मांग का अर्थ, परिभाषा प्रकार, नियम एवं आवश्यक तत्व

मांग का अर्थ

मांग का अर्थ किसी वस्तु को प्राप्त करने से है। किंतु अर्थशास्त्र में वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा मात्र को मांग नहीं कहते बल्कि अर्थशास्त्र का संबंध एक निश्चित मूल्य व निश्चित समय से होता है। मांग के, साथ निश्चित मूल्य व निश्चित समय होता है। 

मांग के आवश्यक तत्व 

मांग कहलाने के लिए निम्न तत्वों का होना आवश्यक है-
  1. इच्छा - मांग कहलाने के लिये उपभोक्ता की इच्छा का होना आवश्यक है। अन्य इच्छा की उपस्थिति के बावजूद यदि उपभोक्ता उस वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा नहीं करता तो उसे मांग नहीं कहते।
  2. साधन- मांग कहलाने के लिए मनुष्य की इच्छा के साथ पर्याप्त धन (साधन) का होना आवश्यक है। एक भिखारी कार खरीदने की इच्छा रख सकता है, परंतु साधन के अभाव में इस इच्छा को मांग संज्ञा नहीं दी जा सकती। 
  3. खर्च करने की तत्परता - मांग कहलाने के लिये मनुष्य के मन में इच्छा व उस इच्छा की पूर्ति के लिये पयार्प्त साधन के साथ-साथ उस धन को उस इच्छा की पूर्ति के लिए व्यय करने की तत्परता भी होनी चाहिए। जैसे- यदि एक कंजूस व्यक्ति कार खरीदने की इच्छा रखता है और उसके पास उसकी पूर्ति के लिए धन की कमी नहीं है, परंतु वह धन खर्च करने के लिए तैयार नहीं है तो इसे मांग नहीं कहेंगे।
  4. निश्चित मूल्य - मांग का एक महत्वपूर्ण तत्व निश्चित कीमत का होना है अर्थात् किसी उपभोक्ता के द्वारा मांगी जाने वाली वस्तु का संबंध यदि कीमत से नहीं किया गया तो उस स्थिति में माँग का आशय पूर्ण नहीं होगा। उदाहरण के लिए, यदि यह कहा जाये कि 500 किलो गेहूँ की मांग है, तो यह अपूर्ण हो। उसे 500 किलो गेहूँ की मांग 3 रू. प्रति किलो की कीमत पर कहना उचित होगा।
  5. निश्चित समय - प्रभावपूर्ण इच्छा, जिसके लिए मनुष्य के पास धन हो और वह उसे उसकी पूर्ति के लिए व्यय करने इच्छुक भी है और किसी निश्चित मूल्य से संबंधित है, लेकिन यदि वह किसी निश्चित समय से संबंधित नहीं है तो मांग का अर्थ पूर्ण नहीं होगा। इस प्रकार, किसी वस्तु की मांग, वह मात्रा है जो किसी निश्चित कीमत पर, निश्चित समय के लिए मांगी जाती है। 

मांग के प्रकार

मांग दो प्रकार की होती है-
  1. व्यक्तिगत मांग
  2. बाजार मांग

व्यक्तिगत मांग

व्यक्तिगत मांग तालिका में एक व्यक्ति के द्वारा एक निश्चित समय-अवधि में वस्तु की विभिन्न कीमतों पर वस्तु की खरीदी जाने वाली मात्राओं को दिखाया जाता है। इस मांग तालिका को बायीं ओर वस्तु की कीमत तथा दायीं ओर वस्तु की मांगी जाने वाली मात्रा को दिखाया जाता है। तालिका से यह स्पष्ट है-

 व्यक्तिगत मांग सन्तरे का मूल्य
(प्रति इकाई रू. में)
सन्तरे की मांग
(इकाईयों में)
1
2
3
4
1000
700
400
200
100

उपर्युक्त तालिका से यह स्पष्ट है कि जैसे- जैसे सन्तरे की कीमत में वृद्धि होती है। वैसे-वैंसे सन्तरे की मागँ में कमी होती है। जब सन्तरे की कीमत प्रति इकाई 1 रू. थी तब सन्तरे की मांग 1000 इकाई की थी, किन्तु सन्तरे के मूल्य में वृद्धि 5 रू. प्रति इकाई हो जाने पर सन्तरे की मांग घटकर 100 इकाइयाँ हो गयी है। इस प्रकार मांग तालिका वस्तु के मूल्य एवं मांगी गयी मात्रा के बीच विपरीत संबंध को स्पष्ट कर रही है।

बाजार मांग

बाजार मांग तालिका एक निश्चित समय अवधि में वस्तु की विभिन्न कीमतों पर उनके सभी खरीददारों द्वारा वस्तु की मांगी गयी मात्राओं के कुल यागे को बताती है। उदाहरणार्थ, मान लीजिए बाजार में वस्तु के A,B एवं C तीन खरीददार है। अत: वस्तु की विभिन्न कीमतों पर इन लोगों के द्वरा अलग-अलग खरीदी जाने वाली वस्तु की मात्राओं का योग बाजार मांग तालिका होगी। तालिका से यह स्पष्ट है-
बाजार मांग

उपर्युक्त तालिका के प्रथम खाने जिसमें सन्तरे की कीमत प्रति इकाई रू. को दिखया गया है, तथा अन्तिम खाने में जिसमें बाजार में सन्तरे के विभिन्न खरीददारों द्वारा मांगी गयी कलु मात्रा को दिखाया गया है। ये दोनों खाने मिलकर बाजार मांग तालिका का निर्माण करते है।

इस प्रकार मांग तालिका से स्पष्ट है कि वस्तु के मूल्य में कमी हाने पर वस्तु की मांग बढ  जाती है तथा मूल्य में वृद्धि होने पर वस्तु की मांगी गयी मात्रा में कमी हो जाती है।

व्यक्तिगत तथा बाजार मांग में अंतर 

व्यक्तिगत तथा बाजार मांग तालिका में प्रमुख अंतर हैं-
  1. बाजार माँग तालिका व्यक्तिगत माँग तालिका की अपेक्षा अधिक समतल तथा सतत् होती है। इसका कारण यह है कि, व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो सकता है। जबकि व्यक्तियों के समुदाय का व्यवहार सामान्य हुआ करता है।
  2. व्यक्तिगत मांग तालिका का व्यावहारिक महत्व अधिक नहीं है, जबकि बाजार मांग तालिका का मूल्य नीति, करारोपण नीति तथा अथिर्क नीति के निधार्रण पर अत्यधिक प्रभाव पडत़ा है।
  3. व्यक्तिगत मांग तालिका बनाना सरल है। जबकि बाजार मांग तालिका बनाना एक कठिन कार्य है। इसके दो कारण हैं- 
    1. धन की असमानताओं का होना, तथा 
    2. व्यक्तियों के दृष्टि कोणों में अंतर पाया जाना। 

मांग वक्र

“जब मांग की तालिका को रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तब हमें मांग वक्र प्राप्त होता है इस प्रकार “मांग तालिका का रेखीय चित्रण ही मांग वक्र कहलाता है।”

मांग वक्र

उपर्युक्त रेखाचित्र में OX आधार पर सन्तरे की इकाइयाँ और OY लम्ब रेखा पर सन्तरे की प्रति इकाई कीमत को दिखाया गया है। DD मागँ वक्र है जो कि A,B,C,D एवं E बिन्दुओं को जोडत़े हुए खीचा गया है। DD मांग वक्र में स्थित प्रत्यके बिन्दु विभिन्न कीमतों पर वस्तु की खरीदी जाने वाली मात्रा को बताता है। उदाहरण के लिए, । बिन्दु पर सन्तरे की प्रति इकाई कीमत 5 रू. होने पर उपभोक्ता सन्तरे की 1 इकाइयाँ खरीदता है, जबकि E बिन्दु पर वह सन्तरे की कीमत प्रति इकाई 1 रू. होने पर 5 इकाइयाँ खरीदता है। इससे स्पष्ट है कि जब सन्तरे की कीमत घट जाती है तब उसकी मांग बढ़ जाती है। इसलिए मांग वक्र का ढाल ऋणात्मक है।

मांग को प्रभावित करने वाले तत्व 

  1. वस्तु की कीमत - किसी वस्तु की मांग को प्रभावित करने वाले सबसे प्रमुख तत्व उसकी कीमत है। वस्तु की कीमत में परिवर्तन के परिणामस्वरूप उसकी मांग भी परिवर्तित हो जाती है। प्राय: वस्तु की कीमत के घटने पर मांग बढ़ती है तथा कीमत के बढ़ने पर मांग घटती है।
  2. उपभोक्ता की आय - उपभोक्ता की आय किसी भी वस्तु की मांग का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण निधार्रक तत्व है। यदि वस्तु की कीमत में कोई परिवर्तन हो तो आय बढ़ने पर वस्तु की मांग बढ़ जाती है तथा आय कम होने पर वस्तु की मांग भी कम हो जाती है। गिफिन वस्तुओं (निकृष्ट वस्तुओ) के संबंध में उपभोक्ता का व्यवहार इसके विपरीत होता है।
  3. धन का वितरण- समाज में धन का वितरण भी वस्तुओं की मांग को प्रभावित करता है। यदि धन का वितरण असमान है, अर्थात ् धन कुछ व्यक्तियों के हाथों में ही केन्द्रित है तो विलासितापूर्ण वस्तुओं की मांग बढेग़ी। इसके विपरीत, धन का समान वितरण है, अर्थात् अमीरी-गरीबी के बीच की दूरी अधिक नहीं है, तो आवश्यक तथा आरामदायक वस्तुओं की मांग अधिक की जायेगी। 
  4. उपभोक्ताओं की रुचि - उपभोक्ताओं की रुचि, फैशन, आदत, रीति-रिवाज के कारण भी वस्तु की मांग प्रभावित हो जाती है। जिस वस्तु के प्रति उपभोक्ता की रूचि बढ़ती है, उस वस्तु की मांग भी बढ़ जाती है जैसे - यदि लोग कॉफी को चाय की अपेक्षा अधिक पसंद करने लगते है। तो काफी की मांग बढ  जायेगी तथा चाय की मांग कम हो जायेगी।
  5. सम्बन्धित वस्तुुओं की कीमत- किसी वस्तु की मांग पर उस वस्तु की संबंधित वस्तु की कीमत का भी प्रभाव पडत़ा है। संबधित वस्तुएँ दो प्रकार की हाती हैं- 
    1. प्रतिस्थापन वस्तुएँ वे हैं जो एक-दसूरे के बदले में प्रयागे की जाती है जैसे- चाय व कॉफी। यदि चाय की कीमत बढत़ी है और कॉफी की कीमत पूर्वत् रहती है। तो चाय की अपेक्षा कॉफी की मांग बढेग़ ी। 
    2. पूरक वस्तुएँ वे है। जिनका उपयागे एक साथ किया जाता है; जसै - डबलरोटी व मक्खन। अब यदि रोटी की कीमत बढ़ जाये तो उसकी मांग घटेगी, फलस्वरूप मक्खन की मांगीाी घटेगी।
  6. मौसम एवं जलवायु- वस्तु की मांग पर मासै म एवं जलवायु आदि का भी प्रभाव पड़ता है जैसे- पंखा, कूलर, फ्रीज, ठण्डा पेय आदि की मांग गर्मियों में बढ जाती है। इसी प्रकार ऊनी कपडे, हीटर आदि की मांग सर्दियों में बढ़ जाती है। इसी प्रकार छाते बरसाती कोट आदि की माँग बरसात के दिनों में बढ जाती है। 

मांग का नियम 

वस्तु का मूल्य कम होता है तो मांग बढत़ी है और मूल्य बढ़ने पर मांग कम होती है। संभव है कि शेष परिस्थितियों में ऐसा न हो युद्ध व असमान्य परिस्थितियों में ऐसा हो सकता है। अन्य बातें समान रहने पर किसी वस्तु या सेवा के मूल्य में वृद्धि होने पर उसकी मांग कम हाती है और मूल्य घटने पर उसकी मांग बढत़ी है। यह माँग का नियम कहलाता है। ‘‘मांग का नियम के अनुसार मूल्य व मांगा गई मात्रा में विपरीत संबंध होता है।’’

मार्शल के अनुसार मांग का नियम- ‘‘विक्रय के लिए वस्तु की मात्रा जितनी अधिक होगी, ग्राहकों आकर्षित करने के लिए मूल्य भी उतना ही कम होना चाहिये ताकि पर्याप्त ग्राहक उपलब्ध हो सकें। अन्य शब्दों में मूल्य के गिरने से मांग बढत़ी है और मूल्य वृद्धि के साथ घटती है।’’

मांग का नियम का चित्र
उपरोक्त चित्र में DD मांग वक्र है जो यह दशार्ता है कि मूल्य बढऩे पर मागं कम हो जाती है। और मूल्यकम होने पर मांग बढ जाती है। जैसा चित्र में दर्शाया गया है कि वस्तु का मूल्य 1रुपये होने पर मांग 5 है एवं मूल्य 5रुपये होने पर मांग घटकर कम हो जाती है। इसमें मूल्य एवं मांग के ABCDE बिन्दु प्राप्त होते है। तो मिलाकर मागं वक्र O दर्शाते है।

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