प्राणायाम किसे कहते हैं ? प्राणायाम की परिभाषा, भेद और महत्व

‘प्राण’ शब्द शरीरस्थ जीवनी शक्ति का बोधक है। श्वास-प्रश्वास में उपयोग होने वाली वायु उसका स्थूल स्वरूप हैं, प्राण के स्थान एवं कर्म (कार्य) के अनुसार दस भेद हैं- 1.प्राण 2. अपान 3.समान 4.व्यान तथा 5.उदान को मुख्य तथा नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंन्जय गौण प्राण कहा गया है। प्राणायाम दो शब्दों से मिलकर बना है- प्राण+आयाम अर्थात् प्राणों का आयाम, प्राणों का नियंत्रण ही प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में कहा है कि 

‘तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतविच्छेदः प्राणायाम’ (योग सूत्र 2/49) 

अर्थात श्वास तथा प्रश्वास की गति को अवरूद्व करना ही प्राणायाम है। कहा भी गया है कि प्राणायामों को करने से अज्ञान का आवरण नष्ट हो जाता है तथा धारणा में मन लगता है, जिससे समाधि एवं कैवल्य की प्राप्ति होती है।

प्राणायाम योग का एक प्रमुख अंग है। हठयोग एवं अष्टांग योग दोनों में इसे स्थान दिया गया है। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग में चौथे स्थान पर प्राणायाम रखा है। प्राणायाम नियंत्रित श्वसनिक क्रियाओं से संबंधित है। स्थूल रूप में यह जीवनधारक शक्ति अर्थात प्राण से संबंधित है। प्राण का अर्थ श्वांस, श्वसन, जीवन, ओजस्विता, ऊर्जा या शक्ति है। ‘आयाम’ का अर्थ फैलाव, विस्तार, प्रसार, लंबाई, चौड़ाई, विनियमन बढ़ाना, अवरोध या नियंत्रण है। इस प्रकार प्राणायाम का अर्थ श्वास का दीर्घीकरण और फिर उसका नियंत्रण है।

प्राणायाम का अर्थ

प्राणायाम शब्द संस्कृत व्याकरण के दो शब्दों ‘प्राण’ और ‘आयाम’ से मिलकर बना है। संस्कृत में प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्गपूर्वक ‘अन्’ धातु से हुई है। ‘अन’ धातु जीवनीशक्ति का वाचक है। इस प्रकार ‘प्राण’ शब्द का अर्थ चेतना शक्ति होता है। ‘आयाम’ शब्द का अर्थ है- नियमन करना। इस प्रकार बाह्य श्वांस के नियमन द्वारा प्राण को वश में करने की जो विधि है, उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो अश्टांग योग में वर्णित है। प्राणायाम का अर्थ प्राण का विस्तार करना। 

प्राणायाम की परिभाषा

प्राणायाम से संबंधित विभिन्न व्याख्याकारों ने जो व्याख्या की है वह इस प्रकार है-

महर्षि व्यास- आसन जय होने पर श्वास या बाह्य वायु का आचमन तथा प्रश्वास या वायु का नि:सारण, इन दोनों गतियों का जो विच्छेद है अर्थात उभय भाव है, वही प्राणायाम है।

योगी याज्ञवल्क्य के अनुसार- प्राण और अपान वायु के मिलाने को प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम कहने से रेचक, पूरक और कुंभक की क्रिया समझी जाती है।

जाबाल दर्शनोपनिषद के अनुसार- रेचक, पूरक एवं कुम्भक क्रियाओं के द्वारा जो प्राण संयमित किया जाता है, वही प्राणायाम है।

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद के अनुसार- सभी प्रकार के वृत्तियों के निरोध को प्राणायाम कहा गया है। स्वामी ओमानन्द तीर्थ के अनुसार - बाहर की वायु का नासिका द्वारा अंदर प्रवेश करना श्वास कहलाता है। कोष्ठ स्थित वायु का नासिका द्वारा बाहर निकलना प्रश्वास कहलाता है। श्वास प्रश्वास की गतियों का प्रवाह रेचक, पूरक और कुम्भक द्वारा बाह्याभ्यान्तर दोनों स्थानों पर रोकना प्राणायाम कहलाता है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार - प्राणायाम सांस खींचने, उसे अंदर रोके रखने और बाहर निकालने की एक विशेष क्रिया पद्धति है। इस विधान के अनुसार, प्राण को शरीर में संचित किया जाता है।
 
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार - प्राणायाम क्या है ? शरीर स्थित जीवनीशक्ति को वश में लाना। प्राण पर अधिकार प्राप्त करने के लिए हम पहले श्वास-प्रश्वास को संयत करना शुरू करते हैं क्योंकि यही प्राणजय का सबसे सख्त मार्ग है।
स्वामी शिवानन्द के अनुसार- प्राणायाम वह माध्यम है जिसके द्वारा योगी अपने छोटे से शरीर में समस्त ब्रह्माण्ड के जीवन को अनुभव करने का प्रयास करता है तथा सृष्टि की समस्त शक्तियाँ प्राप्त कर पूर्णता का प्रयत्न करता है।
अत: प्राणायाम अर्थात प्राण का आयाम जोड़ने की प्राण तत्व संवर्धन की एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें जीवात्मा का क्षुद्र प्राण ब्रह्म चेतना के महाप्राण से जुड़कर उसी के तुल्य बन जाए।

प्राणायाम के भेद

महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम के मुख्यत: तीन भेद बताए हैं- 

1. बाह्य वृत्ति (रेचक)- प्राणवायु को नासिका द्वारा बाहर निकालकर बाहर ही जितने समय तक सरलतापूर्वक रोका जा सके, उतने समय तक रोके रहना ‘बाह्य वृत्ति’ प्राणायाम है। 

2.आभ्यान्तरवृत्ति (पूरक)- प्राणवायु को अंदर खींचकर अर्थात श्वास लेकर जितने समय आसानी से रूक सके, रोके रहना आभ्यान्तर वृत्ति है, इसका अपर नाम ‘पूरक’ कहा गया है। 

3. स्तम्भ वृत्ति (कुम्भक)- श्वास प्रश्वास दोनों गतियों के अभाव से प्राण को जहाँ-तहाँ रोक देना कुम्भक प्राणायाम है। प्राणवायु सहजतापूर्वक बाहर निष्कासित हुआ हो अर्थात जहाँ भी हो वहीं उसकी गति को सहजता से रोक देना स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है। 
प्राणायाम के इन तीनों लक्षणों को योगी देश, काल एवं संख्या के द्वारा अवलोकन करता रहता है कि वह किस स्थिति तक पहुँच चुका है। देश, काल व संख्या के अनुसार, ये तीनों प्राणायामों में से प्रत्येक प्राणायाम तीन प्रकार का होता है-

1. देश परिदृष्ट- देश में देखता हुआ अर्थात देश से नापा हुआ है अर्थात प्राणवायु कहाँ तक जाती है। जैसे- (1) रेचक में नासिका तक प्राण निकालना, (2) पूरक में मूलाधार तक श्वास को ले जाना, (3) कुम्भक में नाभिचक्र आदि में एकदम रोक देना। 

2. काल परिदृष्ट- समय से देखा हुआ अर्थात समय की विशेष मात्राओं में श्वास का निकालना, अन्दर ले जाना और रोकना। जैसे- दो सेकण्ड में रेचक, एक सेकण्ड में पूरक और चार सेकण्ड में कुम्भक। इसे हठयोग के ग्रंथों में भी माना गया है। हठयोग के ग्रंथों म पूरक, कुम्भक और रेचक का अनुपात 1:4:2 बताया गया हैें। 

3. संख्या परिदृष्ट:- संख्या से उपलक्षित। जैसे- इतनी संख्या में पहला, इतनी संख्या में दूसरा और इतनी संख्या में तीसरा प्राणायाम। इस प्रकार अभ्यास किया हुआ प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म अर्थात लम्बा और हल्का होता है। 
इन तीन प्राणायामों के अतिरिक्त महर्षि पतंजलि ने एक चौथे प्रकार का प्राणायाम भी बताया है- 

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थ:।। पांतजल योग सूत्र 2/51

अर्थात अंदर बाहर के विषय को फेंकने वाला चौथा प्राणायाम है। बाह्य आभ्यान्तर प्राणायाम पूर्वक अर्थात इनका पूर्ण अभ्यास होने पर प्राणायाम की अवस्था विशेष पर विजय करने से क्रम से दोनों पूर्वोक्त प्राणायामों की गति का निरोध हो जाता है, तो यह प्राणायाम होता है।

यह चतुर्थ प्राणायाम पूर्व वर्णित तीनों प्राणायामों से सर्वथा भिन्न है। सूत्रकार ने यहॉं यही तथ्य प्रदर्शित करने के लिए सूत्र में ‘चतुर्थ पद’ का प्रयोग किया है। बाह्य एवं अन्त: के विषयों के चिंतन का परित्याग कर देने से अर्थात इस अवधि में प्राण बाहर निष्कासित हो रहे हों अथवा अंदर गमन कर रहे हों अथवा गतिशील हों या स्थिर हों, इस तरह की जानकारी को स्वत: परित्याग करके और मन को अपने इष्ट के ध्यान में विलीन कर देने से देश, काल एवं संख्या के ज्ञान के अभाव में, स्वयमेव प्राणों की गति जिस किसी क्षेत्र में रूक जाती है, वही यह चतुर्थ प्राणायाम है। यह सहज ही आसानी से होने वाला राजयोग का प्राणायाम है। इस प्राणायाम में मन की चंचलता शांत होने के कारण स्वयं ही प्राणों की गति रूक जाती है। यही इस प्राणायाम की विशेषता है।

इसके अतिरिक्त हठयोग के ग्रंथों में प्राणायाम के आठ प्रकार लिते हैं। हठयोग में प्राणायाम को ‘कुम्भक’ कहा गया है। ये आठ प्रकार के प्राणायाम या कुम्भक हैं-

(i) हठप्रदीपिका के अनुसार- सूर्यभेदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूच्र्छा तथा प्लाविनी ये आठ प्रकार के कुम्भक हैं।

(ii) घेरण्ड संहिता के अनुसार- केवली, सूर्यभेदी, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूच्र्छा तथा केवली ये आठ कुम्भक हैं।

प्राणायाम का महत्व

प्राण के नियंत्रण से मन भी नियंत्रित होता है क्योंकि प्राण शरीर व मन के बीच की कड़ी है। प्राणायाम से चित्त की शुद्धि होती है और चित्त शुद्ध होने से अनेक तर्कों, जिज्ञासुओं का समाधान स्वयमेव हो जाता है। इन्द्रियों का स्वामी मन है और मन पर अंकुश प्राण का रहता है। इसलिए जितेन्द्रिय बनने वाले को प्राण की साधना करनी चाहिए। इस प्रकार प्राणायाम वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम प्राणों का नियमन, नियंत्रण, विस्तार एवं शोधन करते हैं। चित्त शुद्ध होता है और चित्त शुद्ध होने पर ज्ञान प्रकट होता है जो योग साधना का प्रमुख उद्देश्य है। 

प्राणायाम के प्राण का विस्तार एवं नियमन होता है और प्राण मानवीय जीवन में विशेष महत्व रखता है। प्राण की महत्ता सर्वविदित है और प्राणायाम प्राण नियंत्रण की प्रक्रिया है। अत: प्राणायाम का योग में महत्वपूर्ण स्थान है।

हठयोग प्रदीपिका में वर्णित प्राणायाम 

सूर्यभेद, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी मूच्र्छा और प्लाविनी ये आठ प्रकार के कुम्भक हैं। 

1. नाड़ी शोधन

नाड़ी शोधन प्राणायाम को हठप्रदीपिका के आठ प्राणायामों के अंतर्गत नहीं रखा गया है किन्तु इस प्राणायाम को अन्य 8 प्राणायामों से पूर्व तथा नियमित करने को बताया गया है। इस प्राणायाम को करने से साधकों के नाड़ी समूह तीन मास से कुछ अधिक समय में स्वच्छ एवं निर्मल हो जाते हैं। प्राण का प्रवाह सुषुम्ना नाड़ी में होने लगता है। 

इस प्राणायाम को एक दिन में चार बार करना चाहिए (प्रातः, मध्याह्न, सांय तथा अर्धरात्रि) तथा कुम्भकों की संख्या धीरे-धीरे 80 तक करनी चाहिए। कहा भी गया है कि बिना नाड़ी शुद्धि के अन्य 8 प्राणायाम सिद्ध नहीं होते। इसलिए इस प्राणायाम का अभ्यास साधक को नियमित एवं नियम से करना चाहिए। 

विधि- नाड़ी शुद्धि की विधि को बताते हुए स्वात्माराम जी ने लिखा है कि- सर्वप्रथम पùासन में बैठे। तत्पश्चात् चन्द्रनाड़ी (बाएंँ नासारन्ध्र) से गहरी लम्बी श्वास लें यथासम्भव कुम्भक (श्वास को रोके) करें तथा सूर्य नाड़ी (दाएँ नासारन्ध्र) से श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़े। पुनः श्वास को सूर्यनाड़ी से भरें पुनः कुम्भक करें तथा चन्द्रनाड़ी से प्रश्वास करें। इसी प्रक्रिया को धीरे-धीरे दोहराते रहें। विद्वानों ने इसका अभ्यास तीन महीने तक करने का निर्देश दिया है। 

लाभ- नाड़ी शोधन जैसा की इसके नाम से ही विधित है- यह प्राणायाम शरीर में स्थित 72000 नाडि़यों का शोधन करता है। इड़ा तथा पिंगला की बीच संतुलन स्थापित करता है जिससे प्राण का प्रवाह सुषुम्ना में होता है। शरीर को निर्मल करता है। शरीर कान्तिवान तथा कृष होता है। इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है, नाद का अनुभव होता है तथा शरीर कभी भी रोग ग्रस्त नहीं होता। 

सावधानी-जिन व्यक्तियों को उच्चरक्तचाप, हृदय संबधी विकार हो वो इस प्राणायाम में कुम्भक का अभ्यास न करें। साइटिका, स्लिप डिस्क आदि से पीडि़त व्यक्ति नीचे जमीन पर न बैठें, वे लोग इसका अभ्यास कुर्सी पर या गद्दे में बैठकर करें। 

सामान्य व्यक्ति यथासम्भव ही कुम्भक करें परेशानी होने पर कुम्भक को छोड़कर धीरे-धीरे रेचक कर दें। श्वास-प्रश्वास को धीरे-धीरे करें, वेग से न करें। नाड़ी शुद्धि के बाद ही स्वामी स्वात्माराम जी ने आठ प्राणायामों को करने का निर्देश दिया है। 

वे आठ प्राणायाम इस प्रकार हैं- सूर्यभेद, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी मूच्र्छा और प्लाविनी ये आठ प्रकार के कुम्भक हैं। 

2.सूर्यभेदन

सूर्यभेदन हठप्रदीपिका में पहला प्राणायाम है। इस प्राणायाम में बार-बार सूर्यनाड़ी का भेदन किया जाता है इसलिए इसे सूर्यभेदन या सूर्यभेदी कहा जाता है। 

विधि- सर्वप्रथम किसी उप्र्युक्त स्थान (समतल) पर आसन बिछा लें, फिर किसी भी ध्यानात्मक आसन जैसे सिद्धासन, पद्मासन आदि लगा ले। कमर तथा गर्दन को सीधा रखते हुए दाएं हाथ से प्राणायाम की प्रणव मुद्रा बना लें तथा बाएं हाथ से ज्ञान या चिन मुद्रा बनाकर उसको दूसरे पैर के घुटने के ऊपर रख लें। तत्पश्चात् दाएं नासारन्ध्र से धीरे-धीरे लम्बा श्वास ले यथासम्भव कुम्भक (जालन्धर बन्ध) लगाएं तथा गर्दन को सीधा कर कुम्भक को खोले और बाएं नासारन्ध्र से धीरे-धीरे प्रश्वास करें। इसी क्रिया को बार-बार दोहराएँ। 

लाभ- इस प्राणायाम के नियमित अभ्यास से मस्तक की शुद्धि होती है, सभी प्रकार के वातरोग दूर होते है। पेट में होने वाले कृमि दोष नष्ट हो जाते हैं। सर्दियों में इसे करने से सर्दी नहीं लगती क्योंकि यह शरीर को उष्णता देता है। सावधानी- इस प्राणायाम को ग्रीष्म ऋतु में नहीं करना चाहिए। जिन लोगों को पित्त सम्बन्धी दोष हो एवं नकसीर फटने की समस्या हो उनके लिए यह अभ्यास वर्जित है।

3. उज्जायी विधि

सर्वप्रथम किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठे। कमर, गर्दन को सीधा रखें। दोनों नासारन्ध्रों से कण्ठ को संकुचित करते हुए श्वास ले जिससे धीमे-धीमे आवाज(छोटे बच्चे के खरांटे, लहरों की ध्वनि) उत्पन्न हो तत्पश्चात् यथासम्भव कुम्भक करें फिर प्राणायाम की प्रणव मुद्रा बनाएं तथा बाएं नासारन्ध्र से धीरे-धीरे प्रश्वास करें। इस क्रिया को बार-बार दोहराएं, यहीं उज्जायी प्राणायाम हैं। 

लाभ- उज्जायी प्राणायाम के लाभों का वर्णन करते हुए हठप्रदीपिका में लिखा है कि इसका नियमित अभ्यास से सभी प्रकार के कफ सम्बंधी कण्ठदोष नहीं होते। शरीर में स्थित जठराग्नि प्रदीप्त होती है। इससे नाड़ी सम्बन्धी, जलोदर, धातु सम्बन्धी सभी दोष दूर हो जाते हैं। कहा गया है कि इस प्राणायाम को उठते-बैठते हमेशा करना चाहिए। 

सावधानी- हृदय से सम्बन्धित किसी रोग या उच्च रक्तचाप वाले रोगियों को इस प्राणायाम में कुम्भक नहीं करना चाहिए। गले को (श्वास नली) अत्यधिक संकुचित न करें।

प्राणायाम के अंग

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प्राणायाम के प्रकार

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Bandey

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