क्षेत्रीय असमानता क्या है?

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भारत में असमानता का एक महत्वपूर्ण रूप क्षेत्रीय असमानता है। क्षेत्रीय असमानता का अभिप्राय है देश के विभिन्न राज्यों के आर्थिक तथा प्रति व्यक्ति आय के स्तर में पाई जाने वाली असमानता। देश के कुछ राज्यों जैसे पंजाब, गोवा, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात आदि के आर्थिक विकास की दर एवम् प्रति व्यक्ति आय बहुत अधिक है। इसके विपरीत कई राज्यों जैसे, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, असम आदि के आर्थिक विकास की दर एवम् प्रति व्यक्ति आय काफी कम है।

भारत में असमानता के कारण 

भूमि के स्वामित्व में असमानता

भारत में असमानता अर्थात आय तथा सम्पत्ति में पाई जाने वाली असमानता का मुख्य कारण जमींदारी प्रथा तथा भूमि के स्वामित्व में पाई जाने वाली असमानता है। स्वतन्त्रता से पहले देश में जमींदारी प्रथा पाई जाती थी। इसके फलस्वरूप भू-स्वामित्व में सारी असमानता पाई जाती थी। स्वतन्त्रता के पश्चात् जमींदारी प्रथा समाप्त कर दी गई परन्तु भूमि के स्वामित्व की असमानता में कोई कमी नहीं हुई है। इस समय देश की 10 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या के पास कृषि भूमि का 56 प्रतिशत भाग है तथा 70 प्रतिशत जनसंख्या के पास केवल 14 प्रतिशत भाग है। भूमि के स्वामित्व में पाई जाने वाली असमानता ग्रामीण क्षेत्रा में पाई जाने वाली आय की असमानता का मुख्य कारण है। ग्रामीण क्षेत्रा में भूमिहीन कृषि श्रमिकों तथा छोटे किसानों की आय बहुत कम है। वे बड़ी कठिनाई से अपना जीवन निर्वाह कर पाते हैं। इसके विपरीत बड़े किसानों की आय बहुत अधिक है तथा इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। इन किसानों के पास पूंजी अधिक होती है इसलिए ये टै्रक्टर, ट्यूबवैल, रासायनिक खाद, कीटनाशक, उत्तम बीज आदि का प्रयोग करके अधिक उत्पादन करते हैं। इनकी आय में और अधिक वृद्धि हो जाती है। जबकि छोटे किसान पूंजी के अभाव में अपने खेतों से अधिक उत्पादन नहीं कर पाते हैं। वे पिछड़े तथा निर्धन रह जाते हैं। इस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रा में भू-स्वामित्व की असमानता के कारण आय तथा सम्पत्ति की असमानता में वृद्धि होती है।

शहरी क्षेत्र में सम्पत्ति का निजी स्वामित्व

 शहरी क्षेत्रा में उद्योगों, व्यापार, भूमि, मकानों आदि सम्पत्ति पर निजी स्वामित्व पाया जाता है। कुछ लोगों के अधिकार में अधिकतर शहरी सम्पत्ति होती है। इसके विपरीत शहरों की अधिक जनसंख्या निर्धन होती है। शहरों में पूंजीपति, उद्योगों, व्यापार, यातायात तथा अन्य व्यवसायों में पूंजी का निवेश करके अधिक आय प्राप्त कर पाते हैं, परन्तु शहरों का मध्यम तथा निर्धन वर्ग अपना जीवन निर्वाह भी बड़ी कठिनाई से कर पाता है। यद्यपि यह वर्ग अधिक शिक्षित तथा योग्य होता है परन्तु पूंजी की कमी के कारण इनकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं होने पाता। इसके फलस्वरूप शहरी क्षेत्रा में भी आय तथा सम्पत्ति के वितरण की असमानता बना रहती है।

विरासत का कानून -

भारत में प्रचलित उत्तराधिकार के नियमों के फलस्वरूप भी आय तथा सम्पत्ति के वितरण की असमानता में वृद्धि हुई है तथा यह स्थाई बन गई है। उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार किसी धनी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसकी सम्पत्ति उसकी सन्तान को मिलती है। इस प्रकार धनी व्यक्ति की सन्तान प्रारम्भ से ही धनी हो जाती है। इसके विपरीत किसी निर्धन व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी सन्तान को कोई सम्पत्ति प्राप्त नहीं होती बल्कि ऋण प्राप्त होते हैं और वे आरम्भ से ही निर्धन होते हैं। निर्धन अपने परिश्रम द्वारा ही अपनी आय तथा सम्पत्ति मेंं वृद्धि करने का प्रयत्न कर सकते हैं। परन्तु इसकी सम्भावना बहुत कम होती है क्योंकि इसके लिए उन्हें अवसर नहीं मिलते। अतएव उत्तराधिकार के नियमों ने भारत में असमानता को स्थायी बना दिया है।

व्यावसायिक प्रशिक्षण की असमानता -

व्यावसायिक प्रशिक्षण में पाई जाने वाली असमानता भी आय की असमानता का एक मुख्य कारण है। कुछ व्यवसायों जैसे - डाक्टर, इंजीनियर, कम्पनी प्रबंधक तथा वकीलों आदि की आय अन्य व्यवसायों में लगे हुए लोगों की तुलना में बहुत अधिक होती है। यह प्रशिक्षण के कारण सम्भव हो पाता है। इन व्यवसायों में प्रशिक्षण ग्रहण करना महंगा तथा अधिक समय लेने वाली प्रक्रिया है। परन्तु इन व्यवसायों का प्रशिक्षण प्राप्त करना निर्धन व्यक्तियों के बच्चों के लिए साधारणतया सम्भव नहीं है। इन व्यवसायों में अधिकतर धनी वर्ग के बच्चे ही प्रशिक्षण प्रापत कर पाते हैं। इसके फलस्वरूप आय की असमानता बढ़ती जाती है।

महंगाई -

सन् 1956 से देश में कीमतों के बढ़ने की प्रवृत्ति जारी है। कीमतों के बढ़ने का धनी वर्ग की तुलना में निर्धन वर्ग पर अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके फलस्वरूप निर्धन वर्ग की वास्तविक आय में काफी कमी हो गई है। अतएव मुद्रा स्फीति भी वास्तविक आय की असमानता में होने वाली वृद्धि के लिए जिम्मेदार है।

वित्तीय संस्थाओं की क्रेडिट पॉलिसी-

स्वतन्त्रता के पश्चात् देश में बैंकिंग तथा विशिष्ट वित्तीय संस्थाओं जैसे - औद्योगिक बैंक, औद्योगिक वित्तीय तथा साख निगम राज्य वित्त निगम तथा जीवन बीमा आयोग की स्थापना हुई है। इन संस्थाओं ने पूंजीपतियों को ही अधिक ऋण दिए हैं। निर्धन वर्ग को कम साख सुविधाएं दी गई हैं। इसके फलस्वरूप पूंजीपति ही अपने उद्योगों तथा व्यवसायों का अधिक विकास कर सके हैं। उनकी आय तथा सम्पत्ति में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। इसके विपरीत निर्धन वर्ग पर्याप्त साख के अभाव में अपनी आर्थिक स्थिति में विशेष सुधार करने में असमर्थ रहा है। वित्तीय संस्थाओं की वर्तमान साख नीति के फलस्वरूप भी आय की असमानता में वृद्धि हुई है।

अप्रत्यक्ष करों का अधिक बोझ -

स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत मेंं भारी मात्रा में कर लगाए गए हैं। परन्तु प्रत्यक्ष करों जैस - आय कर, निगम कर आदि की तुलना में अप्रत्यक्ष करों जैसे - उत्पादन कर, बिक्री कर, आयात-निर्यात कर आदि के भार में काफी अधिक वृद्धि हुई है। अप्रत्यक्ष करों का धनी वर्ग की तुलना में निर्धन वर्ग को अधिक भार उठाना पड़ता है। इसके फलस्वरूप निर्धन वर्ग की वास्तविक आय कम होती है। इस प्रकार अप्रत्यक्ष करों के भार में वृद्धि होने के कारण वास्तविक आय की असमानता में अप्रत्यक्ष रूप से वृद्धि हुई है।

भ्रष्टाचार और स्मगलिंग -

स्वतन्त्रता के पश्चात देश में भ्रष्टाचार और स्मगलिंग में काफी वृद्धि हुई है। इसके फलस्वरूप भी आय की असमानता बढ़ी है। जो लोग रिश्वत देने की क्षमता रखते हैं उन्हें कोटा, परमिट, औद्योगिक लाइसेंस आसानी से मिल जाते हैं। इनके द्वारा एक ओर तो उनकी आय में बहुत अधिक वृद्धि होती है और दूसरी ओर जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को रिश्वत दी जाती है उनकी आय में तेजी से वृद्धि होती है। स्मलिंग करने वाले तथा इस कार्य में उन्हें सुरक्षा प्रदान करने वाले अधिकारियों की आय भी बहुत अधिक होती हैं। इसके विपरीत ईमानदारी और कानून के अनुसार कार्य करने वाले लोगों की आय में बहुत कम वृद्धि होती है। भ्रष्टाचार और स्मगलिंग के फलस्वरूप काला धन उत्पन्न होता है। सरकार ने भी समय-समय पर काले धन को कानूनी बनाने अथवा सफेद धन में बदलने के अवसर प्रदान किए हैं। इन सबके फलस्वरूप देश में आय और सम्पत्ति के वितरण की असमानताओं में वृद्धि हुई है।

बेरोजगारी

महालनोबिस समति के अनुसार बेरोजगारी तथा अल्परोजगार भारत में आय की असमानता के प्रमुख तत्व हैं। बेरोजगारी की अवस्था में व्यक्ति आय के सभी स्रोतों से वंचित रह जाता है। भारत में बेरोजगारों की संख्या प्रत्येक योजना के साथ बढ़ी है। 1951 में बेरोजगारों की संख्या लगभग 33 लाख थी जो 1998.99 में बढ़कर 153 लाख हो गई हैं। चूंकि अधिकांश बेरोजगार व्यक्ति समाज के निर्धन वर्गों से जुड़े हुए हैं, अत: समय के साथ इनकी संख्या में वृद्धि होने से आय की असमानता में वृद्धि हुई है।

कर चोरी -

सम्पत्ति के वितरण में असमानता के लिए चारों ओर व्यक्त करों की चोरी भी जिम्मेवार है। जिन अधिकारियों पर करों के इकट्ठा करने की जिम्मेवारी है, वे कार्यकुशल नहीं है। इसके फलस्वरूप लोग करों से बचने में सफल हो जाते हैं। ये लोग या तो कर देते ही नहीं अथवा वास्तविक कर देय राशि से कम कर देते हैं। ऐसे अनैतिक लोग कराधिकारों को झूठे हिसाब-किताब दिखलाते हैं और स्थिति का इस विधि में जोड़-तोड़ करते हैं कि उनके ऊपर कर-भार कम से कम हों।

वाचू समिति के अनुसार - ‘‘जिस आय पर कर की चोरी की जाती है, वह 1,400 करोड़ रुपये के करीब बैठती है। करों की चोरी से काले धन का जन्म होता है।’’

भारतीय अर्थव्यवस्था में काले धन की मात्रा की वृद्धि ने देश में सम्पत्ति तथा आय के वितरण में असमानता को ओर अधिक बढ़ावा दिया है।

असमानताओं को कम करने के लिए सरकार की नीति

स्वतन्त्रता के पश्चात् से ही सरकार इस बात का प्रयत्न कर रही है कि देश में आय तथा सम्पत्ति की असमानता को कम किया जाए। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सरकार द्वारा अपनाई गई नीति की मुख्य विशेषताएं या सरकार द्वारा अपनाए गए मुख्य उपाय हैं -

भूमि सुधार -

ग्रामीण क्षेत्र में आय तथा सम्पत्ति की असमानता को कम करने के लिए भूमि सुधार किए गए हैं। भूमि सुधार सम्बन्धी नीति का मुख्य उद्देश्य भूमि स्वामित्व की असमानता में कमी लाना है। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सरकार ने स्वतन्त्रता के तुरन्त पश्चात ही जमींदारी उन्मूलन सम्बन्धी कानून पास कर दिए थे। इसके फलस्वरूप जमींदारी समाप्त कर दी गई तथा जमींदारी की उच्चतम सीमा से अधिक भूमि का वितरण उस पर काश्त करने वाले काश्तकारों में कर दिया गया। कृषि भूमि की उच्चतम सीमा निर्धारित करने के लिए कानून बनाए गए हैं। सीमा से ऊपर की जमीन उनके स्वािमयों से ली जा रही है। इस ज़मीन का वितरण उन लोगोंं में किया जा रहा है जिनके पास बहुत थोड़ी भूमि थी या जो भूमिहीन थे। परन्तु भारत में भूमि सुधार की प्रगति बहुत धीमी रही है। भूमि सुधार के अधिकतर उद्देश्य अधिक सफल नहीं हो सके हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार-

सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र का तेजी से विकास करने की नीति को अपनाया है। इस क्षेत्र के विकास के कई उद्देश्य हैं परन्तु उनमें से एक महत्वपूर्ण उद्देश्य आय तथा सम्पत्ति की असमानता को कम करना है। यह क्षेत्रा निजी क्षेत्रा के स्वामित्व के विस्तार को रोकने में सहायक है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण का भी यह एक मुख्य उद्देश्य है। इसके फलस्वरूप निजी लोगोंं के हाथ में धन तथा आय में केन्द्रीयकरण को रोकने तथा इस प्रकार समानता को बढ़ाने में मदद मिलेगी। परन्तु 1991 की नई आर्थिक नीति के अनुसार सरकार अब सार्वजनिक क्षेत्रा में स्थान पर निजी क्षेत्रा को अधिक महत्व दे रही है और निजीकरण की नीति को बड़े जोरों से चलाया जा रहा है। इसके फलस्वरूप आय की असमानता में और अधिक वृद्धि होने की सम्भावना है।

स्माल-स्केल और कॉटेज इंडस्ट्रीज को प्रोत्साहन-

पंचवष्र्ाीय योजनाओं की अवधि में लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन देने की नीति को अपनाया गया है। इन उद्योगों को प्रोत्साहन देने से आय तथा सम्पत्ति के केन्द्रीयकरण को रोकने में सहायता मिलने की सम्भावना है। इस नीति के फलस्वरूप औद्योगिक क्षेत्रा में रोजगार के अवसर बढ़ेंगें। इसके फलस्वरूप कृषि क्षेत्रा में छुपी हुई बेरोजगारी वाले मजदूरों को वहां से हटाकर इन क्षेत्रों में रोजगार दिया जा सकेगा। इस प्रकार निर्धन लोगों की आय में वृद्धि होगी। परिणामस्वरूप आर्थिक असमानता कम होगी। कुटीर उद्योगों के विकास के फलस्वरूप निम्न आय वाले लोगों को अपनी आय में वृद्धि करने के अवसर प्राप्त हो सकेंगे। परन्तु नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत निजीकरण और बहुराष्ट्रीय निगमों तथा बड़े स्तर के उद्योगों को ही मिलने वाली सुविधाओं के कारण लघु उद्योगों, आय तथा धन के वितरण की समानता को प्रोत्साहित नहीं कर पायेंगे।

एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथाओं पर नियंत्रण -

शहरी सम्पत्ति के केन्द्रीयकरण को रोकने के लिए सन् 1969 में Monopolies and Restrictive Trade Practices Act 1969 पास किया गया है। इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकना है। सरकार ने इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए औद्योगिक लाइसेंस की नीति को भी अपनाया था परन्तु जैसा कि हजारी समिति, दत्त समिति आदि की रिपोर्टों से ज्ञात होता है, ये सब उपाय अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके हैं। सन् 1991 की औद्योगिक नीति के अनुसार, अधिकतर लोगों के लिए लाइसैंसों को समाप्त कर दिया गया है।

रोजगार और मजदूरी नीतियां -

देश की बेरोजगार जनता को रोजगार प्रदान करके भी आय की असमानता को कम किया जा सकता है। पंचवष्र्ाीय योजनाओं में रोजगार के अवसर अधिक से अधिक बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इस सम्बन्ध में कई विशेष योजनाओं जैसे - छोटे किसानों के विकास की एजेन्सी (SFDA) सीमान्त किसान तथा कृषि श्रमिक एजेन्सी (MFALA), सूखा क्षेत्रा कार्यक्रम (Drought Provne Area Programme), अनाज के बदले काम (Food for Work Programme) को लागू किया गया था। पांचवीय योजना के अन्त में देश में रोजगार के अवसर अधिक बढ़ाने के लिए एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (Integrated Rural Development Programme) तथा छठी योजना में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (National Rural Employment Programme) आरम्भ किया गया था। सातवीं योजना में जवाहर रोजगार योजना (Jawahar Rozgar Yojna) आरम्भ की गई। 1993 में प्रधानमंत्राी रोजगार योजना (Prime Minister Employment Scheme) तथा रोजगार बीमा योजना (Employment Insurance Employment Scheme) आरम्भ की गई। देश में रोजगार कार्यालयों की संख्या में काफी वृद्धि कर दी गई है। परन्तु इन योजनाओं का आय तथा सम्पत्ति के वितरण पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। सरकार ने मजदूरों की आर्थिक स्थिति में सुधार करके आय की असमानता को कम करने के लिए कई प्रकार के उपाय अपनाए हैं। न्यूनतम मजदूरी कानून, बोनस एक्ट आदि कई कानून लागू किए गए हैं। परन्तु सरकार को मजदूरी सम्बन्ध नीति से संगठित क्षेत्रा के श्रमिकों को तो लाभ हुआ है परन्तु असंगठित क्षेत्र पर जहां कुल श्रमिकों के 90: भाग को रोजगार प्राप्त होता है इन नीतियों का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा है। सरकार ने मजदूरों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कई प्रकार के ‘सामाजिक सुरक्षा उपाय’ (Social Security Measures) जैसे - कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (Employee's State Insurance Act), प्रोविडेन्ट एक्ट, मातृत्व लाभ एक्ट (Maternity Benefit Act) आदि भी लागू किए हैं। परन्तु इनका भी आय की असमानता को दूर करने पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।

मूल्य निर्धारण और वितरण नीतियां-

आय की असमानता को कम करने के लिए कीमत तथा वितरण को अपनाया गया है। इनका उद्देश्य समाज के निर्धन वर्ग को सहायता देना है। आवश्यकता की कई वस्तुओं जैसे - चीनी, कपड़ा, कागज आदि के लिए सरकार ने दोहरी कीमत अपनाई है। इसके फलस्वरूप निर्धन वर्ग को सम्पन्न वर्ग की तुलना में वस्तुएं सस्ती प्राप्त होती हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा निर्धन की आवश्यकताओं की वस्तुएं कम कीमत पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। परन्तु इस उपाय का भी आय तथा सम्पत्ति की असमानता को दूर करने पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा है।

राजकोषीय नीति 

राजकोषीय नीति वह नीति है जिसका सम्बन्ध, कुछ निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए, कर प्रणाली तथा सार्वजनिक व्यय की व्यवस्था से है। सरकार ने अपनी राजकोषीय नीति को ऐसी दिशा दी है कि इसके द्वारा आय और सम्पत्ति की असमानता में कमी के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके। आय और सम्पत्ति की असमानता को कम करने के लिए भारत की राजकोषीय नीति में उपाय अपनाए गए हैं: -

कराधान -

सरकार की प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर नीतियों का उद्देश्य आय की असमानता को कम करना है। आय कर, निगम कर और पूंंजी लाभ कर जैसे प्रत्यक्ष कर धनी वर्ग की आय पर प्रगतिशील दर पर लगाया गया है ताकि करों के रूप में उनसे अधिक धनराशि एकत्रित की जा सके। मृत्यु कर तथा सम्पत्ति कर सम्पत्ति की असमानता को कम करने के लिए लगाए गए हैं। निर्धनों को आय कर से मुक्त रखा गया है। विलासिताओं पर भी प्रत्यक्ष कर ऊंची दर पर लगाए गए हैं। इन करों का भार समाज के धनी वर्ग को सहन करना पड़ता है। परन्तु आय की असमानता पर करों का वास्तविक दबाव कुछ असन्तोषजनक ही रहा है। करों की चोरी के कारण प्रत्यक्ष करों का भार धनी वर्ग पर हल्का ही रहा है। धनी किसानों को करों के जाल से अलग ही रखा है, अर्थात् वे करों की सीमा से बाहर है। करों की चोरी या करों से किसी प्रकार बचना एक आम बात देखी जाती है। प्रत्यक्ष कर जांच समिति (Direct Taxation Enquiry Committee) के अनुसार, ‘‘जहां तक करों की चोरी के आकार का सम्बन्ध है, पिछले कई वर्षों में करों की चोरी तथा काले धन की मात्रा बढ़ी है।’’ इसके अतिरिक्त हाल ही के बजटों में मृत्यु कर वापिस ले लिया गया है। सम्पत्ति कर की ऊपर की सीमा बढ़ा दी गई है। अत: आय और सम्पत्ति की असमानता को कम करने के लिए वर्तमान कर प्रणाली की संरचना को नवीन रूप देना होगा।

सार्वजनिक व्यय नीति -

सरकार की सार्वजनिक व्यय नीति का उद्देश्य भी आय की असमानता के विस्तार को कम करना है धनी वर्ग से इकट्ठी की गई मुद्रा-राशि का प्रयोग निर्धन लोगों की आय बढ़ाने के लिए करना है। अन्य शब्दों में, सार्वजनिक व्यय अमीरों से प्राप्त आय का गरीबों में पुनर्वितरण निम्न प्रकार से करता है -
  1. सामाजिक सुरक्षा लाभ - सरकार निर्धन लोगों को कई प्रकार की असुरक्षाओं से बचने के लिए तथा उनका जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिए सहायता प्रदान करती है। ये लाभ कई प्रकार के हैं जैसे बीमारी लाभ, मृत्यु राहत, पारिवारिक पेंशन वृद्धि और अपाहिजों की सामाजिक सुरक्षा आदि।
  2. सब्सिडी- आय की असमानता को दूर करने के लिए सहायता देने की नीति को भी अपनाया गया है। समाज के निर्धन तथा कमजोर वर्ग की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए सरकार कई प्रकार की वस्तुओं जैसे बिजली, सिंचाई और जल आपूर्ति, स्वास्थ्य सेवाएं, दूध व अन्य नागरिक वस्तुओं की आपूर्ति, आवास, शिक्षा आदि के लिए सहायता देती है। सार्वजनिक उद्यम कई वस्तुओं जैसे - रासायनिक उर्वरक, दवाइयों आदि को लागत से भी कम कीमत पर बेचते हैं। परन्तु जहां तक आय की असमानता को कम करने का प्रश्न है, इन उपायों को अपनाने से कोई विशेष सफलता नहीं मिली है। वास्तव में कई सहायताएं किसी आर्थिक औचित्य से नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से दी गई हैं। इसका एक उदाहरण उर्वरक पर रियायत है।
  3. क्षेत्रीय असंतुलन को ठीक करने के उपाय - क्षेत्रीय असन्तुलनों को दूर करने के लिए उपाय अपनाए गए -
    1. वित्त आयोग द्वारा केन्द्रीय वित्त में से अधिक भाग पिछड़े राज्यों को उपलब्ध कराया गया है। इन राज्यों को आय तथा केन्द्रीय उत्पादन कर में से बड़ा भाग दिया गया है।
    2. निर्धन राज्यों के कुशल प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार उन्हें वित्तीय सहायता देती है।
    3. पिछड़े राज्यों में विशिष्ट क्षेत्रा कार्यक्रम जैसे सूखी खेती कार्यक्रम, मरूस्थल विकास कार्यक्रम, सूखा क्षेत्रा कार्यक्रम आदि शुरू किए गए हैं।
    4. सुधरी सूखी खेती तकनीक का प्रयोग तथा प्रचार
    5. पिछड़े बिलों में औद्योगिक विकास के लिए विशेष सुविधाएं।
    6. पिछड़े क्षेत्रों में नए उद्योगों को कर-सम्बन्धी कई रियायतें दी गई हैं। ये उद्योग कई प्रकार की सहायताएं भी प्राप्त कर सकते हैं।
निष्कर्ष- निष्कर्ष में हम कह सकते हैं कि भारत में अभी भी आय तथा सम्पत्ति के वितरण में बहुत अधिक असमानताएं हैं। भारत सरकार, देश में पाई जाने वाली आय तथा सम्पत्ति की असमानता को कम करने के लिए काफी प्रयत्नशील हैं। इसके लिए कई प्रकार के उपाय अपनाए गए हैं, परन्तु भारत सरकार को इस सम्बन्ध में विशेष सफलता प्राप्त नहीं हो सकी हैं। योजना आयोग ने आय तथा सम्पत्ति की असमानता को कम करने के लिए सुझाव दिए हैं: -
  1. कृषि भूमि, शहरी सम्पदा तथा नियिन्त्रात सम्पत्ति का पुनर्वितरण किया जाना चाहिए। ;पपद्ध सार्वजनिक उद्यमों द्वारा कम आय वाले उपभोक्ताओं के लिए आवश्यक वस्तुओं का रियायती कीमतों पर वितरण करना चाहिए। आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।
  2. लघु तथा कुटीर उद्योगों और छोटे किसानों के लिए अधिक साख की व्यवस्था की जानी चाहिए। उनके लिए आवश्यक कच्चे माल की पूर्ति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  3. गांवों तथा शहरों के निर्धन वर्ग को संगठित किया जाना चाहिए। इनके संगठित होने में प्रशासन भी इनकी सहायता आसानी से कर सकता है।
  4. न्यूनतम रोजगार की सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिएं। आठवीं योजना में भी आय तथा सम्पत्ति के वितरण की असमानता को कम करने पर जोर दिया गया है।


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