श्रम कल्याण के सिद्धान्त एवं प्रशासन

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कोई भी श्रम कल्याण सम्बन्धी योजना अथवा कार्यक्रम तब तक प्रभावपूर्ण रूप से नही बनाया जा सकता जब तक कि समाज के नीति निर्धारक श्रम कल्याण की आवश्यकता को स्वीकार करते हुये इसके सम्बन्ध में उपयुक्त नीति बनाते हुए अपने इरादे की स्पष्ट घोषणा न करें और इसे कार्यान्वित कराने की दृष्टि से राज्य का समुचित संरक्षण प्रदान करने हेतु उपयुक्त इसे वैधानिक स्वरूप प्रदान न करें।

श्रम कल्याण के सिद्धान्त 

सिद्धान्त शब्द का प्रयोग यहां पर उन सामान्यीकरण को सम्बोधित करने के लिए किया जा रहा है जो श्रम कल्याण के क्षेत्र से सम्बन्धित व्यक्तियों के अनुभवों पर आधारित है। और श्रम कल्याण नीतियों के निर्धारण, योजनाओं के निर्माण, कार्यक्रमों के आयोजन तथा सेवाओं के प्रावधान को अधिक प्रभावपूर्ण बनाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। ये कुछ सिद्धान्त इस प्रकार है :

श्रम कल्याण की आवश्यकता की स्वीकृति - 

कोई भी श्रम कल्याण सम्बन्धी योजना अथवा कार्यक्रम तब तक प्रभावपूर्ण रूप से नही बनाया जा सकता जब तक कि समाज के नीति निर्धारक श्रम कल्याण की आवश्यकता को स्वीकार करते हुये इसके सम्बन्ध में उपयुक्त नीति बनाते हुए अपने इरादे की स्पष्ट घोषणा न करें और इसे कार्यान्वित कराने की दृष्टि से राज्य का समुचित संरक्षण प्रदान करने हेतु उपयुक्त इसे वैधानिक स्वरूप प्रदान न करें। नीति निर्धारकों द्वारा ‘श्रमेव जयते’ को स्वीकार करते हुये श्रम को व्यक्ति एवं समाज के विकास के लिये आवश्यक मानते हुये श्रम कल्याण को सामाजिक नीति का एक अभिन्न अंग स्वीकार करना चाहिये और श्रमिकों की कल्याण सम्बन्धी योजनाओं एवं कार्यक्रमों को राज्य का संरक्षण प्रदान करने हेतु आवश्यक श्रम सम्बन्धी विधान बनने चाहिये।

श्रमिक, उनके विचार, उद्योग तथा समाज की अन्योन्याश्रयिता - 

श्रम कल्याण के महत्व को सही अर्थ में तभी स्वीकार किया जा सकता है जबकि इस बात पर सहमति व्यक्त की जाय कि श्रमिक, उनसे परिवार, उद्योग तथा समाज एक दूसरे पर निर्भर है। और वे एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते है।। जिस प्रकार समाज के विघटित होने का प्रतिकूल प्रभाव उद्योग पर, उद्योग के ठीक से न चलने का प्रतिकूल प्रभाव श्रमिक पर और श्रमिक के विघटित होने का प्रतिकूल प्रभाव परिवार पर पड़ता है उसी प्रकार श्रमिक के व्यक्तित्व सम्बन्धी संगठन के उचित न होने तथा उसके द्वारा अपने दायित्वों का निर्वाह न किये जाने पर उद्योग, उनके परिवार और समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। धनात्मक रूप में एक सुसंगठित समाज उद्योग को, उद्योग श्रमिकों को तथा श्रमिक परिवार को उपयुक्त रूप से चलाने में सहायक सिद्ध होता है तथा एक अच्छे व्यक्तित्व सम्बन्धी संगठन वाला श्रमिक अपने उद्योग, परिवार तथा समाज को अच्छी प्रकार चलाने में अपना योगदान देता है।

अनुभूत आवश्यकताओं का सिद्धान्त - 

कोई भी श्रम कल्याण कार्यक्रम तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि वह श्रमिकों की उन अनुभूत आवश्यकताओं पर आधारित न हो जिनके लिये वास्तव में वह आयोजित किया जाता है। श्रमिकों की वास्तविक आवश्यकताओं को जानने के लिये उनसे सम्पर्क स्थापित करते हुये, विचार-विमर्ष और पर्यवेक्षण का आश्रय लेते हुये उनकी अनुभूत आवश्यकताओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। श्रमिकों की अनुभूत आवश्यकताओं के अन्तर्गत उनके परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से आश्रित सदस्यों की अनुभूत आवश्यकतायें भी सम्मिलित हैं।

अनुभूत आवश्यकताओं में प्राथमिकता का सिद्धान्त - 

श्रमिकों एवं उनके परिवार के सदस्यों की अनुभूत आवश्यकतायें अनेक प्रकार की होती हैं। इनमें से कुछ अल्पकालीन तथा कुछ दीर्घकालीन होती है।, इनमें से कुछ आर्थिक, कुछ मनोवैज्ञानिक, कुछ सामाजिक होती है, इनमें से कुछ स्वयं श्रमिकों के मत में अन्य की तुलना में अधिक अनिवार्य होती है। चूँकि इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति एक साथ सम्भव नहीं है इसलिये इन आवश्यकताओं में प्राथमिकता स्थापित की जानी चाहिये और उन आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयास पहले किया जाना चाहिये जिन्हें स्वयं श्रमिक तथा उनके परिवार के सदस्य सापेक्षत: अधिक महत्वपूर्ण समझते हैं।

श्रमिकों के लचीले प्रकार्यात्मक संगठन के विकास का सिद्धान्त -

 जीवन के किसी भी क्षेत्र में आवश्यकताओं को पूर्ति के लिये कोई-न-कोई योजना एवं कार्यक्रम बनाना ही पड़ता है। अनवरन् रूप से योजनाबद्ध ढंग से कार्यक्रम बनाये जाते रहें और उन्हें सुचारू रूप से आयोजित किया जाता रहे इसके लिये यह आवश्यक है कि श्रमिकों के संगठन का निर्माण किया जाय जिसमें विभिन्न प्रकार के श्रमिकों की अभिरूचियों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग रखे जायें। इन प्रतिनिधियों का चयन यथासम्भव मतैक्य के आधार पर किया जाना चाहिए किन्तु जहाँ मतैक्य सम्भव न हो वहाँ चयन बहुसंख्यक मत के आधार पर किया जाना चाहिए। इस संगठन के अन्तर्गत् श्रमिकों, उद्योग से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित सरकारी विभागों तथा लोकोपकारी एवं स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिये।

श्रमिकों के सक्रिय सम्मिलन का सिद्धान्त - 

श्रमिकों के हितों का संरक्षण एवं सम्बर्द्धन करने के लिये आयोजित किये जाने वाले श्रम कल्याण कार्यक्रमों के साथ श्रमिकों में अपनत्व एवं लगाव की भावना तब तक विकसित नहीं की जा सकती जब तक कि उन्हें इन कार्यक्रमों के आयोजनों में सक्रिय रूप से सम्मिलित न किया जाय। ‘श्रमिकों के लिये’ कार्य करने के बजाय ‘श्रमिकों के साथ’ कार्य करना अधिक उपयुक्त है और इसलिये यह आवश्यक है कि श्रम कल्याण के नीति निर्धारण से लेकर कार्यक्रमों के आयोजन और मूल्यांकन तक के प्रत्येक स्तर पर श्रमिकों को निर्णय लेने एवं उनके द्वारा उपयुक्त समझे गये तरीकों का प्रयोग करते हुये कार्य करने के अवसर सुनिश्चित किये जाने चाहिये।

प्रभावपूर्ण कार्यक्रम के निर्माण का सिद्धान्त - 

प्राथमिकता के आधार पर निश्चित की गयी अनुभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आयोजित किये जाने वाले श्रम कल्याण कार्यक्रमों की रूपरेखा इस प्रकार तैयार की जानी चाहिये कि वे सभी प्रकार के श्रमिकों की व्यक्त एवं सन्निहित, अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन अभिरूचियों की सन्तुष्टि में सहायक सिद्ध हो सके। कुछ कार्यक्रम ऐसे होने चाहिये जिनके परिणाम प्रत्यक्ष रूप से इनके आयोजन के साथ ही साथ दिखाई देने लगें तथा कुछ कार्यक्रम ऐसे होने चाहिये जिनके परिणाम दीर्घकालीन योजना का अनुसरण करते हुये सापेक्षत: अधिक लम्बे समय के उपरान्त परिलक्षित हो सकें।

सामुदायिक संसाधनों के अधिकतम सुदपयोग का सिद्धान्त - 

श्रम कल्याण कार्यक्रमों के लिये संसाधन आवश्यक होते हैं। सामान्यत: ये संसाधन मालिकों द्वारा प्रदान किये जाते है। क्योंकि यह माना जाता ह ै कि श्रमिक द्वारा किये गये काम से होने वाले लाभों का सबसे बड़ा हिस्सा मालिक ही लेता है। ऐसी उत्पादन की व्यवस्था में जिसमें श्रमिकों की सहभागिता को प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित किये जाने का प्रावधान हो तथा जिसमें उद्योग को होने वाले लाभों में श्रमिकों की उत्पादकता पर आधारित लाभांष प्राप्त करने का कानूनी प्रावधान हो, केवल यह स्वीकार करना कि श्रम कल्याण के लिये अपेक्षित साधन जुटाना मालिकों का दायित्व है, उपयुक्त नहीं प्रतीत होता। श्रमिकों को भी विशेष रूप से अपने संगठनों के माध्यम से श्रम कल्याण कार्यक्रमों के लिये संसाधन जुटाना चाहिये। न केवल इतना बल्कि समाज को भी इस दिशा में आगे आना चाहिये क्योंकि श्रमिकों द्वारा किये गये श्रम से उद्योग के माध्यम से किये गये उत्पादन से समाज प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होता है। इसीलिये यह आवश्यक है कि श्रम कल्याण के लिये आवश्यक संसाधन जुटाने का दायित्व मालिक, श्रमिक और समाज तीनों द्वारा संयुक्त रूप से निभाया जाय। समुदाय में अनेक लोकोपकारी व्यक्ति एवं संगठन पाये जाते है। जो इस कार्य में सहायता कर सकते है।। इन व्यक्तियों एवं संगठनों की सहायता लेते हुये समुदाय में उपलब्ध संसाधनों का अधिक से अधिक सदुपयोग किया जाना चाहिये।

मार्गदर्शन हेतु समुचित विशेषज्ञ सहायता उपलब्धि का सिद्धान्त -

श्रमिकों से इस बात की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे प्राथमिकता के आधार पर निश्चित की गयी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित कार्यक्रमों के निर्णय के सभी पहलुओं की जानकारी रखते हों। इसी प्रकार श्रम कल्याण के लिये संगठन में सम्मिलित मालिकों, उद्योग से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित सरकार के विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों तथा लोकोपकारी एवं स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों से भी इस बात की आशा नहीं की जा सकती कि वे आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बनाये जाने वाले कार्यक्रमों के सभी पहलुओं के बारे जानकारी रखते हों। चूँकि कुछ विशिष्ट प्रकार के कार्यक्रमों के निर्माण में कुछ ऐसे पहलू होते हैं जिनमें तकनीकी ज्ञान एवं निपुणताओं की आवश्यकता होती है इसलिये समय-समय पर विभिन्न विशेषज्ञों को आमंत्रित करके उनसे आवश्यक परामर्श लेते हुए कार्यक्रमों का निर्माण किया जाना चाहिये, किन्तु कार्यक्रम निर्माण से लेकर इसके कार्यान्वयन तक के प्रत्येक स्तर पर एक प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता की सेवायें ली जानी चाहिये क्योंकि श्रम कल्याण सम्बन्धी कार्यक्रम मानव संसाधनों के विकास से सम्बन्धित है। तथा इनका आयोजन साहै ार्दपूर्ण तथा अर्थपूर्ण मानवीय सम्बन्धों का आश्रय लेते हुए किया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता की उपस्थिति इस बात को सुनिश्चित करेगी कि कार्यक्रम सोद्देश्यपूर्ण बनेगे तथा इनके कार्यान्वयन के दौरान उत्पन्न होने वाली अन्त:क्रिया को आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त हो सकेगा।

सतत् मूल्यांकन एवं संशोधन का सिद्धान्त - 

श्रम कल्याण कार्यक्रमों का अनवरत् मूल्यांकन होते रहना चाहिये ताकि इनकी प्रगति, इनके कार्यान्वयन के दौरान आने वाली विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों तथा अपेक्षित संशोधनों की जानकारी प्राप्त हो सके और इनके आधार पर श्रम कल्याण से सम्बन्धित प्रत्येक स्तर के सभी पहलुओं में आवश्यक संशोधन किये जा सकें।

श्रम कल्याण प्रशासन 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 और अनुसूची 7 में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के बीच विधायी शक्तियों के विभाजन-संबंधी उपबंध है। श्रम-संबंधी विधान बनाने के विषयों को संघ-सूची समवर्ती सूची तथा राज्य-सूची तीनों में रखा गया है, लेकिन इनमें अधिकांश महत्त्वपूर्ण विषय समवर्ती सूची में रखे गए है। संघ-सूची में उल्लिखित विषयों पर केवल संसद ही कानून बना सकती है। समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर संसद और राज्यों के विधानमंडल दोनों कानून बना सकते है। राज्य-सूची के विषय राज्य विधानमंडलों के अधिकार-क्षेत्र में आते हैं। संघ एवं समवर्ती सूचियों में उल्लेखित विषयों में मुख्य हैं - औद्योगिक संबंध, नियोजन, श्रम-प्रबन्ध-सहयोग, मजदूरी और कार्य की अन्य दशाओं का विनियमन, सुरक्षा, श्रम-कल्याण, सामाजिक सुरक्षा, श्रम-विवाद, प्रशिक्षण तथा सांख्यिकी। इन विषयों के संबंध में केन्द्र सरकार राष्ट्रीय नीतियाँ निर्धारित करती है तथा रेलवे, खानों, तेलक्षेत्रों, बैंकिग और बीमा, मुख्य पतनों और गोदियों तथा केन्द्रीय सरकार के उपक्रमों के संबंध में इन नीतियों का कार्यान्वयन भी करती है। अन्य नियोजनों में श्रम-नीतियों का क्रियान्वयन मुख्यत: राज्य सरकारों का दायित्व है। केन्द्र सरकार राज्य सरकारों के श्रम-सम्बन्धी कार्यकलाप को समन्वित करती है तथा आवश्यकतानुसार उन्हें परामर्श और निदेश देती है। श्रम-विधानों के कार्यान्वयन तथा श्रम-सम्बन्धी अन्य बातों के निष्पादन के लिए केन्द्रीय एवं राजय दोनों स्तरों पर प्रशासनिक तंत्रों की व्यवस्था की गई है। इन तंत्रों के कार्यो का संक्षिप्त वितरण है।

केन्द्र सरकार का श्रम-प्रशासन 

केन्द्र सरकार के श्रम-प्रशासन का दायित्व श्रम-मंत्रालय का है। इस मंत्रालय में मुख्य मंत्रालय (सचिवालय) के अतिरिक्त संबद्ध कार्यालय, अधीनस्थ कार्यालय, स्वायत्त संगठन, न्यायनिर्णयन निकाय तथा विवाचन निकाय हे।

श्रम-मंत्रालय (सचिवालय) 

श्रम-मंत्रालय का सचिवालय भारत सरकार के श्रम-संबंधी सभी विषयों पर विचार करने वाला केन्द्र है। यह श्रम-नीतियों, श्रम-अधिनियमों के प्रवर्तन तथा श्रम-कल्याण के संवर्धन के संबंध में केन्द्रीय प्रशासनिक संयंत्र है। भारत सरकार के कार्यो के आबंटन-संबंधी नियमावली के अंतर्गत श्रम-मंत्रालय को आबंटित विषयों में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण है। -
  1. संघीय विषय - (i) रेलवे के संबंध में मजदूरी का भुगतान, श्रम-विवाद, ऐसे कर्मचारियों के कार्य के घंटे जो कारखाना अधिनियम के दायरे में नहीं आते, तथा बालकों के नियोजन का विनियमन; (ii) गोदियों के संबंध में गोदी-श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कल्याण-उपायों का विनियमन, तथा (iii) खानों तथा तेलक्षेत्रों में श्रम एवं सुरक्षा का विनियमन। 
  2. समवर्ती विषय - जैसे - (i) कारखानों में श्रम की दशाओं का विनियमन; (ii) श्रम-कल्याण, जैसे - औद्योगिक, वाणिज्यिक तथा कृषि-श्रमिकों की दशाओं का विनियमन, भविष्य-निधि, परिवार-पेंशन, उपदान; नियोजकों का दायित्व और कर्मकार-क्षतिपूर्ति, स्वास्थ्य एवं बीमारी-बीमा, जिसमें अशंक्तता-पेंशन शामिल है; तथा वार्धक्य पेंशन; (iii) बेरोजगारी बीमा; (iv) श्रमसंघ, औद्योगिक एवं श्रम-विवाद; (v) श्रम-सांख्यिकी; (vi) ग्रामीण रोजगारी और बेरोजगारी को छोड़कर रोजगारी और बेरोजगारी; तथा (vii) शिल्पियों का व्यावसायिक और प्रौद्योगिक प्रशिक्षण। 
  3. अन्य विषय - जैसे - (i) दूसरे देशों के साथ हुई संधियों एवं समझौतों का कार्यान्वयन; (ii) रोजगार कार्यालय, (iii) अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन, (iv) त्रिदलीय श्रम सम्मेलन; (v) खानों में सुरक्षा एवं कल्याण-सम्बन्धी कानूनों का प्रशासन; (vi) भारतीय गोदी श्रमिक अधिनियम, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, बागान श्रमिक अधिनियम तथा उत्प्रवासन से संबद्ध कानूनों का प्रशासन; (vii) केन्द्रीय क्षेत्र के उपक्रमों में श्रम-कानूनों का प्रशासन; (viii) श्रम-सांख्यिकी; (ix) औद्योगिक न्यायधिकरणों, श्रम-न्यायालयों तथा राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरणों का प्रशासन; (x) मुख्य श्रमायुक्त के कार्यालय तथा कारखाना सलाह सेवा तथा श्रम-संस्थान महानिदेशालय का संगठन, (xi) भारत सरकार के श्रम-अधिकारियों की भर्ती, स्थानान्तरण और प्रशिक्षण; (xii) श्रमिक शिक्षा; (xiii) प्रबन्ध में श्रमिकों की भागीदारी; (xiv) औद्योगिक अनुशासन; (xv) मजदूरी-बोर्ड; (xvi) मोटर परिवहन कर्मकारों के कार्य की दशाओं का विनियमन; तथा (xvii) देश में श्रम-कानूनों का मूल्यांकन तथा कार्यान्वयन। 

संबद्ध कार्यालय श्रम-

मंत्रालय से संबद्ध कार्यालय है - (i) मुख्य श्रमायुक्त (केन्द्रीय) का कार्यालय, (ii) रोजगार और प्रशिक्षण महानिदेशालय, (iii) कारखाना सलाह सेवा और श्रम संस्थान महानिदेशालय, (iv) श्रम ब्यूरो। इन कार्यालय के कार्यो का संक्षिप्त विवरण है -
  1. मुख्य श्रमायुक्त (केन्द्रीय) का कार्यालय - मुख्य श्रमायुक्त (केन्द्रीय) का कार्यालय नई दिल्ली में हैं। इस कार्यालय के महत्त्वपूर्ण कार्य है - 1. केन्द्रीय क्षेत्र में औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत औद्योगिक विवादों की रोकथाम, उनकी जाँच करना तथा समझौते कराना, 2. केन्द्रीय क्षेत्र में अधिनिर्णयों तथा सुलहों तथा मजदूरी-बोर्डो की सिफारिशों का प्रवर्तन कराना; 3. उन उद्योगों तथा प्रतिष्ठानों में श्रम-कानूनों का कार्यान्वयन कराना जिनके संबंध में केन्द्रीय सरकार समुचित सरकार है; 4. केन्द्रीय श्रमसंघ संगठनों की सदस्यता का सत्यापन करना; तथा 5. अनुशासन संहिता के उल्लघंन के मामलों की जाँच करना। यह कार्यालय केन्द्रीय क्षेत्र में जिन श्रम-कानूनों के प्रवर्तन का कार्य देखता है, उनमें मुख्य है- (i) मजदूरी भुगतान अधिनियम, (ii) बाल श्रम (प्रतिशेध एवं विनियमन) अधिनियम, (iii) औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, (iv) औद्योगिक विवाद-अधिनियम, (v) न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, (vi) गोदी कर्मकार (नियोजन का विनियमन), अधिनियम, (vii) प्रसूति हितलाभ अधिनियम, (viii) बोनस भुगतान अधिनियम, (ix) ठेका श्रम (विनियमन तथा प्रतिशेध) अधिनियम, (x) उपदान संदाय अधिनियम, (xi) समान पारिश्रमिक अधिनियम तथा (xii) अंतरराज्यीय उत्प्रवासी कर्मकार (नियोजन एवं सेवा-शर्त विनियमन) अधिनियम। मुख्य श्रमायुक्त (केन्द्रीय) के कार्यालय को केन्द्रीय औद्योगिक संबंध सयंत्र भी कहा जाता है। इस कार्यालय का प्रधान श्रमायुक्त (केन्द्रीय) होता है। उनके अधीनस्थ क्षेत्रीय कार्यालय है। संगठन में एक संयुक्त मुख्य श्रमायुक्त, कुछ उप-श्रमायुक्त, कई क्षेत्रीय श्रमायुक्त, सहायक श्रमायुक्त और श्रम-प्रवर्तन अधिकारी है। मुख्य श्रमायुक्त की सहायता के लिए श्रम-कल्याण के मुख्य परामश्र्ाी तथा निदेशक (प्रशिक्षण) भी नियुक्त है।
  2. रोजगार और प्रशिक्षण महानिदेशालय - इस महानिदेशालय का मुख्य कार्य व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए सारे देश में नीतियाँ, मानक एवं पद्धतियाँ निर्धारित करना और रोजगार-सेवाओं का समन्वय करना है। महानिदेशालय अधिकारियों के प्रशिक्षण तथा कार्यक्रमों के मूल्यांकन के कार्य भी संपन्न करता है। इस कार्यालय के तत्वावधान में ही देशभर में रोजगार-कार्यालयों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों तािा अन्य विशिष्ट संस्थाओं के जरिए रोजगार-सेवाओं एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण-सबंधी कार्यक्रम चलाए जाते है।। रोजगार-कार्यालय तथा औद्योगिक प्रशिक्षण-संस्थानों के दिन-प्रतिदिन के कार्य राज्य सरकारों तथा संघ राज्य-क्षेत्रों द्वारा संचालित होते है।। राष्ट्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण परिषद तथा केन्द्रीय शिशुक्षुता परिषद इसी महानिदेशालय के महत्वपूर्ण सलाहकार निकाय है। इस महानिदेशालय द्वारा संचालित महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण योजनाएं या कार्यक्रम है - शिल्पी प्रशिक्षण योजना, शिक्षु प्रशिक्षण योजना, शिल्प अनुदेशक प्रशिक्षण योजना, शिल्प अनुदेशक प्रशिक्षण योजना, अत्यधिक कुशल शिल्पीकार तथा पर्यवेक्षक प्रशिक्षण योजना, महिला प्रशिक्षण योजना, स्टाफ प्रशिक्षण एवं शोध तथा अनुदेशीय सामाधियों का विकास। इस संगठन का मुख्यालय नई दिल्ली में हैं। 
  3. कारखाना सलाह सेवा एवं श्रम संस्थान महानिदेशालय - इस महानिदेशालय के मुख्य कार्य कारखानों और गोदियों के कर्मकारी की सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कल्याण से संबद्ध है। यह महानिदेशालय कारखाना अधिनियम के कार्यान्वयन को समन्वित करता है तथा अधिनियम के अधीन आदर्श नियम बनाता है। इसके कार्य गोदी कर्मकार (सुरक्षा, स्वास्थ्य तथा कल्याण) अधिनियम, 1986 के प्रशासन से भी संबद्ध है। महानिदेशालय औद्योगिक सुरक्षा, व्यावसायिक स्वास्थ्य, औद्योगिक स्वच्छता, औद्योगिक मनोविज्ञान और औद्योगिक शरीर क्रियाविज्ञान के क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य भी करता है। यह औद्योगिक सुरक्षा तथा स्वास्थ्य-संबंधी क्षेत्र में प्रशिक्षण-कार्यक्रम भी चलाता है। महानिदेशालय के कार्यो में कारखाना-निरीक्षकों का नियमित प्रशिक्षण भी सम्मिलित है। महानिदेशालय द्वारा संचालित श्रम संस्थान मुंबई, कानपुर, कोलकाता और चेन्नई में अवस्थित है। इसका मुख्यालय मुंबई है। श्रम-मंत्रालय में एक स्वायत राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का भी गठन किया गया है। इस परिषद का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा-जागृति आंदोलन का विकास करना है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए परिषद कई प्रकार के शैक्षणिक एवं प्रशिक्षण-संबंधी क्रियाकलाप का संचालन करता है। 
  4. श्रम ब्यूरो - इस ब्यूरो का कार्यालय शिमला और चड़ीगढ़ में है। श्रम ब्यूरों के मुख्य कार्य है - 1. अखिल भारतीय आधार पर श्रम-सांख्यिकी का संग्रहण, सकेतन तथा प्रकाशन, 2. चुने हुए केन्द्रों के लिए श्रमिक वर्ग उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तथा औद्योगिक श्रमिकों के लिए अखिल भारतीय उपभोक्ता-मूल्य-सूचकांक का निर्माण एवं अनुरक्षण करना, 3. कृषि-श्रमिकों के लिए उपभोक्ता-मूल्य-सूचकांक का निर्माण एवं अनुरक्षण करना, 4. औद्योगिक श्रमिकों के कार्य की दशाओं से सम्बद्ध अद्यतन आँकड़े अनुरक्षित करना, 5. श्रम-नीति के निर्माण के लिए श्रम-सम्बन्धी विशिष्ट समस्याओं के सम्बन्ध में शोध करना, 6. श्रम से सम्बद्ध विभिन्न पहलुओं पर रिपोर्ट, पुस्तिका तथा विवरणिका का प्रकाशन करना, 7. इंडियन लेवर ईयर बुक, इंडियन लेबर जर्नल, इंडियन लेबर स्टैटिस्टिक्स, तथा श्रम सांख्यिकी लघु पुस्तिका, का प्रकाशन करना, तथा 8. राज्य/जिला/इकाई के स्तरों पर श्रम-सांख्यिकी में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के लिए आवश्यक सलाह देना। ब्यूरों के प्रधान इसके महानिदेशक होते हैं। 

अधीनस्थ कार्यालय श्रम-

मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यालय हैं - (क) खान सुरक्षा महानिदेशालय, तथा (ख) कल्याण आयुक्तों के कार्यालय।
  1. खान सुरक्षा महानिदेशालय - इस कार्यालय को खान अधिनियम, 1952 के उपबंधों तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों और विनियमों को लागू करने का दायित्व सौंपा गया है। इसका मुख्यालय धनवाद में है तथा इसके मंडलीय, क्षेत्रीय एवं उपक्षेत्रीय कार्यालय विभिन्न खान-क्षेत्रों में हैं। इसके महानिदेशक की अध्यक्षता में गठित खान-बोर्ड खान-प्रबन्धकों, सर्वेक्षकों तथा वोअरमेन के लिए आवधिक परीक्षाएँ लेता है और योग्यता-प्रमाणपत्र देता है। यह कार्यालय खानों में हितलाभ अधिनियम, 1961 तथा भारतीय बिजली अधिनियम, 1910 के उपबंधों का खानों और तेल-क्षेत्रों में प्रवर्तन करता है। 
  2. कल्याण आयुक्त के कार्यालय - कल्याण आयुक्तों के कार्यालयों का मुख्य दायित्व विभिन्न श्रम-कल्याण निधि अधिनियमों के उपबन्धों का प्रवर्तन है। देश में इनके नौ कार्यालय अभ्रक, चूना-पत्थर और होलोमाइट, लौह अयस्क, मैंगनीज अयस्क, क्रोम अयस्क, खानों और बीड़ी तथा सिनेमा उद्योगों में नियोजित कर्मकारी के लिए स्थापित किए गए है। कल्याण आयुक्तों के कार्यालयों के तत्वाधान में चलाए जाने वाले श्रम-कल्याण के महत्वपूर्ण क्षेत्र है - आवासीय, मनोरंजनात्मक, चिकित्सकीय तथा शैक्षिक सुविधाएँ, पेयजल की आपूर्ति, छात्रवृतियों की व्यवस्था, तथा दुर्घटना-हितलाभ ये कार्यालय स्वीकृत योजनाओं के लिए राज्य सरकारों, स्थानीय प्राधिकारियों तथा कर्मचारियों को ऋण एवं सहायिकी भी उपलब्ध कराते हैं। 

स्वायत्त संगठन 

भारत सरकार के श्रम-मंत्रालय के अधीनस्थ स्वायत्त संगठन है - 1. कर्मचारी राज्य बीमा निगम, 2. कर्मचारी भविष्य-निधि संगठन, 3. वी0वी0 गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान तथा 4. केन्द्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड। 
  1. कर्मचारी राज्य बीमा निगम - इस निगम का गठन कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1952 के अधीन किया गया है। यह अधिनियम के उपबंधों के अनुसार बीमारी-हितलाभ, प्रसूति-हितलाभ, अशक्तता-हितलाभ, आश्रित-हितलाभ, अंत्येष्टि व्यय तथा चिकित्सा-हितलाभ की व्यवस्था के लिए उत्तरदायी है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में तथा क्षेत्रीय कार्यालय देश के विभिन्न भागों में है।
  2. कर्मचारी भविष्य-निधि संगठन - यह संगठन कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 के प्रशासन के लिए उत्तरदायी है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है तथा इसके शाखा कार्यालय देश विभिन्न भागों में है। इस संगठन द्वारा कर्मचारी भविष्य-निधि योजना, कर्मचारी निक्षेप संबद्ध बीमा योजना तथा कर्मचारी पेंशन योजना का संचालन होता है। 
  3. वी0वी0 गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान - यह संथान नोएडा (उत्तर प्रदेश) में है। यह संस्थान एक पंजीकृत संस्थान है। इसके मुख्य कार्य संगठित तथा असंगठित दोनों क्षेत्रों में श्रम-सम्बन्धी समस्याओं पर कार्योन्मुखी अनुसंधान करना तथा ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में श्रमसंघ आंदोलन में निचले स्तर श्रमिकों तथा औद्योगिक संबंध, कार्मिक प्रबंध, श्रम-कल्याण आदि से संबद्ध विभिन्न स्तरों के अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान करना है। संस्थान श्रम-सम्बन्धी विषयों पर कार्यशालाएँ एवं सेमिनार भी आयोजित करता है। 
  4. केन्द्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड - इस कार्यालय का मुख्यालय नागपुर है इसके मंडलीय निदेशालय दिल्ली, कोलकाता, मंबु ई और चेन्नई है तथा देश के कई भागों में इसके क्षेत्रीय, निदेशालय और केन्द्र स्थापित किए गए है। यह संगठन भी एक पंजीकृत संस्था है। बोर्ड श्रमसंघवाद की तकनीकों में प्रशिक्षण देने से संबद्ध योजना संचालित करता है और श्रमिकों को उनके अधिकारों, कर्त्तव्यों और दायित्वों से अवगत कराने के लिए शैक्षिक कार्यक्रम चलाता है। बोर्ड ने राष्ट्र-स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए मुंबई में भारतीय श्रमिक शिक्षा संस्थान की स्थापना भी की है। बोर्ड ग्रामीण शिक्षा तथा क्रियात्मक प्रौढ़ शिक्षा संबंधी कार्यक्रम का भी संचालन करता है। 
  5. न्यायनिर्णयन या अधिनिर्णयन- निकाय देश के कुछ औद्योगिक केन्द्रों या नगरों में केन्द्रीय सरकार द्वारा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन उन स्थापनों के औद्योगिक विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए औद्योगिक अधिकरण और श्रम-न्यायालय गठित किए गए है, जिनके संबंध में समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है। ऐसे अधिकरण तथा श्रम-न्यायालय धनबाद, मुंबई, कोलकाता, आसनसोल, जयपुर, जबलपुर, नई दिल्ली, चण्डीगढ़, कानपुर तथा बंगलोर में स्थापित किए गए है। आवश्यकता पड़ने पर, केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों द्वारा गठित अधिकरणों की सेवाओं का भी उपयोग करती है। वर्तमान समय में अधिकरण-सह-श्रम न्यायलयों की संख्या 17 है। 
  6. विवाचन-निकाय- केन्द्रीय सरकार ने संयुक्त परामर्शदात्री तंत्र एवं अनिवार्य मध्यस्थता योजना के अधीन तथा सरकारी कर्मचारियों के वेतन तथा भत्ते, साप्ताहिक कार्य के घंटे तथा किसी वर्ग या श्रेणी के कर्मचारियों के लिए अवकाश-संबंधी विवादों या मतभेदों के निपटान के लिए विवाचन बोर्ड का गठन किया है। बोर्ड में एक अध्यक्ष और दो अन्य सदस्य होते हैं। श्रम प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार एवं राज्य सरकार के तंत्रों में तालमेल के लिए निरंतर प्रयास किए जाते हैं। अधिकांश स्थितियों में, केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों के श्रम-संबंधी क्रियाकलाप को समन्वित करती है और आवश्यकतानुसार उन्हें परामर्श एवं निर्देश देती है। 

राज्य सरकार का श्रम-प्रशासन 

जैसा कि इस अध्याय के आरंभ में कहा जा चुका है, ‘श्रम’ से संबंद्ध अधिकांश महत्वपूर्ण विषय संविधान की समवर्ती सूची में है। सामान्यत: अधिकांश श्रम-कानून केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए है, तथा उनका प्रवर्तन अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र के स्थापनों में केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें दोनों करती है, लेकिन कुछ श्रम-कानूनों के कार्यान्वयन का दायित्व राज्य सरकारों को भी सौंपा गया है। कुछ श्रम-कानून राज्य सरकारों द्वारा भी बनाए गए है और उनका प्रवर्तन भी राज्य सरकारों द्वारा ही होता है। केन्द्रीय सरकार तथा अन्य राज्य सरकारों में भी श्रम-प्रशासन के लिए तंत्रों की व्यवस्था की गई है जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।

सरकार पक्ष 

राज्य में श्रम-प्रशासन का दायित्व ‘श्रम, नियोजन एवं प्रशिक्षण’ विभाग का है। सरकार पक्ष में इस विभाग के शीर्ष में मंत्री होते हैं। व्यवहार में, वे कैबिनेट स्तर के मंत्री होते है, और आवश्यकतानुसार उनकी सहायता के लिए राज्य-मंत्री तथा उप-मंत्री भी नियुक्त होते रहे है। इस पक्ष में प्रधान अधिकारी आयुक्त-सह-प्रधान सचिव होता है। आयुक्त सह प्रधान सचिव श्रम संबंधी सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहता है और अपने अधीनस्थ विभिन्न विभागों के कार्यो पर नियंत्रण रखता है तथा उनके कार्यकलाप को समन्वित करता है। वह श्रम-संबंधी नीतियों एवं कार्यक्रमों के संबंध में केन्द्रीय श्रम-मंत्रालय से संपर्क बनाए रखता है और उसके निर्देशों एवं सुझावों को बिहार में क्रियान्वित करने के लिए कदम उठाता है। आयुक्त-सह-प्रधान सचिव की सहायता के लिए आवश्यकतानुसार अपर प्रधान सचिव, तथा कुछ संयुक्त सचिव, उप-सचिव और अवर सचिव नियुक्त किए गए है। क्षेत्रों के प्रशास्क सरकार की अनुमति या स्वीकृति के लिए अपने सुझाव या अभ्युक्तियाँ इसी तंत्र के पास भेजते हैं।

प्रशासनिक पक्ष 

राज्य में श्रम-प्रशासन में लगे महत्त्वपूर्ण कार्यालय हैं - (क) श्रमायुक्त का कार्यालय, (ख) मुख्य कारखाना निरीक्षणालय, (ग) मुख्य बॉयलर निरीक्षणालय, (घ) कृषि श्रमिक निदेशालय, (ड़) मुख्य निरीक्षी पदाधिकारी का कार्यालय, (च) नियोजन एवं प्रशिक्षण निदेशालय, (छ) सामाजिक सुरक्षा निदेशालय, तथा (ज) निदेशालय, चिकित्सा-सेवाएँ (कर्मचारी राज्य बीमा योजना)। इनके अतिरिक्त राज्य से अधिनिर्णयन तंत्र तथा त्रिपक्षीय निकायों का भी गठन किया गया है। इन कार्यालयों के श्रम-प्रशासन-संबंधी महत्त्वपूर्ण क्रियाकलाप का संक्षिप्त विवरण है-
  1. श्रमायुक्त का कार्यालय - राज्य के श्रम-प्रशासन में श्रमायुक्त के कार्यालय की भूमिका अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण है। राज्य में अधिकांश श्रम-अधिनियमों के प्रशासन का दायित्व इसी कार्यालय पर है। इस कार्यालय के मुख्य उद्देश्य है - 1. हड़तालों, तालाबंदियों तथा अन्य औद्योगिक कार्यवाहियों की रोकथाम, 2. नियोजकों और कर्मचारियों के बीच उनके सामाजिक दायित्वों के संबंध में जागरूकता लाना, तथा 3. विभिन्न श्रम-कानूनों का प्रवर्तन। यह कार्यालय कई श्रम-अधिनियमों के प्रवर्तन का कार्य देखता है। इन अधिनियमों में अधिकांश केन्द्रीय अधिनियम है, लेकिन उनका प्रवर्तन अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें दोनों करती है। इन अधिनियमों में मुख्य हैं - 1. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947, 2. श्रमसंघ अधिनियम, 1926, 3. औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946, 4. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948, 5. मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम, 1961, 6. कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923, 7. प्रसूति हितलाभ अधिनियम, 1961, 8. समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976, 9. बोनस भुगतान अधिनियम, 1965, 10. उपंदान संदाय अधिनियम, 1972, 11. ठेका श्रम (विनियमन और उत्पादन) अधिनियम, 1970, तथा 12. बाल श्रम (प्रतिशेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986। जिन केन्द्रीय श्रम कानूनों के प्रवर्तन का मुख्य दायित्व इस कार्यालय पर है, उनमें सम्मिलित है- 1. कारखाना अधिनियम, 1948, 2. बीडी और सिगार कर्मकार (नियोजन की शर्ते) अधिनियम, 1966, तथा 3. बॉयलर अधिनियम, 1923। इस कार्यालय का प्रधान अधिकारी श्रमायुक्त है। श्रमायुक्त के अधीनस्थ एक अपर श्रमायुक्त तथा कुछ संयुक्त श्रमायुक्त मुख्यालय में पदस्थापित है। श्रमायुक्त के अधीन उप-श्रमायुक्त राज्य के विभिन्न प्रमंडलों तथा महत्त्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्रों में और विशेष प्रयोजनों के लिए कार्यरत है। महत्त्वपूर्ण जिलों में तथा विशेष कार्यो के लिए सहायक श्रमायुक्त तथा कई क्षेत्रों में श्रम-अधीक्षक नियुक्त किए गए है। प्रखंड-स्तर पर बड़ी संख्या में श्रम-प्रवर्तन अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, जिनका मुख्य कार्य कृषि-श्रमिकों तथा अन्य ग्रामीण श्रमिकों के संबंध में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 का समुचित क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है। श्रमायुक्त औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत सुलह अधिकारी, श्रमसंघ अधिनियम के अधीन श्रमसंघों का रजिस्ट्रार तथा कुछ श्रम-अधिनियमों के अंतर्गत नियंत्रक प्राधिकारी तथा अपीलों प्राधिकारी, तथा कई श्रम-अधिनियमों के अधीन सारे राज्य का निरीक्षक होता है। वह अपने कार्यालय के स्थापन, विवाचन, पर्यवेक्षण तथा श्रम-प्रशासन-संबंधी कई अन्य कार्य भी संपन्न करता है। श्रमायुक्त के सामान्य अधीक्षण एवं पर्यवेक्षण में उप-श्रमायुक्त, सहायक श्रमायुक्त तथा श्रम-अधीक्षक अपने-अपने क्षेत्रों में औद्योगिक विवाद अधिनियम के अधीन सुलह अधिकारी के अतिरिक्त, विभिन्न श्रम-कानूनों के अंतर्गत निरीक्षक, तथा निरोक्षी पदाधिकारी की भूमिकाएँ निवाहते है। उप-श्रमायुक्तों को कृषि-श्रमिकों के श्रमसंघों के पंजीयन के लिए रजिस्ट्रार तथा कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम के अधीन क्षतिपूर्ति आयुक्त की शक्तियाँ भी प्रदान की गई है। श्रमायुक्त, अपर श्रमायुक्त तथा संयुक्त श्रमायुक्त क्षेत्रों में कार्यरत कार्मिकों के कार्यो का समय-समय पर्यवेक्षण करते हैं तथा विभिन्न श्रम-कानूनों के प्रभावी प्रवर्तन के लिए परामर्श तथा मार्गदर्शन देते रहते हैं। मुख्य कारखाना निरीक्षणालय, मुख्य बॉयलर निरीक्षणालय तथा कृषि श्रमिक निदेशालय भी श्रमायुक्त के अधीक्षण में अपने दायित्व निबाहते है। श्रमायुक्त के कार्यालय का मुख्यालय पटना में है। 
  2. मुख्य कारखाना निरीक्षणालय - मुख्य कारखाना निरीक्षणालय का प्रधान मुख्य कारखाना-निरीक्षक होता है। उसके अधीन कुछ उप-मुख्य कारखाना-निरीक्षक तथा कई कारखाना-निरीक्षक नियुक्त है। कारखाना-निरीक्षकों में कुछ चिकित्सकीय एवं रासायनिक निरीक्षक है। इस निरीक्षणालय का मुख्य कार्य राज्य में कारखाना अधिनियम का प्रवर्तन है। निरीक्षणालय कारखानों में अधिनियम के सुरक्षा, स्वास्थ्य, कल्याण आदि से संबद्ध उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहता है। निरीक्षणालय को कारखानों में मजदूरी भुगतान अधिनियम, प्रसूति हितलाभ अधिनियम, बाल श्रम (प्रतिशेध एवं विनियमन) अधिनियम तथा मजदूरी भुगतान अधिनियम के प्रवर्तन का दायित्व भी सांपै ा गया है। निरीक्षणालय उत्पादकता के संबंध में राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के साथ सहयोग करता है। यह कारखानों तथा उनमें कार्यरत श्रमिकों की दशाओं के संबंध में आँकड़ों का संकलन भी करता है। मुख्य कारखाना-निरीक्षक श्रमायुक्त के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करता है। 
  3. मुख्य बॉयलर निरीक्षणालय - मुख्य बॉयलर निरीक्षणालय का मुख्य कार्य भारतीय बॉयलर अधिनियम का प्रवर्तन है। इस निरीक्षणालय का प्रमुख मुख्य बॉयलर निरीक्षक होता है, जो श्रमायुक्त के नियंत्रण में अपने दायित्व निवाहता है। मुख्य बॉयलर निरीक्षक की सहायता के लिए कुछ बॉयलर निरीक्षकों की नियुक्ति की गई है। 
  4. कृषि श्रमिक निदेशालय - इस निदेशालय का मुख्य कार्य कृषिक्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का प्रवर्तन करना है। इस कार्यालय का प्रमुख संयुक्त श्रमायुक्त की कोटि का निदेशक, कृषि श्रमिक होता है। मुख्यालय में निदेशक की सहायता के लिए उप-निदेशक तथा प्रखंडों में श्रम-प्रवर्तन-पदाधिकारी नियुक्त हे। निदेशक, कृषि श्रमिक, श्रमायुक्त के नियंत्रण तथा अधीक्षण में अपना दायित्व निवाहता है। 
  5. मुख्य निरीक्षी पदाधिकारी का कार्यालय - इस कार्यालय का मुख्य कार्य दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम का प्रवर्तन है। इस कार्यालय का प्रमुख उप-श्रमायुक्त की कोटि का मुख्य निरीक्षी पदाधिकारी होता है, जो श्रमायुक्त के अधीनस्थ अपने कर्तव्यों का निर्वाह करता है। क्षेत्रों में सहायक श्रमायुक्त तथा श्रम-अधीक्षक अधिनियम के प्रवर्तन का कार्य संपन्न करते हैं। 
  6. नियोजन एवं प्रशिक्षण निदेशालय - इस निदेशालय का मुख्य कार्य रोजगार-कार्यालयों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों तथा अन्य विशिष्ट संस्थाओं के संचालन का कार्य संपन्न करना है। इस निदेशालय के कार्य केन्द्रीय सरकार के रोजगार और प्रशिक्षण महानिदेशालय द्वारा निर्धारित नीतियों, मानकों तथा पद्धतियों के अनुसार होते हैं। निदेशालय द्वारा राज्य के कई नगरों एवं क्षेत्रों में रोजगार कार्यालय संचालित होते हैं तथा विश्वविद्यालयों में रोजगार-सूचना-केन्द्रों तथा व्यावसायिक मार्गदर्शन ब्यूरो स्थापित किए गए है। निदेशालय रोजगार-बाजार- सूचनाएँ भी एकत्र करता है। इस कार्यालय का प्रधान निदेशक, नियोजन एवं प्रशिक्षण होता है। उसकी सहायता के लिए कुछ उपनिदेशक, सहायक निदेशक तथा कई रोजगार पदाधिकारी और सहायक रोजगार पदाधिकारी नियुक्त है। इस निदेशालय का प्रशिक्षण विभाग शिक्षु अधिनियम, 1961 को क्रियान्वित करता है तथा राज्य के कुछ नगरों में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं का संचालन करता है। इन प्रशिक्षण संस्थानों में विभिन्न व्यवसायों एवं शिल्पों में प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। इस निदेशालय पर बिहार सरकार द्वारा चलाई जानेवाली अनियोजन संकेतक भत्ता योजना के क्रियान्वयन का दायित्व भी रहा है। 
  7. सामाजिक सुरक्षा निदेशालय - इस निदेशालय का मुख्य कार्य केन्द्र एवं राज्य सरकार की सार्वजनिक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का क्रियान्वयन है। इन सार्वजनिक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में मुख्य है- 1. राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, 2. राष्ट्रीय परिवार हितलाभ योजना, 3. राष्ट्रीय प्रसूति हितलाभ योजना, 4. राज्य सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना, 5. बंधुआ श्रमिकों का पुनर्वासन तथा 6. अपंगों एवं भिक्षुकों के बीच वस्त्र वितरण योजना निदेशालय अंतराज्जीय उत्प्रवासी कर्मकार (नियोजन एवं सेवा-शर्ते) अधिनियम, 1976 के प्रवर्तन का कार्य भी देखता है। निदेशालय का प्रधान निदेशक, सामाजिक सुरक्षा होता है। उसकी सहायता के लिए मुख्यालय में उप-निदेशक तथा क्षेत्रों में सहायक निदेशक नियुक्त किए गए है। निदेशालय के अधिकांश कार्यक्रम जिलाधिकारों, अनुमंडल पदाधिकारियों तथा प्रखंड विकास पदाधिकारियों के जरिए संपन्न किए जाते हैं। 
  8. निदेशालय, चिकित्सा-सेवाएँ (कर्मचारी राज्य बीमा योजना)- कर्मचारी राज्य बीमा योजना के अन्तर्गत चिकित्सा-हितलाभ के संचालन का मुख्य दायित्व राज्य सरकारों का है। राज्य के श्रम-विभाग में निदेशालय, चिकित्सा-सेवाएं (कर्मचारी राज्य बीमा योजना) का गठन किया गया है। यह निदेशालय राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से कर्मचारी राज्य बीमा योजना के अंतर्गत स्थापित अस्पतालों के लिए चिकित्सकों तथा अन्य कार्मिकों की सेवाओं की व्यवस्था करता है। निदेशालय का प्रमुख निदेशक, चिकित्सा सेवाएं होता है जो कर्मचारी राज्य बीमा योजना के अंतर्गत चिकित्सा हितलाभ के कार्यान्वयन के कार्य को समन्वित और नियंत्रित करता है। 

अधिनिर्णयन तंत्र 

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन राज्य सरकार ने औद्योगिक न्यायाधिकरणों तथा न्यायालयों की भी स्थापना की है। इस अधिनिर्णयन प्राधिकारियों का मुख्य काय्र औद्योगिक विवादों का अधिनिर्णयन करना है। 

त्रिपक्षीय निकाय 

राज्य सरकार के श्रम विभाग के तत्वावधान में कुछ त्रिपक्षीय निकायों का भी गठन किया गया है। इनमें महत्वपूर्ण है- राज्य केन्द्रीय श्रम सलाहकार बोर्ड, मूल्यांकन तथा कार्यान्वयन स्थायी समिति, चीनी और जूट उद्योगों के लिए स्थायी समितियाँ तथा ठेका श्रमिकों और न्यूनतम मजदूरी से संबद्ध सलाहकार समितियाँ। राज्य सरकार के श्रम विभाग ने राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में श्रम-कल्याण केन्द्रों की स्थापना की है। इन केन्द्रों के कार्यकलाप श्रम-कल्याण पदाधिकारियों की देखरेख में चलाए जाते रहे है। मुख्यालय-स्तर पर इन श्रम-कल्याण केन्द्रों के लिए संयुक्त श्रमायुक्त को प्रभार सांपै ा गया है। इन केन्द्रों के श्रम-कल्याण कार्यकलाप में सम्मिलित है- प्रसवावस्था में परिचारिका सेवाएं, संगीत एवं मनोरंजन कार्यक्रमों का आयोजन, पुस्तकालय एवं वाचनालय, पारितपोशिक वितरण, सिलाई कला प्रशिक्षण, उत्पादन केन्द्र कार्यक्रम, श्रमिकों को मद्यपान-व्यसन, ऋणग्रस्तता आदि से मुक्ति पाने के लिए प्रशिक्षण, श्रमिकों के बच्चों के लिए पठन सामग्रियों का वितरण तथा औद्योगिक स्वास्थ्य सेवाएं। प्रारम्भ में श्रम-कल्याण केन्द्रों के कार्यकलाप बड़े उत्साह से चलाए गए, लेकिन विगत वर्षो में राशि की कमी के कारण ये कार्यकलाप सीमित पैमाने पर ही चलाए जाते हैं। वर्तमान समय में अधिकांश श्रम-कल्याण केन्द्र निश्क्रिय है।

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