उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ एवं आवश्यकता

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आप इस तथ्य से परिचित हैं कि उपभोक्ताओं को कुछ मूलभूत अधिकार प्राप्त हैं, जैसे- सुरक्षा का अधिकार , सूचना का अधिकार , चुनाव का अधिकार और उनकी बात सुने जाने का अधिकार । लेकिन क्या हम खरीददारी करते समय इन अधिकारों को हमेशा याद रखते हैं? शायद नहीं। लेकिन अगर हम इन अधिकारों से परिचित हैं, तो भी विक्रेता प्राय: हमारी स्थिति का लाभ उठाकर हमें ऐसी वस्तुओं की आपूर्ति करते हैं, जो दोषपूर्ण, हानिकारक और असुरक्षित हैं और जिनसे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है।

मान लीजिए आप किसी दुकान पर खाना पकाने का तेल खरीदने गये। दुकानदार आपसे कहता है कि तेल बंद टीन या डिब्बे में उपलब्ध है। आप आश्वस्त होना चाहते हैं कि तेल मिलावटी तो नहीं है, अर्थात् उसमें कोई घटिया हानिकारक तेल तो नहीं मिलाया गया। अब दुकानदार आपको लेबल पर उत्पाद का नाम दिखायेगा और कहेगा कि यह जानी-मानी कम्पनी है, जो कभी भी अशु( और घटिया चीजों की आपूर्ति नहीं करती। आप उस तेल का प्रयोग करते हैं और उसे खाकर बीमार पड़ जाते हैं। अब क्या आप दुकानदार के पास जाकर तेल को लौटा सकते हैं? नहीं, अब वह खुले टिन में थोड़ा-बहुत इस्तेमाल हो चुका तेल वापस नहीं लेगा। शायद वह आपसे यह भी कहे कि आपकी बीमारी किसी और वजह से हुई होगी। तो अब आप यही कर सकते हैं कि आगे उस लेबल का तेल इस्तेमाल करना बंद कर दें। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि दूसरे ब्रांड के तेलों के साथ पिफर यही समस्या आपके सामने नहीं आएगी?

एक और उदाहरण लें। किसी उपभोक्ता को पंखे के रेगुलेटर, या बिजली के हीटर, या टेलीविजन सैट में कोई त्राुटि नजर आती है। वारंटी के दौरान डीलर बिना कोई शुल्क लिये इसे ठीक करता है, लेकिन त्रुटि इसके बाद भी बनी रहती है। अब उपभोक्ता क्या करेगा? मान लीजिए बिजली के हीटर में खराबी की वजह से कोई नुकसान हो जाता है तो क्या इसका कोई उपाय है? उपभोक्ता, विक्रेता के पास जा सकता है। हो सकता है कि विक्रेता उसी पर दोष मढ़ दे कि उपयोग के दौरान आवश्यक सावधनी नहीं बरती गयी।

समझदार खरीददार होने के बावजूद उपभोक्ताओं के बेबस हो जाने के ये कुछ उदाहरण हैं। ऐसे में उपभोक्ता यदि अपने अधिकारों से अवगत नहीं होता है तो उसको हानि की आशंका कहीं ज्यादा होती है। इसलिए उपभोक्ताओं का हित सुरक्षित करने के लिए यह महसूस किया गया कि वस्तुओं और सेवाओं के विक्रेता की मनमानी से आम आदमी को बचाने के लिए और उसकी मदद के लिए कुछ उपाय आवश्यक हैं। उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ है, व्यापार से जुड़ी अनियमितताओं से आम उपभोक्ता के हित की रक्षा के लिए उठाये जाने वाले कदम या आवश्यक उपाय। उपभोक्तावाद की तरह इसे भी एक आंदोलन माना जा सकता है। ये सब प्राथमिक बातें हैं क्योंकि हर व्यापारी अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता है और यह अक्सर उपभोक्ताओं के खर्च की कीमत पर ही होता है।

आइए, हम अपने देश में प्रचलित व्यवसायिक गतिविधियों के स्वरूप पर विचार करें जिनसे लोगों को आर्थिक नुकसान होने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य और जीवन को भी खतरा है।

उपभोक्ताओं की समस्याओं का स्वरूप

अनैतिक और बेईमान व्यापारी कई प्रकार से उपभोक्ताओं को धोखा दे सकते हैं। इनमें व्यापारी, डीलर, उत्पादक, निर्माता और सेवा प्रदाता सभी आते हैं। इनमें से कुछ अनुचित गतिविधियों से कभी न कभी आप भी अवश्य प्रभावित हुए होंगें।
  1. मिलावट : अर्थात् बेची जा रही वस्तु में उससे घटिया क्वालिटी की चीज मिला देना। इस तरह की मिलावट अनाज, मसालों, चाय की पत्ती, खाद्य तेलों और पेट्रोल में की जाती है। उदाहरण के लिए सरसों के तेल में रेप सीड या आर्जिमोन तेल की मिलावट, काली मिर्च में पपीते के सूखे बीज, और घी या मक्खन में वनस्पति की मिलावट की जा सकती है। कई बार तो मिलायी गयी घटिया क्वालिटी की चीज स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हो सकती है।
  2. नकली चीजों की बिक्री : यानि असली उत्पाद के बदले उपभोक्ताओं को ऐसी चीज की बिक्री करना जिसकी कोई खास कीमत नहीं है। ऐसा अक्सर दवाओं और स्वास्थ्य रक्षक उत्पादों के साथ होता है। ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें इंजेक्शन में सिर्फ पानी मिला पाया गया है या ग्लूकोज के पानी की बोतल में आसुत (डिस्टिल्ड) जल पाया गया है।
  3. नाप तोल के गलत पैमानों का इस्तेमाल : व्यापारियों द्वारा अपनाया जाने वाला एक और अनुचित तरीका है। तोल कर बिकने वाली चीजें जैसे सब्जी, अनाज, चीनी और दालें, या नाप कर बेची जाने वाली चीजें जैसे कपड़े, या सूट पीस वगैरह कभी-कभी वास्तविक तोल या नाप से कम पाई जाती है। जाली भारक (जैसे एक किलोग्राम, 500 ग्राम या 250 ग्राम के वजन) या गलत निशानों वाले गज या टेप अकसर खरीददार को धेखा देने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। कभी-कभी पैक किया हुआ सामान या सीलबंद डिब्बों में उनके लेबल पर दर्शाये गये वजन से, कम वजन का सामान होता है। इसकी पुष्टि भी आसानी से की जा सकती है। मिठाइयां अकसर डिब्बे के साथ ही तोल दी जाती हैं, जो 50 से 100 ग्राम तक का होता है और आपको इसके लिए भी मिठाई की दर से ही भुगतान करना पड़ता है।
  4. जाली माल की बिक्री : यानि चीजों पर जिस बेहतर क्वालिटी का निशान दिया गया है, वास्तव में सामान का उसके अनुरूप न होना। या जैसे स्थानीय तौर पर बनायी गयी चीजों को भी विदेशों से आयातित बताकर, ऊंचे दाम पर बेचना, आयातित चीजें अक्सर बेहतर समझी जाती है। कुछ उत्पाद जैसे ध्ुलाई का साबुन या पाउडर, ट्यूब लाइट, जैम, खाने का तेल और दवाओं पर जाने-माने ब्रांड का लेबल लगा होता है। हालांकि ये दूसरी कंपनियों द्वारा बनायी जाती हैं।
  5. जमाखोरी व कालाबजारी : जब कोई आवश्यक वस्तु खुले बाजार में उपलब्ध नहीं करायी जाती है और जानबूझकर व्यापारी इसे गायब कर देते हैं तो इसे जमाखोरी कहा जाता है। इसका उद्देश्य होता है उस चीज का कृित्राम अभाव पैदा कर देना ताकि इसकी कीमत में उछाल लाया जाये। इस तरह से जमा किये गये सामान को चोरी-छिपे, ऊंची कीमत पर बेचना कालाबाजारी कहलाता है। कभी-कभी जब किसी उत्पाद की आपूर्ति कम होती है तो इस तरह के अनुचित तरीके अपनाये जाते हैं। कुछ समय पहले आपने समाचार पत्रों में कुछ राज्यों मं प्याज की कमी के बारे में पढ़ा होगा और जिन व्यापारियों के पास प्याज का स्टॉक था, उन्होंने अधिक दाम वसूले।
  6. टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद करने वालों को कभी-कभी बिक्री की पूर्व शर्तों : के रूप में कुछ अन्य वस्तुएं भी खरीदनी पड़ती हैं या उनसे इस वर्ष का बिक्री के बाद सेवा शुल्क का अग्रिम भुगतान करने को कहा जा सकता है। आपने नये गैस कनेक्शन के साथ गैस स्टोव की बिक्री की शर्त सुनी होगी। इसी तरह टेलीविजन सेट भी कभी-कभी इस शर्त के साथ बेचे जाते हैं कि उपभोक्ताओं को एक वर्ष का सेवा शुल्क अग्रिम भुगतान करना होगा।
  7. बिना कोई अतिरिक्त मूल्य लिये उपहार : बिना कोई अतिरिक्त मूल्य लिये या कुछ चीजों की अगली खरीद पर उपहार प्राप्त करने के लिए कूपन देना आदि कुछ ऐसे तरीके हैं जिनसे उपभोक्ताओं को उत्पाद खरीदने के लिए लुभाया जाता है। अक्सर बेची जा रही वस्तु का मूल्य बढ़ाकर ही उपहार दिये जाते हैं। कई बार डीलर उपभोक्ताओं के बीच प्रतियोगिता या लॉटरी की भी घोषणा करता है, जबकि उसकी नीयत कोई ईनाम देने की कभी नहीं होती है।
  8. भ्रमात्मक विज्ञापन : भ्रमात्मक विज्ञापनों के जरिये भी उपभोक्ताओं को छला जाता है। ऐसे विज्ञापन किसी उत्पाद या सेवा की गुणवत्ता अच्छी होने का दावा करते हैं और इस उत्पाद या सेवा की उपयोगिता का झूठा आश्वासन देते हैं। 
  9. हल्के स्तर के उत्पादों की बिक्री : यानि ऐसी वस्तुएं बेचना जो गुणवत्ता के घोषित स्तर या मानक स्तर, विशेषकर सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं होती हैं। ऐसे उत्पादों में प्रेशर कुकर, स्टोव, बिजली के हीटर या टोस्टर, रसोई गैस सिलेण्डर आदि हैं।

उपभोक्ता संरक्षण की आवश्यकता

व्यवसाय में अपनाये जाने वाले गलत ओर अनुचित तरीके तथा उनसे बचने में आम उपभोक्ताओं की लाचारी के कारण ही उपभोक्ताओं के हितों को सुरक्षित करने के उपायों की आवश्यकता पड़ती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सेवाओं में कमी या खराब वस्तु की वजह से होने वाले नुकसान या हानि से स्वयं को बचाना, एक उपभोक्ता का मूलभूत अधिकार है। लेकिन इसके बावजूद अज्ञानता या जागरूकता के अभाव के कारण उपभोक्ता अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर पाते। उदाहरण के तौर पर एक उपभोक्ता के रूप में हम सबको बाजार में उपलब्ध एक वस्तु के विभिन्न प्रकारों में से अच्छी किस्म की वस्तु चुनने का अधिकार है, लेकिन हम भ्रामक विज्ञापनों की वजह से सही चुनाव करने में असपफल होते हैं और हल्की गुणवत्ता वाली चीजें खरीद लेते हैं।

कुछ परिस्थितियों में तो हम बिल्कुल लाचार हो जाते हैं, जैसे किसी उत्पाद की गुणवत्ता की पुष्टि करने में हम अपने आपको असमर्थ पाते हैं। चालाक दुकानदार अपनी लच्छेदार बातों से हमें आसानी से ठग सकता है। यदि दवा की गोलियों की पट्टठ्ठी पर उसकी एक्सपायरी डेट ठीक से पढ़ी नहीं जा रही है तो हम इतनी जल्दी में होते हैं कि दुकानदार जो कहता है उसे मान लेते हैं। अब अगर उस दवा का असर नहीं होता है तो हम पिफर डॉक्टर के पास जाते हैं और उनसे कोई दूसरी दवा लिखने का अनुरोध् करते हैं। हम बिल्कुल भूल जाते हैं कि जो दवा हमने खरीदी थी, शायद उसका वांछित असर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि हमें वह दवा दी गयी थी जिसका असर समाप्त हो चुका था।

कई बार तो ऐसा होता है कि हम अपनी ही कुछ निराधर मान्यताओं की वजह से ठगे जाते हैं। जैसे हममें से कई लोगों का विश्वास होता है कि ऊंची कीमत का मतलब है बेहतर गुणवत्ता और ऐसे में अगर विक्रेता ने किसी उत्पाद की गुणवत्ता के अच्छी होने की सिपफारिश कर दी तो हम उसके लिए ऊंची से ऊंची कीमत चुकाने की भी परवाह नहीं करते। इसके अलावा यह भी एक आम धरणा है कि आयातित वस्तुओं की गुणवत्ता बेहतर होगी ही। तो अगर किसी उत्पाद पर कोई भी लेबल या निशान लगा हो जो इसे विदेश में निर्मित बताए तो हम उत्पादन या निर्माण स्थल की कोई पुष्टि किये बिना ही इसे ऊंची कीमत पर खरीद लेते हैं।

पैकेटों में बिकने वाले तैयार खाद्य पदार्थ जैसे आलू के चिप्स सेहत के लिए अच्छे नहीं होते। लेकिन बच्चे इन चीजों को खरीदते हैं, क्योंकि ये स्वादिष्ट होते हैं। शीतल पेय के कुछ ब्रांड युवाओं के बीच कापफी लोकप्रिय हैं क्योंकि टेलीविजन पर नजर आने वाले इनके विज्ञापनों में नामी गिरामी पिफल्मी कलाकार होते हैं और उनकी कही गई बातों का उनके ऊपर कापफी प्रभाव होता है। अब तो ऐसा लगता है हम एक स्वादिष्ट पेय के रूप में चीनी और नमक के साथ ताजे नींबू पानी का स्वाद और महत्व बिल्कुल भूल ही गये हैं।

कई वस्तुओं के निर्माता प्राय: पैकिंग पर गुणवत्ता का स्तरीय प्रामाणिकता का मानक प्ण्ैण्प्ण् जैसा चिन्ह लगा देते हैं, जो कि कड़ी जांच परख के बाद ही लगाया जाने वाला प्रमाणिक चिन्ह होता है। इसी तरह यदि पैक किया सामान इस पर अंकित वजन से कम होता है तो खरीदने से पहले हमेशा इसमें वजन की पुष्टि कर पाना बहुत कठिन होता है। कभी-कभी तो तोलने की मशीनें भी त्राुटिपूर्ण होती है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि उपभोक्ताओं को, वस्तुओं के त्राुटिपूर्ण होने या सेवा में कमी होने की स्थिति के उपचार के रूप में अपने लिए सुलभ उपायों की सही जानकारी तक नहीं होती।

अब आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि उपभोक्ताओं को ऐसी अनुचित व्यापारिक गतिविधियों से बचाने के उपाय करना क्यों आवश्यक है, जिनसे उनका आर्थिक नुकसान तो होता ही है, वे उनके स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हो सकती है।

उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े पक्ष

यदि आपने उपभोक्ता हितों की रक्षा के लिए कदम उठाये जाने की आवश्यकता को अच्छी तरह समझ लिया है तो सवाल यह है कि ये कदम कौन उठायेगा? क्या केवल उपभोक्ता ये कदम उठा सकते हैं। या हमें सरकार पर निर्भर रहना होगा। क्या व्यापारी कुछ कर सकते हैं? या फिर उपभोक्ता को अपने हितों की रक्षा के लिए गैर सरकारी संगठनों के पास जाना चाहिये? वास्तव में प्रभावी उपभोक्ता संरक्षण के लिए यह आवश्यक है कि इन तीनों पक्षों (1) उपभोक्ता (2) व्यापारी और (3) सरकार को इसमें सम्मिलित किया जाए। आइए, हम विचार करें कि ये सभी पक्ष क्या कर सकते हैं ?
  1. स्वयं सहायता सर्वोतम सहायता है : आप इस बात से तो सहमत होंगे कि स्वयं की सहायता, सर्वोतम सहायता है। इसलिए उपभोक्ताओं को जहां तक संभव हो सके अपने हितों का खुद ध्यान रखना चाहिए और बाजार के हथकंडों से अपनी रक्षा करनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि वे अपने अधिकार ों और उनके इस्तेमाल के बारे में जानें। उन्हें व्यापारियों की समझ के भरोसे नहीं रहना चाहिए। उपभोक्ताओं को इससे सम्बिन्ध्त जानकारी या सूचना पाने का अधिकार है और साथ ही अपनी बातें सुने जाने का अधिकार भी है। उन्हें स्थानीय उपभोक्ता संघ द्वारा उपभोक्ताओं के लिए आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए और सार्वजनिक कार्यकर्ताओं को उपभोक्ताओं के अधिकारों और उनके संरक्षण के लिए उपलब्ध कानूनों के बारे में बतलाने के लिए आमंित्रत करना चाहिए।
  2. व्यापारियों द्वारा सम्मान : जहां तक व्यापारियों का प्रश्न है, उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि उत्पादक, वितरक, डीलर, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता सभी अपने हित में, उपभोक्ताओं के अधिकार ों का पूरा सम्मान करें। उन्हें सही मूल्य पर उत्तम प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। अनुचित तरीकों की रोकथाम के लिए व्यापारी संघों, वाणिज्य और उद्योग परिसंघों, और निर्माता संघों को अपने सदस्यों के खिलापफ उपभोक्ताओं की शिकायतें सुननी चाहिएँ और गलत शर्तें रखने वालों के खिलापफ उचित कार्रवाई करनी चाहिए।
  3. सरकार द्वारा हितों का संरक्षण : सरकार को चाहिए कि वह पूरे समाज के हित में उपभोक्ता संरक्षण को दायित्व मानकर चले। यह आवश्यक है कि विभिन्न उपभोक्ता संघों के दृष्टिकोण के अनुरूप उपभोक्ता हितों के संरक्षण के लिए कानून लागू किए जायें और मौजूदा कानूनों में सुधर किया जाए। सरकार द्वारा केन्द्र और राज्य स्तर पर गठित नीति-निर्धरक निकायों में उपभोक्ता संघों के प्रतिनििध्यों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। सरकार ने इस दिशा में समय-समय पर कई कदम उठाए भी हैं।

उपभोक्ताओं को कानूनी संरक्षण

भारत सरकार ने उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई कानून बनाए हैं। इन कानूनों के उद्देश्यों के बारे में यहां संक्षेप में बताया जा रहा है।
  1. कृषि उत्पाद (श्रेणीकरण और विपणन) अधिनियम, 1937 : इस अधिनियम के अंतर्गत, कृषि उत्पादों के गुणवत्ता स्तर को प्रमाणित करने और उन्हें श्रेणीकृत करने का प्रावधन है तथा इनपर भारत सरकार के कृषि विपणन विभाग की गुणवत्ता प्रमाण सील ‘एगमार्क’ लगाया जा सकता है।
  2. औद्योगिक (विकास ओर नियमन) कानून, 1951 : इस कानून में उत्पादन और उत्पादित वस्तुओं के वितरण पर नियंत्राण का प्रावधन है। इस कानून के अनुसार केन्द्र सरकार, किसी भी ऐसे उद्योग की जांच का आदेश जारी कर सकती है। जिसमें उसकी राय में उत्पादन में भारी कमी हुई हैं, या उत्पाद की गुणवत्ता में स्पष्ट गिरावट आई हैं या उत्पाद मूल्य में अनुचित बढ़ोत्तरी हुई है। आवश्यक जांच और छानबीन के बाद सरकार स्थिति को सुधरने के निर्देश जारी कर सकती है। यदि निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है तो सरकार उस उद्योग को अपने हाथों में भी ले सकती है।
  3. खाद्य पदार्थ मिलावट रोकथाम अधिनियम, 1954 : यह काननू पहली जनू 1955 से लागू हुआ। इसके तहत खाद्य वस्तुओं में मिलावट के लिए कड़े दण्ड का प्रावधान है। ऐसी मिलावट के लिए, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो तथा जिससे मृत्यु तक हो सकती हो, उम्र कैद और साथ में रू 3,000 के जुर्माने का प्रावधान है। जांच के लिए निरीक्षक नियुक्त किये जाते हैं। उन्हें वस्तु का नमूना लेकर उसे जांच और विश्लेषण के लिए भेजने का अधिकार है। इस अधिनियम के अंतर्गत मिलावटी और नकली ब्रांड की खाद्य सामग्री के निर्माण, आयात, भंडारण, बिक्री और वितरण से सम्बिन्ध्त अपराध के लिए भी दंड का प्रावधन है।
  4. आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 : इस कानून के तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक हित में किसी भी वस्तु को आवश्यक वस्तु घोषित कर दे। इसके बाद सरकार इस वस्तु के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण तथा व्यापार को नियंित्रत कर सकती है। इसके तहत मुनापफाखोरों, जमाखोरों और काला बाजारियों की असामाजिक गतिवििध्यों के खिलापफ कार्रवाई का भी प्रावधन है।
  5. माप-तौल मानक अधिनियम, 1956 : इसके अतंगर्त देश भर में  तौल के लिए भार और लम्बाई के मानक पैमाने के प्रयोग करने की व्यवस्था है। लम्बाई मापने के लिए मीटर और भार तोलने के लिए किलोग्राम को प्राथमिक इकाई माना गया है। यह कानून लागू होने से पहले देश के विभिन्न हिस्सों में माप तौल की विभिन्न प्रणालियां प्रचलित थी, जैसे- वजन के लिए ‘पौंड’, ‘छटांक’ और ‘सेर’ तथा लम्बाई के लिए गज, इंच और पुफट आदि। इस विभिन्नता और अंतर से व्यापारियों को उपभोक्ताओं के शोषण का मौका मिलता था।
  6. एकािध्कार और प्रतिबंध्ति व्यापार अधिनियम, 1969 : 1983 और फिर 1984 में संशोधित इस अधिनियम के तहत उपभोक्ता या उपभोक्ताओं के समूह, प्रतिबंधित और अनुचित व्यापारिक गतिविधियों के बारे में शिकायतें दर्ज कराकर, जांच कराने के अधिकार का उपयोग कर सकते हैं। सरकार ने एक एकािध्कार और प्रतिबंध्ति व्यापार आयोग(Monopolies and Restrictive Trade PracticesCommission)का गठन किया है जिसे आवश्यक छान बीन और जांच के बाद उपभोक्ताओं की शिकायतें निपटाने का अधिकार दिया गया है। आयोग को यह अधिकार भी प्राप्त है कि वह उपभोक्ताओं को हुई किसी भी हानि या नुकसान के लिए मुआवजे के भुगतान का आदेश दें। आयोग जांच के दौरान गलत व्यापारिक गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगा सकता है। इस आयोग को एक सिविल कोर्ट के समकक्ष अधिकार दिये गये हैं।
  7. कालाबाजारी की रोकथाम और आवश्यक वस्तु आपूर्ति  अधिनियम, 1980 : इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य, काला बाजारी की रोकथाम और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाये रखने के लिए, दोषी लोगों को हिरासत में लेने की व्यवस्था करना है। इस कानून के उद्देश्य के खिलापफ, किसी भी तरह का काम करने वाले लोगों को अध्कितम 6 महीने तक की कैद हो सकती है।
  8. भारतीय मानक ब्यूरो  अधिनियम, 1986 : इस  अधिनियम के तहत, उपभोक्ता के हितों को बढ़ावा देने के लिए और उनके संरक्षण के एक कारगर उपाय के तौर पर भारतीय मानक संस्थान के स्थान पर भारतीय मानक ब्यूरो का गठन किया गया। इसकी दो मुख्य गतिविधियां हैं : उत्पादकों के लिए गुणवत्ता मानकों का निर्धरण करना और BIS चिन्ह योजना के जरिये उनको प्रमाणित करना। इसके द्वारा निर्धरित गुणवत्ता मानक सुरक्षा और कार्य निष्पादन के अनुरूप पर्याप्त जांच के बाद उत्पादकों को अपने उत्पाद पर मानक चिन्ह ISI प्रयोग करने की अनुमति दी जाती है। अब इस्तेमाल के आवश्यक उत्पादों : जैसे रंगीन खाद्य सामग्री, वनस्पति, सीमेंट, एल.पीजी. सिलेण्डर, गैस स्टोव, घरेलू बिजली उपकरण आदि पर मानकीकरण चिन्ह का होना अनिवार्य है। कई उत्पादकों ने तो स्वेच्छा से अपने उत्पादों पर यह चिन्ह लिया है। ब्यूरो ने आम उपभोक्ताओं में गुणवत्ता के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए उपभोक्ता मामले विभाग का गठन किया है। एक सार्वजनिक शिकायत प्रकोष्ठ भी है, जिसमें उपभोक्ता ISI मार्क वाली उत्पादों की गुणवत्ता के बारे में अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।
  9. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 : यह अधिनियम अन्य किसी कानून की अपेक्षा उपभोक्ताओं को अध्कि व्यापक संरक्षण प्रदान करता है। उपभोक्ता बड़े पैमाने पर हो रही व्यापारिक धांधलियों के लिए कानूनी संरक्षण प्राप्त कर सकते हैं। इनमें न केवल वस्तुओं ओर उत्पाद बल्कि बैंकिंग, बीमा, वित्त, परिवहन, टेलीफोन, विद्युत या अन्य ऊर्जा आपूर्ति, आवास मनोरंजन और आमोद-प्रमोद जैसी अनेक सेवाएं भी शामिल हैं। इस अधिनियम के तहत केन्द्र और राज्य स्तर पर उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की स्थापना का भी प्रावधान है। उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए इस अधिनियम में अर्( न्यायिक प्रणाली की व्यवस्था है। इसमें उपभोक्ता विवाद निपटाने के लिए जिला पफोरम, राज्य और राष्ट्रीय आयोग होते हैं। इन्हें उपभोक्ता अदालत माना जा सकता है।

उपभोक्ता अदालतों का अधिकार क्षेत्र

उपभोक्ता संरक्षण  अधिनियम 1986 के तहत गठित न्यायिक व्यवस्था में जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता अदालतें होती हैं। इन्हें क्रमश: जिला पफोरम, राज्य उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग (राज्य आयोग) तथा राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग (राष्ट्रीय आयोग) के रूप में जाना जाता है। कोई भी उपभोक्ता या उपभोक्ता संघ वस्तु की कीमत के आधर पर मुआवजा चाहता है तो वह दावे के साथ जिलाफोरम, राज्य या राष्ट्रीय आयोग में अपनी लिखित शिकायतें दर्ज करा सकता है।

यदि वस्तु या सेवाओं की कीमत या मुआवजे का दावा 20 लाख से अधिक नहीं है तो इन शिकायतों का पैफसला जिला पफोरम के अधिकार क्षेत्रा में आता है। राज्य आयोग को 20लाख से ऊपर और एक करोड़ तक के मामलों की सुनवाई का अधिकार है। जिला पफोरम के आदेशों के खिलापफ अपीलों पर भी राज्य आयोग सुनवाई करता है। एक करोड़ रूपये से अध्कि के सभी दावे और मामले राष्ट्रीय आयोग के अधिकार क्षेत्रा में आते हैं। इसके साथ ही इसे जिला पफोरम और राज्य आयोगों के आदेशों के खिलापफ दायर अपीलों को निपटाने का भी अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय आयोग के आदेशों के खिलापफ यदि अपील करनी हो तो उच्चतम न्यायालय में जाना होगा।

उपभोक्ता की शिकायतों को निपटाने की प्रक्रिया

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, कोई व्यक्तिगत उपभोक्ता या उपभोक्ताओं का संघ अपनी शिकायतें दर्ज करा सकता है। शिकायतें उस जिले फोरम में दर्ज करायी जा सकती है जहां यह मामला हुआ या जहां विरोध्ी पक्ष रहता है या राज्य सरकार या केन्द्र शासित प्रदेश की सरकार द्वारा अिध्सूचित राज्य आयोग के समक्ष, अथवा नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय आयोग के समक्ष दर्ज कराई जा सकती है। शिकायत दर्ज कराने का बहुत कम शुल्क है। शिकायत, शिकायत कर्ता द्वारा या व्यक्तिगत रूप से उसके अधिकृत एजेंट द्वारा दर्ज करायी जा सकती है या डाक से भेजी जा सकती है। निम्नलिखित सूचनाओं के साथ शिकायत की पांच प्रतियां जमा कराई जानी चाहिएँ।
  1. शिकायत कर्ता का नाम, पता और विवरण।
  2. विरोधी पक्ष या पक्षों का नाम, पता और विवरण।
  3. शिकायत से सम्बंध्ति तथ्य और यह जानकारी, कि मामला कब और कहां हुआ।
  4. शिकायत दर्ज आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, यदि कोई हो तो (जैसे कैशमेमो, रसीद वगैरह)
  5. यह ब्यौरा कि शिकायत कर्ता किस तरह की राहत चाहता है।
शिकायत पर शिकायत कर्ता या उसके अधिकृत प्रतिनिधि(एजेंट) के हस्ताक्षर होने चाहिएँ। यह जिला पफोरम, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष को संबोध्ति होनी चाहिए। कोई भी शिकायत, मामला उठाने की तारीख से दो वर्ष की अवधि के भीतर दायर की जानी चाहिए।

यदि इसमें देर होती है और सम्बंध्ति फोरम या आयोग इसे क्षम्य मान लेता है तो विलम्ब का कारण रिकॉर्ड किया जाना चाहिये। जहां तक संभव हो शिकायतों पर विरोधी पक्ष द्वारा नोटिस ग्रहण करने के तीन महीने के भीतर पैफसला कर दिया जाना चाहिए। उन मामलों में जहां उत्पादों की, प्रयोगशाला में जांच या विश्लेषण की व्यवस्था हो, निपटान की समय सीमा पांच महीने की होती है। पफोरम या आयोग, शिकायतों की प्रकृति, उपभोक्ता द्वारा मांगी गयी राहत और मामले के तथ्यों के अनुरूप, इनमें से एक या एक से अधिक राहतों का आदेश दे सकता है।
  1. वस्तुओं में त्राुटि/सेवाओं में कमी को दूर करना।
  2. वस्तुओं के बदले दूसरी वस्तु देना, सेवाओं को बहाल करना।
  3. वस्तु के लिए चुकायी गयी कीमत या सेवाओं के लिए चुकायी गयी अतिरिक्त शुल्क की वापसी।

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