राष्ट्र और राज्य

अनुक्रम
आधुनिक राष्ट्र और राज्य को राजनीतिक संगठन के रूप में बदलने में बहुत लम्बा समय लगा। प्राचीन समय में मानव समुदायों में रहता था। स्वभावत: मानव एक सामाजिक प्राणी है जो अकेला नहीं रह सकता। वह समाज का अभिन्न अंग होता हैं अत: अपने जीवन में मानव को कुछ नियमों का पालन करना होता है और इस समुदायिक जीवन से धीरे- धीरे राजनीतिक समुदायों और राज्यों की स्थापना होती है। अपने प्रारंभिक रूप में ‘राज्य’ की संरचना सरल थी। उस सरल संरचना को राज्य अब गूढ़ संरचना में विकसित हो चुका है। कालान्तर में इसके रूप में बदलाव आता रहा है एवं यह एक सर्वव्यापी संस्था बन गयी है। इसमें आप राष्ट्र राष्टी्रयता और राज्य की संकल्पना का अध्ययन करेंगे। इसके अतिरिक्ति आप राज्य के घटकों का भी अध्ययन करेंगे।

राष्ट्र और राष्ट्रीयता 

लैटिन शब्द ‘नेट्स’ ने राष्ट्रीयता की उत्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ है ‘जन्म लेना’। अत: इन पदों में राष्ट्रीयता का अर्थ है किसी एक जाति विशेष में जन्म या रक्त संबंध के आधार पर संबंधित होना। वस्तुत: राष्ट्रीयता की यह समझ भ्रामक है। आज विश्व में कोई भी एक ‘राष्ट्र’ नहीं है जिसके नागरिक एक ही वंश या कलु से सबंधित हों। सभी राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न कुलों से संबंधित नागरिक रहते हैं। वंशानुगत शुद्धता बहुत कठिन है, क्योंकि यह अप्रवासियों, अंतर्जातीय तथा अंतर्कुलीय विवाहों के कारण अशुद्ध होती आ रही है। अत: निश्चित रूप से राष्ट्रीया का विकास एक मनोवैज्ञानिक घटना है, न की राजनीतिक या नस्ल आधारित। जे.डब्लू. गार्नर के शब्दों में- ‘‘राष्ट्रीय एक सांस्कृतिक रूप से समांगी समूह है जो कि इसकी एकता के बारे में भी सतर्क है’’

राष्ट्र और राष्ट्रीयता में अंतर 

राष्ट्र और राष्ट्रीयता में बहुत ही सूक्ष्म भेद है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों ही शब्दों की एक शब्द विशेष से उत्पत्ति हुई है। कुछ लोग इन शब्दों को परस्पर बदले जा सकने वाले शब्द कहते है। परंतु निश्चित रूप से दोनों शब्दों में अंतर है -
  1. राष्ट्रीयता एक सांस्कृतिक शब्द है। यह एक मनोवैज्ञानिक भाव है। जो कि एक भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले लागों में एक ही कुल, इतिहास, धर्म, रीति-रिवाज, आदि के कारण उत्पन्न होता है। एक राष्ट्रीयता के लोगों में एकता की भावना होनी चाहिए उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि उनमें कुछ समानता है, जो उन्हें दूसरे लागों से अलग करती है। परंतु राष्ट्र लोगों का एक संगठन एवं ब्यवस्थित समूह है। किसी राष्ट्र में व्यक्तियों को जो एक चीज जोड़ती है, वह एक होने की भावना है। अत: राष्ट्र से एक संगठन का विचार आता है तथा राष्ट्रीयता से भावात्मक। 
  2. मूल रूप से राष्ट्रीयता एक सांस्कृतिक पद है जो केवल ‘राजनीतिक’ है जैसे कि हायक हमें बताते हैं। राष्ट्र मूल रूप से एक राजनीतिक पद है जो कि संयोगवश सांस्कृतिक है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि राष्ट्रीयता की राजनीतिक और राष्ट्र की सांस्कृतिक संकल्पना नहीं है। 
  3. राज्य के विकास से यह प्रदर्शित हो चुका है कि एक से अधिक राष्ट्रीयता वाले भी राज्य हो सकते हैं तथा एक ही राष्ट्रीयता कई राज्यों में भी पाई जा सकती है। पूर्व सोवियत संघ में जब वह एक राज्य था कई राष्ट्रीयताएं समाहित थी; दूसरे उदाहरणार्थ कोरियन राष्ट्रीयता जो दो से अधिक राज्यों में विद्यमान है। अत: राज्य राष्ट्रीयता एक ही साथ पाये भी जा सकते हैं और नहीं भी। 
  4. दूसरे अर्थ में, राष्ट्र और राष्ट्रीयता दो अलग-अलग शब्द है। कुछ लोग ‘राष्ट्रीयता’ शब्द को मानते हैं कि यह राष्ट्र के निर्माण का आधारभूत तथ्य अथवा गुण है, अर्थात् राष्ट्र से पहले राष्ट्रीयता का स्थान है। इसलिए मूल उत्पत्ति के अनुसार ये दोनों एक जैसे नहीं है। यहूदी राष्ट्रीयता ने यहूदी राष्ट्र का निर्माण किया। 
  5. यदि हम ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग एक ही कुल, भाषा और रीति-रिवाज, तथा एक ही क्षेत्र की जनसंख्या के सबसे अधिक लोगों के लिए करते हैं, तो वास्तव म ें हम देखते हैं कि ब्रिटिश लोग भी एक राष्ट्र हैं। दूसरी ओर, यदि हम ‘राष्ट्रीयता’ शब्द का प्रयोग किसी क्षेत्र के छोटे-छोटे विभिन्न मानव समदु ायों के लिए करते हैं जो कि उस क्षेत्र की जनसंख्या का छोटा सा भाग हैं, तो हम देखते हैं कि वेल्श एक राष्ट्रीयता है तथा यह ब्रिटिश राष्ट्र का एक अंग है। 

राष्ट्रीयता के तत्व या घटक 

राष्ट्रीयता को इसके घटक पदों में परिभाषित करना अत्यंत कठिन है। यह एक मनोवैज्ञानिक संकल्पना है, अथवा व्यक्तिगत विचार। अत: यह असंभव है कि कोई ऐसा समाज गुण अथवा निश्चित रूचि हो सकती है। जो राष्ट्रीयता में सभी जगहों पर समान हो। अत: हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते है कि यह विशेष घटक एक अलग राष्ट्रीयता समान है। इस प्रयास में हम यहां कुछ घटकों को सूचीबद्ध कर सकते है जो कि है-

भौगोलिक संलग्नता

हर व्यक्ति के मन में अपनी जमीन से किसी न किसी रूप में लगाव अवश्य होता है, जिसे उसके राष्ट्र, उसकी मातृभूमि अथवा उसकी पितृभूमि के रूप में जानते है। किन्तु इसराइल बनने से पूर्व यहूदी पूरी दुनिया में बिखरे हुए थे, किन्तु उनके मन में इसराइल के प्रति ही लगाव था।

भाषा समुदाय

सामान्यता किसी भी राष्ट्र के नागरिकों की एक आम भाषा होती है, क्योंकि इसी के माध्यम से वे अपने विचार तथा संस्कृति का परस्पर आदान-प्रदान करते हैं। राष्ट्र के विकास में भाषा एक सहायक तत्व अवश्यक हैं, किन्तु यह अनिवार्य तत्व नहीं हो सकती। जैसे स्विस लोग फ्रेंच जर्मन तथा इटैलियन आदि भाषाएं बोलते हैं, किन्तु उन सबकी राष्ट्रीयता एक है।

समान कुल

कुलीय समानता का विचार यह दर्शाता है कि किसी राष्ट्रीयता विशेष से संबंधित लोग एक समूह अथवा सामाजिक एकता से संबंधित होते है। कुछ लोग यह सुझाव देते हैं कि कुलीय शुद्धता से ही राष्ट्र बनता है। वैज्ञानिक तौर पर यह गलत है उपरोक्त अध्ययनानुसार, अप्रवास, अंतर्जातीय विवाहों आदि के कारण कुलीय शुद्धता लगभग असंभव है। आज यह मिथक बन गया है। परंतु यह विश्वास कि लोग एक वास्तविक या काल्पनिक कुल से संबंधित हैं, इससे राष्ट्रीयता के विचार में योगदान मिला है। कुलीय समरूपता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे समान भाषा, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक समरूपता को बल मिलता है।

सामान्य राजनीतिक आकांक्षाएँ

कुछ विचारक राष्ट्र निर्माण की इच्छा आकांक्षा को राष्ट्रीयता एक प्रमुख सिद्धांत मानते है। 1917 के पेरिस शांति सम्मेलन में इसी आधार पर Self determination nation के सिद्धांत को स्वीकार किया गया।

समान धर्म

धर्म भी राष्ट्रीयता का एक महत्वपूर्ण घटक है। समान धर्म से राष्ट्रीय भावना मजबूत होती है। इंग्लैण्ड ने प्रोटैस्टैन्ट (इसाई धर्म के प्रोटैस्टैन्ट चर्च के अनुयायी) की रक्षा के लिए स्पेन के जहाजी बेड़ों का मुकाबला किया। परन्तु यह एक आवश्यक घटक नहीं है। दरअसल आधुनिक समय में, राष्ट्रीयताएं बहुधर्मी बन गई हैं तथा इन परिस्थितियों में धर्म एक व्यक्तिगत मामला बन जाता है और आम जीवन में धर्म निरपेक्षता आ जाती है। धर्म हमेशा जोड़ने वाला घटक ही नहीं होता है। समान धर्म के होते हुए भी पाकिस्तान दो टुकड़ों में बंट गया एवं बग्लादेश का निर्माण हुआ। भारत विभाजन के कारण जब पाकिस्तान का निर्माण हुआ तब धर्म ने भारतीय उपमहाद्विप में विभाजन घटक के रूप में नकारात्मक कार्य ही किया।

समान राजनीतिक व्यवस्था

किसी राज्य में समान राजनीतिक ढांचे का होना भी चाहे वह वर्तमान में हो या भूत में राष्टी्र यता का एक घटक है। एक राज्य में लोग कानून के द्वारा एकसूत्र में बंधे होते हैं। एक ही राज्य में इस प्रकार रहने से एकता की भावना उत्पन्न होती है। विभिन्न संकट की घड़ियों में जैसे कि युद्ध के समय देशभक्ति की भावना का विकास होता है। वास्तव में सरकार विभिन्न तरीकों द्वारा इसे प्रोत्साहित करती है। गिलक्रिस्ट ठीक ही कहते हैं, ‘‘राष्ट्रीयता या तो इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि यह एक राष्ट्र है जिसमें इसका राज्य या क्षेत्र निहित है, या इसलिए क्योंकि यह अपने राज्य या क्षेत्र के साथ राष्ट्र बनने की इच्छा रखती है।’’

आर्थिक कारक

आर्थिक कार्यकलाप लोगों को एक दूसरे के समीप लाते हैं। यह तर्क दिया जाता है कि ऐतिहासिक रूप से विभिन्न जनजातियों और कुलों के मिश्रण के परिणामस्वरूप ही राष्ट्रीयता उभरती है। आदि समाज में राष्ट्रीयता के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। मार्क्सवादियों का भी यही विश्वास है कि राष्ट्रीयता आर्थिक कारक के कारण ही उभरती है। उनके अनुसार किसी दास युग या सामंती समाज के लिए राष्ट्रीयता का कोई महत्व नहीं था तथा राष्ट्रीयता केवल उत्पादन के पूंजीवादी तरीके के बाद ही अस्तिव में आयी। नि:संदेह आर्थिक घटक राष्ट्रीयता का एक महत्वपूर्ण कारक है। यह राष्ट्रीयता को सहेज कर रखने का भी एक महत्वपूर्ण कारक है। परंतु यह अकेले ही राष्ट्रीयता का निर्माण नहीं कर सकता।

एक समान अधिनस्तता 

अफ्रीकी-एशियाई देशों में राष्ट्रीय आंदोलनों को उभरने में समान अधिनस्ता एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। विभिन्न यूरोपीय साम्राज्यों ने उन पर आक्रमण किया। एक एकसमान अधिनस्तता का कारण उनमें राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न हुई क्योंकि इसने लोगों में एक होने की भावना जागृत की। भारत के समान औपनिवेशिक शोषण के कारण समान भारतीय राष्ट्रीयता का उद्य हुआ।
उपरोक्त सभी तत्व राष्ट्रीयता को उभारने में सहयक होते हैं, किन्तु इनमें से कोई भी तत्व आत्मिक रूप से राष्ट्रीयता को निर्मित नहीं करता। वस्तुत: राष्ट्रीयता एक व्यक्ति परक भावनात्मक संवेदना से जुड़ी चीज है, जिसे किसी भी एक वस्तुगत तथ्य के द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता। इन उपरोक्त तथ्यों में से किसी भी तथ्य की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति राष्ट्रीयता की भावना की उपस्थिति या अनुपस्थिति को अनिवार्य रूप से प्रभावित नहीं करता है।

राज्य

राजनीति के अध्ययन का केन्द्र बिन्दु राज्य है। परंतु इसे गलत तरीके से राष्ट्र, समाज और सरकार के पयार्यवाची की तरफ प्रयोग किया जाता है। ‘राज्य’ शब्द का प्रयोग राज्य प्रबंधन तथा राजकीय सहायता आदि के लिए भी किया जाता है। जैसे कि भारतीय संघ के राज्य या अमेरिका को बनाने वाले 50 राज्य। परंतु राजनीति विज्ञान में हम इस शब्द का प्रयोग अलग प्रकार से करते है। इसका एक विशेष अर्थ होता है। राज्य का शाब्दिक अर्थ- राज्य शब्द अंग्रेजी भाषा के स्टेट (State) शब्द का हिन्दी रूपान्तरण है, जिसकी उत्पत्ति लेटिन भाषा के स्टेटस शब्द से हुई है। स्टेटस का शाब्दिक अर्थ है सामाजिक स्तर। अत: स्टेट शब्द का तात्पर्य उस महान संस्था से है, जो गौरवशाली हो अर्थात् समय परिर्वतन के साथ स्टेट से बने स्टेट शब्द को राज्य के अर्थ में उपयोग किया जाने लगा।

राज्य की परिभाषा

राज्य की परिभाषा विभिन्न दृष्टिकोणों से की गई है। इस कारण राज्य की अनेक परिभाषाएं हैं, उनमें निम्नलिखित मुख्य हैं-
  1. अरस्तु के अनुसार - ‘‘राज्य परिवारों व ग्रामों का एक ऐसा समुदाय है, जिसका उद्देश्य पूर्ण और आत्म-निर्भर जीवन की प्राप्ति है। ‘‘ 
  2. जीन बोदाँ के अनुसार - ‘‘राज्य परिवारों का एक संघ है, जो किसी सर्वोच्च शक्ति और तर्क बुद्धि द्वारा शासित होता है।’’ 
  3. डॉ. गार्नर के अनुसार - ‘‘राजनीति विज्ञान और सार्वजनिक कानून की धारणा के रूप में राज्य, संख्या के कम या अधिक व्यक्तियों का एक ऐसा समुदय है जो कि किसी निश्चित भू-भाग पर स्थायी रूप से निवास करता हो तथा बाह्य नियंत्रण से पूर्णत: या लगभग स्वतंत्र हो और जिसकी एक ऐसी संगठित सरकार हो, जिसके आदेशों का पालन निवासियों का विशाल समुदाय स्वभावत: करता है।’’ 

राज्य के आवश्यक तत्व 

राज्य निर्माण के आवश्यक तत्वों के संबंध में राज्य के संबंध में विभिन्न विचारकों की परिभाषाओं के विश्लेषण के आधार पर राज्य के अग्रांकित चार प्रमुख तत्व है- 1. जनसंख्या  2. निश्चित भू-भाग 3. सरकार 4. संप्रभुता ।
  1. जनसंख्या- जनसंख्या राज्य का प्रथम आवश्यक तत्व है, क्योंकि राज्य एक मानव समुदाय है और मानव के बिना राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती।
  2. निश्चित भू-भाग- राज्य का दूसरा आवश्यक तत्व निश्चित भू-भाग है। मानव समुदाय जब तक किसी एक निश्चित भू-भाग पर स्थायी रूप से निवास नहीं करने लगता तब तक उसे राज्य नहीं कह सकते।
  3. सरकार- राज्य के लिए तीसरा आवश्यक तत्व सरकार है। राज्य मनुष्यों का एक राजनीतिक समुदाय है और सामुदायिक जीवन के लिए सरकार रूपी राजनीतिक संगठन का होना आवश्यक हैं, क्योंकि सरकार ही वह यंत्र है जो उन उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को व्यावहारिक रूप देता है, जिसके लिए राज्य का उदय हुआ है।
  4. संप्रभुता- संप्रभुता का अर्थ है ‘सर्वोच्च सत्ता’। संप्रभुता राज्य की आज्ञा देने वाली शक्ति है। चूंकि संप्रभुता राज्य में ही निवास करती है, अत: बाह्य एवं आंतरिक दोनों ही रूपों में सर्वोच्च एवं सर्वशक्ति मान है। संप्रभुता राज्य को आन्तरिक और बाह्य दोनों ही मामलों में सर्वोच्चता एवं स्वतंत्रता प्रदान करती है। संप्रभुता सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। किसी निश्चित भू-भाग में रहने वाले, सरकार संपन्न मानव समुदाय को भी तब तक राज्य नहीं कहा जा सकता, जब तक संप्रभुता उनके अधिकार में न हो, अर्थात् जब तक वह मानव समुदाय अपनी आंतरिक एवं बाह्य समस्याओं के समाधान और नीति निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र न हो। अत: संप्रभुता ही वह तत्व है, जो राज्य को अन्य मानव समुदायों से श्रेष्ठता प्रदान करता है।

राज्य के कार्य

राज्य के कार्यों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- अ. अनिवार्य कार्य ब. ऐच्छिक कार्य।

अनिवार्य कार्य

राज्य को अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए कुछ कार्य अनिवार्य रूप से करने पड़ते है यदि इन कार्यों को राज्य नहीं करे तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। राज्य के अनिवार्य कार्य हैं-
  1. बाह्य आक्रमण से रक्षा- राज्य को अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए बाह्य आक्रमण से अपनी सीमाओं की रक्षा करना राज्य का अनिवार्य कार्य है। इस कार्य को करने के लिए राज्य जल, थल और वायु सेना रखता है और इन सेनाओं के लिए युद्ध सामग्री की व्यवस्था भी करता है।
  2. आंतरिक शांति व सुव्यवस्था- राज्य में शान्ति व सुव्यवस्था की स्थापना करना राज्य का दूसरा अनिवार्य कार्य है। इन कार्यों को सम्पादित करने के लिए राज्य कानून बनाता है तथा उसका पालन करता है, इसके लिए राज्य पुलिस और जेल की व्यवस्था करता है और विषम परिस्थितियों में सेना की सहायता भी लेता है।
  3. न्याय-व्यवस्था- राज्य में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के लिए बनाये गये कानून का उल्लंधन करने वाले व्यक्तियों को दण्डित करना और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रखा करने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका की स्थापना करना भी राज्य का अनिवार्य कार्य है। 
  4. वैदेशिक संबंधों का संचालन- वैदेशिक संबंधों का संचालन करना राज्य का एक अनिवार्य कार्य है इसके लिए राज्य विश्व के अन्य राज्यों में अपनी राजदूतों की नियुक्ति करता है, साथ ही साथ अन्य राज्यों के राजदूतों के लिए अपने यहां व्यवस्था करता है। 
  5. मुद्रा एवं बैंकिंग व्यवस्था- आधुनिक युग में राज्य में मुद्रा एवं बंैि कंग की उत्तम व्यवस्था तथ करारोपण द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु धन संग्रह करना भी राज्य का एक अनिवार्य कार्य है। 6. संचार एवं यातायात व्यवस्था- राज्य के अनिवार्य कार्यों में संचार एवं यातायात व्यवस्था भी सुचारू रूप से करना एक है। 

राज्य के ऐच्छिक कार्य

इन कार्यों में वे कार्य आते हैं, जिनकों करना राज्य की इच्छा पर निर्भर होता है, क्योंकि इन कार्यों को करने या न करने से राज्य के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं होता। राज्य के ऐच्छिक कार्य हैं-
  1. शिक्षा की व्यवस्था- मानव की उन्नति और विकास में शिक्षा का प्रमुख और महत्वपूर्ण योगदान रहाता है। इसलिए राज्य अपने नागरिकों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा व्यवस्था करता है। 
  2. सार्वजनिक स्वास्थ्य- राज्य अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए महामारी और अन्य बीमारियों की रोकथाम के लिए सार्वजनिक चिकित्सालयों की भी व्यवस्था करता है। 
  3. कृषि की उन्नति- कृषि की उन्नति के लिए राज्य कृषकों को उत्तम बीज, खाद और सिंचाई के सांधनों को उपलब्ध कराता है। किसानों को नये-नये आविष्कारों और तकनीक से परिचित कराना, उपज का उचित मूल्य दिलवाना, प्राकृतिक प्रकोप होने पर आर्थिक सहायता प्रदान करना आदि कार्य राज्य द्वारा किये जाते हैं। 
  4. श्रमिकों के हितों की रक्षा करना- श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए राज्य श्रमिकों के कार्य करने के घण्टे निश्चित करके उन्हें उचित पारिश्रमिक दिलाने की व्यवस्था करता है। 
  5. अपंग एवं असहायों की सहयता- शारीरिक रूप से अपंग, असहाय और वृद्ध व्यक्तियों के लिए राज्य द्वारा आर्थिक सहायता की व्यवस्था की जाती है। 
  6. सामाजिक सुधार- सामाजिक कुरीतियों से समाज को मुक्त कराना भी राज्य का कार्य हैं। 
  7. लोककल्याण के कार्य- आधुनिक युग में राज्य के कार्यों में वृद्धि होती जा रही है। आज लोक कल्याण के कार्य राज्य द्वारा किये जाते हैं।

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