त्वचा की संरचना तथा कार्य

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स्पर्शेन्द्रिय (Sense of touch) का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है, जबकि शरीर की अन्य समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ स्थानीय होती हैं, तथा एक निश्चित क्षेत्र में कार्य करती हैं। स्पर्श के अतिरिक्त ताप, शीत, दाब, पीड़ा, वेदना, हल्का, भारी, सूखा, चिकना आदि संवेदनाओं का ज्ञान इसी के द्वारा होता है। समस्त शरीर की त्वचा में तन्त्रिका तन्तुओं के अंन्तांगों (Nerve endings) का एक जाल-सा फैला रहता है, जो भिन्न-भिन्न संवेदनाओं को ग्रहण कर मस्तिष्क में पहुँचाते हैं, इन्हें रिसेप्टर्स (Receptors) कहा जाता है। किसी एक संवेदना के रिसेप्टर्स एक समान होते हैं तथा विभिन्न प्रकार की संवेदनाओं के रिसेप्टर्स एक-दूसरे से भिन्न होते हैं और इनकी रचना में भी भिन्नता होती है। त्वचा में विद्यमान विभन्नि प्रकार के रिसेप्टर्स एक-दूसरे से पर्याप्त दूरी पर स्थित रहते हैं। उचित प्रकार के उद्दीपक को त्वचा पर लगाकर विशिष्ट वर्ग के रिसेप्टर की स्थिति (Location) को ज्ञात किया जाता है। उस बिन्दु को उस विशेष संवेदना का बिन्दु (Spot) कहा जाता है। त्वचा के जिन बिन्दुओं पर कुछ कड़े बाल (hair) के द्वारा स्पर्श कराने से स्पर्श की संवेदना (Sense of touch) का ज्ञान होता है, उन क्षेत्रों को ‘ताप बिन्दु (Warm spots), ‘शीत बिन्दु’ (Cold spots), पीड़ा बिन्दु (Pain spots) कहा जाता है। किसी विशेष संवेदना के बिन्दु, त्वचा के किसी भाग पर अधिक और कहीं कम रहते हैं।

यदि किसी कड़ी वस्तु जैसे पेन्सिल की नोंक से त्वचा पर दबाव डालते हुए स्पर्श कराया जाए तो वह दाब (Pressure) की संवेदना होती है, जिसके रिसेप्टर्स विशेष वर्ग के होते हैं। इस प्रकार के रिसेप्टर्स त्वचा के अतिरिक्त शरीर के अन्य भाग, जैसे अस्थिआवरण (Periosteum), टेन्डन्स के नीचे, आन्त्रयोजनी (Mesentery) ग्रन्थियों में भी पाए जाते हैं। इस संवेदना से हमें अपने शीर या इसके विभिन्न भागों की स्थिति एवं उनकी गति का ज्ञान होता है। इस प्रकार के रिसेप्टर्स को लेमीलेटेड या पैसिनियन (Lamellated or Pacinian) कॉर्पसल्स (कणिका) कहते हैं। इसी से शरीर में स्थिति और गति की जानकारी होती हे। उदाहरण के तौर पर यदि आप एक व्यक्ति को दोनों आँखे बन्द कर उसके एक हाथ को टेबल पर रख दें और उसे अपने दूसरे हाथ को ठीक वैसी ही स्थिति में टेबल पर रखने को कहें, तो वह सहज ही पहले रखे गए हाथ के समीप दूसरे हाथ को ठीक वैसी ही स्थिति में रख लेगा।

इसी प्रकार विभिन्न प्रकार की संवेदनाओं के लिए रिसेप्टर्स भी विशिष्ट प्रकार के होते हैं, जैसे स्पर्श की संवेदना के लिए ‘स्पर्श कणिकाएँ’ (Tactile corpuscles), दाब के लिए ‘पैसिनियन कणिका’ (Pacinian corpuscles), कॉर्पसल्स ऑफ रफीनी (Corpuscles of Ruffini), कार्पसल्स ऑफ क्रॉज (corpuscles of Krause), ताप के लिए गॉल्जी-मेजोनी (Golgi-Mazzoni organs) एवं रफीनी (Ruffini) कॉर्पसल्स के तन्त्रिका-अन्तांग, शीत के लिए बल्बस कॉर्पसल्स ऑफ क्रॉज (Bulbous corpuscles of Krause) के तन्त्रिका अन्त्रांग, आदि कुछ विशिष्ट संयोजक ऊतकों से निर्मित अन्तांग हैं, जिनमे ंक्यूटेनियस तन्त्रिकाओं के छोरों (Cutaneous nerve endings) का अंत होता है। पेशी स्पिन्डल (Muscle spindle), गाल्जी बॉडी तथा अन्तांग प्लेट्स (End plates) आदि भी त्वचा संवेदनाओं के माध्यम हैं। इनके अतिरिक्त पीड़ा एवं वेदना के आवेगों को ले जाने वाली तन्त्रिकाओं के अन्तांग स्वतन्त्र (Free nerve endings) रहते हैं अर्थात् ये त्वचा पर स्वतन्त्र रूप से फैले रहते हैं। स्पर्श संवेदन से सम्बन्धित कुछ तन्त्रिका-अन्तांग बालों की जड़ों में भी लिपटे रहते हैं, जिनसे स्पर्श का ज्ञान होता है। इस प्रकार विभिन्न वर्ग के रिसेप्टर भिन्न-भिन्न संवेदनाओं को ग्रहण करते हैं। किसी एक प्रकार के रिसेप्टर्स किसी एक ही संवेदना को ग्रहण कर सकते हैं, जो तन्त्रिका अन्तांग ताप के लिए हैं उनसे स्पर्श की संवेदना नहीं हो सकती है।

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