कीमत विभेद का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

अनुक्रम
जब एकाधिकारी अपनी वस्तु के लिये भिन्न-भिन्न क्रेताओं से भिन्न-भिन्न कीमतें लेता है। तो उसे कीमत विभेद या विभेदात्मक एकाधिकार कहते हैं जैसे हरियाणा बिजली बोर्ड, घरेलू उपयोग के लिए बिजली की दर अधिक वसूल करता है तथा उद्योगों के लिए बिजली की प्रति ईकाई कम दर पर वसूल करता है। अर्थात कीमत विभेद वह स्थिती होती है जिसमें एक वसतु विभिन्न खरीददारों को विभिन्न कीमतों पर बेची जाती हैं। प्रो0 स्टिगलर के अनुसार ‘‘कीमत विभेदीकरण का अर्थ हैं कि तकनीकी दृष्टि से समरूप पदार्थो को इतनी भिन्न-भिन्न कीमतों पर बेचना जो उनकी सीमान्त लागतों के अनुपात से कही अधिक हैं’’

कीमत विभेद के प्रकार

  1. व्यक्तिगत कीमत विभेद : जब एक एकाधिकारी अपनी वस्तु की विभिन्न व्यक्तियों से विभिन्न कीमतें लेता है। उसे व्यक्तिगत कीमत विभेद कहते हैं। जैसे वकील द्वारा अमीर व्यक्तियों से अधिक फीस तथा गरीब व्यक्तियों से कम फीस लेना व्यक्तिगत कीमत विभेद का उदाहरण हैं।
  2. भौगोलिक कीमत विभेद: जब एकाधिकारी फर्म घरेलू बाजार में वस्तु की ऊची कीमत और विदेशी बाजार में कम कीमत लेती हैं तो यह भौगोलिक कीमत लेती हैं तो यह भौगोलिक कीमत विभेद का उदाहरण हैं।
  3. उपयोग कीमत विभेद: जब एकाधिकारी फर्म एक वस्तु के विभिन्न उपयोगों के लिये विभिन्न कीमतें लेती हैं। जैसे घरेलू उपयोग के लिए बिजली की प्रति इकाई कीमत तथा कृषि व उद्योगों में उपयोग के लिये बिजली की प्रति इकाई कम कीमत ली जाती है। यह उपयोग कीमत विभेद है।
  4. समयानुसार कीमत विभेद : जब एकाधिकारी फर्म एक जैसी सेवा के लिये अलग-अलग समय पर अलग-अलग कीमत लेती है। जैसे ट्रनकॉल के रेट (कीमत) दिन में ऊँचे तथा शत में नीचे होते हैं।

कीमत विभेद की श्रेणी

प्रो0 पीगू ने कीमत विभेद की तीन श्रेणीयाँ बताई हैं-
  1. प्रथम श्रेणी कीमत विभेद : इसमे एकाधिकारी विभिन्न क्रेताओं की कीमत वसूल करता है और इस प्रकार एकाधिकारी प्रत्येक उपभोक्ता से सम्पूर्ण बचत खींच लेता हैं।
  2. द्वितीय श्रेणी कीमत विभेद : इसमें एकाधिकारी इस प्रकार से विभिन्न क्रेताओं से कीमत वसूल करता है कि वह उनकी सम्पूर्ण उपभोक्ता की बचत तो नहीं किन्तु उसका एक हिस्सा प्राप्त कर लेता है। भारतीय रेलवे इसी सिद्धांत पर विभिन्न श्रेणीयों के याित्रायो से विभिन्न किराया वसूल करता है।
  3. तृतीय श्रेणी कीमत विभेद : इसके एकाधिकारी माँग की लोच के आधार पर अपने क्रेताओं को दो या दो से अधिक समूहों में बाँट देता है। जिस बाजार में माँग कम लोचदार होती है। वहाँ अधिक कीमत तथा जिस बाजार में मांग अधिक लोचदार होती है। वहाँ कम कीमत वसूल की जाती है।
क्या कीमत विभेद समाज के लिये हानिकारक होता है या लाभदायक
कुछ अवस्थाओं में कीमत विभेद समाज के लिये लाभदायक और कुछ अवस्थाओं में कीमत विभेद समाज के लिये हानिकारक हैं।

कीमत विभेद समाज के लिये लाभदायक

  1. यदि कीमत विभेद के कारण किसी वस्तु की कीमत निर्धन वर्ग के लिये नीची रखी जाये और अमीर वर्ग के लिये ऊँची कीमत रखी जाये तो ऐसी अवस्था में कीमत विभेद समाज के लिये लाभदायक होता है।
  2. बहुत-सी जनसाधारण सेवायें ऐसी होती हैं। जो कीमत विभेद की नीति के बिना साधारण लोगों को प्राप्त नहीं होती हैं। जैसे रेलवे सेवा, डॉक्टर की सेवायें आदि।
  3. यदि कीमत विभेद के अन्र्तगत एकाधिकारी अपनी उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपयोग करके उत्पादन में वृद्धि करता हैं। तो रोजगार में वृद्धि होगी। जिससे कीमत विभेद समाज के लिये लाभदायक होगा।

कीमत विभेद समाज के लिये हानिकारक

निम्न परिस्थितीयों में कीमत विभेद समाज के लिये हानिकारक होता है।
  1. यदि कीमत विभेद के कारण गरीबों को ऊँची किमतें देनी पड़ती है। तो कीमत विभेद समाज के लिये हानिकारक हैं।
  2. यदि राशिपातन की नीति के कारण एकाधिकारी घरेलू बाजार में ऊंची कीमत लेता है और विदेशी बाजार में कम कीमत लेता है तो कीमत विभेद समाज के लिये हानिकारक होगा।
  3. जब एकाधिकारी जान बुझकर (सोच-समझकर) अपने लाभ अधिकतम करने के लिये वस्तु का उत्पादन कम करता है और कीमत बहुत ऊँची वसूल करता है तो कीमत विभेद हानिकारक होता है।

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