जापान में मेईजी पुनर्स्थापना एवं आधुनिकीकरण

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19 वीं शताब्दी के मध्य चरण में, जापान में विदेशियों के प्रवेश और उनके साथ जापान की सत्ता के केन्द्र शोगून द्वारा सन्धि करने से व्यापक प्रतिक्रिया हुई। इस काल में चीन और जापान दोनों देशों का एक ही प्रकार की स्थिति का सामना करना पड़ा था। दोनों देशों ने अपने-अपने तरीके से पश्चिमी साम्राज्य विस्तार के विरूद्ध प्रतिक्रिया की। चीन ने पश्चिमी साम्राज्यवाद को रोकने के लिए युद्ध का सहारा लिया और पराजित हुआ। जबकि जापान ने तर्कसंगत तरीके से प्राचीन और वर्तमान में सामजस्य स्थापित करते हुए भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिये जापान को तैयार करने का निश्चय किया और जापान अपने लक्ष्य में विजयी हुआ।

मेईजी पुर्नस्थापना की पृष्ठभूमि और कारण

जापान के विभिन्न सत्ता केन्दा्रें को समझ लें तो मेईजी पुर्नस्थापना को समझना अधिक सरल हो जाएगा। बारहवीं सदी में जापान में शोगून व्यवस्था का प्रारंभ हुआ था। जापान का सम्राट क्योटो में एकान्तवास करता था। उसका प्रशासनिक कार्यो में कोई भूमिका नहीं थी। वह पवित्र, देवतुल्य एवं पूज्यनीय मात्र था। सम्राट शक्तिशाली सामन्तों को शोगून की उपाधि प्रदान करता था जिसका अभिप्राय ‘बर्बरों का दमन करने वाला’ सर्वोच्च सैनिक अधिकारी होता था। सबसे अधिक शक्तिशाली ‘शोगून’ परिवार को शासन सत्ता सौंपी जाती थी और उसकी राजधानी येडो में थी। उसके अधीन दाइम्यों (सामन्त) होते थे, उनके अधीन समुराई वर्ग होता था जो सैनिक अधिकारी होते थे और राष्ट्र पर मर मिटने के लिये सदैव तैयार रहते थे। इनके अतिरिक्त सामान्य जनता का राज्य अथवा प्रशासन कार्य में कोई भूमिका नहीं थी। 1603 ई. से तोकुगावा वंश का शोगून व्यवस्था पर वर्चस्व चला आ रहा था।

सम्राट राष्ट्र की एकता का प्रतीक था और जनता की श्रद्धा और भक्ति का केन्द्र था। राज्य के प्रशासनिक कार्यों की समस्त जिम्मेदारी शोगून पर थी। वह युद्ध करने, सन्धि करने, अधिकारियों की नियुक्ति करने, कर लगाने, वसूल करने, दण्ड देने आदि का कार्य उसी के द्वारा सम्पन्न होता था। सम्राट से नाममात्र के लिये स्वीकृति प्राप्त कर ली जाती थी। इस द्वैध शासन -प्रणाली में अनेक दुर्बलताएं आ गई थी जिनका विरोध अन्य शोगून, सामन्त तथा सामान्य जन कर रहे थे।

जापान में पाश्चात्य प्रवेश से उत्पन्न परिस्थिति- 

अमेरिका के साथ सन्धि करके जापान ने पाश्चात्य देशों के लिए अपने द्वार तो खोल दिए थे, मगर समस्या यह थी कि इन विदेशी शक्तियों के साथ जापान का व्यवहार किस प्रकार का हो। जापान के पुरातनपंथी और रूढ़िवादी विदेशियों के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध रखने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन उनकी संख्या बहुत सीमित थी इसलिए उनकी आवाज पर ध्यान नहीं दिया गया। जापान में एक ऐसा वर्ग भी था जो समझौतावादी प्रवृत्ति का था और ‘प्राच्य नैतिकता और पाश्चात्य विज्ञान’ के समन्वय पर जोर दे रहा था। इस वर्ग का कहना था कि पश्चिम का मुकाबला करने के लिए, परिवर्तनों के साथ पाश्चात्य भाषा सीखनी चाहिए, उनके ज्ञान-विज्ञान और तकनीक को अपनाना चाहिए। यह वर्ग पश्चिमी विज्ञान और युद्ध कला को अपनाये जाने का प्रबल समर्थक था।

जापान का पूर्ण पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण पर जोर देने वाला वर्ग अधिक सशक्त था। इस वर्ग का कहना था कि जापान में अपने-आपको समय के अनुकूल ढालने और पाश्चात्य देशों के बराबर आ जाने के गुण हैं। वे विरोधाभासी स्थिति से निकलकर एक तरफा खेल खेलना चाहते थे। अन्त में, इसी वर्ग की विचारधारा के पक्ष में जापान होता गया जिसमें शोगून व्यवस्था के अन्त और सम्राट की पुर्नस्थापना के बीज छिपे थे।

शोगून शासन- व्यवस्था के प्रति असन्तोष- 

जापान में विदेशियों के आगमन के समय, अनेक प्रकार का असन्तोष व्याप्त था। तोकुगावा ( प्रमुख शोगून परिवार) से अन्य सामन्त नाराज थे। शोगून उनको अपने अधीन रखने के लिए षड़यन्त्र रचता रहता था। शोगून की इजाजत के बगैर अन्य सामन्तो को किले बनाने, उनकी मरम्मत करने, लड़ाकू जहाज बनाने, सिक्का ढालने आदि के अधिकार नहीं थे। उन्हें कुछ समय शोगून की राजधानी येदों में रहना पड़ता था अन्यथा अपने बीबी-बच्चों को बन्धक रूप में वहीं छोड़ना पड़ता था। वर्तमान परिस्थितियों में सभी सामन्त शोगून के विरूद्ध संगठित होने लगे।

राज्य के उच्च एवं महत्वपूर्ण पदों पर भी तोकुगावा परिवार के लोगो को ही नियुक्त किया जाता था। प्रमुख सामन्त परिवार चोशू, सातसूमा और तोसा प्रमुख शोगून की इस व्यवस्था से खासे नाराज थे। प्रमुख शोगून की सामन्त विरोधी नीति के कारण सामन्तों को अपने खर्चो में कटोती करनी पड़ी, उन्हें अपने सैनिकों की संख्या कम करनी पड़ी, जिससे सामुराई वर्ग में भी असन्तोष फैल गया। वे अपनी इस स्थिति के लिए तोकुगावा परिवार को जिम्मेदार मान रहे थे।

19 वीं शताब्दी में व्यापारिक उन्नति के कारण समाज में एक उन्नत धनी वर्ग का उदय हुआ। यह वर्ग पर्याप्त रूप में धन सम्पन्न था। सामन्त अपनी आवश्यकताओं के लिए इनसे कर्ज लेते थे तथापि समाज में व्यापारियों का स्थान सामन्तों से निम्न था। परिवर्तित परिस्थितियों में व्यापारी वर्ग सामाजिक परिवर्तन के लिए जोर लगा रहा था।

सामन्ती व्यवस्था का समस्त बोझ किसानों के कन्धों पर था। वे करो के भार से दबे जा रहे थे, उनमें भी राजनीतिक- सामाजिक जागरण आ रहा था और वे सामन्त एवं शोगून व्यवस्था के स्थान पर सम्राट की व्यवस्था के पक्षधर थे।

जापान में सैनिक कार्य केवल समुराई वर्ग के लोग ही कर सकते थे, सामान्य जन को सैनिक कार्यों से दूर रखा जाता था। समाज का प्रत्येक वर्ग किसी न किसी कारण से शोगून व्यवस्था से नाराज था और विदेशियों के आगमन ने उनके असन्तोष में पर्याप्त मात्रा में वृद्धि कर दी।

जापानी साहित्य, शिक्षा एवं अतीत का चिंतन-

17 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में तोकुगावा परिवार ने जापान को संगठित किया और अन्य छोटे सामन्तों की शक्ति को कम करके शान्ति स्थापित की। शान्ति काल में जापान के प्राचीन साहित्य एवं शिक्षा पर जोर दिया गया। चिन्तन की नवीन धारा विकसित हुई। राज्य की ओर से पुस्तकों के सग्रंह के कार्य को प्रोत्साहित किया गया, इतिहासकारों ने राष्ट्र के अतीत का विस्तृत अध्ययन किया। धर्म का पुनरूद्वार किया गया, जिसके फलस्वरूप जापान के अधिपति सम्राट को और अधिक आदर प्राप्त होने लगा। इतिहासकारों की अधिक महत्वपूर्ण खोज यह थी कि राष्ट्र का न्यायसम्मत एवं उचित शासक सम्राट है और शोगून-तन्त अपेक्षाकृत बाद की चीज है। विद्वानों के बीच यह विचार जोर पकड़ने लगा कि शोगून को अपने पद से त्याग पत्र दे देना चािहए और सम्राट को उसके वास्तविक अधिकार मिलने चाहिए

ताकेगावा शोगून का विरोध- 

1853 ई में शोगून द्वारा अमेरिका एवं अन्य राष्ट्रों के साथ सन्धि का विरोध अन्य प्रतिद्विन्द्व सामन्तों ने किया। जापान के शक्तिशाली सामन्त परिवार, जो तोकुगावा शोगून से नाराज थे, तोकूगावा शोगून को सत्ता से हटाना चाहते थे। जापान में यूरोपीय राष्ट्रों के प्रवेश से इन विरोधी सामन्तों को तोकुगावा शोगून को अपदस्त करने का सुनहरा अवसर प्राप्त हो गया। वे विदेश विरोधी लहर को वे हवा देने लगे। विदेश विरोधी आन्दोलन राजनीतिक आन्दोलन में परिवर्तित हो गया जिसका उद्देश्य शोगून की सत्ता को समाप्त करके सम्राट के अधिकारों को बहाल करना था।

सामन्तों द्वारा सम्राट की बहाली के लिए आवाज उठाना-

तोकुगावा शोगून द्वारा छोटे- बड़े सभी सामन्तों की शक्ति और अधिकारों को संकुचित कर दिया गया था। अब जबकि विदेशी प्रभाव जापान में बड़ा तो इन सामन्तों का कहना था कि तोकुगावा ने विदेशों के साथ सन्धि की है इसलिए शोगून व्यवस्था समाप्त की जानी चाहिए। शोगून की कमजोरी और अदूरदर्शिता के कारण जापान का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। ये सामन्त शोगून से प्रत्यक्ष तो टक्कर ले नहीं सकते थे। इसलिए उन्होंने ‘बर्बरों को निकालो, शोगून को हटाओ तथा सम्राट की शक्ति में वृद्धि करो का नारा लगाया, इस प्रकार 1854 ई. के बाद से शोगून व्यवस्था की समाप्ति की मांग जोर पकड़ने लगी।

विदेशियों के विरूद्ध भावना- 

जापान में इस समय विदेशियों के विरूद्ध भावनाएँं तेजी से बढ़ रहीं थी। जापान के लोग विदेशियों को बाहर निकालों के नारे लगा रहे थे। सामन्त तो आमजन की भावनाओं को भड़का ही रहे थे, स्वयं सम्राट कोमेई भी विदेशियों के विरूद्ध हो गया। चोशू के सामनतों ने सम्राट से मुलाकात की और देश की परिस्थितियों पर वार्ता की। तत्पश्चात 25 जून 1863 ई. को सम्राट ने शोगून को आदेश दिया कि वह विदेशियों को देश से बाहर निकाले। शोगून, वर्तमान परिस्थितियों में इस कार्य को असम्भव मान कर चल रहा था। तब, चोशू के सामन्तो ने विदेशियों को निकालने का कार्य अपने हाथ में ले लिया। फलत: एक अमेरिकी जहाज पर गोलीबारी करके, उसे नष्ट कर दिया गया। अमेरिकी युद्धपोत ने भी जापान के दो युद्धपोत नष्ट कर दिए।

एक अन्य घटना ने भी जापान विदेशी संर्घर्ष में वृद्धि की। सातसूमा के सामन्त का एक जुलूस निकला रहा था। जापान में नियम था कि जब किसी सामन्त का जुलूस निकले तो लोग रास्ते से हट जाएँ और सम्मान प्रकट करें। रिचर्डसन नामक अग्रेंज अपने तीन घुड़सवारों के साथ उसी रास्ते से निकल रहा था। उसने सातसूमा के सामन्त के लिए न तो रास्ता छोड़ा और न ही उसके प्रति सम्मान प्रकट किया जिसके कारण सामन्त के साथ चल रहे सामूराई क्रोद्धिात हो उठे और रिचर्डसन की हत्या कर दी। ब्रिटिश सरकार ने जापान सरकार तथा सातसूमा के सामन्त को हर्जाना देने के लिए कहा। सात अग्रेजी जहाज हर्जाना वसूल करने के लिए कागोशीमा पहुँचे और गोलीबारी करके एक जहाज डूबों दिया। इस घटना से जापान में विदेश विरोधी घृणा और तीव्र हो गई जिसका अन्त सम्राट की बहाली से ही सम्भव था।

चोशू के सामन्त और शोगून में संघर्ष- 

चोशू और सातसूमा के सामन्त विदेशियों से संघर्ष कर चुके थे जिसमें नुकसान चोशू और सातसूमा सामन्तों का ही हुआ था। उन्होंने विदेशियों के विरूद्ध शक्ति संगठित करने का निश्चय किया उन्होंने सामूराई तथा सामान्य जनता को मिली जुली स्थाई सेनाएं संगठित कर लीं। सामान्य जनता को सैनिक के रूप में पहली बार स्थान मिला था इससे सामान्य जनता ने सामन्तों के साथ बढ़ चढ़कर भाग लिया। उधर चोशू और सातसूमा की कार्यवाही से नाराज शोगून ने चोशू सामन्तों के दमन के लिए एक विशाल सेना भेज दी। इससे पूर्व की चोशू सामन्त सेना को पूर्णतया समाप्त कर दिया जाता सातसूमा ने हस्तक्षेप किया और चोशू सामन्त को नष्ट होने से बचा लिया। उधर चोशू सामन्तों के सैनिकों ने हथियार डालने से इन्कार कर दिया और जनवरी-मार्च 1865 में क्रान्ति का नारा बुलन्द कर दिया, सरकारी दफ्तरों और राजधानी को अपने अधिकार में ले लिया। 7 मार्च 1866 ई. को चोशू और सातसूमा सामन्तों के मध्य एक गुप्त समझौता हुआ जिसमें शोगून व्यवस्था को समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

शोगून का अन्त और मेईजी की पुर्नस्थापना- 

जनवरी 1867 ई. में तोकुगावा केईकी नया शोगून बना। वह प्रगतिशील विचारों का था और संघर्ष को टाल कर मिलजुलकर कार्य करना चाहता था। मगर चोशू, सातसूमा, तोशा और हिजेन सामन्त, परिवार किसी भी मूल्य पर शोगून को बर्दाश्त नहीं करना चाहते थे। उधर फरवरी 1867 में सम्राट कोमेई का निधन हो गया। नया सम्राट मूतसुहितो गद्दी पर बैठा। जिसकी उम्र लगभग 15 वर्ष थी। 3 जनवरी 1868 को चोशू, सातसूमा तथा उनके सहयोगी सामन्तों की फौजों ने महल को अपने अधिकार में ले लिया और सम्राट की पुर्नस्थापना की घोषणा कर दी। सम्राट द्वारा ‘मेईजी’ (शानदार) उपनाम धारण किया गया। इस घटना को मेईजी ईशीन’ (मेईजी की पुर्नस्थापना) कहा गया।

शोगून का अन्त- 

तोकुगावा केईकी ने इस परिवतर्न को स्वीकार कर लिया और अपना त्याग पत्र सम्राट के पास भेज दिया, यद्यपि अन्य तोकुगावा सामन्त नवीन व्यवस्था को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे मगर उनकी शक्ति को पूरी तरह कुचल दिया गया। और 12 वीं शताब्दी से चली आ रही शोगून व्यवस्था का अन्त 1868 ई. में हुआ जबकि सम्राट (मेईजी) की पुर्नस्थापना हुई।

नवीन शपथ पत्र

शोगून व्यवस्था के अन्त एवं सम्राट की पुर्नस्थापना 6 अप्रेल 1868 को एक शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें कहा गया था-
  1. साम्राज्य के संगठन एवं उसको सुदृढ़ बनाने के लिए किसी भी देश के ज्ञान- विज्ञान, बुद्धि, विवेक को स्वीकार किया जाएगा।
  2. जनता के सभी वर्गो को चाहे वह किसी भी स्थिति के हों, राष्ट्र की प्रगति में भागीदार बनाया जाएगा।
  3. सभी को स्वेच्छा एवं स्वतन्त्रता से अपने व्यवसाय अपनाने का अधिकार होगा।
  4. निरर्थक रीति रिवाज और रूढ़ियों को समाप्त किया जाएगा। सभी के साथ समान न्याय एवं निष्पक्षता का व्यवहार किया जाएगा।
  5. एक परामर्श दात्री नियुक्त की जाएगी। सभी निर्णय परामर्श से ही किए जाएगे। अप्रेल 1868 ई. में सभी सामन्तों ने इस पर अपनी स्वीकृति की मोहरें लगा दी।

मेईजी. पुर्नस्थापना का महत्व एवं परिणाम

जापान के इतिहास में मेईजी पुन: स्थापना का महत्व व्यापक अर्थो में लिया जाता है। लगभग 650 वर्षो से चली आ रही शोगून व्यवस्था का अन्त करके सम्राट के पद की पुर्नस्थापना आसान कार्य नहीं था। किन्तु यह सत्य है कि एक क्रान्ति हुई और वह भी रक्तहीन, जिसमें सामन्तों ने अपने अधिकार छोड़े और सम्राट के प्रति अपनी सद्भावना प्रकट की। 1789 की फ्रांस की क्रान्ति के बाद सामन्तों और कुलीनों ने अपने अधिकार आमजन के पक्ष में छोड़े थे। मगर यहाँ सम्राट की पुर्नस्थापना के लिए सामन्त एकजुट हुए थे।

सम्राट की पुर्नस्थापना से सामन्तवादी व्यवस्था का अन्त हुआ। 650 वर्षो से एकान्तवास में रहा सम्राट का पद जनता के सम्मुख जीवन्त हो उठा। सामान्य जन ने अपने सम्राट के प्रति भक्ति भावना एवं आस्था प्रकट की।
सामन्ती सोच के पतन के साथ ही नवीन सम्राट, युवा सम्राट, युवा नेतृत्व और नवीन सोच, जापान के लिए एक नये युग का सन्देश लेकर आई।

नये ‘‘सम्राट मूतसुहीतो (मेईजी) ने क्योता के स्थान पर येदों को राजधानी बनाया जिसका नया नाम टोकियो रखा गया। यहाँ स्थित शोगून का दुर्ग सम्राट का महल बन गया। नयी राजधानी भौगोलिक दृष्टि से देश के केन्द्र में थी। सम्राट द्वारा केन्द्र में रहने से उसका एकान्तिक, पृथक और अधिकार विहीन जीवन समाप्त हुआ। अब वह आमजन की पहुँच में था। मेईजी पुन: स्थापना के कारण जापान साम्राज्यपाद के चँगुल में फँसने से बच गया।
यदि सामन्त रहते तो वे विदेशियों के आगे घुटने टेकने को विवश हो जाते मगर अब सभी सामन्त विदेशी विरोधी भावना को लेकर समा्रट के साथ थे, जापान में अभूतपूर्व राष्ट्रीयता का उदय हुआ और देश साम्राज्यवादियों के हाथों में जाने से बच गया।

मेईजी पुर्नस्थापना के कारण और जापान से विदेशी छाप हटाने के लिए आमजन संगठित हुए। देश के सैन्यबल को पुन राष्ट्रीय स्तर पर संगठित किया गया। आर्थिक क्षेत्र में औधोगिकरण के तीव्र विकास को अपनाया गया। शासन-प्रशासन को व्यवस्थित किया गया। ससंद की स्थापना की गई।

पुर्नस्थापना ने जापान की चहुँमुखी विकास की प्रगति का मार्ग प्रशास्त कर दिया। विदेशियों के ज्ञान- विज्ञान को अपनाकर उसका उपयोग जापानी संस्कृति के अनुरूप किया गया। पश्चिमी देशों के समकक्ष पहुँचने के लिए पाश्चात्य ढंग के कल-कारखाने, उद्योग, शिक्षा, उच्चशिक्षा, सेना आदि में सुधार किए गए।

विनाके ने लिखा, ‘‘पुनर्स्थापना आन्दाले न की सफलता ने र्परम्पराओ  एवं सस्थाओं को स्थापित किया तथा यूरोपिय नवीन विचारों के आधार पर देश का पुन: संगठन किया गया।’’

सामन्तवादी व्यवस्था में आम जनता की कोई भूमिका नहीं थी मगर सम्राट की पुर्नस्थापना ने आम नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए।

1869ई. में दक्षिण-पश्चिम के चार बड़े दाइम्यों (सामन्तों)ने स्थानीय प्रशासन को सम्राट के हाथों में सौंप दिया। तीन सौ के लगभग सामन्तों में से अधिकांश ने स्वेच्छा से अपनी जागीरें सम्राट को सौंप दी। इस प्रकार, पश्चिमी देशों के सम्पर्क ने एक बार फिर देश भक्ति की उस भावना को उद्बोधित किया जिसका निर्माण तोकुगावा प्रशासन के अन्तर्गत शताब्दियों तक स्थिर एकता तथा बूशीदों द्वारा विकसित राज्य निष्ठा ने किया था। राष्ट्र पे्रम की इस भावना के कारण ही सम्राट के अधीन एक सुसंगन्ति प्रशासन सम्भव हुआ। मेईजी पुर्नस्थापना के कारण जापान के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। नवीन जापान का जन्म हुआ जिसने विकास के पथ पर तेजी से कदम बढ़ाए। द्रुतगति से औद्योगिकीकरण हुआ एवं सैन्यवाल में पर्याप्त वृद्धि की गई जिसके परिणामस्वरूप जापान शीघ्र ही साम्राज्यवाद की राह पर चल निकला।

जापान का आधुनिकीकरण- परिणाम एवं महत्व

जापान का आधुनिकीकरण- 

जापान में विदेशी उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद के विरूद्ध हुई प्रतिक्रिया के रूप में शोगून व्यवस्था की समाप्ति तथा नवीन सम्राट के रूप में मेईजी पुन: स्थापना तो हो चुकी थी, परन्तु विदेशी हस्तक्षेप से प्रतिरक्षा हेतु जापान को अब नव निर्माण की आवश्यकता थी। पश्चिमी ज्ञान एवं विज्ञान की आधुनिकतम जानकारी प्राप्त कर जापान का पुनर्गठन आधुनिक राष्ट्र के रूप में किया जाना था। जापान को प्राचीन परम्पराओं एवं प्राचीन गौरव के बन्धन से बाहर निकल साम्राज्यवादी विश्व का सामना करने के लिए तैयार होना था ताकि शोगून व्यवस्था की समाप्ति, और मेईजी पुर्नस्थापना के औचित्य को सिद्ध किया जा सके। जापान को आधुनिकीकरण के प्रत्येक क्षेत्र में ठोस कदम उठाने थे। मेईजी पुर्नस्थापना के बाद जापान ने वही किया जिसका वह हकदार था। उसने पीछे मुड़कर देखना बन्द कर दिया। शोगून की समाप्ति और मेईजी की पुर्नस्थापना को जापान ने अतीत की धरोहर नहीं बनने दिया वरन उससे प्रेरणा ग्रहण कर जापान को विकास और आधुनिकीकरण के ऐसे रास्ते पर ला खड़ा किया जहाँ जापान को आधुनिक जापान की संज्ञा मिली। जापान के लोग पाश्चात्य देशों के सम्मुख चीन का पतन देख चुके थे, वे इस बात को समझ चुके थे कि यदि विदेशी साम्राज्यवाद का सामना करना है तो प्राचीन परम्पराओं से बाहर निकल कर पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और सैन्य-संगठन को अपनाना ही होगा। इसीलिए जापान ने मेईजी पुर्नस्थापना के फौरन बाद आधुनिकीकरण की राह पकड़ ली। जापान में आधुनिकीकरण के लिए प्रबल एवं ठोस आन्दोलन चला जिसने देश के जीवन में अमूल परिवर्तन किए जो जापान के आधुनिकीकरण के लिए उत्तरदायी थे। 1868ई. की मेईजी पुर्नस्थापना के बाद जापान के आधुनिकीकरण के लिए जो प्रयास किए गए उनका उल्लेख इस प्रकार है।

जापान से सामन्तवादी व्यवस्था का उन्मूलन-

 जापान से शोगून व्यवस्था की समाप्ति और मेईजी पुर्नस्थापना के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि देश में एक व्यवस्थित, केन्द्रिय, और शक्तिशाली सरकार एवं प्रशासन की स्थापना कैसे की जाए ताकि सम्पूर्ण जापान आन्तरिक भेदभावों को भूलकर एक केन्द्रीय शासन के अधीन खड़ा हो सके।

जापान से शोगून व्यवस्था का अन्त हुआ था किन्तु सामन्तवादी व्यवस्था अभी भी विद्यमान थी। सामन्ती परिवार सम्पूर्ण जापानी समाज में फैले थे और अपने-अपने क्षेत्र में शासन की समस्त व्यवस्था देखते थे। केन्द्रीय शासन की मजबूती के लिए सामन्तवादी ढाँचे का ढहना आवश्यक था। लगता नहीं था कि शोगून व्यवस्था की समाप्ति के साथ सामन्तवादी व्यवस्थायें भी समाप्त हो जाएगी। परन्तु, मेईजी पुर्नस्थापना का प्रभाव सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र पर इस तरह छाया हुआ था कि सामन्तों ने राष्ट्रीयता की भावना को स्वीकार कर अपने अधिकारों को छोड़ने का निश्चय कर लिया।

राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर सातसूमा, चोशू, तोसा और हीजन सामन्तों ने 1868 ईमें एक आन्दोलन द्वारा अपनी रियासतें सम्राट को अर्पित कर दीं और अपनी समस्त सुविधाएं छोड़ना स्वीकार किया। कुछ अन्य सामन्तों ने भी उनका अनुकरण किया। शेष को सम्राट के आदेश द्वारा समाप्त कर दिया गया। रियासतें सम्राट के अधीन हो गई थी किन्तु जागीरों पर सामन्तों का अधिकार बना हुआ था। रियासतों को जिले(हान) का नाम देकर वहाँ के सामन्त ( डैम्यो) को ही वहाँ का प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। अब वह केन्द्र सरकार के अधीन जिले का प्रशासक था। जिले की आय का दसवां भाग डैम्यों का वेतन निर्धारित किया गया। वर्ष में तीन माह उन्हें राजधानी टोक्यों में रहना होगा, ऐसा निश्चित किया गया।

अगस्त 1871 ई. में जापान सरकार द्वारा सामन्त व्यवस्था की पूर्णरूप से समाप्ति की घोषणा कर दी गई। समस्त देश को तीन शहरी प्रदेशों (फू) ओसाका, क्योतो और टोकियों तथा 72 अन्य प्रदेशों (केन) में विभक्त किया गया। शासन की इकाईयाँ प्रदेश (केन), जिला (गून), शहर (फू), कस्बा (माची) और गाँव (मूरा) में विभक्त थीं। समस्त क्षेत्रों में केन्द्रीय अधिकारी नियुक्त किए गए थे।

डेम्याँ और सामूराइयों के वेतन एवं भत्तों में धीरे-धीरे कटौती की जाती रही। 1883 ईमें तब डैम्यों और यामूराइयों के वेतन, जामदाद आदि समाप्त हो गए और वे आमजन में तब्दील हो गए।

इस प्रकार, सदियों से चली आ रही सामन्तवादी सामाजिक व्यवस्था समाप्त हो गई। और सम्पूर्ण देश एकता के सूत्र में बँध गया। यह एक ऐसी सामाजिक, राजनीतिक क्रान्ति थी जो रक्तहीन थी मगर गौरव से परिपूर्ण थीें।

जापान में सैनिक सुधार - 

अभी तक जापान की सैनिक, व्यवस्था मध्यकालीन सामन्तीय व्यवस्था के आधार पर गठित थी। अब जबकि सामन्तवादी ढाँचा जापान से समाप्त किया जा चुका था, सेना के गठन में सुधार की आवश्यकता को गम्भीरता से अनुभव किया गया। अभी तक सेना के गठन में सामूराई वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। सामूराई वर्ग के लोग ही सामन्तों के अधीन सेना में नियुक्त किए जाते थे। जन साधारण वर्ग सैनिक सेवा के लिए अयोग्य माना गया था। मेईजी पुर्नस्थापना ने सेना में सम्मिलित होने के सामूराई वर्ग के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। जापान के सभी वर्गो के लिए सेना में भर्ती के लिए द्वार खोल दिए गए। जापान का कोई भी व्यक्ति सैनिक कार्य के लिए सेना में भर्ती हो सकता था। जापानी सेना का स्वरूप राष्ट्रीय हो गया। पुराना सामन्ती स्वरूप समाप्त हो गया।

फ्रेंच सैन्य तकनीक और फिर जर्मन सेैन्य तकनीक द्वारा सेना में सुधार किए गए। सैनिक अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए फ्राँसीसी एवं जर्मन सैन्य अधिकारियों को नियुक्त किया गया। राष्ट्रीय सेना को तीन भागों में गठित किया गया। नियमित सेना, रिजर्व सेना और राष्ट्रीय सेना। 1871 ई. में ‘इम्पीरियल गार्ड’ नामक सैनिक दल गठित किया गया। 1873 ईमें राजाज्ञा द्वारा सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी गई। 21 वर्ष के प्रत्येक स्वस्थ जापानी युवक को सैनिक सेवा के रूप में प्रथम तीन वर्ष नियमित सेना में, आगामी चार वर्ष रिजर्व सेना में और 40 वर्ष की आयु तक राष्ट्रीय सेना में रहना, अनिवार्य कर दिया गया।

जल सेना को भी आधुनिक ढंग से प्रशिक्षित किया गया। इसके लिए डच सैनिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया। कुछ अधिकारियों को गहन प्रशिक्षण के लिए इंग्लैण्ड और अमेरिका भी भेजा गया। 1869ई. में जल सेना के प्रशिक्षण के लिए टोिक्यों में एक प्रशिक्षण स्कूल खोला गया। 1872 ई. में सेना विभाग स्थापित किया गया। 1875 ई. में जापान ने प्रथम युद्धपोत तैयार कर लिया। जापान के राष्ट्रीय चरित्र पर आधुनिक सैन्यकरण का गहन प्रभाव हुआ और वहाँ सैनिकवाद की उत्पत्ति हुई।

सामन्तीय चिन्हों की समाप्ति-

 सामन्तवादी व्यवस्था की समाप्ति के बाद भी अनके ऐसी चीजे समाज में उपस्थित थी जो सामान्य जन को सामन्तों से अलग करती थीं। जापानी सरकार ने इस प्रकार की सभी बातों को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया। 1869 ई. में सरकारी और व्यावसायिक नौकरियों पर से वर्ग विषयक पाबन्दियाँ हटा ली गईं। 1880 ई. में सामान्य जनता को भी पारिवारिक नाम धारण करने के अधिकार मिल गए। 1871 ई. में जापान के निम्न वर्ग को भी पूर्ण स्वतन्त्रता दे दी गई। 1876 ई. में सामन्त एवं सामूराई वर्ग के लोगों को तलवार रखने की मिली सुविधा समाप्त कर दी गई। इससे सामन्ती प्रतिष्ठा और पार्थक्य का दिखावटी प्रदर्शन और चिन्ह समाप्त हो गए। जापान का हर व्यक्ति अब समान था।

आधुनिक नौकरशाही की स्थापना- 

सामन्तों द्वारा सचं ालित स्थानीय प्रशासन के स्थान पर सुगठित नौकरशाही की स्थापना की गई। टोकियों स्थित अधिकारियों द्वारा योग्यता के आधार पर नियुक्तियाँ दी जाती थीं। इनके हाथ में सम्पूर्ण देश का स्थानीय एवं केन्द्रीय प्रशासन रहता था। सम्राट के अपने प्रतिनिधियों द्वारा इस नौकरशाही व्यवस्था के माध्यम से प्रजा का छोटे से छोटा व्यक्ति भी संरक्षित और शासित होता था।

आरम्भ में नौकरशाही व्यवस्था में सामूराई वर्ग के लोगों को अधिक नियुक्त किया गया क्योंकि ये ही प्रशासन संचालन से भलीभँाति परिचित थे। लेकिन बाद में प्रशासनिक सेवा के पदों पर प्रतियोगी परीक्षाआं में उत्तीर्ण व्यक्तियों को नियुक्त किया जाने लगा। प्रतियोगी परीक्षाओं में समाज का प्रत्येक व्यक्ति बिना भेदभाव के सम्मिलित हो सकता था। कृषि के क्षेत्रों में सुधार- कृषि के क्षेत्रों में सुधार की दिशा में सरकार द्वारा पहल की गई। सामन्तवादी व्यवस्था में कृषकों की दशा अत्यधिक शोचनीय थी। मेईजी सरकार द्वारा कृषकों को ही उस भूमि का स्वामी मान लिया गया जिस पर वे खेती कार्य करते चले आ रहे थे। बेगारी-प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया। कृषि कर की अदायगी नगदी द्वारा की जाने लगी। कृषि में आधुनिक तकनीक को अपनाया जाने लगा।

शासन की आर्थिक कठिनाईयों के कारण कृषकों को बहुत अधिक सुविधाएँ नहीं मिल सकीं। जमीन की कीमत का 3 प्रतिशत लगान बहुत अधिक था, किसान इसको चुकाने में असमर्थ थे जिसके कारण सरकार को विद्रोहों का सामना भी करना पड़ा। कालान्तर में 3 प्रतिशत के स्थान पर लगान की दर प्रतिशत कर दी गई। पैदावार बढ़ाने के लिए सरकारी सहायता दी गइर्ं। खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाने लगी। मगर किसानों की स्थिति में परिवर्तन नहीं आया। लाचार होकर उन्हें अपनी भूमियाँ बेचनी पड़ीें जिनको पुराने सामन्तों ने खरीद लिया, किसान मजदूर होकर रह गए। मेईजी काल में किसान की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया।

औद्योगिक एवं वाणिज्यिक विकास- 

मेईजी काल के सुधारों में सबसे अधिक परिवर्तन औद्योगिक, बैकिंग, वाणिज्य, परिवहन, आदि क्षेत्रों में देखने को मिलता है। जापान की सरकार ने अपना समस्त ध्यान औद्योगिक विकास पर दिया।

जापानी सरकार ने पाश्चात्य जगत का सामना करने के लिए अपने उद्योगों पर अत्यधिक ध्यान देना आवश्यक समझा। नवीन कारखाने खोले गए। यूरोप तथा अमेरिका से तकनीक, इंजीनियर तथा मशीनें आयात की गईं। जापान शीघ्र ही औद्योगिक क्रान्ति की तरफ अग्रसर हो गया। कपड़ा, रेशम, लोहे का सामान, प्रचुर मात्रा में बनाया जाने लगा। लोहे एवं इस्पात के व्यवसाय को उन्नत किया गया। खदानों से खनिज निकाले गए। युद्धोपयोगी वस्तुओं के उत्पादन पर भी अधिक जोर दिया गया। 1890 ई. तक जापान के अधिकांश कल- कारखाने भाप की शक्ति से काम करने लगे।

सामूराई और पुराने कुलीन सामन्तों को उद्योग-व्यवसाय में धन लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। शीघ्र ही जापान वस्त्र उद्योग में प्रमुख देश बन गया। 1881 ई. में सरकार ने लोहे की खदानों मे पूँजी निवेश तथा सोने चाँदी की खदानों में 90 प्रतिशत व्यापार अपने संरक्षण में ले लिया। सीमेन्ट, काँच और सफेद पक्की ईंट बनाने के कारखाने लगाए गए। दियासलाई और कागज बनाने के उद्योग निजी क्षेत्रों में खोले गए। मेईजी काल में पुरानी दस्तकारी का स्थान औद्योगिक क्रान्ति द्वारा विकसित नए तरीकों ने ले लिया।

सरकार ने टोकियो और ओसाका में तोप, बन्दूक, गोला और बारूद बनाने के कारखाने लगवाए। ओसाका कारखाने में लगभग 1100 मजदूर कार्य करते थे। 1869 ई. में हीजन में आधुनिक ढंग की कोयले की खदान चालू की गई। 1873 ई. में खान विभाग की स्थापना हुई जिसमें विदेशी रखे गए। 1880 ई. तक कोयले की 8 और 1881 ई. में सरकार ने एक और लोहे की खान खोली जिससे कि उद्योगों को पर्याप्त मात्रा में लेाहा और कोयला प्राप्त हो सके। उद्योगों के साथ-साथ वाणिज्य, बैंक एवं परिवहन के क्षेत्र में भी आवश्यक सुधार किए गए। जापान में काफी प्रयासों के बाद वाणिज्य अपने विकास की पूर्ण पराकाष्ठा पर पहुँचा। 1881 ई. तक व्यापार का सन्तुलन जापान के प्रतिकूल था और उसकी पर्याप्त मुद्रा देश से बाहर निकल जाती थी। 1887 ई. के बाद सरकार के सक्रिय निरीक्षण तथा उ़द्योगों के आन्तरिक पुनर्गठन से व्यापक परिवर्तन आए। उद्योगों एवं वाणिज्य के साथ- साथ बैकिंग क्षेत्र का भी उद्भव हुआ। 1873 ई. में अमेरिका के नमूने पर एक राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की गई। 1881 ई. में बैंक आफ जापान की स्थापना हुई। व्यापार और विदेशी मुद्रा विनिमय के कार्य में सहायता के लिए एक उपसंस्थान की भी स्थापना की गईं। जिसे योकोहामा स्पीशी बैंक कहा गया। 150 बैंक अस्तित्व में आ गये। सोने और चाँदी का संचय किया गया। डाकघरों में बचत बैंक योजना शीघ्र ही आरम्भ की गई। 1894 ई. के बाद कृषि सम्बन्धी एवं एवं औद्योगिक बैंक अलग से खोले गए।

उद्योग और वाणिज्य के लिए आवश्यक तत्व परिवहन एवं यातायात की तरफ भी ध्यान दिया गया। समुद्र तट पर जहाजों की संख्या में वृद्धि की गई। आरम्भ में विदेश निर्मित जहाजों को उपयोग में लाया गया। धीरे-धीरे देश में ही जहाजों का निर्माण होने लगा, भाप से चलने वाले बड़े जहाजों को बनाया गया। 1890 ई. के आसपास जापान में 100-100 टन के जहाज बनने लगे। 1883 ई. तक नागासाकी के कारखानों में 10 और हयोगी के कारखानों में 23 जहाज तैयार हुए, ये सभी भाप से चलने वाले थे। 19वीं शताब्दी के अन्त तक जापान एक प्रमुख नौ- शक्ति बन गया।

जापान सरकार द्वारा रेलवे की तरफ भी ध्यान दिया गया। 1872ई. में रेल लाइनों का निर्माण कार्य शुरू किया गया और देखते ही देखते 1894 ई. तक सम्पूर्ण देश में रेल लाइनों का जाल फैल गया। आरम्भ में रेलवे का निर्माण सरकार द्वारा अथवा सरकार सहायता प्राप्त कम्पनियों द्वारा किया गया आगे चलकर निजी कम्पनियाँ भी इस क्षेत्र में आ गई। राज्य में डाक-तार व्यवस्था पर भी ध्यान दिया गया। 1877 ई. में टेलीफोन का प्रारम्भ किया गया। जापान के इस तीव्र औद्योगिक विकास से उसका स्थान पाश्चात्य देशों के समकक्ष हो गया। अपने औद्योगिक विकास के बल पर वह शीघ्र ही साम्राज्यवाद की तरफ चल दिया, क्योंकि परिवर्तित स्थिति में वह उत्पादित माल के लिए बाजार की खोज में लग गया और अपने यहाँ लगे उद्योगों के लिए कच्चे माल के लिए भी मण्डी की खोज में लग गया, परिणामत: साम्राज्यवाद से पीछा छुड़ाने के चक्कर में जापान स्वयं एक साम्राज्यवादी देश बन गया।

शिक्षा के क्षेत्र में सुधार - 

मेईजी काल में शिक्षा के क्षेत्रो में भी आवश्यक सुधार किए गए। 1811 ई. में स्थापित पश्चिमी ग्रन्थों का जापानी में अनुवाद करने वाली संस्था ‘बान्शो शीराबेशो’ को 1857 ई. में विद्यालय का रूप दे दिया गया। 1868 ई. के शाही शपथ के निर्देश ‘हर स्थान से ज्ञान प्राप्त किया जाए’ के अनुसार 1871 ई. में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। धनी, निर्धन, स्त्री-पुरूष, सभी के लिए शिक्षा आवश्यक घोषित की गई। अमेरिका की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में संशोधन करके उसे जापान के अनुकूल बनाया गया। प्रत्येक 600 व्यक्तियों पर एक प्राथमिक पाठशाला स्थापित की गई, 8 विश्वविद्यालय और 210 प्राथमिक पाठशाला स्थापित की गई। सामान्य आवश्यक विषयों के साथ- साथ सम्राट के प्रति आदर निष्ठा और उच्च चरित्र की शिक्षा आवश्यक थी। 1880 ई. में अनिवार्य शिक्षा 3 वर्ष की कर दी गई, 1886 में चार वर्ष और 1907 में इसकी अवधि 6 वर्ष कर दी गई। माध्यमिक विद्यालय भी सम्पूर्ण जापान में खोले गए। इनमें छात्रों को विश्वविद्यालय शिक्षा अथवा रोजगार के लिए तैयार किया जाता था। खेती, वन विभाग, खनन, इंजीनियर, मत्स्य पालन आदि की भी शिक्षा दी जाने लगी। कुल शिक्षा काल 17 वर्ष का रखा गया था।

जापान ने अपनी लड़कियों के लिए भी शिक्षा पर बल दिया। लड़कियों के लिए प्राथमिक शिक्षा लड़कों के समान थी। लेकिन माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों को अच्छी माता बनने की शिक्षा पर अधिक बल दिया जाता था। 1913ई. में जापान में एक महिला विश्वविद्यालय की स्थाापना की गई। 1877 ई. में पुरानी राजकीय संस्थाओं केा मिलाकर टोकियों विश्वविद्यालय स्थापित किया गया।

1897 ई. में क्येतो, 1907 में सेन्दोई, 1910 में फू कू ओका, 1918 में साप्पोरों में विश्वविद्यालय खोले गए।

जापान के लोगो में नवीन ज्ञान-विज्ञान के प्रति काफी रूचि थी। वे पाश्चात्य शिक्षा में, जो अच्छा है उसको ग्रहण करना चाहते थे। 1869 ई. में एक जापानी अग्रेंजी शब्द-कोष इसी उद्देश्य को लेकर बनाया गया। जर्मन और फ्रेंचं भाषा के अध्ययन के लिए केन्द्र खोले गए। जॉन स्टुअर्ट मिल, बेन्थम और मिल की रचनाओं का जापानी में अनुवाद किया गया। जर्मन डाक्टरों की सहायता से जापानी चिकित्सा को नया रूप दिया गया। 1877 ई. में हारवर्ड के प्रो. ई. एस. मोर्स के नेतृत्व में जन्तु विज्ञान, पुराविज्ञान, और समाज शास्त्र के अध्ययन की आधारशिला रखी गई।

जापान में शिक्षा जगत में आए परिवर्तनों का वहाँ की समग्र उपलब्धियों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। 1905 ई. तक साक्षरता की दर 95 प्रतिशत हो गई। नई शिक्षा पद्धति ने जापान को वैज्ञानिक, और यान्त्रिक श्रेणी में साक्षरता एक सक्षम राष्ट्र बना दिया। जापान की तकनीक आज भी विश्व के लिए एक चुनौती है।

समाचार-पत्रों का प्रकाशन- 

नई शिक्षा पद्धति ने जापान में समाचार पत्र और पत्रिकाओं के प्रकाशन में भी भूमिका निभाई, पुर्नस्थापना काल में अनेक समाचार-पत्र निकाले गए। 1870 ईमें ‘योकोहामा मााईचीनी शीम्बून’ नामक दैनिक समाचार पत्र आरम्भ हुआ। 1875 ई. तक समाचार पत्रों की संख्या 100 तक पहुँच गई। महिलाओं और बच्चों के लिए पत्र- पत्रिकाएँ अलग से निकाले गए। समाचार-पत्रों में सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना भी की जाती थी। फलत: सरकार को आचार संहिता भी बनानी पड़ी। समाचार पत्रों ने जापानियों के बोद्धिक स्तर को ऊँचा उठाने का कार्य अवश्य किया।

धार्मिक क्षेत्र में परिवर्तन- 

पुनर्स्थापना काल में धर्म के क्षेत्र में भी व्यापक परिवतर्न देखने में आए। सोलहवीं एवं सत्रहवीं शताब्दी के अनुभवों ने जापानियों में ईसाइयत के प्रति- भय, तिरस्कार और घृणा की एक मिश्रित भावना उत्पन्न कर दी थी। 1873 तक ईसाई में धर्म पर प्रतिबन्ध लगा रहा नवीन संविधान के लागू होने पर ही धार्मिक सहिष्णुता प्रदान की गई। सन्धि-बंदरगाहों की आड़ में प्रोटेस्टेटं, रूसी तथा रोमन कैथोलिक सम्प्रदायों ने थोड़ी सी स्वतन्त्रता मिलते ही धर्म प्रचार की गतिविधियाँ तेज कर दी। 1880 के बाद से जहाँ विदेशी वस्तुओं का लोकप्रियता में वृद्धि हुई वहीं ईसाइयत के प्रति भी रूझान बड़ा। किन्तु पूर्व शताब्दियों की खटास के कारण प्रगति बहुत धीमी रही।

उधर बौद्ध धर्म के स्थान पर शिन्तो धर्म लोकप्रिय होने लगा शन्तो धर्म को राज धर्म का दर्जा दिया गया जिससे राष्ट्रीयता के विकास में सहायता मिली।

राजनीतिक चेतना का विकास-

जापान में शिक्षा, पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के प्रति रूझान तथा समाचार पत्रों के विकास ने पाश्चात्य राजनैतिक दर्शन तथा उदारवाद को भी जापान में लोकप्रिय बनाया नवीन परिस्थितियों में शासन में सुधार का प्रश्न भी खड़ा होने लगा। 1868 ई. की घोषणा में एक संसद की स्थापना का उल्लेख किया गया था और कहा गया था कि राज्य की नीति निर्धारण में इसी संसद का महत्व होगा न्याय के क्षेत्रों में सभी नागरिकों के लिए समानता की बात कही गई थी।

पुर्नस्थापना काल से जापान खुल रहा था, लोग खुली हवा में साँस ले रहे थे। ऐसे में नवीन विचारक और बौद्धिक वर्ग भी सामने आया जिन्होंने शासन सुधार के लिए योजनाएँ प्रस्तुत की।

ईतागाकी ताईसुके नामक विद्वान ने सम्राट से अनुरोध किया कि एक ऐसी संसद की स्थापना की जाए जो लोकमत का वास्तविक प्रतिनिधित्व करें। इस माँग को पूरा करने के लिए 1875 ई. में ‘ आईकोकूशा’ नामक संगठन सामने आया इसके द्वारा चलाए गए आन्दोलन को जनतन्त्रीय आन्दोलन का नाम दिया गया। सम्राट ने इस आन्दोलन से प्रभावित होकर कुछ सुधार स्वीकार किए। एक सीनेट और केन्द्रीय न्यायालय की स्थापना की गई। 1878 ई. में स्थानीय स्वशासन की दिशा में कदम उठाए गए। 1878 ई. में प्रान्तों में पाँच येन या उससे अधिक लगान देने वाले पुरूषों द्वारा चुनी हुई प्रान्तीय सभा गठित करने का निर्णय लिया गया। इसका कार्य वित्तीय मामलों पर विचार करना था। धीरे-धीरे शहरों, कस्बों, और देहातों में भी इस प्रकार की संस्थाएं स्थापित की गईं।

धीेर-धीेर राजनीतिक दलों की स्थापना भी हुई। 1881 ई. में ईतागाकी ने पूर्ण लोकतन्त्र के लिए ‘छोजीयूतो’ (उदारवादी) दल बनाया। इसका मूलमंत्र था स्वतन्त्रता मनुष्य की प्राकृतिक दशा हैं। 1882 ई. में काउन्ट ओिक्या सीगेनेबू ने ‘रीक्केन काई शिन्तो’ (सांविधानिक सुधार दल) स्थापित किया रूढ़िवादियों ने पृथक दल बनाया। राजनीतिक वातावरण को दूषित होने से रोकने के लिए सरकार द्वारा कुछ कदम भी उठाए गए। राजनीतिक दलों को अपने विधान, नियम, सदस्य, सूची आदि को स्पष्ट करने को कहा गया। सभा के पूर्व सूचना पुलिस को देना अनिवार्य किया गया। शान्ति के लिए खतरा बन रहे व्यक्तियों को टोकियों से बाहर करने के लिए सुरक्षा अधिनियम भी जारी किया गया।

मेईजी काल का संविधान- 

मेईजी काल अथवा पुर्नस्थापना काल का संविधान ही आधुनिकीकरण का सच्चा पथ प्रदर्शक था। 1881 ई. को एक घोषणा द्वारा जापान के लिए एक संविधान निर्माण की तैयारी आरम्भ कर दी गई। ईतो हीरोबूमो को पश्चिमी देशों के संविधान का अध्ययन करने के लिए यूरोप भेजा गया। वह विएना तथा बर्लिन भी गया। वह पेरिस, लन्दन और रूस भी गया। वापस आने पर एक समिति बनाई गई जिसमें ईतों के साथ फोवाशी, मियोजी, तथा केन्तारो को भी रखा गया। इसने अपने अनुभवों के आधार पर जापान के लिए एक संविधान स्वीकार किया जिसकी घोषणा 11 फरवरी 1889 को कर दी गई।

संविधान की विशेषताएँ- 

नया संविधान सामन्तवाद और पूँजीवाद का मिश्रित रूप था। जारी किये गये संविधान में संशोधन का अधिकार सम्राट को ही था। संविधान की व्याख्या का अधिकार न्यायालयों को दिया गया था। शाही महल साधारण नियमों और कानूनों से पृथक किया गया था। सम्राट के उत्तराधिकार का प्रश्न संविधान द्वारा तय नहीं किया जा सकता था। इसका हल शाही महल का कानून ही कर सकता था। स्थल और जल सेना के सेनापति तथा स्टाफ की नियुक्ति सम्राट द्वारा ही की जा सकती थी।

मन्त्रि परिषद और प्रिवी कौसिंल परामर्श दात्री समिति थी। मन्त्रिपरिषद जापानी संसद के प्रति उत्तरदायी न होकर सम्राट के प्रति उत्तरदायी रखी गई। प्रिवी कौंसिल का निर्माण सम्राट द्वारा ही किया जाता था। सदस्यों और मन्त्रियों की नियुक्ति सम्राट द्वारा ही की जाएगी। संसद में दो सदन उच्च और निम्न सदन रखे गये। उच्च सदन में कुलीन वर्ग के लोग, राजपरिवार के लोग, काउन्ट, विस्काउण्ट, बैरन लॉर्ड, सम्राट द्वारा मनोनीत सदस्य तथा सर्वाधिक कर देने वाले सदस्य होते थे। निम्न सदन में 15 येन या इससे अधिक कर देने वाले व्यक्ति निर्वाचित हो सकते थे। कानूनों की वैधता के लिए संसद की स्वीकृति आवश्यक थी। संसद का सत्र वर्ष में तीन माह के लिए होता था। सदस्य विधेयक ला सकते थे, बहस कर सकते थे, सरकार से प्रश्न कर सकते थे। सम्राट को हर कानून पर निषेधाधिकार प्राप्त था। सम्राट संसद को कभी भी भंग कर सकता था।

जनता के मूल अधिकार -

 संविधान में जनता के मलू अधिकारों की चर्चा की गई थी। भाषण करने, सभा करने, लिखने, संस्था बनाने और धार्मिक स्वतन्त्रता दी गई थी। योग्यता के आधार पर सरकारी पद सभी के लिए थे, बिना उचित कानूनी दखल के किसी को बन्दी नहीं बनाया जा सकता था नाहीं किसी के घर की तलाशी ली जा सकती थी उन्हें पर्याप्त सम्पत्ति रखने का अधिकार था।

न्याय और कानून - 

जापान सरकार ने 1890 ई में पश्चिमी राष्ट्रो को मिले राज्यक्षेत्रातीत अधिकार को समाप्त कर दिया फौजदारी और दीवानी कानूनों की संहिता जारी की गई। फौजदारी कानूनों पर फ्रांसीसी और दीवानी कानूनों पर जर्मनी की छाप थी। न्याय विभाग का भी पुन: संगठन किया गया। फ्रांस की न्याय प़द्धति को आदर्श माना गया। 1894 ई. तक सम्पूर्ण देश में नवीन पद्धति लागू कर दी गई।

जापान में आधुनिकीकरण के परिणाम और महत्व

19 वी शताब्दी के मध्याहन तक, डर, संकोची, और विश्व से पृथक रहने वाला जापान अगले 40-50 वर्षों में ही भयरहित आदर्श सशक्त और एक आधुनिक देश के रूप में सामने आया। इन वर्षों में जापान ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन को स्वीकार किया और विश्व के सामने एक मिसाल कायम की कि किस प्रकार एक उन्नत, और आधुनिक देश बनाया जा सकता है। जापान के लोगों के परिश्रमी स्वभाव ने उन्हें विश्व की उन्नत सभ्यताओं में सम्मिलित करा दिया। अपनी प्रभुसत्ता पर हुए आघात को उन्होंने अधिक दिनों तक सहन नहीं किया और औद्योगिकीकरण को अपनाकर अपनी स्वतन्त्र प्रभुसत्ता को पुन: प्राप्त किया। जल्द ही वह फ्रांस, इंग्लैण्ड, अमेरिका, जर्मनी आदि पाश्चात्य देशों के समकक्ष आ गया और समानता के आधार पर उनसे सन्धियाँ की। यहीं कारण था कि राज्यक्षेत्रातीत के अधिकार को भी समाप्त कर दिया गया।

पाश्चात्य जीनव शैली को अपनाने के कारण राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन में पर्याप्त परिवर्तन आए। जल्दी ही, जापान एक आर्थिक एवं सैनिक शक्ति बन गया। पाश्चात्य देश भी इस बात को समझ गए कि जापान को चीन नहीं बनाया जा सकता। जापानी की बढ़ती शक्ति जल्द ही, साम्राज्यवादी देश के रूप में प्रस्फुटित हुई। 19 वीं शताब्दी के समाप्त होने से पूर्व ही जापान एशिया का प्रथम साम्राज्यवादी देश बनकर सामने आया। जापान का आधुनिकीकरण विश्व के लिए एक दृष्टांत बन गया।

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