प्रबंध की संकल्पना एवं संरचना

अनुक्रम
बहुधा प्रबन्ध शब्द का प्रयोग सुव्यवस्थित, सुसंगठित तथा क्रमबद्ध रूप से कार्यों के सम्पन्न होने के लिए किया जाता है। दूसरे शब्दों में, कम्पनियों का संचालन करने वाले व्यक्तियों के संदर्भ में भी इसका प्रयोग करते हैं। इन कम्पनियों के संचालन हेतु व्यवसायिक रूप से प्रशिक्षित प्रबंधकों की आवश्यकता होती है। इन प्रबन्धकों की सफलता उनके प्रबंधकीय ज्ञान सिद्धान्त तथा उसके कुशल एवं सुव्यवस्थित उपयोग पर आधारित होती है।

प्रबंध की संकल्पना 

यू तो प्रबंध की संकल्पना उतनी ही प्राचीन होती है जितनी कि मानव सभ्यता। आदि काल से ही मानव समूहों में रहता था और जीवन यापन हेतु कार्यों का बंटवारा भी होता था। जीवन के प्रत्येक स्तर पर प्रबंध की संकल्पना का प्रयोग किया जाता है किन्तु हमें प्रबंध को व्यवसाय की दृष्टि से समझना और विश्लेषित करना है। अत: प्रबन्ध के ज्ञान से पहले आइये जाने व्यवसाय क्या होता है।

प्रबंध

व्यवसाय का अर्थ उन क्रियाओं से है जिनके द्वारा जीवन यापन होता है। प्राय: यह आर्थिक क्रियाओं की ओर संकेत करता है। चित्र 1. व्यवसाय को और विस्तृत करने का एक प्रयास है जिसके अन्र्तगत व्यापार, वाणिज्य सहायक उद्योग, प्रत्यक्ष सेवाएं व उनकी उप क्रियाओं आदि का समावेश किया जाता है जिनसे उपभोक्ताओं की संतुष्टि होती है साथ ही साथ व्यावसायिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति सम्भव हो पाती है।
अग्रलिखित विशेषताओं से व्यापार की प्रकृति को विश्लेषित किया जा सकता है :
  1. व्यवसाय एक आर्थिक क्रिया है।
  2. व्यवसाय के लिए लेन-देन में नियम व निरंतरता आवश्यक है।
  3. व्यवसाय साहस एवं जोखिम का कार्य है, इसमें लाभ व हानि दोनों सम्भव है।
  4. पूंजी व्यवसाय का आधारभूत तत्व है।
  5. व्यवसाय में व्यापार, उद्योग तथा सहायक सेवाओं से सम्बन्धित क्रियायें सम्मिलित की जाती हैं।
  6. व्यवसाय एक सामाजिक संस्था है जो समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु समाज में ही उपलब्ध संसाधनों द्वारा उत्पादों , सेवाओं व सूचनाओं को उपलब्ध कराने का कार्य करता है।
  7. व्यवसाय एक प्राणी है जिसके अनेक उप-तंत्र होते हैं जैसे- उत्पादन, वित्त, कार्मिक, विपणन आदि।
  8. व्यवसाय समाज के आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक व तकनीकी पर्यावरण व्यापार को प्रभावित करता है।
  9. सरकार को समाज के कल्याणार्थ व्यापार का नियमन व नियंत्रण करना होता है।
इस प्रकार व्यवसाय से आशय उन आर्थिक क्रियाओं से है जो सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हम उत्पादों, सेवाओं व सूचनाओं को उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं एवं जिनका प्रारम्भिक उद्देश्य व्यवसायी व उपभोक्ता दोनों को लाभ पहुॅंचाना है। संक्षेप में, प्रशासन नीतियों के निर्धारण का कार्य है, जिनके आधार पर उपक्रम का संचालन किया जाता है। आइये अब प्रबन्ध को व्यवसायिक अर्थों में समझने का प्रयास करते हैं।

‘प्रबन्ध’ से आशय कर्मचारियों के उस समूह से है जो व्यापार के निर्धारित उद्देश्यों एवं नीतियों के क्रियान्वयन हेतु उत्तरदायी होता है। जो व्यक्ति इस कार्य को करते हैं उन्हें ‘प्रबन्धक’ कहते हैं। प्रबन्ध, वास्तव में एक सामाजिक प्रक्रिया होती है। जिसके द्वारा किसी संस्था के उपलब्ध संसाधनों तथा कर्मचारियों के प्रयासों में इस प्रकार समन्वय स्थापित किया जाता है जिससे संस्था के लक्ष्यों को सुव्यवस्थित, सुसंगठित दक्षतापूर्ण एवं प्रभावी ढंग से सम्पन्न किया जा सके।

इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण अंग हैं - नियोजन, संगठन, अभिप्रेरण तथा नियंत्रण। इस प्रकार प्रबन्ध उद्योग की वह शक्ति है जो नियम सीमाओं के अन्तर्गत नीतियों के क्रियान्वयन तथा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संगठन का उपयोग करती है। व्यापक दृष्टि से प्रबन्ध हमारी अर्थव्यवस्था को आकार प्रदान करता है और सुयोग्य कर्मचारियायें की नियुक्ति के द्वारा अधिकतम लाभ प्रदान करता है। वस्तुत: प्रभावी प्रबंध से ही सफलता की अपेक्षा की जा सकती है। प्रबन्ध आर्थिक व सामाजिक विकास की धुरी है। यह वह शक्ति है जो मिट्टी को सोना बना सकता है। यह वह संजीवनी है जिसका प्रयोग समाज की समस्त समस्याओं के लिए समान रूप से उपयोगी व कारगर सिद्ध हो सकती है।

प्रबन्ध की विशेषताएँ 

  1. प्रबन्ध विविध विषयों द्वारा विकसित ज्ञान तथा अवधारणाओं के समन्वय एवं व्यवहार की कला व विज्ञान है।
  2. प्रबन्ध व्यक्ति नहीं, वरन् एक प्रक्रिया है जिसके अंग हैं, नियोजन, संगठन, अभिप्रेरण व नियंत्रण ।
  3. प्रबन्ध के पूर्व निर्धारित कुछ लक्ष्य व उद्देश्य होते हैं।
  4. अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रबंध संगठन का उपयोग करता है।
  5. प्रबन्ध एक गतिशील व परिवर्तनशील सामाजिक प्रक्रिया है जो समूहों के प्रयास से सम्बन्धित है।
  6. प्रबन्ध में काम करने के लिए पदानुक्रम व्यवस्था बनाई जाती है जिसके अनुसार कुछ अधिकारी व अधीनस्थ होते हैं। ऐसी व्यवस्था संगठन के अनेक स्तरों पर बनाई जा सकती है।
  7. सुचारू प्रबन्ध हेतु अधिकारी का प्रत्यायोजन किया जाता है तथा आदेश प्रसारित किए जाते हैं।
  8. प्रबन्ध प्रत्येक संस्था का अनिवार्य अंग होता है क्योंकि वह साधनों की प्रभावशीलता एवं दक्षता को बढ़ाकर अधिकाधिक उत्पादकता का सृजन करने में योगदान देता है।
प्रबन्ध कर्मचारियों को नेतृत्व देने का प्रयास करता है तथा उन्हें सुव्यवस्थित, सुसंगठित तथा क्रमबद्ध रूप से कार्य सम्पन्न करने के लिए अभिप्रेरित करने का प्रयास करता है। संकुचित अर्थ में प्रबन्ध अन्य व्यक्तियों से कार्य कराने की युक्ति से है। इस प्रकार जो अन्य व्यक्तियों से काम कराने की क्षमता रखते हैं, उन्हें ‘प्रबंधक’ की संज्ञा दी जाती है। व्यापक अर्थ में प्रबन्ध एक कला एवं विज्ञान है जो पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उत्पादन के विभिन्न घटकों में समन्वय स्थापित करता है। इस दृष्टि से यह स्वयं उत्पादन का एक महत्वपूर्ण घटक है।

उत्पादन के विभिन्न साधनों में भूमि, पूॅंजी व मशीन गैर-मानवीय साधन हैं, जबकि श्रम, साहस व प्रबन्ध मानवीय साधन हैं। उत्पादन के ये सभी साधन अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं,किन्तु ‘प्रबन्ध’ इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह वो आर्थिक साधन है जो उत्पादन के साधनों को एकत्र करता है, नियोजन करता है, संस्था में संगठनात्मक भावना का संचार करता है, व्यावसायिक क्रियाओं का निर्देशन संचालन व समन्वय स्थापित करता है तथा समस्त क्रियाओं पर नियंत्रण रखता है। संक्षेप में, ‘प्रबन्ध एक कला एवं विज्ञान है जो एक संस्था के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए व्यक्तियों के व्यक्तिगत व सामूहिक प्रयासों के नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय एवं नियंत्रण से सम्बन्धित होता है।

प्रबंध की कोई ऐसी परिभाषा नहीं दी जा सकती जो सर्वमान्य हों। प्रबन्ध गुरूओं ने अपने अपने ढंग से इसकी अवधारणाएं दी हैं। प्रबन्ध की अवधारणा उस लघु कथा के समान है जिसमें अन्धे व्यक्तियों ने एक हाथी को पकड़ लिया और जिसके हाथ में उसका जो अंग आया उसी के अनुरूप वह हाथी के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करने लगे। हाथी की पूंछ पकड़ने वाले ने गजराज को सॉंप, पॉंव पकड़ने वाले ने खम्भा, सूॅंड पकड़ने वाले ने बांस, कान पकड़ने वाले ने सूप और जिसका हाथ पेट पर पड़ा, उसने उसे मूशक जैसा बताया। इसी प्रकार विभिन्न विद्वानों ने प्रबंध को जिस रूप में समझा उन्होंने उसी के समान उसकी अवधारणा प्रकट की। इस प्रकार अनायास ही प्रबन्ध की अनेक अवधारणाएं विकसित हो गई हैं । उनमें से कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाएं इस प्रकार हैं।

प्रक्रिया विचारधारा 

इस विचारधारा में प्रबंध की परिभाषा का आधार प्रबंधकों के कार्यों से है जिसे प्रबंधक समेकित रूप से संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु कार्य करता है। इस विचारधारा के प्रमुख तत्व में पूर्वानुमान व नियोजन, संगठन, आदेश, संयोजन और नियंत्रण आदि आते हैं।नीचे अंकित चित्र 1.2 प्रबंध की इस अवधारणा को और स्पष्ट करेगा।

प्रबंध
प्रबंधक प्रबन्धक प्रबन्धक अभिप्रेरण नियंत्रण समुदाय की सन्तुष्टि हेतु श्रेष्ठम व कुशलतम उपयोग के लिए निम्न साधनों का प्रयोग करना है। मानव माल मशीन विधि मुद्रा जिससे प्राप्त होते हैं निर्धारित लक्ष्य उपरोक्त चित्र को ऊपर से नीचे की ओर व्याख्या करने से यह ज्ञात होता है कि ‘‘प्रबन्ध, वास्तव में एक प्रक्रिया है । नियोजन, संगठन, अभिप्रेरण, तथा नियंत्रण जिसके आधारभूत अंग हैं तथा जो समुदाय को अधिकतम संतुष्टि प्रदान करने हेतु मानव, माल, मशीन, विधि व मुद्रा जैसे संसाधनों का प्रयोग करता है तथा पूर्व निर्धारित उद्देश्यो को प्राप्त करने का प्रयास करता है।

जिस प्रकार कप्तान के अभाव में एक क्रिकेट टीम इधर-उधर भटक सकती है। उसी प्रकार प्रबंध के अभाव में समुदाय के समस्त प्रयास निरर्थक हो सकते हैं प्रत्येक सामुदायिक प्रक्रिया में श्रमिक वर्ग टीम के खिलाड़ी और प्रबंध वर्ग उसका कप्तान की भॉंति होते हैं।

मानव प्रधान अवधारणा 

इसके अनुसार 20वीं शताब्दी के चौथे दशक में समाजशास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों के दबाव के कारण इस अवधारणा का विकास माना जाता है। इसके अनुसार प्रबंध दूसरों से कार्य कराने की कला व विज्ञान है। इस अवधारणा के समर्थक यह मानते हैं कि मानव का विकास करके ही संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इस विचारधारा में संगठन के मानवीय पहलू पर बल दिया गया है, चूॅंकि प्रबंधकीय कार्य मानवीय संबंधों पर आधारित है इसलिए प्रबंध एक सामाजिक प्रणाली है। प्रबंध केवल संगठन को दिशा प्रदान करने के लिए ही नहीं है। यह मानव के विकास के लिए भी उत्तरदायी है। संक्षेप में, प्रबंध की यह अवधारणा यह स्वीकार करती है कि न्यूनतम लागत और प्रयासों से संस्था के लक्ष्यों को तभी प्राप्त किया जा सकता है जबकि प्रबन्ध अपने कर्मचारियों का विधिवत विकास करें।

वस्तुत: मनुष्य का व्यक्तित्व एक अविकसित पुष्प की भांति होता है। जिसे प्रबन्ध के द्वारा ही पल्लवित किया जा सकता है। जिस प्रकार एक कुशल माली अपनी वाटिका के वृक्षों के खाद-पानी एवं प्रकाश की उत्तम व्यवस्था करके वृक्षों के लिए सुरक्षा करता है उसी प्रकार एक कारखाने में प्रबन्ध रूपी माली व्यवसायिक पर्यावरण को विकसित करके उपभोक्ताओं को सुख, शान्ति एवं संतोष प्रदान कर सकता है। इसमें कारखानें तथा उद्योग का विहित भी छिपा रहता है। इसी तथ्य के आधार पर एक बार अमरीकन कारपोरेशन के अध्यक्ष ने अपने कर्तव्यों को स्पष्ट करते हुए कहा था, ‘‘हम मोटर, हवाई जहाज, फ्रिज, रेडियो या जूते के फीते का निर्माण नहीं करते बल्कि हम बनाते हैं मनुष्य और इन मनुष्य उत्पादों का निर्माण करते हैं।’’ यह कथन सुस्पष्ट करता है कि ‘प्रबन्ध मनुष्यों का विकास है न कि उत्पादों का निर्देशन ।’’

निर्णयन विचारधारा 

इस विचारधारा के अनुसार प्रबंध नियम बनाने तथा उनका अनुपालन कराने वाली संस्था है। प्रबंधक जो भी कार्य करता है निर्णय उसका आधार होता है। एक प्रबंधक का अधिकतर समय निरंतर निर्णय लेने में ही व्यतीत होता है। निर्णय लेने की क्षमता ही संगठन को उत्पादनशील एवं प्रभावी बनाने की गतिशील शक्ति है। अत: प्रबन्धक अच्छे निर्णयों के द्वारा ही न्यूनतम लागत सुव्यवस्थित तथा प्रयासों से उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार प्रबन्ध की सफलता हेतु श्रेष्ठ निर्णयन परमावश्यक है।

वैज्ञानिक प्रबंध की अवधारणा 

इस अवधारणा का जन्म 20वीं शताब्दी में एफ. डब्ल्यू. टेलर द्वारा हुआ था। आपके अनुसार, प्रबंध से तात्पर्य काम करने की सर्वोत्तम विधि खोजना तथा न्यूनतम लागत एवं प्रयासों से अधिकतम उत्पादन करना है। इस विचारधारा के अनुसार प्रत्येक कार्य को करने की एक सर्वोत्तम विधि होती है, जिसे ‘वैज्ञानिक विधि’ की संज्ञा दी जा सकती है। प्रबन्ध की इस अवधारणा के उत्थान का कारण तत्कालीन परिस्थितियॉं भी थीं । उस समय औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करना एक चुनौती था। फलत: लोग प्रबन्ध कार्य को उसी रूप में समझने व अनुभव करने लगें। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि कार्य निष्पादन का आवश्यक मार्ग खोजना ही प्रबंध कहलाता हैं

इस विचारधारा के अनुसार संगठन की तुलना एक जीवित प्रणाली से की गई है। संगठन को अपने अस्तित्व एवं विकास के लिए वातावरण के अनुकूल कार्य करते रहना चाहिए। प्रबंध का प्रमुख कार्य संगठन को परिवर्तनशील बाजार, तकनीक तथा अन्य परिस्थितियों के अनुकूल बनाना है। प्रबंधकों से संगठन के विभिन्न सदस्यों के अंतर्विरोधी उद्देश्यों, लक्ष्यों एवं गतिविधियों में संतुलन स्थापित करने की अपेक्षा की जाती है। अत: प्रबंधक को विद्यमान परिस्थितियों को ध्यान में रखकर संगठन के लक्ष्यों का निर्धारण तथा नीति निर्माण का कार्य करना चाहिए। उपरोक्त विचारधाराओं के समग्र अवलोकन के पश्चात आइये प्रबंध की कुछ महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक परिभाषाओं के आत्मसात करने का प्रयास करें-

1. एफ. डब्ल्यू. टेलर जिन्हें प्रबन्ध विज्ञान का जनक भी कहा जाता है, के अनुसार ‘‘प्रबन्ध यह जानने की कला है कि क्या करना है तथा उसे करने का सर्वोत्तम एवं सुलभ तरीका क्या है।’’ यह परिभाषा प्रबन्ध के तीन तत्वों पर प्रकाश डालती है-
  1. प्रबन्ध एक कला है यह कला सामान्य ज्ञान और विश्लेषण ज्ञान से युक्त है।
  2. प्रबन्ध किये जाने वाले कार्यों का पूर्व चिन्तन व निर्धारण है। 
  3. यह कार्य निष्पादन की श्रेष्ठतम एवं मितव्ययितापूर्ण विधि की खोज करता है। 
उनके अनुसार कार्य को करने से पहले जानने तथा बाद में उसे भली प्रकार न्यूनतम लागत पर सम्पन्न करने की कला ही प्रबंध है। इस परिभाषा का नकारात्मक पक्ष यह है कि यह मानवीय पक्ष की घोर उपेक्षा करता है एवं शोषण को बढ़ावा देता है।

2. हेनरी फेयोल की दृष्टि से, ‘‘प्रबन्ध से आशय पूर्वानुमान लगाने एवं योजना बना संगठन की व्यवस्था करने, निर्देश देने, समन्वय करने तथा नियंत्रण करने से है।’’

इस प्रकार फेयोल ने प्रबन्ध की प्रक्रिया की व्याख्या करने का प्रयास किया है। इससे प्रबन्धक के कार्य का ज्ञान हो जाता है। इन कार्यों में पूर्वानुमान, नियोजन, संगठन, निर्देशन समन्वय तथा नियंत्रण का समावेश किया गया है किन्तु उन्होंने प्रबन्ध के समस्त कार्यों की ओर संकेत नहीं किया है जिनमें अभिप्रेरण एवं निर्णयन सम्मिलित हैं। फिर भी महत्वपूर्ण कार्यों का समावेश होने से यह परिभाषा काफी स्पष्ट, सरल, सारगर्भित बन गई है।

3. पीटर एफ. ड्रकर के अनुसार, ‘‘प्रबन्ध आद्योगिक समाज का आर्थिक अंग है। वांछित परिणामों को प्राप्त करने हेतु कार्य करना ही प्रबन्ध है। यह एक बहुउद्देशीय तत्व है जो व्यवसाय का प्रबन्ध करता है। प्रबन्धकों का प्रबंध करता है तथा कर्मचारियों व कार्य का प्रबंध करता है।’’ यह परिभाषा अग्रलिखित तत्वों पर प्रकाश डालती है-
  1. प्रबन्ध औद्योगिक सभ्यता व संस्कृति का उत्पाद है। 
  2. औद्योगीकरण के बढ़ते हुए चरणों ने प्रबंध की आवश्यकताओं को प्रेरित किया है। 
  3. प्रबन्ध वांछित परिणामों को प्राप्त करने का कार्य है। 
  4. यह एक बहुउद्देशीय तत्व है जो व्यवसाय,प्रबंधक, कर्मचारी एवं कार्य सभी का प्रबन्ध करता है। 
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि प्रबंध एक वैज्ञानिक व निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो संस्था के निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से संगठन में कार्यरत व्यक्तियों के प्रयासों का नियोजन, निर्देशन, समन्वय, अभिप्रेरण व नियंत्रण करती है। इस प्रकार उपरोक्त प्रबन्ध गुरूओं के चिन्तन के आधार पर हम आधुनिक प्रबंध की विशेषताओं का निर्धारण में सक्षम हो सकते हैं। आइये आधुनिक प्रबंध की विशेषताओं का अध्ययन करें जो कि इस प्रकार से है -
  1. प्रबन्ध एक मानवीय क्रिया है जिसमें विशिष्ट कार्य होता है।
  2. प्रबन्ध मानव एवं मानवीय संगठनों से सम्बन्धित कार्य है। जिसमें उद्देश्यपूर्ण कार्य होते हैं। 
  3. प्रबन्ध कार्यों की सुव्यवस्थित एकीकृत व संयाजित प्रक्रिया है।
  4. प्रबन्ध एक सामाजिक प्रक्रिया है जो सतत चलती रहती है। 
  5. प्रबन्ध एक गतिशील, परिवर्तनशील व सार्वभौमिक प्रक्रिया है। 
  6. प्रबन्ध वह प्रक्रिया है जो समूहों के प्रयासों से सम्बन्धित है जिसका आधार समन्वय होता है। 
  7. प्रबन्ध में कार्य निष्पादन हेतु पदानुक्रम व्यवस्था बनाई जाती है। 
  8. प्रबन्ध एक सृजनात्मक तथा धनात्मक कार्य है।
  9. प्रबन्ध एक अधिकार सत्ता व कार्य-संस्कृति है। 
  10. प्रबन्ध एक अदृश्य शक्ति है जिसे देखा या छुआ नहीं जा सकता। 
  11. प्रबन्ध एक कला व विज्ञान दोनों ही है। 
  12. प्रबन्ध ज्ञान व चातुर्य का हस्तांतरण किया जा सकता है यह कार्य शिक्षण प्रशिक्षण की व्यवस्था द्वारा सम्भव होता है। 
  13. प्रबन्ध व्यवहारवादी विज्ञान है। इसका उपयोग सभी मानवीय क्रिया क्षेत्रों में किया जा सकता है।
  14. प्रबन्ध वस्तुओं का निर्देशन नहीं, वरन मानव का विकास है। 
  15. प्रबन्ध का विधिवत नियमन व नियंत्रण किया जाता है। यह कार्य सरकार द्वारा कानून की मदद से किया जाता है। 
उपरोक्त विशेषतायें प्रबन्ध की प्रकृति का सटीक विश्लेषण करने में सक्षम हैं, जो कि है।
  1. प्रत्येक व्यवसाय में प्रबन्ध की आवश्यकता अनिवार्य रूप से होती है इसलिये प्रबंध की सार्वभौतिक प्रक्रिया कहते हैं। संगठन की प्रकृति व प्रबन्धक का स्तर चाहे कुछ भी हो, उसके कार्य लगभग समान ही होते हैं। किसी भी प्रकृति, आकार या स्थान पर प्रबन्ध के सिद्धान्तों का प्रयोग हो सकता है।
  2. संगठन के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को प्राप्त करना ही प्रबन्धन का प्राथमिक उद्देश्य है। प्रबन्ध की सफलता का मापदंड केवल यही है कि उसके द्वारा उद्देश्य की पूर्ति किस सीमा तक होती है। संगठन का उद्देश्य लाभ कमाना हो या न हो, प्रबंन्धक का कार्य सदैव प्रभावी तथा कुशलतापूर्ण सम्पन्न होना चाहिये। 
  3. प्रबन्ध में आवश्यक रूप से व्यवस्थित व्यक्तियों के सामूहिक कार्यों का प्रबन्धन शामिल होता है। प्रबन्धन में कार्य के अधीनस्थ व्यक्तियों का प्रशिक्षण विकास तथा अभिप्रेरण शामिल है। साथ ही वह उनको एक सामाजिक प्राणी के रूप में संतुष्टि प्रदान करने का भी ध्यान रखता है। इन सब मानवीय संबन्धों एवं मानवीय गतिवििध्यों के कारण प्रबन्ध को एक सामाजिक क्रिया की संज्ञा दी जाती है। 
  4. प्रबन्ध द्वारा परस्पर सम्बन्धित गतिविधियों को व्यवस्थित करने का प्रयास किया जाता है जिससे किसी कार्य की पुनरावृत्ति न हो। इस प्रकार प्रबन्ध संगठन के सभी वर्गों के कार्यों का समन्वय करता है।
  5. प्रबन्ध एक अदृश्य ताकत है। इसकी उपस्थिति का अनुभव इसके परिणामों से ही किया जा सकता है। ये परिणाम व्यवस्था, उचित मात्रा में संतोषजनक वातावरण, तथा कर्मचारी संतुष्टि द्वारा किये जा सके हैं। 
  6. प्रबन्ध एक गतिशील एवं सतत् प्रक्रिया है। जब तक संगठन में लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रयास होता रहेगा, प्रबन्ध रूपी चक्र चलता रहेगा। 
  7. प्रबन्धकीय कार्य की श्रृंखला पूर्ण रूप से सह आधारित है इसलिए स्वतंत्र रूप से किसी एक कार्य को नहीं किया जा सकता। प्रबन्ध विशिष्ट अवयवों से मिलकर बनी संयुक्त प्रक्रिया है। प्रबन्ध की सभी गतिविधियों में अनेक अवयवों को सम्मिलित करना पड़ता है इसलिए इसे एक व्यवस्थित संयुक्त प्रक्रिया की संज्ञा दी गई है। 
  8. प्रबन्ध परिणाम प्रदान कर सह क्रियात्मक प्रभावों का सृजन करता है जो सामूहिक सदस्यों के व्यक्तिगत प्रयास के योग से अधिक होता है। यह संक्रियाओं को एक क्रम प्रदान करता है, कार्यों का लक्ष्य से मिलान करता है तथा कार्यों को भौतिक और वित्तीय संसाधनों से जोड़ता है । यह सामूहिक प्रयासों को नई कल्पना, विचार तथा नई दिशा प्रदान करता है। 
कुशल प्रबन्धन व्यवहार के प्रत्येक स्तर की महत्वपूर्ण आवश्यकता है, तथा आज के प्रतियोगात्मक संगठनों में तो इसका विशेष महत्व है। प्रबन्ध किसी संगठन का मस्तिष्क होता है जो उसके लिए सोच विचार करता है और लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर अभिप्रेरित करता है। रचनात्मक विचारों और कार्यों के सम्पादन का मूल स्रोत प्रबन्ध ही है। यही संगठन की नई सोच, लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नए मार्ग और समूचे संगठन को एक सूत्र में बॉंधने का कार्य करता है। सदस्यों को अपने कुशल एवं उचित आदेशों निर्देशों द्वारा प्रबन्धक व्यापार को वांछित दिशा और सही गन्तव्य की ओर ले जाता है। संगठन की विभिन्न क्रियाओं में समन्वय और नियंत्रण स्थापित करके प्रबन्धक उसका मार्गदर्शन करता है। यह संगठन की समस्याओं का समाधान प्रदान करता है, भ्रान्तियों और झगड़ों को दूर करता है, व्यक्तिगत हितों के ऊपर सामूहिक हितों की गरिमा की स्थापना करता है। और आपसी सहयोग की भावना का सृजन करता है। कुशल प्रबन्ध के द्वारा ही सर्वोत्तम परिणामों की प्राप्ति होती है, कुशलता में वृद्धि होती है और उपलब्ध मानवीय और भौतिक साधनों का अधिकतम उपयोग सम्भव होता है, तथा लक्ष्यहीन क्रियाएं सम्पन्न होने लगती है। अकुशल प्रबन्ध वातावरण में अनुशासनहीनता, संघर्षों , भ्रान्तियों, लालफीताशाही, परस्पर विरोधों, अनिश्चितताओं, जोखिमों और अस्त-व्यस्तता को उत्पन्न करता है जिससे संगठन अपने निर्धारित लक्ष्यों से भटक जाता है। अत: किसी संगठन की सफलता में उसके प्रबन्ध का बड़ा योगदान होता है। बड़े साधन-विहीन एवं विकट समस्याओं से त्रस्त संगठन अपने प्रबन्धकों की दूरदर्शिता, कुशल नेतृत्व एवं चातुर्यपूर्ण अभिप्रेरण से सफलता की शिखर पर पहुॅंच जाते हैं।

समस्त विकसित देशों के इतिहास के विकास पर नजर डालें तो पायेंगे कि उनकी समृद्धि, वैभव व प्रभुत्व का मूल आधार कुशल प्रबन्धकीय नेतृत्व एवं व्यावसायिक उन्नति ही हैं। भारत एक विकासशील देश है, यहॉं प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता होते हुए भी गरीबी है। आज भी 26 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। आर्थिक विकास की दृष्टि से यह अपने शैवकाल से गुजर रहा है। गरीबी के साथ साथ यहॉं औद्योगिक असंतुलन तथा बेरोजगारी चरमोत्कर्ष पर है। इन आर्थिक समस्याओं को निदान औद्योगीकरण में निहित है। यही कारण है कि पंचवष्र्ाीय योजनाओं में उद्योग धन्धों के विकास पर पर्याप्त बल दिया है। प्राइवेट सेक्टर के अतिरिक्त पब्लिक सेक्टर के विकास के लिए विशाल मात्रा में विनियोजन की व्यवस्था की जा रही है। इन भावी उद्योगों के समुचित प्रबन्ध के लिये आवश्यकता होगी कुशल प्रबन्धकों की । आने वाले वर्षों में यदि मंदी को दूर कर व्यवसाय को भूतकाल की त्रुटियों से बचना है और भविष्य में प्रबन्धकों की बढ़ती हुई मांग को पूरा करना है तो कुशल प्रबन्ध के सिद्धान्तों की शिक्षा देना आवश्यक है। पर्याप्त प्रबन्धकीय सम्पत्ति का निर्माण करके ही भविष्य के लिए कुशल प्रबन्धकों को तैयार किया जा सकता है। भारतीय व्यापारिक परिदृश्य में प्रबन्ध का महत्व निम्नलिखित बिन्दुओं से आंका जा सकता है।
  1. देश में भौतिक संसाधनों का सदुपयोग करने के लिए कुशल प्रबन्ध आवश्यक है।
  2. रोजगार के सृजन के लिए भी श्रेष्ठ प्रबन्धन आवश्यक है।
  3. प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हेतु प्रभावकारी प्रबंध आवश्यक है।
  4. पूॅंजी के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए कुशल प्रबन्ध आवश्यक है।
  5. आधारभूत उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति को बढ़ावा देने के लिए प्रबन्ध की भूमिका महत्वपूर्ण है।
  6. आधारभूत सुविधाएं प्रदान करने के लिए उद्योगों का कुशल प्रबन्ध आवश्यक है।
  7. विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कुशल प्रबन्ध की आवश्यकता है।
  8. निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की उत्पादकता में वृद्धि लाने के लिए कुशल प्रबन्ध एक अनिवार्यता है।
  9. जनसाधारण के जीवन स्तर में गुणात्मक विकास लाने के लिए प्रबन्ध आवश्यक है।
  10. नव प्रवर्तन को प्रोत्साहित करने में भी प्रबन्ध की भूमिका महत्वपूर्ण है।
  11. हमारी आर्थिक नीति का आधार उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण (एल. पीजी. ) का सही क्रियान्वयन एवं समन्वय कुशल प्रबन्ध द्वारा ही सम्भव हो सकता है जिससे भारत का चातुर्दिक विकास कर समृद्धि लाई जा सकती है और भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा किया जा सकता है।

प्रबंध के विभिन्न स्तर एवं कार्य 

आधुनिक प्रतियोगात्मक व्यवसायिक युग में संस्था का स्वामित्व एवं प्रबन्ध पृथक पृथक होते हैं और प्रबन्ध के भी विभिन्न स्तर होते हैं। प्रबन्ध के विभिन्न स्तरों के अन्तर्गत प्रबन्धकीय क्रम व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है। प्रबन्धकीय क्रम व्यवस्था से आशय किसी संस्था के प्रबन्धक वर्ग में अधिकारी एवं अधीनस्थों का सम्बन्ध रखने वाले विभिन्न पदों से है। प्रबन्धकीय क्रम व्यवस्था अथवा प्रबन्ध के स्तर एक प्रकार का खाका है जो इस बात को स्पष्ट करता है कि किस अधिकारी की क्या स्थिति है कौन किसको आदेश देगा तथा कौन किससे आदेश प्राप्त करेगा। किसी संस्था में प्रबन्ध के कितने स्तर होंगे यह संस्था के आकार एवं कार्यों पर निर्भर करता है। जैसे जैसे संस्था का आकार एवं कार्यों का विस्तार होता जाता है, प्रबन्ध वर्ग के अन्तर्गत अधिकारी एवं अधीनस्थों की श्रृंखला का विस्तार भी हो जाता है। प्राय: प्रबन्ध के स्तर अथवा प्रबन्धकीय क्रम व्यवस्था को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।
  1. उच्च प्रबन्ध 
  2. मध्य प्रबन्ध, एवं 
  3. निम्न स्तरीय प्रबन्ध, 
प्रत्येक प्रबन्ध स्तर का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है -

उच्च प्रबंध - 

व्यावसायिक उपक्रम में यह प्रबन्ध सर्वोच्च स्तर होता है। इसके अन्तर्गत संचालक मण्डल, प्रबन्ध निदेशक/जनरल मैनेजर एवं सचिव आदि को सम्मिलित किया जाता है। इनके प्रमुख कार्य व्यावसायिक उपक्रम में सफल संचालन हेतु उद्देश्य एवं लक्ष्यों का निर्धारण है। महत्वपूर्ण निर्णय लेना, नीतियां बनाना और यह देखना कि नीतियां प्रभावोत्पादक तरीके से लागू की जा रही है या नहीं तथा उपक्रम के परिणामों का मूल्यांकन करना है। उच्च प्रबन्ध के कार्यों को निम्न दो भागों में विभाजित किया जा सकता है -

निर्णय सम्बन्धी कार्य - 

पुन: उच्च निर्णय सम्बन्धी कार्यों को पॉचं भागों में विभक्त किया जा सकता है। 
  1. निर्णय एवं उनकी पुष्टि, 
  2. योजना बनाना, लक्ष्यों को निर्धारित करना, तकनीकी प्रक्रिया निर्धारित करना, संगठन संरचना निश्चित करना, समन्वय करना एवं प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति, 
  3. सामान्य एवं विशिष्ट नीतियों को परिभाषित करना तथा उनकी व्याख्या, 
  4. नीतियों के क्रियान्वयन के लिए अधीनस्थों को अधिकार देना, एवं 
  5. वित्त व्यवस्था के लिये साधन निर्धारित करना एवं लाभों का वितरण करना। 

न्यायिक कार्य- 

उच्च प्रबन्ध के न्यायिक कायों को पुन: तीन भागों में बॉटां जा सकता है -
  1. उपलब्धियों तथा लक्ष्यों की तुलना करना, 
  2. उपलब्धियों की लागत से मूल्यांकन करना तथा वैकल्पिक सम्भावनाओं का मूल्यांकन करना, एवं 
  3. निर्णय तथा आदेश के सम्बन्ध में परामर्श। 

मध्य प्रबंध - 

प्रबन्ध के इस स्तर के अन्र्तगत कनिष्ठ प्रबन्धक, अधीक्षक, जनरल श्रम अधिकारी आदि अधिकारियों को सम्मिलित किया जाता है। मध्य प्रबन्ध के प्रमुख कार्य इस प्रकार हो सकते हैं -
  1. संगठन का संचालन
  2. आपस में समन्वय, 
  3. महत्वपूर्ण नीतियों के सम्बन्ध में विभागों के पारस्परिक सम्बन्धों को समझना, 
  4. संगठन के विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित करना, 
  5. अधीनस्थों को संतुष्ट करना एवं उनको कार्यकुशल बनाना और उनकी योग्यतानुसार पारिश्रमिक की व्यवस्था करना, 
  6. प्रशिक्षण की व्यवस्था करना एवं 
  7. उपक्रम भावना को विकसित करना आदि।

निरीक्षक वर्ग/निम्न स्तरीय प्रबन्ध - 

निम्ननिरीक्षक वर्ग/निम्नस्तरीय प्रबन्ध श्रमिकों में प्रबन्ध का एवं प्रबन्ध में श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरों शब्दों में निरीक्षक वर्ग एवं फोरमैन प्रबन्ध की अन्तिम कड़ी है जो प्रबन्धकीय कर्मचारियों और गैर प्रबन्धकीय कर्मचारियों में समन्वय रखता है। इसलिये संस्था के सफल संचालन में प्रबन्ध के इस स्तर का विशेष महत्व है। निरीक्षक वर्ग में वे सभी अधिकारी सम्मिलित किये जाते हैं जो कार्यालय, कारखाना, विपणन आदि क्षेत्रों में कार्य करने वाले कर्मचारियों के ऊपर पर्यवेक्षण का कार्य करते हैं। निरीक्षक वर्ग द्वारा किये जाने वाले प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं -
  1. प्रत्येक क्रियाशील कर्मचारी के लिये कार्य योजना का निर्माण, सारणी बनाना और उसे कार्य सौपना। 
  2. स्टोर से सामग्री एवं यंत्र एवं उपकरणों को प्राप्त करना एवं क्रियाशील कर्मचारियों को देना, 
  3. क्रियाशील कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना एवं कार्य सम्बन्धी आदेश देना, 
  4. कार्य करने का स्वस्थ वातावरण बनाये रखना एवं अनुशासन बनाये रखना, 
  5. आवश्यक मात्रा में उत्पादन करना, 
  6. कार्य करने की दशाओं में सुधार करना, मशीनों एवं उपकरणों की देखभाल, 
  7. क्रियाशील कर्मचारियों में मनोबल और सहयोगी भावना का विकास करना, 
  8. क्रियाशील कर्मचारियों को अधिक कार्य करने के लिए प्रेरणायें प्रदान करना, 
  9. अनुपस्थिति की प्रवृत्ति को नियंत्रित करना तथा, 
  10. उत्पादन विधियों में सुधार करना, एवं क्रियाशील कर्मचारियों की शिकायतें दूर करना। 

क्रियाशील कर्मचारी - 

इस श्रेणी के अन्तर्गत ऎसे कर्मचारियों को सम्मिलित किया जाता है जिनको प्रबंधकीय अधिकार प्राप्त नहीं होते लेकिन वे स्वयं अपने कार्य एवं उपकरणों का प्रबन्ध करते हैं। इस वर्ग का प्रत्येक कर्मचारी निरीक्षक द्वारा सौंपे गये सारे कार्य को करता है और अपने कार्य के लिए निरीक्षक के प्रति उत्तरदायी होता है। अनौपचारिक आधार पर कभी कभी ऐसे कर्मचारी अपने में से किसी एक को अपना मुखिया अथवा नेता मान लेते हैं और उसके आदेश एवं निर्देश के अनुसार कार्य करते हैं। लेकिन ऐसे मुखिया अथवा नेता को औपचारिक तरीके से प्रबन्ध के अधिकार नहीं दिये जाते हैं। प्रबन्धकीय क्रम व्यवस्था के उपर्युक्त वर्णित तीन स्तरों के बीच विभाजन की कोई रेखा नहीं खींचीजा सकती है। प्रबन्ध के स्तरों की संख्या व्यावसायिक उपक्रम के आकार एवं स्वभाव की आवश्यकतानुसार कम अथवा अधिक हो सकती है।

प्रबन्ध के सामाजिक उत्तरदायित्व 

आज औद्योगिक क्षेत्र के बढ़ते हुए स्वरूप के साथ साथ प्रबंध की विचारधारा का दृष्टिकोण भी अत्यधिक विस्तृत हो गया है। प्रारम्भिक अवस्था में प्रबंध केवल नियोक्ता के प्रति ही उत्तरदायी था परन्तु आज यह सम्पूर्ण समाज के प्रति उत्तरदायी है। आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था में प्रबंध का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं रह गया है अपितु प्रबंध समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उत्पादन कार्य को सम्पन्न करना भी है जिससे प्रबन्ध न्यूनतम लागत पर श्रेष्ठतम उत्पाद उपलब्ध करा सके। आज के युग में प्रबन्ध उपभोक्ताओं के उत्पादों की गुणवत्ता तथा विशेषताओं के संबंध में जानकारी प्रदान करता है। इस प्रकार प्रबंध अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। आइये सामाजिक दायित्व के क्षेत्रों को और गहराई से समझने का प्रयास करें -
  1. देश की प्राकृतिक सम्पदा का व्यवस्थित व श्रेष्ठ उपयोग करना जिससे राष्ट्र समृद्ध हो सके। 
  2. उपभोक्ताओं को पर्याप्त मात्रा में उच्च गुणवत्ता के सस्ते उत्पाद व सेवाऐं उचित समय व स्थान पर उपलब्ध कराना तथा मूल्यों में स्थायित्व बनाए रखना तथा उनमें अत्यधिक वृद्धि को रोकना। 
  3. पूॅंजीपतियों, अंशधारियों व ऋणदाताओं द्वारा लगायी गयी पूॅंजी की सुरक्षा एवं लाभांश की व्यवस्था करना। 
  4. बेरोजगारी की समस्या के निवारणार्थ रोजगार के क्षेत्र में नए अवसर प्रदान करना। प्रबन्ध में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना तथा सामाजिक कल्याण की व्यवस्था करना, जैसे विद्यालय व महाविद्यालय खोलना, शिशु सदन, धर्मशाला, मंदिर, मनोरंजनालय, चिकित्सालय, आदि की व्यवस्था करना। 
  5. सरकार द्वारा प्रतिपादित नीतियों, नियमों व कानून का पालन सुनिश्चित करना, राज्य द्वारा लगाए गये करों को ईमानदारी के साथ चुकाना। 
  6. धूल, धुऑं, गन्दा जल, विषैले रासायनिक पदार्थ आदि से होने वाले प्रदूषण को रोकना तथा वृक्षारोपण को बढ़ावा देना। 
  7. समाज की संस्कृति व प्रचलित परम्पराओं की रक्षा करना तथा लोकतंत्र, समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता को प्रोत्साहित करना। 
प्रबंध के सामाजिक उत्तरदायित्व को समझने के पश्चात आइये इसके धनात्मक पहलुओं का विश्लेषण करें, जिसके कारण व्यवसायिक संस्थाओं को इन्हें अपनी कार्य प्रणाली में सम्मिलित करना चाहिये।
  1. यद्यपि सामाजिक उत्तरदायित्व को पूर्ण करने में व्यवसाय को समय और धन का व्यय करना पड़ता है, किन्तु वास्तव में यह व्यय नहीं वरन निवेश है जिसमें व्यवसाय का दीर्घकालीन हित छुपा होता है क्योंकि इससे व्यवसाय में शामिल सभी उपभोक्ता, कर्मचारी, पूर्तिकर्ता आदि लाभान्वित होते हैं एवं संतुष्ट रहते हैं।
  2. अपने उद्देश्यों में सामाजिक दायित्व का समावेश, किसी भी व्यवसाय की समाज में छवि उज्जवल होती है।
  3. प्राय: जो संगठन सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह विधिपूर्वक सुव्यवस्थित ढंग से करते हैं, उनसे समाज ही नहीं वरन सरकार भी संतुष्ट रहती है तथा सरकार ऐसे व्यवसायों की सहायता करती है। 
  4. समाज भी ऐसी संस्थाओं को धनात्मक दृष्टि से देखता है तथा इनकी कमियों के आलोचनाओं के प्रति जनता का ध्यान नहीं जाता। 
  5. सामाजिक दायित्व की मांग काफी हद तक व्यवसाय की सफलता का मूल्य है। इससे जनसाधारण के जीवन स्तर की गुणवत्ता में भी सुधार होता है। 
  6. सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना आर्थिक उत्पादन तो बढ़ाती ही है, साथ ही देश के संसाधनों व संस्कृति की भी रक्षा होती है। संसाधनों के सदुउपयोग से राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि होती है। 
  7. इस भावना के फलस्वरूप ही अनेक आर्थिक एवं सामाजिक समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती है। जैसे - बेरोजगारी की समस्या, बीमारी, अज्ञानता, आवास की समस्याएं आदि। 
  8. किसी व्यवसाय द्वारा सामाजिक दायित्वों का निर्वहन व्यवसाय के नैतिक व्यवहार का एक आवश्यक अंग हैं। सामाजिक दायित्व व्यवसाय के नैतिक दायित्व का निर्माण करते हैं। व्यवसाय मात्र धर्नाजन का उपकरण ही नहीं हैं। 
  9. सामाजिक उत्तरदायित्व का उद्देश्य व्यवसाय के वाणिज्यिक और आर्थिक हितों में वृद्धि करता है और उसे प्रत्यक्ष रूप से शक्ति प्रदान करता है। सामाजिक शक्ति की सुरक्षा भी सामाजिक उत्तरदायित्व से ही हो सकती है। ऐसी संस्थाएं वैध सामाजिक मूल्यों और हितों के विरूद्ध कोई काम नहीं कर सकती।
इस प्रकार यहॉं सामाजिक उत्तरदायित्व के धनात्मक पक्ष ही नहीं बल्कि इसकी कुछ सीमायें भी हैं। जिसका विश्लेषण इस प्रकार से है -
  1. सामाजिक दायित्व के पालन के साथ-साथ प्रबन्धक को अपने आर्थिक लाभों को संरक्षित कर लेना चाहिए। आर्थिक दृष्टि से कमजोर संगठन अपने सामाजिक दायित्व को सुव्यवस्थित रूप से नहीं निभा सकते। आवश्यकता यह है कि सामाजिक दायित्व एवं आर्थिक सुदृढ़ता के मध्य समन्वय एवं संतुलन लेकर चला जाए। 
  2. प्रबन्धक को यह भी निश्चित करना चाहिए कि क्या वह सामाजिक दायित्व का निर्वहन कर सकता है या नहीं। ऐसा न करने पर सामाजिक दायित्व को निभाने के परिणाम निरर्थक व असंतुलित हो सकते हैं। 
  3. सामाजिक दायित्व के कुछ क्षेत्र गैरकानूनी हो सकते हैं, जैसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विरूद्ध शिक्षा देना आदि। व्यवसाय समाज का सेवक है। मालिक नहीं अत: सरकार की तरह प्रबंधकों का काम नहीं हो सकता। इस प्रकार जो भी कार्य किया जाए वह अधिकार की सीमा के बाहर नहीं होना चाहिए। 
उपर्युक्त विवेचनाओं से यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त सीमाओं के अन्तर्गत ही सामाजिक उत्तरदायित्व का कार्य होना चाहिए। आधुनिक युग में यह विचार उत्तरोत्तर प्रगति पर है कि प्रबंध को सामाजिक दायित्व में अपनी भूमिका को प्रभावपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से स्वीकार करना चाहिए। जिससे समाज निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसारित हो सके।

Comments