सर्वोच्च न्यायालय का गठन, कार्य व शक्तियाँ

अनुक्रम
‘‘कोई भी समाज बिना विधायी व्यवस्था के रह सकता है यह बात तो समझ में आ एकता है, परन्तु किसी ऐसे समय राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती, जिसमें न्यायापालिका या न्यायाधिकरण की कोई व्यवस्था न हो ।’’ भारत का सर्वोच्च न्यायालय देश का उच्चतम् न्यायालय है, यह भारतीय न्याय व्यवस्था की शीर्षक संख्या है। किसी भी सरकार की श्रेष्ठता उसकी न्याय व्यवस्था की श्रेष्ठता पर निर्भर करती है संघात्मक व्यवस्था में संघ और राज्य सरकारों को अपनी नर्धारित सीमाओं में रहकर ही कार्य करना पड़ता है इस प्रकार न्यायपालिका आज व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य व्यक्ति और राज्य के मध्य, राज्य और राज्य के मध्य, संघ एवं राज्य के मध्य उत्पन्न विवादों का निर्णय ही नहीं करती अपितु वह मौलिक अधिकारों के रक्षक और संविधान के संरक्षक के रूप में भी कार्य करती है। इसकी उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए लार्ड ब्राइस ने लिखा है’’ यदि न्याय का दीपक अधेरे में बझु जाये तो अँधेरा कितना होगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।’’

भारतीय संविधान द्वारा भारत में संधीय शासन की व्यवस्था की गयी है जिसके अन्तर्गत संघ एवं राज्यों के लिये न्याय पालिका का संगठन पृथक-पृथक न होकर सम्पूर्ण देश की एकीकृत एवं संगठित न्याय व्यवस्था है। उच्चतम् न्यायालय देश का सर्वोच्च एवं अंतिम न्यायालय है, जिसके अधीन राज्यों के उच्च न्यायालय एवं उच्चन्यायालयों के अधीन अन्य अधीनस्त न्यायालय है इस प्रकार भारत के समस्त न्यायालय एक कड़ी के रूप में बँधे हुए है। 

भारतीय न्याय प्रणाली

भारतीय न्याय प्रणाली

सर्वोच्च न्यायालय का गठन

न्यायाधीशो की संख्या

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशो की संख्या अधिनियम 1985 के द्वारा वर्तमान में न्यायाधीशों की संख्या कुल 26 है जिसमें 01 मुख्य न्यायाधीश एवं 25 अन्य न्यायाधीश होते है।

न्यायाधीशो की नियुक्ति

संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, नियुक्ति करने से पूर्व वह उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से परामर्श ले सकता है। जिनसे परामर्श लेना आवश्यक समउच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर करता है। संविधान के द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा किये जाने की व्यवस्था है परंतु व्यवहार में इन नियुक्तियों का निर्णय प्रधानमंत्री द्वारा लिया जाता है और राष्ट्रपति उसके परामर्श से कार्य करता है।

न्यायाधीशो की योग्यताएँ

संविधान के अनुच्छेद 124(3) के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के लिये निम्नांकित योग्यताएँ अपेक्षित है।
  1. भारत का नागरिक हो। 
  2. जिसकी आयु 65 वर्ष से कम हो 
  3. जो भारत के किसी उच्च न्यायालय अथवा दो या दो से अधिक न्यायालयो में कम से कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश के पद पर रह चुका हो। अथवा किसी उच्च न्यायालय में 10 वर्ष तक वकालत कर चुका हो अथवा राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता (कानून का ज्ञाता) हो। 

शपथ ग्रहण

प्रत्येक न्यायाधीश को अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति के समक्ष अपने पद की शपथ लेनी होती है।

कार्यकाल

संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते है।

महाभियोग की प्रक्रिया

कोई न्यायाधीश कार्यकाल पूरा होने से पहले भी त्यागपत्र दे सकता है। असाधारण स्थिति में किसी न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति की आयु पूरी होने से पहले भी अपदस्थ किया जा सकता है परन्तु इसके लिये निर्धारित प्रक्रिया को अपनाना होगा। अत: सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसकी अक्षमता व कदाचार के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है यदि संसद के दोनो सदन अलग अलग प्रस्ताव पारित कर दे जिसके लिये एक ही सत्र में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यो की कुल संख्या का 2/3 बहुमत होना आवश्यक है अभी तक सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने के लिये ऐसी प्रक्रिया का प्रयोग केवल एक बार किया गया है। परंतु फिर भी उसे हटाया नहीं जा सका क्योंकि संसद उस प्रस्ताव को पारित नही कर सकी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल सुरक्षित है और कार्यपालिका उन्हे अपनी इच्छा अनुसार नहीं हटा सकती।

वेतन एवं भत्ता

न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते संसद द्वारा निश्चित किये जाते है। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 33,000.00 (तैतीस हजार) मासिक वेतन एवं 1250.00 रूपये (बारह सौ पचास) मासिक भत्ता एवं अन्य न्यायाधीशो को 30,000. 00(तीस हजार) मासिक एवं 750 (सात सौ पचास) रूपये मासिक भत्ता प्राप्त होता है। इसके अलावा नि:शुल्क आवास आने जान के लिये वाहन एवं 150 लीटर पेट्रोल की सुविधा भी मिलती है।

न्यायालय का स्थान

भारत का उच्चतम न्यायालय दिल्ली में स्थित है।

न्यायाधीशों पर प्रतिबंध

सेवानिवृत्ति होने के पश्चात उच्चतम न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी न्यायालय में अथवा अन्य पदाधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता।

उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ व कार्य

सर्वोच्च न्यायालय का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण भारत होने के कारण इसकी शक्तियाँ बहुत विस्तृत एवं व्यापक है इसके निर्णय देश के समस्त न्यायालयो को मान्य होते है। इनकी शक्तिर्यो एवं कार्यो को निम्नांकित शीर्षक के अन्तर्गत विभाजित कर अध्ययन कर सकतें है।

प्रारंभिक क्षेत्राधिकार

अनुच्छेद 131 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को कुछ मुकदमो पर प्रारंभिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है प्रांरभिक क्षेत्राधिकार का अर्थ है कि ये मुकदमें सीधे उच्चतम न्यायालय में लाए जा सकते है और इन्हे पहले किसी छोटे न्यायालय में ले जाने की आवश्यकता नहीं है। प्रांरभिक क्षेत्राधिकार को दो भागो में विभाजित किया जा सकता है- 1. संघ तथा राज्यो से संबधित 2. मौलिक अधिकारो से संबधित

संघ तथा राज्यो से संबंधित विवाद

इसमें वे विवाद आते हैं जिनका निणर्य केवल उच्चतम न्यायालय ही कर सकता है जैसे-
  1. भारत सरकार (केन्द्र सरकार) तथा एक या अधिक राज्यो के बीच का विवाद। 
  2. एक पक्ष केन्द्र सरकार और एक या कुछ राज्यों का हो तथा दूसरा पक्ष एक या अनेक राज्यों का हो। 
  3. दो या दो से अधिक राज्यों के वैध अधिकार के प्रश्न का विवाद। 

मौलिक अधिकारो से संबंधित विवाद 

संविधान के अनुच्छेद 32 (1) के द्वारा नागरिको के मौलिक अधिकारो की रक्षा करने के लिये उच्चतम न्यायालय को समुचित कार्यवाही की शक्ति प्रदान की गयी है। मौलिक अधिकारो की रक्षा के लिये उच्चतम न्यायालय के द्वारा पाँच प्रकार के लेख जारी किये जा सकते है।
  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेखी- इसका शाब्दिक अर्थ है- हमें शरीर चाहिए (let us have the body)- यदि किसी व्यक्ति को पुलिस गिरफ्तार करती है तो उसे सामान्यत: 24 घटें के भीतर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। यदि पुि लस ऐसा नहीं करती अथवा कोई व्यक्ति किसी का अपहरण कर लेता है तो न्यायालय में बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की जा सकती है। न्यायालय संबंधित के विरूद्ध बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख जारी करते हुए कहती है कि उस व्यक्ति को सशरीर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाय। 
  2. परमादेश लेख - इसका अर्थ ‘‘हम आदेश देते है’’ (we command) इसके अन्तर्गत न्यायालय किसी व्यक्ति या संस्था को काम करने का आदेश देती है। 
  3. प्रतिषेध लेख - यह परमादेश लेख का विपरीत है परमादेश में काम करने का आदेश दिया जाता है जबकि प्रतिषेध लेख जारी कर काम करने के लिये मना किया जाता है। 
  4. उत्प्रेषण लेख - इसका अर्थ है ‘पूर्णतया सूचित कीजिए’ (Be fully informed)। यदि अधीनस्थ न्यायालय में कोई मामला विचाराधीन है और उच्च स्तर का न्यायालय यह समझता है कि प्रकरण महत्वपूर्ण है। अतएव उसे स्वयं उस प्रकरण पर सुनवाई करना चाहिए तो वह उच्च स्तर का न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय के लिये यह लेख जारी करते हुए उस प्रकरण के बारे में सम्पूर्ण दस्तावेज आदि अपने पास मगा लेता है और प्रकरण पर स्वयं सुनवाई करता है। 
  5. अधिकार पृच्छा लेख-  इसका अर्थ है कि ‘किस अधिकार से (By which authority)। इसके अनुसार न्यायालय किसी व्यक्ति को एक पद ग्रहण करने से रोकने के लिये एक निषेध आज्ञा जारी कर सकता है और उक्त पद के रिक्त होने की तब तक के लिये घोषणा कर सकता है जब तक कि न्यायालय द्वारा कोई निर्णय न हो जाय। आदेश का तात्पर्य है कि ‘‘ आप इस पद पर किस अधिकार से पदस्थ हैं।’’ इस प्रकार उच्चतम न्यायालय नागरिको के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है। 

अपीलीय क्षेत्राधिकार

उच्चतम न्यायालय देश का अंतिम अपीलीय न्यायालय है उच्चतम न्यायालय को उच्च न्यायालयो के विरूद्ध  चार प्रकार की अपीलें सुनने की शक्ति प्राप्त है। 

संवैधानिक अपीलें

संवैधानिक मामले न तो दीवानी झगडे होते है और न ही फौजदारी अपराध। यह ऐसा मुकदमा है जिसके कारण संविधान की भिन्न भिन्न प्रकार से व्याख्या करना होता है विशेषकर मौलिक अधिकारो से सबंधित व्याख्या अथवा अर्थ निकालना ऐसे मामलों की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में केवल तभी हो सकती है यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि मामला संवैधानिक मामलो से संबंधित है।

दीवानी अपीलें

संपत्ति विवाह धन समझौते या किसी सेवा संबंधी झगडो के मामले दीवानी मुकदमें कहलाती है। यदि किसी दीवानी मामलो में लाके महत्व का कोई ऐसा प्रमुख कानूनी बिन्दु है जिसकी व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वांछित है तो उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। 1972 के 30 वें संशोधन के अनुसार धनराशि (बीस हजार से अधिक की राशि का विवाद) का बंधन हटा दिया गया है अर्थात दीवानी अपील के लिये कोई निम्नतम राशि निर्धारित नहीं है।

फौजदारी अपीलें 

संविधान के अनुच्छेद 134 के अनुसार उच्च न्यायालयों के निणर्य के विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में उन फौजदारी विवादो की अपील की जा सकती है। जबकि-
  1. यदि कोई उच्च न्यायालय निचली अदालत द्वारा दोषमुक्त घोषित किए गए व्यक्ति को मृत्युदंड सुना दे तो ऐसे व्यक्ति को इस निर्णय के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार है।
  2. यदि कोई उच्च न्यायालय किसी निचली अदालत से किसी मुकदमे को अपने यहां मंगा ले और उस व्यक्ति को दोषी करार देते हुए मृत्युदंड सुना दे तो ऐसे मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। ऐसी स्थिति में भी अधिकार स्वरूप और उच्च न्यायालय से बिना किसी प्रमाणपत्र के अपील दायर की जा सकती है। 
  3. उपरोक्त दो स्थितियों के अतिरिक्त भी सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है यदि कोई उच्च न्यायालय यह प्रमाणपत्र दे कि मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने योग्य है। 

विशिष्ट अपीले

सर्वोच्च न्यायालय सैनिक न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध अपील नही सुन सकता। इस अपील को छोड़कर भारत स्थित किसी भी न्यायालय द्वारा किसी भी विवाद में दिये गये निर्णय के विरूद्ध अपील करने की विशेष अनुमति प्रदान कर सकता है।

परामर्शदायी क्षेत्राधिकार

 संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार इस अधिकार का अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने का अधिकार है यदि उससे परामर्श मांगा जाए। मंत्रणा संबंधी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत राष्टप्र ति किसी भी कानून सबंधी अथवा लोक महत्व के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांग सकता है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय परामर्श देने के लिये बाध्य नहीं है। दूसरी ओर यदि परामर्श या मत भेज दिया जाए तो उसे मानना या ना मानना राष्टप्रति के लिये भी बाध्यकारी नही है। आज तक जब भी सर्वोच्च न्यायालय ने कोई परामर्श दिया है राष्ट्रपति ने उसे सदैव स्वीकार किया है। आयोध्या में जिस स्थान पर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी उस स्थान पर पहले मंदिर था या नहीं जब इस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय मांगी गई तो उसने अपनी राय देने से इंकार कर दिया था। 

न्यायिक पुनरावलोकन संबंधी अधिकार

यदि संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून या कार्यपालिका द्वारा किया गया कोई कार्य अथवा कोई आदेश संविधान के विरूद्ध है तो सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करते हुए ऐसे कानून कार्य अथवा आदेश को अवैध घोषित कर देता है। इसी न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के कारण सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक कहा जाता है। 

संविधान की व्याख्या संबंधी अधिकार 

संविधान के अनुच्छेदो से संबंधित विवादास्पद प्रश्नों के निर्णय के लिये उच्चतम न्यायालय को उन अनुच्छेदो की व्याख्या करने की शक्ति प्राप्त है। 

अभिलेख न्यायालय

संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार उच्चतम न्यायालय पर अभिलेख न्यायालय है क्योंकि उसकी समस्त कार्यवाहिया एवं निर्णय लिखित रूप में हाते े है और प्रकाशित किये जाते है जिन्हें अभिलेख के रूप में रखा जाता है। इन अभिलेखो को आवश्यकतानुसार भविष्य में अधीनस्थ न्यायालयों के समक्ष उदाहरण या नजीर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। 

अन्य अधिकार

सर्वोच्च न्यायालय को उपर्युक्त अधिकारों के अलावा अन्य अधिकार भी प्राप्त है। 
  1. वह अपने अधीनस्थ न्यायालयों के कार्य की जांच कर सकता है। 
  2. उसे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्ते निर्धारित करने के अतिरिक्त उनके पदोन्नति एवं उनको पदच्युत करने की शक्ति भी प्राप्त है।
  3. न्यायालय की अवमानना करने वाले किसी भी व्यक्ति को दण्डित करने की शक्ति भी उच्चतम न्यायालय को प्राप्त है। 
  4. उसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लाके सभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री सहित भारतीय संघ के अन्य पदाधिकारियों के चुनाव में उत्पन्न विवादों में भी निर्णय देने का अधिकार प्राप्त है। 
अत: स्पष्ट है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार व शक्तियाँ अत्यधिक व्यापक है और वह अपनी इन्हीं शक्तियों के द्वारा व अपनी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायप्रणाली द्वारा न्याय प्रदान करके लोकतंत्र के प्रति नागरिकों में विश्वास की भावना उत्पन्न करता है, जो सफल लोकतंत्र का मुलधार है। 

उच्चतम न्यायालय का महत्व

उच्चतम न्यायालय की आवश्यक्ता एवं महत्व के विषय में भारत के भूतपूर्व महान्यायवादी श्री. एम. सी. सीतलवाड ने कहा है। ‘‘उच्च्तम न्यायालय संघ एवं राज्य सरकारो के पारस्परिक विवादो का निपटारा एवं संविधान का स्पष्टीकरण करेगा। नागरिको के मौलिक अधिकारो की रक्षा एवं जनता के राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों को व्यवहारिक रूप प्रदान करेगा।’’ सर्वोच्च न्यायालय के महत्व को मुख्य रूप से निम्नांकित शीर्षक के अन्तर्गत विभाजित किया जा सकता है।
  1. मौलिक अधिकारो के संरक्षक के रूप में- सर्वोच्च न्यायालय नागरिको को प्राप्त मौलिक अधिकारो का सरंक्षक भी है। यदि कार्यपलिका किसी व्यक्ति के अधिकारो का हनन कर ती है तो न्यायालय लेख जारी करके उस व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की रक्षा करता है। इसके अलावा संसद या विधान मण्डलों द्वारा बनाये गये ऐसे कानूनो को न्यायालय अवैध घोषित कर देता है जो नागरिको के मौलिक अधिकारो का हनन करते हैं।  
  2. संविधान के संरक्षक के रूप में- संविधान के सरं क्षक के रूप में उच्चतम न्यायालय केन्द्र (संसद) एवं राज्यों के विधान मण्डलों द्वारा बनाये गये कानूनों को अवैध घोषित करता है जो संविधान के विरूद्ध होते हैं। 
  3. चुनाव याचिकाओं की सुनवाई- न्यायपालिका में राज्यो एवं केन्द्रीय क्षेत्रों के प्रत्याशी चुनाव याचिकाएँ दायर करते है।। इस प्रकार स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय अपनी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र न्यायप्रणाली के द्वारा न्याय पद्रान करके लोकतंत्र के प्रति नागरिको में विश्वास की भावना उत्पन्न करता है। 

जनहित याचिका 

प्रारंभिक दौर में सर्वोच्च न्यायालय सहित न्यायपालिका केवल उन्हीं के मुकदमे सुनने के लिये स्वीकार करती थी जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होते थे। यह केवल मूल तथा अपील संबंधी अधिकार क्षेत्र के ही मुकदमे सुनती थी और उन पर फैसला सुनाती थी। परंतु बाद में न्यायपालिका जनहित याचिकाओ पर आधारित मुकदमे भी सुनने लगी। इसका अभिप्राय यह है कि वे लागे भी जिनका किसी मामले से कोई सीधा संबधं नहीं है न्यायालय में कोई जनहित का मामला ला सकते है। यह न्यायालय का विशेषाधिकार है कि वह उस जनहित याचिका को स्वपीकार करे या न करे। जनहित याचिका की अवधारण को न्याय मूर्ति पी एन भगवती ने शुरू किया था। जनहित याचिका अब इसलिए महत्वपूर्ण बन गई है क्योंकि इससे समाज के निर्धन तथा कमजोर वर्गो को सुगमता से न्याय मिलने लगा है। पत्रकारों वकीलों तथा समाज सेवको यहां तक की समाचार पत्रों की रिपोर्टो के आधार पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक जनहित याचिकाएं स्वीकार की है। आइए यह जानने के लिये कि जनहित ने किस प्रकार लोगो को न्याय दिलवाया है कछु उदाहरण देखें। 

जनहित याचिकाओं के द्वारा अवैध रूप से बंदी बनाए गए लोगों को जिन पर मुकदमे चल रहे है। उन्है। कई अधिकार दिलाए गए है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई कैदियो को बिना मुकदमा चलाए ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर रिहाई के आ देश दिए हैं क्योंकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता किसी न्यायिक व्यवस्था अथवा नौकरशाही की अक्षमता या अयोग्यता से कम नहीं कही जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने बंधुआ मजदूरों, जनजातियों, गंदी बस्तियो के निवासियों, नारी उद्धार गृहों में रहने वाली महिलाओं, बाल सुधार गृहों के बच्चो तथा बाल मजदूरों को मुक्त कराने के लिये कई कदम उठाए है। 

पर्यावरण के प्रदूषण के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कानपुर, दिल्ली तथा कुछ अन्य स्थानों पर कुछ फैक्टिरियों के बंद करने के आदेश दिए है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अधिकाधिक निर्णय लेने के कारण जनहित याचिकाओं का क्षेत्र काफी बढ़ गया है। अब कोई भी व्यक्ति केवल एक पत्र के माध्यम से न्यायालय तक पहुंच सकता है और यदि सर्वोच्च न्यायालय को यह विश्वास हो जाए कि मामला जनहित का है तो वह उसी पत्र को याचिका मान सुनवाई के निर्देश दे सकता है ताकि जनहित की रक्षा की जा सके। जनहित याचिकाओ की इस प्रक्रिया ने न्यायिक सक्रियतावाद को बढावा दिया है।

Comments

  1. Nyaydhiso ki niyukti 124(2)ke antargat diya h aapne 142(2)likha h

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  2. Nyaydhiso ki niyukti 124(2)ke antargat diya h aapne 142(2)likha h

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