सुपर बाजार क्या है?

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सुपर बाजार या मिला-जुला भण्डार का अर्थ उस फुटकर व्यापारिक संस्था से है जो विभिन्न प्रकार की दैनिक आवश्यकता की वस्तुएँ नकद या स्वयं-सेवा के आधार पर बेचती है। अन्य शब्दों में, सुपर बाजार एक बड़े पैमाने पर विभागीय फुटकर व्यापार करने वाली संस्था है जो विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का व्यापार करती है, स्वयं-सेवा के आधार पर कम से कम ग्राहक-सेवा द्वारा चलाई जाती है, जिसमें समान मूल्य नीति अपनायी जाती है और जिसमें वाहन खड़े करने हेतु पर्याप्त स्थान करता है। सुपर बाजार को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है-
  1. डिक्शनरी ऑफ बिजनेस एण्ड फाइनेन्स के अनुसार, ‘‘सुपर बाजार वह बडा फुटकर भण्डार है जो घर में काम आने वाली विभिन्न वस्तुओं का विक्रय करता है।’’ 
  2. कण्डिफ एवं स्टिल के अनुसार, ‘‘सुपर बाजार एक दीर्घस्तरीय फुटकर व्यापार करने वाली व्यावसायिक इकाई है जो कम लागत पर मुख्यत: खाद्य पदार्थो एवं किराना वस्तुओं का व्यापार करती है, स्वयं सेवा के आधार पर विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बेचती है और वस्तुओं पर विशेष ध्यान देती है।’’
इस प्रकार सुपर बाजार एक बड़ा व्यापार करने वाली संस्था है जो विभिन्न प्रकार की दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं का स्वयं-सेवा के आधार पर व्यापार करती है, जैसे- फल, सब्जी, सूखे मेवे, माँस, बेकरी एवं डेयरी का सामान आदि।

अत: इसे ‘सहकारी मण्डली’, ‘संस्ता बाजार’, ‘जनता बाजार’, ‘अपना बाजार’, ‘सहकारी बाजार’ आदि नामों से भी जाना जाता है। सुपर बाजार जनता तथा राज्य दोनों के सहयोग के आधार पर चलाया जाता है। ऐसे बाजार एक छत के नीचे अनेक दुकानों के रूप में होते हैं तथा यहॉं डाक, तार, होटल, बैठने आदि की सुविधाए भी होती हैं। ग्राहक इन बाजारों में प्रवेश करके अपनी पसंद की वस्तु स्वयं उस पर लगी कीमत स्लिप को देखकर चुन लेते हैं। काउन्टर क्लर्क बिल बनाकर भुगतान प्राप्त कर लेता है तथा पैकिंग कर सामान ग्राहक को सौंप देता है। भारत में इस समय लगभग 150 से अधिक सुपर बाजार हैं।

सुपर बाजार की विशेषताएँ - 

  1. सुपर बाजार वृहद्स्तरीय फुटकर व्यापार की एक संस्था है।
  2. इसका संचालन स्वयं-सेवा पद्धति, जैसे- वस्तुओं को छाँटना, देखना, पसन्द करना आदि के आधार पर किया जाता है। 
  3. इस बाजार में क्रेताओं को खुली आलमारियों में रखी हुई वस्तुओं में से अपनी रूचि एवं पसन्द की वस्तुएँ छाँटने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। 
  4. सुपर बाजार में बिकने वाला सामान अनेक प्रकार का होता है, जैसे- खाद्य पदार्थ सामग्री, सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री, दैनिक एवं घरेलू उपयोग की वस्तुएँ आदि। 
  5. प्रत्येक वस्तु का मूल्य पूर्व निश्चित होता है, जिसके मोल-भाव की आवश्यकता नहीं है। 
  6. यहाँ ‘दाम दो, माल लो’ का सिद्धान्त लागू होता है। 
  7. सुपर बाजारों में पृथक्-पृथक वस्तुओं को बेचने के लिए पृथक-पृथक सामग्री विभाग स्थापित किये जाते हैं।
  8. इन बाजारों में केन्द्रीय भुगतान व्यवस्था हैं। इसलिए इसके अन्तर्गत क्रेता अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ विभिन्न विभागों में से चुनकर काउन्टर पर लाता है और वहाँ बैठे कर्मचारी को मूल्य चुकाता है।

सुपर बाजार के लाभ-

सुपर बाजार से दो पक्षकारों को विशेष लाभ होता है- एक व्यवसायी, तथा द्वितीय ग्राहकों या उपभोक्ताओं को, जो हैं-

व्यवसायियों को लाभ-

  1. अधिक बिक्री- चूंकि सुपर बाजार में कम संचालन लागत एवं कम मूल्य पर अच्छी वस्तुएँ मिल जाने के कारण कम मूल्य पर बेची जानी सम्भव होती है। फलत: बिक्री की मात्रा बढ़ जाती है।
  2. बड़े पैमाने के लाभ- यहाँ पर वस्तुओं का क्रय-विक्रय बड़े पैमाने पर किया जाता है, जिससे एक तो उत्पादकों से वस्तुएँ सस्ती दर पर मिलती है एवं अन्य व्यय भी कम हो जाते हैं। फलस्वरूप बड़े पैमाने के लाभ जो एक साधारण फुटकर व्यापारी को नहीं मिलते, वे इन्हें मिल जाते हैं। 
  3. कर्मचारियों की समस्याओं से मुक्ति- सुपर बाजार में विक्रेता न रखने के कारण बहुत कर्मचारी रखे जाते हैं। अत: इनके संचालन, विक्रेताओं की नियुक्ति एवं नियन्त्रण आदि समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। 
  4. कम संचालन व्यय- सुपर बाजार में विक्रेताओं की सेवाएँ न लिये जाने के कारण संचालन व्यय कम हो जाते हैं।
  5. नकद विक्रय- सुपर बाजारों में प्राय: नकद व्यापार ही किया जाता है, फलस्वरूप ऋण डूबने का भय नहीं रहता है। 
  6. अधिक लाभ- इन बाजारों में ‘कम लाभ, अधिक बिक्री’ सिद्धान्त को अपनाये जाने के कारण संचालन लागत में कमी, बड़े पैमाने पर क्रय-विक्रय के लाभ होते हैं, फलस्वरूप लाभ की मात्रा बढ़ जाती है।

ग्राहकों या उपभोक्ताओं को लाभ-

  1. वस्तुओं की उपलब्धि- सुपर बाजार की व्यवस्था से ग्राहकों को सभी घरेलू वस्तुएँ एक ही स्थान पर उपलब्ध हो जाती है। अत: ग्राहकों को इधर-उधर भटकने की आवश्यकता नहीं होती है। 
  2. क्रय परामर्श का अभाव- इन बाजारों में विक्रेता के अभाव में वस्तु के गुण तथा उसकी प्रयोग विधि आदि बातों की जानकारी नहीं मिल पाती है। वे ग्राहक जो वस्तु के चुनाव में स्वयं निर्णय नहीं ले पाते हैं, उन्हें यहाँ माल खरीदने में काफी कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त गलत वस्तु का चुनाव होने की भी सम्भावना बनी रहती है। 
  3. कम मूल्य- सुपर बाजारों की संचालन लागत कम आने से ग्राहकों को जो मूल्य देना पड़ता है, वह अन्य दुकानों स े कम होता है यहाँ पर निश्चित मूल्य पर ही विक्रय किया जाता है। अत: ग्राहकों को किसी प्रकार की सौदेबाजी नहीं करनी पड़ती है। 
  4. धन व समय की बचत- इस प्रणाली में विक्रेताओं के न होने के कारण उनसे बातचीत करने एवं वस्तु के बारे में पूछताछ करने के बारे में लगने वाला समय बच जाता है। 
  5. केन्द्रीय स्थिति- ये बाजार प्राय: नगर के केन्द्र में स्थापित किये जाते हैं, जिससे किसी भी क्षेत्र से उपभोक्ता को वहाँ पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं होती है। 
  6. निश्चित मूल्य- सुपर बाजारों में वस्तुएँ निश्चित मूल्य पर बेची जाती हैं जिससे सौदेबाजी में नश्ट होने वाला समय बच जाता है, साथ ही धोखे से भी बचा जाता है। 
  7. चुनाव की पूर्ण स्वतन्त्रता- इस प्रणाली में विक्रेता कर्मचारियों का अभाव होने के कारण ग्राहकों को अपनी मनपसन्द वस्तुएँ चुनने की स्वतन्त्रता होती है। 

सुपर बाजार की हानियाँ- 

जहाँ सुपर बाजार के अनेक लाभ हैं, वहाँ हानियाँ भी हैं। लाभों की भाँति हानियाँ भी व्यवसायी एवं ग्राहकों दोनों वर्गों को हैं। ये हानियाँ हैं-

व्यवसायियों को हानियाँ- 

  1. भारी विनियोग- चूँकि सुपर बाजार के व्यवसायी उत्पादकों या निर्माताओं से सीधे माल खरीदते हैं जिसके कारण मूल्य तुरन्त चुकाना पड़ता है और कभी-कभी अग्रिम राशि भी देनी पड़ती है। इसके अलावा विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ भी पर्याप्त मात्रा में स्टॉक में रखनी पड़ती है। इन सभी कार्यों के लिए प्रारम्भ में ही भारी राशि का विनियोग करना पड़ता है। 
  2. उपयुक्त स्थान की कठिनाई- चूँकि सुपर बाजार की स्थापना शहर एवं महानगर के मध्य में ही करने के लिए विषाल भवन एवं उपयुक्त स्थान मिलने में कठिनाई होती है। ऐसी दशा में उन्हें बाजार को शहर से दूर खोलना पड़ता है, जहाँ ग्राहक कम पहुँचते हैं। 
  3. तकनीकी वस्तुओं का विक्रय नहीं- सुपर बाजार में तकनीकी वस्तुएँ बेचते समय क्रेता को सभी सूचनाएँ दी जानी आवश्यक होती है। किन्तु इस प्रणाली में इस व्यवस्था की अनुपस्थिति होने से ऐसी वस्तुएँ बेची जानी सम्भव नहीं होगी। 
  4. वस्तुओं का खराब होने का भय- सुपर बाजारों में वस्तुएँ भारी मात्रा में संग्रहित की जाती हैं। साथ ही खाद्य पदार्थ भी बेचे जाते हैं। इसके अलावा वस्तुएँ समय पर न बिकने की दशा में उनके सड़ने-गलने का भय हमेशा बना रहता है। 
  5. ग्राहकों की असन्तुष्टि- ग्राहक विक्रेता की अमूल्य निधि होता है। व्यक्तिगत सेवा एवं सहयोग के अभाव में उसे पूर्ण संतुश्टि नहीं मिल पाती है। साथ ही प्रोत्साहन के अभाव में क्रेता स्वयं अतिरिक्त वस्तुएँ नहीं खरीदते हैं। 

ग्राहकों या उपभोक्ताओं को हानियाँ- 

  1. दूर स्थिति- सुपर बाजार सामान्यत: शहर से दूर स्थित होते हैं, जहाँ ग्राहकों की आसान पहुँच नहीं होती है। अनेक बार तो जितनी बचत कम भावों के कारण होती है, उससे अधिक व्यय परिवहन पर हो जाता है।
  2. क्रय परामर्श का अभाव- विक्रेता के अभाव में वस्तु के गुण, उसकी प्रयोग विधि आदि बातों की जानकारी नहीं मिल पाती है। वे ग्राहक जो वस्तु के चुनाव में स्वयं निर्णय नहीं ले पाते हैं तो उन्हें यहाँ खरीदने में काफी कठिनाई होती है। साथ ही गलत वस्तु का चुनाव हो जाने की सम्भावना भी बनी रहती है। 
  3. साख-सुविधाओं का अभाव- चूंकि सुपर बाजारों में नकद विक्रय किया जाता है अर्थात् यहाँ साख-सुविधाओं का अभाव होता है। इससे ग्राहकों को बड़ी असुविधा का सामना करना पड़ता है। 
  4. अधिक समय- इन बाजारों में जहाँ वस्तु का चुनाव कम समय में ही हो जाता है, वहीं उसका बिल बनवाने, मूल्य का भुगतान करने, पैकिंग करवाने, घर से सुपर बाजार पहुँचने एवं वापस आने में ग्राहक का बहुत समय खराब हो जाता है। 
  5. सन्तुष्टि का अभाव- सुपर बाजार में विक्रेताओं के अभाव के कारण सुपर बाजार सभी ग्राहकों को सन्तुष्टि नहीं दे पाते हैं। इसके अतिरिक्त उनकी सेवा करने में कोई न कोई कमी रह ही जाती है।

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