आतंकवाद के कारण और उपाय

आतंकवाद एक ऐसा शब्द हैं जिसे सुनकर दहशत हो जाती हैं कि किस का घर उजडने वाला हैं क्योंकि आतंकवाद के कारण भारत देश नहीं वरन समूचा विश्व परेशान हैं। कुछ ऐसे सिरफिरे लोग जोकि विक्षित्प मानसिकता के होते हैं उनके द्वारा यह कृत किया जाता है। ‘‘‘‘‘कटट्ररपंथ’’’’’ और आतंकवाद पूरे विश्व की ज्वलंत समस्या हैं, शायद ही कोई देश इस अभिशाप से अछूता रहा हैं। सेना समर्थित कमजोर सरकारों की शह मिलने से आतंकवाद को फलने-फूलने का भरपूर मौका मिला अकूत तेल भंडारों से लवरेज देशों की बेहिसाबी धन-संपत्ति और भटकी हुई युवा शक्ति ने उनके लिए खाद पानी का काम किया हैं। फिर भी सियासतदां ऐसे भस्मासुरों को वरदान देने से बाज नहीं आ रहे हैं। मीटिंगों में बार-बार कहा जा रहा हैं कि शांति और स्थायित्व कायम किया जाए सभी देशों में इस हेतु साझा कदम उठाए जाए। हालांकि दृढ़ इच्छा शक्ति और अदम्य साहस के बलबूतें अमरीका जैसे सर्वशक्तिमान राष्ट्र ने आंतकी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होने दी।

आतंकवाद जिस प्रकार से एक अन्तरराष्ट्रीय घटना बनती जा रही है। उससे यह बात निश्चित तय दिखाई देती है कि आतंकवाद के विविध रूप व विविध प्रयोजन हो सकते हैं। अत: इस बात को भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आतंकवाद को जन्म देने वाले कारक भी विविध हो सकते है।

आतंकवाद के कारण

आतंकवादी जिस प्रकार की रणनीति तैयार करते हैं उसको यदि बारीकी से देखा जाए तो वह उन कारणों या कारकों के विरूद्ध रणनीति होती है जिसने कि आतंकवाद को जन्म दिया है। आतंकवाद के मुख्य कारण है :-
  1. अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना
  2. धार्मिक कट्टरतावाद
  3. मनोवैज्ञानिक कारण

अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना

समाज के अल्पसंख्यक वर्गों के प्रति सरकारी तन्त्र की भेदभावपूर्ण अथवा अनदेखी करने की नीति उनमें असुरक्षा की भावना उत्पन्न करती है। कई बार अल्पसंख्यक समुदाय के लोग यह महसूस करते हैं कि उनको जानबूझकर पिछड़ा अथवा सुविधाओं से वंचित रखा गया है। सरकार की अल्पसंख्यकों के प्रति नीति के बहुत से धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक कारण हो सकते हैं। परन्तु होता यह है कि यह असुरक्षा व भेदभाव की भावनाएँ उनमें निराशा के भाव पैदा करती है।

भारत में मुस्लिम वर्ग की अपेक्षा ईसाई वर्ग श्रीलंका में इसाईयों की (उप समूह वर्ग से, रोमन कैथोलिक्स सहित) अपेक्षा तमिल समूह व पाकिस्तान में बहुमत इस्लाम धर्म में ही शिया उप सम्प्रदाय या पख्तून बलूची, मुहाजिर समुदाय अधिक असंतुष्ट है। अत: धर्म व सम्प्रदाय के नाम पर आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। दूसरी यह प्रवृत्ति भी देखी जाती है कि असंतुष्ट वर्ग किन्हीं एक से ही कारणों से असन्तुष्ट हो ऐसा सदैव नहीं होता, कभी-कभी अपेक्षाकृत लाभान्वित समुदाय भी अपने को पीड़ित या उपेक्षित मान लेते हैं और उग्रवादी या हिंसात्मक तरीकों से अपने हिस्से की माँग करते हैं जैसे केन्द्र राज्य में आर्थिक सम्बन्धों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि हरित क्रांति योजनाओं में सर्वाधिक लाभान्वित राज्य पंजाब में ही 1980 के दशक में आतंकवाद पनपा। शोषण एवं अन्याय यह कहना असंगत नहीं होगा कि आतंकवाद की जड़े शोषण व अन्याय की प्रवृत्ति में निहित होती है। आतंकवाद कालान्तर में चाहे कोई रूप ले परन्तु मूलतः वह शोषण व अन्याय के विरूद्ध प्रतिक्रिया है।

भारत में पूर्वोत्तर क्षेत्र में आतंकवाद के पीछे आर्थिक शोषण की शिकायतें हैं। परन्तु इसके साथ-साथ वहाँ एक अन्य कारण केन्द्रीय शासन द्वारा नागा उग्रवादी तत्वों के प्रति सहानुभूति व किसी रूप में उदार सहायता का निष्क्रिय पड़ोसी समुदायों (जैसे खासी, बोड़ो, मिजो आदि)ध पर भी प्रभाव पड़ा व उन्होंने भी नागाओं के उदाहरण को अपनाते हुए राज्य से अधिक आर्थिक मदद स्वायत्तता हेतु आन्दोलन चलाए।

विशिष्ट ऐतिहासिक घटनाचक्र के दबाव में एक समुदाय या राजनीतिक सत्ता दूसरे गुटों के दमन के लिए यातना आदि हिंसक कदम उठाती है। ऐसे कार्यों के विरूद्ध पीड़ित समूह भी गुप्त रूप से संगठित हो आत्मरक्षा में प्रतिहिंसा का आश्रय लेते हैं। पश्चिमी एशिया में इस्लामी शक्तियों के प्रबल होते यहूदियों का उत्पीड़न व बाद में अमेरिका-ब्रिटेन के समर्थन में यहूदियों के सत्ता में आने पर फलिस्तीनी मुसलमानों का उत्पीड़न व उत्पन्न प्रतिहिंसा ऐसा ही एक उदाहरण है। वस्तुत: रूस एक अरब के मुसलमानों के विरूद्ध इजरायल की शत्रुता प्रारम्भ में हिटलर, स्टालिन और मध्यकालीन मुसलमान शासकों के ऐतिहासिक दबाव और अपमान के विरूद्ध प्रदर्शन और प्रतिक्रिया थी।

सभ्यताओं के मध्य टकराव 20वीं सदी के अन्तिम दशक के दौरान सैमुअल हटिंगटन ने ‘सभ्यताओं के टकराव’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसका अमेरिकी विदेश नीति पर गहन प्रभाव पड़ा और बाद में इसे इस्लाम और ईसाई सभ्यता के टकराव के रूप में माना।

हटिंगटन के अनुसार दुनिया में सभ्यताओं के मध्य की विभाजन रेखा खींच चुकी है और वही भविष्य की भू-राजनैतिक स्थितियों को निर्धारित करेगी। इस विभाजन का सार है कन्यूशियस को छोड़कर इस्लाम का सभी तरफ टकराव है चाहे वह यहूदीवाद हो ईसाईवाद हो, हिन्दुवाद सब इस्लाम के शत्रु हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सभ्यताओं का यह टकराव उभर कर सामने आ रहा है जिसने आतंकवाद को बढ़ावा दिया।

धार्मिक कट्टरता वाद

राजनीति में धर्म की भूमिका का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है कट्टरपंथी गुटों का राजनीतिक प्रभाव। इन कट्टरपंथी तत्वों ने धर्म की असुरक्षा, हनन व अपने धर्म के प्रति भेदभाव के नाम पर या जेहाद के नाम पर विभिन्न धर्मावलम्बियों को आपस में लड़ाने का काम किया। इनके द्वारा फैलाये धार्मिक उन्माद ने आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान व बांग्लादेश धार्मिक कट्टरवाद से सबसे अधिक ग्रसित हैं। कट्टरपंथियों की पाकिस्तान की राजनीति में भूमिका तथा उनके प्रभाव को सभी जानते हैं। वस्तुत: पाकिस्तान का कोई भी शासक चाहे वह लोकतांित्राक रूप से चुना हो या सैनिक तानाशाह हो, कट्टरपंथियों के वर्चस्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह कहना असंगत नहीं होगा कि कट्टरपंथियों के प्रभाव के कारण ही पाकिस्तान इस्लामिक आतंकवाद का गढ़ बन गया है।

आतंकवाद के मनोवैज्ञानिक कारण

आतंकवाद को एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा के रूप में भी देखा जा सकता है। आतंकवाद हिंसा या बदला लेने की प्रवृत्ति एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है। यह व्यक्ति के अन्दर स्वत: उपजती है और ज्यों-ज्यों कोई घटना घटित होती है तो यह भावना और प्रस्फ्रफुटित हो जाती है। इसके मूल में व्यक्ति का स्वाभिमान होता है जिसकी रक्षा अथवा जिसके प्रतिकार के बदले के रूप में व आतंकवादी प्रवृत्ति अपनाने लगता है। यदि विविध आतंकवादी प्रवृत्ति, घटनाओं एवं आतंकवादियों के चरित्रा का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि आतंकवादी मूल रूप से अन्याय का प्रतिकार करना चाहता है। यह अन्याय वास्तविक भी हो सकता है या काल्पनिक हो सकता है। 

आतंकवादी हिंसा के माध्यम से इस मनोदशा की तुष्टि करना चाहता है। इस्लामिक आतंकवादियों ने आतंकवाद को जेहाद का नाम दिया है। बहुत से आतंकवादी संगठन यह घोषणा करते हैं कि यदि वे आतंकवाद का रास्ता अपनायेंगे तो वे अल्लाह की सेवा करेंगे और उनके मरने के बाद उनको अल्लाह की सेवा में जीने का मौका मिलेगा। इसलिए इस धार्मिक उन्माद में डूबकर आतंकवादी हिंसक प्रवृत्ति में लिप्त होता चला जाता है। यह वस्तुत: एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है।

अन्त में यह कहा जा सकता है कि आतंकवाद किसी एक कारण से जन्म जरूर ले सकता है, किन्तु समस्या तब खड़ी होती है जब प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कई छोटे-बड़े कारण जुड़ जाते हैं। अगर एक स्थापित व्यवस्था में मनुष्य को मनुष्य की तरह रहने का अधिकार मिले, उसे अपने जीवन-यापन के लिए मूलभूत सुविधाएं प्राप्त हों और सबको सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर बराबर का दर्जा प्राप्त हो तो आतंकवाद का जड़ जमाना मुश्किल हो जाएगा। इसके साथ यह भी जरूरी है कि राजनैतिक जीवन में मंगलकारी आदर्श, पवित्रता, अनुशासन एवं कर्त्तव्यपरायणता मौजूद हो और पृथक्तावाद, व्यक्तिवाद, जातिवाद और अन्धी साम्प्रदायिकता का कोई स्थान न हो, तभी हमारा समाज आतंकवाद से असरदार तरीके से लड़ सकता है और इसके बढ़ते आकार को सीमित कर खत्म कर सकता है।

आतंकवाद के उपाय

  1. परिवार द्वारा बालक/ बालिकाओं का उचित लालन-पालन करना उनकों उपयुक्त वातावरण देना उन्हें प्यार देना, पढाई, लिखाई, आदि पर पर्याप्त ध्यान देना आदि। 
  2. परिवारिक सामंजस्य पति पत्नी के बीच उचित तालमेल न होना तलाक हो जाना, या परिवार द्वारा गलत कार्य करना इनसे भी बच्चे भी गलत हाथों में चले जाते हैं। अत: मॉं-बाप, परिवार का विशेष कत्र्तव्य हैं कि वे परिवारिक वातावरण आपसी सामंजस्य अच्छा बनाकर रखें।
  3. सामाजिक पर्यावरण-बच्चों को भेदभाव की शिक्षा न देकर सवधर्म सभी लोग एक हैं। जिससे उनके कोमल मानसिकता पर गलत प्रभाव न पडें। 4. मीडिया एवं देश की भी जिम्मेदारी हैं कि उन्हें उचित शिक्षा दी जाए। 
  4. पुलिस द्वारा नाबालिक बच्चों को पुलिस थाने की जगह बालसुधार गृह में रखा जाए। 
  5. सबसे महत्वपूर्ण हैं संस्कार यदि इनका रोपण सही हैं तो पौधा भी धूप छॉव आदि से बचकर भली प्रकार फली फूलित होगा
  6. बेरोजगारी और गरीबी इन्हें खत्म किया जाए -सरकार प्रयत्न करें यह दोनों चीजें व्यक्ति से कुछ भी करवा सकती हैं।
सन्दर्भ -
  1. M.L. Batham, Terrorism : Challanges and Conflict, p. 89
  2. M.L. Batham, Terrorism : Challanges and Conflict, p. 89
  3. “Classic terrorism is propaganda by deed and propaganda is impossible without the use of media”. 34

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