वस्तु विभेद का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं

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प्रो. चेम्बरलिन के अनुसार एकाधिकारी प्रतियोगिता की एक मुख्य विशेषता वस्तु विभेद है। वस्तु विभेद का अर्थ है कि वस्तुएँ एक-दूसरे के निकट स्थानापन्न (Close Substitute) तो होती हैं परन्तु वे समरूप (Homogeneous) नहीं होतीं और उनमे रंग, नाम, पैकिंग, क्वालिटी आदि का अन्तर पाया जाता है।

बाजार में आपको फोरहन्स, बिनाका, कॉलगेट, सिगनल आदि कई प्रकार के टूथपेस्ट, लिमका, कैम्पा कोला, पेप्सी कोला, कोका कोला, थम्स अप आदि कई ठण्डे पदार्थ मिलते हैं। ये एक दूसरे के स्थानापन्न हैं परन्तु इनमे विभेद भी पाया जाता है।

वस्तु विभेद की परिभाषा

प्रो. चैम्बरलिन (Chamberlin) के अनुसार, ‘‘एक किस्म की वस्तुओं में विभेद उस समय उत्पन्न होता है जब एक विक्रेता की वस्तुओं तथा सेवाओं को दूसरे विक्रेता की वस्तुओं तथा सेवाओं से विभिन्न मानने को कोई महत्वपूर्ण आधार हो। यह आधार वास्तविक या कृित्राम हो सकता है। इसके फलस्वरूप क्रेता एक उत्पादन की वस्तु को दूसरे की तुलना में अधिक पसन्द करता है।’’ ;

वस्तु विभेद की मुख्य विशेषताएं

  1. वस्तु विभेद के फलस्वरूप वस्तुएं पूर्ण प्रतियोगिता की तरह एक रूप (Homogeneous) नहीं होती है।
  2. वस्तु विभेद बाजार की एक वास्तविक स्थिति है। ये वस्तुएं निकट स्थानापन्न (Close Substitutes) होती हैं।
  3. वस्तु विभेद वास्तविक तथा कृित्राम दोनों प्रकार का हो सकता है।
  4. वस्तु विभेद की अवस्था में उत्पादक अपनी-अपनी वस्तुओं के नाम आदि को कानूनी रूप से पेटेन्ट करा लेते हैं उन्हें उस वस्तु के नाम, डिजाइन आदि का एकाधिकार प्राप्त होता है। जैसे वेसपा स्कूटर के उत्पादन का अधिकार केवल एक ही फर्म को है। इसका ट्रेड मार्क रजिस्टर्ड है। दूसरी फर्म इसका प्रयोग नहीं कर सकती। परन्तु वह किसी दूसरे ब्रांड की वस्तुओं का उत्पादन कर सकती हैं। इस प्रकार विभिन्न फर्मों में प्रतियोगिता भी पाई जाती है।
  5. वस्तु विभेद का उद्देश्य कीमत निर्धारित करने की शक्ति प्राप्त करना तथा लाभ में वृद्धि करना। वस्तु विभेद के फलस्वरूप औसत लागत में वृद्धि हो सकती है।
  6. चैम्बरलिन के अनुसार वस्तु विभेद लोगों की अनेक रूपों में विभिन्नता (Variety) की आवश्यकता पूरी करता है। अतएव इसके लिए कुछ अधिक कीमत देना आवश्यक हो जाता है।

वस्तु विभेद तथा मांग वक्र

अर्थशास्त्र में सबसे पहला सराफा ने नीचे गिरती हुई मांग वक्र के आधार के रूप में वस्तु विभेद की धारणा प्रतिपादित की थी। परन्तु कीमत तथा उत्पादन की मात्रा के निर्धारण के आधार के रूप में वस्तु विभेद की धारणा का विकास चैम्बरलिन ने किया था। चैम्बरलिन के अनुसार, किसी फर्म की मांग पर केवल कीमत का ही प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि वस्तु की किस्म (Style of the Product) तथा विक्रय लागत का भी प्रभाव पड़ता है। वस्तु विभेद का उद्देश्य उपभोक्ता को किसी विशेष वस्तु की मांग करने के लिए प्रेरित करना है। यह ध्यान रखना चाहिए कि विभिन्न फर्मों के उत्पादन में विभिन्नता होते हुए भी वे एक दूसरे के निकट स्थानापन्न (Close Substitution) होते हैं। वस्तु विभेद का मुख्य उद्देश्य कीमत निर्धारण पर उत्पादक के प्रभाव को बढ़ाना है। उत्पादक केवल कीमत लेने वाला (Price Taker) ही नहीं रह जाता बल्कि कीमत निर्धारित (Price Maker) करने वाला बन जाता है। इसके फलस्वरूप मांग वक्र का ऋणात्मक झुकाव (Negative Slope) होता है अर्थात् कीमत कम होने पर मांग बढ़ जाती है तथा कीमत के बढ़ने पर मांग कम हो जाती है। वस्तु विभेद के कारण ही मांग वक्र पर विक्रय लागतों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

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