पूंजी की लागत का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएँ, महत्व एवं वर्गीकरण

अनुक्रम

पूँजी की लागत का अर्थ एवं परिभाषा

पूंजी की लागत एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जिसे अनेक अर्थो में प्रयुक्त किया जाता है। पूंजी प्रदाता या विनियोक्ता के दृष्टिकोण से यह उस त्याग का पुरस्कार है जिसको वह वर्तमान उपभोग को स्थगित करके भविष्य में विनियोग के बदले प्राप्त करने की इच्छा रखता है। उपयोगकर्ता के दृष्टिकोण से पूंजी की लागत पूंजी का उपभोग करने के बदले दिया गया मूल्य है। तकनीकी दृष्टिकोण से पूजीं की लागत वह न्यनतम प्रत्याय दर है जो विनियोक्ताओं को सन्तुष्ट करने एवं उपयोगकर्ता को अपने व्यवसाय को बनाये रखने के लिये विनियोगों पर अर्जित करनी चाहिये।
  1. सोलोमन इजरा - पूंजी की लागत अपेक्षित अर्जनों की न्यूनतम दर या पूंजी व्ययों की विच्छेद पर है। -
  2. मिल्टन एच. स्पेन्सर - पूंजी की लागत वह न्यूनतम प्रत्याय दर होती है, जिसे एक फर्म किसी विनियोग को करते मय एक शर्त के रूप में आवश्यक मानती है। 
  3. हन्ट, विवलियम तथा डोनाल्डसन - इसे (पूंजी की लागत ) उस दर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो प्राप्त् शुद्ध राशि पर अवश्य ही अर्जित की जानी चाहिये ताकि देय होने पर लागत व्यायों की पूर्ति की जा सके। 
  4. एम.जे.गार्डन - पूंजी की लागत वह प्रत्याय दर है जो कि एक कम्पनी को अपना मूल्य बनाये रखने के लिये विनियोग पर अर्जित करनी चाहिये। 
  5. डब्ल्यू जी. लवेलियन - एक फर्म की तथाकथित पूंजी की लागत जिसे सामान्यतया वार्षिक प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है-सरल रूप वें वह प्रत्याय दर है जो उस फर्म की सम्पतियों को अपना विनियोग औचित्य प्रदर्शित करने के लिये अर्जित करना चाहिये। 
  6. हम्पटन जॉन जे - पूंजी की लागत एक ऐसी प्रत्याय दर है जो एक संस्था अपने मूल्य में वृद्धि करने के लिये विनियोग पर चाहती है। 
निष्कर्ष के रूप में पूंजी की लागत वह न्यूनतम प्रत्याय दर है जो किसी संस्था को ऋणप्रदाताओं को उनके त्याग की लागत का भुगतान करने व अपने समता अंशों के बााजार मूल्य में वृद्धि करने अथवा बनाये रखने के लिये अपने विनियोगों पर अवश्य प्राप्त करनी चाहिये।

पूँजी की लागत की विशेषताएँ

  1. पूंजी की न्यूनतम प्रत्याय दर- पूंजी की एक ऐी न्यूनतम प्रत्याय दर है जो किसी संस्था को अपने विनियोग पर प्राप्त करनी चाहिये, जिससे प्राप्त कोषों की लागतों का भुगतान किया जा सके। 
  2. लागत नहीं होना - पूंजी की लागत वास्तव में कोई लागत नहीं है, वरन एक प्रत्याय दर है जो किसी संस्था को विनियोग पर प्राप्त करनी चाहिये। 
  3. व्यावसायिक एवं वित्तीय जोखिम का पुरस्कार- पूंजी की लागत मुख्यत: व्यावसायिक एवं वित्तीय जोखिम के बदले मिलने वाला पुरस्कार है व्यावायिक जोखिम बिक्री की मात्रा व वित्तीय जोखिम पूंजी संरचना पर निर्भर करती है।

पूँजी की लागत का वर्गीकरण

पारम्परिक लागत एवं भावी लागत - 

पारम्परिक लागत वह लागत होती है जिस पर भूतकालीन लेखांकन व्यवस्था में लेखों को लिपिबद्ध किया जाता है। भावी लागत वह लागत होती है जिसका पूर्वानुमान भविष्य के वर्षों के लिए किया जाता है।

विशिष्ट लागत एवं संयुक्त लागत - 

पूँजी के विभिन्न उपलब्ध वित्तीय स्रोतों को पृथक रूप से विशिष्ट लागत कहा जाता है जैसे समता अंशपूँजी, पूर्वाधिकारी अंश पूँजी एवं ऋण पत्रादि संयुक्त लागत संगठन में विनियोजित समग्र पूँजी की संयुक्त लागत होती है, इसके अन्तर्गत समस्त पूँजी लागत को सम्मिलित किया जाता है। संयुक्त लागत को सम्पूर्ण पूँजी साधनों की औसत पूँजी लागत होने के कारण भारित लागत भी कहा जाता है। पूँजी व्यय सम्बन्धी निर्णयन में भारित लागत का महत्वपूर्ण स्थान होता है।

औसत लागत तथा सीमान्त लागत  -

संगठन में विनियोजित समस्त प्रकार की पूँजी में प्रत्येक स्रोत की लागत का भारित औसत, औसत लागत कहलाती है। संगठन की पूँजी संरचना में प्रत्येक स्रोत का अनुपात भार होता है उसी के आधार पर औसत लागत की गणना की जाती है। सीमान्त लागत वह लागत होती है जिसे संगठन द्वारा नये कोषों के माध्यम से जुटाया जाता है। यह नवीन कोषों से एकत्रित पूँजी की औसत लागत होती है, विनियोग सम्बन्धी निर्णयन में सीमान्त लागत का महत्वपूर्ण स्थान होता है।

स्पष्ट लागत एवं अन्र्तनिहित लागत  - 

स्पष्ट लागत उस छूट की दर को कहते हैं जो रोकड़ आगमनों के वर्तमान मूल्य को रोकड़ निर्गमन (Cash outlaws) के वर्तमान मूल्य को समतुल्य करती है। व्यावहारिक तौर पर यह आन्तरिक प्रत्याय दर होती है। अन्र्तनिहित लागत वह प्रत्याय दर होती है जो किसी विशिष्ट विनियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने हेतु परित्यक्त अवसरों की लागत होती है इस लागत का आविर्भाव तब होता है जब संस्था उगाहे गये कोषों के वैकल्पिक प्रयोग पर विचार करती है। इसे अवसर लागत (Opportunity cost) भी कहा जाता है।

पूँजी की लागत की गणना

सामान्य तौर पर किसी कम्पनी की पूँजी लागत के मापन हेतु कोई निर्धारित कार्यविधि नहीं है। संगठन की आवश्यकताओं नीतियों एवं परिस्थितियों के अनुसार पूँजी की लागत का पूर्वानुमान लगाया जाता है। संगठन के लिए पूँजी एकत्रीकरण के विभिन्न साधनों की पूँजी लागत प्राय: भिन्न-भिन्न होती है जिसकी गणना इस प्रकार की जा सकती है।

ऋण पूँजी की लागत 

वस्तुत: ऋण पूँजी संगठन की वह पूँजी होती है जो संगठन के अन्तर्गत ऋणों के रूप में आती है ऋण पूँजी की लागत वह ब्याज दर होती है जो कि संगठन द्वारा ऋणदाताओं को देय होती है वस्तुत: यह दर कम्पनी द्वारा ऋण पूंजी के निर्गमन काल में तय की दी जाती है। ऋण पूंजी की लागत ज्ञात करने हेतु ऋण पत्रों के निर्गमन पर होने वाले व्ययों जैसे विज्ञापन, छपाई, कमीशन, इत्यादि व्ययों को समायोजित करते हुए निर्गमन से प्राप्त शुद्ध राशि का आंकलन किया जाता है शोधन काल के आधार पर ऋण पूंजी को दो वर्गो में विभाजित किया जा सकता है।

सतत ऋण पूँजी की लागत 

सतत ऋण पूँजी वह पूँजी होती हैं जिसका शोधन (भुगतान) प्राय: कम्पनी के जीवन काल में नहीं करना पड़ता। किसी भी उपक्रम द्वारा संगठन में ऋण पूँजी के अनुपात को स्थिर बनाये रखने हेतु सतत ऋण पूँजी का निर्गमन किया जाता है। सतत ऋण पूंजी का शोधन कम्पनी के जीवन काल में किये जाने की बाध्यता न होने के कारण इसे अशोधनीय ऋण पूँजी (Non Reedemable) भी कहा जाता है। 

शोधनीय ऋणपूंजी की लागत

शोधनीय ऋण वे ऋण होते हैं जिनका भुगतान पूर्व निर्धारित अवधि के उपरांत संगठन द्वारा ऋणपत्र धारक को करना पड़ता है। शोधनीय ऋणों की पूँजी लागत ज्ञात करने हेतु देय ब्याज के साथ-साथ शोधन के समय चुकाये जाने वाले मूलधन पर भी ध्यान देना होता है।

पूर्वाधिकार अंश पूंजी की लागत

पूर्वाधिकार अंश वे है जिन पर लाभाँश की एक निश्चित पूर्व निर्धारित दर होती है। साथ ही कम्पनी के समापन पर पूर्वाधिकारी अंशधारकों को पूँजी की वापसी में वरीयता प्राप्त होती है। लाभांश की देयता का निर्धारण निदेषक मण्डल सभा में निदेषक मण्डल द्वारा किया जाता है। संचयी पूर्वाधिकार अंशधारकों को लाभांश का भुगतान स्थगित करने पर आगामी वर्शो में होने वाले लाभों में से भुगतान करना आवश्यक होता है। किन्तु असंचयी पूर्वाश्चिाकार अंशों की दषा में कम्पनी का लाभ कम होने पर उसे भुगतान के दायित्व से मुक्ति मिल सकती है। पूर्वाधिकारी अंश पूंजी की लागत का निर्धारण अंशों पर देय लाभांश में प्रति अंश प्राप्त शुद्ध मूल्य राशि का विभाजन करके 100 से गुणा करने के उपरान्त प्रतिशत के रूप में किया जा सकता है।
         
व्यावहारिक तौर पर पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन प्रीमियम अथवा छूट पर किया जा सकता है। इन अंशों के निर्गमन पर होने वाले व्ययों को निर्गमन की लागत में सम्मिलित किया जाता है। पूर्वाधिकारी अंशों के सममूल्य को आवश्यकतानुसार निम्न सूत्रों के माध्यम से समायोजित करके शुद्ध राशि (Net Proceeds) ज्ञात की जा सकती है।
  1. पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन सममूल्य पर होने की दषा में प्राप्त शुद्ध राशि (NP)= सममूल्य (NV) & निर्गमन व्यय (IE) 
  2. पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन छूट पर होने की दषा में प्राप्त शुद्ध राशि NP = सममूल्य (NV)- छूट (D) - निर्गमन व्यय (IE) 
  3. पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन प्रीमियम पर होने की दषा में प्राप्त शुद्ध राशि (NP) - सममूल्य (PV) $ प्रीमियम (P) & निर्गमन व्यय (IE) 
पूर्वाधिकार अंशों की लागत निर्धारण में समायोजन हेतु कर (Tax) की धनराशि को सम्मिलित नहीं किया जाता है। क्योंकि पूर्वाधिकार अंशों पर लाभांश का भुगतान करों के भुगतान के उपरान्त किया जाता है।

समता अंश पूँजी की लागत

समता अंश पूंजी धारक वास्तविक अर्थों में कम्पनी के स्वामी होते हैं कम्पनी में होने वाले लाभ का अधिकतम भाग प्राय: समता अंशधारकों के मध् य वितरित करने का प्रयास निदेषक मण्डल द्वारा किया जाता है। किन्तु समता अंश पूंजी पर लाभांश की एक निश्चित दर का भुगतान प्रबन्ध के द्वारा किया जाना अनिवार्य नहीं होंता। लाभांश का भुगतान करने या न करने के सम्बन्ध में कम्पनी प्रबन्धन पूर्णरूप से स्वतंत्र है। समता अंश पूंजी पर देय लाभांश की दर अनिश्चित होने के कारण समता अंश पूंजी की लागत का आकलन करना अपेक्षाकृत कठिन होता है। किन्तु स्वाभाविक तौर पर समता अंश पूंजी को लागत रहित पूंजी (Cost free capital) नहीं कहा जा सकता। वस्तुत: समता अंश धारकों द्वारा कम्पनी में विनिवेष (Investment) लाभांश के रूप में आय प्राप्त करने हेतु ही किया जाता है। प्राय: समता अंशधारक कम्पनी से अपेक्षाएं रखते है।
  1. समता अंशधारक एक निश्चित दर से प्रति अंश लाभांश (Dividend per share) अनवरत प्राप्त करते रहेंगें।
  2. अंशधारकों के प्रति अंश आय में अनवरत वृद्धि होती रहेगी। 
  3. व्यवसाय में अधिकतम लाभ की निरन्तरता बनी रहे, जिससे प्रतिधारित आय (Retained earning) में वृद्धि हो। उपरोक्त अपेक्षाओं के परिप्रेक्ष्य में कम्पनी प्रबन्धन एक न्यूनतम उपर्जन क्षमता बनाये रखने का प्रयास करती है। प्राय: समता अंश पूंजी की लागत का निर्धारण निम्नलिखित प्रविधियों से किया जाता है।

लाभांश प्राप्ति विधि 

लाभांश पा्रप्ति विधि समता अंशधारकों को प्राप्य: लाभांश पर आधारित विधि होती है। अत: इसे लाभांश मूल्य अनुपात विधि (Dividend Price Ratio method) के नाम से भी जाना जाता है व्यावहारिक तौर पर प्रत्याषित या घोशित दर पर समता अंश पूंजी की लागत न होकर अपितु समताअंश पूंजी की लागत लाभांश प्राप्ति के बराबर होती है।

सीमाएँ -

  1. समता अंशों के वास्तविक मूल्य के सापेक्ष बाजार मूल्य को सम्मिलित किया जाता है जबकि वास्तविक मूल्य की उपेक्षा की जाती है। 
  2. संगठन में होने वाली प्रतिधारित आय (Retained earning) की उपेक्षा की जाती है। जबकि प्रतिधारित आय से अंशों के बाजार मूल्य एवं लाभांश में वृद्धि होती है। 
  3. इस विधि के अन्तर्गत भविष्य में होने वाली लाभांश की मात्रा में वृद्धि को कोई स्थान नहीं दिया जाता । 
  4. समता अंशों के बाजार मूल्य में होने वाले उच्चावचनों के कारण उन अंशों का वास्तविक बाजार मूल्य ज्ञात करना कठिन होता है। 

उपार्जन प्राप्ति विधि 

यह विधि आय मूल्य अनुपात विधि (earning price ratio method) के नाम से भी जानी जाती है, इस विधि के अन्तर्गत समता अंश पूंजी की लागत का निर्धारण अंशों पर होने वाली प्रत्याषित आय को उनके बाजार मूल्य से सम्बन्धित करके ज्ञात की जाती है। यह विधि इस मान्यता पर आधारित है कि समता अंश धारक कम्पनी के अप्रत्यक्ष तौर पर स्वामी होते हैं।

लाभांश प्राप्ति तथा लाभांश वृद्धि विधि  

यह विधि इस अवधारणा पर आधारित है कि समता अंश धारक केवल वर्तमान में प्राप्त लाभांश से सन्तुश्ट न होकर अपितु लाभांश से प्रतिवर्ष वृद्धि की अपेक्षा रखते है। समता अंश जैसे जोखिम पूर्ण विनियोजन का आधार यही है। इस विधि के अन्तर्गत समता अंश पूंजी की लागत का निर्धारण कम्पनी की वर्तमान लाभांश दर में सम्भाव्य भावी वृद्धि का समायोजन करके किया जाता है।
        
सीमाएं (Limitation) इस विधि की कतिपय सीमाएं हैं। 
  1. इस विधि में .यह माना जाता है कि लाभांश दर में होने वाली वृद्धि, प्रति अंश अर्जन तथा प्रति अंश बाजार मूल्य में होने वाली वृद्धि के समान होगी। जब कि प्राय: व्यवहार में ऐसा नहीं होता । 
  2. लाभांश में वृद्धि की दर ज्ञात करना कठिन होता है। 
  3. कम्पनी द्वारा भविष्य में होने वाले लाभांश की मात्रा में अनवरत वृद्धि का अनुमान यथार्थपूर्ण नहीं होता है। कम्पनी को भावी वर्षों में हानि होने की दषा में लाभांश की मात्र में कमी भी हो सकती है। 

प्रतिधारित आय की लागत

प्राय: कम्पनियाँ अपने द्वारा अर्जित समस्त लाभों में से सम्पूर्ण भाग वितरित न करके उसका कुछ भाग संगठन के विकास हेतु संचय के रूप में रख लेती है। इसका प्रयोग वित्त की भावी मांग को पूर्ण करने हेतु किया जाता है। इसी से की हुई आय को प्रतिधारित आय (Retained earnings) कहा जाता है। प्रतिधारित आय के रूप में संगठन को आन्तरिक साधनों से पूँजी प्राप्त होती है। इस परिप्रेक्ष्य में आम धारणा यह है कि प्रतिधारित आय के रूप में संग्रहीत पूंजी की कोई लागत नहीं होती है। व्यवहारिक तौर पर कम्पनी को यह राशि अत्यन्त सहजता से प्राप्त होती है। तथा इसके लिए किसी भी प्रकार का निर्गमन व्यय नहीं करना पड़ता, किन्तु वास्तविक रूप में प्रतिधारित आय की कुछ न कुछ लागत अवष्य होती है। क्योंकि अंश धारकों द्वारा अपने लिये उपलब्ध लाभ में से कुछ भाग का परित्याग करना पड़ता है। आय के एक भाग को प्रतिधारित करने से अंश धारक उस आय के पुर्नविनियोग अवसर से वंचित हो जाते हैं। वस्तुत: प्रतिधारित आय की लागत अंशधारकों द्वारा त्याग किये गये विनियोग अवसर की लागत होती है। प्रतिधारित आय की लागत आगणन हेतु दो परिस्थितियाँ विद्यमान हो सकती हैं। 
  1. जब अंश धारक को प्राप्त लाभांश पर कर एवं दलाली के रूप में कोई धनराशि व्यय नहीं करना पड़ता। 
  2. जब लाभांश की प्राप्ति पर कर भुगतान एवं विनियोजन पर दलाली इत्यादि का भुगतान करना पड़ता है। 
प्रथम स्थिति में प्रतिधारित आय की अवसर लागत समता अंश पूंजी की लागत के समान होगी। 

पूँजी की लागत का महत्व 

परम्परा विचारधारा के अन्तर्गत वित्तीय प्रबन्धन के क्षेत्र में पूँजी की लागत अवधारणा को कोई महत्व नहीं दिया गया। क्योंकि इस अवधारणा में कोषों के संग्रहण पर अधिक बल दिया गया। न कि कोषों के समुचित उपयोग पर। किन्तु आधुनिक विचारधारा पूँजी की लागत अवधारणा को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान देती है। वर्तमान वैष्वीकरण (Globalisation) एवं मुक्तिकरण (Liberalisation) के परिवेष में विष्व समुदाय के साथ प्रतिस्पर्धा हेतु यह आवश्यक हो जाता है कि पूंजी की लागत अवधारणा को मात्र सैद्धान्तिक अध्ययन हेतु स्वीकार न करके अपितु व्यावहारिक धरातल पर लागत नियंत्रण, लाभ अधिकतमीकरण एवं धन अधिकतमीकरण हेतु प्रयोग में लाया जाय। पूंजी की लागत अवधारणा की सार्थकता का विवेचन निम्नलिखित “ाीर्शक के अन्तर्गत किया जा सकता है। 

पूंजी व्यय सम्बन्धी निर्णयन में सहायक

पूंजी व्यय सम्बन्धी निर्णयन में पूंजी की लागत अवधारणा महत्वपूर्ण होती है। वस्तुत: किसी भी विनियोग प्रस्ताव की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का आधार विनियोग की लागत होती है। वस्तुत: विनियोग की प्रत्याषित आय एवं पूंजी की लागत के मध्य अन्र्तसम्बन्ध होता है। यदि विनियोग से प्रत्याषित आय का वर्तमान मूल्य विनियोग की लागत (पूंजी की लागत) के समतुल्य अथवा अधिक हो तो वह विनियोग प्रस्ताव स्वीकार्य होगा, किन्तु यदि विनियोग से प्रत्याषित आय का वर्तमान मूल्य विनियोग की लागत से कम हो तो वह विनियोग प्रस्ताव अस्वीकार्य होगा। 

वित्तीय निर्णयन में सहायक

सगंठन के अन्तगर्त प्रबन्धकों को अनेक प्रकार की वित्तीय निर्णयन लेने होते हैं जैसे लाभांश निर्णयन, कार्यषील पूँजी नीति सम्बन्धी निर्णयन, लाभों के पुर्नविनियोग सम्बन्धी निर्णयन आदि, प्रबन्ध द्वारा इन बिन्दुओं पर निर्णय लेने से पूर्व पूंजी की लागत को ध्यान में रखा जाता है। 

सगंठन हेतु पूंजी सरचंना का निर्धारण

वस्ततु : विभिन्न सा्रेतों से प्राप्य पूंजी की मात्रा का निर्धारण संगठन की अनुकूलतम पूंजी संरचना हेतु आवश्यक होता है। विभिन्न विकल्पों में से अनुकूल विकल्प के चयन का आध् ाार मात्र पूंजी की लागत होती है। अपेक्षाकृत कम लागत वाली पूंजी का चयन संगठन के हित में होता है। 

पूंजी मिलान का निर्धारण

पूंजी मिलान दर वह दर है जिसके माध्यम से बाजार में उपलब्ध विभिन्न विनियोग विकल्पों के आर्थिक मूल्य का मूल्यांकन सहजता से किया जा सकता है। पूंजी मिलान दर का निर्धारण करने हेतु पूंजी की लागत का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। अनुकूलतम पूंजी ढॉंचे के निर्धारण हेतु वित्तीय प्रबन्धक को पूंजी की लागत को न्यूनतम करने एवं संगठन की प्रत्याय दर को अधिकतम करने हेतु प्रभावी कदम उठाने चाहिये। 

वित्तीय निर्णय में पूंजी की लागत की भूमिका 

परम्परागत विचारधारा के अन्तर्गत वित्तीय निर्णयन में पूंजी की लागत का कोई स्थान नहीं था किन्तु नवीन विचारधारा के अन्तर्गत वित्तीय निर्णयन में पूंजी की लागत का महत्वपूर्ण स्थान है। वस्तुत: फर्म द्वारा लिये गये विनियोग सम्बन्धी निर्णयों में पूंजी की लागत का गहरा प्रभाव पड़ता है। वित्तीय निर्णयन में पूंजी की लागत की भूमिका निम्नलिखित रूप में स्वीकार की गयी है।

पूंजी बजटिग सम्बन्धी निर्णयन

पूंजी बजटिगं सम्बन्धी निणर्यो में पूंजी की लागत की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। वस्तुत: किसी भी फर्म की पूंजी की औसत लागत प्रत्याय की उस न्यूनतम दर अथवा मिलान बिन्दु की सूचक है जिससे कम दर पर पूंजी निवेष के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं दी जा सकती। किसी परियोजना में विनियोग सम्बन्धी निर्णय विनियोग के शुद्ध वर्तमान मूल्य के धनात्मक होने पर ही लिया जाता है। वस्तुत: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पूंजी की लागत अवधारणा वित्तीय निर्णय के मापदण्ड स्वरूप अत्यन्त उपयोगी हो चुकी है। 

पूंजी ढाँचे के आयोजन सम्बन्धी निर्णय

प्रत्येक औद्योगिक संगठन द्वारा संगठन के हित में अनुकूलतम पूंजी ढाँचे की संरचना का प्रयत्न किया जाता है। संगठन की कार्यक्षमता के समुचित विदोहन हेतु एवं पूंजी लागत को न्यूनतम करने हेतु अंश पूंजी तथा ऋण पूंजी का अनुकूलतम मिश्रण (Optimum mix) तैयार करने का प्रयत्न किया जाता है। जिससे संगठन की पूंजी की औसत लागत को न्यूनतम रखते हुए अंश पूंजी तथा ऋण पूंजी का अनुकूलतम मिश्रण तैयार करने का प्रयत्न किया जाता है। जिससे संगठन की पूंजी की औसत लागत को न्यूनतम रखते हुए अंशों के बाजार मूल्य को अधिकतम रखा जा सके। 

अन्य वित्तीय निर्णयन

अन्य वित्तीय निणर्यों के अन्तर्गत पूंजी की लागत अवधारणा का प्रमुख बिन्दु पूंजी होती है। इसके माध्यम से कार्यषील पूंजी का प्रबन्ध अत्यन्त सुचारू रूप से किया जा सकता है। लाभांश एवं प्रतिधारण नीतियों के निर्धारण में भी पूंजी की लागत का सिद्धान्त अत्यन्त उपयोगी होता है। इसके अतिरिक्त यह सिद्धान्त फर्म की वित्तीय कार्य निश्पत्ति के मूल्यांकन में प्रभावी भूमिका का निर्वहन करता है।

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