विज्ञापन क्या है?

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एक समाचार-पत्र में आपको न केवल ताजा घटनाओं अथवा खेल संबंधी समाचार पढ़ने को मिलते हैं, बल्कि एअर कंडीशनर, साइकिलों, बालों में लगाने वाले तेलों, ट्रांसपोर्टरों, भवन-निर्माताओं आदि द्वारा अपने उत्पाद अथवा सेवाओं के बारे में दी गई सूचनाएं अथवा संदेश भी पढ़ने को मिलते हैं। इस तरह की सूचनाएं आपको पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन और सड़कों के किनारे लगे होर्डिंगों में भी देखने को मिलती हैं। सूचनाओं के द्वारा आपको संबंध्ति उत्पाद अथवा सेवा की उपलब्ध्ता, मूल्य और गुणों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इस प्रकार जब भी आपको उन उत्पाद अथवा सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है तो आप उनकी उपलब्ध्ता वाले स्थानों पर जाते हैं, उनकी गुणवत्ता और गुणों को देखते-परखते हैं और यदि वे आपकी आवश्यकता के अनुरूप होते हैं तो उन्हें खरीद भी लेते हैं। उदाहरण के लिए, रेडियो सुनते समय आपको एक उत्पाद के बारे में सूचना मिलती है, जिसका नाम है- ‘क ख ग आँवला केश तेल’। तो जब कभी आप केश तेल खरीदने दुकान पर जाते हैं तो आप दुकानदार से इस उत्पाद को भी दिखाने के लिए कहते हैं। आपको उसकी खुशबू पसंद आती है और कीमत किफायती होती है तो आप उसे खरीद भी लेते हैं। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण हो सकते हैं, जैसे भवन-निर्माता आपको किश्तों पर फ्रलैट देते हैं, दुकानदार वस्तुओं पर छूट देते हैं, विनिर्माता एक नई वस्तु को बाजार में उतारता है आदि। स्वभाविक है कि इस प्रकार की सूचनाएं वस्तुओं के प्रति आपको जागरूक बनाने के लिए दी जाती हैं, ताकि आप उनसे परिचित हो सकें और उन्हें खरीद सकें। इस प्रकार विनिर्माता, व्यापारी अथवा सेवाएं प्रदान करने वाले इस प्रकार की सूचनाएं ग्राहकों को आकर्षित करने और अपनी बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से देते हैं। ये सभी प्रवर्तन की क्रियाएं ‘विज्ञापन’ कहलाती हैं और इन क्रियाओं को अपनाने वाले सभी विनिर्माता, व्यापारी अथवा सेवाएं प्रदान करने वाले ‘विज्ञापन दाता’ अथवा ‘प्रायोजक’ कहलाते हैं तथा वे सभी माध्यम जिनके द्वारा ये सूचनाएं प्रदान की जाती हैं, जैसे समाचार-पत्र, पत्रिकाएं, रेडियो, टेलीविजन आदि, ‘विज्ञापन माध्यम’ कहलाते हैं।

विज्ञापन की परिभाषा

अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन ने विज्ञापन को इस प्रकार परिभाषित किया है : ‘‘किसी निश्चित प्रायोजक द्वारा भुगतान के आधर पर किसी भी विचार, वस्तु अथवा सेवा की अवैयक्तिक प्रस्तुति तथा प्रवर्तन’’। इस प्रकार विज्ञापन अवैयक्तिक होता है क्योंकि किसी एक व्यक्ति की ओर लक्षित नहीं होता और दूसरी बात यह है कि प्रायोजक (विनिर्माता अथवा उत्पादक) को हमेशा विज्ञापन में उसके नाम से पहचाना जा सकता है और इस प्रक्रिया में आने वाले सभी प्रकार के व्ययों को वही वहन करता है। तीसरी बात यह कि उत्पादक किसी भी वस्तु अथवा सेवा की गुणवत्ता, डिजाइन, पैकिंग तथा मूल्य आदि के संबंध् में भी विचारों को बढ़ावा दे सकता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी भी उत्पाद, सेवा अथवा विचार के बारे में प्रायोजक द्वारा दिए जाने वाले संदेशों से जुड़ी सभी गतिविधियों को विज्ञापन कहते हैं।

विज्ञापन बिना वैयक्तिक विक्रयकर्ता के विक्रय कला है’’ इस प्रकार विज्ञापन वस्तु या सेवा की मॉंग उत्पन्न करने की कला है यह एक प्रकार की ऐसी व्यापारिक शक्ति है जो मुद्रित शब्द के द्वारा विक्रय करती है तथा विक्रय कराने में सहायक होती है, कीर्ति का निर्माण करती हैं एवं ख्याति में वृद्धि करती है।

विज्ञापन के माध्यम

समाचार पत्र

आप समाचार पत्र तो अवश्य पढ़ते होंगे। हमारे देश में समाचार पत्र हिन्दी, अंग्रेजी तथा अन्य प्रांतीय भाषाओं में प्रकाशित किए जाते हैं। ये ताजा घटनाओं, समाचारों तथा लोगों के विचार जानने का अच्छा स्रोत होते हैं। इसके साथ ही समाचार पत्र विज्ञापन का भी एक आम माध्यम है। समाचार पत्र के माध्यम से विज्ञापनकर्ता संदेश को संप्रेषित करते हैं तथा यह करोड़ों लोगों तक पहुंचता है।

पत्रिकाएँ

पत्रिकाएं नियमित रूप से प्रकाशित होती हैं, लेकिन दैनिक आधर पर इनका प्रकाशन नहीं किया जाता। इनका प्रकाशन साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, द्वैमासिक, त्रौमासिक, यहां तक कि वार्षिक आधर पर किया जाता है। उदाहरण के लिए आपने इंडिया टुडे, आउट लुक, योजना, स्वागत, गृहशोभा, नंदन, चंपक आदि पत्रिकाएं देखी होगीं जिनका हिन्दी में नियमित प्रकाशन होता है। इन पत्रिकाओं का प्रकाशन अध्कि संख्या में किया जाता है, इस प्रकार इनमें छपने वाले विज्ञापन भी अधिक संख्या में लोगों के पास पहुंचते हैं।

रेडियो 

हम सभी रेडियो से परिचित हैं और इस पर विभिन्न वस्तुओं के विज्ञापन भी सुनते रहते हैं। रेडियो पर कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान बीच-बीच में छोटे-छोटे अंतराल लिए जाते हैं, जिन्हें वस्तुओं तथा सेवाओं के विज्ञापनों द्वारा भरा जाता है। इसके अलावा लोकप्रिय कार्यक्रमों को विज्ञापनदाताओं द्वारा प्रायोजित भी किया जाता है तथा इन कार्यक्रमों के दौरान नियमित अंतराल पर विज्ञापन दिये जाते हैं।

टेलीविजन

सूचना तकनीक और इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों के तेजी से हो रहे प्रसार के कारण आज टेलीविजन विज्ञापन सबसे आगे है। टेलीविजन हमारी आंखों और कानों दोनों पर प्रभाव छोड़ते हैं। टेलीविजन पर उत्पादों को दिखाया जा सकता है। उनके प्रयोग को दिखाया जा सकता है, उनकी उपयोगिता को प्रदर्शित किया जा सकता है और उपयोगिता के बारे में बताया जा सकता है। रेडियो की तरह ही टेलीविजन पर भी विज्ञापन कार्यक्रमों के बीच में अंतरालों में दिखाए जाते हैं और विज्ञापनदाता द्वारा इनका प्रायोजन किया जाता है।

इंटरनेट

क्या आप इंटरनेट से परिचित हैं? वास्तव में यह सूचनाओं को इकट्ठा करने और संप्रेषण का आध्ुनिकतम माध्यम है, यदि आपके पास कम्प्यूटर है ओर उसमें इंटरनेट की सुविध है तो आप पलक झपकते दुनियाभर की सूचनाएँ इससे प्राप्त कर सकते हैं। इंटरनेट के माध्यम से आप किसी भी विनिर्माता अथवा सेवा प्रदान करने वाले की वेबसाइट पर जाते हैं और सभी सूचनाएं प्राप्त कर लेते हैं। यदि कभी आपको किसी वेबसाइट का पता नहीं है तो इंटरनेट के सर्च इंजन या पोर्टल द्वारा उसका पता प्राप्त कर लेते हैं। प्राय: सभी वेब साइटों अथवा पोर्टल पर भी विभिन्न विनिर्माताओं अथवा सेवा प्रदान करने वालों द्वारा विज्ञापन दिए जाते हैं।

होर्डिंग 

सड़क पर चलते-पिफरते आपने छतों के ऊपर मोटे-मोटे लोहे के खंभों पर या दीवारों पर लगे होर्डिंग देखे होंगे। ये आमतौर पर एक प्रकार के बोर्ड होते हैं जिन पर पेंट करके या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से डिजाइन करके विज्ञापन तैयार किए जाते हैं ओर उन्हें रात में या दिन में आसानी से देखा जा सकता है। ये होर्डिंग जिन स्थानों पर लगाए जाते हैं उन स्थानों के लिए विज्ञापन दाता को भुगतान करना पड़ता है।

पोस्टर 

पोस्टरों को छापकर दीवारों, भवनों, पुलों आदि पर लगाया जाता है, ताकि इन्हें देखकर उपभोक्ता आकर्षित हों। हमारे देश में सिनेमा घरों तथा सार्वजनिक स्थानों पर पोस्टर लगाने का प्रचलन आम है।

विज्ञापन के उद्देश्य

वस्तुुओं के बारे में जानकारी देना - 

विज्ञापन का प्रमुख उद्देश्य निर्मित वस्तुओं के संबंध में अधिक से अधिक लोगों को जानकारी देना है जब तक वस्तुओं के बारे में सामान्य जनता को जानकारी नहीं होगी, तब तक उसकी इच्छा उसे खरीदने की नहीं होगी, तब तक वस्तुओं का विक्रय होना असंभव है।

मॉंग उत्पन्न करना - 

विज्ञापन का दूसरा उद्देश्य बाजार में वस्तु की मॉंग उत्पन्न करना है बाजार में वस्तु की मॉंग तभी पैदा होती है, जब उपभोक्ताओं के समक्ष वस्तु का बार-बार विज्ञापन एवं प्रचार किया जाता है, जिससे जनता में उसे क्रय करने की इच्छा जागृत होती है फलस्वरूप उसकी मॉंग होने लगती है।

मॉंग में वृद्धि करना - 

मॉंग उत्पन्न करने के साथ-साथ विज्ञापन का यह भी उद्देश्य है, कि नए-नए ग्राहको को खोजकर वस्तु की मॉंग में वृद्धि करना भी है यह कार्य विज्ञापन के विविध साधनो के प्रयोगो द्वारा किया जाता सकता है।

ख्याति में वृद्धि करना -

विज्ञापन के द्वारा वस्तु के साथ-साथ व्यवसाय की साख में भी वृद्धि होती है निरन्तर विज्ञापन करने से उत्पादन करने वाली संस्था के प्रति जनता में विश्वास जागृत होता है।

मॉंग को स्थिर बनाए रखना - 

निर्माता विज्ञापन के द्वारा वस्तुओं की मॉंग को स्थिर बना रखने के लिए प्रयोग करता है विज्ञापन केवल वस्तु का प्रचार ही नहीं करता, अपितु जनता में उत्पन्न भ्रांतियों को दूर करता है और वस्तु के गुणों का विज्ञापन द्वारा प्रचार करता है विज्ञापन के द्वारा मूल्य उपयोगिता एवं उपयोग की विधि संबंधी जानकारी दी जाती है इससे जनता में विश्वास पैदा होता है और वस्तुओ की मॉंग निरन्तर बनी रहती है।

नवीन उत्पादन के लिये मांग का आधार तैयार करना -

 जब किसी नई वस्तु का उत्पादन या निर्माण किया जाता है तो उसे बाजार मे प्रचलित करने के लिए विज्ञापन अनिवार्य सा हो जाता है विज्ञापन के माध्यम से ऐसे नए उत्पाद के लिए आधार तैयार किया जाता है और प्रत्येक संभावित क्रेता या ग्राहक को ऐसी वस्तु की विशेषताओं से परिचित कराया जाता है।

विक्रेता की सहायता करना -

विज्ञापन के द्वारा विक्रेता के विक्रय कार्य में सहायता मिलती है विज्ञापन से ग्राहकों को पूर्व में ही वस्तु के बारे में वस्तु के गुण, मूल्य, प्रकार, आकार आदि के बारे में जानकारी हो जाती है फलस्वरूप ग्राहक उस वक्त वस्तु को प्राप्त करने के लिए विक्रेता के पास आता है इस प्रकार विक्रेता को ग्राहकों को समझाने की आवश्यकता नहीं होती और न ही वस्तु के बारे में कुछ कहना पड़ता है क्योंकि ग्राहक विज्ञापन के माध्यम से पूर्ण जानकारी प्राप्त कर चुका।

क्रय की विवेकशीलता विकसित करना - 

विज्ञापन का उद्देश्य क्रेता को विवेकशील बनाना है इसकी सहायता से विज्ञापनकर्ता की वस्तु तथा प्रतियोगी संस्था की वस्तु में अन्तर कर सकने की क्षमता क्रेता मे आती है ओर बेहतर वस्तु के चुनाव करने के लिए वह तैयार होता है।

नए प्रयोगो की जानकारी देना - 

विज्ञापन का उद्देश्य वस्तुओं के नए-नए प्रयोग तथा प्रयोग की विधियों की पर्याप्त जानकारी देना भी है, ताकि क्रेता पूरा-पूरा लाभ उठा सके।

परिवर्तर्नों के बारे में जानकारी देना - 

विज्ञापन का महत्वपूर्ण उद्देश्य संस्था की नीतियॉं, वस्तुओं की किस्म, बनावट, मूल्य आदि मे परिवर्तन की सूचना देना भी होता हैं।

अन्य उद्देश्य - 

उपर्युक्त उद्देश्यों के अतिरिक्त विज्ञापन के कई उद्देश्य है जैसे उपभोक्ताओं को स्मरण दिलाना, मध्यस्थों को वस्तु बचे ने के लिए विवश करना, मध्यस्थों व विक्रेताओं का नैतिक स्तर उन्नत करना, नए बाजार में प्रवेश करना, संस्था की साख बढ़ाना, स्थानापन्न वस्तुओं का मुकाबला करना आदि।

विज्ञापन के लाभ 

बिक्री में वृद्धि -

वर्तमान युग विज्ञापन का युग कहलाता हैं कोई भी व्यवसायी चाहे छोटा हो या बड़ा विज्ञापन के बिना सफलता प्राप्त नहीं कर सकता वर्तमान में विज्ञापन को आधुनिक श्रंृगारमय एवं आकर्षक तरीकों से किया जाता है इन विज्ञापनों से ग्राहक प्रभावित होते है। और इस प्रकार बिक्री में वृद्धि होती है बिक्री में वृद्धि होने से विक्रेता के लाभ में वृद्धि होती है।

रोजगार में वृद्धि - 

रोजगार के दृष्टिकोण से भी विज्ञापन अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश व्यक्ति विज्ञापन संबंधी कार्यो में ही संलग्न रहते हैं इससे ही उनका जीवन निर्वाह होता है विज्ञापन कार्य के लिए कई प्रकार के व्यक्तियों की आवश्यकता होती है जैसे- लेखक, कलाकार, विशेषज्ञ आदि आजकल तो कई व्यावसायिक संस्थाएॅं ऐसी खुल गई है।, जिनका कार्य केवल विज्ञापन करना है।

लागत व्यय में कमी - 

आज के प्रतियोगी बाजार में वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि करके अधिक लाभ कमाना संभव नहीं है इसके विपरीत वह विज्ञापन द्वारा वस्तुओं की मॉंग में वृद्धि करके उन्हें अधिक मात्रा में उत्पादन करके उनकी लागत में कमी करने का प्रयास करता है अधिक मात्रा में किसी वस्तु का उत्पादन लागत में कमी करने यह निश्चित है कि उस वस्तु का उत्पादन मूल्य कम हो जाता है इस प्रकार विज्ञापन एवं कुशल प्रबंध द्वारा वस्तुओं का विक्रय मूल्य घटाया जात सकता है मूल्य कम होने से वस्तुओ की बिक्री अधिक होती है इससे विक्रेता और ग्राहक दोनों लाभान्वित होते है।

विक्रेताओं को प्रोत्साहन -

विज्ञापन के द्वारा विक्रेताओं का कार्य बहुत आसान हो जाता है अब विक्रेता को वस्तु के मूल्य, गुण एवं प्रयोग के बारे में समझाने की अधिक आवश्कता नहीं होती, क्योंकि यह कार्य विज्ञापन द्वारा हो जाता है अब तो उन्हे केवल आदेश प्राप्त करने का कार्य ही शेष रह जाता है इससे स्पष्ट है कि विज्ञापन के द्वारा विक्रेताओं को बहुत प्रोत्साहन मिलता है।

विज्ञापन अधिक मात्रा में वस्तुएँ उपलब्ध कराने में योगदान करता है -

 विज्ञापन द्वारा नई वस्तुओं को प्रयाग करने की शिक्षा दी जाती है जब कोई नई वस्तु बाजार में आती है। तो प्रारंभ में बहुत कम लोग उसे तत्काल खरीदते हैं अधिक लोग उस वस्तु का प्रयोग करें, इसके लिए यह आवश्यकता है कि उन्हें उनकी उपयोगिता एवं आवश्यकता के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए नया विज्ञापन उत्पादकों के लिए लोगों में इच्छाएॅं जागृत करता है और पुरानी आदतों को बदलने में सहायक होता है।

विज्ञापन उत्पाद सुधार में एक महत्वपूर्ण घटक है - 

अनेक कम्पनियों द्वारा बनाई गई वस्तुओं के ब्रांड, गुण, डिजाइन एवं पैकिंग में समानताएॅं हो सकती है इसलिए प्रत्येक निर्माता का यह दायित्व है कि वह स्वयं के द्वारा निर्मित वस्तुओं की श्रेष्ठता का परिचय विज्ञापन में तुलनात्मक श्रेष्ठ्ता का उल्लेख कर बिक्री बढ़ाने का प्रयास करता है इसलिए प्रत्येक निर्माता को अपनी वस्तुओं को श्रेष्ठतर बनाने का ज्ञान भी हो जाता है अत: प्रत्येक उद्योगपति अपने उत्पाद को अधिक उत्त्ाम बनाना चाहता है, उसे सुविधाजनक, टिकाऊपन, आकर्षक पैकिगं और कम मूल्य में देने का प्रयत्न करता है अत: वर्तमान प्रतियोगी अर्थव्यवस्था मे विज्ञापित वस्तु में निरन्तर सुधार होना आवश्यक हो जाता है विज्ञापन से संस्थाओं का आकार बढ़ता है, विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन मिलता है और नए-नए आविष्कारा संभव होते हैं ।

वस्तुओं के लिए स्थायी मॉंग - 

विज्ञापन एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा किसी वस्तु की मॉंग को स्थाई रखा जा सकता है उदाहरण के लिए हम बाटा के जूतों को लेते हैं, समाचार पत्रों मे इस प्रकार का विज्ञापन निकाला जाता हैं कि’’बाटा के जूते पहनिये, यह गर्मियों में ठण्डे और सर्दियों में गर्म रहते हैं’’ अधिकांश व्यक्ति इन विज्ञापनों से प्रभावित होकर वर्षभर बाटा के जूते पहनने लगते हैं इससे जूतो की मॉंग भी स्थायी बन जाती है।

मध्यस्थों की संख्या में कमी - 

मध्यस्थों की संख्या अधिक होने के कारण वस्तुओं के मूल्य बढ़ जाते हैं और इसका प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ताओं पर अच्छा नहीं पड़ता है, लेकिन विज्ञापन के द्वारा मध्यस्थों को कम किया जा सकता है और उपभोक्ताओं से उत्पादनकर्त्त्ााओं का प्रत्यक्ष संबंध स्थापित हो जाता है तथा वस्तुओं का मूल्य भी कम हो जाता है इसका परिणाम यह होता है कि उपभोक्ताओं को कम मूल्य पर वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती है तथा बिक्री मे भी वृद्धि होती है।

नवनिर्मित वस्तुओं की मॉंग में वृद्धि 

विज्ञापन के द्वारा जनता को नवनिर्मित वस्तुओं का ज्ञान करवाया जाता है विज्ञापन के द्वारा जनता को वस्तुओं के गुणों को इस प्रकार बताया जाता है कि ग्राहक तुलनात्मक अध्ययन कर यह सुनिश्चित कर सके कि जो वस्तु चलन में आई है, वह गुणों में अन्य वस्तुओं की अपेक्षा अच्छी है ऐसा होने से पुरानी वस्तुओं की मॉंग कम हो जाती है और नई वस्तुओं की मॉंग बढ़ जाती है यह सब विज्ञापन द्वारा ही संभव है इस प्रकार विज्ञापन से नवनिर्मित वस्तुओं की मॉंग में वृद्धि होती है।

प्रबधकों व मजदूरों को प्रोत्साहन - 

विज्ञापन से प्रबंधको व मजदूरों को भी प्रोत्साहन मिलता है प्रबंधक एवं मजदूर इस बात का प्रयास करते हैं कि उन्होने अपनी वस्तु के जो गुण विज्ञापन में बताए है, वे पूर्ण रूप से पूरा करें,, जिससे कि बाजार में उनकी वस्तु की ख्याति में वृद्धि हो सके अधिक बिक्री होने से इन्हें कार्य करने की प्रेरणा मिलती है और भविष्य में और अधिक अच्छी वस्तु बनाने का प्रयास करते हैं।

विज्ञापन की हानियॉं

यद्यपि विज्ञापन का व्यावसायिक एवं औद्योगिक जगत में विशिष्ट महत्व है, तथापि यह दोषों में मुक्त भी नहीं है विज्ञापन की हानियों या दोषों को  विभक्त किया जात सकता है-

धन का अपव्यय - 

विज्ञापन के कारण कई उपभोक्ता उन वस्तुओं को भी खरीद लेते हैं जो कि उनके लिए आवश्यक नहीं होती हैं इस प्रकार उनका सीमित धन अनावश्यक वस्तुओं पर खर्च हो जाता है ऐसा करने से धन का अपव्यय होता हैं।

मिथ्या विज्ञापन -

 विज्ञापन एक उग्र विद्या बन गई है। क्योंकि इसके द्वारा बहुत-सी मिथ्या बातों का प्रचार किया जाता है, जैसे- ‘‘आज ही सौ रूपये भेजकर एक घडी़ व रेडियो प्राप्त करें’’ आदि जनता इस प्रकार विज्ञापनों से प्रभावित होकर हानि उठाती है, क्योंकि इसमें सत्यता का अभाव होता है हमारे देश में इस प्रकार के विज्ञापन बहुत देखने को मिलते है।

फैशन में परिवर्तन -

विज्ञापन के द्वारा फैशन में बहुत परिवर्तन आता है इस कारण विक्रेता और उपभोक्ता दोनों को हानि होती है विक्रेता के पास जो पुराने फैशन का माल रखा है, वह बेकार हो जाता है, क्योंकि फैशन में परिवर्तन के कारण उपभोक्ता उसे नहीं खरीदते उपभोक्ता के दृष्टिकोण से भी यह हानिप्रद इसलिए है कि फैशन में परिवर्तन होने के कारण उन्हें अपनी पुरानी वस्तुओं में भी कुछ परिवर्तन करवाने के लिउ व्यय करना पड़ता है।

उपभोक्ताओं पर बोझ - 

विज्ञापन करने में प्रत्येक व्यवसायी को धन व्यय करना पड़ता है इस व्यय का भार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ताओं पर पड़ता है, क्योंकि विक्रेता तो इस व्यय को वस्तु के मूल्य मे जोड़ देते हैं।

चंचलता - 

विज्ञापन के प्रभाव से उपभोक्ता का मन चलायमान हो जाता है वह उस वस्तु के उपभोग को छोड़ देता है जिसके विषय मे उसने पूर्व मे निश्चय किया था और उस वस्तु का उपभोग करने लगता है, जिसके लिए वह विज्ञापन से प्रभावित होता है।

प्रतिस्पर्द्धा को जन्म - 

विज्ञापन से प्रतिस्पर्द्धा के क्षेत्र में विस्तार होता है, जिससे निर्माताओं को वस्तुओं के मूल्य में अनायास कमी करनी पड़ती है इस प्रकार वस्तुओं के मूल्य की कमी की पूर्ति उनकी गुणवत्त्ाा घटाकर की जाती है।

सामाजिक बुराइयों में वृद्धि - 

जो विज्ञापन आरामदायक और विलासिता संबंधी वस्तुओं के संबंध में किया जाता है उसके कई सामाजिक दुष्परिणाम निकलते हैं जब किसी व्यक्ति को किसी एक विशेष चीज के उपभोग की आदत पड़ जाती है, तो उसका छूटना बहुत कठिन हो जाता है अत: विज्ञापनों से सामाजिक बुराइयों में वृद्धि होती है।

स्वच्छता मे कमी - 

विज्ञापन प्राय: दीवारों पर लिखकर या पोस्टर चिपकाकर किया जाता है इसमे चारों ओर गंदगी बढ़ जाती है तथा मकानों की दीवारों व सड़कें आदि गंदी दिखाई देने लगती है।

एकाधिकार का भय - 

जिन वस्तुओं का विज्ञापन निरन्तर होता रहता है, उन वस्तुओं का बाजार में एकाधिकार हो जाता है और अन्य वस्तुएँ बढ़िया किस्म की होने पर भी विज्ञापन के अभाव में बाजार से लुप्त हो जाती है इसका दूसरा प्रभाव यह होता है कि एकाधिकारी मनमाने तरीके से वृद्धि कर देता है।

विज्ञापन के प्रमुख कार्य

  1. संभावित ग्राहको के वस्तुएँ खरीदने हेतु प्रेरित करना।
  2. वर्तमान तथा भावी ग्राहकों को वस्तुओ तथा उनके निर्माताओं के संबंध में जानकारी देना। 
  3. नवीन वस्तु को बाजार में प्रविष्ट करना, उसमें जनता की रूचि जाग्रत करना तथा उसकी मॉंग में वृद्धि करना। 
  4. वस्तुओ की विद्यमान मॉंग को बनाए रखना। 
  5. स्थानापन्न वस्तुओ के उपयोग को हतोत्साहित करना। 
  6. नकली वस्तुओं के प्रचलन के संबंध मे ग्राहको को सचेत करना।
  7. वस्तुओं के प्रति ग्राहकों में विश्वास उत्पन्न कराना। 
  8. समाज के उपभोग स्तर को ऊॅंचा उठाना। 
  9. ग्राहाके मे वस्तुओं के संबधं में व्याप्त भ्रातियों का निवारण करना। 
  10. वस्तुओं के उयोग के ढंग के बारे में ग्राहकों को जानकारी देना।

Comments

  1. It's a very useful site for students of mass communication. I'm very greatful to u sir.... Thanks a lot..

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