रूसी क्रांति के कारण, घटनाएं तथा परिणाम

By Bandey 1 comment
अनुक्रम

1905 ई. की रूसी क्रांति

1905 की रूसी क्रांति के कारण

रूस की 1905 की क्रांति के कारण उसकी राजनीतिक, सामाजिक परिस्थितियों में निहित थे।
जापानी युद्ध ने केवल उत्प्रेरक का कार्य किया। युद्ध में पराजय के कारण रूस की जनता का असंतोष
इतना बढ़ गया था कि उसने राज्य के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। इस क्रांति के कारण ही सरकार को
जापान से युद्ध बंद कर शांति संधि करनी पड़ी। इस क्रांति के कारण निम्नलिखित थे –

  1. अलेक्जेण्डर तृतीय और निकोलस द्वितीय के शासन-काल में सुधार की ओर कोई ध्यान नहीं
    दिया गया था। इसके विपरीत, प्रशासन में प्रतिक्रियावादी तत्वों का पूर्ण प्रभाव बना रहा। सुधार
    आंदोलनों को अत्यंत कठोरता से कुचल दिया जाता था। जार की शक्ति पूर्ण रूप से निरंकुश और
    स्वेच्छाचारी थी। 
  2. जार के मंत्री पोवीडोनोस्नेव, टाल्सटाय, प्लेहवे घोर प्रतिक्रियावदी थे। सुधार की माँग को दबाने
    के लिए उन्होंने जघन्य अत्याचार किये। इससे आतंकवाद बढ़ता गया। पुलिस के अधिकार असीमित थे
    और निरपराध व्यक्तियों को संदेह मात्र में मृत्यु दण्ड दिया जाता था या साइबेरिया से निर्वासित कर
    दिया जाता था। 
  3. क्रांति का कारण कृषकों की भूमि समस्या थी। अभिजात वर्ग के अधिकार में विशाल कृषि भूमि
    थी। किसान चाहते थे कि इस भूमि को उनमें बाँट दिया जाये। क्रांतिकारियों के प्रचार से उनमें भी
    जागृति आ रही थी। क्रांति के द्वारा वे भूमि प्राप्त करना चाहते थे। 
  4. श्रमिकों का असंतोष भी क्रांति का कारण था। रूस में औद्योगीकरण के कारण बड़ी संख्या में
    मजदरू नगरों में एकत्रित हो गये थे। उनका जीवन असुरक्षित और दयनीय था। औद्योगिक समस्याओं
    की और से सरकार उदासीन था। श्रमिकों में समाजवादी विचार तेजी से फैल रहे थे। उन्हें संगठन
    बनाने या हड़ताल करने का अधिकार नहीं था। सरकार के दमन से उनमें असंतोष बढ़ता जा रहा था। 
  5. 1896 के बाद सुधार आंदोलन तेज हो गया था। अभिजात वर्ग और उच्च वर्ग के लोग भी
    सुधारों की माँग कर रहे थे। समाजवादी समाज में आमूल परिवर्तन की माँग कर रहे थे। 1893 से
    माक्र्सवादी विचारधारा का प्रचार हो रहा था। 
  6. रूसीकरण की नीति के कारण दलित जातियाँ जैसे फिन, पोल आदि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष
    कर रही थी। इनके असंतोष से क्रांति को बल प्राप्त हुआ। 
  7. आतंकवादी पुलिस और भष्ट अधिकारियों की हत्या कर रहे थे। शासन के जुल्म और अत्याचार
    का यही एकमात्र जबाव रह गया था। कृषकों और श्रमिकों को क्रांति के लिए संगठित किया जा रहा था
    क्योंकि शांतिपूर्ण उपायों द्वारा सुधार असंभव हो गया था। 
  8. रूस-जापान युद्ध में रूस की पराजय से सरकार की अयोग्यता और भ्रष्टाचार स्पष्ट हो गया।
    सभी वर्गों में सरकार की आलाचे ना हो रही थी। निरंकुश और अयोग्य सरकार के परिवर्तन की माँग बढ़
    गयी। जनता के कष्ट बढ़ते जा रहे थे। उन्हें केवल पुलिस का अत्याचार मिलता था।

तात्कालिक पृष्ठभूमि

रूस में जापान के विरूद्ध युद्ध को जनता का समर्थन प्राप्त नहीं था। रूस की जनता यह नहीं
जानती थी कि युद्ध किस उद्देश्य से लड़ा जा रहा है। युद्ध का प्रबंधन कुशलता से नहीं किया गया था।
भ्रष्टाचार इस सीमा तक बढ़ गया था कि जनता ने जो उपहार सैनिकों के लिए दिये थे, वे नगरों में
खुले आम बेचे जा रहे थे। पराजय से जनता में निराशा बढ़ती जा रही थी। 27 दिसम्बर को सम्राट् की
दूसरी घोषण प्रकाशित हुई। इसमें सुधार कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध लगा दिये गयें जैसे सभाओं की
स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती थी। इससे रूस की जनता को मालमू हो गया कि सरकार अपनी शक्ति
निरंकुश रखना चाहती थी और सुधार करने के लिए उसकी इच्छा नहीं थी।

खूनी रविवार

जार की घोषणाओं से सुधारवादी संतुष्ट नहीं थे। अब इस आदोंलन में श्रमिक वर्ग भी सम्मिलित
हो गया। जनवरी 1905 में राजधानी सेण्ट पीटर्सबर्ग में हड़ताले हुई। श्रमिक संगठन पर एक उदारवादी
पादरी, फादर गेपन का प्रभाव। यह संगठन श्रमिकों की आर्थिक समस्याओं पर विचार करने के लिए
बनाया गया था लेकिन श्रमिक वर्ग में राजनीतिक जागृति बढ़ रही थी। अत: फादर गेपन को अपना
प्रभाव बनाये रखने के लिए आदोंलन को राजनीतिक रूप भी देना पड़ा। उसके नेतृत्व में राजधानी के
श्रमिकों ने कई माँगां े केा लेकर हडत्रताल कर दी। वार्ता असफल होने के बाद गपे न ने जार के समक्ष
याचिका प्रस्तुत करने का निश्चय किया। 22 जनवरी, 1905 को रविवार के दिन उसके नेतृत्व में हजारों
श्रमिकों का जुलूस शांति और अनशाति था लेकिन महल के सामने मैदान में सैनिकों ने उस पर गोलियाँ
चलायी ं जिससे सैकड़ों प्रदर्शनकारी मारे गय।े इस घटना से क्रांति आरं भ हो गयी।

जार द्वारा सुधारों की घोषणा

सुधारवादी आंदोलन अब स्पष्ट रूप से क्रांतिकारी आंदोलन बन चुका था। यातायात और संचार
साधन हड़तालों के कारण अवरूद्ध हो गये। थे। जनता के बढ़ते हुए असंतोष के कारण जार ने 3 मार्च
को फिर सुधारों की घोषणा की। जार ने कहा कि वह साम्राज्य के योग्यतम व्यक्तियों को कानून बनाने
के कार्य में सम्बद्ध करना चाहता था। अपै्रल व जून में अनेक सुधारों की घोषणा भी की गयी और
जनता से कहा गया कि वे सुधारों के विषय पर अपने स्मरण पत्र प्रस्तुत करे।

क्रांति का प्रसार

सुधारों की इन चर्चाओं के साथ हड़तालों का दौर भी चल रहा था। सारे देश के श्रमिकों ने
हड़ताल कर दी थी। स्थान-स्थान पर पुलिस और श्रमिकों की मुठभेडं ़े भी हो रही थी। 14 जून को
काला सागर के एक जहाज ‘प्रोटीओमकिन’ के नाविकों ने विद्रोह कर दिया। इस बीच सुदूरपूर्व के दो
युद्धों में रूस की निर्णायक पराजय हो चुकी थी। मार्च 1905 में जापान ने मुदकन में रूसी सेना को
पराजित कर दिया था। जल युद्ध में जापानियों ने रूस के जहाजी बेड़े की सुसीमा के युद्ध में नष्ट कर
दिया था।

अगस्त घोषणा

सुसीमा की पराजय के बाद सुधारवादियों ने पुन: सुधार की माँग प्रस्तुत की। इस बार जेम्सतेवों
सुधारवादियों के दोनों वर्ग नरम-सुधारवादी और उदार-सुधारवादी एक हो गय।े उनका संयुक्त
अधिवेशन हुआ जिसमें नगरों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इस सम्मेलन ने जार के पास एक
प्रतिनिधिमण्डल भेजा। प्रतिनिधिमण्डल ने जार से भंटे करके ‘सम्राट और जनता’ के सहयागे के लिए
प्रार्थना की लेकिन इसका सरकार की प्रतिक्रियावादी नीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 28 जून को नगर
परिषदों का एक वृहद सम्मेलन हुआ जिसमें माँग की गयी कि जेम्सतेवों सम्मेलन की योजना को
स्वीकार किया जाये। 19 जुलाई को जेम्सतेवों तथा नगर परिषदों का संयुक्त सम्मेलन हुआ जिसमें
संविधान की रूपरेखा स्वीकृत की गयी। सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन अपनी ओर से
6 अगस्त को घोषणा प्रकाशित की जिसमें ड्यूमा की स्थापना के बारे में कहा गया था। इसे अत्यतं
सीमित मताधिकार पर चुना जाना था और इसकी स्थिति परामर्श देने की थी। यह सरकार का अधूरा
प्रयास था। अनुदारवादियों को छोड़कर किसी दल ने इस योजना को स्वीकार नहीं किया।

क्रांति की असफलता

1905 की क्रांति असफल हो चुकी थी लेकिन सुधारवादियों को अभी ड्यूमा से आशा थी। शीघ्र
ही यह स्पष्ट हो गया कि सरकार अपनी रूचि की ड्यूमा चाहती थी। प्रथम ड्यूमा को दो माह बाद भंग
कर दिया गया। इसके सदस्यों ने देश से सरकार के प्रति असहयोग की अपील की लेकिन देश
आंदोलनों से थक चुका था, अत: इसका प्रभाव नहीं पड़ा। सरकार ने छुटपुट विद्रोह को निर्दयता से
कुचल दिया। दूसरी ड्यूमा में भी सरकार विरोधी सदस्यों का बहुमत था। इसे भी भंग कर दिया गया।
इसके बाद सरकार ने मताधिकार सीमित करके चुनाव कराये। इससे तीसरी ड्यूमा में सरकार के
समर्थकों को बहुमत प्राप्त हो गया। यद्यपि ड्यूमा बनी रही लेकिन वह सरकार से सहयागे करती रही
और सरकार की इच्छा के अनुसार चालती रही।

असफलता के कारण

क्रांति की असफलता के कारण थे –

  1. रूस का सैनिकतंत्र दुर्बल नहीं हुआ था। यद्यपि सुदूरपूर्व में हार हो गयी थी, पर सेना पूर्ण रूप
    से पराजित नहीं हुई थी। जब तक वह सुदूरपूर्व में फँसी रही, जार को क्रांतिकारियों की माँगों को
    स्वीकार करना पड़ा। उसके वापस आते ही जार ने रियासतें वापस ले ली  और क्रांति को कुचल
    डाला। 
  2. विभिé राजनीतिक दलों के उद्दश्े यों में एकता नहीं थी। अक्टूबरवादी परामर्शदात्री ड्यूमा से
    संतुष्ट थे। केडेट पार्टी संसदीय प्रणाली चाहती थी। समाजवादी समाज में आमूल परिवर्तन चाहते थे।
    उद्देश्य एक न हाने े से आदं ोलन में एकता का अभाव हो गया। 
  3. विभिé वर्ग अपने-अपने हितों के लिए कार्य कर रहे थे। श्रमिक वर्ग औद्योगिक समस्याओं को
    हल करने की प्राथमिकता दे रहा था। कृषक वर्ग समझता था कि ड्यूमा को इसलिए नियंत्रित किया जा
    रहा है कि वह भस्ू वामियों की भूमि जब्त करके उनमें बाँट दे। बुद्धिजीवी नागरिक संविधान और नागरिक
    अधिकारों में रूचि रखते थे। श्रमिकों और कृषकों को इनमें रूचि नहीं थी। 
  4. विट की रियासत देने की नीति ने भी आंदोलन को दुर्बल कर दिया। अक्टूबर की घोषणा से केडेट
    पार्टी में फूट पड़ गयी थी। कृषकों को अनेक रियासतें दी गयी। सामान्य नागरिक, जनता और श्रमिक वर्ग
    व्यापक मताधिकार से संतुष्ट हो गया था। इससे समाजवादी और आतंकवादी पृथक् रह गये। 
  5. क्रांति के दौरान श्रमिकों और कृषकों की हिंसा से मध्यम वर्ग क्रांति से विमुख होने लगा था।
    मास्को के श्रमिकों में बोल्शेविकों का प्रभाव था जिनका सैनिकों से संघर्ष हुआ। ग्रामां े में कृषकों की लूट
    और हिंसा का भी विरोधी प्रभाव पड़ा। 
  6. क्रांति को चलते एक वर्ष से अधिक हो गया था। इससे जनता में उदासीनता आने लगी थी।
    रूस जैसे विशाल देश में विभिé क्षेत्रों के मध्य समन्वय रखना भी कठिन था। अत: जनता अब ड्यमू ा
    की ओर आकर्षित हो गयी थी। 
  7. सरकार को विदेशी ऋण मिल जाने से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गयी। अब वह ड्यूमा को भंग
    कर सकती थी और क्रांति को कुचल सकती थी। पोर्ट्समाउथ की संधि में रूस को कोई अपना क्षेत्र
    जापान को नहीं देना पड़ा था। अत: सरकार को मनोबल ऊँचा था। उसकी अंतर्राष्ट्रीय स्थिति भी दृढ़
    थी। फ्रांस उसका मित्र था और इंग्लैण्ड से मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित हो रहे थे। 

अर्द्ध संवैधानिकता का युग (1906-1917) 

1905 की क्रांति असफल होने के बाद रूस में स्वच्े छाचारी शासन पूर्ण रूप से स्थापित हो गया
था। शासन की नीति प्रतिक्रियावादी और दमनात्मक थी लेकिन ड्यूमा का अस्तित्व बने रहने से शासन
का स्वरूप अर्द्ध संवैधानिक था। 1912 ई. में चौथी ड्यमा चुनी गयी। वह भी शासन से सहयागे करती
रही। उसके समय में प्रथम विश्वयुद्ध में रूस शामिल हुआ और 1917 में क्रांति हुई। युद्ध की
असफलताओं के कारण अविश्वास का वातावरण बन गया। इससे ड्यूमा और सरकार के मध्य मतभेद
उत्पé हो गये। इस संघर्ष में दोनों ही दुर्बल हो गये जिससे अंत में सत्ता बोल्शेविकों के हाथों में चली
गयी।

1917 ई. की रूसी क्राँति

क्रांति का महत्व – रूस की क्रांति का महत्व न केवल यूरोप के इतिहास में वरन् विश्व के
इतिहास में है। जिस प्रकार 18वीं शताब्दी के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना फ्रांस की राज्य क्रांति
है उसी प्रकार बीसवीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण घटना रूस की 1917 ई. की बोल्शेविक क्रांति थी।
रूस में सामाजिक समानता का नितांत अभाव था। इस समय रूस का समस्त समाज तीन
विभिन्न श्रेणियों में विभक्त था, जिनमें आपस में किसी भी प्रकार की सद्भावना विद्यमान नहीं थी। वे
एक दूसरे को अपने से पूर्णतया भिन्न और पृथक समझती थीें।

  1. प्रथम श्रेणी में कुलीन वर्ग आता है। इसको राज्य की ओर से बहुत अधिकार प्राप्त थे। 
  2. द्वितीय श्रेणी के अंतर्गत उच्च मध्यम वर्ग आता है, जिसमें व्यापारी छोटे जमींदार, पूंजीपति
    सम्मिलित थे।
  3. तृतीय श्रेणी के अंतर्गत कृषक, अर्द्धदास कृषक तथा श्रमिक सम्मिलित थे। इसके साथ राज्य
    तथा अन्य वर्गों का व्यवहार बहुत ही अमानुषिक था। 

जार की निरंकुशता तथा स्वेच्छाचारिता-
जार निकोलस पूर्ण निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी शासक था। यह जनता को किसी प्रकार का
अधिकार प्रदान करने का पक्षपाती नहीं था।

1917 की रूसी क्रांति के कारण

व्यावसायिक क्रांति और उसके परिणाम

अन्य देशों के समान रूस में भी व्यावसायिक क्रांति हुई, यद्यपि यहां पर क्रांति अन्य देशों की
अपेक्षा काफी समय के उपरांत हुई किन्तु इसके होने पर रूस में बहुत से कारखानों की स्थापना हो गई
थी। इस प्रकार रूस का औद्योगीकरण होना आरंभ हुआ। इसमें काम करने के कारण लाखों की संख्या
में मजदूर देहातों और गांवों का परित्याग कर उन नगरों तथा शहरों में निवास करने लग,े जिनमें कल
कारखानों की स्थापना हुई थी। नगरों और शहरों में निवास करने के कारण अब वे पहले के समान
सीधे-सादे नहीं रह गये थे। नगरों में रहने से उनमें न केवल चलता-पुरजापन ही आ गया था, अपितु
ये राजनीतिक मामलों में भी रूचि लेने लगे थे। इनको अपने राजनीतिक तथा सामाजिक अधिकारों का
भी ध्यान हुआ। इन्होनें अपने क्लबों का निर्माण किया, जहां ये सब प्रकार के मामलों पर विचार करते थे
और आपस में वाद-विवाद करते थे इनको यहां रहकर नवीन विचारधाराओं तथा प्रवृत्तियों का भी ज्ञान
हुआ। इन्होंने श्रमिक सगं ठनों की स्थापना भी करनी आरंभ कर दी।

1905 ई. की क्रांति

रूस मे 1905 ई. में एक क्रांति हुई थी, जिसके द्वारा रूस में वैधानिक राजतंत्र की स्थापना
करने का पय्र ास किया गया था किन्तु पारस्परिक झगड़ों के कारण यह क्रांति सफल नहीं हो सकी और
शासन पर पुन: जार का आधिपत्य स्थापित हो गया। इस क्रांति का स्पष्ट परिणाम यह हुआ कि उसने
रूस की साधारण जनता को राजनीतिक अधिकारों का परिचय करा दिया था। उनको ज्ञात हो गया कि
वाटे का क्या अर्थ है? ड्यूमा या दूसरे शब्दों में पार्लियामंटे के सदस्यों का निर्वाचन किस प्रकार जाना
चाहिये? सरकार को लोकमत के अनुसार अपनी नीति का निर्धारण कर जनहित के कार्यों को करने के
लिये अग्रसर होना चाहिये। अपने राजनीतिक अधिकारों से परिचित हो जाने के कारण रूस की जनता
समझ गई कि रूस में भी पूर्णतया लाके तंत्र शासन की स्थापना होनी चाहिये जहां साधारण जनता के
हाथ में शासन सत्ता हो।

पश्चिमी यूरोप का प्रभाव

पश्चिमी यूरोप के लाके तंत्र राज्यों का प्रभाव भी रूस पर पड़ा, यद्यपि रूस के सम्राटों ने
पाश्चात्य प्रगतिशील विचारों का रूस में प्रचार राके ने के लिये विशेष रूप से प्रयत्न किया, किन्तु विचारों
का रोकना बहतु ही कठिन कार्य है, क्यांेि क विचार हवा के समान होते हैं। महायुद्ध के समय में जर्मनी
और उसके साथियों के विरूद्ध जो प्रचार-कार्य मित्र राष्ट्रों की ओर से किया जा रहा था, उसमें मुख्यत:
यही कहा जाता था कि वे लोकतंत्र शासन, जनता की स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता के आधार पर नवीन
राष्ट्रों का निर्माण करने के अभिप्राय से युद्ध कर रहे हैं। रूस मित्र-राष्ट्रों के अंतर्गत था। अत: वहां की
जनता पर भी इस प्रचार का बहुत असर पड़ा।

मध्यम वर्ग के विचारों में परिवर्तन

रूसी में मध्य श्रेणी के व्यक्तियों में शिक्षा का प्रचार हो गया था। जिस प्रकार फ्रांस की क्रांति
का श्रेय फ्रांस के दार्शनिक, शिक्षित वर्ग आदि को प्राप्त है उसी प्रकार रूस में भी क्रांति का वेग इसी
श्रेणी के लोगों ने तीव्र किया। वे लागे नई-नई पुस्तकों का अध्ययन करते थ।े पश्चिमी यूरोप के विचारों
की लिखी हुई पुस्तकें रूसी भाषा में अनुवादित हुई थी। अनेक एशियन लेखकों ने भी अपने ग्रन्थों द्वारा
नये तथा प्रगतिशील विचारों का प्रतिपादन किया। शिक्षित वर्ग पर उन नये विचारों का बहुत अधिक
प्रभाव पड़ा, विशेषत: नवयुवक विद्याथ्र्ाी नये विचारों का अध्ययन कर यह भली-भांति समझने लगे थे कि
उनका देश उन्नति की दौड़ में बहुत पिछड़ा हुआ है, जिसका प्रमुख कारण जार की निरंकुशता है।
उनके हृदय में यह भावना जागतृ हुई कि उनका कर्तव्य है कि वे अपने देश को उन्नत करने के लिये
घारे प्रयत्न करे।

महायुद्ध का प्रभाव

महायुद्ध में रूस मित्र राष्ट्रों की ओर से सम्मिलित हुआ। उनकी विशाल सेना ने युद्ध के आरंभ
में बड़ी क्षमता तथा योग्यता का प्रदर्शन किया, परन्तु दो वर्ष तक निरंतर युद्ध करते हुये उसमें
शिथिलता के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगे। रूस की सेना बहादुर अवश्य थी, किन्तु उसमें
देश-भक्ति और राष्ट्रीयता की वे भावनायें विद्यमान नहीं थी, जो अपूर्व त्याग और मर मिटने के लिये
प्रेरणा प्रदान करती है। रूस की सेनायें संख्या की पूर्ति के लिये भरती की गई थी।ं उनमें वीर सैनिकों
की परम्परा अवश्य थी, पर उनके सम्मुख कोई आदर्श विशेष नहीं था। यही दशा रूस की नौकरशाही
की थी। रूस के कर्मचारी यह नहीं समझते थे कि वे देश की उन्नति और राष्ट्र सेवा के लिये नियुक्त
किये गये हैं। उनका आदर्श था सम्राट को प्रसन्न कर उच्च पदों पर आसीन होना। जब विश्वयुद्ध लम्बा
होता गया और दो वर्ष की लड़ाई के उपरांत भी विजय के कोई चिन्ह प्रकट नहीं हुए तो रूस की सेना
और नाकै रशाही घबरा उठी। रिश्वत खारे ी, भष््र टाचार आदि रूस में पहले से ही अपनी चरम सीमा को
प्राप्त कर चुका था। गरीब लागे ों के लिए गुजर कर सकना असंभव हो गया था।

1917 की रूसी क्रांति की घटनायें तथा परिणाम


सेना द्वारा जनता पर गोली चलाने से इंकार-
अंत में 7 मार्च 1917 ई. को जनता की दशा बहुत ही शोचनीय हो गई थी। उसके पास न
पहनने को कपड़ा था और न खाने को अनाज था। वह भख्ू ा और कपड़ े से व्याकुल हो चुकी थी।
परेशान होकर भूखे और ठण्ड से ठिठुरते हुए गरीब और मजबूरों ने 7 मार्च दिन पेट्रोग्रेड की सड़कों पर
घूमना आरंभ किया। रोटी की दुकानों पर ताजी और गरम रोटियों के ढेर लगे पड़े थे। भूखी जनता का
मन ताजी और गरम चाय व रोटियों को देखकर ललचा गया और वह अपने आपको नियंत्रण में नहीं
रख सकी। उन्होंने बाजार में लूट-मार करनी आरंभ कर दी। सरकार ने सेना को उन पर गोली चलाने
का आदेश दिया कि वह गाले ी चलाकर लूटमार करने वालों को तितर-बितर कर दे, किन्तु सैनिकों ने
जिनको उनसे सहानुभूि त थी गाले ी चलाने से साफ मना कर दिया। उनमें भी क्रांति की भावना प्रवेश
कर चुकी थी। जब मजदूरों ने यह देखा कि सैनिक उन पर गोली चलाने को तैयार नहीं हैं, तो उनका
साहस बहुत बढ़ गया। अत: अब क्रान्ति अवश्यम्भावी हो गई थी।



जार का शासन त्यागना-
दूसरी ओर ड्यूमा ने विसर्जित होने से मना कर दिया। उसका पेट्रोग्रेड सोबियत के समझौता हो
गया, जिसके आधार पर 14 मार्च 1917 ई. को उदारवादी नेता जार्ज स्लाव की अध्यक्षता में एक
सामाजिक सरकार की स्थापना की गई। उसने 14 मार्च को जार से शासन का परित्याग करने की मांग
की। परिस्थिति से बाध्य होकर उसने उनकी मांग को स्वीकार कर शासन से त्यागपत्र दे दिया। इस
प्रकार रूस में जारशाही का अंत हुआ। क्रांति में मजदूरों को सफलता प्राप्त हुई, किन्तु उन्होनें शासन
की बागडोर को अपने हाथ में रखना उचित न समझ, समस्त शक्ति मध्य वर्ग के हाथ में सौंप दी। 

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