लिपि की उत्पत्ति और विकास

अनुक्रम

लिपि की उत्पत्ति

भाषा की उत्पत्ति की भांति ही लिपि की उत्पत्ति के विषय में भी पुराने लोगों का विचार था कि ईश्वर या किसी देवता द्वारा यह कार्य सम्पन्न हुआ। भारतीय पंडित ब्राह्मी लिपि को ब्रह्मा की बनाई मानते हैं और इसके लिए उनके पास सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि लिपि का नाम ‘ब्राह्मी’ है। इसी प्रकार मिस्री लोग अपनी लिपि का कर्ता थाथ (Thoth) या आइसिस (Isis) बेबिलोनिया के लोग नेबो (Nebo) को, पुराने ज्यू लोग मोजेज (Moses) को तथा यूनानी लोग हर्मेस (Hermes) को पैलमीडप, प्रामेथ्यूस, आफ्र्फुस तथ लिनोज् आदि अन्य पौराणिक व्यक्तियों को मानते हैं। पर, भाषा की लिपि के संबंध में भी इस प्रकार के मत अन्ध् ाविश्वास मात्रा हैं। तथ्य है कि मनुष्य ने अपनी आवश्यकतानुसार लिपि को स्वयं जन्म दिया।

आरम्भ में मनुष्य ने इस दिशा में जो कुछ भी किया वह इस दृष्टि से नहीं किया गया था कि उससे लिपि विकसित हो, बल्कि जादू-टोने के लिए कुछ रेखाएं खींची गई या धार्मिक दृष्टि से किसी देवता का प्रतीक या चित्र बनाया गया, या पहचान के लिए अपने-अपने घड़े या अन्य चीजों पर कुछ चिन्ह बनाये गये, ताकि बहुतों की ये चीजें जब एक स्थान पर रखी जायं, तो लोग सरलता से अपनी चीजें पहचान सकें या सुन्दरता के लिए कंदराओं की दीवालों पर आसपास के जीव-जन्तुओं चा वनस्पतियों को देखकर उनके टेढ़े-मेढ़े चित्र बनाये गये।’ या स्मरण के लिए किसी रस्सी या पेड़ की छाल आदि में गांठे लगार्इं गर्इं और बाद में इन्हीं साधनों का प्रयोग अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए किया गया और वह धीरे-धीरे विकसित होकर लिपि बन गर्इं

लिपि का विकास

आज तक लिपि के संबंध में जो प्राचीनतम सामग्री उपलब्ध है, उस आधार पर कहा जा सकता है कि 4,000 ई.पू. के मध्य तक लेखन की किसी भी व्यवस्थित पद्धति का कहीं भी विकास नहीं हुआ था और इस प्रकार के प्राचीतम अव्यस्थित प्रयास 10,000 ई.पू. से भी कुछ पूर्व किये गये थे। इस प्रकार इन्हीं दोनों के बीच, अर्थात् 10,000 ई.पू. और 4000 ई.पू. के बीच लगभग 6,000 वर्षों में धीरे-धीरे लिपि का प्रारम्भिक विकास होता रहा।
लिपि के विकास-क्रम में आने वाली विभिन्न प्रकार की लिपियां
  1. चित्रलिपि
  2. सूत्रलिपि
  3. प्रतीकात्मक लिपि
  4. भावमूलक लिपि
  5. भाव-ध्वनिमूलक लिपि
  6. ध्वनिमूलक लिपि

चित्रलिपि

चित्र-लिपि ही लेखन के इतिहास की पहली सीढ़ी है। पर, वे प्रारम्भिक चित्र केवल लेखन के इतिहास के आरम्भिक प्रतिनिम्भिा थे, यह सोचना गलत होगा। उन्हीं चित्रों में चित्रकला के इतिहास का भी आरम्भ होता है, और लेखन के भी इतिहास का उस काल के मानव ने कंदराओं की दीवालों पर या अन्य चीजों पर वनस्पति, मानव शरीर या अंग तथा ज्यामितीय शक्लों आद के टेढ़े-मेढ़े चित्र बनाये होंगे। यह भी संभव है कि कुछ चित्र धार्मिक कर्मकाण्डों के हेतु देवी-देवताओं के बनाये जाते रहे हों। इस प्रकार के पुराने चित्र दक्षिणी फ्रांस, स्पेन, क्रीट, मेसोपोटामिया, यूनान, इटली, पुर्तगाल, साइबेरिया-उजबेकिस्तान, सीरिया, मिस्र, ग्रेटब्रिटेन, केलिर्फोनिया, ब्राजील, तथा ऑस्ट्रेलिया आदि अनेकानेक देशों में मिले हैं। ये पत्थर, हड्डी, काठ, सींग, हाथीदांत, पेड़ की छाल, जानवरों की खाल तथा मिट्टी के बर्तन आदि पर बनाए जाते थे।

चित्रलिपि में किसी विशिष्ट वस्तु के लिए उसका चित्र बना दिया जाता था, जैसे सूर्य के लिए गोला या गोला और उसके चारों ओर निकलती रेखाएं, विभिन्न वस्तुओं के लिए उनके चित्र, आदमी के लिए आदमी का चित्र तथा उसके विभिन्न अंगों के लिए उन अंगों के चित्र आदि। चित्रलिपि की परम्परा उस प्राचीन काल से आज तक किसी न किसी रूप में चली आ रही है। भौगोलिक नक्शों में मंदिर, मस्जिद, बाग तथा पहाड़ आदि तथा पंचांगों में ग्रह आदि चित्रों द्वारा ही प्रकट किये जाते हैं।

प्राचीन काल में चित्र लिपि बहुत ही व्यापक रही होगी, क्योंकि इसके आधार पर किसी भी वस्तु का चित्र बनाकर उसे व्यक्त कर सकते रहे रह होंगे। इसे एक अर्थ में अन्तर्राष्ट्रीय लिपि भी माना जा सकता है, क्योंकि किसी भी वस्तु या जीव का चित्र सर्वत्रा प्राय: एक-सा ही रहेगा, और उसे देखकर विश्व का कोई भी व्यक्ति जो उस वस्तु या जीव से परिचित होगा, उसका भाव समझ जाएगा और इस प्रकार उसे पढ़ लेगा। पर यह तभी तक संभव रहा होगा जब तक चित्र मूल रूप में रहे होंगे।

चित्रलिपि की कठिनाइयाँ

  1. व्यक्तिवाचक संज्ञाओं को व्यक्त करने का इसमें कोई साधन नहीं था। आदमी का चित्र तो किसी भी प्रकार कोई बना सकता था, पर राम, मोहन और माधव का पृथक्-पृथक् चित्र बनाना साधारणतया संभव नहीं था। 
  2. स्थूल वस्तुओं का प्रदर्शन तो संभव था, पर भावों या विचारों का चित्र संभव न था। कुछ भावनाओं के लिये चित्र अवश्य बने थे, जिन्हें हम आगे देखेंगे, पर सब का इस प्रकार प्रतीकात्मक चित्र बनाना स्वाभाविक नहीं था।
  3. शीघ्रता मे ये चित्र नहीं बनाये जा सकते थे।
  4. कुछ लोग ऐसे भी रहे होंगे जो सभी वस्तुओं के चित्र बनाने में अकलाकर प्रवृत्ति के होने के कारा समर्थ न रहे होंगे। ऐसे लोगों को और भी कठिनाई पड़ती रही होगी।
  5. काल आदि के भावों को व्यक्त करने के साधनों का इस लिपि मे एकान्त अभाव था। 
चित्र लिपि विकसित होते-होते प्रतीकात्मक हो गई। उदाहरणार्थ यदि आरम्भ में पहाड़ किसी और प्रकार बनता था तो धीरे-धीरे लोग उसे दूसरी तरह बनाने लगे। दूसरे शब्दों में उसका रूप घिस गया। शीघ्रता में लिखने के कारण संक्षेप में होने लगा। चीनी लिपि का विचार करते समय इस प्रकार चिन्हो के प्रतीक बन जाने के और भी उदाहरण हमे मिलेंगे। इस तरह धीरे-धीरे चित्र लिपि के सभी चित्र प्रतीकात्मक हो गये होंगे। इस रूप में चित्र लिपि को विश्व भर में समझी जाने की क्षमता समाप्त हो गई होगी और विभिन्न संजीव और निर्जीव वस्तुओं के चित्र उन वस्तुओं के स्वरूप के आधार पर बनकर विकसित चिन्हो के रूप में बनने लगे होगे। यहां वह अवस्था आ गई होगी जब इन प्रतीकात्मक या रुढ़ि-चिन्हो को याद रखने की आवश्यकता पड़ने लगी होगी।

सूत्र लिपि

सूत्र लिपि का इतिहास भी बहुत पुराना है। इसकी परम्परा प्राचीन काल से आज तक किसी न किसी रूप में चली आ रही है। स्मरण के लिए आज भी लोग रूमाल आदि में गांठ देते हैं। सालगिरह या वर्षगांठ में भी वहीं परम्परा अक्षुण्ण है। प्राचीन काल में सूत्र, रस्सी तथा पेड़ों की छाल आदि में गांठ दी जाती थी। किसी बात को सूत्र में रखने या सूत्र‘ यादकर पूरी बात को याद रखने की परम्परा का भी संबंध इसी से ज्ञात होता है।

सूत्रों में गांठ आदि देकर भाव व्यक्त करने की परम्परा भी काफी प्राचीन है। इस आधार पर भाव कई प्रकार से व्यक्त किये जाते रहे हैं, जिनमें प्रधान निम्नांकित है-

क. रस्सी में रंग-बिरंगे सूत्र बांधकर। ख. रस्सी को रंग-बिरंगे रंगों से रंग कर। ग. रस्सी या जानवरों की खाल आदि में भिन्न-भिन्न रंगों के मोती, घोंघे, मूंगे या मनके आदि बांधकर। घ. विभिन्न लम्बाइयों की रस्सियों से। ड़ विभिन्न मोटाइयों के रस्सियों से। च. रस्सी में तरह-तरह की तथा विभिन्न दूरियों पर गांठें बांधकर। छ. डंडे में भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न मोटाइयों या रंगों की रस्सी बांध कर।

इस तरह के लेखन का उल्लेख, 5वीं सदी के ग्रंथकार हेरौडोटस ;498द्ध ने किया है। इस प्रकार का सर्वश्रेष्ठ उदाहण पीरू की ‘क्वीपू’ है।

‘क्वीपू’ में भिन्न-भिन्न लम्बाइयों, मोटाइयों तथा रंगों के सूत (जो प्राय: बटे ऊन के होते थे) लटकाकर भाव प्रकट किये जाते थे। कहीं-कहीं गांठें भी लगाई जाती थी। इनके द्वारा गणना की जाती थी तथा ऐतिहासिक घटनाओं का भी अंकन होता था।

पीरू के सैनिक अफसर इस लिपि का विशेष प्रयोग करते थे। इसके माध्यम से सेना का एक वर्णन आज भी प्राप्त है, पर उसे पढ़ने या समझने का कोई साधन नहीं है। चीन तथा तिब्बत में भी प्राचीनकाल में सूत्र लिपि का व्यवहार होता था। बंगाल के संथालों, तथा कुछ जापानी द्वीपों आदि में अब भी सूत्र लिपि कुछ रूपों में प्रयोग में आती रही है। टंगानिका के मकोन्दे लोग छाल की रस्सियों में गांठ देकर बहुत दिनों वे घटनाओ तथा समय की गणना करते आये हैं।

भावाभिव्यक्ति की प्रतीकात्मक पद्धति या प्रतीकात्मक लिपि

शुद्ध अर्थ में लिपि न होते हुए भी, इस रूप में कि आंख के सहारे दूरस्थ व्यक्ति के विचार भी उनके द्वारा भेजी गई वस्तुओं के द्वारा जाने जा सकते हैं, यह पद्धति लिपि कही जा सकती है। कई देशों और कबीलों में प्राचीन काल से इसका प्रचार मिलता है। तिब्बती-चीनी सीमा पर मुर्गी के बच्चे का कलेजा, उसकी चर्बी के तीन टुकड़े तथा एक मिर्च लाल कागज में लपेटकर भेजने का अर्थ रहा है कि युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। गार्ड का लाल या हरी झंडी दिखलाना, युद्ध में सफेद रंग झंडा फहराना तथा स्काउटों का हाथ से बात-चीत करना भी इसी के अंतर्गत आ सकता है। गूंगे-बहरों के वार्तालाप का आधार भी कुछ इसी प्रकार का साधन है। फतेहपुर जिले में ब्राह्मण तथा क्षित्राय आदि उच्च जातियों में लड़की के विवाह का निमंत्राण हल्दी भेजकर तथा लड़के के विवाह का निमंत्राण सुपारी भेजकर दिया जाता है। भोजपुर प्रदेश में अहीर आदि जातियों में हल्दी बांट कर निमंत्राण देते हैं। इलाहाबाद के आसपास छोटी जाति के लोगों में गुड़ बांटकर निमंत्राण देते हैं। कुछ स्थानों पर किसी की मृत्यु-संस्कार में भाग लेने के लिए आने वाला निमंत्राण पत्रा कोने पर फाड़कर भेजा जाता है। इस प्रकार विचाराभिव्यक्ति के साधन और स्थानों पर भिन्न-भिन्न प्रकार के मिलते हैं। कांगो नदी की घाटी में कोई हरकारा जब कोई महत्त्वपूर्ण समाचार लेकर किसी के पास जाता था तो भेजने वाला उसे एक केले की पत्ती दे देता था। यह पत्ती 6 इंच लंबी होती थी और दोनों और पत्ती के चार-चार भाग किये रहते थे। कम महत्त्व के समाचार के साथ चाकू या भाले आदि भेजे जाते थे। सामान्य समाचारों के साथ कुछ भी नहीं भेजा जाता था।

कहना न होगा कि लिपि के अन्य रूपों की भांति यह बहुत व्यापक नहीं है और इसका प्रयोग बहुत ही सीमित है।

भावमूलक लिपि

भावमूलक लिपि चित्र लिपि का ही विकसित रूप है। चित्रलिपि में चित्र वस्तुओ को व्यक्त करते थे, पर भावलिपि में स्थूल वस्तुओं के अतिरिक्त भावों को भी व्यक्त करते हैं। उदाहरणार्थ चित्र लिपि में सूर्य के लिए एक बोला बनाते थे पर भावमलक लिपि में यह गोला सूर्य के अतिरिक्त सूर्य से संबद्ध अन्य भावों को भी व्यक्त करने लगा, जैसे सूर्य देवता, गर्मी, दिन तथा प्रकाश आदि। इसी प्रकार चित्रलिपि में पैर का चित्र पैर को व्यक्त करता था पर भावमूलक लिपि में यह चलने का भी भाव व्यक्त करने लगा। कभी-कभी चित्र लिपि के दो चित्रों को एक में मिलाकर भी भावमूलक लिपि में भाव व्यक्त किये जाते हैं। जैसे दु:ख के लिए आंख का चित्र और उससे बहता आंसू, या सुनने के लिए दरवाजे का चित्र और उसके पास कान। भावमूलक लिपि के उदाहरण उत्तरी अमेरिका, चीन तथा पश्चिमी अफ्रीका आदि में मिलते हैं।

इस लिपि के द्वारा बड़े-बड़े पत्रा आदि भी भेजे जाते हैं। इस प्रकार यह बहुत ही समुन्नत रही है। इसका आधुनिक काल का एक मनोरंजक उदाहरण यहां दिया जा रहा है। उत्तरी अमेरिका के एक रेड इंडियन सरदार ने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के प्रेसिडेंट के यहां एक पत्रा अपनी भावमूलक लिपि में भेजा। पत्रा मूलत: रंगीन था पर वहां उसका स्केच मात्रा दिया जा रहा है। इसमें जो अंक दिये गये हैं वे मूल पत्रा में नहीं थे। समझने के लिए ये दे दिये गये हैं। पत्रा पाने वाला (नं. 8) व्हाइट हाउस में प्रेसिडेंट है। पत्रा लिखने वाला ;1द्ध उस कबीले का सरदार है, जिसका गणचिन्ह (टोटेम) गरुड़ है। उसके सर पर दो रेखाएं यह स्पष्ट कर रही हैं कि वह सरदार है। उसका आगे बढ़ा हुआ हाथ यह प्रकट कर रहा है कि वह मैत्राी-संबंध स्थापित करना चाहता है। उसके पीछे उसी के कबीले के चार सिपाही हैं। छठां व्यक्ति मत्स्य गणचिन्ह के कबीले का है। नवां किसी और कबीले का है। उसके सर के चारों ओर की रेखाएं यह स्पष्ट करती है कि पहले सरदार से वह अधिक शक्तिशाली सरदार है। सबकी आंखों को मिलाने वाली रेखा उनसे मतैक्तय प्रकट करती है। नीचे के तीन मकान यह संकेत दे रहे हैं कि ये तीन सिपाही प्रेसिडेंट के तौर-तरीके अपनाने को तैयार है। पत्रा इस प्रकार पढ़ा जा सकता है- ‘मैं, गरुड़ गणचिन्ह के कबीले का सरदार, मेरे कई सिपाही, मत्स्य गणचिन्ह के कबीले का एक व्यक्ति, और एक अज्ञात गणचिन्ह के कबीले का मुझसे अधिक शक्तिशाली सरदार एकत्रा हुए हैं, और आपसे मैत्राी-संबंध स्थापित करना चाहते हैं हमारा आप से सभी बात में मतैक्य है। हमारे तीन सिपाही आपके तौर-तरीके अपनाने को तैयार हैं।’ इस प्रकार भाव लिपि, चित्र तथा सूत्र लिपि की अपेक्षा अधिक समुन्नत तथा अभिव्यक्ति में सफल हैं। चीनी आदि कई लिपियां के बहुत से चिन्ह आज तक इसी श्रेणी के हैं।

भाव-ध्वनिमूलक लिपि

चित्रलिपि का विकसित रूप ध्वनि-मूलक लिपि है, जिस पर आगे विचार किया जायेगा, पर उसके पूर्व ऐसी लिपि के संबंध में कुछ जान लेना आवश्यक है जो कुछ बातों में तो भावमूलक हैं और कुछ बातों में ध्वनि-मूलक। मेसोपोटैमियन, मिस्री तथा हित्ती आदि लिपियों को प्राय: लोग भावमूलक कहते हैं, पर यथार्थत: ये भाव-ध्वनि-मूलक है, अर्थात् कुछ बातों में भावमूलक हैं और कुछ बातों में ध्वनिमूलक। आधुनिक चीनी लिपि भी कुछ अंशों में इसी के अंतर्गत आती है। इन लिपियों के कुछ चिन्ह चित्रात्मक तथा भावमूलक होते हैं, और कुछ ध्वनिमूलक और दोनों ही का इसमें यथासमय उपयोग होता है। कुछ विद्वानों के अनुसार सिंधु घाटी की लिपि भी इसी श्रेणी की है।

ध्वनिमूलक लिपि

चित्रलिपि तथा भावमूलक लिपि में चिन्ह किसी वस्तु या भाव को प्रकट करते हैं। उनसे उस वस्तु या भाव के नाम से कोई संबंध नहीं होता। पर इसके विरुद्ध ध्वनिमूलक लिपि में चिन्ह किसी वस्तु या भाव को न प्रकट कर, ध्वनि को प्रकट करते हैं, और उनके आधार पर किसी वस्तु या भाव का नाम लिखा जा सकता है। नागरी, अरबी तथा अंग्रेजी आदि भाषाओं की लिपियां ध्वनि-मूलक ही हैं। ध्वनि-मूलक लिपि के दो भेद हैं-
  1. अक्षरात्मक (syllabic)
  2. वर्णात्मक (alphabetic)

अक्षरात्मक लिपि

अक्षरात्मक लिपि में चिन्ह किसी अक्षर (syllable) को व्यक्त करता है, वर्ण (Alphabet) को नहीं। उदाहरणार्थ नागरी लिपि अक्षरात्मक है। इसके ‘क’ चिन्ह क्+अ (दो वर्ण) मिले हैं, पर इसके विरुद्ध रोमन लिपि वर्णात्मक है। उसके ज्ञ में केवल ‘क्’ है। अक्षरात्मक लिपि सामान्यतया प्रयोग की दृष्टि से तो ठीक है, किन्तु भाषा-विज्ञान में जब हम ध्वनियों का विश्लेषण करते चलते हैं तो इसकी कमी स्पष्ट हो जाती है। उदाहरणार्थ हिन्दी का कक्ष शब्द लें। नागरी लिपि में इसे लिखने पर स्पष्ट पता नहीं चलता कि इसमें कौन- कौन वर्ण हैं, पर, रोमन लिपि में यह बात (Kaks'a) बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। नागरी में इसे देखने पर लगता है कि इसमें दो ध्वनियां हैं पर रोमन में लिखने पर सामान्य पढ़ा-लिखा भी कह देगा कि इसमें पांच ध्वनियां हैं। अरबी, फारसी, बंगला, गुजराती, उड़िया तथा तमिल-तेलगू आदि लिपियां अक्षरात्मक ही हैं।

वर्णनात्मक लिपि

लिपि-विकास का प्रथम सीढ़ी चित्र लिपि है तो इसकी अंतिम सीढ़ी वर्णात्मक लिपि है। वर्णात्मक लिपि में ध्वनि की प्रत्येक इकाई के लिए अलग चिन्ह होते हैं और उनके आधार पर सरलता से किसी भी भाषा का कोई भी शब्द लिखा जा सकता है। भाषा-विज्ञान की दृष्टि से यह आदर्श लिपि है। रोमन लिपि प्राय: इसी प्रकार की है। ऊपर नागरी और रोमन में ‘कक्ष’ लिखकर अक्षरात्मक लिपि और वर्णात्मक लिपि के भेद को तथा अक्षरात्मक की तुलनामें वर्णात्मक लिपि को अच्छाई से हम लोग देख चुके हैं।

लिपि के विकास-क्रम की विभिन्न अवस्थाएं

लिपि के विकास-क्रम में प्राप्त छ: प्रकार की लिपियों का ऊपर परिचय दिया गया है। विकास-क्रम की क्रमिक सीढ़ी की दृष्टि से सूत्र लिपि तथा भावाभिव्यक्ति की भावात्मक पद्धति (या प्रतीकात्मक लिपि) का विशेष स्थान नहीं है। वे दोनों भाव प्रकट करने की विशिष्ट पद्धतियां हैं, जो किसी न किसी रूप में प्राचीन काल से आज तक चली आ रही है। उनका न तो उनकी पूर्ववर्ती चित्र लिपि से कोई संबंध है और न बाद की भावमूलक या ध्वनिमूलक लिपि से। दूसरे शब्दों में न तो ये दोनों चित्रलिपि से विकसित हुई हैं और न इनसे इनके बाद प्रचलन में आने वाली भावमूलक या ध्वनि- मूलक लिपियां।

इन दो को छोड़ देने पर शेष चार प्रकार की लिपियां बचती हैं। इनमें जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, प्रारम्भिक लिपि चित्र लिपि है। चित्र लिपि का ही विकसित रूप भावमूलक लिपि है। और आगे चलकर भावमूलक लिपि विकसित होकर भाव-ध् वनि-मूलक लिपि और फिर ध्वनिमूलक हुई है। ध्वनि-मूलक में भी अक्षरात्मक ध्वनिमूलक लिपि प्रारम्भिक है और वर्णात्मक ध्वनि-मूलक लिपि उससे विकसित तथा बाद की है।

इस प्रकार लिपि के विकास-क्रम में चित्र लिपि प्रथम अवस्था की लिपि है और वर्णात्मक ध्वनि-मूलक लिपि अन्तिम अवस्था की।

संसार की प्रमुख लिपियों के दो प्रधान वर्ग
संसार की लिपियां प्रमुख रूप से दो वर्गों में रखी जा सकती है-
  1. जिसमें अक्षर या वर्ण नहीं हैं, जैसे क्यूनीफार्म तथा चीनी आदि।
  2. जिनमें अक्षर या वर्ण हैं, जैसे रोमन तथा नागरी आदि।
पहले वर्ग की प्रधान लिपियां
  1. क्यूनीफार्म
  2. हीरोग्लाफिक
  3. क्रीट की लिपि (या लिपियां)
  4. सिंधु घाटी की लिपि
  5. हिट्टाइट लिपि
  6. चीनी लिपि
  7. प्राचीन मध्य-अमेरिका तथा मैक्सिको की लिपियां,
दूसरे वर्ग की प्रधान लिपियां
  1. दक्षिणी सामी लिपि
  2. हिब्रू लिपि
  3. फोनेशियन लिपि
  4. खरोष्ठी लिपि
  5. आर्मेइक लिपि
  6. अरबी लिपि
  7. भारतीय लिपि
  8. ग्रीक लिपि
  9. लैटिन लिपि
यहां इनमें कुछ प्रधान पर (कुछ पर विस्तार से और कुछ पर संक्षेप में) विचार किया जा रहा है। सिंधु घाटी की लिपि तथा खरोष्ठी लिपि पर अलग विचार न करके ‘भारतीय लिपियां’ शीर्षक के अन्तर्गत ही भारत की अन्य लिपियों के साथ विचार किया गया है।

क्यूनीफार्म या तिकोनी लिपि

क्यूनीफार्म विश्व की प्राचीतम लिपि है। इसकी उत्पत्ति कब और कहां हुई, इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहने के लिए अभी तक कोई आधार-सामग्री नहीं मिली है। यों इसका प्राचीनतम प्रयोग 4,000 ई.पू. के आसपास मिलता है। साथ ही विद्वानों का अनुमान है कि सुमेरी लोग इसके उत्पत्तिकर्त्ता हैं। इसके तिकोने स्वरूप के कारण आधुनिक काल में 1700 ई. के आसपास इसे ‘क्यूनीफार्म’ नाम दिया गया। इस नाम का प्रयोग सर्व प्रथम थामस हाइड ने किया।

4,000 ई.पू. से 1 ई.पू. तक इसका प्रयोग मिलता है इसके अध्ययनकर्त्ताओं का कहना है कि मूलत: यह लिपि चीनी या सिंधु घाटी की मूल लिपि की भांति चित्रात्मक थी। बेबिलोनिया में गीली मिट्टी की टिकियों या र्इंटों पर लिखने के कारण धीरे-धीरे यह तिकोनी रेखात्मक हो गई है। यह कारण ठीक ही है। गीली मिट्टी पर गोल, धनुषाकार या और प्रकार की रेखा खींचने की अपेक्षा सीधी रेखा बनाना सरल है। इसके अतिरिक्त रेखा का गीली मिट्टी पर तिकोनी हो जाना भी स्वाभाविक है। जल्दी में रेखा जहां से बननी आरम्भ होगी वहां गहरी और चौड़ी होगी और जहां समाप्त होगी लिखने की कलम के उठने के कारण कम गहरी और कोणाकार। इस प्रकार उसका स्वरूप ित्राभुजाकार रेखा-सा हो जायेगा। इस लिपि में इसी प्रकार की छोटी रेखाएं पड़ी, खड़ी और विभिन्न कोणों पर आड़ी मिलती है। आरम्भ में इसमें बहुत अधिक चिन्ह थे, पर बाद में सुमेरी लोगों ने 570 के लगभग कर दिये और उनमें भी 30 ही विशेष रूप से प्रयोग में आते थे। चित्रात्मकता से विकसित होकर यह लिपि भाव-मूलक-लिपि हुई। (सूर्य का चित्र=दिन, या पैर का चित्र=चलना आदि) तथा और बाद में असीरिया और फारस आदि में यह अर्द्ध अक्षरात्मक हो गई। पहले यह ऊपर से नीचे को लिखी जाती क्यूनीफार्म लिपि का उदाहरण थी पर बाद में दाएं से बाएं, और फिर बाएं से दाएं भी लिखी जाने लगी थी। समुेरी, बेबिलोन, असीरी तथा ईरानी लोगों के अतिरिक्त हिट्टाहइट, मितानी, एलामाइट तथा कस्साइट आदि ने भी इस लिपि का प्रयोग किया है।

हीरोग्लाइफिक या पवित्राक्षर लिपि

विश्व की प्राचीन लिपियों में हीरोग्लाइफिक लिपि का महत्वपूर्ण स्थान है। इसका यह नाम यूनानियों का रखा हुआ है, जिसका मूल अर्थ ‘पवित्रा खुदे अक्षर’ है। प्राचीन काल में मन्दिर की दीवारों पर लेख खोदने में इस लिपि का प्रयोग होता था। इसी आधार पर इसका नाम रखा गया। विद्वानों का अनुमान है कि 4,000 ई.पू. में यह लिपि प्रयोग में आ गई थी। आरम्भ में यह चित्र लिपि थी बाद में भाव-लिपि हुई और फिर यह अक्षरात्मक हो गई। संभवत: इसी लिपि में अक्षरों का सर्वप्रथम विकास हुआ। इस लिपि में स्वर नहीं थे, केवल व्यंजन थे। पर वे व्यंजन ठीक आज के अर्थ में नहीं थे। एक ध्वनि के लिए कई चिन्ह थे और साथ ही एक चिन्ह का कई ध्वनियो के लिये भी प्रयोग हो सकता था। सामान्यत: यह दाएं से बाएं को लिखी जाती थी पर कभी-कभी इसके उलटे या एकरूपता के लिये दोनों ओर से भी । हीरोग्लाइफिक लिपि के घसीट लिखे जाने वाले रूप का नाम ‘हीराटिक’ है, जो पहले ऊपर से नीचे की ओर और बाद में दायें से बायें को लिखी जाने लगी थी। इसका बाद में एक और भी घसीट रूप विकसित हो गया जिसकी संज्ञा ‘डेमोटिक’ है। यह दाएं से बाएं को लिखी जाती थी। हीरोग्लाइफिक लिपि का प्रयोग 4,000 ई.पू. से छठी ई. तक, हीराटिक का 2000 ई.पू. से 3री सदी तक, तथा डेमोटिक का 7वीं सदी ई.पूसे 5वीं सदी तक मिलता है।

क्रीट की लिपियां

क्रीट में चित्रात्मक तथा रेखात्मक दो प्रकार की लिपियां मिलती हैं। इन लिपियों की उत्पत्ति सम्भवत: वहीं हुई थी, पर इन पर मिस्र की हीरोग्लाइफिक लिपि का प्रभाव पड़ा था। कुछ लोगों के अनुसार इन लिपियों की उत्पत्ति में भी हीरोग्लाइफिक लिपि का हाथ रहा है।

चित्रात्मक लिपि में लगभग 135 चित्र मिलते हैं। यह बाद में कुछ अंशों में भावमूलक लिपि तथा कुछ अंशों में ध्वन्यात्मक लिपि हो गई थी। इसको कभी तो बायें से दायें और कभी-कभी क्रमश: दोनों ओर से लिखा जाता था। इसका प्राचीनतम प्रयोग 3,000 ई.पू. में होता था। 1700 ई.पू. के लगभग इसकी समाप्ति हो गई। रेखात्मक लिपि का प्रयोग 1700 ई.पू. के बाद प्रारम्भ हुआ। इसमें लगभग 90 चिन्ह थे। इसे बाएं से दाएं लिखते थे। यह कुछ अंशों में चित्रात्मक तथा भावात्मक और कुछ अंशों में ध्वन्यात्मक थी। 1200 ई. पू. से पूर्व ही यह समाप्त हो गई।

हिट्टाइट लिपि

हिट्टाइट लिपि को ‘हिट्टाइट हीरोग्लाइफिक’ लिपि भी कहते हैं। इसका प्राचीनतम प्रयोग 1500 ई.पू. का मिलता है। 600 ईपू. के बाद इसका प्रयोग नहीं मिलता। यह लिपि मूलत: चित्रात्मक थी, पर बाद में कुछ अंशों में भावात्मक तथा कुछ अंशों में ध्वन्यात्मक हो गई थी। इसमें कुल 419 चिन्ह मिलते हैं। इसे कभी दाएं से बाएं और कभी इसके उलटे लिखते थे। इसकी उत्पत्ति कुछ लोग मिस्री हीरोग्लाइफिक से तथा कुछ लोग क्रीट की चित्रात्मक लिपि से मानते है, पर डॉ. डिरिंजर ने इन मतों का विरोध करते हुए इसे वहीं की उत्पत्ति माना है। उनके अनुसार केवल यह सम्भव है कि आविष्कारों ने इसके आविष्कार की प्रेरणा मिस्र से ली हो।

चीनी लिपि

चीनी लिपि की उत्पत्ति के संबंध में चीन में तरह-तरह की किवदंतियां प्रचलित है। एक के अनुसार एक आठ प्रकार की ित्रापंिक्तीय रेखाओं से यह निकली है। इस विशिष्ट रेखाओं का प्रयोग वहां के धार्मिक कर्मकांडों में होता था। एक चीनी कहावत के अनुसार लगभग 3200 ई.पू. फू-हे नाम के एक व्यक्ति ने चीन में लेखन का आविष्कार किया। कुछ धार्मिक प्रवृत्तिवालों के अनुसार लिपि के देवता ‘त्जुशेन’ ने चीनी लिपि बनाई। एक मत से त्सं-की नामक एक बहुत ही प्रतिभा- संपन्न व्यक्ति चीन में 2700 ई.पू. के लगभग पैदा हुआ। इसने एक दिन एक कछुआ देखा और उसी के स्वरूप को देखकर इसने उसके भाव के लिए उसका रेखाचित्र बनाया। बाद में उसने इस दिशा में और सोच-समझ कर सभी आसपास के जीवों और निर्जीव वस्तुओं का रेखाचित्र बनाया और उसी का विकसित रूप चीनी लिपि हुआ। चीनी भाषा के प्रसिद्ध बौद्ध विश्वकोष ‘फा बुअन् चु लिन्’ (निर्माणकाल सन् 668 ई.) में भी ‘त्सं-की’ को ही चीनी लिपि का आविष्कारक माना गया हे, और यह भी लिखा है कि उसने पक्षी के पैरों आदि को देखकर यह लिपि बनाई।

त्सं-की का होना और कछुआ या पक्षी के पैर को देखकर लिपि बनाना ठीक हो या नहीं पर इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि आसपास के इसी प्रकार के जन्तुओं तथा पदार्थों को देखकर लोगों ने उनके चित्र बनाये और उसी से मूल चीनी लिपि (जो चित्रात्मक लिपि थी) का जन्म हुआ।

यों विद्वानों ने चीनी लिपि की उत्पत्ति के बारे में तरह-तरह के अनुमान लगाये हैं, जिनमें से प्रमुख हैं
  1. पीरू की ग्रन्थ-लिपि की भांति की किसी लिपि से यह निकली है।
  2. सुमेरी लोगों की क्यूनीफार्म लिपि से इसका जन्म है।
  3. चीन में हाथ की मुद्रा से भाव-प्रदर्शन की पद्धति के अनुकरण पर इसका जन्म है।
  4. सजावट या स्वामित्व-चिन्ह रूप में बनने वाले चिन्हो से इसका जन्म है।
  5. मिस्र की हीरोग्लाइफी से इसकी उत्पत्ति हुई है।,
  6. मेसोपोटामिया, ईरान या सिंधु-घाटी की चित्र-लिपि की प्रेरणा से इन लोगों ने अपनी लिपि बनाई है। 
इनमें छठवां कुछ ठीक लगता है। क्योंकि इन देशों से चीन का संबंध था और देशों में चीन से पहले चित्र-लिपि बनी, अत: असम्भव नहीं है कि इन लोगों की लिपि से प्रेरणा लेकर चीनियों ने अपने यहां के जीवों और निर्जीवों के आकार-अनुकरण के आधार पर अपनी लिपि बनाई हो।
चीनी लिपि में भी अन्य अक्षर या वर्ण-विहीन लिपियों की भांति अक्षर या वर्ण नहीं है। वहां अलग-अलग शब्दों के लिए अलग-अलग चिन्ह हैं। अपने मूल-रूप में अधिकतर चिन्ह चित्र रहे होग,े पर धीरे-धीरे परिवर्तित होते-होते अधिकतर चित्र रूढ़िरूप मात्रा रह गये। उदाहणार्थ पहले सूर्य के लिए बनता था, जो सूर्य का चित्र है। पर बाद में परिवर्तित होते-होते यह ऐसे हो गया। या पहाड़ पहले यों बनता था, जिसे पहाड़ का चित्र कहा जा सकता है पर बाद में वह घिसते-घिसते या विकसित होते-होते हो गया। चीनी लिपि में कुल लगभग 50,000 चिन्ह हैं। इन्हें मोटे रूप से चार वर्गों में रखा जा सकता है:-
  1. चित्रात्मक चिन्ह : ये चिन्ह चीनी लिपि के आरम्भिक काल के हैं। यों अधिकतर चिन्ह जैसा कि ऊपर समझाया जा चुका है चित्र से विकसित होकर अब चिन्ह मात्रा रह गये हैं, पर इन चिन्हो में भी इनकी चित्रात्मकता देखी जा सकती है ईश्वर, कुआं, मछली, सूर्य, चांद तथा पेड़ आदि के चिन्ह इसी श्रेणी के हैं।
  2. संयुक्त चित्रात्मक चिन्ह : ये चिन्ह पहले की अपेक्षा अधिक विकसित अवस्था के हैं। जब बहुत-से चित्रात्मक चिन्ह बन गये तो दो या अधिक चित्रात्मक चिन्हो के संयोग से कुछ चीजों के लिए चिन्ह बने। जैसे दो पेड़ के चिन्ह पास-पास बना कर ‘जंगल’ का चिन्ह बना। या एक रेखा खींच कर उसके ऊपर सूर्य बनाकर ‘सवेरा’ का चिन्ह बनाया गया, जिसमें रेखा क्षितिज का प्रतीक है। इसी प्रकार मुँह से निकलती हवा दिखाकर ‘शब्द’, तथा मुंह से कोई निकलती चीज दिखलाकर ‘जीभ’ के चिन्ह बनाये गये। चित्रात्मक चिन्हो की भांति ही, आज ये संयुक्त चित्रात्मक चिन्ह ...., चित्र न रहकर चिन्ह-मात्रा रह गये हैं।
  3. भाव चिन्ह : स्थूल वस्तुओं और जीवों के लिए चित्र बन जाने पर सूक्ष्म भावों की चीनी लिपि में व्यक्त करने का प्रश्न आया। कहना न होगा कि भावों के चित्र खींचना सरल न होने के कारण यह समस्या बड़ी विकट थी पर चीनी लोगों ने बड़ी चतुराई से काम लिया और सूक्षम से सूक्ष्म भावों को भी चित्रों द्वारा प्रकट कर लिया। कुछ मनोरंजक उदाहरण यहां दिये जा सकते हैं। सूर्य और चांद के चिन्ह एक स्थान पर बनाकर ‘चमक’ या ‘प्रकाश’ का भाव प्रकट किया गया। इसी प्रकार स्त्री+लड़का=अच्छा, भला। खेत+पुरुष=शक्ति। पेड़ के बीच सूरज=पूरब। दो हाथ=मित्रता, दो िस्त्रायां=झगड़ा, आंख में निकलते आंसू=दु:ख, दरवाजा+कवि=सुनना। मुंह+पक्षी=गाना, तथा छत के नीचे स्त्री=शांति इत्यादि। कहना न होगा कि ये सभी भाव-चित्र बहुत ही उचित और सफल हैं और चीनियों के सूक्ष्म चिन्तन के ज्वलंत उदाहरण हैं।
  4. ध्वन्यर्थ संयुक्त चिन्ह: चीनी भाषा में एक शब्द के प्राय: बहुत से अर्थ होते हैं। कहते समय वे अर्थ-भेद के लिए विभिन्न सुरों में शब्दों का उच्चारण करते हैं। इस प्रकार उच्चारण करने में तो सुर के कारण अर्थ स्पष्ट हो जाता है, पर कोई लिखित चीज पढ़ने में इस अनेकार्थता के कारण पहले बहुत कठिनाई होती थी। इसी कठिनाई को दूर करने के लिए चीनियों ने ध्वनि के संकेत के लिए लिखने में चिन्हो का दोहरा प्रयोग आरम्भ किया। उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो जायेगी। एक चीनी शब्द ‘फैग’ है, जिसका अर्थ ‘बुनना- तथा ‘कमरा’ होता है। अब यदि यों कहीं ‘फैग’ लिख दें तो पढ़ने वाला यह न जान पायेगा कि यह ‘फैग’ बुनने का अर्थ रखता है। या ‘कमरे- का, और यह न जा पाने से उसको ठीक सुर में या ठीक ध्वनि से उच्चरित न कर पायेगा। पर यदि ‘फैग’ के साथ कोई और शब्द लिख दें, या किसी और भाव को प्रकट कर देने वाला चिन्ह बना दें, जिससे अर्थ तथा ध्वनि स्पष्ट हो जाय तो यह कठिनाई न रहेगी। चीन में यही किया गया हैं जहां ‘फैग’ का बुनना अर्थ अपेक्षित होता है, उसके साथ ‘सिल्क’ का भाव प्रकट करने वाला चिन्ह बना देते हैं और चूंकि दरवाजे और कमरे तथा सिल्क और बुनने में संबंध है, अत: उन शब्दों के संकेत से पढ़ने वाला ठीक अर्थ समझ कर उनका उच्चारण ठीक सुर में करता है। इसीलिए इस दोहरे प्रयोग को ‘ध् वन्यर्थ’ संयुक्त चिन्ह’ कहते हैं। कहना न होगा कि इसके कारण चीनी लिपि को शुद्ध पढ़ा जाना संभव है, नहीं तो बड़ी कठिनाई होती।
दोहरे प्रयोगों में केवल उपर्युक्त उदाहरण में दिये गये संबंधित शब्द ही नहीं रखे जाते । इसके लिए तीन अन्य तरीके भी अपनाये जाते हैं। एक के अनुसार कभी-कभी उसी चिन्ह को दो बार रख देते हैं। जैसे ‘को- के कई अर्थ है, जिनमें एक ‘बड़ा भाई’ भी है। ‘बड़े भाई’ के भाव तथा सुर की ओर संकेत करने के लिए ‘को’ का एक चिन्ह न बनाकर दो चिन्ह बना देते हैं। इस प्रकार एक ही चिन्ह का दोहरा प्रयोग भी सुर और अर्थ स्पष्ट करने का काम दे जाता है। यह परम्परागत रूप से रूढ़ि-सा हो गया है, कि दो ‘को’ साथ होने पर बड़े भाई का ही अर्थ लिया जाय, अत: इससे लोग यही भाव समझ जाते हैं। पहले उदाहरण की भांति इसमें कोई स्वाभाविक संबंध नहीं है।

दूसरे के अनुसार सुर तथा अर्थ की स्पष्टता के लिए दो पर्याय साथ रखते हैं, हिन्दी से इसका उदाहरण लेकर स्पष्टता से इसे समझाया जा सकता है। ‘हरि’ का अर्थ विष्णु, सांप, पानी तथा मेंढक आदि होता है। इसी प्रकार ‘क्षीर’ का अर्थ ‘दूध’ तथा ‘पानी’ होता है। अब यदि ‘हरि क्षीर’ लिखें तो अर्थ में गड़बड़ी न होगी। दोनों शब्दों के अनेक अर्थों में ‘पानी’ अर्थ उभयनिष्ठ हैं, अतएव स्वभावत: उसी की ओर लोगों का ध्यान जायेगा। चीनी में इस प्रकार के समानाथ्र्ाी शब्द-चिन्हो को एक स्थान पर रखकर भी उपर्युक्त कठिनाई का निवारण किया जाता है। कुंग-पा (डरना) शु-मु (पेड़) या काओ-सु (कहना) आदि ऐसे ही चिन्ह हैं।

अन्तिम प्रकार के प्रयोग में जो दो शब्द-चिन्ह साथ-साथ रखे जाते हैं, उनमें आपस में कोई इस प्रकार का स्पष्ट करने वाला संबंध नहीं होता। उदाहरणार्थ हु (=चीता) के लिए लाव-हु (वृद्ध चीता) लिखते हैं। इस लाव (वृद्ध) का चीते से कोई संबंध नहीं है, पर प्रयोग की रूढ़ि के कारण इन दोनों चिन्हो को एक स्थान पर देख कर लोग समझ जाते हैं कि यह ‘चीते’ के लिए आया है।

चीनी लिपि में अलग-अलग अक्षर या वर्ण न होने के कारण विदेशी नामों के लिखने में कठिनाई होती है। इसके लिए ये लोग अधिकतर नामों का चीनी भाषा में अनुवाद करके लिखते हैं। उदाहरणार्थ उन्हें ‘केशव चन्द्र’ लिखना होगा तो वे ‘ईश्वर’ और ‘चांद’ के भाव प्रकट करने वाले चिन्ह एक स्थान पर रख देंगे। बुद्ध भगवान के पिता ‘शुद्धोदन’ का चीनी लिपि में लिखा जो रूप मिलता है उसका मूल अर्थ ‘झुद्ध गवल’ (शुद्ध+आदेन) है। पर, इसके अतिरिक्त यदि किसी नाम से ध्वनि में मिलता-जुलता है उन्हें अपनी भाषा में कोई शब्द मिल जाता है तो उसी के चिन्ह से काम चलाते हैं। बुद्ध की स्त्राी ‘यशोधरा’ का नाम उन्होंने इस पद्धति से लिखा है। सुना है ईश्वर ध्वनि की इस पद्धति पर ही वे लोग अधिकतर विदेशी नाम तथा शब्द लिखने लगे हैं और अनुवाद करके लिखने का तरीका छोड़ा जा रहा है।

चीनी लिपि दो दृष्टियों से बहुत कठिन है’ एक तो यह है कि इसके चिन्ह बहुत टेढ़े-मेढ़े हैं। रेखाओं के भीतर रेखाएं और बिन्दु आदि इतने घिच-पिच होते हैं कि इन्हें बनाना तथा याद रखना दोनों ही बहुत कठिन है।

दूसरे इसमें लिपि-चिन्ह बहुत अधिक (40.50 हजार) हैं। इस प्रकार के (कठिन) इतने अधिक चिन्हो को याद रखना कितना कठिन है कहने की आवश्यकता नहीं। चिन्ह के कठिन होने की कठिनाई को पार करने के लिए चीनी लोगों ने अपने 500 बहु-प्रयुक्त चिन्हो को सरल बनाया है और अब इसका प्रयोग ही वहां विशेष रूप से चल रहा है। चिन्हो को सरल बनाने के लिए स्ट्रोक या रेखाओं की संख्या घटा दी गई है। उदाहरण के लिए पहले यदि किसी चिन्ह में 16 छोटी-छोटी रेखाएं थीं तो उसके स्थान पर अब 6 या 7 से लोग काम चला लेते हैं।

इधर चीनी लिपि की तुलना में वर्णात्मक लिपि की उपयोगिता ने भी चीनी लोगों को बहुत आकर्षित किया है, और विश्व की सर्वोत्तम लिपि ‘रोमन’ को वे लोग अपनी भाषा की लिपि के लिए अपनाने जा रहे हैं। उनकी भाषा में कुछ ऐसी भी ध्वनियां हैं, जिनके लिए रोमन लिपि में चिन्ह नहीं है। इसके लिए उन्होंने रोमन लिपि से कुछ नये चिन्ह बढ़ा दिये हैं, जो ल्ह, च्ज, तथा ड़ आदि ध्वनियों के लिए हैं। इस प्रकार की प्रस्तावित रोमन लिपि में, जो चीनी लिपि का स्थान लेना चाहती है, 30 वर्ण हैं, जिनमें 24 व्यंजन और 6 स्वर हैं।

अरबी लिपि

अरबी लिपि विश्व की एक बहुप्रचलित लिपियों में है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में बहुत अधिक मतभेद नहीं है। प्राचीन काल में एक पुरानी सामी लिपि थी, जिसकी आगे चलकर दो शाखाएं हो गर्इं। एक उत्तरी सामी लिपि और दूसरी दक्षिणी सामी लिपि। बाद में उत्तरी सामी लिपि से आर्मेइक तथा फोनेशियन लिपियां विकसित हुर्इं। इनमें आर्मेइक ने विश्व की बहुत-सी लिपियों को जन्म दिया, जिनमें हिब्रू, पहलवी तथा नेबातेन आदि प्रधान है। नेबातेन से सिनेतिक और सिनेतिक से पुरानी अरबी लिपि का जन्म हुआ। यह जन्म कब और कहां हुआ इस संबंध में निश्चय के साथ कहने के लिए प्रमाणों का अभाव है। अरबी का प्राचीनतम अभिलेख 512 ई. का है। अतएव इस आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इसके पूर्व अरबी लिपि का जन्म हो चुका था।

अरबी लिपि का विकास मक्का, मदीना, बसरा, कुफा, तथा दमस्कस आदि नगरों में हुआ और इनमें अधिकांश की अपनी-अपनी शैली तथा विशेषताएं विकसित हो गर्इं, जिनमें प्रमुख दो थीं-
  1. कुफी (मसोपोटामिया के कुफा नगर में विकसित)
  2. नस्खी (मक्का-मदीना में विकसित)
इनमें ‘कुफी’ का विकास 7वीं सदी के अन्तिम चरण में हुआ। यह कलात्मक लिपि थी और स्थायी मूल्य के अभिलेखों के प्रयोग में तरह-तरह से आती थी। ‘नस्खी’ का विकास बाद में हुआ और इसका प्रयोग सामान्य कार्यों तथा त्वरलेखन आदि में होता था।

अरबी लिपि दाएं से बाएं को लिखी जाती है। इसमें कुल 28 अक्षर हैं।

इस लिपि को यूरोप, एशिया तथा अफ्रीका के कई देशों ने अपना लिया। जिनमें तुर्की’, फारस, अफगानिस्तान तथा हिन्दुस्तान प्रधान है। इन विभिन्न देशों में जाकर इस लिपि के कुछ चिन्हो तथा अक्षरों की संख्या में परिवर्तन भी आ गये थे। उदाहरणार्थ फारसी में ‘रे’ और ‘जे’ कुछ परिवर्तित ढंग से लिखने लगे तथा उनकी भाषा में अरबी की 28 ध्वनियों के अतिरिक्त प, च, ज्ह तथा ग ये चार ध्वनियां आती थीं, अत: इनके लिए 4 नये चिन्ह।
अरबी वर्णमाला में सम्मिलित कर लिए गये और इस प्रकार फारसी अक्षरों की संख्या 32 हो गई। भारत में उर्दू तथा कश्मीरी आदि के लिए भी अरबी लिपि अपनाई गई। यहां फारस वालों ने जो वृद्धि की थी उसे तो स्वीकार किया ही गया, उसके अतिरिक्त सात चिन्ह और बढ़ा लिये गये, इस प्रकार उर्दू आदि भाषाओं की लिपि में अक्षरों ब्की संख्या 37 हो गई। इन बढ़े अक्षरों में ध्वनि की दृष्टि से केवल तीन ही (टे, डाल, ड़े) नवीन हैं। अन्य चार में ( ) अक्षर ( ) का, ( ) अक्षर ( । ) का और ( ) अक्षर ( ) का दूसरा रूप मात्रा है, और ( ) अक्षर ( ) तथा ( ) का योग मात्रा है। इसीलिए ये महत्वपूर्ण नहीं है। भारत में ‘रे’ आदि की बनावट अरबी की भांति के न होकर है।

तुर्की, पश्तो तथा मलय आदि भाषा-भाषियों ने भी अरबी में अपनी आवश्यकतानुसार परिवर्तन-परिवर्द्धन कर लिये। अरबी तथा उससे निकली सभी लिपियां पुरानी सामी की भांति व्यंजनप्रधान है। स्वरों के लिए ‘जेर’, ‘जवर’, ‘पेश’ तथा ‘मद’ आदि का सहारा लेकर पूर्ण अंकन का प्रयास किया जाता है, पर वह उतना वैज्ञानिक नही है, जितना नागरी या रोमन आदि में है। इस दृष्टि से अरबी तथा उससे निकली अन्य सभी लिपियों में सुधार अपेक्षित है।

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