प्रत्याहार का अर्थ, परिभाषा, परिणाम एवं महत्व

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अनुक्रम

प्रत्याहार का अर्थ

प्रत्याहार दो शब्दों ‘प्रति’ और ‘आहार’ से मिलकर बना है। ‘प्रति’ का अर्थ है विपरीत अर्थात इन्द्रियों के जो अपने विषय हैं उनको उनके विषय या आहार के विपरीत कर देना प्रत्याहार है। इंद्रियॉं विषयी हैं, ये विषय को ग्रहण करती हैं। ये विषय हैं- पंच तन्मात्राएँ। चेतना ज्ञान प्राप्त करना चाहती हैं और चित्त उसका माध्यम बनता है। विषय अधिक होने पर चित्त उसमें भटक जाता है और यह ज्ञान इन्द्रियों से प्राप्त होता है।
जब इंद्रियाँ विषयों को छोड़कर विपरीत दिशा में मुड़ती हैं तो प्रत्याहार होता है। अर्थात इंद्रियों की बहिर्मुखता का अंतर्मुख होना ही प्रत्याहार है। योग के उच्च अंगों के लिए अर्थात धारणा, ध्यान तथा समाधि के लिए प्रत्याहार का होना आवश्यक है।

प्रत्याहार की परिभाषा

  1. महर्षि पतंजलि प्रत्याहार के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए कहते हैं – स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहार:।। पातंजल योग सूत्र 2/54 अर्थात अपने विषयों के संबंध से रहित होने पर इंद्रियों का जो चित्त के स्वरूप में तदाकार सा हो जाता है, वह प्रत्याहार है।
  2. प्रत्याहार से संबंधित विभिन्न व्याख्याकारों ने जो व्याख्या की है वह इस प्रकार है- महर्षि व्यास के अनूसार – इंद्रियाँ अपने विषय से असम्बद्ध हैं, जैसे मधुमक्खियाँ रानी मधुमक्खी का अनुकरण करती हैं। राजा मन के निरोध होने से इन्द्रियों का भी निरोध हो जाता है। योग की इस स्थिति को ही प्रत्याहार कहा जाता है। 
  3. आचार्य श्रीराम शर्मा के अनूसार – इंद्रियों की बाह्य वृत्ति को सब ओर से हटाकर एकत्रित करके मन में लय करने के अभ्यास को प्रत्याहार कहा गया है। इंद्रियों का विषयों से अलग होना ही प्रत्याहार है। जिस समय साधक अपनी साधनाकाल में इंद्रियों के विषयों का परित्याग कर देता है और चित्त को अपने इष्ट में एकाकार कर (लगा) देता है, तब उस समय जो चिंतन इन्द्रियों के विषयों की तरफ न जाकर चित्त में समाहित हो जाती है, वही प्रत्याहार सिद्धि की पहचान है। जिस तरह से मनुष्य की छाया चलने पर चलने लगती है, रूकने पर रूक जाती है, वैसे ही इंद्रियाँ चित्त के अधीन रहकर कार्य करती हैं। यही प्रत्याहार के अभिमुख होना है। 
  4. शारदातिलक के अनूसार – इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु निरगलम्। बलदाहरणं तेभ्य प्रत्याहारोSभिधीयते।। 25/23 अर्थात ये इन्द्रियाँ विषयों में बेरोक-टोक दौड़ते रहने से चंचल रहती हैं। अत: उन विषयों से इंद्रियों को निरूद्ध कर मन को स्थिर करने का नाम प्रत्याहार है। रूद्रयामल में भगवद्पाद में चित्त लगाने को प्रत्याहार कहा गया है। 
  5. घेरण्ड संहिता के अनूसार – यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्यैव वशं नयेत्।। 4/2 अर्थात जहाँ-जहाँ यह चंचल मन विचरण करे इसे वहीं-वहीं से लौटाने का प्रयत्न करते हुए आत्मा के वश में करे (यही प्रत्याहार है)। 
  6. विष्णु पुराण के अनूसार – शब्दादिष्वनुषक्तानि निगृह्याक्षणि योगवित्। कुर्याच्चित्तानुकारिणी प्रत्याहार परायणा:।। अर्थात योगविदों को चाहिए कि वह शब्दादि विषयों में आसक्ति का निग्रह करे और अपने-अपने विषयों में आसक्ति का निग्रह करे और अपने-अपने विषयों से निरूद्ध इंद्रियों को चित्त का अनुसरण करने वाला बनावे। यही अभ्यास प्रत्याहार का रूप धारण कर लेता है। 
  7. कठोपनिषद् (1/3/13) के अनूसार – बुद्धिमान मनुष्य को उचित है कि वाक् आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर मन को इष्ट में लगावे। 
  8. मैत्रेयुपनिषद् (1/9) के अनूसार – चित्त ही संसार है। इसलिए प्रयत्नपूर्वक उसे ही शुद्ध करो, क्योंकि जैसा चित्त है वैसी ही गति, यह सनातन सिद्धांत है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि इंद्रियों का अपने विषयों को छोड़कर चित्त के अनुकूल अनुरूप होकर कार्य करना प्रत्याहार है। उपर्युक्त परिभाषाओं में महर्षि पतंजलि द्वारा बतायी गयी परिभाषा के अनुसार प्रत्याहार स्वत: होने वाली प्रक्रिया है। इसमें प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है जबकि अन्य परिभाषाओं में प्रयासपूर्वक अर्थात क्रियात्मक प्रत्याहार पर जोर दिया गया है।

प्रत्याहार का परिणाम एवं महत्व

महर्षि पतंजलि के अनूसार – 

तत: परमावश्यतेइन्द्रियाणाम्।। पातंजल योग सूत्र 2/55 उस प्रत्याहार से इंद्रियों की परम वश्यता होती है अर्थात प्रत्याहार से इंद्रियाँ अपने वश में हो जाती हैं। प्रत्याहार के परिणाम से संबंधित विभिन्न व्याख्याकारों ने जो व्याख्या की है वह इस प्रकार है-

व्यास भाष्य के अनूसार –

इंद्रियों की परमवश्यता क्या है, इसे व्यास भाष्य में इस प्रकार कहा गया है-कोई कहते हैं शब्दादि विषयों में आसक्त न होना अर्थात अपने अधीन रखना इन्द्रियवश्यता या इन्द्रिजय है।दूसरे कहते हैं कि वेदशास्त्र से अविरूद्ध विषयों का सेवन, उनके विरूद्ध विषयों का त्याग इन्द्रियजय है।कुछ लोग कहते हैं कि विषयों में न फँसकर अपनी इच्छा से विषयों के साथ इन्द्रियों का सम्प्रयोग।कुछ लोग कहते हैं कि राग-द्वेष के अभावपूर्वक सुख-दु:ख से शून्य विषयों का ज्ञान होना इन्द्रियजय है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनूसार –

तब वह मनुष्य जितेन्द्रिय होकर जहाँ अपने मन को ठहराना या चलाना चाहे, उसी में ठहरा एवं चला सकता है। फिर उसको ज्ञान हो जाने से सदा सत्य से प्रीति हो जाती है और असत्य में कभी नहीं।

आचार्य श्रीराम शर्मा के अनूसार –

योगी साधक जब प्रत्याहार की सिद्धि प्राप्त कर लेता है तो समस्त इंद्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं। वह जितेन्द्रिय हो जाता है। इंद्रियों की स्वतंत्रता का सदैव के लिए अभाव हो जाता है। इन सब विषयों में इन्द्रियजय के लक्ष्य में विषयों का संबंध बना ही रहता है जिससे गिरने की आशंका दूर नहीं हो सकती। इसलिए यह इंद्रियों की परमवश्यता नहीं है। चित्त की एकाग्रता के कारण इंद्रियों की विषयों में प्रवृत्ति न होना इन्द्रियजय है। उस एकाग्रता से चित्त के निरूद्ध होने पर इंद्रियों का सर्वथा निरोध हो जाता है और अन्य किसी इंद्रियजय के उपाय में प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं रहती। इसलिए यही इंद्रियों की परमवश्यता है। प्रत्याहार का फल है इन्द्रियजय अर्थात मन सहित समस्त इंद्रियों पर विजय। इन्द्रियजय योग की एक महत्वपूर्ण घटना या प्रक्रिया है जो आगे धारणा, ध्यान, समाधि के लिए आधारभूमि का काम करती है।

2 Comments

umrendra singh

Feb 2, 2020, 11:39 am Reply

बहुत उपयोगी जानकारी है

Yogdeep

Dec 12, 2019, 9:59 am Reply

अछि जानकारी

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