लागत का सिद्धान्त

By Bandey | | No comments
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उत्पादन लागत क्या है? प्रत्येक फर्म किसी वस्तु का उत्पादन करने के लिए उत्पादन के साधनों का प्रयोग करती है। उत्पादन
के साधनों का प्रयोग करने के लिए जो रकम खर्च करनी पड़ती है उसे उत्पादन लागत कहते हैं। उत्पादन लागत मुख्य रूप
से उत्पादन की मात्रा पर निर्भर करती है।

मौद्रिक लागत 

किसी वस्तु का उत्पादन तथा बिक्री करने के लिए मुद्रा के रूप में जो धन खर्च करना
पड़ता है उसे उस वस्तु की मौद्रिक लागत कहते हैं।

Example : 500 दर्जन कापियों का उत्पादन करने की लागत 2000 रुपए है तो इन दो हजार रुपयों को 500 कापियों
की मौद्रिक लागत कहा जाएगा। अर्थशास्त्राी लागत या मौद्रिक ताकत में निम्नलिखित खर्च को शामिल करते हैं।
(1) कच्चे माल की कीमत (2) ब्याज (3) लगान (4) मजदूरी (5) बिजली या चालक शक्ति का खर्च (6) घिसावट
(7) विज्ञापन का खर्च (8) बीमा (9) पैकिंग (10) ट्रांसपोर्ट पर किए जाने वाला खर्च (11) सामान्य लाभ

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अवसर लागत 

जब किसी एक वस्तु के उत्पादन में साधनों का प्रयोग किया जाता है तो अन्य
वस्तुओं की उन मात्राओं का त्याग करना पड़ता है जिनके उत्पादन में ये साधन सहायक होते हैं।
मान लीजिए, एक किसान एक खेत पर गेहूं तथा चना दोनों फसलें पैदा कर सकता है। यदि 1 हेक्टेयर के खेत पर वह
केवल गेहूं उत्पन्न करता है तो उसे चने का त्याग करना पड़ेगा। यदि चने की मात्रा की कीमत एक हजार रुपए है तो गेहूं
की अवसर लागत 1,000 रुपए होगी। फर्गुसन के अनुसार, ‘‘वस्तु की इकाई उत्पन्न करने की अवसर लागत वस्तु की वह मात्रा है जिसका त्याग
करना पड़ेगा ताकि साधनों का प्रयोग वस्तु के स्थान पर ग् वस्तु का उत्पादन करने के लिए किया जा सके।’’
अवसर लागत में स्पष्ट लागतें तथा निहित लागतें शामिल होती हैं।

  1. स्पष्ट लागतें (Explicit Costs) : एक फर्म द्वारा किए जाने वाले वे सभी खर्चे जिनका भुगतान दूसरों को किया
    जाता है, स्पष्ट लागतें कहलाती हैं। फर्म के द्वारा दी जाने वाली मजदूरी, कच्चे व अर्धनिर्मित माल के भुगतान, ऋणों पर दिया जाने वाला, ब्याज व घिसावट
    पर किए जाने वाले भुगतान आदि स्पष्ट लागतें कहलाती हैं।
  2. निहित लागतें (Implicit Costs) : एक उद्यमी के अपने स्वयं के साधन की लागत को निहित लागतें कहा जाता
    है। एक उद्यमी की अपनी पूंजी पर ब्याज, भूमि का लगान, श्रम की मजदूरी तथा उद्यमी के कार्य के लिए मिलने वाले सामान्य
    लाभ निहित लागतों में शामिल होते हैं।

लागत का सिद्धांत

लागत का परम्परावादी सिद्धांत 

परम्परावादी सिठ्ठांत में समय अवधि के अनुसार लागतों का अध्ययन दो भागों में
किया जाता है।

  1. अल्पकाल में लागत
  2. दीर्घकाल में लागत

अल्पकाल में लागत – 

अल्पकाल समय की वह अवधि है जिसमे उत्पादन के कुछ साधन स्थिर (fixed) होते हैं तथा
कुछ साधन परिवर्तनशील (Veriable) होते हैं। अल्पकाल में कुछ लागत, औसत लागत तथा सीमांत लागत का अध्ययन निम्न
प्रकार से किया जा सकता है।

  1. कुल लागत: एक वस्तु के विभिन्न स्तरों का उत्पादन करने के लिये जो धन व्यय करना पड़ता है
    उसे कुल लागत कहते हैं। यदि 500 कापियों का उत्पादन करने के लिये 200 रुपये कुल खर्च करना पड़ता है तो इन 500
    कॉपियों की कुल लागत 2000 रुपये होगी।
    1. बन्धी या पूरक लागत : अल्पकाल में स्थिर साधनों की कुल लागत को बन्धी लागत कहा जाता है। ये उत्पादन की
      मात्रा के साथ परिवर्र्तित नहीं होती। यदि उत्पादन यदि उत्पादन शून्य हो या अधिकतम हो, बन्धी लागत इतनी ही रहेगी। बन्धी
      लागत में निम्नलिखित खर्च शामिल होते हैं।
    2. परिवर्तनशील लागतें : ये वे लागते हैं जो उत्पादन के घटते बढ़ते साधनों के प्रयोग के लिये खर्च करनी पड़ती है।
      डूली के अनुसार घटती बढ़ती लागत वह लागत है जो उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने पर परिवर्तित होती है। 
  2. औसत लागत –  किसी वस्तु की प्रति इकाई लागत को औसत लागत कहा जाता है।
    1. औसत बन्धी लागत : कुल बन्धी लागत को उत्पादन की मात्रा से भाग देने पर जो भजनफल
      आता है उसे औसत बन्धी लागत कहते हैं।
  3. सीमान्त लागत – किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने से कुल लागत में
    जो अन्तर आता है उसे सीमान्त लागत कहते हैं।

दीर्घकाल में लागतें – 

कोतसुिब्यानी के अनुसार, ‘‘दीर्घकाल वह अवधि है जिसमें सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं।’’
इस अवस्था में कोई बन्धी हुई लागत नहीं होती। सभी लागतें घटती-बढ़ती लागतें होती हैं। अल्पकाल की तरह दीर्घकाल
में भी लागत की तीन धारणायें हैं (1) दीर्घकाल कुल लागत (2) दीर्घकाल औसत लागत (3) दीर्घकाल सीमान्त लागत।

  1. दीर्घकाल कुल लागत .लीभाफास्की के अनुसार, ‘‘दीर्घकालीन कुल उत्पादन के किसी स्तर की न्यूनतम
    कुल लागत है जबकि सभी साधन परिवर्तनशील हैं।’’ दीर्घकालीन कुल लागत सदैव अल्पकालीन कुल लागत से कम होगी या
    उसके बराबर होगी
  2. दीर्घकालीन औसत लागत वक्र : दीर्घकालीन औसत लागत, दीर्घकाल में किसी वस्तु की विभिन्न मात्राओं को उत्पन्न
    करने की प्रति इकाई न्यूनतम सम्भव लागत होती है। दीर्घकाल में प्रत्येक फर्म विभिन्न प्रकार के प्लांटों का प्रयोग कर सकती है। एक निश्चित उत्पादन की मात्रा के लिए
    एक विशेष प्रकार का प्लांट उपयुक्त रहता है क्योंकि उस प्लांट की सहायता से उत्पादन करने से औसत लागत न्यूनतम होती
    है। दीर्घकाल में एक उत्पादक उस प्लांट से उत्पादन करेगा जिससे औसत लागत न्यूनतम हो जाये। उत्पादन की मांग में
    परिवर्तन होने के साथ-साथ वह प्लांट के आकार भी परिवर्तन करता जायेगा। प्रत्येक प्लांट की एक अल्पकालीन औसत लागत
    वक्र (SAC) होती है। इसकी सहायता से हम दीर्घकालीन औसत लागत वक्र (LAC) का अनुमान लगा सकते हैं। मान लीजिए
    एक फर्म दो प्रकार के प्लांटों का प्रयोग कर सकती है। एक छोटा (Small) प्लांट है। उसकी अल्पकालीन लागत वक्र SAC1
    है, दूसरा बड़ा प्लांट है। इसकी अल्पकालीन लागत वक्र SAC2 है। दीर्घकाल में फर्म इन दोनों प्लांटों में से सबसे लाभदायक
    प्लांट पर निवेश करने की योजना बना सकती है। उत्पादन की विभिन्न मात्राओं पर इन दोनों अल्पकालीन लागत वक्रों की
    सहायता से यह ज्ञात किया जा सकता है कि उत्पादन की विभिन्न मात्राओं पर कौन से प्लांट के द्वारा उत्पादन करने में औसत
    लागत न्यूनतम होगी।
  3. दीर्घकालीन सीमान्त लागत : दीर्घकाल में किसी वस्तु की एक अधिक या कम इकाई उत्पन्न करने से कुल लागत में जो
    अन्तर आता है उसे दीर्घकालीन सीमांत लागत कहा जाता है।

आकार का दीर्घकाल औसत लागत वक्र : आधुनिक विचारधारा 

परम्परावादी अर्थशािस्त्रायों तथा आधुनिक अर्थशािस्त्रायों के
लागत सम्बन्धी सिद्धांतों में मुख्य अन्तर यह है कि परम्परवादी
अर्थशास्त्राी लागत वक्रों को U-Shafed मानते हैं जबकि आधुनिक
अर्थशास्त्राी लागत वक्रों को L-Shaped मानते हैं। जिसका अर्थ यह
है कि लागत वक्र या दीर्घकालीन औसत लागत वक्र प्रारम्भ में
तीव्रता से नीचे गिरता है, परन्तु एक बिन्दु के पश्चात् वह स्थिर
रहता है अथवा अपने दाहिने छोर पर धीरे-धीरे नीचे को गिरता
हुआ भी हो सकता है।

Bandey

I’m a Social worker (Master of Social Work, Passout 2014 from MGCGVV University ) passionate blogger from Chitrakoot, India.

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