सार्वजनिक ऋण का अर्थ एवं प्रकार

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सरकार जब सार्वजनिक व्यय सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति करारोपण के द्वारा नहीं कर पाती है। (क्योंकि लोगों में एक निश्चित सीमा के बाद करारोपण की ऊँची दर असन्तोष को जन्म देगी तथा कार्य प्रेरणा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगी) तथा घाटे की वित्त व्यवस्था का भी सहारा नहीं ले पाती है (क्योंकि उसे ‘सुरक्षित सीमा’ के भीतर ही रखना होता है, जिससे भयावह मुद्रा स्फीति अर्थव्यवस्था को ध्वस्त न कर दें)। ऐसे समय वहाँ सरकार सार्वजनिक व्यय तथा सार्वजनिक आय के बीच के अन्तर को लोगों से उधार लेकर ऋण के माध्यम से पूरा करने का प्रयास करती है। यही सार्वजनिक ऋण है। इस तरह सार्वजनिक ऋण का अर्थ सरकार द्वारा लिए जाने वाले ऋण से है। सरकार द्वारा अपने देश के अन्दर तथा दूसरे देशों से लिये गये ऋण को लोक या सार्वजनिक ऋण कहते हैं। सार्वजनिक ऋण या तो आन्तरिक हो सकता है अथवा विदेशी सरकारों या अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से लिया जा सकता है।

किसी अवधि में बजट घाटा (Budget deficit) राजस्व से व्यय आधिक्य (excess of spending over revenues) है। किसी दिए हुए समय में ऋण पिछले सभी बजट घाटे का जोड़ (sum of all over revenues) है। इस प्रकार ऋण पिछले राजस्व से पिछले व्यय का संचयी आधिक्य (cumulative excess) है। ऋण एक स्टॉक चर (stock variable) है, जिसकी माप समय के एक खास बिन्दु (at a point time) पर होता है। बजट घाटा एक प्रवाह चर (flow variable) है, जिसकी माप समय की एक अवधि (during a period of time) में होती है। उदाहरणार्थ, मान लें कि 2010 के दौरान सरकार को 25000 करोड़ रूपए का घाटा होता है, लोक ऋण के भण्डार में इस राशि का जोड़ दिया जाएगा। इसके विपरीत, मान लें कि 2008 में सरकार को 18000 करोड़ रूपये का अतिरेक (surplus) प्राप्त हुआ। लोक ऋण के भण्डार में इतनी राशि की कमी हो गई। सम्प्रति, राज्य का कार्यक्षेत्र इतना व्यापक हो गया है कि सरकारें बिना ऋण के अपना कार्य नहीं चला सकतीं। सार्वजनिक ऋण को सार्वजनिक आय की दृष्टि से ‘असाधारण वित्त’ (Extraordinary Finance) कहा जाता है, क्योंकि सरकार द्वारा ऋण असाधारण आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु लिए जाते हैं। आजकल मुद्रा बाजार के विकास एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में बृद्धि होने के कारण सार्वजनिक ऋण की प्रक्रिया काफी सुविधाजनक हो गई है। वर्तमान में, सार्वजनिक ऋण सरकार की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है, किन्तु बहुत बड़ी मात्रा में सार्वजनिक ऋणों से आय स्रोत प्राप्त करना उचित नहीं है। बैस्टेबल के विचार से ‘‘जिस प्रकार एक व्यक्ति हमेशा ऋण की सहायता से अपना काम नहीं चला सकता उसी प्रकार सरकार भी हमेशा ऐसे साधनों से काम नहीं चला सकती।’’ वर्तमान में, सरकारें आन्तरिक ऋण अथवा बाह्य ऋण अथवा दोनों लेकर अपनी अनेक विकास योजनाओं को पूरा कर रही हैं।

सरकार जो राशि ऋण द्वारा किसी वर्ष प्राप्त करती है, वह उसकी उस वर्ष की आय का हिस्सा बन जाती है। यह आय स्थायी नहीं होती क्योंकि इसे कुछ समय के उपरान्त वापस करना होता है। अत: ऋण को सरकार की अल्पकालीन आय का साधन कहा जाता है। दीर्घकालीन दृष्टि से यह आय नहीं कही जा सकती। सरकार की आय में केवल उसी आय को सम्मिलित करना उचित होगा जो सदैव ही सरकार के उपयोग में रहे और जिसे सरकार को वापस लौटाना न पड़े। सार्वजनिक आय के विपरीत सार्वजनिक ऋणों पर एक निर्धारित अवधि तक ब्याज देना पड़ता है तथा ऋण की अवधि समाप्त होने पर ऋण राशि का भुगतान करना आवश्यक होता है। इस तरह सार्वजनिक ऋण की प्रकृति सार्वजनिक आय की प्रकृति से सर्वथा भिन्न होती है। प्रो0 जे0 के0 मेहता के अनुसार, ‘‘सार्वजनिक आय वह प्राप्ति है जिसको, उसके भुगतान कर्त्ताओं को वापस लौटाना सरकार के लिए आवश्यक नहीं होता, जबकि इसके विपरीत सार्वजनिक ऋण के सम्बन्ध में सरकार इस बात के लिए बाध्य होती है कि उस धन को यह ऋणदाताओं के वापिस कर दें।’’ वस्तुत: ऋण एक तरह का आर्थिक बोझ होता है, अत: सामान्य परिस्थितियों में ऋण लेना उचित नहीं समझा जाता।

सकल ऋण (Total Debt) तथा निवल ऋण (Net Debt) में अन्तर किया जाता है। निवल ऋण को जनता द्वारा धारण किया गया ऋण (debt held by the public) भी कहा जाता है, जिसमें स्वयं सरकार द्वारा धारण किए गए ऋण को शामिल नहीं किया जाता है। व्यक्ति या परिवार, बैंक, व्यवसायी, विदेशी तथा अन्य गैर-संघीय हस्तियां निवल ऋण के स्वामी होते हैं। सकल ऋण निवल ऋण तथा सरकार के स्वामित्व में बाण्ड का प्रयोग है। (Gross Debt = Net Debt + Bonds owned by the Government)

व्यक्तिगत या निजी तथा सार्वजनिक ऋण में अन्तर

सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत ऋणों के बीच अनेक समानतायें हैं, पर साथ ही कुछ असमानतायें भी हैं। जिन्हें इस प्रकार लिखा जा सकता है -

समानतायें -

  1. उद्देश्य - व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक दोनों ही ऋण आकस्मिक समय में लिए जाते हैं। जब किसी कारण से आय की मात्रा व्यय की तुलना में कम पड़ जाती है, तभी व्यक्ति तथा सरकार द्वारा ऋण लिये जाते हैं।
  2. ऋण की सीमा - व्यक्ति तथा सरकार दोनों की ही ऋण लेने की एक निश्चित सीमा होती है, जिसके बाद उन्हें ऋण नहीं प्राप्त होता है। यह सीमा उनकी ऋण तथा ऋण के ब्याज के भुगतान करने की क्षमता पर निर्भर करती है। यह बात दूसरी है कि व्यक्ति की ऋण क्षमता तथा साख दोनों कम होती है जबकि सरकार की क्षमता तथा साख दोनों अधिक होती है पर एक सीमा के बाद सरकार को भी उसी प्रकार ऋण नहीं मिल पाता है, जिस प्रकार व्यक्ति को।
  3. भुगतान का दायित्व - दोनों ही ऋणो में ऋण के ब्याज तथा मूलधन के भुगतान के दायित्व के सम्बन्ध में समानता रहती है। दोनों के भुगतान के ढंग में अन्तर हो सकता है।
  4. कोष का स्थानान्तरण - सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत दोनों ही ऋणों में एक प्रयोग से दूसरे प्रयोग में कोष का हस्तान्तरण होता है। व्यक्तिगत ऋण की स्थिति में हम यह पाते हैं कि ऋण से प्राप्त कोष का प्रयोग किसी साधन को प्राप्त करने के लिए किया जाता है, इस प्रकार एक प्रयोग के लिए दूसरे प्रयोग का त्याग करना पड़ता है। यही बात सार्वजनिक ऋण के भी सम्बन्ध में ठीक है। क्योंकि इसमें भी सरकार इस कोष के द्वारा कोई साधन प्राप्त करती है तथा इसमें व्यक्तिगत प्रयोग का त्याग करके सार्वजनिक प्रयोग में कोष को लगाया जाता है।
  5. ऋण का प्रयोग - व्यक्तिगत ऋण के सम्बन्ध में ऋणी यथा सम्भव प्रयास करता है कि ऋण का प्रयोग लाभप्रद उपयोगों में हो अन्यथा दायित्व का भुगतान नहीं किया जा सकता, ठीक यही बात सार्वजनिक ऋणों के भी सम्बन्ध में सही है, सरकार को भी यही प्रयास करना चाहिए।

असमानतायें -

एक व्यक्ति की भाँति सरकार को भी ऋण लेना पड़ता है, लेकिन सरकार एवं जनता के द्वारा लिए गए ऋणों के उपयोग एवं ऋण की व्यवस्था में कुछ मौलिक अन्तर पाए जाते हैं, जो इस प्रकार है -
  1. ऋण का उद्देश्य - एक व्यक्ति अपने परिवार के हितों के लिए अथवा अपने निजी लाभ के लिए ऋण लेता है जबकि सरकार देश के कल्याण के लिए ऋण लेती है। कभी-कभी सरकार मुद्रा प्रसार की स्थिति को भी नियन्त्रित करने के लिए देश के लोगों से ऋण लेती है। सामान्यतया सरकार द्वारा लिए गए अधिकांश ऋण उत्पादक होते हैं, जबकि व्यक्तिगत ऋण उत्पादक तथा अनुत्पादक दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं।
  2. ब्याज की दर - सरकार की साख अधिक होने के कारण उसे कम ब्याज पर उधार मिल जाता है जबकि व्यक्तिगत ऋण प्राय: ऊँची ब्याज की दरों पर ही उपलब्ध हो पाता है।
  3. ऋण की मात्रा, अवधि तथा जमानत - एक व्यक्ति की तुलना में सरकार अपनी ऊँची साख के कारण बड़ी मात्रा में तथा लम्बे समय के लिए ऋण ले सकती है और सरकार को जमानत देने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके विपरीत, व्यक्तिगत ऋणों की मात्रा एवं अवधि अपेक्षाकृत कम होती है और ऋण लेने के लिए प्राय: जमानत अथवा उचित धरोहर का होना आवश्यक समझा जाता है।
  4. ऋण प्राप्ति के रूप तथा स्रोत - सरकार अपने देश के नागरिकों तथा विभिन्न संस्थाओं से ऋण लेने के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर विदेशों से भी ऋण ले सकती है। इसके अलावा सरकार स्वयं भी ऋण का स्रोत उत्पन्न कर सकती है जबकि एक व्यक्ति या तो बैंक से अथवा अपने मित्रों एवं रिश्तेदारों से या साहूकार से ऋण ले सकता है। व्यक्ति के ऋण सम्बन्धी साधन अत्यन्त सीमित होते हैं और उसे प्राय: आन्तरिक ऋण ही उपलब्ध हो सकता है।
  5. अनिवार्यता - सरकार के पास राजसत्ता होती है। अत: वह आन्तरिक ऋण तो अपने अधिकारों का प्रयोग कर ले सकती है, जैसे आयकर दाताओं पर अनिवार्य बचत योजना लागू कर सरकार ने उनसे ऋण लिया था। किन्तु एक व्यक्ति इस प्रकार किसी शिक्ता या अधिकार से ऋण नहीं ले सकता।
  6. ऋण भार - व्यक्ति जब ऋण लेता है तो उसका भार उसी व्यक्ति पर पड़ता है या अधिकतम उसके परिवार के सदस्यों पर पड़ता है किन्तु सरकार द्वारा लिए गए ऋण का भार पूरे देश के लोगों पर पड़ता है क्योंकि ऋण चुकाने के लिए सरकार लोगों पर कर लगाती है। यही नहीं सार्वजनिक ऋण का भार वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ भावी पीढ़ी पर भी पड़ता है।
  7. साख का अन्तर - सरकार की साख अधिक होने से सरकार को सरलता से तथा कम ब्याज पर ऋण मिल जाता है। इसी कारण सरकार द्वारा जारी ऋणपत्र हाथों-हाथ बिक जाते हैं, क्योंकि लोग सरकार को ऋण देना सुरक्षित विनियोग समझते हैं। किन्तु एक व्यक्ति को इतनी सरलता से ऋण नहीं मिलता साथ ही उसे ऊंची दर का ब्याज भी देना पड़ता है।
  8. ऋण का लाभ से सम्बन्ध - जब व्यक्तिगत ऋण व्यय किया जाता है तो इससे ऋणदाता को कोई लाभ प्राप्त नहीं होता किन्तु जब सरकार ऋण की राशि व्यय करती है तो देश के नागरिकों को लाभ प्राप्त होता है। इस लाभ में वे व्यक्ति भी शामिल होते हैं जो सरकार को ऋण नहीं देते हैं।
  9. ऋण का परिशोधन - सरकार ऋण का भुगतान करने से इन्कार कर सकती है अथवा अपने ढंग से भुगतान करने का निर्णय ले सकती है किन्तु एक व्यक्ति लिए हुए ऋण का भुगतान करने से इन्कार नहीं कर सकता और यदि वह ऐसा करता है तो उस पर कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। किन्तु सरकार भी अपनी साख को दृष्टि में रखते हुए ऋण का भुगतान करने से इन्कार नहीं करती।
  10. अवधि का अन्तर - व्यक्ति प्राय: अल्पावधि के लिए ऋण लेता है अथवा यह कुछ ही वर्शों के लिए होता है। इसके विपरीत, सरकार दीर्घकालीन योजनाओं के लिए दीर्घकालीन ऋण लेती है, जो 20-25 वर्ष या उससे भी अधिक की अवधि की हो सकती है।
  11. गोपनीयता - व्यक्तिगत ऋण सामान्यतया गोपनीय रखे जाते हैं, जबकि सार्वजनिक ऋणों को गोपनीय नहीं रखा जाता। व्यक्ति अपनी साख व प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए ऐसा करता है। अधिकाधिक ऋणभार पड़ने पर भी वह अपनी स्थिति को छिपाए रखता है। इसके विपरीत, सरकार समय-समय पर ऋणों के लिए आँकड़ों को प्रकाशित करती रहती है, जिससे देश के नागरिकों के सामने स्थिति स्पष्ट रहे।
  12. आवश्यकता का अन्तर- कोई ऋण तभी लेता है जब उसको धन की आवश्यकता होती है, परन्तु सरकार बहुत बार धन प्राप्त करने के दृष्टिकोण से नहीं वरन् अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए तथा उसमें आवश्यक परिवर्तन की दृष्टि से भी ऋण लेती है। यथा स्फीतिकाल में व्यक्तियों के पास क्रयशक्ति कम करने के उद्देश्य से सरकार जनता से ऋण लेती है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि निजी ऋण एवं सार्वजनिक ऋण में अन्तर होता है।

सार्वजनिक ऋण के प्रकार

लोक ऋण का वर्गीकरण 8 आधारों पर किया जा सकता है -

ऋण स्रोत के आधार पर - 

ऋण कहाँ से प्राप्त किया गया है, के आधार पर लोक ऋण दो प्रकार के हो सकते हैं : (i) आन्तरिक ऋण (ii) वाह्य अथवा विदेशी ऋण।

आन्तरिक ऋण  - 

जब सरकार अपने देश में नागरिकों को प्रतिभूतियाँ बेचकर उनसे ऋण प्राप्त करती है तो इसे आन्तरिक ऋण कहते हैं। प्रो. डाल्टन के अनुसार, ‘‘एक ऋण आन्तरिक है यदि वह उन व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा दिया जाता है जो उस क्षेत्र में रहते हैं, जिसे ऋण लेने वाली लोक सत्ता द्वारा नियन्त्रित किया जाता है।’’

बाह्य ऋण - 

यदि लोक ऋण विदेशों में रहने वाले व्यक्तियों या संस्थाओं या सरकारों से प्राप्त किए जाते हैं तो उन्हें बाह्य ऋण कहते हैं। डाल्टन के अनुसार, ‘‘ऋण उस समय वाह्य होगा, यदि वह उन व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा दिया जाता है, जो उस क्षेत्र से बाहर रहते हैं, जिसे ऋण लेने वाली लोक सत्ता द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जाता है।’’ उदाहरणत:, भारत द्वारा अमेरिका, जापान, इंगलैण्ड, इत्यादि देशों से एवं विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ, आदि अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से जो ऋण लिया जाता है, वह वाह्य अथवा विदेशी ऋण है।
  1. आन्तरिक और वाह्य ऋण में अन्तर - इन दोनों के अन्तर को निम्न तरह से स्पष्ट किया जा सकता है - अ.आन्तरिक ऋण अपने देश की मुद्रा में लिया जाता है जबकि वाह्य ऋण विदेशी मुद्रा में प्राप्त होता है। ब.आन्तरिक ऋणों की अदायगी अपने देश की मुद्रा में ही की जाती है जबकि वाह्य ऋणों की अदायगी विदेशी मुद्रा में की जाती है। स.आन्तरिक ऋण में मुद्रा का हस्तान्तरण एक ही देश में नागरिकों से सरकार को होता है, जबकि वाह्य ऋण में यह हस्तान्तरण एक देश से दूसरे देश को होता है। द.आन्तरिक ऋण ऐच्छिक या अनिवार्य हो सकते हैं, जबकि वाह्य ऋण केवल ऐच्छिक होते हैं अर्थात् विदेशी सरकारों की इच्छा के विरूद्ध ऋण प्राप्त नहीं जा सकता। य. सरकार आन्तरिक ऋणों को प्राथमिकता देती है। किन्तु जब इनसे सरकार की आवश्यकता की पूर्ति नहीं होती तो वाह्य ऋण लिए जाते हैं।
  2. आन्तरिक ऋणों का भार - जब सरकार देश के नागरिकों से ही ऋण लेती हैं तो इसमें लोगों के पास से क्रय-शक्ति का हस्तान्तरण सरकार को होता है अर्थात् साधनों का पुनर्वितरण होता है। आन्तरिक ऋणों से देश का धन देश के भीतर ही रहता है। इस प्रकार आन्तरिक ऋणों से देश के भीतर धन का पुनर्वितरण होता है, इसलिए इन ऋणों का प्रत्यक्ष मौद्रिक भार नहीं पड़ता है। जहाँ तक वास्तविक भार का प्रश्न है वह इस बात पर निर्भर करता है कि ऋणों का उपयोग कैसे किया जा रहा है और उन्हें कहाँ से प्राप्त किया जा रहा है। यदि इनके प्रयोग से उत्पादकता में बृद्धि होती है एवं वितरण में समानता स्थापित होती है तो इन ऋणों का भार नगण्य होता है, किन्तु यदि ऋणों को अनुत्पादक कार्यों में प्रयुक्त किया जाता है तथा इनके भुगतान के लिए निर्धन व्यक्तियों पर कर लगाया जाता है तो इससे वितरण में असमानता बढ़ती है और लोगों पर इसका भार पड़ता है।
  3. बाह्य ऋणों का भार - आन्तरिक ऋण-भार की तरह बाह्य ऋण भार भी देश के नागरिकों को वहन करना पड़ता है। जब सरकार बाह्य ऋणों की वापसी करती है तो मूलधन और ब्याज की राशि देश के नागरिकों पर कर लगाकर वसूल की जाती है। इससे जो हानि देश के लोगों को होती है, वही इन ऋणों का प्रत्यक्ष वास्तविक भार है। यदि इन ऋणों के प्रयोग से उत्पादकता में बृद्धि होती है तथा देश की राष्ट्रीय आय बढ़ती है जिससे ऋण की अदायगी की जा सकती है तो देश के नागरिकों पर इन ऋणों का भार भी बहुत कम पड़ता है। यदि ऐसे ऋणों को चुकाने के लिए अमीर लोगों पर कर लगाया जाता है तो वास्तविक कर-भार कम होगा। इसके विपरीत, यदि निर्धनों से कर वसूल करके ऋण व ब्याज का भुगतान किया जाता है तो वास्तविक कर भार अधिक होगा। कुछ लोगों का कहना है कि बाह्य ऋणों का वास्तविक भार बुरा नहीं है, क्योंकि वाह्य ऋणों की सहायता से बड़े पैमाने पर देश में आर्थिक विकास होता है, जिससे देश में उत्पादन व रोजगार में बृद्धि होती है। क्योंकि प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है, इसलिए लोगों की कर देय-क्षमता भी बढ़ती है। फलत: सरकार नागरिकों को मिलने वाले लाभ में से ही थोड़ी-थोड़ी राशि संग्रह करके ऋणों का भुगतान कर सकती है, ऐसी दशा में वास्तविक भार अधिक नहीं होता। यदि वाह्य ऋणों का उपयोग अनुत्पादक कार्यों के लिए होता है तो यह कहा जायेगा कि इससे रोजगार व उत्पादन में बृद्धि नहीं होगी। लोगों की कर देय-क्षमता भी नहीं बढ़ेगी और ऐसी दशा में वास्तविक भार बढ़ेगा।
  4. बाह्य ऋणों के पक्ष में तर्क - वाह्य ऋणों के पक्ष में निम्न तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं : (i) युद्ध व्यय हेतु पर्याप्त संसाधन एकत्रित करने का वाह्य ऋण एक प्रमुख स्रोत है। (ii) आर्थिक विकास की अनेक दीर्घकालीन परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए बाह्य ऋण संसाधनों की प्राप्ति के प्रमुख स्रोत हैं। वाह्य ऋणों का उत्पादकीय कार्यों में प्रयोग करके देश में पूंजी निर्माण की दर को आसानी से बढ़ाया जा सकता है। (iii) दैवी विपदाओं एवं संकटकालीन परिस्थितियों में वाह्य ऋण आय का एक प्रमुख स्रोत है। वाह्य ऋणों की सहायता से संकटकालीन समस्याओं का निराकरण आसान हो जाता है। (iv) अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए बाह्य ऋण आवश्यक होते हैं। (v) वाह्य ऋणों द्वारा विदेशी विनिमय के संकट को दूर करने में सहायता मिलती है।
  5. बाह्य ऋणों के विपक्ष में तर्क -  (i) वाह्य ऋणों पर दिया जाने वाला ब्याज देश के सामने विदेशी विनिमय की प्रमुख समस्या उत्पन्न करता है। वाह्य ऋणों की अदायगी भी विदेशी मुद्रा में की जाती है जिससे विदेशी विनिमय संकट उत्पन्न होता है। (i) वाह्य ऋण ऋणभार को संचयी क्रम में बढ़ाता है, जिससे देश में मितव्ययिता के सिद्धान्त की उपेक्षा होती है। (iii) वाह्य ऋणों की अधिकता दासता का मार्ग प्रशस्त करती है - ऋण देने वाला देश अथवा विदेशी संस्थायें देश की नीतियों में हस्तक्षेप करती हैं।

ऋण के उपयोग के आधार पर

ऋणों के उपयोग के आधार पर लोक ऋण को उत्पादक तथा अनुत्पादक ऋणों में विभाजित किया जा सकता है।

उत्पादक ऋण - 

उत्पादक ऋण वे होते हैं जिनका प्रयोग ऐसे उत्पादक कार्यों में किया जाता है, जिनसे इतनी आय प्राप्त हो सके कि उससे ऋण के मूलधन और ब्याज राशि का भुगतान किया जा सके। इन्हें सक्रिय ऋण भी कहते हैं, क्योंकि उत्पादक ऋणों से देश में धन व उत्पादन की मात्रा, राष्ट्रीय लाभांश, जनता की कर दान क्षमता तथा सरकार की आय में बृद्धि होती है। डाल्टन के अनुसार, ‘‘उत्पादक ऋण वह ऋण है जिसकी पूर्ति पूरी तरह समान मूल्य की सम्पत्ति के स्वामित्व से हो जाय।’’ इसी तरह का विचार प्रो0 शिराज तथा प्रो0 मेहता भी दिये हैं। फिण्डले शिराज के अनुसार, ‘‘उत्पादक ऋण वे ऋण हैं जिनके फलस्वरूप बराबर या अधिक मूल्य की सम्पत्ति का निर्माण होता है और इसी सम्पत्ति की आय से ब्याज का भुगतान किया जाता है। प्रो. जे. के. मेहता के शब्दों में, ‘‘उत्पादक ऋण वे हैं जिनसे प्राप्त राशि को ऐसे व्यवसायों में लगाया जाता है जिनकी आय से मूलधन और ब्याज की राशि को ऋण की परिपक्वता के बाद लौटाया जा सके। उपर्युक्त दृष्टि से उद्योगों, सिंचाई, परिवहन, आदि के हेतु लिये गया ऋण उत्पादक माना जाता है।

अनुत्पादक ऋण - 

उन ऋणों को अनुत्पादक कहते हैं जिनके प्रयोग से सरकार को कोई आय प्राप्त नहीं होती अथवा बराबर सम्पत्ति का निर्माण नहीं होता। इन्हें निश्क्रिय ऋण भी कहा जाता है। प्रो. डाल्टन के अनुसार, ‘‘वह ऋण अनुत्पादक होता है, जिसके पीछे कोई वर्तमान सम्पत्ति नहीं होती।’’ इसे दृष्टि में रखते हुए कहा जा सकता है कि युद्ध, बाढ़ अथवा अकाल इत्यादि पर व्यय के लिए जो ऋण लिया जाता है वह अनुत्पादक होता है। यद्यपि कि उपर्युक्त वर्गीकरण सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से भले ही सही हैं पर यदि सरकार ऋणों का प्रयोग विवेकपूर्ण तरीके से करती है तो किसी भी ऋण को अनुत्पादक नहीं कहा जा सकता। उदाहरणत: यदि युद्ध पर व्यय किया जाता है तो इससे देश की स्वतन्त्रता की रक्षा होती है और लोगों में कार्यक्षमता की बृद्धि होती है तथा देश में शान्ति और व्यवस्था का निर्माण होता है जो अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादन में सहायक होता है।

ऋण प्राप्ति की प्रकृति के आधार पर

इस आधार पर लोक ऋण को दो भागों में बांटा जाता है - (i) ऐच्छिक ऋण (ii) अनिवार्य ऋण।

ऐच्छिक ऋण  - 

ऐच्छिक ऋण से तात्पर्य ऐसे ऋण से है जिसे सरकार ऋण देने वालों की इच्छा से लेती है अर्थात् उन्हें ऋण देने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। बाह्य ऋण ऐच्छिक प्रकृति के होते हैं। सरकार देश के लोगों से भी ऐच्छिक ऋण लेती है। सरकार ऋण की अवधि, राशि, ब्याज आदि का विज्ञापन कर देती है तथा जिन व्यक्तियों की इच्छा होती है, वे ऋणपत्र खरीदते हैं।

अनिवार्य ऋण - 

जब सरकार देश के नागरिकों को ऋण देने के लिए बाध्य करती है तो ऐसे ऋणों को अनिवार्य ऋण कहते हैं। आन्तरिक ऋण ही अनिवार्य हो सकते हैं, बाह्य ऋण नहीं क्योंकि सरकार विदेशी नागरिकों या सरकारों को ऋण देने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। उदाहरण के लिए भारत में अनिवार्य जमा योजना अनिवार्य ऋण का उदाहरण है। डाल्टन के अनुसार, ‘‘आधुनिक राजस्व में अनिवार्य ऋण का महत्व बहुत कम रह गया है।’’

ऋण की अवधि के आधार पर

ऋण की अवधि के आधार पर भी लोक ऋण को दो भागों में बांटा जाता है - (i) अल्पकालीन या निश्चित कालीन अथवा अनिधिक ऋण, (ii) दीर्घकालीन या अनिश्चित कालीन अथवा निधिक ऋण।

अल्पकालीन या निश्चित कालीन अथवा अनिधिक ऋण  - 

जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है कि ये ऋण अल्प अवधि के होते हैं। सामान्य रूप से इनकी अवधि एक वर्ष की होती है। इन्हें सरकारें किसी विशेष उद्देश्य से नहीं वरन् अपने नियमित खर्च चलाने के लिए लेती हैं। सरकारें इन ऋणों की अदायगी के लिए किसी कोष की व्यवस्था नहीं करतीं, अत: इन्हें अनिधिक ऋण भी कहते हैं। राजकोषीय पत्र (Treasury Bills) के आधार पर लिये जाने वाले ऋण अल्पकालीन होते हैं ये 6 माह के भीतर शोधनीय होते हैं। अत: इन्हें अल्पकालीन ऋण हैं।

दीर्घकालीन या अनिश्चित कालीन अथवा निधिक ऋण - 

ये ऋण लम्बी अवधि के लिए सरकार द्वारा लिए जाते हैं। इन ऋणों को लेते समय इनकी अदायगी, अवधि तथा अन्य शर्तों को निश्चित कर लिया जाता है। इनकी अदायगी के लिए अलग एक कोष की स्थापना की जाती है अत: इन्हें निधिक या स्थायी ऋण भी कहते हैं। क्योंकि सरकार इस कोष में प्रतिवर्ष एक निश्चिम रकम जमा करती रहती है इसी कारण इसे कोशित ऋण भी कहते हैं। इस प्रकार का ऋण प्राय: सरकार नहरें, सड़कें, रेल तथा अन्य उत्पादक एवं स्थायी निर्माण कार्यों के लिए लेती हैं। इसके विपरीत अल्पकालीन ऋणों के लिए सरकार किसी प्रकार के कोष का निर्माण नहीं करती और इन ऋणों का भुगतान अपनी चालू आय में से नए लिए गए ऋणों से करती हैं।

ऋण के भुगतान के आधार पर

भुगतान के आधार पर ऋणों का भुगतान निम्न दो प्रकार से किया जा सकता है - (i) प्रतिदेय अथवा शोध्य ऋण, (ii) अप्रतिदेय अथवा अशोध्य ऋण।

प्रतिदेय अथवा शोध्य ऋण - 

प्रतिदेय ऋण वे ऋण होते हैं जिनका एक निश्चित अवधि के बाद भुगतान का चयन सरकार द्वारा किया जाता है। प्रो. जे.के. मेहता के अनुसार, ‘‘प्रतिदेय ऋण वे ऋण हैं, जिसको सरकार द्वारा एक भावी तिथि पर भुगतान करने का वचन दिया जाता है।’’

अप्रतिदेय अथवा अशोध्य ऋण - 

अप्रतिदेय ऋण वे ऋण होते हैं जिनके मूलधन के भुगतान की कोई तिथि नहीं होती किन्तु ब्याज के भुगतान की गारण्टी सरकार द्वारा दी जाती है। इस ऋण को सार्वकालिक ऋण अथवा बेमियादी ऋण भी कहते हैं।दूसरे शब्दों में, शोध्य ऋण वे होते हैं, जिनका भुगतान सरकार को ब्याज सहित एक निश्चित अवधि तक कर देना पड़ता है। इसके विपरीत अशोध्य ऋणों के सम्बन्ध में ऐसा कोई वादा सरकार नहीं करती। इस प्रकार अशोध्य ऋणों में सरकार केवल ब्याज का भुगतान करती है और मूलधन के भुगतान की चिन्ता नहीं करती है। 

इन ऋणों की विशेषताएँ इस प्रकार हैं - (i) शोध्य ऋण की दशा में मूलधन तथा ब्याज दोनों का भुगतान किया जाता है जबकि अशोध्य ऋण में केवल ब्याज का भुगतान करना पड़ता है। (ii) अशोध्य ऋण उन व्यवस्थाओं हेतु लेना चाहिए जिनसे निरन्तर आय प्राप्त होती रहे, जबकि शोध्य ऋण किसी भी कार्य के लिए लिया जा सकता है। (ii) शोध्य ऋण समय के दृष्टिकोण से अल्पकालीन, मध्यकालीन तथा दीर्घकालीन होते हैं, जबकि अशोध्य ऋण सदैव के लिए अर्थात् कालरहित होते हैं। (iii) अशोध्य ऋणों का भार भावी पीढ़ी पर पड़ता है और शोध्य ऋण का भार केवल वर्तमान पीढ़ी पर। (iv) अशोध्य ऋणों का प्रचलन आजकल नहीं है क्योंकि इनका भार नागरिकों पर सदैव पड़ता रहता है। जब तक ऋण राशि का भुगतान नहीं हो जाता तब तक सरकार नियमित रूप से ब्याज का भुगतान करती रहती है और सरकार कभी भी इस ऋण से मुक्त नहीं हो पाती है।
  1. शोध्य ऋणों के लाभ - (i) संकट काल में अल्पकालीन आय स्रोतों को जब सरकार कर द्वारा पूरा नहीं कर पाती तो वह शोध्य ऋणों की सहायता लेती है क्योंकि ये ऋण अल्पकालीन ऋण के समान होते हैं। (ii) शोध्य ऋणों में ब्याज की दर कम रहने की सम्भावना होती है, जिसके कारण इन ऋणों पर दिए जाने वाले ब्याज का भुगतान आसान हो जाता है। (iii) शोध्य ऋण में ऋण लेने और देने की साख बनी रहती है, जिसके कारण ऋण सुगमता से सहज रूप में मिल जाते हैं।
  2. शोध्य ऋणों की हानियाँ -  (i) शोध्य ऋण देश के पूंजीपतियों एवं धनी व्यापारियों से सुगमता से प्राप्त हो जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप लोगों की व्यक्तिगत पूँजी निजी विनियोग से निकलकर सरकार के हाथो में चली जाती है जिसका सरकार उत्पादकीय एवं अनुत्पादकीय दोनों ही प्रकार की क्रियाओं में प्रयोग करती है। निजी पूँजी के इस स्थानान्तरण का उत्पादन एवं विनियोग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। (iii) शोध्य ऋणों की प्राप्ति सहज होने के कारण अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति उत्पन्न होने का भय सदैव बना रहता है। (iv) शोध्य ऋणों की अधिकता सरकार को ऋणों के दुश्चक्र में फंसा देती है और ऐसे ऋण दीर्घकालीन बन जाते हैं क्योंकि सरकार एक ऋण का भुगतान करने के लिए क्रमश: दूसरा ऋण लेती चली जाती है तथा अर्थव्यवस्था में ऋणों का बोझ कभी समाप्त नहीं होता।(v) शोध्य ऋणों को लेने की बारम्बारता अधिक होती है। सरकार द्वारा बार-बार ऋण लिए जाने के कारण सरकार की साख गिर जाती है जिसका प्रतिकूल प्रभाव विशेष रूप से बाहरी ऋणों पर पड़ता है।
  3. अशोध्य ऋणों के लाभ - (i) अशोध्य ऋणों का ऋण भार कम होता है क्योंकि इस भार को भविष्य के लिए टाला जा सकता है। (ii) देश में दीर्घकालीन आर्थिक संकट उत्पन्न होने पर शोध्य ऋणों की तुलना में अशोध्य ऋण अधिक सहायक होते हैं क्योंकि अशोध्य ऋणों के भुगतान की अवधि बहुत लम्बी होती है और इस अवधि के दौरान देश अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकता है। (iii) अशोध्य ऋणों के भुगतान की समस्या सरकार के सामने ज्वलंत रूप में नहीं होती क्योंकि इन ऋणों की अदायगी की कोई विशेष तिथि नहीं होती और सरकार आसानी से इन ऋणों के ब्याज का भुगतान करती रहती है। (iii) अशोध्य ऋण प्राय: दीर्घकालीन होते हैं, जिनका प्रयोग आर्थिक विकास की दीर्घकालीन परियोजनाओं में किया जाता है। दूसरे शब्दों में अशोध्य ऋण आर्थिक विकास के लिए पर्याप्त वित्तीय साधन एकत्रित करने में सक्षम हैं।
  4. अशोध्य ऋणों से हानियाँ - (i) अशोध्य ऋणों में भुगतान की विशेष समस्या नहीं रहती जिससे फिजूलखर्ची को बढ़ावा मिलता है तथा मितव्ययिता के सिद्धान्त की उपेक्षा होती है। (ii) अशोध्य ऋणों में व्यक्तियों का धन लम्बे समय तक सरकार के पास जमा रहता है, जिससे निजी क्षेत्र का विनियोग घट जाता है, जिसका पूंजी निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। (iii) अशोध्य ऋणों में ब्याज की दर ऊंची होती है जिसके कारण भुगतान का भार न केवल वर्तमान पीढ़ी पर पड़ता है बल्कि भावी पीढ़ी को भी इस भार को वहन करना पड़ता है।

ब्याज के आधार पर

ब्याज के आधार पर भी लोक ऋण को दो भागों में विभाजित किया जाता है- (i) ब्याज सहित ऋण (ii) ब्याज रहित ऋण।

ब्याज सहित ऋण  - 

जिस ऋण की अदायगी में मूलधन के साथ ब्याज का भुगतान भी किया जाता है उसे ब्याज सहित ऋण कहते हैं। सामान्य रूप से ऋणों की यही प्रकृति होती है।

ब्याज रहित ऋण -

जिस ऋण की अदायगी के समय केवल मूलधन की वापसी की जाती है तथा ब्याज का भुगतान नहीं किया जाता है ऐसे ऋण को ब्याज रहित ऋण कहते हैं। ऋण लेते समय ही यह निश्चित कर लिया जाता है कि इस ऋण पर ब्याज नहीं लिया जाएगा। कुछ विशेष परिस्थितियों में अन्तर्राष्ट्रीय वित्त संस्थाओं द्वारा इस प्रकार के ऋण दिए जाते हैं।

विपणन योग्य और विपणन अयोग्य ऋण

विक्रय योग्य अथवा विपणन योग्य ऋण वे हैं, जिनमें सरकारी प्रतिभूतियों को स्वतन्त्रतापूर्वक खरीदा व बेचा जाता है। आजकल अधिकांश ऋण इसी श्रेणी के हैं। ऐसे ऋण जिन्हें उन सरकारी प्रतिभूतियों के आधार पर प्राप्त किया गया हो, जिन्हें खुले बाजार में बेचा जा सकता है, जैसे - डाकखाने के बचत पत्र। परन्तु कुछ ऋण विपणन योग्य नहीं होते।

सकल ऋण एवं शुद्ध ऋण 

किसी समय विशेष में सरकार के जितने ऋण होते हैं, उन सबके योग को सकल ऋण कहा जाता है। यदि सरकार ऋणों का भुगतान करने के लिए कोई विशेष कोष एकत्र करती है तो उस कोष को कुल ऋण राशि में से निकाल कर जो कुछ शेष बचत है वह शुद्ध ऋण कहलाता है।

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