कंपनी अंकेक्षक की नियुक्ति

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भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1956 के अन्तर्गत प्रत्येक कम्पनी के लिए अपने लेखों का अंकेक्षण करना अनिवार्य है। यह अंकेक्षण ‘‘वैधानिक अंकेक्षण’’ कहलाता है। जो व्यक्ति इस कार्य के लिए नियुक्त किया जाता है उसे ‘‘वैधानिक अंकेक्षक’’ कहते हैं। भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1 अप्रैल 1956 से लागू हुआ। इस अधिनियम की धाराएँ 224 से 233 तक अंकेक्षकों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि इस धाराओं में अंकेक्षकों की नियुक्ति, अयोग्यता, पद से हटाना, पारिश्रमिक, अधिकार तथा कर्त्तव्यों का वर्णन किया गया है।

अंकेक्षक का पारिश्रमिक

संचालक मंण्डल अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त अंकेक्षक की दशा में अंकेक्षक का पारिश्रमिक संचालक मण्डल अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित किया जा सकता है, तथा अन्य दशाओं में कम्पनी द्वारा साधारण सभा में निर्धारित किया जाएगा अथवा, ऐसी रीति में निर्धारित किया जाएगा जोकि कम्पनी व्यापक सभा में निर्धारित करे। यदि अंकेक्षक से कुछ अतिरिक्त कार्य जैसे अन्तिम खाने बनाना या आय का विवरण तैयार करने के लिए कहा जाए, तो वह अतिरिक्त पारिश्रमिक प्राप्त करने का अधिकारी होगा। यदि कम्पनी ने अंकेक्षक के किसी व्यय का भुगतान किया है तो वह व्यय भी पारिश्रमिक में शामिल कर लिया जाएगा।

अंकेक्षकों की योग्यताएँ एवं अयोग्यताएँ

कम्पनी अधिनियम, 1956 की धारा 226 के अनुसार कम्पनी अंकेक्षक की योग्यताएँ होनी चाहिए-
  1. किसी व्यक्ति को तब ही अंकेक्षक नियुक्त किया जा सकता है, जबकि वह चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट्स एक्ट, 1949 के अनुसार सी. ए. (C. A.) हांे।
  2.  एक फर्म भी अंकेक्षक नियुक्त की जा सकती है जबकि उसके सभी साझेदार चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट हों।
  3. कुछ दशाओं में, पुराने नियमों के अन्तगर्त, सर्टीफिकेट प्राप्त (Certified Auditor) व्यक्ति भी अंकेक्षण नियुक्त किए जा सकते हैं। केन्द्रीय सरकार इन प्रमाण-पत्रों को रद्द कर सकती है या बढ़ा सकती है।

अयोग्यताएँ

इन में से कोई भी व्यक्ति कम्पनी का अंकेक्षक नियुक्त किए जाने के योग्य नहीं है-
  1. एक समामेलित संस्था (A body Corporate)।
  2. कम्पनी का एक अधिकारी अथवा कर्मचारी।
  3. ऐसा एक व्यक्ति जोकि कम्पनी के एक अधिकारी अथवा एक कर्मचारी का साझेदार या उनका कर्मचारी है।
  4. ऐसा एक व्यक्ति जोकि 1,000 रू. से अधिक रकम के लिए कम्पनी का ऋणी है।
  5. ऐसा एक व्यक्ति जोकि एक ऐसी निजी (Private) कम्पनी का संचालक अथवा सदस्य है जो कम्पनी का सचिव या कोषाध्यक्ष है, अथवा ऐसा एक व्यक्ति जो कि ऐसी एक फर्म का साझेदार है जो कम्पनी का सचिव एवं कोषाध्यक्ष है।
  6. ऐसा एक व्यक्ति जो किसी ऐसी समामेलित संस्था का संचालक है जो कम्पनी का सचिव एवं कोषाधक्ष है।
  7. ऐसा कोई व्यक्ति जो समामेलित संस्था की प्रार्थित पूँजी (Subscribed Capital) के अंकित मूल्य के 5: से अधिक अंशों का मालिक है।
यदि नियुक्ति के बाद अंकेक्षक में उपरोक्त अयोग्यताओं में से कोई भी अयोग्यता आ जाए तो उसका स्थान रिक्त समझा जाएगा।

कम्पनी अंकेक्षक के नियुक्तिकर्ता (धारा 224)

  1. कम्पनी के संचालकों द्वारा नियुक्ति - कम्पनी के प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति संचालक मण्डल द्वारा समामेलन की तिथि से 1 माह के भीतर की जाएगी; और ऐसे अंकेक्षक प्रथम वार्षिक साधारण बैठक के समाप्त होने के समय तक कार्य करेंगे। किसी अंकेक्षक का पद आकस्मिक रूप से रिक्त हो जाने की दशा में संचालक मण्डल ऐसे रिक्त स्थान को पूरा कर सकता है। इस प्रकार नियुक्त किया गया अंकेक्षण अगली वार्षिक साधारण सभा के अन्त तक कार्य करता रहेगा। हाँ, यदि यह स्थान किसी अंकेक्षक के त्याग-पत्रा देने के कारण रिक्त हुआ है तो उसकी पूर्ति कम्पनी अपनी साधारण सभा में कर सकती है।
  2. प्रत्येक वार्षिक साधारण सभा में नियुक्ति - यदि संचालक मण्डल कम्पनी के प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति नहीं करते हैं, तो कम्पनी अपनी साधारण सभा में प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति कर सकती है। कम्पनी अपनी प्रत्येक वार्षिक साधारण सभा में अंकेक्षक की नियुक्ति करेगी और ऐसे नियुक्त किए गए अंकेक्षक उस सभा के अन्त से अगली वार्षिक साधारण सभा के अन्त तक कम्पनी के अंकेक्षक होंगे। कम्पनी, अंकेक्षक की नियुक्ति सभा के 7 दिन के भीतर, उसकी सूचना प्रत्येक अंकेक्षक को देगी, अवकाश प्राप्त करने वाले अंकेक्षक के लिए ऐसी सूचना देने की आवश्यकता नहीं है। इसके अतिरिक्त इस प्रकार नियुक्त अंकेक्षक, कम्पनी से नियुक्ति की सूचना प्राप्त करने से 30 दिन के भीतर ऐसी नियुक्ति को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने की लिखित सूचना रजिस्ट्रार को देगा।
  3. केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्ति - जब एक वार्षिक साधारण सभा में अंकेक्षक की नियुक्ति नहीं की जाती, जो केद्रीय सरकार रिक्त स्थान को पूरा करने के लिए ऐसी नियुक्ति कर सकती है, जब केन्द्रीय सरकार, द्वारा ऐसी ऐसी नियुक्ति करने के अधिकार का समय हो जाता है, तो कम्पनी को ऐसे समय से 7 दिन के भीतर इस तथ्य की सूचना केन्द्रीय सरकार को देनी चाहिए, और यदि कम्पनी ऐसा नहीं करती, तो कम्पनी तथा कम्पनी का प्रत्येक वह अधिकारी जिसने त्राुटि की है, जुर्माने द्वारा दण्डित किया जाएगा जो कि 500 रु. तक हो सकता है।

अनिवार्य पुनर्नियुक्ति

वार्षिक साधारण सभा में अवकाश ग्रहण करने वाला अंकेक्षक ही, चाहे वह संचालक, साधारण सभा या केन्द्रीय सरकार किसी के भी द्वारा नियुक्त किया गया हो, पुनर्नियुक्त किया जाएगा। केवल निम्नलिखित परिस्थितियों में वह फिर से नियुक्त नहीं किया जा सकता-
  1. पुनर्नियुक्ति के योग्य न हो।
  2. उसने अपनी अनिच्छा लिखित रूप में दे दी हो।
  3. सभा में इस प्रकार का एक प्रस्ताव पास कर दिया गया हो कि उसे फिर से नियुक्त नहीं किया जाएगा अथवा उसके स्थान पर कोई दूसरा अंकेक्षक नियुक्त किया जाएगा।
  4. नये अंकेक्षक को नियुक्त करने की सूचना दी जा चुकी हो, किन्तु प्रस्तावित अंकेक्षक की मुत्यु, अयोग्यता इत्यादि के कारण प्रस्ताव पर विचार न किया गया हो।

विशेष प्रस्ताव द्वारा अंकेक्षक की नियुक्ति

कम्पनी अधिनियम की धारा 224 (A) के अधीन एक ऐसी कम्पनी में एक अंकेक्षक की नियुक्ति प्रत्येक वार्षिक साधारण सभा में विशेष प्रस्ताव द्वारा की जाएगी जिसकी प्रार्थित पूँजी का कम से कम 25: पृथक या संयुक्त रूप से निम्न के पास हो-(1) केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, सरकारी कम्पनी या सार्वजनिक वित्तीय संस्था, (2) प्रान्तीय या राज्य अधिनियम के द्वारा स्थापित ऐसी वित्तीय या अन्य संस्था जिसकी प्रार्थित पूँजी का कम-से-कम 51: राज्य सरकार के पास हो, (3) एक राष्ट्रीयकृत बैंक या एक सामान्य बीमा व्यवसाय करने वाली कम्पनी। यदि उक्त अवस्था में अंकेक्षक की नियुक्ति नहीं होती है तो केन्द्रीय सरकार को नियुक्ति करने का अधिकार है।

कम्पनी अंकेक्षक का हटाया जाना

  1. प्रथम अंकेक्षक का अटाया जाना : यदि प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति संचालकों द्वारा की गई है तो वार्षिक साधारण सभा के दिन प्रथम अंकेक्षक का कार्यालय अपने आप समाप्त हो जाता है लेकिन इस अंकेक्षक की पुनर्नियुक्ति हो सकती है किन्तु कम्पनी चाहे तो साधारण सभा में प्रस्ताव स्वीकृत करके प्रथम अंकेक्षक को हटा सकती है।
  2. अन्य अंकेक्षकों को हटाना जाना - अन्य अंकेक्षकों को कम्पनी अपनी साधारण सभा में उनकी अवधि से पूर्व तभी हटा सकती है जब उसने इसके लिए केन्द्रीय सरकार से पहले अनुमति ले ली हो। ¿धारा 224 (7)À उपर्युक्त व्यवस्था में एक संशोधन यह किया गया है कि कम्पनी प्रथम अंकेक्षक को, जो संचालकों द्वारा नियुक्त किया गया है, साधारण सभा में प्रस्ताव पास करके केन्द्रीय सरकार से स्वीकृति प्राप्त किए बिना भी हटा सकती है।
  3. चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट इन्स्टीट्यूट की सदस्यता छूटने के कारण हटाया जाना: कम्पनी अंकेक्षक वही व्यक्ति बन सकता है जो Institute of Chartered Accounts का सदस्य हो। निम्न कारणों से इन्स्टीट्यूट की सदस्यता से वंचित होने पर कोई अंकेक्षक कम्पनी के पद से हटाया जा सकता है -
    1. यदि उसकी मृत्यु हो गई हो।
    2. यदि उसने सदस्यता से अलग होने के लिए इन्स्टीट्यूट को आवेदन किया है।
    3. यदि उसने इन्स्टीट्यूट की निश्चित फीस का भुगतान नहीं किया है।
    4. यदि उसमें Chartered Accounts Act में उल्लिखित कोई असमर्थता आ गई है।

अंकेक्षक की स्थिति

  1. अंशधारियों का प्रतिनिधि : कम्पनी का अंकेक्षक, अंकेक्षण के लिए अंशधारियों का प्रतिनिधि है। प्रतिनिधि के रूप में वह कम्पनी की पुस्तकों तथा अन्य सभी प्रपत्रों को देख सकता है एवं कम्पनी के प्रबन्धकों से ऐसी सूचनाएँ एवं स्पष्टीकरण माँग सकता है, जिन्हें वह अंकेक्षण के लिए आवश्यक समझे। अधिनियम के अधीन उसे अपनी रिपोर्ट अंशधारियों को देना आवश्यक है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि अंकेक्षक कुल सूचना अंशधारियों को देना चाहे, तो वह सूचना न केवल संचालकों को दी जाए बल्कि अंशधारियों के प्रति दी जाने वाली रिपोर्ट में शामिल कर लेनी चाहिए। अंकेक्षक अंशधारियों के हितों की रक्षा करने के लिए उत्तरदायी होता है।
  2. कम्पनी का अधिकारी : क्या अंकेक्षक कम्पनी के मैनेजर, एकाउन्टेन्ट, आदि की भाँति कम्पनी का अधिकारी है? वास्तव में, अंकेक्षक कम्पनी का अधिकारी नहीं होता है, परन्तु अधिनियम की कुछ धाराओं के अन्तर्गत उसे कम्पनी का अधिकारी माना गया है। ये धाराएँ हैं-477ए 478, 539, 543, 545, 621, 625 और 633।
  3. कम्पनी का नौकर : प्राय: यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अंकेक्षक कम्पनी से पारिश्रमिक प्राप्त करता है, अत: वह कम्पनी का नौकर है। हो सकता है कि वह अन्य कर्मचारियों की भाँति नौकर न हो। वास्तव में उसकी नियुक्ति कम्पनी के संचालकों के कार्यों की जाँच करने के लिए होती है। वास्तव में, यह परिस्थितियों पर ही निर्भर करता है कि अंकेक्षक कम्पनी का अधिकारी है, अथवा नहीं।

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