भारत की प्राचीन लिपियाँ

अनुक्रम
भारत के पुराने शिलालेखों और सिक्कों पर दी लिपियां-1. ब्राह्मी, 2. खरोष्ठी मिलती हैं। पर पुस्तकों में और अधिक लिपियों के नाम मिलते है। जैनों के पत्रावणासूत्रा में 18 लिपियां- 1. बंभी, 2. जवणालि, 3. दीसापुरिया, 4. खरोष्ठी, 5. पुक्खरसारिया, 6. भोगवइया, 7. पहाराइया, 8. उपअन्तरिक्खिया, 9. अक्खरपिट्ठिया, 10. तेवणइया, 11. गि (णि) राइया, 12. अंकलिवि, 13. गणितलिवि, 14. गंधव्वलिवि, 15. आंदसलिवि, 16. माहेसरी, 17. दामित्नी, 18. पोलिंदी तथा बौद्धों की संस्कृत पुस्तक ‘ललितविस्तर’ में 64 लिपियां- इनमें ब्राह्मी और खरोष्ठी, इन दोनों का ही आज पता है। यों इनमें से अधिकांश नाम कल्पित ज्ञात होते हैं।

खरोष्ठी लिपि

खरोष्ठी लिपि के प्राचीनतम लेख शहबाजगढ़ी और मनसेरा में मिले हैं। आगे चलकर बहुत-से विदेशी राजाओं के सिक्कों तथा शिलालेखों आदि में यह लिपि प्रयुक्त हुई है। इसकी प्राप्त सामग्री मोटे रूप से 4थी सदी ई.पू. से 3री सदी ई. तक मिलती है। इसके इंडोबैक्ट्रियन, बैक्ट्रियन, काबुलियन, वैक्ट्रोपालि तथा आर्यन आदि और भी कई नाम मिलते हैं, पर अधिक प्रचलित नाम ‘खरोष्ठी’ ही है, जो चीनी साहित्य में 7वीं सदी तक मिलता है।

नाम पड़ने के कारण

‘खरोष्ठी’ नाम पड़ने के संबंध में 9 बातें कही जाती हैं-
  1. चीनी विश्कोष ‘फा-वान-शु-लिन’ के अनुसार किसी ‘खरोष्ठ’ नामक व्यक्ति ने इसे बनाया था।
  2. यह ‘खरोष्ठ’ नामक सीमाप्रान्त के अर्धसभ्य लोगों में प्रचलित होने के कारण इस नाम की अधिकारिणी बनी। 
  3. इस लिपि का केन्द्र भी मध्य एशिया का एक प्राप्त ‘काशगर’ था, और ‘खरोष्ठ’ काशगर का ही संस्कृत रूप है। 
  4. सिलवां देवी के अनुसार खरोष्ठ काशगर के चीनी नाम ‘किया-लु-शु-ता-ले’ का विकसित रूप है, और काशगर ही इस लिपि का केन्द्र रहा है।
  5. गदहे की खाल पर लिखी जाने से इसे ईरानी में ‘खरपोश्त’ कहते थे और उसी का अपभ्रंश रूप ‘खरोष्ठ’ है। 
  6. डॉ. प्रजिलुस्की के अनुसार यह गदहे की खाल पर लिखी जाने से ‘खरपृष्ठी’ और फिर खरोष्ठी कहलाई। 
  7. कोई आर्मेइकशब्द ‘खरोष्ठ’ था, और उसी की भ्रामक व्युत्पत्ति के आधार पर बना संस्कृत रूप ‘खरोष्ठ’ है।
  8. डॉ. राजबली पांडेय के अनुसार इस लिपि के अधिक अक्षर गदहे के बोल की तरह बेढंगे हैं, अतएव यह नाम पड़ा है।
  9. डॉ. चटर्जी के अनुसार हिब्रू में खरोशेथ का अर्थ ‘लिखावट’ है। उसी से लिया जाने के कारण इसका नाम ‘खरोशेथ’ पड़ा, जिसका संस्कृत रूप खरोष्ठ और उससे बना शब्द खरोष्ठी है।
इन नवों में कोई भी बहुत पुष्ट प्रमाणों पर आधारित नहीं है, अतएव इस संबंध में पूर्ण निश्चय के साथ कुछ कहना कठिन है। यों अधिक विद्वान् इस लिपि की उत्पत्ति जैसा कि आगे हम लोग देखेंगे आर्मेइक लिपि से मानते हैं, अतएव आर्मेइक शब्द ‘खरोट्ठ’ से इसके नाम को संबद्ध माना जा सकता है।

खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति के संबंध में सभी लोग एक मत नहीं है इस संबंध में प्रमुख रूप से दो मत हैं-
  1. यह आर्मेइक लिपि से निकली है,
  2. यह शुद्ध भारतीय लिपि है।
प्रथम मत का संबंध प्रसिद्ध लिपिवेत्ता जी. वूलर से है। इसका कहना है कि-

1. खरोष्ठी लिपि आर्मेइक लिपि की भांति दाएं से बाएं को लिखी जाती है।
2. खरोष्ठी लिपि के 11 अक्षर बनावट की दृष्टि से आर्मेइक लिपि के 11 अक्षरों से बहुत मिलते-जुलते हैं। साथ ही इन 11 अक्षरों की ध्वनि भी दोनों लिपियों में एक है यथा-
खरोष्ठी आर्मेइक
क . . . . . . काफ्
ज . . . . . . जाइन्
द . . . . . . दालेथ्
न . . . . . . नून
ब . . . . . . वेथ्
य . . . . . . यीबू
र . . . . . . रेश्
व . . . . . . बाबू
प . . . . . . शिन्
स . . . . . . त्साधे
ह . . . . . . हे

3. आर्मेइक लिपि खरोष्ठी से पुरानी है।
4. तक्षशिला में आर्मेइक लिपि में प्राप्त शिलालेख से यह स्पष्ट है कि भारत से आर्मेइक लोगों का संबंध था। इन चारों बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि खरोष्ठी आर्मेइक से ही संबद्ध है।
भारतीय लिपियों के प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा भी इस मत से सहमत हैं। आधुनिक युग के लिपि-शास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् और अध्येता डिरिंजर ने भी इसी मत को स्वीकार किया है।

दूसरा मत खरोष्ठी को शुद्ध भारतीय माने जाने का है। डॉ. राजबली पांडेय ने अपनी पुस्तक ‘इंडियन पैलोग्राफी’ में इस मत का प्रतिपादन किय है। यह मत केवल तर्क पर आधारित है। पूर्व मत की भांति ठोस आधारों की इसमें कमी है। अत: जब तक इस मत के पक्ष में कुछ ठोस सामग्री उपलब्ध न हो जाय, पूर्व मत की तुलना में इसे मान्यता नहीं प्राप्त हो सकती। खरीष्ठी लिपि उर्दू लिपि की भांति पहले दाएं से बांए को लिखी जाती थी, पर बाद में सम्भवत: ब्राह्मी लिपि के प्रभाव के कारण यह भी नागरी आदि लिपियों की भांति बाएं से दाएं को लिखी जाने लगी।

डिरिंजर तथा अन्य विद्वानों का अनुमान है कि इस दिशा-परिवर्तन के अतिरिक्त कुछ और बातों में भी ब्राह्मी लिपि ने इसे प्रभावित किया। इसमें मूलत: स्वरों का अभाव था। वृत्त, रेखा या इसी प्रकार के अन्य चिन्हो द्वारा Ðस्व स्वरों का अंकन इसमें ब्राह्मी का ही प्रभाव है। इसी प्रकार भ, ध तथा घ आदि के चिन्ह आर्मेइक में नहीं थे। यह भी ब्राह्मी के ही आधार पर सम्मिलित किये गये।

खरोष्ठी लिपि को बहुत वैज्ञानिक या पूर्ण लिपि नहीं कहा जा सकता। यह एक कामचलाऊ लिपि थी, और आज की उर्दू लिपि की भांति इसे भी लोगों को प्राय: अनुमान के आधार पर पढ़ना पड़ता रहा होगा। मात्राओं के प्रयोग की इसमें कमी है विशेषत: दीर्घ स्वरों (आ, ई, ऊ, ऐ और औ) का तो इसमें सर्वथा अभाव है। संयुक्त व्यंजन भी इसमें प्राय: नहीं के बराबर या बहुत थोड़े हैं। इसकी वर्णमाला में अक्षरों की मूल संख्या 37 है। खरोष्ठी-लिपि के अक्षर यहां दिये जा रहे हैं- ख्पहचान के लिए आरम्भ में नागरी अक्षर देकर उनके सामने उसी ध्वनि के खरोष्ठी अक्षर दिये गये हैं,

ब्राह्मी लिपि

ब्राह्मी प्राचीन काल में भारत की सर्वश्रेष्ठ लिपि रही है। इसके प्राचीनतम नमूने बस्ती जिले में प्राप्त पिपरावा के स्तूप में तथा अजमेर जिले के बडली (या बर्ली) गांव के शिलालेख में मिले हैं। इनका समय ओझा जी ने 5वीं सदी ई.पू. माना है। उस समय से लेकर 350 ई. तक इस लिपि का प्रयोग मिलता है।

ब्राह्मी नाम का आधार

इस लिपि के ‘ब्राह्मी’ नाम पड़ने के संबंध में कई मत हैं-
  1. इस लिपि का प्रयोग इतने प्राचीनकाल से होता आ रहा है कि लोगों को इसके निर्माता के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है और धार्मिक भावना से विश्व की अन्य चीजों की भांति ‘ब्रह्मा’ को इसका भी निर्माता मानते रहे हैं, और इसी आधार पर इसे ब्राह्मी कहा गया है।
  2. चीनी विश्वकोष ‘फा-वान-शु-लिन’ (668 ई.) में इसके निर्ताता कोई ब्रह्म या ब्रह्मा (Fan) नाम के आचार्य लिखे गये हैं अतएव उनके नाम के आधार पर इसका नाम ब्राह्मी पड़ना संभव है।
  3. डॉ. राजबली पांडेय के अनुसार भारतीय आर्यों ने ब्रह्मा (=वेद ) की रक्षा के लिए इसको बनाया। इस आधार पर भी इसके ब्राह्मी नाम पड़ने की संभावना हो सकती है।
  4. कुछ लोग साक्षर समाज-ब्राह्मणों-के प्रयोग में विशेष रूप से होने के कारण भी इसके ब्राह्मी नाम से पुकारे जाने का अनुमान लगाते हैं।
‘खरोष्ठी’ की भांति ही ब्राह्मी के विषय में भी व्यक्त ये मत केवल अनुमान पर ही आधारित हैं। ऐसी स्थिति में इनमें किसी को भी सनिश्चय स्वीकार नहीं किया जा सकता। यों पहला मत अन्य की अपेक्षा तर्क-सम्मत लगता है।

ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति

ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति के प्रश्न को लेकर विद्वानों में बहुत विवाद होता आया है। इस विषय में व्यक्त किये गये विभिन्न मत दो प्रकार के हैं। एक के अनुसार ब्राह्मी किसी विदेशी लिपि से संबंध रखती है और दूसरे के अनुसार इसका उद्भव और विकास भारत में हुआ है। यहां दोनों प्रकार के मतों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है।

ब्राह्मी किसी विदेशी लिपि से निकली है -

 इस संबंध में विभिन्न विद्वानों ने अपने अलग-अगल विचार व्यक्त किये हैं, जिनमें प्रमुख हैं-
  1. फ्रेंच विद्वान् कुपेरी का विश्वास है कि ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति चीनी लिपि से हुई है। यह मत सब से अधिक अवैज्ञानिक है। चीनी और ब्राह्मी चिन्ह आपस में सभी बातों में एक दूसरे से इतने दूर हैं कि किसी एक से दूसरे को संबंधित मानने की कल्पना ही हास्यपद है। इस मत की व्यर्थता के कारण ही प्राय: विद्वानों ने इस विषय पर विचार करते समय इसका उल्लेख तक नहीं किया है।
  2. डॉ. अल्फ्रेड मूलर, जेम्स प्रिंसेस तथा सेनार्ट आदि ने यूनानी लिपि से ब्राह्मी को उत्पन्न माना है। सेनार्ट का कहना है कि सिकंदर के आक्रमण के समय भारतीयों से यूनानियों का संपर्क हुआ और उसी समय इन लोगों ने यूनानियों से लिखने की कला सीखी। पर, जैसा कि बूलर तथ डिरिंजर आदि ने लिखा है, सिकंदर के आक्रमण (325 ई.) के बहुत पहले यहां लेखन का प्रचार था2, अतएव यूनानी लिपि से इसका संबंध नहीं जोड़ा जा सकता।
  3. हलवे के अनुसार ब्राह्मी एक मिश्रित लिपि है, जिसके 8 व्यंजन 4थी सदी ई.पू. आर्मेइक लिपि से, 6 व्यंजन, दो प्राथमिक स्वर, सब मध्यवर्ती स्वर और अनुस्वार खरोष्ठी से, तथा 5 व्यंजन एवं तीन प्राथमिक स्वर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यूनानी से लिये गये हैं और यह मिश्रण सिकंदर के आक्रमण (325 ई.पू.) के बाद हुआ है। कहना न होगा कि 4थी ई.पू. एवं सिकंदर के आक्रमण से पूर्व ब्राह्मी लिपि का प्रयोग होता था, अतएव यह मत भी अल्फ्रेड मूलर के मत की भांति ही निस्सार है।
  4. ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति सामी (सेमिटिक) लिपि से मानने के पक्ष में अधिक विद्वान हैं, किन्तु इनमें सभी दृष्टियां से पूर्णत: मतैक्य नहीं है। यहां कुछ प्रधान मत दिये जा रहे हैं।
वेबर, कस्ट, बेनफे तथा जेनसन आदि विद्वान् सामी लिपि की फोनीशियन शाखा से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति मानते हैं। इस मत का मुख्य आधार है कुछ ब्राह्मी और फोनीशियन लिपि-चिन्हो का रूप-साम्य। इसे स्वीकार करने में दो आपत्तियां हैं -
  1. जैसा कि डिरिंजन ने अपनी पुस्तक ‘द अलफाबेट’ में दिखलाया है, जिस काल में इस प्रकार के प्रभाव की सम्भावना हो सकती है, भारत तथा फोनीशियन लोगों के प्रत्यक्ष सम्पर्क के कोई निश्चित और प्रौढ़ प्रमाण नहीं मिलते।
  2. फोनीशियन लिपि से ब्राह्मी क समानता स्पष्ट नहीं है। इसके लिए सबसे बड़ा प्रमाण तो यह है कि यह समानता यदि स्पष्ट होती तो इस संबंध में इस विषय के चोटी के विद्वानों में इतना मतभेद न होता। इस प्रसंग में गौरीशंकर हीराचन्द ओझा का मत ही समीचीन ज्ञात होता है कि दोनों में केवल एक अक्षर (ब्राह्मी ‘ज’ और फोनीशियन ‘गिमेल’) का ही साम्य है। कहना अनुचित न होगा कि एक अक्षर के साम्य के आधार पर इसे बड़ निर्णय को निर्धारित करना वैज्ञानिक नीं कहा जा सकता।
(आ) टेलर तथा सेथ आदि के अनुसार ब्राह्मी लिपि दक्षिणी सामी लिपि से निकली है। डॉ. आर. एन्. साहा ने इसे अरबी से संबंधित माना है। पर सत्य यह है कि इन लिपियों से भारत का पुराना संपर्क था, यह मान लेना न्यायसंगत नहीं लगता कि ब्राह्मी अरबी या दक्षिणी सामी लिपि से निकली है। डीके के अनुसार असीरिया के कीलाक्षरों (क्यूनीफार्म) से किसी दक्षिणी सामी लिपि की उत्पत्ति हुई थी और फिर उससे ब्राह्मी की। इस संबंध में गौरीशंकर हीराचंद ओझा का मतपूर्णत: न्यायोचित लगता है कि रूप की विभिन्नता के कारण कीलाक्षरों से न तो किसी सामी लिपि के निकलने की संभावना है और न तो सामी से ब्राह्मी की।

(इ) कुछ लोग उत्तरी सामी लिपि से ब्राह्मी की उत्पत्ति मानते हैं। इस मत के समर्थकों में प्रधान नाम बूलर का लिया जाता है। यों बेवर, बेनफे, पाट, वेस्टरगार्ड, àिटने तथा विलियम जोन्स आदि अन्य लोगों के भी इनसे बहुत भिन्न मत नहीं है।
बूलर का कहना है कि हिन्दुओ ने उत्तरी सामी लिपि के अनुकरण पर कुछ परिवर्तन के साथ अपने अक्षरों को बनाया। परिवर्तन से उसका आशय यह है कि कहीं लकीर को कुछ इधर-उधर हटा दिया जैसे ‘अलीफ़’ से ‘अ’ करने में- जहां लकीर न थी वहां नई लकीर बना दी, जैसे जाइन से ‘ज’ बनाने में, कहीं-कहीं लकीरें मिटा दीं जैसे ‘हेथ’ को ‘घ’ करने में- और इसी प्रकार कहीं नीचे लटकती लकीर ऊपर घुमा दी, कहीं तिरछी लकीर सीधी कर दी, कहीं आड़ी लकीर खड़ी कर दी, कहीं ित्राकोण को धनुषाकार बना दिया और कहीं कोण को अर्द्धवृत्त या कहीं लकीर को काटकर छोटी या बड़ी कर दी तो कहीं और कुछ। आशय है कि जहां जो परिवर्तन चाहा कर लिया। यहां दो बातें कहनी हैं:
  1. इतना करने पर भी बूलर को 7 अक्षरों [दालेथ (द) से ‘घ’, हेष (ह) से ‘ध’, तेथ से ‘थ’, सामेख (स) से ‘ष’ फे (फ) से ‘प’, त्साधे से ‘च’ तथा काफ (क) से ‘ख’, की उत्पत्ति ऐसे अक्षरों से माननी पड़ीं, जो उच्चारण में भिन्न है। 
  2. बूलर ने जिस प्रकार के परिवर्तनों के आधार पर ‘अलेफ’ से ‘अ’ या इसी प्रकार अन्य अक्षरों की उत्पत्ति सिद्ध की है यदि कोई चाहे तो संसार की किसी भी लिपि को किसी अन्य लिपि से निकली सिद्ध कर सकता है। उदाहरण के लिए ‘क’ अक्षर से यदि अंग्रेजी ज्ञ को निकला सिद्ध करना चाहें तो कह सकते हैं कि बनाने वाले के क के बार्इं ओर के गोल हटाकर ऊपर की शिरोरेखा तिरछी कर दी और ज्ञ बन गया इसी प्रकार ब्राह्मी के अ-का मुँह फेरकर सीधी रेखा को जरा हटा दिया और उत्तरी सामी का अलेफ- बन गया। इस तरह जैसा कि ओझा जी ने लिखा है अंग्रेजी । से ब्राह्मी अ- या D से ब्राह्मी n का निकलना सिद्ध किया जा सकता है।
बूलर ने इस द्रविण-प्राणायम के आधार पर यह सिद्ध किया कि ब्राह्मी के 22 अक्षर उत्तरी सामी से, कुछ प्राचीन फोनीशीय लिपि से, कुछ मेसा के शिलालेख से तथा 5 असीरिया के बाटों पर लिखित अक्षरों से लिये गये। इधर डॉ. डेविड डिरिंजर ने अपनी ‘द अलफाबेट’ नामक पुस्तक में बूलर का समर्थन करते हुए ब्राह्मी को उत्तरी सामी लिपि से उत्पन्न माना है।

उत्तरी सामी से ब्राह्मी के उत्पन्न होने के लिए प्रधान तर्क ये दिये जाते हैं-
  1. दोनों लिपियों में साम्य है।
  2. भारत में सिंधु घाटी में जो प्राचीन लिपि मिली है व चित्रात्मक या भावध्वनि-मूलक लिपि है, और उससे वर्णात्मक या अक्षरात्मक लिपि नहीं निकल सकती।
  3. ब्राह्मी प्राचीन काल में सामी की भांति ही दायें से बायें को लिखी जाती थी।
  4. भारत में 5वीं सदी ई.पू. के पहले की लिपि के नमूने नहीं मिलते।
यहां एक-एक करके इन तर्कों पर विचार किया जा रहा है।
  1. दोनों लिपियों में प्रत्यक्ष साम्य बहुत ही कम है। ऊपर हम लोग देख चुके हैं कि किस प्रकार तरह-तरह के परिवर्तनों तथा द्रविण-प्राणायाम के आधार पर बूलर ने दोनों लिपियों के अक्षरों में साम्य स्थापित किया है। साथ ही हम लोग यह भी सिद्ध कर चुके हैं कि इस प्रकार यदि साम्य सिद्ध करने पर कोई तुल ही जाय तो संसार की किसी भी दो लिपि में थोड़ा-बहुत साम्य सिद्ध किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में यह आरोपित साम्य दोनों में संबंध सिद्ध करने के लिए पूर्णतया अपर्याप्त है।
  2. जहां तक दूसरे तर्क का प्रश्न है, दो बातें कहीं जा सकती हैं। एक तो यह कि यह कहना पूर्णतया भ्रामक है कि चित्रात्मक लिपि या चित्र-भाव-मूलक लिपि का भाव-ध्वनि-मूलक लिपि से वर्णात्मक लिपि का विकास ही नहीं होता। प्राचीन काल में संसार की सभी लिपियां चित्रात्मक थीं और उनसे ही वर्णात्मक लिपियों का विकास हुआ।1 दूसरे यह कि सिंधु घाटी की लिपि पूर्णतया चित्र-लिपि नहीं है। पीछे हम देख चुके हैं कि उसमें कुछ तो चित्र हैं, पर साथ ही कुछ ऐसे ही चिन्ह हैं जिन्हें चित्र कहकर लिपि-चिन्ह कहना अधिक युक्ति-संगत होगा। जैसा कि डिरिंजर ने लिखा है यह भाव और ध्वनि के बीच में थी अर्थात् भाव-ध्वनिमूलक लिपि थी। ऐसी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी की लिपि से ब्राह्मी लिपि का विकास संभव नहीं है। संभव है कल कोई टूटी कौड़ी मिल जाय और सिंधु घाटी की लिपि से ही ब्राह्मी की उत्पत्ति सिद्ध हो जाय। यों यदि ध्यान से सिंधु घाटी की लिपि तथा ब्राह्मी को देखा जाय तो दोनों के कई चिन्हो में पर्याप्त साम्य है, और वह बूलर द्वारा उत्तरी सामी और ब्राह्मी में आरोपित साम्य से कहीं अधिक युक्ति-युक्त और तर्कसंगत है।
  3. तीसरे तर्क में उत्तरी सामी से ब्राह्मी को निकली मानने वालों ने कहा है कि सामी दायें से बायें को लिखी जाती है, और पुरानी ब्राह्मी के भी कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें वह बायें से दायें न लिखी जाकर दायें से बायें को लिखी गई है। इसका आशय है कि सामी से निकली होने के कारण ब्राह्मी मूलत: दायें से बायें को लिखी जाती थी।
ब्राह्मी के उदाहरण जो दायें से बाये लिखे मिले हैं,
  1. अशोक के अभिलेखों के कुछ अक्षर
  2. मध्य प्रदेश के एरण स्थान में प्राप्त सिक्के का लेख।
  3. मद्रास के यरगुड़ी स्थान में प्राप्त अशोक का लघु शिलालेख।
बूलर के सामने इनमें केवल प्रथम दो थे। तीसरा बाद में मिला है।

‘क’ के संबंध में यह कहना कि इसके उदाहरण बहुत थोड़े हैं जब कि इसके समकालीन लेखों में बायें से दायें लिखने के उदाहरण इससे कई गुने अधिक हैं। जैसा कि ओझा जी का अनुमान है यह लेखक की असावधानी के कारण हुआ ज्ञात होता है या संभव है देश-भेद के कारण इस प्रकार का विकास हो गया हो जैसे छठीं सदी के यशोधर्मन के लेख में ‘उ’ नागरी के ‘उ’ सा मिलता है, पर उसी सदी के गारुलक सिंहादित्य में दानपत्रा में ठीक उसके उलटा। बंगला का ‘च’ भी पहले बिल्कुल उल्टा लिखा जाता था। अतएव कुछ उल्टे अक्षरों के आधार पर लिपि की उल्टी लिखी जाने वाली (दायें से बायें) मानना उचित नहीं कहा जा सकता।

‘ख का संबंध सिक्के से है। किसी सिक्के पर अक्षरों का उलटे खुद जाना आश्चर्य नहीं। ठप्पे की गड़बड़ी के कारण प्राय: ऐसा हो जाता है। सातवाहन (आंध्र) वंश के राजा शातकण्र्ाी के भिन्न प्रकार के दो सिक्कों पर ऐसी अशुद्धि मिलती है। इसी प्रकार पार्थिअन् अब्दगसिस के एक सिक्के पर का खरोष्ठी का लेख भी उलट गया है। और भी इस प्रकार के उदाहरण हैं। इसी कारण प्रसिद्ध पुरातत्वेत्ता फ्लीट ने बुलर के इस तर्क को अर्थहीन माना है।

‘ग’ के संबंध में विचित्रता यह है कि इसमें एक पंक्ति बायें से दायें को लिखी मिलती हैं तो दूसरी दायें से बाएं और आगे भी इसी प्रकार परिवर्तन होता गया है। इससे ऐसा लगता है कि लिखने वाला नये प्रयोग या खिलवाड़ की दृष्टि से प्रयोग कर रहा था। यदि वह दायें से बायें लिखने के किसी निश्चित सिद्धांत का पालन करता तो ऐसा न होता। पूरा लेख एक प्रकार का होता।

इन सारी बातों को देखने से स्पष्ट हुए बिना नहीं रहता कि इन थोड़े से अपवाद स्वरूप प्राप्त और अशुद्धियों या नये प्रयोगों पर आश्रित उदाहरणों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि पहले ब्राह्मी दायें से बायें को लिखी जाती थी। चौथा तर्क भी महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता। जब तक उत्तरी भारत के सभी संभाव्य स्थलों की पूरी खुदाई नहीं हो जाती यह नहीं कहा जा सकता कि इससे पुराने शिलालेख नहीं हैं। साथ ही साहित्यिक प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि इससे बहुत पूर्व2 से भारत में लिखने का प्रचार था। यह बहुत संभव है कि आर्द्र जलवायु तथा नदियों की बाढ़ आदि के कारण पुरानी लिखित सामग्री जो भोजपत्रा आदि पर रही हो सड़-गल गई हो।
इस प्रकार उत्तरी सामी से ब्राह्मी का संबंध संभव नहीं है।

ब्राह्मी को किसी विदेशी लिपि से संबद्ध सिद्ध करने वालों में प्रधान के मतों का विवेचन यहां किया गया, और इससे स्पष्ट है कि ऐसा कोई भी पुष्ट प्रमाण अभी तक नहीं मिला है, जिसके आधार पर ब्राह्मी को किसी विदेशी लिपि से निकली सिद्ध किया जा सके।

इसी प्रकार कुछ और लोगों ने कुछ और लिपियों से ब्राह्मी को संबद्ध माना है। संक्षेप में इन विभिन्न विद्वानों के अनुसार ब्राह्मी, चीनी, आर्मेइक, फोनीशियन, उत्तरी सेमिटिक, दक्षिणी सेमिटिक, मिòी, अरबी, हिमिअरेटिक क्यूनीफार्म, हड्रमांट या ओर्मज की किसी अज्ञात लिपि या सेअिबन आदि से मिलती-जुलती तथा सम्बद्ध है।

इस प्रसंग में सीधी बात यह कही जा सकती है कि इस क्षेत्रा में काम करने वाले उच्च श्रेणी के विद्वानों ने ब्राह्मी लिपि से इन विभिन्न प्रकार की लिपियों से समता देखी है और संबद्ध सिद्ध करने का प्रयास किया है। यदि इन विभिन्न लिपियों में किसी एक से भी स्पष्ट और यथर्थ साम्य होता है तो इस विषय में इतने मतभेद न होते। इन विद्वानों में इतना अधिक मतभेद यही सिद्ध करता है कि यथार्थत: इनमें विद्वानों को दूर की कौड़ी लानी पड़ी है। ऐसी स्थिति में यह निष्कर्ष निकालना अनुचित नहीं कहा जा सकता है कि ब्राह्मी ऊपर गिनाई गई लिपियों में किसी से भी नहीं निकली है।

ब्राह्मी की उत्पत्ति भारत में हुई है

इस वर्ग में कई मत हैं, जिन पर यहां अलग विचार किया जा रहा है।

1. द्रविड़ीय उत्पत्ति: एडवर्ड थामस तथा कुछ अन्य विद्वानों का यह मत है कि ब्राह्मी लिपि के मूल आविष्कारक द्रविड़ थे। डॉ. राजबली पांडेय ने इस मत को काटते हुए लिखा है कि द्रविड़ों का मूल स्थान उत्तर भारत न होकर दक्षिण भारत है परब्राह्मी लिपि के पुराने सभी शिलालेख उत्तर भारत में मिले हैं। यदि इसके मूल आविष्कर्त्ता द्रविड़ होते हो तो इसकी सामग्री दक्षिण भारत में भी अवश्य मिलती। साथ ही उनका यह भी कहना है कि द्रविड़ भाषाओं में सबसे प्राचीन भाषा तमिल हैं और उसमें विभिन्न वर्गों के केवल प्रथम एवं पंचम वर्ण ही उच्चरित होते हैं, पर ब्राह्मी में पांचों वर्ग मिलते ैं। यदि ब्राह्मी मूलत: उनकी लिपि होती तो इसमें भी केवल प्रथम और पंचम वर्ण ही मिलते।

किसी ठोस आधार के अभाव में यह कहना तो सचमुच ही संभव नहीं है कि ब्राह्मी के मूल-आविष्कर्ता द्रविड़ ही थे, पर पांडेय जी के तर्क भी बहुत युक्ति-संगत नहीं दृष्टिगत होते। यह संभव है कि द्रविड़ों का मूल स्थान दक्षिण में रहा हो पर यह भी बहुत-से विद्वान मानते हैं कि वे उत्तर भारत में भी रहते थे और हड़प्पा और मोहन-जो-दड़ो जैसे विशाल नगर उनकी उच्च संस्कृति के केन्द्र थे। पश्चिमी पाकिस्तान में ब्राहुई भाषा का मिलना (जो द्रविड़ भाषा ही है) भी उनके उत्तर भारत में निवास की ओर संकेत करता है। बाद में संभवत: आर्यों ने अपने आने पर उन्हें मार भगाया और उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली। पांडेय जी यदि सिंधु-सभ्यता से द्रविड़ों का संबंध नहीं मानते या ब्राहुई भाषा के उस क्षेत्रा में मिलने के लिए कोई अन्य कारण मानते है, तो उनकी ओर यदि यहां संकेत कर देते तो पाठकों के लिए इस प्रकार सोचने का अवसर न मिलता।

पांडेय जी की दूसरी आपत्ति तमिल में ब्राह्मी से कम ध्वनि होने के संबंध में है। ऐसी स्थिति में क्या यह संभव नहीं है कि आर्यों ने तमिल या द्रविड़ों से उनकी लिपि ली हो और अपनी भाषा की आवश्यकता के अनुकूल उनमें परिवर्द्धन कर लिया हो। किसी लिपि के प्राचीन या मूल रूप का अपूर्ण तथा अवैज्ञानिक होना बहुत संभव है और यह भी असंभव नहीं है कि आवश्यकतानुसार समय-समय पर उसे वैज्ञानिक तथा पूर्ण बनाने का प्रयास किया गया हो। किसी अपूर्ण लिपि से पूर्ण लिपि के निकलने की बात तत्वत: असम्भव न होकर बहुत संभव तथा स्वाभाविक है।

2. सांकेतिक चिन्हो से उत्पत्ति: श्री आर. शाम शास्त्री ने ‘इंडियन एंटीक्वेरी’ जिल्द 35 में एक लेख देवनागरी लिपि की उत्पत्ति के विषय में लिखा था। इनके अनुसार देवताओं की मूर्तियां बनने के पूर्व सांकेतिक चिन्हो द्वारा उनकी पूजा होती थी, ‘जो कई ित्राकोण तथा चक्रों आदि से बने हुए यन्त्रा, जो ‘देवनगर’ कहलाता था के मध्य लिखे जाते थे। देवनगर के मध्य लिखे जाने वाले अनेक प्रकार के सांकेतिक चिन्ह कालांतर में उन-उन नामों के पहले अक्षर माने जाने लगे और देवनगर के मध्य उनका स्थान होने से उनका नाम देवनागरी हुआ। ओझा जी के शब्दों में शास्त्रीजी का यह लेख, गवेषणा के साथ लिखा गया तथा युक्ति-युक्त है, पर जब तक यह न सिद्ध हो जाय कि जिन तांित्रक पुस्तकों से अवतरण दिये हैं वे वैदिक साहित्य से पहले के या काफी प्राचीन हैं, इस मत को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

3. वैदिक चित्र-लिपि से उत्पत्ति: श्री जगमोहन वर्मा ने सरस्वती (1913-15) में एक लेख-माला में यह दिखाने का यत्न किया था कि वैदिक चित्र-लिपि या उससे निकली सांकेतिक लिपि से ब्राह्मी निकली है। पर, इस लेख के चित्र पूर्णतया कल्पित हें, और उनके लिए प्राचीन प्रमाणों का अभाव है, अतएव इनका मत भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

4. आर्य उत्पत्ति: डाउसन, कनिंघम, लासन, थामस तथा डॉसन आदि विद्वानों का मत है कि आर्यों ने ही भारत की किसी पुरानी चित्र-लिपि के आधार पर ब्राह्मी लिपि को विकसित किया।

बूलर ने पहले इसका विरोध करते हुए लिखा था कि जब भारत में कोई चित्र-लिपि मिलती ही नहीं तो चित्र-लिपि से ब्राह्मी के विकसित होने की कल्पना निराधार है। पर संयोग से इधर सिंध की घाटी में चित्र-लिपि मिल गई है, अतएव बूलर की इस आपत्ति के लिए अब कोई स्थान नहीं है, और संभव है कि यह लिपि आर्यों की अपनी खोज हो।

यह तो किसी सीमा तक माना जा सकता है कि भारतीयों ने इस लिपि को जन्म दिया तथा इसका विकास किया पर यह कार्य आर्यों, द्रविड़ों या किसी अन्य जाति के लोगों द्वारा हुआ, यह जानने के लिए आज हमारे पास कोई साधन नहीं है। ओझा जी का यह कथन- ‘‘जितने प्रमाण मिलते हैं, चाहे प्राचीन शिलालेखों के अक्षरों की शैली और चाहे साहित्य के उल्लेख, सभी यह दिखाते हैं कि लेखन-कला अपनी प्रौढ़ावस्था में थी। उनके आरम्भिक विकास का पता नहीं चलता। ऐसी दशा में यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ब्राह्मीलिपि का आविष्कार कैसे हुआ और इस परिपक्व रूप में.....वह किन-किन परिवर्तनों के बाद पहुंची।.. निश्चय के साथ इतना ही कहा जा सकता है कि इस विषय के प्रमाण जहां तक मिलते हैं, वहां तक ब्राह्मी लिपि अपनी प्रौढ़ अवस्था में और पूर्ण व्यवहार में आती हुई मिलती है, पर उसका किसी बाहरी स्त्रोत और प्रभाव से निकलना सिद्ध नहीं होता। उसके कुछ चिन्ह ब्राह्मी से मिलते भी हैं अतएव इस आधार पर इतना और जोड़ा जा सकता है कि यह भी असंभव नहीं है कि ब्राह्मी का विकास सिंधु घाटी की लिपि से हुआ हो। पर, इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहना तभी उचित होगा जब सिंधु घाटी के चिन्हो की ध्वनि का भी पता चल जाय। डॉ. राजबली पांडेय का निश्चित मत है कि सिंधु घाटी की लिपि से ही ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ है, पर तथ्य है कि बिना ध्वनि1 का विचार किये केवल स्वरूप में थोड़ा-बहुत साम्य देखकर दोनों लिपियों को संबद्ध मान लेना वैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता।

ब्राह्मी लिपि का विकास

ब्राह्मी लिपि के प्राचीनतम नमूने 5वीं सदी ई.पू. के मिले हैं। आगे चलकर इसके उत्तरी भारत और दक्षिणी भारत के रूपों में अन्तर होने लगा। उत्तरी भारत के रूप पुराने के समीप थे पर दक्षिणी रूप धीरे-धीरे विकसित होकर भिन्न हो गये। यह लिपि भारत के बाहर भी गई वहां इस के रूपों में धीरे-धीरे कुछ भिन्नताओं का विकास हुआ। मध्य एशिया में ब्राह्मी लिपि के नाम से ही पुकारी जाती है। 350 ई. के बाद इसकी स्पष्ट रूप से दो शैलियां हो जाती हैं-
  1. उत्तरी शैली-इसका प्रचार प्रमुखत: उत्तरी भारत में था।
  2. दक्षिणी शैली-इसका प्रचार प्रमुखत: दक्षिणी भारत में था।
इन्हीं दोनों शैलियों से आगे और चलकर भारत की विभिन्न लिपियों का विकास हुआ, जिनका संिक्षप्त परिचय दिया जा रहा है।

गुप्त लिपि

गुप्त राजाओं के समय (चौथी तथा पांचवी सदी) में इसका प्रचार होने से इसे ‘गुप्त लिपि’ नाम आधुनिक विद्वानों ने दिया है।

कुटिल लिपि

इस लिपि का विकास गुप्त लिपि से हुआ। स्वरों की मात्राओं की आकृति कुटिल या टेढ़ी होने के कारण इसे कुटिल लिपि कहा गया है। नागरी तथा शारदा लिपियां इसी से निकली हैं।

प्राचीन नागरी लिपि

इसका प्रचार उत्तर भारत में 9वीं सदी के अन्तिम चरण से मिलता है। यह मूलत: उत्तरी लिपि है पर दक्षिण भारत में भी कुछ स्थानों पर 8वीं सदी से यह मिलती है। दक्षिण में इसका नाम नागरी न होकर ‘नंदनागरी’ है। आधुनिक काल की नागरी या देवनागरी, गुजराती, महाजनी, राजस्थानी तथा महाराष्ट्री आदि लिपियां इस प्राचीन नागरी के ही पश्चिमी रूप से विकसित हुई हैं और इसके पूर्वी रूप से कैथी, मैथिली तथा बंगला आदि लिपियों का विकास हुआ है। इसका प्रचार 16वीं सदी तक मिलता है।

नागरी लिपि को नागरी या देवनागरी लिपि भी कहते हैं। इसके नाम के संबंध में मत हैं-
  1. गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इसका नाम नागरी है।
  2. प्रमुखत: नगरों में प्रचलित होने के कारण इसे नागरी कहा गया है।
  3. कुछ लोगों के अनुसार ललितविस्तर में उल्लिखित नाग लिपि ही नागरी है, पर यथार्थत: इन दोनों में कोई भी संबंध नहीं है।
  4. तांित्रक चिन्ह देवनगर से साम्य के कारण इसे देवनागरी और फिर नागरी कहा गया है।
  5. आर. शाम शास्त्री के अनुसार ‘देवनगर’1 से उत्पन्न होने के कारण ही यह देवनागरी और फिर नागरी कही गई।
  6. ‘देवनगर’ अर्थात् काशी में प्रचार के कारण यह ‘देवनागरी’ कहलाई।
ये मत कोरे अनुमान पर आधारित है, अतएव किसी को भी बहुत प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। यों दूसरा मत विद्वानों को अधिक मान्य है।

शारदा-लिपि

काश्मीर की अधिष्ठात्राी देवी शारदा कही जाती है, और इसी आधार पर कश्मीर को ‘शारदा मंडल’ तथा वहां की लिपि को ‘शारदा लिपि’ कहते हैं। कुटिल लिपि से ही 10वीं सदी में इसका विकास हुआ और नागरी के क्षेत्रा के उत्तर-पश्चिम में (कश्मीर, सिंधु तथा पंजाब आदि) इसका प्रचार रहा। आधुनिक काल की शारदा, टक्री, लंडा, गुरमुखी, डोग्री, चमेआली तथा कोछी आदि लिपियां इसी से निकली हैं।
अब आधुनिक लिपियों पर विचार किया जा सकता है

टाकरी लिपि

ग्रियर्सन इसे शारदा और लंडा की बहिन मानते हैं, पर बूलर इसे शारदा की पुत्राी मानते हैं। ओझा जी इसे शारदा का घसीट रूप कहा है। इसका नाम टक्की भी है। टक्क लोगों की लिपि होने से इसका नाम टक्की है। महाजनी की तरह इसमें भी स्वरों की कमी है। इधर इसके बहुत-से रूप विकसित हो गये हैं। ‘टाकरी’ शब्द टांक (एक जाति) या ठक्कुरी (ठाकुरों की लिपि) से व्युत्पन्न माना जाता है।

डोग्री लिपि

यह पंजाब की डोग्री भाषा की लिपि है। इसकी भी उत्पत्ति शारदा से हुई है।

चमेआली लिपि

चंबा प्रदेश की चमेआली भाषा की यह लिपि है। देवनागरी की भांति यह पूर्ण लिपि है। यह भी शारदा से निकली है।

मंडेआली लिपि

मंडा तथा सुकेत राज्यों की मंडेआली भाषा की यह लिपि है और शारदा से निकली है।

जौनसारी लिपि

सिरमौरी से मिलती-जुलती ‘जौनसारी’ लिपि पहाड़ी प्रदेश जौनसार की जौनसारी बोली की लिपि है। यह भी शारदा से ही विकसित हुई है।

कोछी लिपि

शारदा से उत्पन्न इस लिपि का प्रयोग शिमला में पश्चिम पहाड़ों में बोली जाने वाली कोछी के लिए होता है। यह लिपि भी अवैज्ञानिक है।

कुल्लुई लिपि

यह भी शारदा से उत्पन्न है। कुल्लू घाटी की बोली कुल्लुई की यह लिपि है।

कश्टवारी लिपि

कश्मीर के दक्षिणपूर्व मे कश्टवार की घाटी की बोली कश्टवारी की लिपि में लिखी जाती है। यह भी शारदा से उत्पन्न है। ग्रियर्सन से इसे टक्की और शारदा के बीच की कड़ी माना है।

लंडा लिपि

पंजाब तथा सिंध के महाजनों की यह लिपि शारदा से निकली है। लवी तथा लहंदा भाषा इसमें लिखी जाती है। यह भी महाजनी लिपि की भांति अपूर्ण है। इसके कई स्थानीय भेद विकसित हो गये हैं। ‘लंडा’ शब्द का संबंध ‘लहंदा’ से है।

मुल्तानी लिपि

लहंदा की प्रमुख बोली ‘मुल्तानी’ की यह लिपि ‘लंडा’ लिपि से ही विकसित है।

वानिको लिपि

वानिको या बनिया, ‘लंडा’ का सिंध में प्रचलित नाम है। अब केवल वहां के हिन्दू ही इसका प्रयोग करते हैं। मुसलमानों ने फारसी लिपि को कुछ परिवर्तन-परिवर्धन के साथ अपना लिया है।

गुरुमुखी लिपि

लंडा लिपि को सुधार कर सिक्खों के दूसरे गुरु अंगद ने यह लिपि 16वीं सदी में बनाई। सिक्खों में इस लिपि का विशेष प्रचार है।

नागरी लिपि

प्राचीन नागरी या नागर लिपि से ही इसका विकास हुआ है। यह वैज्ञानिक तथा पूर्ण लिपि है। यों भाषा-विज्ञान की ध्वनि-विषयक सूक्ष्मताओं की दृष्टि से इसे बहुत वैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता। इसीलिए सुभाष बाबू तथा डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी आदि बहुत-से विद्वान् इसे छोड़कर रोमन लिपि को अपना लेने के पक्ष में रहे हैं। पूरे हिन्दी प्रदेश की यह लिपि है। मराठी भाषा में भी कुछ परिवर्धन-परिवर्तन के साथ यह प्रयुक्त होती है। नेपाली, संस्कृत, पालि, प्राकृत तथा अपभ्रंश के लिए भी यही लिपि प्रयुक्त होती है।

नागरी लिपि पूर्ण वैज्ञानिक नहीं है। हिंदी की दृष्टि से उसकी प्रधान कमियां हैं -
  1. इसमें कुछ अक्षर या लिपिचिन्ह आज के उच्चारण की दृष्टि से व्यर्थ हैं ‘ऋ’ का उच्चारण ‘रि’ है, ‘ण’ का ‘ड़ँ’ है और ‘प’ का ‘श’। अतएव ऋ, ण और ण् की आवश्यकता नहीं है।
  2. ख में र व के भ्रम की सम्भावना है, अत: इसके लिए दूसरे चिन्ह की आवश्यकता है।
  3. संयुक्त व्यंजनों के रूपों में बड़ी गड़बड़ी है। जैसे ‘प्रेम’ में लगता है कि र् आधा है और ‘प’ पूरा है पर यथार्थत: बात इसके उल्टी है। क्र, ग्र, ध्र, ट्र, ड्र, ब्र तथा म्र आदि में यही बात है। इस पद्धति में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है।
  4. इ की मात्रा ‘‘ि बड़ी अवैज्ञानिक है। इसे जिस स्थान पर लगाया जाना चाहिए, लगाना संभाव नहीं है। उदाहरणार्थ ‘चन्द्रिका’ शब्द लें। इसे तोड़कर इस प्रकार लिख सकते हैं-च्+अ्++िन्+द्+र्+क्+आ। यहां स्पष्ट है कि मात्रा न् के पहले लगी है पर यथार्थत: इसे र् के बाद लगना चाहिए। रोमन में इसे शुद्ध लिखा जाता है-CANDRIKA।। इस अशुद्धि के निवारण के लिए कोई रास्ता निकलना चाहिए।
  5. रकार के र, ,/, ्र,र् 4 रूप हैं। इनमें तीन को निकाल कर एक रूप में प्रचलन की आवश्यकता है। 
  6. क्ष, त्रा, ज्ञ आदि स्वतन्त्रा लिपि-चिन्हो की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ये स्वतन्त्रा ध्वनियां न होकर संयुक्त व्यंजन मात्रा हैं।
  7. न्ह, म्ह, तथ ल्ह (ये संयुक्त व्यंजन न होकर स्वतन्त्रा ध्वनियां हैं) आदि कुछ नवीन ध्वनियां भी हिन्दी में आ गई हैं। अतएव इनके लिए स्वतन्त्रा चिन्ह आवश्यक हैं
  8. उ, ऊ, ए, ऐ की मात्राएं नीचे या ऊपर लगती हैं, पर यथार्थत: इन्हें व्यंजन के आगे लगना चाहिए। इसके लिए भी कोई रास्ता निकालना चाहिए।
  9. कुछ अक्षरों के दो रूप प्रचलित हैं-ल ल; अ अ; राा ण। इनमें एक को स्वीकार करने तथा दूसरे को निकाल देने की आवश्यकता है।
इन कमियों को दूर करने के लिए सुधार के प्रस्ताव बहुत दिनों से आ रहे हैं। विद्वानों द्वारा वैयक्तिक रूप से तथा नागरी प्रचारिणी सभा काशी एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलन आदि संस्थाओं द्वार किये गये प्रयासों के फलस्वरूप कुछ उपयोगी एवं व्यवहार्य सुधार सामने आये, पर इनमें किसी को भी लोगों ने नहीं अपनाया। उत्तर प्रदेशीय सरकार तथा केन्द्रीय सरकार ने भी कुछ सुधार किये हैं, किन्तु इन सुधारों का भी स्वागत नहीं हो रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि सौन्दर्य, वैज्ञानिकता तथा सरलता इन तीनों की दृष्टि में रखकर इस प्रश्न पर फिर से विचार किया जाय और नागरी लिपि हर दृष्टि से पूर्ण बनाने वाले सुधारों को स्वीकार किया जाय।

आधुनिक नागरी लिपि तथा उसके अंकों का ब्राह्मी से (उसकी उत्तरी शैली, गुप्त लिपि तथा कुटिल लिपि में होते) कैसे विकास हुआ है,

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