व्यवस्थापिका का अर्थ, परिभाषा, कार्य व भूमिका

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किसी देश या राज्य के शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सरकार की आवश्यकता पड़ती है। सरकार ही वह यन्त्र होता है जो राज्य के उद्देश्यों या लक्ष्यों को अमली जामा पहनाता है। अपने उत्तरदायित्वों का वहन करने के लिए सरकार शासन कार्यों को अपने तीन अंगों में बाँटकर उन्हें पूरा करने का प्रबन्ध करती है। सरकार के तीन अंग - व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका होते हैं। इन तीनों अंगों में व्यवस्थापिका ही सरकार का सर्वोच्च अंग है। व्यवस्थापिका का प्रमुख कार्य सरकार के लिए कानून या विधि-निर्माण का कार्य करना है। अध्यक्षात्मक सरकार में तो विधायिका इस कार्य को स्वतन्त्रतापूर्वक करती है, लेकिन संसदीय प्रजातन्त्र में यह कार्य कार्यपालिका के साथ मिलकर किया जाता है। लेकिन यह बात सबसे अधिक महत्व रखती है कि प्रत्येक शासन-व्यवस्था में कानून निर्माण का उत्तरदायित्व विधायिका के ही कन्धों पर होता है। लोकतन्त्र के विकास के साथ-साथ विधायिका का भी विकास हुआ है।

व्यवस्थापिका का अर्थ और परिभाषा

साधारण शब्दों में विधायिका या व्यवस्थापिका सरकार का वह अंग है जो कानून निर्माण का कार्य करता है। इसे आमतौर पर संसद के नाम से जाना जाता है। संसद शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच शब्द 'Parler' जिसका शाब्दिक अर्थ है - बातचीत करना या बोलना तथा लेटिन शब्द 'parliamentum' से हुई है। संसद को अंग्रेजी में 'Parliament' कहा जाता है। लेटिन शब्द 'Parliamentum' का प्रयोग भी बातचीत के लिए ही होता रहा है। इस प्रकार संसद शब्द का प्रयोग व्यक्तियों की उस संस्था के लिए प्रयोग किया जाता है जो चर्चा या विचार-विमर्श के लिए एकत्रित हुए हों। आज सरकार के कार्यों के सन्दर्भ में संसद को व्यवस्थापिका या विधायिका का नाम दिया जाता है, जिसका सम्बन्ध कानून निर्माण से है। कुछ विद्वानों ने व्यवस्थापिका को परिभाषित करते हुए कहा है :-
  1. गिलक्राइस्ट के अनुसार - “विधानमण्डल सरकार की शक्ति का अधिक भाग है, जिसका सरकार के वित्त तथा कानून निर्माण दोनों पर अधिकार होता है।
  2. एलेन बाल के अनुसार - “विधायिका, कार्यपालिका का परामर्शदाता निकाय है।”
लेकिन आधुनिक समय में विधायिका कार्यपालिका का परामर्शदात्री निकाय न होकर एक विशेष प्रकार का संगठन है, जिसका शासन-व्यवस्था के संचालन में महत्वपूर्ण कार्य होता है। आधुनिक समय में “व्यवस्थापिका व्यक्तियों का ऐसा सामूहिक संगठन है जो कानून बनाने के अधिकार से युक्त होता है।” आधुनिक समय में व्यवस्थापिका की सही परिभाषा फाईनर ने दी है। उसका कहना है कि “विधायिका सरकार का वह अंग है जिसका कार्य जनमत या जनता की इच्छा को कानून निर्माण में लगाना और कार्यपालिका के कार्यों का निर्देशन, निरीक्षण एवं नियन्त्रण करना है।” अत: सार रूप में कहा जा सकता है कि व्यवस्थापिका सरकार का कानून निर्मात्री अंग है जो अध्यक्षात्मक सरकार में तो कार्यपालिका से स्वतन्त्र होता है, लेकिन संसदीय सरकार में कार्यपालिका पर नियन्त्रण भी रखता है। इस दृष्टि से उसके कार्य कानून निर्माण व कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखना, दोनों हैं।

विधायिका या व्यवस्थापिका के कार्य व भूमिका 

व्यवस्थापिका के कार्य व भूमिका अलग-अलग देशों में अलग-अलग हैं। व्यवस्थापिका के कार्यों का निष्पादन शासन प्रणाली की प्रकृति पर निर्भर करता है। जिन देशों में निरंकुश राजतन्त्र होता है, वहां यह पूर्ण रूप से राज्य के नियन्त्रण में रहकर एक सलाहकार समिति के रूप में कार्य करती है। संसदीय सरकार में विधायिका की स्थिति बहुत मजबूत रहती है। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में व्यवस्थापिका के कार्य संविधान द्वारा मर्यादित होते हैं। फाईनर ने व्यवस्थापिका के कार्य - जनता को कानून निर्माण में लगाना और कार्यपालिका के कार्यों का निर्देशन व निरीक्षण करना बताए हैं। व्यवस्थापिका के प्रमुख कार्य हो सकते हैं :-

विधायी या कानून-निर्माण सम्बन्धी कार्य - 

आधुनिक समय में आधारभूत संविधानिक कानूनों को छोड़कर शेष सभी तरह के कानून विधानमण्डल या व्यवस्थापिका द्वारा ही बनाए जाते हैं। जन इच्छा का प्रतिनिधि होने के नाते जनमत की मांगों व दबावों को कानून का रूप देना विधायिका का प्रमुख कर्त्तव्य बनता है। इसी कारण रिनाऊ ने लिखा है - “आधुनिक संसद एक प्रकार के वे कारखाने हैं जिनका कार्य कानून का निर्माण करना है। यहां जनमत के नाम के कच्चे माल को प्रस्तावों, नीतियों और कानूनों में बदला जाता है।” विधायिका समाज में शान्ति बनाए रखने तथा नागरिकों के विकास के लिए अनेक प्रकार के कानून बनाती है। देश की बदली हुई परिस्थितियों में पुराने कानूनों में परिवर्तन या उन्हें रद्द भी करती है। संसदीय सरकार में अधिकतर बिल मन्त्रियों के द्वारा विधानपालिका में पेश किए जाते हैं, क्योंकि मन्त्रीमण्डल का संसद में बहुमत होता है। अध्यक्षात्मक सरकार में मन्त्रियों की बजाय बिलों के बारे में केवल सन्देश राष्ट्रपति ही भेज सकता है। उन्हें स्वीकार करना या न करना विधायिका की मर्जी है। लेकिन विधायिका भी अपनी मर्जी से कानून बनाने को स्वतन्त्र नहीं है। उस पर कुछ संविधानिक प्रतिबन्ध भी हैं। वह संविधान को कानूनी सीमा में रहकर कानूनों का निर्माण कर सकती है। लेकिन स्थिति चाहे कुछ भी हो, कानून निर्माण का कार्य विधायिका को ही करना पड़ता है। इस कार्य में वह अपनी समितियों की सहायता लेती है। ब्रिटेन में तो संसदीय सर्वोच्चता होने के कारण कानून निर्माण पर पूरा अधिकार विधायिका का ही है। संघात्मक शासन प्रणाली वाले भारत जैसे देशों में व्यवस्थापिका को शक्तियों का विकेन्द्रीकरण होने के कारण संसद राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर ही कानून बना पाती है। कानून बनने से पहले उस पर कार्यपालिका के अध्यक्ष के हस्ताक्षर करवाने भी जरूरी होते हैं। हालांकि कार्यपालिका अध्यक्ष उस पर पुर्नविचार करने के लिए बिल को विधायिका के पास लौटा सकता है, लेकिन अन्त में हस्ताक्षर करना उसकी मजबूरी सी बन गई है। कानून बनाने के इस काम में विधायिका को भी आज अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन अन्त में वह कानून-निर्माण में सफलता प्राप्त कर ही लेती है।

कार्यपालिका पर नियन्त्रण - 

कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखना भी विधायिका का ही प्रमुख कार्य है। संसदीय शासन प्रणाली में यह नियन्त्रण प्रत्यक्ष रहता है, क्योंकि मन्त्रीमण्डल का चुनाव उसके द्वारा ही किया जाता है और यह उसके प्रति ही उत्तरदायी होता है। संसदीय शासन प्रणाली मे विधायिका द्वारा नियन्त्रण के अनेक साधनों - कार्यपालिका से प्रश्न व पूरक प्रश्न पूछना, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, कटौती तथा निन्दा प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव आदि का प्रयोग किया जाता है। इसमें व्यवस्थापिका धन की मांग को अस्वीकार करके या कार्यपालिका द्वारा प्रस्तुत नीति, प्रस्ताव या विधेयक को अस्वीकार करके भी नियन्त्रण रख सकती है। इंग्लैण्ड तथा भारत में यही व्यवस्था है। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली वाले देशों में शक्तियों का पृथक्करण होने के कारण विधायिका द्वारा कार्यपालिका पर प्रत्यक्ष नियन्त्रण कर पाना सम्भव नहीं है। इसलिए वह धन की मांग या आवश्यक व्यवस्थापन पारित न करके र्कापालिका को नियन्त्रित रखने का प्रयास करती है। राष्ट्रपति द्वारा की गई नियुक्तियों या सन्धियों का अनुमोदन रोककर भी वह नियन्त्रण की व्यवस्था कर सकती है। राष्ट्रपति पर महाभियोग के लिए जांच आयोग की नियुक्ति करके भी व्यवस्थापिका कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखती है। इस प्रकार शासन व्यवस्था चाहे कोई भी हो, उसमें व्यवस्थापिका का कम या अधिक नियन्त्रण कार्यपालिका पर अवश्य रहता है। भारत में यह नियन्त्रण प्रत्यक्ष व अधिक है, जबकि अमेरिका में अप्रत्यक्ष व कम है।

न्यायिक कार्य - 

यद्यपि न्यायिक कार्य सम्पन्न करना न्यायपालिका का कार्य है, लेकिन आज अनेक देशों में व्यवस्थापिकाएं भी पूर्ण या अर्द्ध-न्यायिक कार्य करती हैं। इंग्लैण्ड में हाऊस ऑफ लार्डस जो संसद का उपरि सदन है, अपील का सर्वोच्च न्यायालय है। अमेरिका में राष्ट्रपति के खिलाफ लगाए गए महाभियोग के बारे में अन्तिम निर्णय देने के लिए सीनेट न्यायालय के रूप में बैठती है। भारत में राष्ट्रपति पर इसी तरह महाभियोग की सुनवाई व निर्णय की व्यवस्था राज्य सभा (उपरी सदन) करती है। स्वीटजरलैण्ड में राष्ट्रीय सभा को संविधान की व्याख्या करने का अधिकार प्राप्त होने के कारण वह भी न्यायिक कार्य करने वाली व्यवस्थापिका कहलाती है। लेकिन भारत तथा अमेरिका में आज तक किसी राष्ट्रपति को महाभियोग का परिणाम नहीं भुगतना पड़ा है। अत: व्यवस्थापिका न्यायिक कार्य भी करती है।

वित्तीय कार्य - 

प्रत्येक देश में राष्ट्रीय वित्त को सही ढंग से खर्च करने के लिए सुव्यवस्था व्यवस्थापिकाएं ही करती हैं। वास्तव में धन ही किसी राजनीतिक व्यवस्था व समाज का आभार होता है। यदि इसका दुरुपयोग किया गया तो राजनीतिक व्यवस्था पर आने वाले संकटों से कोई नहीं बचा सकता। मेडिसन ने लिखा है - “जिसके पास वित्तीय शक्ति है, उसी के पास वास्तविक शक्तियां होती हैं।” प्रजातन्त्रीय देशों में वित्तीय शक्ति पर नियन्त्रण की व्यवस्था विधायिका के निम्न सदन (निर्वाचित सदन) को सौंपी गई है। उसकी स्वीकृति के बिना एक भी पैसा खर्च नहीं किया जा सकता। नए कर लगाना तथा अनावश्यक करों को समाप्त करना भी व्यवस्थापिका का ही कार्य है। वित्त विधेयक भी हमेशा निचले सदन में ही पेश किया जाता है। वह धन कटौती का प्रस्ताव पेश कर सकता है। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में वित्त विधेयक पूर्ण रूप से कार्यपालिका द्वारा ही तैयार कराकर विधायिका के पास भेजा जाता है, लेकिन प्राय: विधायिका उसमें से कुछ राशि काटकर उसे पास करती है। यद्धपि विधायिका की वित्तीय शक्तियों पर भी सभी देशों में अनेक प्रतिबन्ध हैं लेकिन अन्तिम रूप में किसी न किसी तरह व्यवस्थापिकाएं वित्तीय कार्यों का सम्पादन सफलता के साथ करने में कामयाब हो ही जाती है।

संविधान में संशोधन सम्बन्धी कार्य -

व्यवस्थापिका को संविधान में संशोधन करने का भी अधिकार प्राप्त होता है। कुछ देशों में तो यह अधिकार पूर्ण रूप से प्राप्त है और कुछ में आंशिक। कूुछ देशों में तो विधायिका साधारण बहुमत से संविधान में संशोधन कर देती है, लेकिन कुछ में विशेष प्रक्रिया के तहत ही संशोधन करना पड़ता है। भारत में यह कार्य संसद तीन तरह से कर सकती है - (1) संसद के साधारण बहुमत से (2) संसद के दो तिहाई बहुमत से (3) संसद के दो तिहाई बहुमत तथा आधे से अधिक राज्यों की स्वीकृति से। ब्रिटेन में यह कार्य साधारण बहुमत द्वारा ही सम्पन्न हो जाता है। स्विटजरलैण्ड में संशोधन सम्बन्धी प्रस्ताव जनता के सामने जन-निर्णय के लिए पेश किए जाते हैं। वहां जनता को संविधान संशोधन का प्रस्ताव रखने का अधिकार है। संशोधन प्रस्ताव पर कैंटनो की स्वीकृति आवश्यक होती है। अमेरिका, जर्मनी, स्विटजरलैण्ड आदि देशों में संसद को संधोधन का आंशिक ही अधिकार प्राप्त है, जबकि भारत तथा ब्रिटेन में उसे संशोधन करने का पूरा अधिकार प्राप्त है। संशोधन का यह अधिकार संसदीय देशों में व्यवस्थापिका की सर्वोच्चता को सिद्ध करता है।

निर्वाचन सम्बन्धी कार्य -

संसार के सभी देशों में विधायिका को चुनाव सम्बन्धी कार्य भी करने पड़ते हैं। भारत में राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के चुने हुए सदस्य तथा प्रान्तीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा मिलकर किया जाता है। स्विटजरलैण्ड में राष्ट्रीय सभा, मन्त्रीपरिषद्, न्यायधीशों तथा प्रधान सेनापति का चुनाव करती है। रूस में सुप्रीम सोवियत (संसद) ही कार्यपालिका के सदस्य तथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों का चुनाव करती है। इंग्लैण्ड तथा भारत में निम्न सदन स्पीकर का चुनाव करता है। चीन में संघीय राष्ट्रपति संसद के द्वारा ही चुना जाता है। अमेरिका में कांग्रेस निर्वाचनों, निर्वाचन विवरणों तथा सदस्यों की निर्वाचन सम्बन्धी योग्यताओं का निर्णय करने का अधिकार रखती है। जापान में डाइट (संसद) प्रधानमन्त्री का चुनाव करती है। इस तरह सभी देशों में व्यवस्थापिका निर्वाचन सम्बन्धी कार्य भी करती है।

विमर्शात्मक कार्य - 

कोई भी कानून तभी लोकप्रिय हो सकता है, जब वह व्यापक सूझ-बूझ व विचार-विमर्श से निर्मित हो। इसलिए व्यवस्थापिका अच्छे कानून का निर्माण करने के लिए व्यापक विचार-विमर्श करती है। व्यवस्थापिका अनेक हितों, दृष्टिकोणों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाला सभा स्थल है। इसमें सार्वजनिक विषयों, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय विषयों के बारे में व्यापक विचार-विनिमय होता है। इसमें शासन सम्बन्धी सारी बातों पर आवश्यक विचार करके ही निर्णय किया जाता है। अपना कार्य सही ढंग से करके वास्तव में व्यवस्थापिका उचित व्यवस्थापन कार्य ही करती है। इस कार्य को करने में व्यवस्थापिका की समितियां उसका पूरा सहयोग करती है।

अन्य कार्य - 

आज का युग कल्याणकारी राज्यों का युग है। संसदीय पद्धति के विकसित हो जाने से कानून बनाने तथा प्रशासन पर नियन्त्रण रखने का कार्य कार्यपालिका भी करने लगी है। लेकिन इससे व्यवस्थापिका का बोझ कम नहीं हुआ है। वह आज अनेक उत्तरदायित्वों से लदी हुई है। उसे उपरोक्त कार्यों के अतिरिक्त भी कार्य करने पड़ते हैं। लोकमत का निर्माण करने, जनमत को शिक्षित करने, जनता की शिकायत दूर करने, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर नजर रखने, प्रतिनिधित्व करने, हित-स्वरूपीकरण और हित-समूहीकरण करने, राजनीतिक समाजीकरण तथा पर्यवेक्षण व निगरानी सम्बन्धी कार्य भी आज विधायिका को ही करने पड़ते हैं। ये कार्य संसदीय देशों में तो व्यवस्थापिका के महत्वपूर्ण कार्य बन रहे हैं। इसी कारण फ्रेडिक ने लिखा है - “आधुनिक समय में एक प्रतिनिधि सभा का मूल कार्य कानून-निर्माण उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि आम जनता की राजनीतिक शिक्षा, प्रचार-कार्य तथा विभिन्न मतों, विचारों और मतभेदों का एकीकरण है।” लेकिन व्यवस्थापिका की यह भूमिका लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्थाओं तक ही सिमटकर रह जाती है। अधिनायकवादी देशों में उसकी भूमिका सिकुड़ जाती है।

व्यवस्थापिका की भूमिका का मूल्यांकन

यद्यपि व्यवस्थापिकाएं प्रत्येक देश में पाई जाती हैं और कुछ या अधिक कार्यों का निष्पादन भी करती हैं, लेकिन आज उनकी भूमिका सिकुड़ रही है। अधिकतर देशों में तो उनके कार्यों का निष्पादन औपचारिकता मात्र रह गया है। आज संवैधानिक देशों में व्यवस्थापिकों की भूमिका विधि-निर्माण में कम हो रही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लोकतन्त्रीय देशों में इसकी भूमिका महत्वहीन हो गई है। इन देशों में सरकारी और अन्य राजनीतिक कार्य इन्हीं के द्वारा पूरे किए जाते हैं। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में सरकार के कार्यों पर विधायिका का प्रभाव स्वतन्त्र व अधिक है। ब्रिटेन में संसदीय प्रणाली होने के कारण इनका प्रभाव द्विदलीय व्यवस्था के तहत कार्यपालिका जितना ही है, किन्तु भारत में व्यवस्थापिका का प्रभाव कम है। सोवियत संघ में एकदल के आधिपत्य के कारण यह भारत या अमरीका जितनी भी प्रभावी नहीं है। आज भारत में संसद की वह स्थिति नहीं है जो 26 जून 1975 से पहले थी, लेकिन ब्रिटेन की संसद आज भी आदर की संस्था है। इसका जो कुछ भी प्रभाव है, वह इस कारण है कि यह राजनीतिक सत्ता को वैधता प्रदान करती है। जनता को राजनीतिक शिक्षा देने तथा काण्डों का भाण्डाफोड़ करने में आज व्यवस्थापिका अपनी भूमिका बेखूबी निभा रही है। स्वेच्छाचारी देशों में भी व्यवस्थापिका के बिना शासकों का काम नहीं चल सकता। इण्डोनेशिया और पाकिस्तान में सैनिक शासन के बाद भी किसी न किसी रूप में व्यवस्थापिकाएं अवश्य हैं। बर्मा में जनरल बेविन आज भी इसके कारण ही शासन कर रहे हैं। नेपाल मे लोकतन्त्र का गला घोटने के बाद भी राष्ट्रीय पंचायत के रूप में व्यवस्थापिका आज भी मौजूद है। तानाशाही देशों में व्यवस्थाएं चाहे दिखावा मात्र ही क्यों न हो, हैं अवश्य। कुछ तानाशाही देशों में तो व्यवस्थापिकाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। यूगोस्लाविया में मार्शल टीटो आज भी व्यवस्थापिका को ही काफी महत्व देते हैं। इसलिए तानाशाही देशों में व्यवस्थापिकाओं की भूमिका शासक वर्ग की सोच पर निर्भर करती है। इसी तरह सर्वसत्ताधिकारवादी देशों में व्यवस्थापिका की भूमिका का मुख्य नियामक, निर्देशक व नियन्त्रक साम्यवादी दल होता है। विकासशील देशों में संस्थागत आधारों के अभाव में व्यवस्थापिकाएं न तो सरकारी कार्यों का ठीक तरह से निष्पादन कर पा रही हैं और न ही राजनीतिक कार्यों का। इन देशों में व्यवस्थापिकाएं हंगामा स्थल बनकर रह गई हैं। इन देशों में व्यवस्थापिकाओं की भूमिकाओं को प्रभावी रखने के लिए अनुकूल संस्कृति का निर्माण व विकास नहीं हो पाया है। बहुदलीय प्रणाली तथा सांझा सरकार के प्रतिमान ने आज व्यवस्थापिका की भूमिका को धराशाही कर दिया है। लेकिन धीरे-धीरे विकासशील देशों में व्यवस्थापिकाओं की भूमिका में सुधार होता नजर आ रहा है। अत: सार रूप में कहा जा सकता है कि व्यवस्थापिकाओं की भूमिका राजनीतिक व्यवस्था तथा शासन-प्रणाली विशेष की प्रकृति पर निर्भर करता है।

व्यवस्थापिका का संगठन 

आधुनिक युग प्रतिनिधि लोकतन्त्र का युग है। इसमें कानून बनाने का पूरा उत्तरदायित्व जन-प्रतिनिधियों के संगठन व्यवस्थापिका का है। कई देशों में व्यवस्थापिका एक सदनीय है और कई में द्विसदनीय। लेकिन यह बात तो सत्य है कि किसी भी देश में विधानमण्डल का व्यवस्थापिका अवश्य पाई जाती है। इस बात का कोई सर्वसम्मत राय आज तक नहीं बन पाई है कि व्यवस्थापिका का एक सदन हो या दो, जहां जे0एस0 मिल, सर हैनरी मेन तथा लेकी जैसे विद्वान दो सदनीय विधायिका का समर्थन करते हैं, वहीं बेन्थम, अबेसियस तथा बैंजमन फ्रेंकलिन जैसे विद्वान एक सदनीय विधायिका का ही पक्ष लेते हैं। आज विश्व के आधे से अधिक देशों में एक सदनीय व्यवस्थापिकाएं हैं। जिन देशों में एक सदन है, उस देश की व्यवस्थापिका एक सदनीय व्यवस्थापिका तथा जहां व्यवस्थापिका के दो सदन हैं, उसे द्वि-सदनीय व्यवस्थापिका की संज्ञा दी जाती है। जहां पर दो सदन है उनमें से एक को निम्न सदन तथा दूसरे को उपरि सदन कहा जाता है। भारत, इंग्लैण्ड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका, श्रीलंका आदि में द्वि-सदनीय विधायिकाएं हैं, जबकि चीन, पाकिस्तान, रोडेशिया, तुर्की, पुर्तगाल आदि देशों में एक-सदनीय विधायकाएं हैं।

एक सदनीय व्यवस्थापिका

जिस देश में व्यवस्थापिका का एक सदन होता है उसे एक सदनीय व्यवस्थापिका कहा जाता है। यह पद्धति आज विश्व के अनेक देशों में प्रचलित है। यह पद्धति 18वीं तथा 19वीं सदी के दौरान अधिक लोकप्रिय रही और आज भी है। इस पद्धति के समर्थकों का कहना है कि लोकप्रिय सम्प्रभुता जनता में निवास करती है और उसका प्रतिनिधित्व केवल एक ही सदन द्वारा होना चाहिए। सीएज का कहना है कि “कानून लोगों की इच्छा का परिणाम है। लोग एक समय में एक ही विषय पर दो भिन्न इच्छाएं नहीं रख सकते, इसलिए कानून निर्माण करने वाली सभा भी, जो जनता का प्रतिनिधित्व करती है, अनिवार्यता एक ही होनी चाहिए।” बीन्जामिन फ्रैंकलीन ने भी एक सदन का ही समर्थन किया है। आज यूनान, यूगोस्लाविया, चीन, पाकिस्तान, तुर्की आदि देशों में एक-सदनीय व्यवस्थापिकाएं हैं।

एक सदनीय विधायिका के पक्ष में तर्क

आज अनेक देशों में एक सदनीय व्यवस्थाएं हैं। इसके समर्थक कहते हैं कि जनमत का प्रतिनिधित्व एक ही सदन कर सकता है, दो नहीं इसके पक्ष में तर्क दिए जाते हैं :-
  1. एकसदनीय व्यवस्था सम्प्रभुता के सिद्धान्त की समर्थक है। इसके समर्थकों का कहना है कि सम्प्रुता की अभिव्यक्ति जनता की इच्छा में होती है जिसका प्रतिनिधित्व व्यवस्थापिका द्वारा ही होता है। यह सम्प्रभु की इच्छा अखण्ड या अविभाजित होती है। इसलिए इसका प्रतिनिधित्व एक सदन से ही होना चाहिए।
  2. एकसदनीय व्यवस्थापिका में उत्तरदायित्व सुनिश्चित रहता है। इसमें उत्तरदायित्व का दो सदनों या दो स्थानों पर विभाजन नहीं होता।
  3. यह सार्वजनिक हित के अनुकूल है। द्वितीय सदन तो धनवान वर्गों का पोषक है।
  4. इससे समय व धन दोनों की बचत होती है।
  5. इसमें दो सदनों में पाए जाने वाले गतिरोध की सम्भावना नहीं होती है।
  6. यह अच्छे व उपयोगी कानूनों का निर्माण करती है।
  7. यह सरल पद्धति है। इसके आधार पर विधायिका का संगठन आसानी से समझा जा सकता है।

एक सदनीय विधायिका के विपक्ष में तर्क 

एक सदनीय विधायिका के विपक्ष में द्वि-सदनीय विधायिका के समर्थक तर्क देते हैं :-
  1. एकसदनीय विधायिका के स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश बनने के आसार अधिक होते हैं, क्योंकि कानून-निर्माण की सारी शक्ति उसी में केन्द्रित होती है।
  2. एक सदनीय विधायिका जल्दबाजी में एकपक्षीय और तर्कहीन कानूनों का निर्माण करती है।
  3. एकसदनीय विधायिका में शक्तियों का केन्द्रीयकरण प्रजातन्त्र के सिद्धान्तों के विपरीत है। इससे वैयक्तिक स्वतन्त्रता को खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  4. आज के कल्याणकारी राज्यों के युग में व्यवस्थापिका के कार्य भी बढ़ गए हैं। एकसदनीय विधायिका द्वारा उन्हें पूरा करना सम्भव नहीं है।
  5. एक सदनीय विधायिका में सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल सकता। इसलिए दूसरे सदन का होना आवश्यक है।
  6. एकसदनीय विधायिका में व्यवस्थापिका अपनी गलतियों का पुनरावलोकन नहीं कर सकती।
  7. एकसदनीय व्यवस्थापिका संघात्मक शासन-व्यवस्था के अनुपयुक्त रहती है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि एकसदनीय विधायिका लोकतन्त्र की आस्था के विपरीत है। इसके अवगुणों के कारण आज द्विसदनीय विधायिका का प्रतिमान अधिक लोकप्रिय होता जा रहा है।

द्विसदनीय व्यवस्थापिका 

द्विसदनीय व्यवस्थापिका की परम्परा ब्रिटेन की देन है। सबसे पहले ब्रिटेन में संसद के दो सदन विकसित हुए थे। बाद में सभी प्रजातन्त्रीय देशों ने ब्रिटिश प्रतिमान का ही अनुसरण किया है और उनमें द्विसदनीय विधायिकाएं हैं। प्रत्येक देश में निम्न सदन जन साधारण का प्रतिनिधित्व करता है और उच्च सदन जनता के कुछ विशिष्ट वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है। जनसाधारण का प्रतिनिधित्व करने के कारण निम्न सदन, उच्च सदन से अधिक शक्तिशाली भी होता है। लेकिन आज विश्व के अनेक देशों में द्विसदनीय विधायिका का परम्परा का ही निर्वहन हो रहा है। पृथक सदन की रचना तो जनप्रतिनिधियों द्वारा ही होती है, जबकि उच्च सदन के रचना के बारे में अलग-अलग प्रावधान है। ब्रिटेन में यह वंशानुगत आधार पर होती है तो अमेरिका में निर्वाचन के आधार पर होती है। जापान, इटली और कनाडा में उच्च सदन के सदस्यों का मनोनयन होता है। भारत में निर्वाचन तथा मनोनयन के बीच की व्यवस्था द्वारा उच्च सदन (राज्य-सभा) की रचना होती है। आज अनेक देशों में विधायिका के दूसरे सदन की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत, कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि देशों में द्विसदनीय विधायिकाएं हैं।

द्विसदनीय व्यवस्थापिका के पक्ष में तर्क

सर हैनरी मेन का कहना है कि व्यवस्थापिका का दूसरा सदन अवश्य होना चाहिए ताकि पहले सदन की निरंकुशता को रोका जा सके। लोकतन्त्र के चढ़ते ज्वार ने व्यवस्थापिका को सम्पूर्ण शक्ति का केन्द्र बना दिया है। नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा करने तथा व्यवस्थापिकाओं को दलीय हितों का पोषक बनने से रोकने के लिए आज द्विसदनीय विधायिका का सिद्धान्त प्रबल हो गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार प्रथम सदन यदि अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता है तो उसे दूसरे सदन द्वारा रोका जा सकता है, क्योंकि द्वितीय सदन के रूप में शक्ति को शक्ति का नियन्त्रक बनाया गया है। इसकी स्थापना का उद्देश्य ही पहले सदन की तानाशाही पर रोक लगाना है। द्विसदनीय विधायिका के समर्थक इसके पक्ष में तर्क देते हैं :-
  1. दूसरा सदन पहले सदन की निरंकुशता पर रोक लगाता है - द्विसदनीय विधायिका के समर्थकों का कहना है कि जिस देश में विधानपालिका का एक ही सदन होता है, उसके निरंकुश बनने की सम्भावना अधिक रहती है। साधारणतया यह बात सत्य निकलती है कि शक्ति मनुष्य को भ्रष्ट करती है और निरंकुश शक्ति उसे पूर्ण भ्रष्ट कर देती है। व्यवस्थापिका के प्रथम सदन के सदस्य यद्यपि जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं, लेकिन फिर भी उनके पथ-भ्रष्ट होने की सम्भावना तो रहती है। जिस दल का सदन में बहुमत होता है, वह अपनी मनमानी करके स्वेच्छाचारी कानूनों का निर्माण कर सकता है और अल्पसंख्यकों के हितों की अनदेखी कर सकता है। लीकाक ने कहा है कि एकसदनीय व्यवस्थापिका निरंकुश और अनुत्तरदायी होती है। इसी तरह लेकी ने भी सरकार के सभी रूपों में सर्वशक्तिसम्पन्न लोकतन्त्रीय सदन को बुरा बताया है। जे0एस0गिल ने लिखा है - “दूसरे सदन के अभाव में एक सदन निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी हो जाता है। अत: अविभाजित सत्ता के दूषित प्रभाव को रोकने के लिए दूसरा सदन आवश्यक है।” गैटेल ने भी लिखा है - “यदि कानून बनाने की सारी शक्ति एक सदन में ही केन्द्रित कर दी गई तो इस सदन के राज्य में सारी राजनैतिक सत्ता अपने हाथ में लेने, भ्रष्टाचारी तथा अत्याचारों का भय अधिक हो जाएगा। इसलिए दूसरे सदन की स्थापना भी अनिवार्यता करनी ही चाहिए।” लार्ड एकटन ने ठीक ही कहा है-”स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए दूसरा सदन अति आवश्यक है।” जे0एस0 मिल ने भी दूसरा सदन पहले सदन की निरंकुशता को रोकने के लिए आवश्यक माना है। स्टोरी ने भी कहा है-”व्यवस्थापिका के अत्याचारों से बचने का यही उपाय है कि उसके कार्यों का विभाजन कर दिया जाए। हित के विरुद्ध हित, इच्छा के विरुद्ध इच्छा का गठबन्ध या प्रभुत्व खड़ा कर दिया जाए।” इसी तरह ब्राईस ने भी इसी बात पर जोर दिया है कि पहले सदन की निरंकुशता को रोकने के लिए दूसरा सदन आवश्यक है।
  2. दूसरा सदन अविचारपूर्ण तथा जल्दबाजी में पास किए गए कानूनों को रोकता है - पहले सदन द्वारा अविचारपूण्र तथा जल्दी में पास किए गए कानूनों को रोकने के लिए दूसरा सदन बहुत आवश्यक होता है। पहले सदन को जनता द्वारा निर्वाचित किया जाने के कारण, चुनाव के समय उसके सदस्यों ने जनता के साथ कुछ वायदे किए होते हैं, इसलिए चुनावों के बाद सरकार बनने पर उस सदन के नेता जोश में आकर गलत कानून बना देते हैं। ऐसे कानून जनता को थोड़े समय के लिए तो खुश कर देते हैं, लेकिन उनके परिणाम भयानक होते हैं। एक सदन के पास काम की अधिकता के कारण भी कानूनों को बिना पूर्ण सोच विचार के पास करने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। इसलिए अच्छे कानूनों का निर्माण करने के लिए तथा पहले सदन के द्वारा बनाए गए कानूनों पर विचार करने के लिए दूसरे सदन की महती आवश्यकता है। इससे कानून की गलतियां दूर हो जाती हैं और जो कानून बनता है, उसका प्रभाव अधिक स्थाई रहता है। सोच विचारकर बनाए गए कानून ही राजनीतिक समाज का आधार मजबूत कर सकते हैं। बलंशली ने दूसरे सदन का समर्थन करते हुए लिखा है-”चार आंखें दो आंखों की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह देख सकती हैं, विशेषतया जब किसी विषय पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार करना आवश्यक हो।” लेकी ने भी दूसरे सदन की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह बात सही है कि दूसरे सदन के नियन्त्रण के बिना पहले सदन की न तो निरंकुशता को रोक पाना सम्भव है और न ही अच्छे कानूनों का निर्माण सम्भव है।
  3. दूसरा सदन पहले सदन के समय की बचत करता है - आज का युग कल्याणकारी राज्यों का युग है। इसमें राज्यों के कार्यों में अपार वृद्धि हो चुकी है। इससे विधानमण्डल के कार्य भी बहुत बढ़ गए हैं। एक सदन के पास कार्यों का बोझ इतना अधिक हो गया है कि वह उसे सम्भालने में परेशानी महसूस करने लगा है। इसके सदस्य बार बार बदलने के कारण विधायिका को शासन की जटिलता समझने का अवसर प्राप्त नहीं होता। विकासशील देशों में तो राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह समस्या और भी अधिक गहरी है। इसलिए दूसरा सदन स्थाई सदन होने के कारण शासन की बारीकियों को समझने में सक्षम होता है और प्रथम सदन के कार्यभार को कम भी कर सकता है। दूसरे सदन में अधिक अनुभवी व योग्य व्यक्ति होते हैं, जिससे प्रशासनिक कार्यों में भी असुविधा रहती है। बिलों पर वाद-विवाद करके पहले सदन का समय बचाने में भी दूसरा सदन उपयोगी है। दूसरे सदन में जो बिल पेश किये जाते हैं, वे प्राय: कम महत्व के होते हैं। उन पर दूसरा सदन ही प्राय: विचार-विमर्श करके पहले सदन के कीमती समय को नष्ट होने से बचा लेता है और पहले सदन को आवश्यक बिलों पर व्यापक विचार-विमर्श करने का पर्याप्त समय मिल जाता है। 
  4. दूसरा सदन विशेष हितों और अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए आवश्यक है - निम्न सदन में बहुमत का प्रतिनिधित्व होने के कारण प्राय: अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का पोषण करने वाला प्रतिनिधि वर्ग पीछे रह जाता है। शांति की स्थापना के लिए यह जरूरी होता है कि समाज के सभी वर्गों को शासन में भागीदार बनाया जाएं जनता द्वारा निर्वाचित होने के कारण कई बार पहले सदन में समाज के कुछ विशेष वर्गों या अल्पसंख्यक वर्गों के हितों की अनदेखी हो जाती है। इसलिए उनके हितों को प्रतिनिधित्व देने के लिए दूसरे सदन की व्यवस्था जरूरी है। इसके अतिरिक्त देश में कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जो चुनाव लड़ना पसंद नहीं करते, परन्तु उनकी योग्यता की देश को आवश्यकता होती है। द्वितीय सदन में ऐसे ही योग्य, अनुभवी, कुशल व बुद्धिजीवियों को मनोनीत कर लिया जाता है। भारत में राष्ट्रपति को राज्यसभा या उच्च सदन में 12 ऐसे सदस्य मनोनीत करने का अधिकार है जिन्होंने साहित्य, कला, विज्ञान, इतिहास तथा समाजसेवा में उल्लेखनीय कार्य किया हो। इसी तरह ब्रिटेन में सम्राट या साम्राज्ञी को ऐसे ही योग्य व्यक्तियों को लार्ड सदन में मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त है।
  5. दूसरा सदन स्थाई है - द्वितीय सदन का कार्यकाल पहले सदन की तुलना में अधिक होता है। संसदीय शासन प्रणाली वाले देशों, विशेषतौर पर विकासशील देशों में जहां सरकार अस्थिर होती है, वहां तो इसका महत्व स्थायित्व के कारण अधिक बढ़ जाता है। भारत तथा इंग्लैण्ड में प्रधानमन्त्री की सलाह से राष्ट्राध्यक्ष व शासनाध्यक्ष निम्न सदन को निर्धारित अवधि से पहले भी भंग कर सकता है। परन्तु भारत में राज्यसभा और इंग्लैंड में लार्ड सदन स्थाई सदन हैं। उन्हें किसी भी अवस्था में भंग करने का अधिकार किसी को भी नहीें है। भारत व अमेरिकामें ऊपरी सदन की अवधि तो 6 वर्ष है, लेकिन निम्न सदन की 5 वर्ष है। भारत में अविश्वास प्रस्ताव पारित करके इस सदन को समय से पहले भी प्रधानमन्त्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा भंग किया जा सकता है। अधिक स्थाई होने के कारण स्थाई शासन के गुण इस सदन में ही होते हैं और जनता को इसके स्थायित्व व इसके सदस्यों की योग्यता का पूरा लाभ मिलने लगता है। यह स्थायित्व अच्छे शासन व अच्छे कानून दोनों के हित में है।
  6. दूसरा सदन संघात्मक राज्यों के लिए अनिवार्य है - जिन देशों में संघात्मक सरकार की स्थापना की गई है, वहां विधायिका का दूसरा सदन जरूरी है। पहले सदन (निम्न सदन) के सदस्यों का चुनाव तो आबादी के आधार पर होता है, जिससे अधिक आबादी वाले राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिल जाता है। इससे कम आबादी वाले राज्यों को प्रतिनिधित्व की हानि होती है। बड़े-बड़े राज्य छोटे-छोटे राज्यों के विरुद्ध कानून पास करके उनके हितों को हानि पहुंचा सकते हैं। इसलिए उनके हितों की सुरक्षा के लिए उच्च सदन या द्वितीय सदन की स्थापना करना आवश्यक है। प्रो0 गेटेल ने लिखा है-’”दो सदनों के रहने से विचार-विमर्श में सतर्कता एवं संतुलन और अधिक सावधानी से विश्लेषित एवं संग्रहित व्यवस्थापन की प्राप्ति होती है।” अमेरिका, भारत, स्विटरजरलैण्ड में सभी राज्यों को ऊपरी सदन में बराबर प्रतिनिधित्व दिया गया है ताकि सभी राज्यों के हितों को घोषित करके संघात्मक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया जा सके।
  7. पहले सदन के कार्यों का पुनरावलोकन - दूसरा सदन पहले सदन द्वारा पारित किए गए कार्यों का पुनरावलोकन करने के लिए बहुत आवश्यक है। आजकल पहले सदन के पास कार्यभार की अधिकता के कारण सभी बिलों पर ध्यान देना आवश्यक है। व्यापक विचार-विमर्श की बजाय प्राय: जल्दबाजी में ही बिलों को पास कर दिया जाता है। इससे कानून त्रुटिपूर्ण बन जाता है। इसलिए व्यवस्थापिका में न्यायपालिका की तरह पुनरावलोकन का होना भी जरूरी है। इसलिए दूसरा सदन इसी कमी की पूर्ति कर सकता है। पर्याप्त समय होने के कारण यह योग्य व्यक्तियों के सदन के रूप में पहले सदन के बिलों पर व्यापक विचार-विमर्श करके कमियों को दूर करने में अहम भूमिका निभा सकता है। बलंशली ने ठीक ही कहा है कि एक से दो आंखे अधिक अच्छी होती हैं। इसलिए दूसरा सदन कानूनों ने पुनरावलोकन के लिए बहुत आवश्यक है।
  8. द्विसदनीय व्यवस्थापिका कार्यपालिका की स्वतन्त्रता के लिए आवश्यक है - दो सदनीय विधायिका में दोनों सदन एक दूसरे पर नियन्त्रण करके कार्यपालिका को अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं। कार्यपालिका अपना कार्य तभी कुशलतापूर्वक कर सकती है, जब उसे कार्य करने की आजादी हो। कई बार कार्यपालिका को अपनी नीतियों का एक सदन में तो समर्थन प्राप्त नहींं होता, परन्तु दूसरे में प्राप्त हो जाता है। कार्यपालिका की एक सदन पर निर्भरता कम होने से वह अपना कार्य स्वतन्त्रतापूर्वक कर सकती है। भारत तथा अमेरिका जैसे देशों में कार्यपालिका के अध्यक्ष को संसद अभियोग द्वारा हटा सकती है। लेकिन दो सदनों की व्यवस्था में यह कार्य कठिन होता है। इसमें एक सदन तो आरोप लगाता है, जबकि दूसरा जांच करता है। एक सदन द्वारा लगाए गए गलत आरोपों का दूसरे सदन में निवारण हो जाता है। इससे कार्यपालिका निर्भय होकर उचित कार्यों के निष्पादन में लगी रह सकती है। इसलिए कार्यपालिका की स्वतन्त्रता के लिए दूसरे सदन का होना बहुत जरूरी है।
  9. दूसरा सदन योग्य व्यक्तियों का सदन है - दूसरा सदन पहले सदन की अपेक्षा योग्य व्यक्तियों का ही सदन है। भारत में निम्न सदन में अनपढ़ तथा अयोग्य व्यक्ति भी पहुंच जाते हैं, लेकिन दूसरे सदन (राज्य सभा) में सभी सदस्य योग्य व अनुभवी ही मिलते हैं। उनहें राष्ट्रपति उनकी योग्यता के कारण ही मनोनीत करता है। उनके भाषण भी उच्च स्तर के होते हैं। इंग्लैण्ड में इस सदन में रिटायर न्यायधीश, प्रशासक, स्पीकर डॉक्टर आदि नियुक्त किए जाते हैं। उनके कार्य-व्यवहार का जनता पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। उनके भाषण जनता को उच्च स्तर की राजनीतिक शिक्षा प्रदान करने वाले होते हैं। इसलिए जनता को राजनीतिक व्यवस्था के लाभों से परिपूर्ण करने के लिए दूसरे सदन की महती जरूरत है।
  10. ऐतिहासिक समर्थन - द्वितीय सदन के समर्थकों का कहना है कि इतिहास के आधार पर भी दूसरे सदन की आवश्यकता स्वत: सिद्ध है। 1649 ई0 में इंग्लैण्ड में क्रामवैल ने दूसरे सदन को समाप्त कर दिया था, लेकिन उसके महत्व को देखते हुए 1660 ई0 में उसे दूसरा स्थापित करना पड़ा। आज भी वहां दो सदन हैं। अमेरिका में भी स्वतन्त्रता के समय एक ही सदन था, लेकिन बाद में दूसरे सदन की आवश्यकता महसूस होने पर इसकी भी स्थापना करनी पड़ी। आज संसार के अनेक देशों में व्यवस्थापिका के दो सदन पाये जाते हैं। यदि दूसरे सदन की कोई उपयोगिता नहीं होती तो उसे क्यों स्थापित रखा जाता। इसलिए ऐतिहासिक तथ्य भी द्विसदनीय विधायिका का ही समर्थन करते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दूसरे सदन की आवश्यकता स्वतन्त्र, निष्पक्ष व अनुभवी सदन के रूप में है। चीन को छोड़कर आज बड़ी जनसंख्या वाले देशों में संसद के दो सदन ही पाए जाते हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से विभिन्नता वाले समाजों में समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व व उनके हितों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए दूसरा सदन महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। संघात्मक शासन प्रणालियों वाले देशों में आज दूसरा सदन समन्वयकारी भूमिका निभा रहा है। अत: निष्कर्ष रूप में द्वितीय सदन का होना आधुनिक राज्यों में बहुत ही अनिवार्य है।

द्विसदनीय विधायिका के विपक्ष में तर्क 

यद्यपि दूसरा सदन अनेक देशों में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है, लेकिन फिर भी उसके ऊपर कुछ आपेक्ष लगाए जाते हैं। इन आपेक्षों में कुछ दम भी दिखाई देता है। इसके विपक्ष में तर्क पेश किए जाते हैं। :-
  1. दूसरा सदन समाज के दूसरे मत का अभिव्यक्तक होने के कारण समाज में विभाजन की प्रवृत्ति को पैदा करता है।
  2. यह व्यवस्था सम्प्रभुता की धारणा के विरुद्ध है, क्योंकि सम्प्रभुता की अभिव्यक्ति जनता की इच्छा में होती है। उस इच्छा का प्रतिनिधित्व करने में निम्न सदन ही पर्याप्त है। इसलिए उस इच्छा को बांटना अनुचित है।
  3. उपरि सदन व्यर्थ या शरारती दोनों हैं। यदि वह निम्न सदन के प्रत्येक बिल को पास कर देता है तो वह व्यर्थ है। यदि उसके रास्तें में बाधाएं खड़ी करता है तो वह शरारती है।
  4. निम्न सदन में कानून सोच-विचार के बाद ही पास होते हैं। द्विसदनीय विधायिका के समर्थकों का यह मानना गलत है कि एक सदन में कानून सही नहीं बन पाता। कानून बनने से पहले बिल के कई वाचन होते हैं और उचित प्रक्रिया से गुजरकर ही वह कानून का रूप लेता है।
  5. दूसरे सदन के समर्थकों का यह कथन भी गलत है कि यह पहले सदन की स्वेच्छाचारिता को रोकता है। दूसरा सदन अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाने के कारण निम्न सदन से कम शक्तिशाली होने के कारण निम्न सदन पर प्रभावी नियन्त्रण कैसे रख सकता है ? वह निम्न सदन द्वारा पास बिल पर देरी तो कर सकता है, उसे निरस्त नहीं कर सकता। भारत जैसे देश में विधानमण्डल पर नियन्त्रण न्यायपालिका ही कर सकती है, दूसरा सदन नहीं।
  6. दूसरा सदन पूंजीपति वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए यह सर्वसाधारण के हितों के विरुद्ध है।
  7. दूसरा सदन संसद के द्वारा राष्ट्रीय धन को अपव्यय का साधन बन जाता है। लास्की का कहना सही है कि इससे राष्ट्रीय कोष पर अनावश्यक भार पड़ता है।
  8. इससे व्यवस्थापिका के दोनों सदनों में गतिरोध की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि दूसरा सदन रूढ़िवादियों और प्रतिक्रियावादियों का समूह होता है।
  9. संघात्मक शासन में दूसरा सदन आवश्यक नहीं है। इसमें अल्पसंख्यकों अथवा सघीभूत इकाईयों के अधिकारों की रक्षा दूसरे सदन की अपेक्षा वैधानिक संरक्षणों एवं स्वतन्त्र न्यायपालिका के द्वारा ही हो सकती है, दूसरे सदन से नहीं।
  10. दूसरे सदन की संगठनात्मक व्यवस्था अनेक देशों में वंशानुगत है या प्रजातन्त्र के सिद्धान्तों के विपरीत है। अत: दूसरा सदन अनावश्यक व अप्रजातन्त्रीय है।
अत: द्विसदनीय विधायिका के पक्ष और विपक्ष में दिए गए तर्कों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आधुनिक राज्यों में दूसरे सदन को व्यर्थ ही माना जाता है। वैज्ञानिक फ्रैंकलिन ने तो यहां तक कह दिया है कि “व्यवस्थापिका जो दो सदनों में विभाजित है, एक ऐसी गाड़ी के समान है जिसे एक घोड़ा आगे खींच रहा है और दूसरा पीछे।” अबेसियस ने इसे व्यर्थ या शरारती सरकार के अंग 99 सदन कहा है। लास्की का भी मत है कि संघ की रक्षा के लिए दूसरा सदन कोई प्रभावशाली गारन्टी नहीं है। आज अनेक देशों में दूसरा सदन राष्ट्रीय कोष पर अनावश्यक भार बन रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं हो सकता कि दूसरा सदन उपयोगी नहीं है। ऐतिहासिक आधार पर इस बात का समर्थन किया जा सकता है कि जिन देशों में दूसरे सदन को समाप्त किया गया था, वहां इसे फिर से स्थापित करना पड़ा। इसकी स्थापना ही इसकी उपयोगिता की गारन्टी है। लीकाक ने तो यहां तक कहा है कि एक सदनीय प्रणाली तो कभी अधिक सफल नहीं रही, लेकिन दो सदनों वाली विधायिका सभी देशों में सफल रही है। इसलिए यह कहना सर्वथा गलत है कि दूसरा सदन अनुपयोगी है। अमेरिका में दूसरा सदन (सीनेट) संसार में शासन-व्यवस्था के लिए एक प्रबल उदाहरण है। भारत में भी राज्य सभा की दूसरे सदन के रूप में प्रभावी भूमिका है। जिन जिन देशों में लोकतन्त्रीय व्यवस्थाएं हैं, वहां पर दूसरे सदन की आवश्यकता अनुभव की जाती है। जब तक लोकतन्त्र रहेगा तब तक दूसरे सदन को मिटाना असम्भव है। सर्वसत्ताधिकारवादी तथा तानाशाही या एकात्मक शासन व्यवस्था वाले देशों में तो द्विसदनीय विधायिका की दशा मरे हुए सांप की तरह है जो अपनी रक्षा ही नहीं कर सकता तो जनहितों का ख्याल कैसे रख पाएगा। अत: यह कहना अनुचित है कि आज विश्व की शासन प्रणालियों में दूसरे सदन के महत्व का हास हो रहा है। लोकतन्त्रीय अवस्थाओं के प्रहरी के रूप में दूसरे सदन की आज भी महती आवश्यकता है।

वर्तमान समय की व्यवस्थापिका का हास

यदि आज व्यस्थापिका के कार्यों और शक्तियों की आलोचनात्मक परीक्षा की जाए तो इनमें गिरावट की स्थिति दृष्टिगोचर होती है। सबसे पहले जेम्स ब्राइस का ध्यान इस ओर गया और उसने अपनी पुस्तक 'Modern Democracies' में विधायिका के हास की बात की, लेकिन वह समस्या की तह तक पहुंचने में नाकाम रहा। उसके बाद के0सी0 व्हीयर ने अपनी पुस्तक 'Legislature' में विध् ाायिका के हास की चर्चा फिर से शुरु की। उसने इस पुस्तक में एक अध्याय ‘विधायिकाओं के पतन’ का जोड़ा। उसने विधायिका के हास का कारण कार्यपालिका की शक्तियों में वृद्धि को बताया। रैम्से म्योर ने भी कार्यपालिका की मजबूत स्थिति का परिणाम बताया है। ला पालोम्बरा ने विधायिका के हास का कारण उसकी प्रतिनिध्यात्मकता तथा कार्यपालिका की शक्ति को बढ़ने को माना है। राबर्ट सी0 बोन इसे कार्यपालिका तथा विधायिका के सम्बन्धों में आए बदलाव को उत्तरदायी ठहराया है। आज व्यवस्थापिकाओं के पतन की जो बात चर्चा में है, वह यह है कि आज संसदों का युग लद गया है, नौकरशाही की विजय हो रही है और कार्यपालिका या मन्त्रीमण्डल की तानाशाही स्थापित हो चुकी है। इस चर्चा पर व्हीयर ने अपनी पुस्तक 'Legislature' में अनेक प्रश्न उठाए हैं। उसने लिखा है - क्या व्यवस्थापिकाओं की शक्ति में कमी आ गई है, क्या इनकी कार्यदक्षता नहीं रही; क्या इनके प्रति जनता की रुचि तथा सम्मान कम हुआ है; क्या विधायकों के व्यवहार में या व्यवस्थापिकाओं के शिष्टाचार में कमी आई है; क्या यह पतन अन्य सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं के मुकाबले या कार्यपालिका के मुकाबले में हुआ है ? व्हीयर का कहना है कि यदि इन बातों को ध्यान में रखकर व्यवस्थापिका के पतन पर विचार किया जाए तो कोई सर्वमान्य हल नहीं निकाला जा सकता। व्यवस्थापिका के पतन को तो कार्यपालिका की शक्तियों में हुई वृद्धि के सन्दर्भ में ही समझा जा सकता है। आज कार्यपालिकाएं ऐसे कार्य करने लगी हैं जो पहले नहीं किए जाते थे। इसी तरह व्यवस्थापिकाएं भी पहले से अधिक कार्य करने लगी हैं। लेकिन कार्यपालिका के मुकाबले में वे काफी पिछड़ी हुई हैं। व्यवस्थापिकाओं के पिछड़ने या पतन की तरफ जाने के अनेक कारण हो सकते हैं :-
  1. कार्यपालिका की शक्तियों में असीम बढ़ोतरी - व्यस्थापिका के हास का कारण सबसे पहले कार्यपालिका की शक्तियों में हुई वृद्धि में खोजा जा सकता है। व्हीयर ने कहा है कि दो विश्वयुद्धों के कारण विश्व में आए आर्थिक संकटों, राज्यों द्वारा समाजवादी या लोककल्याणकारी नीतियों को अपनाने ओर अन्तर्राष्ट्रीय तनाव के बराबर बना रहने से सरकार ने परिस्थितियों को देखते हुए अपनी कार्यकारी शक्तियों में वृद्धि करनी शुरु कर दी। अब कार्यपालिका ऐसे कार्य करने लगी, जो पहले कोई नहीं करता था। इससे कार्यपालिका का कार्यक्षेत्र पहले की तुलना में अधिक हो गया है। वैसे तो विधायिका के भी कार्य बढ़े हैं, लेकिन कार्यपालिका जितने नहीं। कार्यपालिका के मुकाबले विधायिका की शक्तियों का हास ही हुआ है, विकास नहीं। 
  2. प्रदत व्यवस्थापन का विकास - प्रदत व्यवस्थापन की व्यवस्था करके विधायिका ने स्वयं ही अपनी शक्तियों का हास किया है। जो कानून विधायिका बनाती थी, वे आज कार्यपालिका द्वारा बनाए जाते हैं। वे कानून भी विधायी कानूनों की तरह ही मान्य होते हैं। इसलिए विधायिका ने कार्यपालिका के प्रति जो शक्ति-प्रत्यायोजन किया है, उससे विधायिका की कुछ शक्ति कार्यपालिका में जाने के कारण विधायिका की शक्तियों का हास ही हुआ है। 
  3. संचार साधनों की भूमिका - आधुनिक युग में रेडियो, टी0वी0, इन्टरनेट जैसी व्यवस्थाओं ने संसद से बाहर भी वाद-विवाद के मंच को विकसित किया है। अब कार्यपालक इन साधनों की सहायता से जनता को अपनी बात कह सकता है और जनता की बात सुन भी सकता है। इससे जनसम्पर्क का महत्व बढ़ा है। आज संचार साधनों को जनमत का निर्माण करने में महत्वपूर्ण माना जाता है। आज संचार के साधन जनमत की सरकार के पक्ष या विपक्ष में तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। इससे संसद की उपयोगिता में कमी आई है। संसद के प्रति जनता के मन में जो डर था, वह अब समाप्त हो गया है। अब लोग संसद के वाद-विवाद की बजाय कार्यपालक को टी0वी0 या रेडियो पर ही सुनना पसन्द करते हैं। इसलिए विधायिका का हास होना स्वाभाविक ही है।
  4. दबावगुटों व हित समूहों का विकास - आधुनिक समय में जनता की मांगों को सरकार तक पहुंचाने वाले अनेक गैर-सरकारी संगठन खड़े हो गए हैं। आज दबाव गुट व हित समूह जनता की शिकायतों को लेकर विधायिका की बजाय सीधे कार्यपालिका में ही पहुंच जाते हैं; इस निर्णय प्रक्रिया में कार्यपालिका को प्रत्यक्ष भूमिका होने के कारण विधायिका की प्रतिष्ठा को धक्का लगना स्वाभाविक ही है। इसमें विधायिका की शक्तियों के हास की बात की जाए तो कोई अतिश्योक्ति भी नहीं होनी चाहिए। 
  5. विशेषज्ञ व परामर्शदात्री समितियों का विकास - आज प्रत्येक विभाग में विशेषज्ञों व सलाहकारों के रूप में समितियां मौजूद हैं। विधेयक के प्रारूप से लेकर उनके कानून बनने तक इन समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। स्वयं विधायिका भी इन्हीं समितियों पर आश्रित है। यदि भूलवश कोई विधायक बिल के बारे में कोई जानकारी चाहने की चेष्टा करता है तो उसे समितियों का हवाला देकर हताश कर दिया जाता है। ऐसी अवस्था में व्यवस्थापिका के सामने ऐसे प्रस्तावों और विधेयकों पर अपना अनुमोदन करना ही पड़ता है। कई बार राष्ट्रहित का वास्ता देकर व्यवस्थापिका को सामान्य विषयों पर वाद-विवाद करने सें वंचित कर दिया जाता है। अत: कार्यपालिका के आगे विधायिका बौनी ही पड़ती है। 
  6. कार्यपालिका की विदेशी सम्बन्धों में सर्वोच्चता - आज अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को बढ़ावा देने के लिए सारे प्रयास कार्यपालिकाएं ही करती हैं। आज कार्यपालिका ही विदेशी-सम्बन्धों के संचालन में अहम् भूमिका निभाती है। कार्यपालिका द्वारा किए गए समझौतों व सन्धियों का विधायिका को अनुमोदन करना ही पड़ता है। अत: विदेशी सम्बन्धों के मामलों में भी विधायिका कमजोर ही पड़ती है।
  7. युद्ध और संकटकालीन परिस्थितियां - युद्ध और संकटकाल में कार्यपालिका ही निर्णय लेने वाली प्रमुख संस्था होती है। लोकतन्त्रीय देशों में तो कार्यपालिका अध्यक्ष द्वारा ऐसी परिस्थितियों में लिए गए निर्णयों का विधानमण्डल द्वारा अनुमोदन करना ही पड़ता है। युद्ध व संकटकाल में आपात निर्णय लेना जरूरी होता है। ऐसे में संसद की बैठक बुलाकर विचार-विमर्श का समय नहीं होता। इसलिए राष्ट्राध्यक्ष सेनाओं का कार्यपालक होने के नाते सर्वे सर्वा होता है। आज परमाणु युग में राष्ट्राध्यक्षों को आपस में हॉट लाइन पर सम्पर्क बनाए रख्ना आवश्यक हो गया है। यद्यपि युद्ध के बारे में अन्तिम निर्णय लेने का अधिकार विधायिका के पास ही होता है लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए यह निर्णय कार्यपालिका ही ले लेती है। 1965 व 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय कार्यपालिका ने ही निर्णय लिया था। 1971 में युद्ध का संचालन भी स्वयं श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ही किया था। वियतनाम युद्ध में भी अमेरिका के राष्ट्रपति ने कई बार कांग्रेस की अवहेलना की थी। अत: युद्ध और संकटकालीन परिस्थितियों में कार्यपालिका ही विधायिका पर हावी हो जाती है। इससे विधायिका की शक्तियों के हास की बात चलना स्वाभाविक ही है। 
  8. कल्याणकारी राज्यों का उदय - आज का युग कल्याणकारी राज्यों का युग है। आज सरकार के कार्य सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों को सब तरह की सुविधाएं या विकास की परिस्थितियां पैदा करने के लिए भी हैं। इसमें कार्यपालिका के क्षेत्र का विकास हुआ है और विधायिका की शक्तियों का हास हुआ है। 
  9. अनुशासित राजनैतिक दलों का विकास - एलेन बाल का यह कथन सही है कि आज अनुशासित राजनीतिक दलों के विकास तथा कार्यपालिका की शक्तियों में हुई वृद्धि के कारण व्यवस्थापिका का हास हुआ है। संसदीय व अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका दल के समर्थन से व्यवस्थापिका की समस्त शक्तियों का प्रयोग ही नहीं करती, अपितु उसके नियन्त्रण से भी मुक्त रहती है। एक दल के बहुमत में तो व्यवस्थापिकाएं कार्यपालिकाओं की कठपुतलियां बनकर रह जाती हैं। शेपीरो ने रूसी जगत में सर्वोच्च सोवियत के लिए कहा था कि रूसी राजनीतिक पद्धति में विधायिका रबड की मुहर है।
  10. न्यायिक पुनरावलोकन - न्यायपालिका की इस शक्ति ने विधायिका के कानूनों का संविधानिक औचित्य निर्धारित करने की शक्ति के रूप में विधायिका पर नियन्त्रण किया है। भारत तथा अमेरिका में संघीय न्यायपालिका के रूप में व्यवस्थापिका के ऐसे निर्णय अवैध घोषित करने का अधिकार न्यायिक पुनरावलोकन के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालयों को प्राप्त है। 1933 में आर्थिक मन्दी के दौरान अमेरिका में सर्वोच्च न्यायालय ने इस शक्ति का प्रयोग करके कई आवश्यक कानूनों को भी रद्द कर दिया था। 1969 में भारत में भी सर्वोच्च न्यायालय ने बैंको के राष्ट्रीयकरण को अवैध घोषित किया था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति भी विधायिका की शक्तियों को मर्यादित करती है।
  11. अन्य कारण - उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त भी विधायिका की शक्ति का हास करने वाले कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे - व्यवस्थापिका के सदस्य अनभिज्ञ या नौसीखिए होने के कारण कार्यपालिका के सदस्यों के आगे कमजोर पड़ते हैं। कार्यपालिका की तुलना में व्यवस्थापिका के पास साधनों का अभाव भी होता है। कार्यपालिका की तुलना में व्यवस्थापिका का बड़ा आकार होने के कारण उसके सदस्यों में आपसी एकता का अभाव भी पैदा हो जाता है। भारत में इसके अतिरिक्त व्यवस्थापिका के सत्र कम ही बार बुलाए जाते हैं, जबकि कार्यपालिका सदा क्रियाशील रहती है। हाल ही में किए गए दल-बदल कानून में संशोधन ने विधायिका की प्रभावशीलता में कमी ला दी है। अत: इन कारणों से भी विधायिका की शक्ति का हास हुआ है और इसके लिए विधायिका काफी हद तक स्वयं दोषी है। 
उपरोक्त विवेचन से निष्कर्ष निकलता है कि व्यवस्थापिका का हास हो रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं समझना चाहिए कि व्यवस्थापिका की मृत्यु हो चुकी है। आज विधायिका जनता की शिकायतें अधिक से अधिक सुनने लगी हैं। विधानमण्डलों में आज जनहित की इतनी अधिक चर्चा होने लगी है कि कार्यपालिका का महत्व घटता नजर आने लगा है। आज राजनीतिक चेतना के बढ़ने के कारण कार्यपालिका को विधायिका द्वारा प्रश्न पूछे जाने का डर बना रहता है। आज जनता विधानमण्डलों की कार्यवाही को टी0वी0 व रेडियो पर सुनने में रुचि लेने लगी है। अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के विकास के कारण भी आज सरकार के कामकाज पर विधायिका द्वारा निगरानी रखना आवश्यक हो गया है। आज सार्वजनिक महत्व के विषयों पर विधायिका अपनी समितियों के माध्यम से नीति-निर्माण पर व्यापक विचार-विमर्श करती है। कानून बनने से पहले किसी बिल की व्यापक जाँच-पड़ताल करना आज विधायिका का लोकप्रिय कार्य हो गया है। इ सलिए विधायिका के अन्त या हास की बात करना मूर्खता है। आर0बी0जैन ने कहा है-”यह निश्चित है कि दूरगामी प्रवृत्ति विधायिकाओं की मृत्यु या हास की दिशा में नहीं है, जैसी पहले लेखकों की मान्यता रही है।” आज का युग व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के मिलन का युग है। इसमें कार्यपालिका की तुलना में विधायिका के हास की बात करना निराधार है। विधायिका के हास की बात विगत शताब्दी में तो ठीक हो सकती है, आज नहीं।

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