राष्ट्रीय हित क्या है?

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राष्ट्रीय हित अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि राज्यों के आपसी संबंधों को बनाने में इनकी विशेष भूमिका होती है। किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति मूलत: राष्ट्रीय हितों पर ही आधारित होती है, अत: उसकी सफलताओं एवं असफलताओं का मूल्यांकन भी राष्ट्रीय हितों में परिवर्तन आता है जिसके परिणामस्वरूप विदेश नीति भी बदलाव के दौर से गुजरती है। राष्ट्रीय हितों सम्बन्धित अन्य जानकारी से पूर्व इन्हें परिभाषित करना अनिवार्य है जो इस प्रकार से है-
  1. चाल्र्स लर्च- राष्ट्रीय हित व्यापक, दीर्घकालीन एवं सतत् उद्देश्यों पर आधारित होते हैं जिनकी प्राप्ति हेतु राज्य, राष्ट्र व सरकार में सब अपने को प्रयत्न करता हुआ पाते हैं।
  2. वर्न वॉन डाईक - राष्ट्रीय हित की रक्षा या उपलब्धि राज्य परस्पर मुकाबले में करना चाहते हैं।
राष्ट्रीय हित की परिभाषा ही नहीं बल्कि इसके उद्देश्यों को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं है। कुछ विद्वान इन्हें विदेश नीति के उद्देश्यों से जुड़ा मानते हैं तो कुछ इसके मूलभूत मूल्यों से जुड़ा मानते हैं। पहली श्रेणी के विद्वानों के अनुसार यह स्थाई, अपरिवर्तित तथा शक्ति से जुड़ी अवधारणा है, लेकिन दूसरे इन्हें राष्ट्र के कल्याण, राजनैतिक विश्वास के संरक्षण, सीमाओं से सुरक्षा, क्षेत्रीय अखण्डता व राष्ट्रीय जीवन पद्धति से जुड़ा मानते हैं। परन्तु वास्तविक स्थिति यह है कि राष्ट्रीय हित व्यापक सन्दर्भ के रूप में लिए गए हैं।

विभिन्न विद्वानों ने राष्ट्रीय हितों को कई श्रेणियों में बांटा है। उदाहरण स्वरूप, विद्वान इन्हें प्रथम कोटि के हित, गौण हित, स्थाई हित, अस्थाई हित, सामान्य हित, विशिष्ट हित आदि में वर्गीकृत करते हैं। लेकिन मूलत: इन्हें दो प्रमुख श्रेणियों में रखना ज्यादा स्पष्ट चित्रण प्रस्तुत करता है - (क) प्रमुख हित; (ख) गौण हित।
  1. जहां तक प्रमुख हितों की बात है प्रत्येक राष्ट्र तीन प्रमुख हितों के आधार पर अपनी विदेश नीति के उद्देश्य तय करते हैं। ये तीन प्रमुख हित हैं (i) राष्ट्रीय सुरक्षा/अखण्डता; (ii) आर्थिक विकास; (iii) अनुकूल विश्व व्यवस्था। प्रत्येक राष्ट्र के प्रमुख उद्देश्यों में इन तीनों कारकों का होना इसलिए आवश्यक है कि प्रथम पर राज्य का मूल आधार/अस्तित्व टिका हुआ है। दूसरे पर उसका सुचारू विकास तथा तीसरे का महत्व इसलिए है कि इन हितों की पूर्ति एक विशिष्ट विश्व परिवेश में ही सम्भव है, एकान्तवास में नहीं। अत: कोई भी राष्ट्र इन तीन प्रमुख हितों के सन्दर्भ में ही अपनी विदेश नीति या राज्यों के साथ पारस्परिक संबंध स्थापित करता है।गौण हित प्रमुख हितों की भांति महत्वपूर्ण तो नहीं होते लेकिन किसी भी राष्ट्र को सत्ता में बनाये रखने हेतु आवश्यक होते हैं। इन हितों के लिए राष्ट्र अपना सर्वस्य या युद्धों तक जाने के लिए तैयार नहीं होता, परन्तु फिर भी इनकी पूर्ति हेतु प्रयास करता है। इन हितों के माध्यम से राष्ट्र अपने सामाजिक, 
  2. सांस्कृतिक, विरासत आदि द्वारा स्थापित आकांक्षाओं की पूर्ति करता है। इसके अतिरिक्त, अपने विदेशों में स्थापित कार्यों को पूर्ण करने की कोशिश करता है। इनके माध्यम से विदेशों में बसे अपने नागरिकों के हितों की पूर्ति के प्रयास भी करता है। अत: इन हितों की पूर्ति हेतु भी राष्ट्र काफी प्रयास करते हैं।
परन्तु जैसा उपरोक्त कहा है कि कुल मिलाकर राष्ट्रहित गतिशील होते हैं, स्थाई नही। इसीलिए जितने ज्यादा से ज्यादा हो सकें उतने सम्भावित हितों की पूर्ति हेतु राष्ट्र प्रयासरत रहते हैं। अभिवृद्धि के साधन- राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में जो भी बातें कही जाए, अन्तत: सत्य यह है कि सभी राष्ट्र इनकी अभिवृद्धि हेतु भरसक प्रयत्न करते हैं। इस संदर्भ में राष्ट्र विभिन्न साधनों का उपयेाग करते हैं जिनमें से प्रमुख हैं-
  1. राजनय- किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का कार्यान्वयन राजनय के माध्यम से ही होता है। राजनय अपने आप मे नैतिक अनैतिक नहीं होता बल्कि अपने राष्ट्र हितों के अनुरूप होता है। न ही यह एक वस्तुनिष्ठ स्थिति है, बल्कि यह व्यक्तिपरक व्यवस्था है जिसका आकलन प्रत्येक राष्ट्र अपने-अपने दृष्टिकोण के अंतर्गत करता है। राजनय अपने देश के विदेशों में स्थापित दूतावासों व वाणिज्य केन्द्रों के अतिरिक्त विदेश मंत्रालय, राजनैतिक नेतृत्व व कई अन्य व्यक्तियों व संस्थाओं की भागीदारी के अनुरूप कार्यान्वित होता है। राजनय द्वि-पक्षीय एवं बहुपक्षीय दोनों प्रकार के होते हैं। राजनय के स्वरूप भी स्थितियों के अनुरूप नये-नये सन्दर्भों में प्रस्तुत होते हैं।
  2. प्रचार- प्रचार भी राष्ट्रीय हितों में वृद्धि एवं पूर्ति का महत्त्वपूर्ण तरीका है। प्रचार दूसरे राष्ट्रों के तर्कों को गलत सिद्ध करने तथा अपनी बात को फैलाने का हमेशा तरीका रहा है, लेकिन 20वीं शताब्दी में ही प्रचार को एक मुख्य साधन के रूप में उपयोग किया गया है। इसका अति स्पष्ट रूप दो विश्व युद्धों के बीच के काल में देखने को मिला जब विभिन्न विचारधाराओं - साम्यवाद, नाजीवाद, फासिज्म - के माध्यमों से राष्ट्रों ने अपनी शक्ति स्थापित एवं संवर्धन हेतु इनका उपयोग किया। शीतयुद्ध काल में भी दोनों महाशक्तियों ने अपने-अपने वर्चस्व को बनाने हेतु राष्ट्रों के मध्य साम्यवादी व पूंजीवादी विकास के प्रतिमानों को अपनाने हेतु प्रतिस्पर्धा पैदा की। शीतयुद्धोत्तर युग में भी एक मात्र शक्ति द्वारा भूमण्डलीकरण, उदारीकरण, मुक्त बाजार व्यवस्था आदि केवल राष्ट्रों के पास बचे विकल्प के रूप में तथा अपनी विदेश नीति की हस्तक्षेप की नीतियों को न्यायोचित स्थापित करने हेतु अत्यधिक प्रचार किया जा रहा है। इस प्रकार दो प्रमुख कारणों से पिछली शताब्दी में प्रचार का काफी प्रयोग हुआ है। पहला कारण रहा है संचार साधनों में आई क्रांति जिसने प्रचार को बहुत शीघ्रता, विश्वसनीय व आसानी से उपलब्ध करा दिया। दूसरा शायद अति आधुनिकतम हथियारों की उत्पत्ति से बल प्रयोग के विकल्प की समाप्ति ने भी इस साधन को अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। कारण जो भी रहे हों परन्तु वर्तमान में उपलब्ध संचार क्रांति के तरीकों ने प्रचार को विदेश नीति के प्रभावी तन्त्र के रूप में प्रस्तुत किया है।
  3. राजनैतिक युद्ध- राजनैतिक युद्ध भी राष्ट्रहितों की अभिवृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण साधन रहा है। यह न तो युद्ध है परन्तु न ही शान्ति। इसके द्वारा राजनय के माध्यम से राज्यों के मध्य दण्डात्मक स्थिति बनाना या आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना जिससे विरोधियों पर दबाव की स्थिति बनी रहती है। वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में विभिन्न तरीकों द्वारा राजनैतिक युद्ध की स्थिति पैदा की जाती है -
    1. किसी समुदाय को भ्रमित प्रचार द्वारा विभाजित करना;
    2. विरोधी राज्य में अल्पसंख्यकों को समर्थन देकर राज्य में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करना;
    3. दूसरे राज्यों के महत्त्वपूर्ण उद्योगों, संचार केन्द्रों, यातायात के साधनों आदि में तोड़-फोड़ की कार्यवाही द्वारा व्यवधान उत्पन्न करना;
    4. राजनेताओं की हत्या कराकर जन साधारण का मनोबल गिराना;
    5. सरकार का तख्ता पलटने वालों को सक्रिय समर्थन देना
    6. सीमा पार से आतंकवादी गतिविधियां चलाना आदि।
  4. आर्थिक साधन- वर्तमान युग अन्त:निर्भरता का युग है। प्रत्येक राष्ट्र, कितना ही शक्तिशाली हो या कितना ही छोटा हो, सभी को परस्पर एक दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। कोई भी सम्पूर्ण रूप से आत्म निर्भर नहीं है। परन्तु प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति हेतु वे राष्ट्र अपने संसाधनों के बल पर अपने राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि करते हैं। इन्हीें संसाधनों के प्रयोग से बड़ी शक्तियां विदेशों में सैन्य अड्डे स्थापित करने; विकासशील देशों में सत्ता परिवर्तन; सस्ता कच्चा माल प्राप्त करने; कमजोर राष्ट्रों की नीतियों को प्रभावित करने; राज्यों की मुद्रा के अवमूल्यन करने; व्यापार की शर्तें तय करने आदि में सफलता प्राप्त कर लेती हैं। इस संदर्भ में आर्थिक रूप से शक्तिशाली राष्ट्र अन्य देशों के प्रति दो प्रकार के साधनों का प्रयोग करते हैं - मुख्य आर्थिक तन्त्र तथा गौण आर्थिक तंत्र। मुख्य आर्थिक तंत्र का प्रयोग निम्न तरीकों से किया जाता है - (i) आयात शुल्क लगाना; (ii) अंतर्राष्ट्रीय अनुबंधों को अपने पक्ष में रखना; (iii) कम मूल्य पर निर्यात करना; (iv) कर्ज या अनुदान देकर; (v) विदेशी सहायता प्रदान करना आदि। गौण आर्थिक तन्त्र के आधार पर प्रयुक्त होने वालीे आर्थिक तंत्र के अंतर्गत - (i) रियासत; (ii) बहिष्कार; (iii) नाकेबन्दी। इन्हीं आर्थिक साधनों के द्वारा राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों में अभिवृद्धि करते हैं।
  5. साम्राज्यवाद- 1945 से पूर्व अत्याधिक बड़ी शक्तियों ने साम्राज्यवाद का सहारा लेकर अपने राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि की थी। सामान्य तौर पर जब कोई राष्ट्र दूसरे राज्य की सीमा व जनता पर जबरदस्ती कब्जा कर लें तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं। इसकी व्याख्या हेतु अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। साम्राज्यवाद के स्वरूप को कई रूपों में देखा जा सकता है। यह बड़े राज्यों द्वारा कभी आर्थिक कारणों, यथास्थिति बनाये रखने, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा आदि कई कारणों से प्रेरित होती है। साम्राज्यवाद की नीतियों के द्वारा राष्ट्रों को आर्थिक लाभ, शक्ति निर्माण तथा अविकसित देशों के कल्याण आदि प्राप्त होते हैं। इससे शक्तियों के राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होती है। परन्तु यदि वास्तव में देखा जाए तो कुछ चन्द राष्ट्रों के हितों के पूर्ति हेतु साम्राज्यवाद से ज्यादातर राष्ट्रों का शोषण, अन्याय, पिछड़ापन, गरीबी, भुखमरी आदि बढ़ती है। इसलिए 1945 के बाद के वर्षों में क्षेत्रीय साम्राज्यवाद समाप्त प्राय हो गया है।
  6. उपनिवेशवाद व नव उपनिवेशवाद- उपनिवेशवाद के माध्यम से 18वीं व 19वीं शताब्दी में यूरोप की बड़ी ताकतों ने तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों पर राज्य किया है। इसके अंतर्गत विदेशी राज्यों पर बाह्य शक्तियों का शासन चलाया जाता रहा है जो स्थानीय लोगों के सभी विषयों पर अपना नियंत्रण रखते हैं। पूरी राजनैतिक व्यवस्था उनके हाथ में होती थी। सरकार विदेशी ताकतों द्वारा ही चलाई जाती थी। भ्ा-भाग पर भी पूर्ण नियंत्रण बाह्य शक्तियों का ही होता था। स्थानीय लोगों की स्वतन्त्रताएं भी उन्हीं के इशारे पर चलती थी। परन्तु स्वतन्त्रता आन्दोलन के लम्बे संघर्ष ने 1950 व 1960 के दशकों में सभी को आजाद करा दिया तथा उपनिवेशी व्यवस्था का प्राय: अन्त हो गया। 1945 के बाद उपनिवेशवाद का स्थान ‘नव’ उपनिवेशवाद ने ग्रहण कर लिया। अब क्षेत्रीय व राजनैतिक रूप से तो राज्य स्वतन्त्र हो गए, लेकिन आर्थिक रूप से अभी भी गुलाम बने रहे। आर्थिक संसाधनों की दृष्टि से 30 प्रतिशत जनसंख्या 70 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग करती है तथा 70 प्रतिशत जनता मात्र 30 प्रतिशत संसाधनों का प्रयोग करती हैं। आज भी कच्चे माल की कीमतें, व्यापार की शर्ते, आर्थिक आदान-प्रदान, तकनीकी हस्तांतरण आदि सभी तीसरी दुनिया के देशों के विरुद्ध हैं। अब इन राष्ट्रों का शोषण अप्रत्यक्ष रूप से होने लगा है। आज बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, आर्थिक सहायता, पूंजीनिवेश कच्चे माल का आयात व तैयार-शुदा माल का निर्यात, दोयम दर्जे का तकनीकी हस्तांतरण आदि के माध्यम से विकसित देश आज भी विकासशील राज्यों का शोषण कर रहे हैं। विभिन्न गैर जरूरी मुद्दों जैसे बाल श्रम, पर्यावरण, मानवाधिकार आदि के नाम पर आज भी इनके साथ व्यापारिक व अन्य आर्थिक संबंधों में भेदभाव किया जाता है। अत: इन आर्थिक लाभों के कारण शक्तिशाली राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति एवं संवर्धन कर रहे हैं।
  7. युद्ध - युद्ध को भी अन्तिम विकल्प के रूप मे राष्ट अपने राष्टी्रय हितो के सवंद्धर्न हेतु प्रयोग कर लेते है युद्दो हेतु विभिन्न कारण व इसके विभिन्न स्वरूप होते हैं। परन्तु वर्तमान युग में हथियारों की मारक क्षमता एवं उनके विध्वंसक स्वरूप के कारण राष्ट्र युद्धों के प्रयोग से बचते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि युद्धों का त्याग कर दिया गया। बड़ी शक्तियां आज भी अपने राष्ट्र हितों की पूर्ति हेतु इसके प्रयोग से नहीं चूकती हैं। उदाहरण के रूप में वर्तमान समय में भी अमेरिका ने अफगानिस्तान व ईराक पर युद्ध करके अपनी एकमात्र वर्चस्व वाली महाशक्ति होने का परिचय दिया।
अत: उपरोक्त साधनों के माध्यम से शक्तियां अपने राष्ट्रीय हितों में वृद्धि करती रहती है। यह शक्ति संवर्द्धन शान्तिपूर्ण तरीकों से लेकर युद्ध तक के अनेक निर्धारण तत्वों के द्वारा किया जाता है। लेकिन वर्तमान अन्तनिर्भरता के युग में कुछ राष्ट्रों के राष्ट्रीय हितों का संवर्द्धन अन्य राज्यों की कीमत पर होता है। इसीलिए राष्ट्रों को अपनी विदेश नीति का आधार बनाते समय दूसरे राष्ट्रों के हितों को भी देखना चाहिए। इसी प्रकार राष्ट्रीय हितों के उपयोग से विश्व में दूरगामी व निरन्तर शांति व सुरक्षा की स्थापना हो सकती है।

विचारधारा

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में विचारधारा का विशेष महत्व है। विचारधाराओं के आधार पर विश्व शांति व अंतर्राष्ट्रीय युद्धों की स्थिति होती है। यह शक्ति का अमूर्त रूप होते हुए भी राष्ट्रीय शक्ति का एक प्रमुख तत्व है। सामान्य रूप से विचारधारा दो अर्थों में मानी जाती है - एक, विचारधारा को विचारों एवं विश्वासों का ऐसा समुच्चय है जो एक सुनिश्चित विश्व दृष्टि पर आधारित हो और अपने आप को पूर्ण मानें। दो, विदेश नीति के वास्तविक उद्देश्यों को छिपाने का आवरण कहा जा सकता है। 20वीं शताब्दी में विभिन्न विचारधाराओं का उदय एवं अन्त देखने को मिला। इनमें सबसे प्रमुख विचारधाराएं रही - साम्यवाद, नाजीवाद, फासिस्टवाद, साम्राज्यवाद, नव-उपनिवेशवाद आदि। एक सन्दर्भ में लोकतन्त्रवाद तथा भूमण्डलीकरण को भी प्रमुख विचारधारा माना जा सकता है। परन्तु मारगेन्थाऊ का मानना है कि मुख्य रूप से इन विचारधाराओं को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता हैं - (i) यथास्थिति की विचारधारा; (ii) साम्राज्यवाद की विचारधारा; (iii) अस्पष्ट विचारधारा। इनका विस्तृत विवरण इस प्रकार से है-
  1. यथास्थिति का अर्थ है किसी प्रकार के परिवर्तन से इंकार करते हुए विश्वव्यवस्था का उसी रूप में चलते रहना। इस स्थिति का समर्थन वही राष्ट्र करेंगे जिन्हें अधिक सम्मानपूर्वक या मजबूत स्थिति प्राप्त हुई हो। जिन राष्ट्रों को अंतर्राष्ट्रीय शक्ति वितरण में नुकसान हुआ हो वे राष्ट्र हमेशा यथास्थिति को बदलने की बात कहते हैं। यह स्थिति विशेषकर प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्धों के उपरांत हुए सत्ता विभाजन के बाद अति स्पष्ट रूप में उजागर हुई। इन युद्धों के उपरान्त हुई सन्धियों व समझौतों से लाभांवित विजित राष्ट्रों ने हमेशा यथास्थिति बनाए रखने पर जोर दिया है तो इनसे हुए नुकसान वाले हारे हुए राष्ट्रों ने हमेशा इस स्थिति को चुनौती दी है। परन्तु इस स्थिति को बनाए रखने हेतु विजित राष्ट्र नई विचारधाराओं जैसे शान्ति की विचारधारा एवं अंतर्राष्ट्रीय कानून की विचारधारा का सृजन कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त, राष्ट्र संघ व संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की स्थापना इन्हीं राष्ट्रों की पहल का परिणाम है। इस पहल के माध्यम से वे अपनी स्थिति को बरकरार रखना चाहते हैं। अत: लाभ की स्थिति वाले राष्ट्र हमेशा ही यथास्थिति की विचारधारा का समर्थन करते हैं तो इससे निराश देश हमेशा इन्हें बदलने हेतु संघर्षरत रहते हैं।
  2. साम्राज्यवाद की विचारधारा हमेशा राज्यों द्वारा अपनी सीमाओं के विस्तार हेतु अपनाई जाती है। यह यथास्थिति के बिल्कुल विपरीत विचारधारा है इसके कार्यान्वयन हेतु शक्ति के सीधे उपयोग की बजाय इन राष्ट्रों को किसी आवरण की आवश्यकता होती है। बाह्य तौर पर इस प्रकार के औचित्य के पीछे अन्तिम उद्देश्य शक्ति विस्तार व नियंत्रण करना है। कई बार इस प्रकार के शक्ति प्रयोग के विभिन्न बहाने बनाये जाते हैं जैसे - “श्वेत लोगों का बोझ,” “राष्ट्रीय कर्तव्य, विनाशकारी हथियारों से बचाने हेतु आदि। परन्तु इन सब पहल का अन्तिम उद्देश्य राज्यों द्वारा अपनी सीमाओं/प्रभावों का विस्तार करना होता है। अपने कार्यों को सिद्ध करने हेतु विभिन्न प्रचलित सिद्धान्तों का सहारा लिया जाता है या उनकी नई व्याख्याएं प्रस्तुत की जाती है।
  3. कुछ विचारधाराओं को मारगेन्थाऊ “अस्पष्ट विचारधाराओं” की श्रेणी में रखता है क्योंकि ये विचारधाराएँ उपरोक्त वर्णित दोनों प्रकार की विचारधाराओं का मिश्रित प्रयोग करती हैं। जहां एक ओर ये आक्रमणकारी पद्धति से स्थिति के परिवर्तन की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर ये यथास्थिति बनाये रखने की कोशिश भी करती हैं। मारगेन्थाऊ तीन प्रमुख विचारधाराओं को इस श्रेणी में सम्मिलित करता है - राष्ट्रीय आत्म निर्णय की विचारधारा, शान्ति की विचारधारा तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठन की विचारधारा। इन तीनों प्रकार की विचारधाराओं का विभिन्न राष्ट्रों ने दोनों संदर्भों में प्रयोग किया है। उदाहरण के रूप में, आत्मनिर्णय के सिद्धान्त के अनुसार जहां एक ओर साम्राज्यवाद के विरोध स्वरूप नये राष्ट्रों का उदय हुआ वहीं पर कई नेताओं ने इसका हवाला देकर कई राज्यों को अपने क्षेत्र में विलीन कर लिया। इसी प्रकार शान्ति के नाम पर राज्यों ने शान्ति भंग करने वाले राष्ट्रों के विरुद्ध कार्यवाही कर शोषण व साम्राज्यवादी नीतियों का अन्त किया वहीं दूसरी ओर शान्ति स्थापना के नाम पर शक्तिशाली राष्ट्रों ने छोटे राष्ट्रों पर हस्तक्षेप किया तथा अपने अनुरूप शासन व्यवस्था स्थापित पर ली। संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन का विचार जहां एक ओर विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद सुचारू व्यवस्था का प्रतीक है वहीं दूसरी ओर विजयी राष्ट्रों हेतु बड़े फायदे का सौदा साबित हुआ, क्योंकि इससे सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता के माध्यम से विजीय राष्ट्रों का स्थाई वर्चस्व स्थापित हो गया।
परन्तु यह सत्य है कि विचारधारा का स्वरूप कुछ भी हो यह राष्ट्रीय हितों से घनिष्ठ रूप से जुड़ी होती हैं। बल्कि कई बार तो अपने राष्ट्रीय हितों के सन्दर्भ में ही राज्य अपनी विचारधारा तय करते हैं। इस प्रकार जिस प्रकार हित विचार धारा का निर्माण करता है उसी प्रकार हित भी विचारधारा द्वारा निर्धारित हो सकता है। अत: ये दोनों एक दूसरे से परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

विचारधारा की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका का आकलन करें तो निम्नलिखित तथ्य स्पष्ट रूप से उजागर होते हें - (i) विचार किसी भी देश की विदेश नीति को दिशा प्रदान करती है, इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में इसके मूल्य/मान्यताएं विदेश नीति के माध्यम से प्रभावित करते हैं। (ii) इससे राष्ट्र शक्ति को भी सुदृढ़ता मिलती है। यह तथ्य उस स्थिति में अत्यन्त महत्वपूर्ण बन जाता है जब वह देश विविधता से पूर्ण हो। (iii) विचारधारा कई बार राष्ट्रों में असंगठित विचारों को एकता के सूत्र में पिरोकर एक आन्दोलन का रूप प्रदान कर देते हैं। (iv) कई बार इसका नकारात्मक स्वरूप भी देखने को मिलता है। यह नकारात्मक अभिव्यक्ति कट्टरवाद के रूप में परिलक्षित होती है। (v) कई बार विभिन्न विचारधाराओं के कारण या परस्पर विरोधी विचारधाराओं के कारण विश्व में तनाव व शीतयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उदाहरण के रूप में 1945-1991 तक विश्व राजनीति साम्यवाद व पूंजीवाद की विरोधी विचारधाराओं के कारण शीतयुद्ध के दौर से गुजरी।

विचारधाराओं में कट्टरता के कारण कई बार अंतर्राष्ट्रीय राजनीति विरोधी गुटों में बंट जाती है। दोनों गुटों के बीच एक दीवार खड़ी हो जाती है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से सम्बद्ध सभी निर्णय वस्तुनिष्ठता एवं गुणों के आधार पर न लेकर विचारधाराओं से सम्बद्धता के अनुरूप लिए जाते हैं। शीतयुद्ध काल में विश्व सभी व्यवहारिक दृष्टि से परस्पर दो विरोधी खेमों में बंट गया था तथा सम्पूर्ण अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से सम्बन्धित निर्णय उसी का परिणाम रहे।

अत: यह निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में विचारधारा का विशेष महत्त्व/स्थान सुनिश्चित है। यद्यपि कुछ समय पूर्व विचारधारा के अंत के सिद्धान्त पर विद्वानों में काफी बहस हुई परन्तु विचारधारा के व्यावहारिक रूप को देखते हुए यह सैद्धान्तिक बहस सफल नहीं हो सकी। वर्तमान समय में फिर से विचारधारा को दो प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रथम, शीतयुद्धोत्तर युग में फुकुयामा ने अपनी नवीनतम पुस्तक के माध्यम से “विचारधारा के अन्त” को स्थाई सिद्ध करने का प्रयास किया है। द्वितीय, 1992 के बाद ज्यादातर राष्ट्र अब एक ही विचारधारा के समर्थक बन गये। और यह विचारधारा है - भूमण्डलीकरण की। अब पाश्चात्य देश ही नहीं लगभग सम्पूर्ण तीसरी दुनिया के देश, जिसमें स्वयं रूस व चीन सहित कई साम्यवादी देश भी सम्मिलित हैं। परन्तु इन चुनौतियों के बाद भी यह मानना कि विचारधारा का अन्त हो गया है यह गलत है, क्योंकि भूमण्डलीकरण भी विचारधारा का ही एक स्वरूप है। इसके अतिरिक्त, अभी बदलाव का दौर चल रहा है इसके बाद शायद पहले जैसी विचारधाराएं न भी उत्पन्न हों, परन्तु नये सन्दर्भ एवं स्वरूप में विचारधाराओं की उत्पत्ति न हो ऐसा पूर्ण प्रमाणिकता से कहना उचित नहीं होगा।

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