नाक की संरचना एवं कार्य

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नासा गुहा (Nasal cavity) की श्लेश्मा, तीन छोटी अस्थियों (Nasal conchae) द्वारा कई कक्षों में बँट जाती है, जो नाक की बाहरी भित्ति से आरम्भ होते हैं। तीनों अस्थियों (Nasal conchae) के कारण इस स्थान पर तीन छोटे टीलों के समान उभार बन जाते हैं। सम्पूर्ण
क्षेत्र पर नेजल म्यूकस मेम्बे्रन बिछी रहती है, जो कॉल्यूमनर सिलिएटेड एपीथीलियम से बनी हैं। इन कोशिकाओं के स्राव से नाक की म्यूकस मेम्बे्रन तर, चिकनी तथा चिपचिपी-सी रहती है।

नेजल कोंचा से नासिका में ऊध्र्व, मध्य तथा निम्न क्षैतिज खाँचें बन जाती हैं। अस्थि निर्मित तीनों खाँचें नासिका के प्रत्येक आधे भाग को अपूर्ण रूप से चार कक्षों में विभाजित के प्रत्येक आधे भाग को अपूर्ण रूप से चार कक्षों में विभाजित कर देती है, जो सामने से पीछे की ओर जाते हैं तथा एक के ऊपर एक स्थित रकते हैं। प्रश्वसिकत वायु, नीचे के तीन कक्षों से हाकर जाती है, परतु सबसे ऊपर वाले में सामान्य रूप से नहीं जाती है। घ्राण (Smell) के अंग, सबसे ऊपर वाले कक्ष की घ्राण श्लेश्मिक कला (Olfactory mucous membrane) में स्थित होते हैं। घ्राण कोशिकाओं के अन्तांत इसी मेम्बे्रन में फैले रहते हैं। नासा गुहा का सबसे ऊपर वाला कक्ष एक अंधगुहा या पॉकेट के समान है, जिसका वही अंत हो जाता है। घ्राण उपकला (Olfactory epithelium) घ्राण (गंध) के लिए संवेदनशील होती है, जो नाक की छत के समीप होती है। इन ग्रन्थियों का स्राव समस्त सतह को तर रखता है तथा गंधयुक्त वाश्पों (Odorous vapours) को घोलने का कार्य करता हैं सहारा देने वाली कोशिकाओं का आधार (Base) ऊपर की ओर रहता है और एक सतही मेम्बे्रन बनाता है, जिसके बीच के रिक्त स्थानों में से घ्राण कोशिकाओं (Olfactory cells) के बाल के समान प्रवर्ध (Cilia) बाहर की ओर निकले रहते हैं।

वस्तुत: द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ (Bipolar nerve cells) ही घ्राण की रिसेप्टर कोशिकाएँ (Receptor cells) होती हैं। मानव में ये 25 मिलियन से अधिक होती हैं तथा प्रत्यक सहारा देने वाली कोशिकाओं से घिरी रहती है। प्रत्येक रिसेप्टर कोशिका में एक गोल न्यूक्लियस तथा एक लम्बे धागे के रूप में प्रोटोप्लाज्म रहता है। ये कोशिकाएँ म्यूकस मेम्ब्रेन में घँसी रहती है। प्रत्येक कोशिका के दो प्रवर्ध (Processes) दोनों ध्रुवों पर से निकले रहते हैं। कोशिकाएँ लम्बे अक्ष में एक-दूसरी से सटी हुर्इ, सतह से लम्बबद्ध दिशा में (Perpendicular) खड़ी-सी स्थित रहती हैं। इन कोशिकाओं के पाश्र्वतन्तु (डेण्डा्रइट) छोटे आकार के अभिवाही प्रवर्ध रिक्त स्थानों से निकले रहते हैं। ऊपर ये थोड़े प्रसारित होकर ऑल्फेक्टरी रॉड्स बनाते हैं तथा विस्फारित घ्राण स्फोटिका (Bulbous olfactory vesicle) में समाप्त हो जो हैं। प्रत्येक स्फोटिका (Vesicle) से 6-20 लम्बे बाल के समान प्रवर्ध (Cilia) निकले रहते हैं, जो सतही एपीथीलियम (Surface epithelium) को आच्छादित किए रहते हैं। इन्हें घ्राण-रोम-कोशिका कहते हैं। स्फोटिका (Vesicle) एवं इसके प्रवर्ध (Cilia) ही घ्राण के अन्तांग (Olfactory end organs) होते हैं। रिसेप्टर कोशिकाओं के अर्क्षतन्तु (एक्सोन्स) जो घ्राण तन्त्रिका (Olfactory nerve) का निर्माण करते हैं, दूसरे सिर ेसे निकलकर ऊपर उठते हैं और इथमॉइड अस्थि की छिद्रित प्लेट (Cribriform plate) से होकर गुजरते हैं और घ्राण-बल्ब्स (Olfactory bulbs) में पहुँचते हैं। घ्रण बल्ब्स भूरे द्रव्य की विशेष संरचनाएँ हैं, जो मस्तिष्क के घ्राण-क्षेत्र (Olfactory region) के स्तम्भाकार विस्तार होते हैं। घ्राण-बल्ब के अन्दर रिसेप्टर कोशिकाओं के टर्मिनल एक्सॉन्स (अक्ष तन्तुओं के अन्तांग) गुच्छित कोशिकाओं (Tufted cells), गै्रन्यूल कोशिकाओं (Granule cells) एवं माइट्रल कोशिकाओं
(Mitral cells) के डेण्ड्राइट्स (पाश्र्वतन्तुओं) के साथ तन्तुमिलन (Synapse) होता है। जिससे एक विशिष्ट गोलकार अंग घ्राण गुच्छिका या ऑल्फेक्टरी ग्लोमेरूलार्इ (Olfactory glomeruli) बनता है। प्रत्येक ग्लोमेरूलस (Glomerulus) रिसेप्टर कोशिका के लगभग 26,000 एक्सॉन्स से आवेगों को प्राप्त करता है। माइट्रल एवं गच्छित (Tufted) कोशिकाओं के अक्षतन्तु (एक्सॉन्स) ही घ्राण-पथ (Olfactory tract) बनाते हैं, जो पीछे जाकर प्रमस्तिष्क कॉर्टेक्स के टेम्पोरल लोब में घ्राण केन्द्र (Olfactory of smell centre) में पहुँचता है, जहाँ पर आवेगों का विश्लेषण होता है, और हमें विशेष गन्ध का ज्ञान होता है।

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