कर विवर्तन की अवधारणा, सिद्धान्त एवं प्रकार

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कर विवर्तन की अवधारणा मुख्य रूप से कराघात एवं करापात के मध्य अन्तर से
सम्बन्धित है। सामान्य रूप से कर विवर्तन से हमारा आशय करक प्रणाली के उस भाग से
लगाया जाता है जिसके अन्तर्गत करदाता कर के भार को दूसरे व्यक्ति या आर्थिक इकाई
पर टालने में सफल हो जाता है। करदाता कर के भार के कितने अंश को दूसरे पर टालने
में सफल हो पाता है यह कर की प्रकृति तथा वस्तु की कीमत लोच पर निर्भर करता है।
कर विवर्तन कराघात एवं कराभार (करापात) के बीच की एक कड़ी के रूप में देखा
जा सकता है। कराघात के द्वारा सरकार कर संग्रहण के लिए एक व्यक्ति या इकाई को
आधार बनाती है वही करापात को अलग-अलग रूप में प्रसरण करने के लिए करदाता को
कुछ ऐसी व्यवस्थाओं का सहारा दिया जाता है जिससे वह कर को सरकार को जमा करने
की प्रतिबद्धता तो पूरी करता है लेकिन करके अन्तिम रूप से उगाही को स्वयं वहन नहीं
करता है। इसके लिए वह उस वस्तु या इकाइयों से सम्बन्धित व्यक्तियों पर विवर्तित कर
देता है। इस प्रकार जब कराघात एवं करापात अलग-अलग दो व्यक्तियों एवं संस्थाओं पर
होता है तब कराघात एवं करापात को अलग-लग सहन करने की क्रिया कर विवर्तन
कहलाती है। कुछ करों की स्थिति में कर का विवर्तन सम्भव होता है तथा कुछ करों की
स्थिति में करापात को दूसरों पर टाला नहीं जा सकता है।

कर विवर्तन के सिद्धान्त

सामान्य रूप से कर विवर्तन को दो सिद्धान्तों के आधार पर समभव बनाया गया है।

  1. केन्द्रीयकरण का सिद्धान्त : करापात का केन्द्रीयकरण सिद्धान्त के अनुसार सरकारक
    द्वारा किये जाने वाले करारोपण का भार अन्तत: एक ही स्थान पर आकर केन्द्रित हो
    जाता है। देश में किसी भी वस्तु या सेवा पर किसी भी प्रकार का कर लगाया जाय
    उसका समस्त भार अन्तत: भूमि/कृषि पर ही पड़ता है। करों का विवर्तन भी इसी
    प्रकार क्रियाशील होता है कि अन्तिम करापात भूमि पर ही पड़ता है।
  2. कर-प्रसारण सिद्धान्त : इस सिद्धान्त का प्रतिपादन फ्रांसीसी अर्थशास्त्री केनार्ड द्वारा
    किया गया। यह सिद्धान्त केन्द्रीयकरण सिद्धान्त के विपरीत तथ्य पर आधारित किया
    गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार करारोपण कहीं भी किया जाय परन्तु उसका प्रभाव
    अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों एवं भागों में फैल जाता है। अर्थात् करारोपण का भार समाज
    के प्रत्येक व्यक्ति को वहन करना होता है। सर हैमिल्टन के अनुसार, ‘‘प्रसार के सिद्धान्त में कदाचित आशावादी सिद्धान्त से भी
    अधिक सच्चाई है, और वह यह कि करों की प्रवृत्ति फैलने तथा समान होने की होती है
    और वे निश्चितता तथा एकसारिता से लगाये जायें तो प्रसारित होकर प्रत्येक सम्पत्ति
    पर ही अपना भार डालेंगे।’’ कर का विवर्तन इस प्रकार होता है कि समय के
    साथ-साथ कर का भार सम्पूर्ण समाज में फैल जाता है।

कर विवर्तन के प्रकार

कर विवर्तन की अवधारणा को आप भली-भांति समझ गये होंगे। इसके बाद अब यह
समझना भी आपके लिए अत्यन्त आवश्यक होगा कि कर विवर्तन कितने प्रकार का होता है।
कर विवर्तन के प्रकारों के बारे में आप अच्छी तरह से अध्ययन कर सकेंगे :-

  1. अग्रग्रामी कर-विवर्तन
  2. पश्चगामी कर-विवर्तन
  3. अग्रोन्मुखी कर-विवर्तन

अग्रगामी कर-विवर्तन 

अग्रगामी कर-विवर्तन से हमारा तात्पर्य सामान्य रूप से उस
प्रक्रिया से है जिसके अन्तर्गत कर देने वाला व्यक्ति या संस्था कर का भार आगे
वाले सम्बन्धित व्यक्ति पर टालने में सफल हो जाता है। उदाहरण के लिए आप
बिक्री कर को लीजिए – माना सरकार द्वारा बिक्री कर लगा दिया गया तब उस
कर को अदा तो वस्तु का विक्रेता करेगा लेकिन कर की धनराशि को वह अपनी
जेब से नहीं करेगा। इस धनराशि के बराबर वह वस्तु की कीमत बढ़ा देगा तथा
उसे क्रेता से बसूल लेगा जिसे सामान्य रूप से उस वस्तु का उपभोक्ता ही कहा
जायेगा। इस प्रकार इस प्रकार के कर विवर्तन में विक्रेता करके भार को वस्तु की
कीमत बढ़ाकर वस्तु के उपभोक्ता पर टाल दिया जाता है तथा इस करभार को
उपभोक्ता आगे और नहीं टाल सकता। इस प्रकार अग्रगामी कर विवर्तन में कराघात
विक्रेता पर तथा करापात वस्तु के उपभोक्ता पर पड़ता है।

पश्चगामी कर विवर्तन

पश्चगामी कर विवर्तन ठीक अग्रगामी कर विवर्तन की उल्टी
प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत करदाता के भार को उस वस्तु या सेवा से सम्बन्धित
पूर्ववर्ती व्यक्ति या इकाई पर टाला जाता है तथा कर का भार पूववर्ती व्यक्ति या
इकाई द्वारा ही सहन करना पड़ता है। इस प्रकार जब कर भार को पीरछे की ओर
टाला जाता है तब उसे पश्चगामी कर विवर्तन की संज्ञा दी जाती है। इस एक
उदाहरण द्वारा आसानी से समझाया जा सकता है। सरकार द्वारा उत्पादन कर
लगाने की स्थिति में कर के भार को दो रूपों में टाला जा सकता है। प्रथमत: वह
उत्पादन कर को उत्पादन की कीमत बढ़ाकर क्रेता से वसूल ले तथा द्वितीयत: वह
उस उत्पादन में प्रयुक्त कच्चे माल की कीमतों में कर की धनराशि के बराबर कमी
कर दे ताकि कर का भार कच्चे माल की आपूर्ति कर्ता को वहन करना पड़े। इस
प्रकार पश्चगामी कर विवर्तन द्वितीय स्थिति की ओर इंगित करता है। इस प्रकार के
कर विवर्तन में करापात को पीछे की प्रिक्रा में शामिल करते हुए टाल दिया जाता है
तथा उसी से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से बसूल लिया जाता है।

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अग्रोन्मुखी कर विवर्तन 

यह कर विवर्तन की वह अवस्था है जिसके अन्तर्गत
करापात को आगे की ओर विक्रेता तथा उपभोक्ता के पूर्व के मध्यस्थों पर टाला
जाता है। इस प्रक्रिया में कर भार को एक से अधिक क्रेताओं तथा छोटे विक्रेताओं
पर टाला जाता है। इस प्रकार यह कर विवर्तन उपभोक्ता से पूर्व तक का अग्रगामी
कर विवर्तन है।

विभिन्न बाजारों में कर विवर्तन

प्रस्तुत उपखण्ड के अन्तर्गत आप अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत विद्यमान विभिन्न बाजारों
में कर-विवर्तन से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का अध्ययन कर सकेंगे। यहाँ पर हम सामान्य
रूप से पूर्ण प्रतियोगी बाजार, एकाधिकार बाजार तथा अपूर्ण प्रतियोगी बाजार के अन्तर्गत
व्यक्ति या संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले कर-भार के विवर्तन की आलोचनात्मक व्याख्या
करेंगे।

पूर्ण प्रतियोगी बाजार में कर-विवर्तन : जहाँ तक कर-विवर्तन की व्याख्या का
सवाल है तब हम पूर्ण प्रतियोगी बाजार में यह जाँच पायेंगे कि कर का विवर्तन इस किस
प्रकार तथा किस सीमा तक किया जा सकता है। जैसा कि आप जानते होंगे कि पूर्ण
प्रतियोगी बाजार में समरूप वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है तथा विक्रेता एवं क्रेताओं की
संख्या अधिक पायी जाती है। इसके साथ सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य पूर्ण प्रतियोगिता में
यह पाया जाता है कि क्रेताओं को बाजार की पूर्ण जानकारी पायी जाती है तथा वस्तुओं की
कीमतें समान बसूली जाती हैं। पूर्ण प्रतियोगिता बाजार के अन्तर्गत क्रेता तथा विक्रेताओं का
यह पूर्ण प्रयास होता है कि विक्रेता पर पड़ने वाले कराघात को क्रेता पर अधिकतम सीमा
तक डाला जाय तथा क्रेता का पूर्ण प्रयास यह रहता है कि उस पर थोपा जाने वाला कर
का भार विक्रेता तक ही सीमित रहे अर्थात् इस बाजार में क्रेता तथा विक्रेता कर के भार को
कम से कम सहन करने का प्रयास करते हैं। लेकिन कर के विवर्तन बाजार की मांग की
लोच तथा पूत्रि की लोच पर निर्भर करता है। आईये वस्तु की मांग तथा पूर्ति की
अलग-अलग लोचों की स्थिति में कर का विवर्तन किस प्रकार तथा किस दिशा में होता है।
वस्तु की मांग की लोच एवं कर विवर्तन : पूर्ण प्रतियोगी बाजार के अन्तर्गत वस्तुओं
पर लगाये जाने वाले कर को उसकी मांग की लोच एक बड़ी सीमा तक प्रभावित करती है।
सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि लोचदान कीमत मांग की स्थिति में कर का विवर्तन
कम तथा बेलोचदार कीमत मांग की स्थिति में कर का विवर्तन उपभोक्ताओं की ओर अधिक
किया जाता है। यहाँ पर आप मांग की कीमत लोच की विभिन्न श्रेणियों में करके विवर्तन
को समझ सकेंगे।

  1. लोचदार कीमत लोच एवं कर विवर्तन : लोचदार कीमत लोच की स्थिति में कर के
    भार के एक भाग को विक्रेता स्वयं सहन करता है तथा एक भाग को क्रेताओं पर
    टालने में सफल हो जाता है। लोचदार कीमत लोच की स्थिति में वस्तु की मांग में
    एकतरफा परिवर्तन सम्भव नहीं होता है। इसीलिये कर का विवर्तन एक निश्चित
    सीमा तक ही सम्भव होता है।
  2. अधिक लोचदार कीमत लोच एवं कर-विवर्तन : इस स्थिति में कीमत में वृद्धि की
    अपेक्षा वस्तुओं की मांग मात्रा में आनुपातिक रूप से अधिक कमी आ जाती है।
    कर-विवर्तन के लिए ऐसी स्थिति विक्रेताओं के अनुकूल नहीं पायी जाती है। बाजार
    की इस स्थिति में कर का विवर्तन उपभोक्ताओं पर बहुत कम ही किया जा सकता
    है। कर का भार विक्रेताओं को ही वहन करना होता है।
  3. पूर्ण लोचदार कीमत लोच तथा कर विवर्तन : कीमतों में बहुत कम या मामूली सी
    वृद्धि होने पर वस्तु की मांग में अत्यधिक गिरावट आ जाती है। तब कर का विवर्तन
    उपभोक्ताओं पर किया जाना सम्भव नहीं होता है। उपभोक्ता कर के भार को अपने
    ऊपर टालने से रोकने में सफल हो जाते हैं।
  4. बेलोचदार मांग तथा कीमत परिवर्तन : पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत बेलोचदार मांग
    वाली वस्तुओं की स्थिति में कर के भार का उपभोक्ताओं पर अत्यधिक सीमा तक
    टाला जा सकता है। उपभोक्ता कर के भार को सहन करने के लिए तैयार हो जाता
    है।
  5. पूर्ण बेलोचदार मांग तथा कर-विवर्तन : पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत यह वह स्थिति
    होती है जिसमें कीमतों में कर भार के परिणमस्वरूप कीमत वृद्धि का वस्तुओं की
    मांग मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। परिणामस्वरूप कर विवर्तन के प्रयासों की
    स्थित में विक्रेता पूर्ण रूप से सफल हो जाता है और कर के विवर्तित भार को
    उपभोक्ताओं को ही सहन करना होता है।

पूर्ति की लोच एवं कर विवर्तन

वस्तुओं की मांग की कीमत लोच के कर विवर्तन पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने
के बाद आप वस्तुओं की पूर्ति लोच के कर विवर्तन पर के आकार एवं दिशा पर पड़ने वाले
प्रभावों को भलीभांति समझ सकेंगे। आपको ध्यान देना होगा कि अल्पकाल में पूर्ति की लोच
बेलोचदार तथा दीर्घकाल में पूर्ति लोचदार स्थिति में पायी जाती है। क्योंकि दीर्घकाल में
मांग की स्थिति के अनुसार पूर्ति में पर्याप्त तथा मांग के अनुसार परिवर्तन किया जा सकता
है। इस प्रकार पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कर के भार का विवर्तन समयानुसार कम या
अधिक सीमा तक किया जा सकता है। यदि वस्तु की पूर्ति लोचदार या पूर्ण लोचदार है तब
कर के भार का विवर्तन उपभोक्ताओं की ओर आसानी से किया जा सकता है तथा
उपभोक्ता कर के नवीन भार को सहन करने में समर्थ होगा।

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इसके विपरीत यदि पूर्ति की लोच बेलोचदार श्रेणी की है तब कर का भार
उपभोक्ताओं की ओर विवर्तित नहीं किया जा सकता है तथा कर का नवीन भार की
विक्रेताओं द्वारा ही वहन किया जायेगा।

कर विवर्तन के सम्बन्ध में डॉल्टन ने स्पष्ट किया है कि, ‘‘विक्रेता पूर्ति को कम
करके कर के भार को क्रेताओं पर ढकेलने का प्रयत्न करता है और क्रेता इसकी मांग कम
करके विक्रेताओं पर विवर्तित करने का प्रयत्न करता है। इन दोनों की सफलता इनकी
सापेक्षित शक्तियों पर निर्भर करती है।’’

इस प्रकार मांग-पूर्ति की लोच सम्बन्धी शक्तियाँ कर विवर्तन को पूर्ण रूप से
प्रभावित करने का कार्य करती है। मांग तथा पूर्ति की लोच समबन्धी विचार धारा के सम्बन्ध
में डाल्टन का यह कथन अत्यन्त ही महत्वपूर्ण सिद्ध होता है – ‘‘किसी भी वस्तु पर लगाये
गये कर का प्रत्यक्ष दायित्व भार विक्रेताओंके मध्य लगायी गयी वस्तु की मांग व पूर्ति की
लचक के अनुपात पर निर्भर रहता है।’’

अपूर्ण प्रतियोगी बाजार में कर विवर्तन

आपको यह स्पष्ट करना अत्यन्त आवश्यक है कि पूर्ण प्रतियोगी बाजार तथा
एकाधिकार बाजार को प्राय: काल्पनिक स्थितियाँ माना जाता है। व्यवहार में अपूर्ण
प्रतियोगिता की स्थिति ही पायी जाती है जो पूर्ण प्रतियोगिता तथा कएाधिकार के बीच की
स्थिति होती है। अपूर्ण प्रतियोगी बाजार में वस्तु की कीमत, रंग एवं आकार (स्वरूप) तथा
गुणवत्ता में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। अत: ऐसी स्थिति में कर का विवर्तन बाजार के
निम्नलिखित तत्वों पर निर्भर करता है।

एकाधिकारी प्रतियोगी बाजार में उत्पादन की पूर्ति एवं कीमत सम्बन्धी नीतियों के
कारण कर का विवर्तन अत्यन्त निम्न सीमा तक ही किया जाना सम्भव होता है। इसके साथ
कर विवर्तन की सीमा एवं दिशा उत्पादकों के संयुक्त व्यवहार तथा उनकी नीतियों पर निर्भर
करता है। फिर भी एक बड़ी सीमा तक उपभोक्ता कर भार से दूर रहने की स्थिति में रहता
है। क्योंकि अपूर्ण प्रतियोगी बाजार में उपभोक्ताओं के पास निकट की स्थानान्तरण वस्तुयें
आसानी से पायी जाती है। वस्तुओं की गुणवत्ता तथा उत्पादकों का व्यवहार तथा विक्रय
रणनीति कर-विवर्तन करने में सहायक होती हैं।

एकाधिकार के अन्तर्गत कर विवर्तन

जैसा कि आपने पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत वस्तुओं की मांग तथा पूर्ति की लोचों
के आधार पर कर विवर्तन का अध्ययन किया। ठीक इसी प्रकार एकाधिकार के अन्तर्गत
वस्तु की मांग तथा पूर्ति की लोच के आधार पर कर का विवर्तन किया जाता है। एकाधिकार
के अन्तर्गत वस्तु का केवल एक ही उत्पादक तथा विक्रेता होता है इसीलिये ऐसी स्थिति में
कर का विवर्तन अत्यधिक मात्रा में किया जा सकता है। इसके साथ एकाधिकार पूर्ति का
निर्धारक भी होता है। इसलिये इस आधार पर भी कर का विवर्तन उपभोक्ताओं के ऊपर
आसानी से किया जा सकता है।

एकाधिकारी बाजार में कर का विवर्तन कितना होगा यह कर की प्रवृत्ति पर निर्भर
करता है। यदि कर एकमुश्त रूप में लगाया जाता है तो उत्पादक इस कर को स्थायी
लागत के साथ समयोजित कर लिया जाता है तथा वस्तु की सीमान्त लागत में वृद्धि नहीं
होती है। ऐसी स्थिति में करों के भार को विवर्तित नहीं किया जायेगा। कर विवर्तन से
विक्रेता या एकाधिकार के लाभ में कमी आ जाती है। अत: कर की राशि का भुगतान
एकाधिकारी द्वारा स्वयं किया जाता है।

इसके साथ एकाधिकार के अन्तर्गत कर मात्रा में आधार पर आरोपित किया जाता है
तो उत्पादन की बिक्री की मात्रा के आधार पर कर की राशि घटती तथा बढ़ती रहती है।
इस स्थिति में कर का विवर्तन उपभोक्ताओं की ओर होने लगता है। मात्रा के अनुसार कर
लगने से वस्तु की सीमान्त लागत बढ़ती है जिससे पूर्ववत मूल्यों पर वस्तुएँ बेचने से उसके
लाभ की मात्रा घट जाती है। इसीलिये वह वस्तुओं की कीमत में वृद्धि करके कर का
विवर्तन किया जाता है।

एकाधिकारी बाजार में मात्रा के आधार पर करारोपण तथा कर विवर्तन के सम्बन्ध में
टेलर का यह कथन अत्यधिक सार्थक सिद्ध होता है – ‘‘दूसरे वर्ग के करों (वे कर जिनकी
कुल मात्रा उत्पादन या विक्रय की मात्रा के अनुसार बदलती है परन्तु प्रति इकाई प्रमुख
लागत में स्थायी वृद्धि होती है) को सामान्यत: आगे की ओर विवर्तित किया जा सकता है।
क्योंकि सम्पूर्ण तालिका में एक ही दर से सीमान्त लागत बढ़ जाती है, जिससे सीमान्त
लागत, लाभ व सीमान्त का नया सन्तुलन स्थापित होता है।’’

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महत्वपूर्ण करों की स्थिति में कर विवर्तन

करापात एवं कर विवत्रन से सम्बन्धित विभिन्न महत्वपूर्ण तथ्यों का अध्ययन करने के बाद
अब आप समझ सकेंगे कि कुछ महत्वपूर्ण करों की स्थिति में कर विवर्तन के द्वारा करापात
की क्या स्थिति होती है। यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण करों के सम्बन्ध में कर विवर्तन एवं
करापात की विवेचना करेंगे।

  1. आय कर : कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि विशेष स्थितियों में आय कर का विवर्तन
    किया जा सकता है परन्तु सामान्यत: आय कर का विवर्तन नहीं किया जा सकता है।
    आय कर व्यक्तिगत आय पर लगाया जाता है तब उसके विवर्तन की कोई सम्भावना नहीं
    रहती है। इसके बाद व्यावसायिक आय कर की स्थिति में अर्थशास्त्री एक मत नही है।
    मुख्यत: दोनों प्रकार की आय कर की स्थिति में कर-विवर्तन को सम्भव नहीं बनाया जा
    सकता है।
  2. बिक्रीकर एवं उत्पादन कर : बिक्रीकर तथा उत्पादन कर की स्थिति में कर के विवर्तन
    को सम्भव किया गया है। इसके साथ कर को विवर्तन की मात्रा वस्तु एवं सेवा की मांग
    व पूर्ति लोच के आधार पर तय की जाती है। कर लगने से वस्तु या सेवा की कीमत
    वृद्धि होती है जिसे उपभोक्ताओं से वसूलने का प्रयास किया जाता है। यदि मांग की
    कीमत लोच बेलोचदार है तो कर का विवर्तन उपभोक्ताओं की ओर होगा और करापात
    उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। लोचदार मांग की स्थिति में करापात का विवर्तन पूर्ण रूप से
    उपभोक्ताओं पर नहीं किया जा सकता है। इसके विपरीत पूर्ति लोच लोचदार है कर का
    विवर्तन उपभोक्ता की ओर होगा तथा पूर्ति लोच बेलोचदार होने पर का विवर्तन नहीं
    किया जा सकता है।
  3. गृह कर : गृह कर की स्थिति में कर का विवर्तन हो सकता है और नहीं भी हो सकता।
    यदि घर में गृह मालिक का परिवार ही निवास करता है तो कर का भार गृह स्वामी को
    ही वहन करना होगा तथा कर का विवर्तन नहीं किया जा सकता है। जब घर में मकान
    मालिक के साथ किराये दार भी रहते हैं तो कर का भार मकान मालिक व किरायेदार पर
    संयुक्त रूप से पड़ेगा क्योंकि कर भार का एक अंश किराये के रूप में वृद्धि कर दी
    जायेगी। ठीक इसके विपरीत यदि मकान में केवल किरायेदार ही निवास करते हैं तो गृह
    कर का पूर्ण विवर्तन कर दिया जायेगा तथा करापात किरायेदार पर ही पड़ेगा।
  4. सीमा शुल्क : आयात एवं निर्यात किये जाने वाले माल एवं सेवाओं की कीमत लोच के
    आधार पर करों का विवर्तन किया जा सकता है। यदि आयात होने वाले सामान की मांग
    व पूर्ति बेलोचदार है तो कर का विवर्तन नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार निर्यात
    होने वाली वस्तु की मांगलोच बेलोचदार है तो कर का विवर्तन किया जा सकता है। यदि
    निर्यात की स्थानान्पन्न वस्तुएँ उपलब्ध हैं तो कर का भार निर्यातक को ही करना होगा। 
  5. भूमि कर : भूमि कर की स्थिति में कर का विवर्तन किया भी जा सकता है तथा नहीं भी
    किया जा सकता है। यदि कर की स्थिति में किसान अपनी फसल की कीमत बढ़ाने में
    सफल होता है तो कर का विवर्तन कृषि उत्पादन को खरीदने वालों पर किया जा सकता
    है। यदि कर को मात्रा का निर्धरण आर्थिक लगान पर लगाया जाता है तो कर का
    विवर्तन नहीं किया जा सकता है तथा कर का भार भू-स्वामी को ही सहन करना होगा।
    इसके साथ कृषि उत्पादन की मांग की लोच के आधार कर का विवर्तन किया जा सकता
    है। यदि उत्पादन की मांग की लोच बेलोचदार है तो कर का विवर्तन आसानी से किया
    जा सकता है तथा उत्पादन की मांग लोच इकाई से अधिक है तो कर का भार किसानों
    को ही वहन करना होगा। कर का विवर्तन नहीं किया जा सकता है।
  6. सम्पत्ति कर : सम्पत्ति कर की स्थिति में कर विवर्तन की स्थिति आसान नहीं है।
    सामान्य रूप से कर का भार सम्पत्ति मालिक को ही सहन करना पड़ता है। यदि
    सम्पत्ति का प्रत्यक्ष रूप से उपभोग किया जा सकता है तो सम्पत्ति कर का विवर्तन
    उपभोक्ताओं पर किया भी जा सकता है। इसके साथ यदि सम्पत्ति का प्रयोग उत्पादन
    कार्य में किया जाता है तो उत्पादन की मांग एवं पूर्ति की लोच के आधार पर कर का
    विवर्तन किया जा सकता है।
  7. लाभ कर : लाभ कर की स्थिति में भी करों का भार व्यावसायिक निगमों के मालिकों को
    ही सहन करना पड़ता है। क्योंकि यह कर आय कर के ही समकक्ष रखा जाता है। अत:
    लाभ कर का विवर्तन करना सम्भव नहीं होता है।
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