नेतृत्व का अर्थ, परिभाषा एवं शैली

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Leadership की उत्पत्ति के संबंध में दो विचार या सिद्धांत हमारे सामने आते हैं- (i) Man theory (ii) Time theory

Man theory इस सिद्धांत के समर्थकों का कहना है कि नेता जन्मजात होते हैं। व्यक्ति में नेता के गुण तथा योग्यता किसी भी परिस्थिति में उसे नेता बना देती है। और नेता जन्म से ही शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक रूप से सुसज्जित होता है। Brown का कहना है कि साधारणत: जनता भी यह सोचती है कि व्यक्ति अपने गुण के कारण ही नेता बन बैठता है।

Time theory इस तरह मानव सिद्धान्त के मानने वालों में Brown भी एक हैं और उन्होंने 1936 ई0 में कहा है कि Wilson, Cloyed George, Kaiser, Lenin और अन्य महान व्यक्तियों के कारण ही विश्व की मुख्य धारणायें व महान परिवर्तन हुए न कि विश्व ऐतिहासिक, आर्थिक, सामाजिक तथा मनावैज्ञानिक रूप से परिस्थिति-परिवर्तन के लिए तत्पर था। ठतवूद के कथन की समर्थक आधुनिक समाजशास्त्री क्रेच एक क्रचकील्ड ने कहा है कि महात्मा गाँधी के प्रभावी नेतृत्व के कारण ही भारत की स्वतंत्रता प्राप्त हुई। महात्मा गाँधी अपने गुण और योग्यता के कारण ही भारतीयों के पुज्य नेता बन गये।उपरोक्त विद्वानों के विचारों से स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति अपने गुण तथा योग्यता के फल स्वरूप ही नेता बनता है। 

Man theory और Time theory दोनों को देखने से पता चलता है कि उत्पत्ति के लिए नेता का गुण तथा परिस्थिति दोनों का होगा आवश्यकता है एक की अनुपस्थिति में कोई भी व्यक्ति नेता नहीं बन सकता। उदाहरण स्वरूप हम कह सकते हैं कि लोकलमक जय प्रकाश नारायण 1974 पूर्व एक भारतीय सैद्धांतिक नेता के रूप में चर्चा के विषय थे परन्तु 1974 कीे क्रांति ने उन्हें लोकमान्य बना दिया। नेता की उत्पत्ति के लिए योग्यता तथा परिस्थिति दोनों एक साथ होना अनिवार्य है। Gibb ने कहा है कि स्मंकमतेीपच व्यक्ति तथा उसके समूह के अन्य सदस्यों के बीच एक प्रकार की सामाजिक परस्पर क्रिया का ही प्रतिफल है।

नेतृत्व की उत्पत्ति के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ 

नेतृत्व की उत्पत्ति के लिए कौन-कौन सी विशेष परिस्थितियाँ होती हैं। जिनमें की नेता अपने गुणों के कारण परिस्थिति विशेष का लाभ उठाकर नेता बन जाते हैं, वे  है।
  1. समूह के निर्माण तथा विकास के लिए नेतृत्व की उत्पत्ति होती है- जब किसी भी समूह का निर्माण होता है तो प्रारंभ में कुछ सदस्य अन्य सदस्यों की अपेक्षा ज्यादा सक्रिय रहते है। और समूह पर सक्रियता के कारण उनका आधिपत्य भी उस समूह पर रहता है और अधिपत्य रखने वाला व्यक्ति उस समूह का नेता होता है और नेतृत्व का श्री गणेश यही होता है।वह नेता समूह के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए नीति निर्धारण एवं योजना का निर्माण करता है। इसलिये हम कह सकते है। कि नेता की उत्पत्ति समूह निर्माण तथा विकास के लिए होती है। 
  2. अस्थिर समूह में नेतृत्व की उत्पत्ति होती है- जब समूह की बनावट अस्थिर रहती है तो उसके सदस्यगण एक ऐसे नेता की खोज करते हैं जो समूह को स्थिर एवं स्थायी बना सके। इस परिस्थिति में योग्य व्यक्ति उस समूह का नेता अपनी योग्यता के आधार पर बन जाता है एवं समूह की आवश्यकताओं को पूरा करता है। अषांत वातावरण में समूह के अन्दर ऐसे नेता दृढ़ता के साथ कार्य को संपादित करते हैं और अपने उप समूहों को भी सुव्यवस्थित करते हैं इसलिये हम कह सकते हैं कि अस्थिर समूह में भी नेतृत्व की उत्पत्ति होती है। 
  3. समस्या युक्त परिस्थिति में नेतृत्व की उत्पत्ति होती है- जब समूह के उद्देश्यों की प्राप्ति में बाहय दबाव या आंतरिक गड़बड़ी रहती है तो इस परिस्थिति में एक ऐसे नेता की आवश्यकता होती है जो आन्तरिक गड़बड़ी एवं वाºय शक्तियों को नष्ट कर समूह की लक्ष्य को प्राप्ति कर सके। इस परिस्थिति में व्यक्ति अपनी योग्यता बुद्धि, ज्ञान, आत्मविश्वास एवं पुरूषार्थ आदि गुणों से उस समूह को सुरक्षा प्रदान करता है। 
  4. व्यक्तिगत आवश्यकताओं की संतुप्ति के लिए नेतृत्व की उत्पत्ति होती है- नेतृत्व की उत्पत्ति समूह के सदस्यों की आवश्यकताओं की संतुष्टि होती है। नेता के महत्व के व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को हम कंधे पर लेगे। अच्छे कार्यों के लिए पुरस्कार एवं बुरे कायोर्ं के लिए दंड देने ,पिता के समान व्यवहार करने आदि में देखते है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नेता की उत्पत्ति होती है। नेता की उत्पत्ति सदस्यों के व्यक्तिगत आवश्यकताओं जैसे प्रतिष्ठा, तादात्म्य, मान-मर्यादा आदि की संतृप्ति के लिए होती है। इसके अतिरिक्त भय, प्रेम क्रोध आदि के संतुलन के लिए नेता की उत्पत्ति होती है। 
  5. नेतृत्व की उत्पत्ति नेता की आवश्यकताओं की संतुप्ति के लिए होती है-नेतृत्व की उत्पत्ति एक गत्यात्मक प्रक्रिया है। नेतृत्व की उत्पत्ति केवल समूह के संपूर्ण परिस्थितियों तथा सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही नहीं होती ,बल्कि नेता के व्यक्ति गत आवश्यकताओं के संतृप्ति के लिए भी नेता की उत्पत्ति होती है। जैसे अधिकपत्य (Dominance)] शक्ति (Power) ] प्रतिष्ठा (Prestige) सामाजिक स्वीकृति (Social recognition) आदि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नेतृत्व की उत्पत्ति होती है।
उपरोक्त सभी विचारों, सिद्धांतों, गुणों तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि नेतृत्व की उत्पत्ति के लिए परिस्थिति तथा व्यक्तिगत शील गुण का होना परम आवश्यक है। सामाजिक परिस्थिति नेतृत्व को उत्पन्न करती है एवं नेता के व्यक्तिगत गुण जैसे-प्रभावशाली व्यक्तित्व, मनोवृति, आधिपत्य की भावना, प्रतिष्ठा की इच्छा आदि गुण रखने वाले व्यक्ति नेता बन जाते हैं।

नेतृत्व की परिभाषाएं 

  1. जॉर्ज आर. टेरी ने नेतृत्व को उस योग्यता के रूप में परिभाषित किया है जो उद्देश्यों के लिए स्वेच्छा से कार्य करने हेतु प्रभावित करता है।
  2. लिंविग्स्टन के अनुसार नेतृत्व से आशय उस योग्यता से है जो अन्य लोगों में एक सामाजिक उद्देश्य का अनुसरण करने की इच्छा जाग्रत करती है। 
  3. मूरे नेतृत्व को एक ऐसी योग्यता मानते हैं जो व्यक्तियों कोनेता द्वारा अपेक्षित विधि के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
  4. जॉन जी. ग्लोवर नेतृत्व को प्रबन्ध का वह महत्वपूर्ण पक्ष मानते है। जो उस योग्यता, सृजनशीलता, पहल शक्ति तथा सहानुभूति को व्यक्त करताहै जिसकी सहायता से संगठन प्रक्रिया में मनोबल का निर्माण करके लोगों का विश्वास, सहयोग एवं कार्य करने की तत्परता प्राप्त की जाती है।
  5. ऑर्डवे टीड के अनुसार, “नेतृत्व उन गुणों के संयोग का नाम है जिनको रखने पर कोई व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से काम लेने के योग्य होता है, विशेषकर उसके प्रभाव द्वारा अन्य लोग स्वेच्छा से कार्य करने के लिए तैयार हो जाते हैं।”
उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि नेतृत्व एक दी हुई स्थिति में लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में किसी व्यक्ति या समूह के प्रयासों को प्रभावित करने की प्रक्रिया है।

नेतृत्व की प्रमुख विशेषताएं 

  1. अनुयायिओं को एकत्रित करना - बिना अनुयायियों के नेतृत्व की कल्पना करना कठिन है। वास्तव में, बिना समूह के नेतृत्व का कोई अस्तित्व ही नहीं है, क्योंकि नेता या नायक केवल अनुवावियों अथवा समूह पर ही अपने अधिकार का प्रयोग कर सकता है। नेतृत्व का उद्देश्य अपने चारों ओर अपने अनुयायियों अथवा व्यक्तियों के समूह को एकत्र करना तथा उन्हें किसी हुई निर्धारित सामूहिक उद्देश्य के प्रति निष्ठावान बनाये रखता है।
  2. अचारण एवं व्यवहार को प्रभावित करना -नेतृत्व, प्रभाव के विचार की अपेक्षा करता है, क्योंकि बिना प्रभाव के नेतृत्व की कल्पना नहीं की जा सकती। नेतृत्व की सम्पूर्ण अवधारणा अब व्यक्तियों के एक-दूसरे के प्रभाव पर केन्द्रित है। लोक प्रशासन में नेतृत्व की भूमिका का सार ही यह है कि कोई अधिषाशी किस सीमा तक अपने सहयोगी अधिशासियों के आचरण का या व्यवहार को अपेक्षित दिशा में प्रभावित कर सकता है। परन्तु इस सम्बन्ध में यह ध्यान रहे कि अन्य व्यक्तियों के आचरण को प्रभावित करने से आशय उनसे अनुचित रूप से कार्य लेने से नहीं है। उसका कार्य अपने अधीनस्थ व्यक्तियों को निर्देशन देना तथा उन्हें एक ऐसे ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित करनाहै ताकि उनमें समझदार स्वहित वाली प्रतिक्रिया स्वत: जाग्रत हो सके। 
  3. पारम्परिक सम्बन्ध : मेरी पार्कर फौले ने नेता तथा अनुयायियों के मध्य पारस्परिक सम्बन्ध को नेतृत्व की प्रमुख विशेषता माना है नेता वह नहीं है जो दूसरों की इच्छा को निर्धारित करता है, परन्तु वह है जो यह जानता है कि दूसरों की इच्छाओं को किस प्रकार अन्तर-सम्बन्धित किया जाय कि उनमें एक साथ मिलकर कार्य करने की प्रेरणा स्वत: जाग्रत हो सके। इस प्रकार एक नेता न केवल अपने समूह को प्रभावित करता है वरन् वह स्वयं भी अपने समूह द्वारा प्रभावित होता है।

अच्छे नेतृत्व की शैली 

कथनी शैली -

  1. औसत से अधिक कार्य- अभिमुखी और औसत से कम सम्बन्ध-अभिमुखी। 
  2. इस शैली के लिए ‘कथनी’ शब्द का अर्थ है कि अनुयायियों से कहना या उन्हें आदेश देना कि उन्हें क्या, कहां और कैसे करना है। 
  3. यह शैली तब सर्वाधिक उपयुक्त है जब अनुयायियों की तत्परता का स्तर औसत से बहुत कम है अर्थात उनमें योग्यता और सहयोगशील दोनों की कमी है। ऐसे में उन्हें निदेशित किए जाने की जरूरत है।
  4. इसे मार्गदर्शक, निदेशक या संरचक (guidancing, directing or structuring) शैली भी कहा जा सकता है। 

विक्रयी शैली -

  1. औसत से अधिक कार्य-अभिमुखी और सम्बन्ध-अभिमुखी।
  2. इस शैली के लिए ‘विक्रयी’ शब्द का अर्थ है कि यहां अनुयायियों को सिर्फ मार्गदर्शन नही दिया जाता, बल्कि उन्हें अपनी बात कहने और स्पष्टीकरण मांगने का अवसर भी दिया जाता है। यहां क्या, कहां और कैसे के साथ-साथ ‘क्यों’ भी जुडा है। यहां ‘क्यो’ का स्पष्टीकरण ही इसे कथनी शैली से अलग करता है। 
  3. यह शैली तब सर्वाधिक उपयुक्त है जब अनुयायियों की तत्परता का स्तर औसत से कम है अर्थात् यद्यपि वे सभी अयोग्य हैं लेकिन प्रयासरत भी है और अपने इस प्रयत्न पर आश्वस्त है। 
  4. इसे व्याख्यापरक, सम्मतिपरक या स्पष्टीकृत(explaining, persuading or clarifying) शैली भी कह सकते है। 

सहभागी शैली -

  1. औसत से कम कार्य-अभिमुखी और औसत से अधिक सम्बन्ध-अभिमुखी व्यवहार। 
  2. इस शैली के जिए ‘सहभागी’ शब्द का आशय है कि यहां नेता के निदेशित व्यवहार की तुलना में समर्थित व्यवहार का महत्तव बढ जाता है। यहां नेता की भूमिका अपने अनुयायियों को सम्पे्रषित करने और उन्हें प्रोत्साहित करने की बन जाती है। 

नेतृत्व के कार्य 

नेतृत्व के कार्यों के सम्बन्ध में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। अलग-अलग विद्वानों ने नेतृत्व की कार्य सूची में भिन्न-भिन्न कार्यो। को सम्मिलित किया है, जो इस प्रकार हैं: -
  1. डाल्टन ई. मैक्फारलैण्ड ने नेतृत्व के कार्यों में भिन्न बातों को सम्मिलित किया है : (1) समूह लक्ष्यों का निर्धारण करना, (2) योजना का निर्माण करना (3) नीति तथा क्रियाविधि निर्धारित करना।, (4) अधीनस्थों का पक्ष-प्रदर्शन करना, (5) कार्यकुशल कर्मचारियों का समूह तैयार करना तथा उनका संरक्षण करना, (6) अधीनस्थों के व्यवहार का उनकी उपलब्धियों के सन्दर्भ में मूल्यांकन करना, (7) अनुयायियों के लिए एक आदर्श प्रदान करना।
  2. नॉरमैन एफ. वाशबर्न ने एक अच्छे नेता द्वारा किये जाने वाले निम्न आठ कार्यों का वर्णन किया है : (1) क्रियाओं का सूत्रपात करना, (2) आदेश प्रदान करना, (3) अपने समूह में स्थापित वाहिकाओं का प्रयोग करना, (4) अपने समूह के नियमों एवं प्रयाओं को जानना और उनकी अनुपालन करना, (5) अनुशासन बनाये रखना, (6) अधीनस्थों को सूनना, (7) अधीनस्थों की आवश्यकताओं के प्रति जागरूक रहना, तथा (8) अधीनस्थों की सहायता करना।
उक्त आधारों पर कहा जा सकता है कि एक नेता को प्रमुख कार्य करने पड़ते हैं :-
  1. अधीनस्थों की भावनाओं एवं समस्याओं को समझना- सफल नेतृत्व के लिए यह आवश्यक है कि नेता को अपने समूह के सदस्यों एवं अपने अधीनस्थों की भावनाओं एवं समस्याआं को अच्छी तरह से समझना चाहिए। लोकतान्त्रिक समाज में कर्मचारियों की भावनाओं एवं समस्याओं की अवहेलना नहीं की जा सकती। 
  2. सहयोग प्राप्त करना-एक प्रशासनिक संगठन के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति समस्त कर्मचारियों के सहयोग से ही सम्भव हो सकती है। अत: आवश्यक है कि एक नेता को सफल होने के लिए अपने समूह के कर्मचारियों का सहयोग प्राप्त हो। इसके लिए उसे प्रशासक के रूप में अपने अधीनस्थों का सहयोग प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिए यह आवश्यक दिलाये कि उपक्रय की सफलता उनके हित में है। 
  3. समन्वय एवं निदेशन-एक सफल नेता का तृतीय प्रमुख कार्य अपने अधीनस्थों के कार्यों में आदेश एवं निदेशक द्वारा समन्वय स्थापित करना है। इसके लिए उसे संप्रेक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाना होगा तथा आदेश एवं निदेशन की प्रक्रिया में भी मानवीय सम्बन्धों को विशेष रूप से ध्यान में रख्ना होगा। 
  4. अनुशासन बनाये रखना - नेता का चौथा कार्य अपने समूह में अनुशासन बनाये रखना भी है क्योंकि अनुशासन द्वारा ही अपने अधीनस्थों को निर्धारित नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित कर सकता है। और कार्य को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए अनुशासन में निहित शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
  5. आदेश देना- नेता स्वयं कार्य न करके अपने अधीनस्थों से कार्य लेता है। अत: उनके द्वारा कार्य को सम्पादित कराने हेतु उसे आदेश देना पड़ता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि आदेश देना ही नेता का एक महत्वपूर्ण कार्य है। 
  6. प्रभावी संप्रेक्षण की व्यवस्था करना-संगठन की गतिविधियों में सामंजस्य एवं सन्तुलन बनाये रखने के लिए और कर्मचारियों में मधुर सम्बन्धों एवं भाईचारे का वातावरण स्थापित करने लिए प्रबन्धकों अर्थात् समूह नायकों को संप्रेषण की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। इस दिशा में नेता ही इस प्रकार की संप्रेषण प्रक्रिया की व्यवस्था करता है, जिससे अधीनस्थों और उसके मध्य विचारों, आदेशों, आदि का आदान-प्रदान निरन्तर होता रहे।
  7. संगठन के प्रति निष्ठा बनाये रखना- एक कुशल नेता का यह भी प्रमुख कार्य है कि वह अपने अधीनस्थों से सम्बन्धित निर्णय आम सहमति से लें। 
  8. सहयोग प्राप्त - नेता अपने समूह से सहयोग प्राप्त करता है। सहयोग द्विमार्गीय प्रक्रिय होती है। अधिकारी और समूह दोनों के सहयोग से ही कार्य को सर्वश्रेष्ठ ढंग से पूरा करना सम्भव होता है। सहयोग की प्राप्ति के लिए नेता निम्न कार्य करता है : (i) वह अपने प्रत्येक अनुयायी को विश्वास दिलाताहै कि संगठन का सफल परिचालन और उसके लिए अपने समूह के हितों को जानना और समझना आवश्यकता होता है। (ii) नता के लिए एक कुशल मनोवैज्ञानिक होना भी आवश्यक है। उसके लिए अपने समूह के हितों को जानना और समझना आवश्यक होता है (iii) सहयोग विश्वास पर आश्रित होता है। लोग तभी सहयोग करते हैं, जब उनको अपने नेता में पूर्ण विश्वास होता है। 
  9. शक्ति का प्रयोग -नेतृतव के साथ शक्ति जुड़ी होती है। इस शक्ति का प्रयोग न्यायिक एवं सहानुभूतिपूर्ण तरीके से भी तय किया जा सकता है और बल एवं उत्पीड़न के द्वारा भी किया जा सकता है। वस्तुत: एक नेता अपनी शक्ति, काप्रयोग उपक्रम ओर समूह के हित साधन में करता है। 
  10. समन्वय एवं आदेश- वांछित परिणाम की प्राप्ति के लिए नेता आदेशों के माध्यम से अपने अधीनस्थों के कार्यों में समन्वय स्थापित करता है। लिविंग्स्टन के अनुसार नेता द्वारा दिये जाने वाले आदेश स्ुनिश्चित क्रमबद्ध, लोचपूर्ण और स्पष्ट होने चाहिए। 
  11. अनुशासन अनुरक्षण - अनुशासन एक प्रकार का बल है, जो समूह के प्रत्येक सदस्य को समूह के नियमों, प्रथाओं, आदतों, परम्पराओं, आदि के अनुसार उत्पन्न परिस्थितिमें वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप से प्रतिक्रिया को जन्म देता है। कुछ अनुशासन नियमों एवं कानूनों द्वारा आरोपित और कुछ स्वयं द्वारा आरोपति होता है। अनुशासन को बनाये रखने की दृष्टि से नेता द्वारा किये जाने वाले अनुरक्षण और अनुमोदन दोनों सुसंगत होने चाहिए। 
  12. उच्च समूह मनोबल का विकास-नेता निरन्तर अपने समूह के सदयों का मनोबल ऊंचा बनाये रखता है, क्योंकि मनोबल बढ़ने के साथ लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में किये जाने वाले प्रयासों में प्रबलता आती है और मनोबल के गिरने के साथ यह प्रबलता क्षीण हो जाती है।

नेतृत्व की विचारधाराएं 

नेतृत्व के सम्बन्ध में अनेक विचारधाराएं प्रचलित हैं। इन विचारधाराओं को नेतृत्व अध्ययन के दृष्टिकोण अथवा उपागम भी कहा जाता है। नेतृत्व सम्बन्धी प्रमुख विचारधाराएं एवं दृष्टिकोण हैं :-

महान् व्यक्ति दृष्टिकोण -

नेतृत्व के अध्ययन के दृष्टिकोण इस मान्यता पर आधारित है कि ‘नेता पैदा होते हैं, बनाये नहीं जाते।’ यह विचारधारा इस बात में विश्वास रखती है कि ‘नेता नेता है’ (A Leader is a Leader) अर्थात् वह महान् व्यक्ति है और हर तरह से योग्य है। इन नेताओं में वंशानुगत रूप से नेतृत्व गुण होते हैं। ऐसे महान जन्मजात नेताओं के उदाहरण बताए जाते हैं, जैसे महात्मा गांधी, माओ, अब्राहम लिंकन, सिकन्दर, आदि। इस विचारधारा के समर्थक’ अधिशासी विकास’ (Exective Development) की नीति में कोई विश्वास नहीं रखते। नेतृत्व की सफलता के मूल्यांकन के लिए वे नेता के व्यवहार एवं उसकी कार्यविधियों के अध्ययन एवं विश्लेषण में कोई रुचि नहीं रखते। इस विचारधारा की यह मान्यता है कि ऐसे लोग किसी भी समय, काल व परिस्थिति में नेता के रूप में सफल होते है। क्योंकि उनमें जन्मजात नेतृत्व कौशल व गुण पाए जाते है। यह कहा जाता है कि इतिहास इन्हीं महान व्यक्तियों की कथा कहानी है। ऐसे महान् नेता अपने युग के रचयिता होते हैं, न कि वह युग उनका रचयिता होता है। इस विचारधारा से आशय झलकता है:
  1. कुछ लोगों को महान् बनने का दैवी वरदान मिलता है। ऐसे नेता मानवता के लिए दैवी उपहार हैं। इन नेताओं में दिव्य गुण व विषिश्टता होती है। 
  2. नेता बनने के लिए और अपने अनुयायियों को प्रभावित करने के लिए तथा सफलता पाने हेतु जन्मजात नेतृत्व कौशल आवश्यक और पर्याप्त होते हैं। 
  3. यह विचारधारा इस बात को अमान्य बनाती है कि किसी व्यक्ति को नेतृत्व करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। नेतृत्व गुणों को शिक्षा व प्रशिक्षण द्वारा विकसित नहीं किया जा सकता। 

गुण दृष्टिकोण -

’गुण’ विचारधारा महान् व्यक्ति दृष्टिकोण से भिन्न है। गुण दृष्टिकोण इस मान्यता पर आधारित है कि सफल नेतृत्व नेता की व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं पर आश्रित होता है और उन विशेषताओं व गुणों का व्यवस्थित रूप से अध्ययन एवं विष्लेशण करना सम्भव होता है। यहां नेतृत्व के विष्लेशण करने का उद्देश्य बौद्धिक, शारीरिक, सामाजिक, भावात्मक और अन्य व्याक्तत्वजन्य विशेषताओं को पहचान करना रहा है जो प्रभावी नेताओं में पाए जाते हैं। जहां तक व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों के निर्धारिण का प्रश्न है यह अत्यनत विवादास्पद मामला है। गुण सूची में 5-6 से लेकर 20 इससे भी अधिक गुणों को सम्मिलित किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में कोई सर्वसम्मत गुणसूची उपलब्ध नहीं है। यद्यपि अन्यशास्त्री किसी एक सामान्य गुण सूची के सम्बन में मतैक्य उत्पन्न नहीं कर सके हैं तथापि तीन सामान्य गुण क्षेत्रों के सम्बन्ध में निर्विवाद रूप से एकमत हैं-
  1. बुद्धिमत्ता, 
  2. संचार चातुर्य,
  3. समूह लक्ष्य की मूल्यांकन योग्यता। 
स्टोइगिल ने गुण विचारधारा मूलक साहित्य का विस्तृत सर्वेक्षण करने के बाद यह बताया है कि एक प्रभावी नेता में विभिन्न गुण होते हैं। इनमें से पांच शारीरिक गुण, चार बुद्धि और योग्यतामूलक गुण, सोलह व्यक्तित्व जन्य गुण, छ: कार्य से सम्बधी गुण तथा नौ सामाजिक गुण है। स्टोडगिल द्वारा प्रस्तृत्व गुणों के ये वर्गीकरण इस प्रकार हैं :-
  1. शारीरिक गुण - जैसे लम्बाई, सवास्थ्य, हृष्ट-पुष्ट, रंग-रूप, आदि। 
  2. बुद्धि और योग्यता का गुण-जैसे धैर्य, उदारता, आत्मविश्वास, आदि। 
  3. व्यक्तित्वजन्य गुण-जैसे धैर्य, उदारता, आत्मविश्वास, आदि।
  4. कार्य से सम्बन्धित गुण-जैसे उपलब्धि, उद्यमशीलता, पहलपन, प्रबलपन, प्रबल इच्छाशक्ति, आदि। 
  5. सामाजिक गुण-जैसे सहकारिता, पर्यवेक्षकीय योग्यता, अन्तव्र्यक्तिगत कौशल, आदि। 

परिस्थितीय दृष्टिकोण - 

इस दृिश्कोण का विकास आर. एम. स्टोडगिल एवं उकने सहयोगियों द्वारा किया गया है। यह विचारधारा इस तथ्य पर बल देती है कि नेतृत्व की सफलता उस परिस्थिति विशेष से प्रभावित होती है, जिसमें नेता कार्य करता है। नेतृत्व की सफलता के अध्ययन में परिस्थिति विशेष का विश्लेषण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक सफल नेता का व्यवहार सदैव एकसा नहीं रहता। वह भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न तरह से व्यवहार करता है। 

परिस्थितीय दृष्टिकोण वह आकस्मिकता मत है जिसमें ध्यान अनुयायियों पर केन्द्रित किया गया है। नेतृत्व पद्धति का चुनाव करके सफल नेतृत्व प्राप्त किया जा सकता है।यह चुनाव हरसे-ब्लेनकार्ड के मतानुसार अनुयायी की परिपक्वता पर निर्भर करता है। यह मत नेतृत्व के दो परिणाम मानता है-लक्षित कार्य व्यवहार तथा सम्बन्ध व्यवहार। इन अन्वेशकों का विश्वास है कि कार्मियों की कार्य में परिपक्वता बढ़ने के साथ-साथ नेतृत्व पद्धति में भी बदलाव किया जाना चाहिए। हरसे-ब्लेनकार्ड ने चार नेतृत्व पद्धतियों का वर्णन किया है जिन्हें कार्मिकों की परिपक्वता स्तरों से सम्बन्धित किया जा सकता है : -
  1.  निदेश, 
  2. विक्रय, 
  3. भाग ग्रहण एवं 
  4. हस्तान्तरण। 

व्यवहार दृष्टिकोण -

व्यावहार दृष्टिकोण में नेता के व्यक्तिगत गुणों और उसकी विशेषताओं के स्थान पर उसके व्यवहार के अध्ययन एक अधिक बल दिया जाता है। व्यवहार से अभिप्राय नेता द्वारा किये जाने वाले कार्य और नेतृत्व विष्लेषण के इस दृष्टिकोण में अधिकारियों द्वारा निरोजन, अभिप्रेरणा एवं संचार में लगाया जाने वाला समय और विधि का अध्ययन सम्मिलित है। इस दृष्टिकोण के अनुसार नेतृत्व की सफलता नेताओं के व्यवहार पर निर्भर करती है अर्थात् किसी नेता की सफलता का मूल्यांकन उसके व्यवहार का विष्लेशण करके ही किया जा सकता है। 

लक्ष्य विचारधारा - 

नेतृत्व की इस विचारधारा के प्रारम्भिक प्रतिपादक हाऊस है किन्तु बाद में इसे हाऊस और मिचैल द्वारा विकसित किया गया। यह विचारधारा ओहिओ स्टेटे नेतृत्व अध्ययन और अभिप्रेरणा के प्रत्याशा सिद्धान्त से पे्ररित है। पथ-लक्ष्य विचारधारा का इस बात पर बल है कि नेता अधीनस्थों को पथ-लक्ष्यों तथा आवश्यकता-सन्तुष्टि के प्रति उनके अवबोध को प्रभावित कर संगठनात्मक प्रभावशीलता को अनुकूलतम बना सकते है। इसकी पहली मान्यता यह है कि अधीनस्थों द्वारा नेता को स्वीकारा जाता है और उसके लक्ष्यों, योजनाओं व नीतियों का उस सीमा तक प्रत्युत्तर दिया जाता है जिस सीमा तक उन्हें यह लगता है कि उसने उनकी तात्कालिक या भावी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होगी। 

इसकी दूसरी मान्यता है कि नेता अपने अधीनस्थों से सफलतापूर्वक कार्य लेने व संगठनात्मक लक्ष्यों में योगदान करने में उस सीमा तक सफल होगा जिस सीमा तक उन्हें यह लगता है कि उनसे उनकी तात्कालिक या भावी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होगी। इसकी मान्यता यह है कि अधीनस्थों द्वारा नेता को स्वीकारा जाता है और उसके लक्ष्यों, योजनाओं व नीतियों का उस सीमा तक प्रत्युत्तर दिया जाता है जिस सीमा तक उन्हें यह लगता है कि उनसे उनकी तात्कालिक या भावी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होगी। इसकी दूसरी मान्यता है कि नेता अपने अधीनस्थों से सफलतापूर्वक कार्य लेने व संगठनात्मक लक्ष्यों में योगदान करने में उस सीमा तक सफल होगा जिस सीमा तक वह (अ) कर्मचारियों की आवश्यकता-सन्तुष्टि को प्रभावी निष्पादन पर आधरित करताहै और, (ब) उन्हें प्रभावी निष्पादन के लिए तैयार करने, (ब) उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता व मार्गदर्शन देने, तथा (स) उनकी आवश्यकता-सन्तुष्टि को प्रभावी निष्पादन पर आधारित करने की कितनी योग्यता रखता है। 

इस प्रकार, जब कर्मचारियों को यह लगता है कि उनकी आवश्यकता निष्पादन पर आधारित करने की कितनी योग्यता रखता है। इस प्रकार, जब कर्मचारियों को यह लगता है कि उनकी आवश्यकता सन्तुष्टि उनके प्रभावी निष्पादन पर निर्भर है, तब वे संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति में अपनी पूरी क्षमता से काम करेंगे और अपना अनुकूलतम योगदान प्रदान करेंगे। 

जीवन चक्र दृष्टिकोण -

ए.के. कोरमेन पाल हर्से तथा केनेथ ब्लेनकार्ड इस दृष्टिकोण के प्रणेता है। यह दृष्टिकोण ‘ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के अध्ययनों’ का परिणाम है। जीवन चक्र दृष्टिकोण में नेता की विशेषताओं तथा परिस्थिति के स्थान पर अनुयायियों की महत्ता पर बल दिया गया है। इसकी मान्यता के अनुसार नेतृत्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक अनुयायी होते है।
क्योंकि प्रत्येक परिस्थिति में व्यक्तिगत रूप से वे ही किसी नेता को स्वीकार अथवा अस्वीकार करते हैं और सामूहिक रूप से वे ही वस्तुत: नेता की व्यक्तिगत शक्ति का निर्धारण स्रोत होते हैं। इस नेतृत्व की यह मौलिक मान्यता है कि सर्वाधिक प्रभावशाली नेतृत्व शैली की उपयुक्तता अनुयायियों की तत्परता-सतर पर निर्भर है। हर्से और ब्लेनकार्ड ने कई परिस्थित्यात्मक कारकों की चर्चा की है-नेता, अनुयायाी, शीर्ष अधिकारी (boss) , मुख्य सहयोगी (key associates), संगठन, कार्य की प्रकृति (job-demands) और निर्णय-समय। लेकिन उनका यह दृढ़ विचार है कि किसी भी नेतृत्व-स्थिति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक नेता और उनके अनुयायियों के बीच सम्बन्ध ही है। यदि अनुयायी नेता का अनुसरण न करने की ठान लें तो फिर यह बात अर्थहीन है कि शीर्ष अधिकारी और मुख्य सहयोगियों के क्या विचार है। अथवा कार्य की प्रकृति कैसी है। अनुयायियों के बिना नेतृत्व नहीं किया जा सकता है।

नेतृत्व के प्रकार 

परिस्थित्यात्मक नेतृत्व -

  1. वह अपने अधीनस्थों को अपने कार्यक्षेत्रों में महत्वपूर्ण निर्णय लेने की अनुमति देता है। 
  2. वह अपने अधीनस्थों को उन निर्णयों को लेने में सहभागी बनाता है जो उन्हें प्रभावित करते हैं। 
  3. वह अपने आदेशों में अन्तर्निहित कारणों को स्पष्ट करता है तथा भावी योजनाओं से समूह को अवगत रखता है। 
  4. वह अपने अनुयायियों को एक सामाजिक इकाई के रूप में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है।। 
  5. वह कर्मचारी-केन्द्रित अधिक होता है और कर्मचारियेां को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान करता है। व मूलाधार पॉल हर्से और ब्लेनकार्ड का मानना है कि नेता की कौन-सी नेतृत्व शैली सर्वाधिक उपयुक्त होगी, यह वस्तुत: लोगों के तत्परता-स्तर पर निर्भर है। इससे स्पष्ट है कि अनुयायियों या अधीनस्थों की तत्परता का स्तर यह निर्धारित करता है कि नेता द्वारा किस नेतृत्व शैली का चयन होना चाहिए। 

निर्बाध नेतृत्व -

यह एक ऐसे प्रकार का नेतृत्व है जिनमें नेता अपने अनुयायियों और अधीनो के साथ सम्पर्क नहीं रखता और उन्हें अपने लक्ष्य निर्धारित करने तथा स्वयं निर्णय लेने के लिए अवसर प्रदान करता है। वास्तव में, अधीनस्थानों को पर्याप्त अधिकार सौंप दिये जाते है। ऐसा नेता मार्गदशर्न नहीं करता है। इस प्रकार वह आज्ञा देने के आदेश होता है। वह सम्पूर्ण प्रयास में शायद ही अपना योगदान देता है।

फलत: सम्पूर्ण संगठन में अव्यवस्था पायी जाती है, क्योंकि वह व्यक्तियों को विभिन्न दशाओं में कार्य करने की अनुमति प्रदान करता है। ऐसा नेतृत्व उसी स्थिति में सफल हो सकता है जब अधीनस्थ पूर्णतया समझदार तथा कर्तव्य के प्रति निष्ठावान हो। यही कारण है क इस प्रकार का नेतृत्व कुछ विशेष परिस्थितियों में ही सफल हो सकता है। सामान्य रूप से इस प्रकार के नेतृत्व को अपनाने का सुझाव नहीं दिया जा सकता।

जनतन्त्रीय नेतृत्व -

जनतन्त्रीय विचारों वाला नेता ऐसा व्यक्ति होता है जो कि समूह के साथ विचार-विमर्श करके नीतियों का निर्माण करता है। इस प्रकार के नेतृत्व की अवधारणा अधिकार तथा निर्णयन के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है। एक लोकतांत्रिक नेता अपने अनुयायी को एक सामाजिक इकाई के रूप में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है तथा समूह के सदस्यों की निपुणताओं और योग्यताओं का पूरा-पूरा लाभ उठाता है।

नेतृत्व सम्बन्धी गुण 

  1. संपे्रषण की योग्यता (Ability to Communicate)- एक अच्छे नेता में निदेशों एवं बिचारों तथा आदेशों को अन्य व्यक्तियों को संप्रेषित करने की योग्यता होनी चाहिए। साथ ही साथ संपे्रझण के परिणमस्वरूप् उसमें अन्य व्यक्तियों की प्रतिक्रिया जानने की झमता भी होनी चाहिए।
  2. सत्यनिष्ठा (Integrity)-नेतृत्व सर्वोत्तम ढंग से उसी समय कार्य करता है जबकि वह सद्भावना, निश्कपटता तथा सत्यनिष्टा, नैतिक सुटृढता एवं सच्चाई पर आधारित होता है।
  3. निर्णायकता (Decisiveness)- यह गुण नेता मे निर्णय लेने से सम्बन्धित होता है। प्रत्येक नेता में किसी भी परिस्थिति मे निर्णय लेने की झमता अवश्य होनी चाहिए क्योकि प्रभावशाली निर्णयकर्ता पर भी संगठन क्ी सफलता निर्भर करती है।
  4. उत्साहित करने की योग्यता (Ability to Inspire)- एक नेता मे अपने अनुयायियों को प्रभावित करने की पर्याप्त योग्यता होनी चाहिए।
  5. साहस (Courage)- एक नेता में उन कार्यो को करने जिन्हें वह ठीक समझता है, का नैतिक साहस होना चाहिए। उन्हें निर्णय लेने और उन निर्णयों के अनुसार कार्य करने में अडिग बने रहने के लिए निभ्र्ाीक होना चाहिए। फील्ड मार्शल स्लिम के अनुसार, ‘‘बिना साहस के कोई भी सद्गुण प्रभावी नही होते है। क्योकि विश्वास, आशा तथा दया आदि सभी सद्गुण नही रह पाते जब तक कि उनका प्रयोग करने के लिए साहस का आश्रय नही लिया जाता है’’
  6. विचारों में लोचशीलता (Flexibility in Ideas)-त्रीव गति से परिवर्तनशील सामाजिक आर्थिक वातावरण मे एक नेता में लोचशीलता होना आवश्यक है। परिस्थितियों के बदलने पर उसमें अपने विचारों में परिवर्तन करने की झमता भी होनी चाहिए।
  7. उत्तरदायित्व (Responsbility)-एक अच्छे नेता मे दूसरे उत्तरदायित्व को निभाने की झमता भी होनी चाहिए। अपने उत्तरदायित्व को वहन करने पर ही वह अपने नैतिक कर्तव्य को पूरा कर सकता है।
  8. अनुभूति (Persuasiveness)-एक नेता में दूसरे व्यक्तियों की भावनाओं, जिज्ञासाओं, हितों एवं परिस्थितियों को समझने एवं अनुभव करने की क्षमता होनी चाहिए। एक अच्छा नेता वही माना जाता है जो अपने अधीनस्थों की भावनाओं के अनुरूप कार्य करता है। लोग ऐसे नेता के आदेशों का अनुपालन करते है, उसके निर्देशानुसार अपना कार्य स्वेच्छा से करने के लिए तत्पर रहते है।
  9. समझदारी :- एक नेता में अपने अनुयायियों से अधिक समझदारी होनी चाहिए जिससे कि वह पूर्व उचित मार्गदर्शन दे सके और उनसे अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति कर सके।
  10. अच्छा निर्णय :- एक अच्छे नेता में भविष्य के सन्दर्भ में सोचने एवं समझने की क्षमता होनी चाहिए जिससे कि वह भविष्य में किये जाने वाले कार्यों एवं समस्याओं के समाधान के लिए अच्छे निर्णय ले सके।
उपर्युक्त गुणों का विश्लेषण करने पर यह निश्कर्ष निकलता है कि एक नेता में दो प्रकार के गुणों का होना नितान्त आवश्यक है : -(i) अनिवार्य गुण तथा, (ii) आन्तरिक एवं अमूर्त गुण।
  1. अनिवार्य गुणों के अन्तर्गत साहस, दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, निर्णायकता, बुद्धिमानी कल्पना शक्ति, सक्रियता निपेक्षा, समन्वय, संपेश््राण एवं प्रबन्ध करने की क्षमता, रचनात्मकता, आदि गुण सम्मिलित किये जाते है।
  2. आन्तरिक गुणों के अन्तर्गत सत्यनिष्ठा, नैतिक, साहस, उदारता कूटनीतिज्ञता, व्यवहार कौशल शिष्टाचार सामंजस्य का तथा परानुभूति के गुण सम्मिलित है। ये सभी गुण मिलकर किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाते हैं। नेता का व्यक्तित्व प्रसन्नचित होना चाहिए ये सभी गुणों के होने पर उसके सहायोगी एवं अनुयायी उसे पसन्द करेंगे। और उस पर विश्वास करेंगे साथ-साथ एक अच्छे नेता को अपने अधीनस्थों को प्रोत्साहित करने तथा उनकी सहायता करने की तत्परता होनी चाहिए।
नेता को अपने अधीनस्थों की विशेषताओं का मूल्यांकन भी करना चाहिए कि उनमें कितनी सक्षमता, अभिप्रेरणा तथा प्रतिबद्धता है। यदि उनमें आत्मनिर्भरता की अत्यधिक आवश्यकता है। निर्णयन के उत्तरदायित्व को ग्रहण करने की तत्परता है, अस्पष्टता कि प्रति उच्चस्तरीय सहनशीलता है, समस्या में रूचि है, संगठनात्मक लक्ष्यों के प्रति समझ व प्रतिबद्धता है, निर्णय लेने के लिए आवश्यक ज्ञान व कुशलता है तथा निर्णयन में सहभागी बनने की अपेक्षा है तो उन्हें निर्णय लेने की अधिक स्वतन्त्रता दी जा सकती है।

परिस्थितियों में निहित शक्तियां भी नेतृत्व शैली के चुनाव को प्रभावित करती जैसे कि संगठन की विशेषताएं जैसे उसके परम्पराएं कार्यशील ईकाई का आकार उनका भौगौलिक स्थल उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु आवश्यक स्तर संगठनात्मक और संगठन के भीतर अन्तरक्रियाओं की मात्रा समूह सदस्यों का एक इकाई के रूप में साथ साथ काम करने की क्षमता समस्या की प्रकृति व उसके लिए अपेक्षित ज्ञान व सफलता, समय का दबाव और दीर्घकालीन व्यूहरचना।

नेता को अपने अधीनस्थों की वैयक्तिक रूप से और समूह सदस्यों के रूप में विशेषताओं का तथा संगठन एवं उदाहरण में निहित शक्तियों का पता होना चाहिए, उसमें परिस्थिति के अनुरूप उपयुक्त नेतृत्व शैली को अपनाने की स्पष्टता होनी चाहिए। वे इस निश्कर्ष पर पहुँचते है कि एक सफल प्रबन्धक न तो सुदृढ़ होता है और न ही अनुमत प्रस्तुत परिस्थितियों का सही सही आकलन कर अपने लिए सर्वाधिक उपयुक्त नेतृत्व व्यवहार का निर्धारण करता है। और वैसा व्यवहार करता है। वह अन्तदृश्टिपूर्ण तथा लाचशील दोनों होता है। इसलिए उसे नेतृत्व की समस्या असमंजस में नहीं डालती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि टैननबाम और शिमिट ने प्रबन्धकों के लिए नेतृत्व शैलियों के चयन हेतु व्यावहारिक मार्गदर्शन रूपरेखा प्रस्तुत की है। उनका यह योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि वे इस बात को मान्यता देते है कि सभी परिस्थितियों में एक विशिष्ट नेतृत्व शैली प्रभावित नहीं होती। प्रबन्धक को प्रस्तुत परिस्थितियों के अनुरूप अपने नेतृत्व व्यवहार में परिवर्तन चाहिए। नेतृत्व के निम्नलिखित गुणों का उल्लेख किया है : -
  1. स्वास्थ्य एवं शारीरिक स्वस्थता या क्षमता, 
  2. समझदारी मानसिक शक्ति, 
  3. नैतिक गुण, 
  4. समानता, तथा 
  5. प्रबन्धकीय योग्यता। 
श्री केट्ज ने एक नेता में तीन प्रकार के गुणों के होने पर विशेष बल दिया है : -(1) तकनीकी गुण, (2) माननीय गुण तथा (3) सैद्धान्तिक गुण।
  1. तकनीकी गुणों से आशय उसकी उस योग्यता से है जिसके द्वारा वह अपने ज्ञान, एवं तकनीकों का समुचित रूप से अपने कार्य निष्पादन में प्रयोग करने में समर्थ हो पाता है। यह योग्यता उसको अनुभव, तथा प्रशिक्षण से प्राप्त होती है। 
  2. मानवीय गुण के अन्र्तगत उसकी उस योग्यता एवं निर्णयन की क्षमता को सम्मिलित किया तथा सहायता से वह अन्य व्यक्तियों के साथ कार्य करने में अभिप्रेरण प्रक्रिया को समझने में तथा प्रभावी नेतृत्व का उपयोग में स्वयं हो पाता है। 
  3. सैद्धान्तिक गुण से आशय उसकी योग्यता से है जो उसे समग्र संगठन को समझने तथा यह ज्ञात उसमें उसका क्या स्थान है, में समर्थ बनाती है।

Comments

  1. बहुत ही सहायक और उपयोगी सिद्ध हुआ! कोटिशः धन्यवाद!

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