1857 के विद्रोह का प्रारंभ, प्रसार, कारण, परिणाम, क्षेत्र

सन् 1757 ई. में प्लासी के युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना हुई थी। इसके सौ वर्षों बाद 1857 ईस्वी तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना अधिकार धीरे-धीरे व्यापार के माध्यम से शुरू किया किन्तु भारतीयों के आपस के झगड़ों का लाभ उठाकर मुट्ठी भर अंग्रेजों ने एक खुशहाल और समृद्धशाली देश को गुलामी से जकड़ लिया इन्होंने भारत पर विजय किसी वीरता या युद्ध कौशल के बलबूते पर नहीं की बल्कि कूटनीतिज्ञ और विश्वासघात से हासिल की थी। ये भारत का दुर्भाग्य ही कह सकते हैं कि यहाँ कि जनता ने आपस में लड़-झगड़कर बाहरी लोगों के हाथों अपने साम्राज्य की बागडोर सौंप दी।

अंग्रेजों की संपूर्ण कार्य व्यवस्था जो कि व्यापार से शुरू हुई थी धीरे-धीरे पूरे भारत वर्ष को हड़पने की कोशिश में बदलने लगी थी, अंग्रेजों का विचार प्रारंभ में तो इस देश में व्यापार बढ़ाने का था किंतु भारतीयों के मनमस्तिष्क को पढ़ने के बाद उनकी विचारधारा बदलने लगी और वे साम्राज्य विस्तार, धनलोलुपता के अधीन होकर भारतीयों पर अत्याचार करने लगे, भारतीय देशी रियासतों का स्वच्छंद एवं उन्मुक्त रूप से कार्य करने और अपनी-अपनी व्यवस्था से चलने एवं एकजुटता ना हो पाने के कारण अंग्रेजों ने इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाकर आपस में एक दूसरे के विरूद्ध लड़वाया, एक रियासत का दूसरी रियासत पर कब्जा किया, एक के बाद एक पूरे भारतीय उपमहाद्वीप केा अपने मकड़जाल में फंसा लिया तथा व्यापारिक दृष्टिकोण लेकर आये ये लोग इस देश तथा इसके आसपास के देशों के सरपरस्त (मसीहा) बन गये।

क्रूरता और अन्याय की हर सीमा को पारकर करके इन्होंने ये साबित कर दिया कि ये मुसलमान शासक गजनबी, तैमूर लंग, नादिरशाह, चंगेज खां से किसी भी तरह कम नहीं हैं। अपने झूठे वादों, संधि-पत्रों के द्वारा इन्होंने रियासतों और राजा-महाराजाओं को पंगु बनाकर उन्हें उनके राज्य से बेदखल कर दिया।

इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा अनुचित व्यवहार की अनेक मिसालें दी जा सकती हैं। सन् 1857 ईस्वी की क्रांति की सही स्थिति समझने की कोशिश की जाये तो ये लगता है कि ये अचानक या कोई तात्कालिक कारण के वजह से होने वाली घटना नहीं है बल्कि इसके होने के पीछे उस समय की परिस्थिति एवं बहुत से कारण जिम्मेदार हैं जो अंग्रेजों द्वारा निर्मित किये गये थे। अंग्रेजों का भारतीय के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करना, उन्हें हेय दृष्टि से देखना, जिस देश में वो लाखों करोड़ों का राजस्व कमा रहे हैं, उसी देश के नागरिकों को धीरे-धीरे पतन की ओर ले जाना, दिल्ली सम्राट बहादुर शाह के साथ अनुचित व्यवहार, इनके विरूद्ध साजिशें, इनकी संपत्तियों पर कब्जा, डलहौजी द्वारा बहुत सी रियासतों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय, पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहेब की पेंशन बंद करा दी, जिसकी सुनवाई तक नहीं हुई, ये अन्याय असहनीय था, इसके बाद भी देश की जनता को मिशनरी से जोड़कर, उन्हें ईसाई बनाना, ईसाईयत का प्रचार-प्रसार किया गया। देश के अधिकांश लोगों में ये सोच पनप रही थी कि यहाँ के निवासियों, उनके मलिक व शासकों कोई अंग्रेजी अधिकार प्राप्त नहीं थे, उन्हें अपमान व घृणा ही मिल रही थी, जिससे उनकी संस्कृति व अपनी पहचान दोनों पर आघात पहुँचा, धर्म असुरक्षित था, अपने ही देश में हम गुलाम बने थे, कानून व न्यायपालिका में देश का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई भारतीय नेता मौजूद नहीं था। जिससे कि नागरिक हित प्रभावित हो रहे थे। उसी समय सैनिकों को चर्बीयुक्त कारतूसों के उपयोग के लिये विवश करना और सैनिकों में असंतोष व्याप्त होना ही उस परिस्थिति में यही विद्रोह का तात्कालिक कारण बन गया ये कुछ हद तक सही भी है किंतु इसने पहले से एकत्रित बारूद के ढेर में चिंगारी लगाने का कार्य किया था।

भारत से अंग्रेजों को हटाने प्रयास सालों से किये जा रहे थे, देश के अंदर हर श्रेणी के लोगों में जबरदस्त विस्फोटक सामग्री जमा हो गई थी, इसे केवल सुयोग्य नेतृत्व की आवश्यकता थी, जो इस सामग्री से लाभ उठाकर सारे देश को स्वाधीनता के एक महान संग्राम के लिये तैयार कर सके और सौ साल से जमे हुये विदेशी शासन को उखाड़ फेंक सके एवं कोई अकस्मात् चिंगारी इस मसले पर पड़कर देश में भयंकर आग लगा दे नतीजा फिर चाहे कुछ भी क्यों न हो और ऐसा हुआ एवं चर्बी वाले कारतूस इसका माध्यम बने।

सन् 1857 ई. का विद्रोह वास्तव में भारत में हिन्दू और मुसलमान नरेशों और भारतीय जनता दोनों की ओर से देश के विदेशियों को, राजनैतिक अधीनता से मुक्त कराने की एक जबरदस्त और व्यापक प्रयास था।

इस प्रकार इन कारणों का आंकलन करने पर पाया गया कि सन् 1857 ई. की क्रांति का अभ्युद्ध होना वाजिब था, ये एक ऐसा युद्ध था जिसमें लोग अपने धर्म, अपनी कौम पर हुये अत्याचारों का बदला लेने व अपनी दबी हुई भावनाओं को जाग्रत करने के लिये उठ खड़े हुये। इस राष्ट्रीय प्रयत्न की तह में एक उतनी ही गहरी योजना और उनका व्यापक, गुप्त संगठन छुपा हुआ था जिसके लिये उन्होंने एकजुट होकर प्रयत्न किये। इस विशाल योजना का सू़त्रपात दोनों में से किसी एक स्थान पर हुआ। कानपुर के निकट विठूर में या बिट्रेन की राजधानी लंदन में। इस तरह विद्रोह में अनेक लोगों द्वारा अलग-अलग रूप से प्रयास चालू कर दिये गये थे जिससे कि देश में ही नहीं विदेशी शक्तियाँ जो अंग्रेजों के विरूद्ध थी उनको भी इस विद्रोह में सहयोगी बनने का अवसर मिला ।

अंततः बैरकपुर छावनी में इस क्रांति की शुरुआत हुई जब वहाँ के भारतीय सैनिकों को चर्बीयुक्त कारतूस का जबरदस्ती प्रयोग करने व उनके धर्मनष्ट करने की कोशिश की गई, मंगल पांडे नामक सैनिक इसका विरोध करते हुये, विद्रोह कर दिया और 1857 की क्रांति की शुरुआत हुई।

1857 के विद्रोह के कारण और परिणाम


1857 विद्रोह का प्रारंभ एवं प्रसार

सन् 1857 ई. के समय सैनिक छावनियों में सैनिकों द्वारा उनके प्रिय ब्राउन बेस बंदूकें के स्थान पर नई एनफील्ड रायफलों का प्रयोग किया गया जिसे चलाने हेतु चर्बी लगे कारतूसों को मुँह से छीलना पड़ता था। इस तथ्य की पुष्टि तब हुई जब जनवरी सन् 1857 ई. में एक दिन दमदम छावनी का एक सिपाही लोटे में पानी लेकर आ रहा था खलासी द्वारा उस ब्राह्मण सैनिक से पानी मांगने पर उसने इंकार किया तब उस खलासी सिपाही ने कहा तुम्हारा जाति दंभ जल्द भंग हो जायेगा क्योंकि थोड़े दिन में अंग्रेज जिन कारतूसों का उपयोग करने तुम्हें देंगे उसमें गाय और सुअर की चर्बी मिली होगी जिसे दाँतों से काटना होगा तब सैनिक द्वारा ये बात सभी सैनिकों को बताई गई, चर्बी वाले कारतूस की घटना दमदम कारखाने से बैरकपुर एवं वहाँ से अन्य छावनियों में फैल गई। चर्बी वाले कारतूस की घटना सत्य ही प्रतीत होती है ग्रीस लगे कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी लगी थी, जिसका उपयोग करना हिन्दू एवं मुसलमान दोनों के लिये धर्म विरूद्ध कार्य था, चूंकि हिन्दुओं के लिये गौ माँस निषिद्ध था, तो मुसलमानों के लिये सुअर का माँस और अधिकारी वर्ग अंत तक इस बात का खंडन नहीं कर सके कि ग्रीज में उक्त चर्बियों का दूषित सम्मिश्रण नहीं है। इस प्रकार सन् 1857 ई. के विद्रोह का प्रारंभ होना राष्ट्रीय प्रयत्न की तह मंें उतनी ही गहरी योजना तथा उतना ही व्यापक एवं गुप्त संगठन था, इस विशाल योजना का सूत्रपात कानपुर के निकट विठूर में ही हुआ होगा क्योंकि सन् 1856 ई. से ही नाना साहब ने सारे भारत में चारों ओर अपने गुप्त दूत और प्रचारक भेजने शुरू कर दिये थे।

इतिहासकार सन जान लिखते हैं ’’महीनों से ही नहीं बल्कि वर्षों से ये लोग सारे देश के ऊपर अपनी साजिशों का जाल फैला ही रहे थे। एक देशी दरबार से दूसरे देशी दरबार तक विशाल भारतीय महाद्वीप के एक सिरे से दूसरे सिरे तक नाना साहब के दूत पत्र लेकर घूम चुके थे, इन पत्रों में होशियारी के साथ और शायद रहस्यपूर्ण शब्दों में भिन्न-भिन्न धर्मों के नरेशों और सरकारों को सलाह दी गई थी और उन्हें आमंत्रित किया गया था कि आप लोग आगामी युद्ध में भाग लें।’’ इस तरह नाना साहब एवं उनके वकील (जिनको इन्होंने इंग्लैंड भेजा था) अजीमुल्ला खाँ ने अपना वेश बदलकर कई प्रदेशों और आसपास के अंग्रेज स्थित इलाकों का बहुत ही बारीकी से दौरा किया एवं तत्कालीन परिस्थिति का आकलन करके विद्रोह की रूपरेखा एवं उसके प्रसार की योजना तैयार की थी।

इनकी इस विशाल राष्ट्रीय योजना को संचालित करने के लिये दिल्ली स्थित लाल किले से अच्छा स्थान शायद कोई उपयुक्त नहीं था। दिल्ली में बहादुरशाह जफर को केन्द्रीय अधिनायक तथा नाना साहब को उनका मंत्री बनाकर क्रांति की तारीख 31 मई सन् 1857 ई. तय की गई । क्रांति के प्रतीक के रूप में कमल का फूल एवं चपाती रखे गये जिसका अर्थ सदैव क्रांति के लिये तैयार रहना था। 31 मई सन् 1857 ईस्वी को ठीक 12 बजे रात्रि से सशस्त्र क्रांति प्रारंभ करने की योजना बना ली गई थी, 31 मई को रविवार का दिन था और अंग्रेज सामूहिक रूप से गिरजाघर जाते थे उन पर उस समय आक्रमण करना आसान था एवं दिल्ली सम्राट के झंडे को राष्ट्रीय मानकर स्वीकार किया, ये हरे सुनहरे रंग का था।

विद्रोह की तारीख 31 मई सन् 1857 ई. नियत की गई थी, किंतु 19 वीं पलटन के एक नौजवान सैनिक मंगल पांडे ने अंग्रेज विरोधी भावना से प्रेरित होकर 29 मार्च सन् 1857 ई. को बैरकपुर में अपने एजुटेंट पर गोली दागी एवं उसकी हत्या कर दी गई, मंगल पांडे को पकड़ लिया गया एवं 8 अप्रैल सन् 1857 ई. को सैनिक अदालत के फैसले में इन्हें फांसी दे दी गई।

इस प्रकार मंगल पांडे ने जो बलिदान दिया उसे भूलना आसान नहीं था। इनकी फांसी की बात आग की तरह छावनी दर छावनी फैलती चली गई एवं इनके सैनिकों में विद्रोह की ज्वाला धधक उठी वे बदला लेने के लिये तत्पर हो गये अब उन्हें तारीख भी याद नहीं रही एवं 9 मई की रात सैनिकों ने दिल्ली के नेताओं को सूचित कर दिया कि हम लोग कल तक (10 मई) दिल्ली पहुँच जायेंगे आप लोग विद्रोह के लिये तैयार रहें। अपने सैनिक साथियों का सार्वजनिक अपमान, तिरस्कार एवं कठोर दंड से अन्य भारतीय सैनिक भी क्रोधित हो गये, 10 मई सन् 1857 ईस्वी को मेरठ के सैनिकों ने विद्रोह का शंखनाद कर दिया क्योंकि यहाँ पर 85 सैनिकों ने चर्बी लगे कारतूस लेने से इंकार कर दिया था, उन्हें 10 वर्ष का कारावास हो गया था, विद्रोह के पश्चात् अंग्रेजी अफसरों को मारा गया, कैदियों का स्वतंत्र कराया गया और वे सामूहिक रूप से दिल्ली की ओर चल पड़े। 

विद्रोह का आरंभ 10 मई सन् 1857 ईस्वी को दिल्ली 36 मील दूर मेरठ में हुआ, यद्यपि मेरठ में 2200 सैनिक थे किंतु इन विद्रोहियों का पीछा नहीं किया गया क्योंकि इसमें वे सैनिक शामिल थे जिन्होंने बाजार में लूटमार की तथा अंग्रेज अफसरों के बांग्लों को जलाकर तहस-नहस कर दिया पुलिस ने भी अंग्रेजों का साथ नहीं दिया। 10 मई की रात ही सैनिक मेरठ से दिल्ली की ओर रवाना हो गये। विद्रोह इतनी तेजी बढ़ता गया और पूरे उत्तर भारत में फैल गया और जल्द ही उत्तर में पंजाब से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक तथा पूर्व में बिहार से लेकर पश्चिम में राजस्थान तक का विशाल भू-भाग इस विद्रोह से नहीं बच पाया।

1857 विद्रोह का स्वरूप

भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम

1857 ई. में ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध भारतीयों द्वारा पहली बार संगठित एवं हथियार बंद लड़ाई हुई। इसे राज्य क्रांति कहना उचित होगा। राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में यह पहला संगठित संघर्ष था। नि:संदेह इस विप्लव में राष्ट्रवाद के तत्वों का अभाव था। इस विप्लव के नेताओं में उद्देश्यों की समानता न होने के कारण वे पूर्ण रूप से संगठित न हो सके थे। यद्यपि यह विप्लव असफल रहा, फिर भी इसने प्राचीन और सामंतवादी परंपराओं को तोड़ने में पर्याप्त सहायता पहुँचायी।

क्रांति का स्वरूप

1857 ई. की क्रांति के विषय में यूरोपीय तथा भारतीय विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। एक ओर यूरोपीय विद्वान इसे ‘सिपाही विद्रोह’ की संज्ञा देकर तथा एक आकस्मिक घटना बताकर टाल देते हैं दूसरी ओर भारतीय विद्वान इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं।

यद्यपि क्रांति के स्वरूप पर अंग्रेज विद्वानों में मतैक्य नहीं है फिर भी वे इस बात पर एकमत हैं कि क्रांति एक राष्ट्रीय घटना नहीं थी, न तो उसे जनता का समर्थन ही प्राप्त था। सर लारेन्स ने कहा है कि ‘‘क्रांति का उद्गम स्थल सेना थी और इसका तत्कालीन कारण कारतूस वाली घटना थी। किसी पूर्वागामी षड्यंत्र से इसका कोई संबंध नहीं था। यद्यपि बाद में कुछ असंतुष्ट व्यक्तियों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए इससे लाभ उठाया।’’ जबकि इतिहासकार सर जॉन सोले ने कहा है, ‘‘1857 ई. का गदर केवल सैनिक विद्रोह था। 

यह पूर्णत: अंतर्राष्ट्रीय स्वार्थी विद्रोह था जिसका न कोई देशी नेता था और न जिसको संपूर्ण जनता का समर्थन प्राप्त था।’’ इससे भिन्न मत प्रकट करते हुए दूसरे अंग्रेज विद्वान पर जेम्स ऑटरम ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध मुसलमानों का षड्यंत्र कहा है। 

मुसलमानों का उद्देश्य बहादुर शाह के नेतृत्व में पुन: मुसलमानी साम्राज्य की स्थापना करना था। इसी उद्देश्य से उन्होंने षड्यंत्र रचा और हिन्दुओं को अपना हथकण्डा बनाया। नि:संदेह आंदोलन को बहादुरशाह का नेतृत्व प्राप्त हुआ लेकिन इसका उद्देश्य यह कभी नहीं था कि मुगल साम्राज्य को फिर से जिलाया जाय। इस आंदोलन में हिन्दुओं और मुसलमानों ने समान रूप से भाग लिया। इसे कारतूस की घटना का परिणाम कहना भी अतिश्योक्ति होगें। ब्रिटिश इतिहासकार राबर्टस का भी मत था कि वह एक सैनिक विद्रोह मात्र नहीं था। 

लार्ड सैलिसबरी ने कहा था कि ‘‘ऐसा व्यापक और शक्तिशाली आंदोलन चर्बी वाले कारतूस की घटना का परिणाम नहीं हो सकता। विद्रोह की पृष्ठभूमि में कुछ अधिक बातें थीं जो अपेक्षाकृत स्पष्ट कारणों से अवश्य ही अधिक महत्वपूर्ण थीं।’’

भारतीय विद्वानों ने स्पष्ट रूप से अंग्रेजी विद्वानों के विचारें का विरोध किया है। उनका मत है कि 1857 ई. का गदर एक राष्ट्रीय क्रांति था जिसकी तुलना हम विश्व की महान क्रांतियो, जैसे अमरीकी, फ्रांसीसी और रूस की क्रांतियों से कर सकते हैं। श्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ‘‘यह एक सैनिक विद्रोह से बहुत कुछ अधिक था। यह जोरों से फैला और एक जनप्रिय आंदोलन था जिसने स्वतंत्रता संग्राम का रूप ले लिया।’’ लाला लाजपत राय का भी कहना था कि ‘‘भारतीय राष्ट्रवाद ने इस आंदोलन को प्रोत्साहित किया जिसके चलते इसने राष्ट्रीय और राजनीतिक रूप धारण कर लिया।’’ 

आधुनिक भारतीय इतिहासकार वीर सावरकर तथा अशोक मेहता ने इस विप्लव को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कह कर ही पुकारा है। भूतपूर्व शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भी बताया था कि यह विद्रोह न तो इसकी पृष्ठभूमि में किन्हीं उल्लेखनीय व्यक्तियों का हाथ था अपितु यह समस्त जनता में सदियों से उत्पन्न असंतोष का परिणाम था। 

इस प्रकार भारतीय विद्वान 1857 ई. के विप्लव को एक साधारण सैनिक गद मानने से इनकार करते हैं वस्तुत: इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रथम संग्राम कहना अधिक युक्तिसंगत तथा उचित होगा।

1857 के विद्रोह के कारण 

स्वधर्म एवं स्वराज्य, इन दो महान लक्ष्यों को उद्देश्य बनाकर सन् 1857 ईस्वी में प्रारंभ हुये रणयुद्ध का निश्चय डलहौजी के कार्यकाल में लिया गया था। किंतु भारतीयों की जन्मजात स्वतंत्रता को छीनकर उसके बदले गुलामी और स्वधर्म के स्थान पर ईसाइयत लादने का पतित विचार जब पहले-पहल अंग्रेजों व्यापारियों के मन में आया तभी से हिन्दुओं के मन मस्तिष्क में क्रांति का संचार प्रारंभ हो गया। सन् 1857 ईस्वी के विद्रोह का कारण अंग्रेजों के ’’अच्छे शासन’’ या ’’बुरे शासन’’ में न होकर केवल और केवल उनके ’’शासन’’ करने में था।

भारत में अंग्रेजों ने राज्य विस्तार का कार्य ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से किया था जिसका उद्देश्य साम्राज्य बढ़ाना और व्यापारिक शोषण था। अंग्रेजों की धन संचय की प्रकृति की कोई सीमा नहीं थी एवं इस समस्त शोषण नीति के संचित प्रभाव से भारत में सभी वर्गों, रियासतों के राजाओं, सैनिकों, जमींदारों, कृषकों, व्यापारियों, ब्राह्मणों तथा मौलवियों केवल नगरों में पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त वर्ग जो अपनी जीविका के लिये कंपनी पर निर्भर थे, उनको छोड़कर शेष सभी पर प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट दिखने लगा था।

1857 ईस्वी के विद्रोह के कारण अधिक गूढ़ थे, भारतीयों का रोष समय-समय पर भारत के विभिन्न भागों में सैनिक विद्रोहों अथवा परिद्रोहों के रूप में प्रकट होता रहा जैसे कि 1806 में बैल्लोर, 1824 में बैरकपुर, फरवरी 1842 ई. में फिरोजपुर, 34 वीं रेजीमेंट का विद्रोह, 1849 ई. में सातवीं बंगाल कैवलरी और 64 वीं रेजीमेंट व 22 वीं एन.आई. का विद्रोह और 1852 ई. में 38 वीं एन.आईका विद्रोह इत्यादि इसी तरह 1816 में बरेली में उपद्रव हुये, 1831-33 का कोल विद्रोह 1848 में कांगड़ा, जसवार और दातारपुर के राजाओं का विद्रोह, 1855-56 ई. में संथालों का विद्रोह ये सभी विद्रोह अनेक राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारणों से हुये थे। 1857 के विद्रोह की नींव वास्तव में 1757 ई. के प्लासी के युद्ध में ही रखी जा चुकी थी। मई व जून 1757 ई. के महीने में दिल्ली के हिन्दी अखबारों में ये भविष्यवाणी छापी गई थी कि ठीक प्लासी के युद्ध वाले दिन अर्थात् 23 जून 1857 ई. को भारत में अंग्रेजी शासन का अंत कर दिया जायेगा। इस प्रकार की भविष्यवाणी का जिन व्यक्तियों ने विद्रोह में भाग लिया था उन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के कारणों को यदि बरीकी से खोजा जाये तो अधिकतर इतिहासकारों का मानना है कि लार्ड डलहौजी की हड़प-नीति सबसे ज्यादा उत्तरदायी रही है किंतु लार्ड क्लाइव और वारेन हेंस्टिग्स की कूट-नीतियां भी कम जवाबदेही नहीं है।

सैनिक असंतोष तथा चर्बी वाले कारतूसों को ही 1857 के महान विद्रोह का सबसे मुख्य तथा तात्कालिक कारण बताया किंतु यही एकमात्र कारण नहीं है क्योंकि प्लासी युद्ध के उपरांत जब 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे द्वारा अंग्रेज एजुटेण्ट की हत्या की गई तब से ही अंग्रेजी प्रशासन के 100 वर्ष के इतिहास में ही इस विद्रोह के कारण छिपे हुये थे, चर्बी वाले कारतूस व सैनिक विद्रोह तो केवल एक चिंगारी मात्र थी।

अंततः भारत में अंग्रेजों का राज्य विस्तार भारतवासियों के लिये अनेकानेक संकटों, आपदाओं और समस्याओं का जनक बन गया अंग्रेजों की निजी नीति ने भारत में प्रचलित सभी पुरानी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संस्थाओं का विनाश कर दिया और लोगों के जीवन निर्वाह के सारे साधन टूटने एवं बिखरने लगे, असंतोष की व्यापकता, शोषण नीति के कारण ही भारत के विभिन्न राजाओं, महाराजाओं और नवाबों, सैनिकों के हृदय में कंपनी शासन के विरूद्ध विद्रोह करने की भावना ने और अधिक क्रूर रूप धारण कर लिया था एवं कुछ समय पश्चात् समस्त वर्गों ने एकजुट होकर विद्रोह कर दिया । इस विद्रोह के कारण अधोलिखित है।

1. राजनीतिक कारण - लार्ड डलहौजी ने देशी राज्यों को कंपनी के अधीनस्थ शासन क्षेत्रो में मिलाने की नीति को अपनाया। उससे धीरे-धीरे देशी राजे सशंकित होकर विद्रोह करने के लिए संगठित होने लगे। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने भारतीयों को शासन से अलग रखने की नीति को अपनाया। 

2. सामाजिक कारण - देशी राज्यों के क्षेत्रों में हड़पने की नीति के चलते राज दरबार पर आजीविका के लिए आधारित व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति पर बहतु बुरा प्रभाव पड़ा। देशी राज्यों के सहयागे पर आधारित उद्योग दस्तकारियों और अन्य निजी व्यवसायों को गहरा धक्का पहुँचा। साधारण जनता में भी असंतोष फैलने लगा क्योंकि अंग्रेजों ने जातीय विभेद की नीति को अपनाकर उनकी भावना पर गहरी चोट पहुँचायी। 

3. धार्मिक कारण - अंग्रेजों की सुधारवादी नीति ने हिन्दुओं और मुसलमानों की धामिर्क भावनाओं को गहरा ठासे पहुँचाया। उदाहरणस्वरूप सती प्रथा का अंत, विधवाओं का पुनर्विवाह, ईसाइयो द्वारा धर्म प्रचार आदि घटनाओं ने कट्टर धर्मावलम्बियों को सशंकित बना दिया। लोगों को यह महसूस होने लगा कि भारतीय धर्मों का कुछ दिनों में नामाेि नशान मिट जायगा तथा संपूर्ण भारत में ईसाइर् धर्म फलै जायेगा। अंग्रेजों ने भी भारतीय संस्कृति को मिटा देना ही राजनीतिक दृष्टिकोण से लाभप्रद समझा क्योंकि इससे भारतीयों के हृदय से राष्ट्रीय स्वाभिमान तथा अतीत के गौरव की भावना का अंत हो जायगा। लेकिन अन्य उपनिवेशों के विपरीत अंग्रेज यह भूल गये थे कि भारतीय संस्कृति तथा धामिर्क श्रेष्ठता इतनी प्राचीन और महान थी कि उसे सहसा दबा सकना असंभव था। 

4. सैनिक कारण - अंग्रेजों की सेना में भारतीय सैनिकों की बहुतायत थी। कुछ छावनियों की सेनाओं में दृढ़ एकता पाई जाती थी। दूसरी ओर सैनिक अनुशासन बहुत ढीलाढाला था। सैनिकों में कई कारणों से असंतोष  की भावना व्याप्त थी। चर्बी वाले कारतूसो के प्रयागे के विरूद्ध सैनिकों ने हथियार उठा लिये। क्रांति का मुख्य दायित्व भारतीय सेना पर था। जहाँ-जहाँ सैनिकों का सहयोग मिला, क्रांति की लहर दौड़ गई।

1857 की क्रांति का विस्तार

क्रांति की शुरूआत कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में 23 जनवरी 1857 ई. को हुई। भारतीय सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूसों के प्रयोग के विरूद्ध हथियार उठाया। तत्पश्चात् 10 मई को मेरठ विद्रोह आरंभ हुआ जिसका प्रभाव उत्तर भारत के अनेक नगरों और प्रांतों पर पड़ा। दिल्ली, मेरठ, आगरा, इलाहाबाद, अवध, राहे ले खंड आदि के आस-पास के प्रदेशो में विद्राहे ने काफी जोर पकड़ा और अंग्रेजी शासन कुछ समय के लिए समाप्त हो गया। 

नाना साहब, बहादुर शाह, तात्या टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, खान बहादुर खाँ आदि नेताओं ने जगह-जगह पर क्रांति का नेतृत्व किया। सिखों और राजपूत शासकों ने क्रांति में भाग नहीं लिया। अंत में अंग्रेजों ने सफलतापवूर्क क्रांति को कुचल दिया।

1857 का विद्रोह के असफलता के कारण

1857 ई. का विद्रोह इन कारणों से असफल रहा -
  1. विद्रोह केवल कुछ ही प्रदेशों तथा नगरों तक सीमित रहा। 
  2. कई देशी राजे तटस्थ बने रहे। उन्होंने कही-कहीं अंग्रेजों को मदद भी दी। 
  3. विद्रोहियों में संगठन तथा नेतृत्व का अभाव था। 
  4. अंग्रेजों की सेना अधिक संगठित और लड़ाकू थी तथा उनके पास उत्तम हथियार थे। फलत: विप्लव को दबाने में वे सफल रहे।

1857 के विद्रोह के परिणाम

1857 ई. के गदर का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा। कुछ अंग्रेज विद्वानों का मत है कि भारतीय इतिहास पर इस क्रांति का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, यह तथ्य एकदम गलत है। 1857 का विद्रोह के परिणाम उल्लेखनीय हैं -
  1. इस क्रांति के प्रभाव अंग्रेज और भारतीय मस्तिष्क पर बहुत बुरे पड़े। विद्रोह से पूर्व अंग्रेजों और भारतीयों का एक-दूसरे के प्रति सामान्य था किन्तु वे एक दूसरे के अपमान के लिए उत्सुक भी थे। लेकिन विद्रोह ने उनकी मनोवृत्ति को एकदम बदल दिया। विद्रोह का दमन बहुत अधिक कठोरता तथा निर्दयता से किया गया था जिसे भूलना भारतीयों के लिए असंभव था। 
  2. विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेजो ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति को अपनाया। उन्होंने शासन और सेना के पुनर्गठन का आधार धर्म और जाति को बनाया। विद्रोह ने हिन्दु-मुसलमानों को एक कर दिया था। लेकिन अब अंग्रेज हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने का प्रयत्न करने लगे। इस दिशा में वे काफी सफल भी हुए। 
  3. 1857 ई. की क्रांति ने भारत में राष्ट्रवाद तथा पुनर्जागरण का बीज बोया। इस क्रांति से आंदोलनकारियों को सदैव प्रेरणा मिलती रहती थी और उन्होंने 1857 ई. के शहीदों द्वारा जलाई मशाल को अनवरत रूप से ज्योतिर्मय रखने का प्रयास किया। 
  4. विद्रोह का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव भावी ब्रिटिश भारत की शासन व्यवस्था पर पड़ा। कंपनी के शासन का अंत हो गया और भारतीय शासन की बागडोर ब्रि.टिश साम्राज्ञी के हाथों में चली गई। महारानी विक्टोरिया की राजकीय घोषणा के द्वारा भारत में उदार, मित्रता, न्याय एवं शासन पर आधारित राज्य की स्थापना की मनोकामना की गई। 
भारतीय शासन व्यवस्था को उदार बनाने तथा उनमें सुधार लाने के हेतु आगामी वर्षो में अनेक अधिनियम पारित हएु , जैसे 1861, 1892, 1909, 1919 और 1935 ई. के अधिनियम।

1857 के विद्रोह के क्षेत्र

1. दिल्ली

मेरठ से निकले लगभग 2 हजार सशस्त्र हिन्दुस्तानी 11 मई सन् 1857 ई. को दिल्ली पहुॅंच गये। दिल्ली में इसकी सूचना मिलते ही 52 वीं पल्टन के कर्नल रिप्ले सक्रिय हो गये एवं इन विद्रोहियों का सामना करने के लिये इन्होंने अपनी पलटन को तैयार कर लिया, किंतु कुछ ही देर में ये दिल्ली व मेरठ के सैनिकों की गोली का शिकार हो गये एवं मेरठ के सैनिकों ने नारे लगाये एवं कहा कि ’’फिरंगियों के राज्य का नाश कर दो’’ बादशाह की जय हो, ’’दीन-दीन’’ ’’हर-हर महादेव’’ एवं दिल्ली के सैनिकों कहा ’’मारो फिरंगी को’’ की जयघोष की। तत्पश्चात् हिन्दुस्तानी सैनिकों ने दिल्ली के किले पर अपना अधिकार कर लिया एवं सेना के भारतीय अधिकारियों ने सम्राट बहादुर शाह को सलाम करके उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व स्वीकार करने का आग्रह किया, उन्हें अपने पक्ष में करके स्वतंत्र भारत का पुनः शासक घोषित किया एवं उनके सम्मान में 21 तोपों की सलामी दी तब दिल्ली के लाल किले पर बहादुर शाह जफर ने अपना स्वतंत्रता का झंडा फहरा दिया एवं एक घोषणा पत्र जारी किया।

दिल्ली के लाल किले के भीतर राजनीतिक गतिविधियाँ चल रही थीं बाहर नगरों में भयंकर मार-काट मचा हुआ था, अंग्रेजों के निवास स्थल, कार्यालय, बैंक, शास्त्रागार, सब आग के हवाले कर दिये सभी अंग्रेज स्त्री-पुरूष तथा बच्चों को मौत के घाट उतारा जा रहा था पूरे देश में विद्रोह की लहर तेजी से फैल चुकी थी।

दिल्ली मेरठ में घटित घटनाओं का समाचार सारे देश में तीव्र गति से फैल गया था एवं अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की भावना भड़क उठी, दिल्ली आसपास के अलीगढ़, मैनपुरी, इटावा एवं उत्तर प्रांत (बुलंद शहर, बढ़ौत, बरेली, अवध, कानपुर, झांसी, बिहार, बनारस, मध्यप्रदेश) अन्य क्षेत्र भी इस विद्रोह से अछूते न रह सके।

2. अवध व लखनऊ

बेगम हजरत महल, अवध के अपदस्थ नवाब वाजिद अली शह की पत्नी थी। इन्होंने सन् 1857 ई. के विद्रोह में लखनऊ में झंडा फहराया। चूंकि अंग्रेज सन् 1857 ई. की जनक्रांति से पूर्व ही अवध को हड़पना चाहते थे। अवध की राजधानी लखनऊ में असंतोष व्याप्त सैनिकों ने 30 मई की रात में 9 बजे विद्रोह कर दिया, विद्रोहियों ने अवध में भी अंग्रेजों के बंगलों पर प्रहार किया, लखनऊ के विद्रोहियों ने अंग्रेजों पर हमला हेतु चिनहट नामक स्थान पर चढ़ाई की ब्रिटिश रेजीडेंट हेनरी लारेंस ने जब विप्लवकारियों पर हमला किया किंतु इनकी सेना भी विद्रोही सिपाहियों से मिल गई, युद्ध उपरांत एवं हेनरी लारेंस की मृत्यु हो गई अंगे्रज हार गये। इस प्रकार सन् 1857 ई. सबसे भयंकर युद्ध अवध की भूमि पर लड़े गए। लखनऊ में हुये विद्रोह के पश्चात् शीघ्र ही सीतापुर, फैजाबाद, गोंडा, सुल्तानपुर इत्यादि में भी विद्रोह का विगुल बज गया।

इस प्रकार 31 मई से 10 जून के बीच लगभग अधिकांश अवध राज्य अंग्रेजों के चंगुल से निकल गया था।

3. कानपुर

4 जून सन् 1857 ई. को कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहब ने किया एवं कानपुर अंग्रेजों के हाथों से निकल गया। इस समय अंग्रेजों के सेनापति सर ह्यू ब्लीहर यहाँ पदस्थ थे नाना साहब की सहायता हेतु अजीमुल्ला खाँ, तात्या टोपे थे। नाना साहब ने इस युद्ध संचालन हेतु एक कूटनीति निर्धारित की थी और ऊपरी तौर पर वह अंग्रेजों के मित्र बने रहे। लगभग एक वर्ष की तैयारी के उपरांत 4 जून सन् 1857 ई. की आधी रात को अचानक कानपुर छावनी में 3 फायर हुये। विद्रोह का शंखनाद हो गया था, सिपाहियों ने पूर्व नियोजित योजना के तहत अंग्रेजों की इमारतों में आग लगा दी, झंडों का गिराया, अपने झंडे फहराये एवं 5 जून तक अंग्रेजी खजाना एवं मैंगजीन दोनों ही विद्रोहियों के हाथों में आ गई। किंतु नाना के सिपाही भी विद्रोहियों से आ मिले, भारतीय सिपाहियों एवं नगर निवासियों ने नाना साहब को नेता चुना, इन्होंने अंग्रेजी किले का मोहासरा देने के लिये जनरल व्हीलर को चेतावनी दी किंतु कोई जवाब न मिलने पर तोपों से आक्रमण किया आक्रमण के दौरान कुछ अंग्रेज मारे गये कुछ घायल हुये। ये गोलीबारी 21 दिन तक चलती रही अंत में व्हीलर ने समझौता किया।

कानपुर के विद्रोह में सतीचैरा घाट का हत्याकांड इतिहास से अत्यंत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इसके किले में कैद अंग्रेजों, स्त्रियों एवं बच्चों को जो बच गये उन्हें नाना साहब ने सुरक्षित इलाहाबाद पहुँचाने का वायदा किया किंतु किले से डेढ़ किलोमीटर दूर सतीचैराघाट पर जब इन सिपाहियों को कश्तियों में बैठाया गया तो इलाहाबाद व उसके आसपास के इलाके से हजारों मनुष्य, बाल-बच्चे, स्त्रियां जो कि कर्नल नील के अत्याचारों से क्रोध की अग्नि में जल रहे थे, वहां एकत्रित हुए। 27 जून सुबह 10 सतीचैराघाट पर एकत्रित भीड़ में से एक व्यक्ति ने कर्नल ईवर्ट पर हमला कर दिया, बस फिर थोड़ी ही देर में मार काट प्रारंभ हो गई, बहुत से अंग्रेजों की मृत्यु हो गई, किंतु नाना साहब को इसका समाचार प्राप्त होते ही उन्होंने कहा स्त्रियों व बच्चों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाया जाये, जिससे बच्चे व स्त्रियों की जान बच गई चूंकि सतीचैराघाट का हत्याकांड सही नहीं था किंतु यह जनरल नील व उसके सिपाहियों के अत्याचार का ही परिणाम था।

4. झांसी

लार्ड डलहौजी ने ‘‘व्यपगत के सिद्धांत‘‘ द्वारा गंगाधर राव के दत्तक पुत्र दमोदर राव को नाजायज कहकर झांसी की संपूर्ण संपत्ति व राज्य पर अधिकार कर लिया था। लक्ष्मीबाई को पेंशन दी जाती थी, अपने खोये हुये राज्य की प्राप्ति हेतु 5 जून सन् 1857 ई. के अंगे्रजों के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। चर्बी लगा कारतूस झांसी में भी चर्चा का विषय था जैसे ही मई में मेरठ व दिल्ली की खबरें आई, यहाँ पदस्थ कैप्टन डनलप सक्रिय हो गये। विद्रोह के उपरांत सेना के एक पक्ष ने सारे खजाने को लूट लिया। स्कीन व गोर्डन आदि अंग्रेज किले में बंद हो गये, इन्होंने अपनी सुरक्षा के हरसंभव प्रयास किये किंतु सिपाहियों की शर्तानुसार किला खाली नहीं किया गया। झांसी की जोखन बाग का वध वाली घटना अत्यंत दर्दनाक थी। इसमें कई पुरूषों, स्त्रियों एवं बच्चों के पूरे दल को तलवार से उड़ा दिया गया, लाशें जोखनबाग में, जहाँ यह हत्याकांड हुआ था, तीन दिन तक खुली पड़ी थी। इन्हें गड्ढे में दफना दिया था। कुछ स्त्री व बच्चे ही सही सलामत बच पाये थे ।

रानी लक्ष्मीबाई व तात्याटोपे 21 अप्रैल को कालपी पहुँचे किंतु यहाँ पर भी अंग्रेजी सेना ने अधिकार कर लिया, ग्वालियर का राजा अंग्रेजों का समर्थक होने के कारण रानी ने ग्वालियर के किले पर अधिकार कर लिया एवं मार्च सन् 1858 ई. में अंग्रेजों से 17 जून सन् 1858 ई. तक झांसी की रानी सैनिक वेशभूषा में लड़ती हुई दुर्ग के पास वीरगति को प्राप्त हुई।

जनरल ह्यूम रोज जिन्होने रानी को पराजित किया, कहा कि ’’यहाँ वह औरत सोई हुई है जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी।’’

5. जगदीशपुर (बिहार)

बिहार के जगदीशपुर में जमींदार कुंवर सिंह ने विद्रोह का नेतृत्व किया जबकि वे 70 साल के हो गये थे किंतु अंग्रेजों ने इन्हें दिवालिया कर दिया एवं इनकी संपत्ति और जायदाद जब्त कर ली, भीतर ही भीतर अंग्रेज इनके शत्रु बन गये थे। चूँकि इन्होंने अंग्रेजों के विरूद्ध कोई योजना नहीं बनाई, किंतु जैसे ही विद्रोही सैनिकों की टुकड़ी वीनापुर से आरा पहुँची कुंअरसिंह ने उनके साथ होकर उनका नेतृत्व किया एवं अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया 6 अप्रैल 1858 को अंग्रेजी सेना को पराजित करके 22 अप्रैल को उन्होंने अपनी जागीर प्रमुख जगदीशपुर अधिकार कर लिया।

अंततः अंग्रेजी राज्य की समाप्ति दिखाई ही दे रही थी किंतु पंजाब व पाटियाला की सिक्ख पल्टनें एवं लखनऊ की गोरखा पलटनें भी यदि विद्रोहियों का एकजुट होकर सहयोग करती तब ये संभव था किंतु इन्होंने सिर्फ अंग्रेजों का साथ दिया, जिससे दिल्ली के सम्राट बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों से हार का सामना करना पड़ा, इन्हें बंदी बनाकर जीवन के अंतिम दिनों में रंगून भेज दिया गया, वहाँ झाँसी में वीरांगना लक्ष्मीबाई ने लड़ते-लड़ते अपने प्राणों की आहूति दे दी, नाना साहेब ने कानपुर में युद्ध जारी रखा किंतु गिरफ्तार होने की वजह सन् 1859 ईस्वी में नेपाल चले गये।

जगदीशपुर के कुंअरसिंह की मृत्यु मई सन् 1858 ई. में हो गई थी। तात्या टोपे ने लगभग 11 महीनों तक गुरिल्ला पद्धति से युद्ध जारी रखा किंतु देश में रहने वालों ने गद्दारी का अपना अलग इतिहास रचा एवं अंग्रेजों को तात्याटोपे का पता बताकर गिरफ्तार करवा दिया एवं इस महासमर को अस्थाई विराम लगा दिया।

संदर्भ - 
  1. Medley's, Campaiging in India from March 1857 to March 1858
  2. Justin Mearthy, History of our own times vol. III
  3. Lodlow's, thoghts in the policy of the crown
  4. Shahi Bhshan Chaudhri, Civil Rebellion in the Indian Muriny (1857-
  5. The world Press Private Ltd., 1957, Calcutta
  6. R.C. Mazumdar, The sepoy mutiny at 1857, Publication - Srimti S.
  7. Choudhri, Bipin Pal Road, Calcutta

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

3 Comments

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  2. समज में नही आया ठीक से

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