जापान में उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद

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16वीं शताब्दी के प्रारम्भ में यूरोप की जातियों ने उत्तरी अमेरिका, एशिया, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका आदि में बड़े पैमाने पर उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद की नीति का अनुसरण किया। उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद जनता का राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से शोषण का प्रतीक था। जब किसी राष्ट्र विशेष के कुछ लोग अपनी मातृभूमि छोड़कर किसी पिछड़े हुए (किन्तु संसाधनों से भरपूर) देश में जाकर बस जाते हैं और वहाँ के संसाधनों पर अपनी पकड़ बनाकर उनका उपयोग अपने हित में करते हैं तो इस नीति को उपनिवेशवाद कहा जाता हैं। साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद से कुछ भिन्न है। जब एक राष्ट्र विशेष के लेाग दूसरे राष्ट्र की आर्थिक लूट करते हैं तो उसे साम्राज्यवाद कहा जाता है। इस व्यवस्था में एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की स्वतन्त्रता का अपहरण कर लेता है और उसके समस्त आर्थिक राजनीतिक संसाधनों का उपयोग अपने हित में करने लगता है। साम्राज्यवादी देश के लोग अपने द्वारा नियुक्त कुछ लोगों के माध्यम से ही विजित देश का शासन चलाते हैं। आर्थिक लूट उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद का मूल मन्त्र है।

आधुनिक उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद का जन्मदाता यूरोप था। पुर्तगाल, स्पेन, हांलैण्ड, इंग्लैण्ड, फ्रान्स आदि इसके जन्म दाता थे। यहाँ के निवासी 16वीं शताब्दी से, ऐसे देशों की खोज में लग गए जिनके पास आर्थिक संसाधन पर्याप्त मात्रा में थे, किन्तु राजनीतिक दृष्टि से वे हाशिए पर थे।

जापान के यूरोप के साथ प्रारम्भिक सम्पर्क

जापान एक लम्बे समय तक विश्व से पृथक रहने की नीति पर चलता रहा था। 12वीं शताब्दी तक यूरोप के लोग जापान के नाम या उसके अस्तित्व से परिचित नहीं थे। तेरहवीं शताब्दी में मंगोल दरबार में रहने वाले मार्को पोलो ने पहली बार जापान का नाम सुना। पुर्नजागरण काल में, यूरोप के नाविक जब एशिया में समुद्री मार्गों की खोज कर रहे थे तो वे जापान भी पहुँच गए। 23 सितम्बर, 1543 को पुर्तगाली जापान की भूमि पर कदम रखने में सफल हो गए।सातसूमा रियासत के लोगों ने पुर्तगालियों का स्वागत किया और वहाँ के डैम्यो (दाइम्यों) ने उनसे आग्नेय शस्त्र क्रय किये और बन्दूक तथा तोप बनाने की कला सीखी। 1555 ई. तक जापान के लोग तोप बनाने की कला में पारंगत हो गए। पुर्तगालियों के बाद, 1549 ई. में कुछ ईसाई पादरी जापान पहुँच गए। जापान के डैम्यों ने उनका भी स्वागत किया और उन्हें अपने यहाँ धर्म-प्रचार की स्वीकृति दे दी। सोलहवीं शताब्दी के अन्त तक स्पेनिश और 17वीं शताब्दी के प्रारम्भ में डच तथा अंग्रेज नाविक और ईसाई पादरी भी वहाँ पहुँचने लगे। प्रारम्भ में, यूरोपियन लोग दक्षिण जापान तक ही सीमित रहे क्योंकि वे हिन्द महासागर, मलक्का और फिलिपाइन्स होते हुए जापान पहुँचते थे। यूरोपियन लोगों ने नागासाकी में अपनी व्यापारिक बस्तियाँ (कोठियाँ) स्थापित कीं और वहीं से अपना व्यापार करने लगे। इस समय तक बड़ी संख्या में ईसाई धर्म प्रचारक जापान पहुँचने लगे थे। जापानी लोग उनका प्रसन्नता से स्वागत कर रहे थे। 16वीं शताब्दी के अन्त तक ईसाईयों की संख्या 3,00,000 तक पहुँच गई।

यूरोपियन लोगों के विरूद्व जापान में प्रतिक्रिया-

जापान ने यूरोप के लोगों के साथ घनिष्ठता के सम्बन्ध रखे और उनके व्यापार, धर्म, ज्ञान-विज्ञान आदि में अभिरूचि दिखाई और उनको ग्रहण भी किया। लेकिन यूरोप के लोगों की मूल भावना जल्द ही जापानियों के सामने आ गई। ईसाई पादरियों ने बहुत से जापानियों को ईसाई धर्म में ले लिया। ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले जापानियेां में देशभक्ति की भावना क्षीण होने लगी। वे रोम के पोप को अपना प्रमुख मानने लगे और अपनी सरकार के खिलाफ शिकायतें भेजने लगे। विदेशी धर्म प्रचारक सरकार विरोधी “ाड़यन्त्रों को जन्म देने लगे। शीघ्र ही जापानी सरकार और बौद्ध एवं शित्तों धर्म के अनुयायी चिन्तित हो उठे और ईसाई धर्म प्रचारकों की रोकथाम के लिए आवाजें उठने लगीं।

यूरोपियन लोग, जापानी भूमि पर, न केवल ईसाईयत पर जोर दे रहे थे वरन वे परस्पर भी एक दूसरे के विरूद्व षड़यन्त्र रच रहे थे। वे आपस में प्रतिस्पर्द्धा करते थे और जापानियों को भड़काते थे। डच अंग्रेजों तथा स्पेनियों के विरूद्व और अंग्रेज स्पेनियों तथा डचों के विरूद्व जापानियों को भड़काते थे। इसका गलत प्रभाव जापानियों पर पड़ रहा था उनके मन में यूरोपियन के प्रति शंका उत्पन्न होने लगी। जापान के समुद्र तट यूरोपियन देशों के संघर्ष के केन्द्र बन गए। 1556 ई. में स्पेन का एक जहाज टूट गया, उसका मुख्य नियामक जापानी अधिकारियों के पास लाया गया। पूछ-ताछ के दौरान उसने कह दिया कि उनकी नीति विदेशों में पहले व्यापारी और धर्म प्रचारकों को भेजने की होती है, वहाँ अपनी पकड़ स्थापित करने के बाद फौज भेजकर उस देश पर अपना अधिकार कायम कर लेते हैं। इसको सुनकर जापानी सावधान हो गए। इस बीच कुछ और घटनाओं से शोगून को यह विश्वास हो गया कि यूरोपियन का जापान में आगमन उचित नहीं है और उन पर प्रतिबन्ध आवश्यक है।

सर्वप्रथम ईसाईमत को रोकने के लिए कदम उठाए गए। 1587ई. में इस तरह का एक आदेश जारी किया गया। 1614 ई. में धर्म प्रचार पर पूर्ण प्रतिबध लगा दिया गया और जापानी ईसाईयों को अपना मौलिक धर्मग्रहण करने का आदेश दिया गया। इयेयासू (शोगून) ने ईसाइमत का बहिष्कार घोषित कर दिया। सभी गिरजाघरों को नष्ट करने की आज्ञा दे दी गई। ईसाई धर्म प्रचारकों ने जापान छोड़कर जाने से इन्कार कर दिया और इधर-उधर छिप गए। इयेयासू कुछ और कर पाता उससे पूर्व ही 1616 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। किन्तु उसके उत्तराधिकारियों ने भी ईसाइयत के विरूद्व कार्य किए और उन पर नियन्त्रण स्थापित करने के प्रयास किए। हजारों की संख्या में धर्म प्रचारकों एवं धर्मान्तरित व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। जिन्होंने ईसाई धर्म त्यागने से इन्कार किया उनको मौत की सजा दी गई। 1623 ईईए मीतसू शोगून बना। 1624 ई. में उसने स्पेनियों को जापान छोड़कर चले जाने का आदेश दिया। 1636ई. में पुर्तगालियों पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 1638 ई. में विदेशी और देशी ईसाईयों ने संगठित होकर विद्रोह कर दिया और नागासाकी के एक पुराने किले से मुकाबला किया। सरकारी सेना ने विद्रोह को पूर्णतया कुचल दिया। 3 अगस्त 1640 ई. को चार पुर्तगाली दूत और उसके 57 साथियों की हत्या कर दी गई। शेष बचे पुर्तगालियों को मकाओ भेज दिया गया। इस प्रकार, जापान ने विदेशियों के साथ अपने सम्बन्ध पूर्णतया तोड़ दिए। डचों और चीनियेां को कुछ प्रतिबन्धों के साथ व्यापार की अनुमति दी गई। डच धर्म प्रचार के चक्कर में न पड़कर केवल व्यापार करते थे, इसलिए ही उनको व्यापार करने की स्वीकृति दी गई। जापान ने विदेशियों पर प्रतिबन्ध लगाकर स्वयं को पिंजरे में बन्द कर लिया। अगली दो शताब्दियों तक जापान एकान्तवास में रहा। सभी देशवासियों को बौद्ध मन्दिरों में अपने नाम का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया। उनको बौद्ध धर्म की किसी न किसी शाखा के प्रति निष्ठावान होने के लिए कहा गया।

जापानी अलगाव का परिणाम- 

विदेशियों पर प्रतिबन्ध लगाकर, ताके गु ावा प्रशासन जापान में आन्तरिक एवं बाह्य शान्ति स्थापित करने में सफल हुआ। एक लम्बे समय से चली आ रही अव्यवस्था और गृह-कलह की भी इतिश्री हो गईं सैनिक सामन्तवाद ने शक्ति के आधार पर जापान में आन्तरिक शान्ति स्थापित की थी और विदेशियेां को बाहर निकालने में सफलता मिली थी। तोकुगावा पद्धति के कारण जापान परस्पर विरोधी परिवारों के एक समूह के बजाय एक राष्ट्र के रूप में कार्य करने लगा। यद्यपि सामन्तवाद के विभिन्न स्वरूपों को कायम रखा गया। और सामन्ती जागीरों का भी अस्तित्व बना रहा तथापि राज्य की पूर्ण शक्ति शोगून में केन्द्रीत थी। जापानवासियों के लिए नवीन नियम प्रणाली प्रकाशित की गई, जिससे प्रजा के कार्यों में नियमितता आ गई। प्रजा में केन्द्रीय प्रशासन द्वारा जारी किए गए कानूनों का पालन करने का स्वभाव विकसित होने लगा।

शान्ति स्थापित हो जाने के कारण जापान अधिक सम्पन्न हुआ। कृषक एवं कारीगर उत्पादन कार्य में लग गए राज्य ने भी कृषि को प्रोत्साहित किया। गाँवों में स्वायत्त-शासन की प्रगति हुई। आन्तरिक वाणिज्य में वृद्धि हुई। सैन्य सरदारों का ध्यान युद्ध-कला से शान्तिकालीन आमोद-प्रमोद की ओर चला गया। नवीन महत्त्वाकांक्षाए जागृत हुई। वाणिज्यिक पूँजी में वृद्धि हुई और मुद्रा प्रणाली में सुधार किया गया।

शिक्षा और साहित्य का विकास हुआ। राजधानी तथा दाइम्यो (सामन्तों) के क्षेत्रों में स्कूल खोले गए। फलस्वरूप उज्जड सैनिकों के पुत्र पढ़ लिख गए। चीन के श्रेष्ठ साहित्यकारों की कृतियों का अध्ययन किया जाने लगा। जापान के उच्च वर्ग में कनफ्यूशियस के कÍर समर्थकों में वृद्धि हुई। राज्य ने पुस्तकों के प्रकाशन एवं संग्रह को प्रोत्साहित किया। इतिहासकारेां को महत्त्व प्रदान किया गया और राष्ट्र के अतीत को सामने लाया जाने लगा। चित्रकला और वास्तुकला का विकास हुआ। प्राचीन जापान अपनी संस्कृति को परिष्कृत करने में लग गया।

शान्ति, व्यवस्था और विकास के कारण समूराई (यौद्धा)वर्ग पतन को प्राप्त होने लगा। ऐसे सैनिक वर्ग का अस्तित्व असंगत प्रतीत होता गया जिसका पोषण सम्पूर्ण राष्ट्र द्वारा किया जा रहा था। विलासिता के कारण सामन्ती सैनिकों की शक्ति क्षीण होने लगी। प्राचीन काल में जिस प्रकार सम्राटों पर फ्यूजीवारा और बाद में शोगूनों का नियन्त्रण रहा था, उसी प्रकार महान दाइम्यो के उत्तराधिकारी भी अपने औपचारिक रक्षकों के नियन्त्रण में आने लगे। यहाँ तक कि कभी-कभी तो शोगून भी अपने मन्त्रियों से प्रभावित होकर कार्य करते दिखाई देने लगे।

साहित्य और भाषा के अध्ययन ने लोगों को इतिहास के प्रति चिन्तनशील बना दिया। चीन के श्रेष्ठ साहित्य से भिन्न एक जापानी साहित्य का विकास हुआ। धर्म का पुनरूद्वार किया गया, जिसके फलस्वरूप जापानी सम्राट को और अधिक आदर प्राप्त होने लगा। राजनीतिक दृष्टि से इतिहासकारों की अधिक महत्वपूर्ण खोज यही थी कि राष्ट्र का न्यायसम्मत एवं उचित शासक सम्राट है और शोगून तंत्र सम्राट के अधिकारों का अपहरणकर्त्ता है। धीरे-धीरे यह विचार जोर पकड़ने लगा कि सम्राट को अपने उचित पद पर प्रतिष्ठापित किया जाना चाहिए। सम्राट को फिर से अपने पद पर स्थापित करने में दक्षिण की बड़ी सामन्ती जागीरें प्रयत्न करने लगी थीं, इस प्रकार देखने में आया कि जिस शोगून व्यवस्था के कारण जापान के सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक क्षेत्र में इतने परिवर्तन आए, अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं उसी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था।

जापान नवीन परिवर्तन की ओर अग्रसर- 

19वी  शताब्दी के मध्यकाल तक जापान परिवर्तन के लिए तैयार था। पुरानी व्यवस्था जर-जर होकर गिरने के लिए तैयार थी। शोगून व्यवस्था क्षीण हेा गई थी। धीरे-धीरे उन पर उनके मन्त्रियों का नियन्त्रण बड़ रहा था। एक क्रान्ति का श्रीगणेश होना शेष था। परन्तु बाह्य हस्तक्षेप अथवा बाह्य हवा के अभाव में क्रान्ति का स्वरूप क्या हेागा, कहना कठिन थ। जापान जिस समय इतिहास के इस विचित्र संयोग से गुजर रहा था, उसी समय उसका सम्पर्क एक बार फिर विस्तारोन्मुख पाश्चात्य देशों के साथ हुआ और इस सम्पर्क सूत्र ने एक नये राष्ट्र को जन्म दिया।

जापान में प्रवेश के लिए पाश्चात्य जगत का पुन: प्रयास- 

19वी शताब्दी के प्रारम्भ तथा 18वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में रूस तथा इंग्लैण्ड ने जापान के साथ सम्बन्ध तलाशने के प्रयास किए। इस काल में प्रशान्त महासागर में यूरोपियन लोगों की हलचलें तेज हो गईं थीं। जापान की तरफ रूस के जहाज जाने लगे थे। रूस जापान के साथ घनिष्ठ सम्बन्धों का इच्छुक था। सन् 1792 ई. में एक रूसी प्रतिनिधि मण्डल जापान पहुँचा परन्तु उसे केवल नागासाकी में उतरने की छूट मिली। 1804 ई. में एक अन्य रूसी प्रतिनिधि मण्डल नागासाकी पहुँचा और जापान के साथ व्यापार करने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन जापान ने नकारात्मक उत्तर दिया, जिससे दोनेां के सम्बन्धों में तनाव में वृद्धि हुई लेकिन रूस के लिए तात्कालीन परिस्थितियों में युद्ध सम्भव नहीं था।

रूस के बाद इंग्लैण्ड ने भी एक बार पुन: जापान के साथ मित्रता का प्रयास किया। 1793 ई. में मेकार्टन को जापान में घुसने की छूट नहीं मिली। इसी क्रम में अंग्रेज और जापानी समुद्री नाविकों में 1824 ई. में एक संक्षिप्त टक्कर भी हो गई। परिणामस्वरूप जापानी अक्षिाकारियों ने 1825 ई. में एक आदेश निकाला कि यदि कोई विदेशी जहाज जापान में उतरेगा तो उस पर गोली चलाई जाए। जापानी नाविकों एवं मछुआरों को कहा गया कि वे विदेशियों के साथ सम्पर्क रखने के प्रयास न करें। इस प्रकार जापान 19वीं शताब्दी के मध्यान तक एकला चलो की नीति पर चलता रहा।

जापान में अमेरिका का प्रवेश और अमेरिका-जापान सन्धि 

जापान में अमेरिका के प्रयास-

जापान के प्रवेश द्वार सम्भवत: प्रथम बार सयुंक्त राज्य अमेरिका के लिए खुले। अमेरिका द्वारा जापान में रूचि लेने के विशेष कारण थे। 18वीं शताब्दी के अन्तिम चरण तथा 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में रूसियों, अंग्रेजों और अमरीकियों ने उत्तर अटलांटिक की खोज करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। नेपोलियन के पतन के बाद इन देशों ने व्यापार एवं वाणिज्य को बढ़ावा दिया। औद्योगिक क्रान्ति के कारण भी व्यापारिक क्षेत्र विकसित हुए। वाष्प नौ परिवहन तथा रेलों ने विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक कम समय में माल ढोना प्रारम्भ कर दिया था। संयुक्त राज्य अमेरिका के विस्तार के कारण यूरोप के लोग प्रशान्त महासागर के पूर्वी तट तक पहुँचने लगे थे। प्रशान्त महासागर में अमेरिका की व्यापारिक गतिविधियाँ तीव्र गति से बढ़ रही थीं। सन् 1840-60 के बीच आरीगाँन और कैलिर्फोनिया की स्थापना हुई। उधर इंग्लैण्ड ने अफीम युद्ध द्वारा चीन के पाँच बन्दरगाहों में प्रवेश की अनुमति प्राप्त कर ली। इसका जापान पर भी असर होना स्वाभाविक था। जापान का एकान्त टूटने के लिए तैयार था। 1847 ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट ने जापान को अपनी पृथकता की नीति छोड़ने की सलाह दी। 1849ई. में उसने जापान को चेतावनी भी दी कि एक अमरीकी जहाजी बेड़ा शीघ्र ही जापान के समुद्र तट में आने वाला है।

प्रशान्त महासागर में अमरीका की रूचि लगातार बढ़ रही थी। ज्यों-ज्यों अमरीका ने अपने पैर पश्चिम की तरफ बढ़ाए त्यों-त्यों जापान के साथ उसका सम्पर्क अवश्यम्भावी नजर आने लगा। अमेरिका के कई जहाज जापानी समुद्र तट पर टूट चुके थे। एक अमेरिकी जहाज जो कठिनाई में फँस गया था उसने जापान के बन्दरगाह में शरण माँगी मगर उसे अनुमति नहीं मिली। अब तो, अमेरिका के लिए आवश्यक हो गया कि प्रशान्त महासागर में अपना वर्चस्व स्थापित करना है तो कुछ ऐसे बन्दरगाह नियन्त्रण में होने चाहिए जहाँ संकटकाल में विश्राम लिया जा सके, जापान से अच्छा आश्रय स्थल कोई और नजर नहीं आ रहा था।

कामोडेारेपेरी का जापान में आगमन- 

20 जुलाई 1846 को अमेरिका नौसेना का एक अधिकारी कोमोडोर जेम्स विडिल दो जहाज लेकर एक जापानी बन्दरगाह पर पहुँचा और उसने व्यापारिक सम्बन्धों की स्थापना के लिए प्रार्थना की लेकिन जापानी अधिकारियों ने अनुमति नहीं दी। 1849ई. में कोमोडोर जेम्स म्लिन नागासाकी के बन्दरगाह पर पहुँचा जहाँ जापानी अधिकारियों ने 15 अमेरिकी नाविकों को बन्धक बना लिया था। परन्तु व्यापार के सम्बध में उसने कोई वार्ता नहीं की।

सन् 1853ई. को अमेरिका सरकार ने कोमोडोर पेरी के नेतृत्व में एक मिशन जापान के लिए भेजा। पेरी अफ्रीका और चीन का चक्कर लगाकर चार युद्धपोतों के साथ यीडो (येदो) की खाड़ी में उतरा और जापानी अधिकारियों से प्रार्थना की कि वे संकटग्रस्त अमेरिकी जहाजों को जापानी बन्दरगाह पर ठहरने की अनुमति प्रदान करें, साथ ही कोयला-पानी आदि प्राप्त हो जाए एवं जापानी बन्दरगाहों, के साथ व्यापार की स्वीकृति भी मिल जाए। उसने अमेरिकी राष्ट्रपति फिलमोर का एक पत्र जापान के सम्राट के नाम दिया। उसने उपहार के रूप में पश्चिमी तार और रेल के दो नमूने भी जापानी अधिकारियों को दिए। पेरी ने एक वर्ष बाद पुन: आने की चेतावनी दी और कहा कि वह पहले से अधिक शक्तिशाली बेड़ों के साथ आएगा तब तक जापानी सरकार उसकी प्रार्थना पर सकारात्मक विचार कर ले। पेरी के जापान से वापस जाने के बाद वहाँ खलबली मच गई। शोगून के मंत्री अत्यधिक व्याकुल हो उठे। राजदरबार की ओर से सभी बड़े बड़े देवालयों में प्रार्थनाएँ करने का आदेश दिया गया। जापानी प्रशासन नहीं समझ पा रहा था कि अमेरिका के साथ क्या किया जाए?

फरवरी 1854ई. में कोमोडोर पेरी तीन भाप के जहाज और पाँच यान लेकर पुन: जापानी बन्दरगाह पर उतरा। अमेरिका जापान के साथ किसी निर्णायक स्थिति में शीघ्र ही पहुँचना चाहता था क्योंकि रूस और इंग्लैण्ड भी जापान के साथ सम्पर्क साधने में लगे थे। रूस के जार निकोलस प्रथम ने एडमिरल पूयातीन के नेतृत्व में नागासाकी में चार जहाजों का एक बेड़ा भी भेजा था। पेरी के साथ तोपे, बन्दूके तथा अनेक आग्नेय शस्त्र थे। उसके पास पाश्चात्य जगत की अनेक ऐसी वस्तुएँ भी थीं जिनको देखकर जापानी आश्चयचकित हो गए। पेरी के भारी अस्त्र-शस्त्र देखकर और उसके युद्धपोतों की शक्ति को देखकर शोगून चिन्तित हो उठा। उसने तुरन्त डेम्यो में एक सभा बुलाई। उसमें तरह-तरह के विचार व्यक्त किए गए। एक पक्ष, जो अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की सन्धि के विरूद्व था, का कहना था कि जापान की परम्परागत पृथकता और अलगाव की नीति का ही अनुकरण जारी रखना चाहिए। यदि अमेरिका से किसी प्रकार की सन्धि की गई तो ‘पहले तो अमेरिका हमें शिक्षा देंगे, औजार और मशीन देंगे, आग्नेय अस्त्र-शस्त्र या अन्य आराम की वस्तुएँ देंगे और फिर अपनी पकड़ बनाकर हमें धोखा देगे। वे धीरे-धीरे देश का धन चूसकर देश को निर्धन बना देंगे, अन्त में, वे हमारी स्वाधीनता भी छीन लेंगे।’ जबकि, दूसरे पक्ष का कहना था कि अमेरिका के साथ सन्धि करने से बचा नहीं जा सकता। फिर हमारी नीति होनी चाहिए हम अपने को बदलें तथा पश्चिमी देशों के साथ सन्धियाँ करें, उनकी विधाओं और कलाओं को सीखकर अपने देश को सशक्त बनाएँ ताकि हम उनका मुकाबला करने में सक्षम हो सकें। अन्त में, दूसरे पक्ष की विजय हुई और जापानी अधिकारियों तथा पेरी के बीच सन्धि के लिए वार्त्ता प्रारम्भ हुई तथा 31 मार्च 1854 ई. को एक सन्धि सम्पन्न हो गई।

कानागावा की सन्धि- 

31 मार्च 1854 ई को कानागावा की सन्धि के अनुसार निश्चित किया गया कि सन्धि के अनुसार अमेरिकी जहाजों को केवल दो बन्दरगाहों -येदों के पास के शिमोदा तथा उत्तरी द्वीप पर स्थित हाकोदातें-पर आने की अनुमति दी गई। अमेरिकी जहाजों को रसद, कोयला, पानी आदि लेने की छूट दी गई, वे जहाजों की मरम्मत आदि कर सकते थे। शिमोदा बन्दरगाह में अमेरिका अपना वाणिज्य दूतावास खोल सकेगा। व्यापारिक सुविधाओं के बारे में अधिक कुछ नहीं कहा गया था। व्यापार केवल वहाँ के स्थानीय विनियमों के तहत किया जा सकता था। जहाज पर ले जाने वाले माल की खरीद भी केवल जापानी अधिकारियों के द्वारा हो सकती थी। देानों देशों के प्रतिनिधियों के आदान-प्रदान की व्यवस्था भी हुई। यह भी निश्चित किया गया कि अन्य देशों को जापान जो भी अतिरिक्त सुविधाएँ देगा वे अमेरिका को स्वत: ही प्राप्त हो जाएँगी। इस प्रकार, एक लम्बे समय से चला आ रहा जापान का अलगाव टूट गया और अब उसके साथ सम्बन्ध बनाने के लिए यूरोपीय राष्ट्र दौड़ में सम्मिलित हो गए।

जापान-अमेरिका सन्धि के परिणाम और शोगून व्यवस्था का अन्त

यूरोपीदेशों के साथ सन्धियाँ – 

अक्टबू र, 1854 मे, नागासाकी में एक ब्रिटिश अधिकारी जेम्स स्टर्लिंग द्वारा सन्धि की गई। फरवरी 1855 में शिमोदा में रूस के साथ सन्धि की गई। जापान ने जनवरी 1856 में डचों के साथ भी सन्धि कर ली। ‘सर्वाधिक प्रियदेश’ की व्यवस्था के फलस्वरूप यह सन्धि चारों देशों के लिए लाभकारी हो गई। 1856 ई. तक चारों राज्यों को जापान में और भी अधिकार मिल गए। जापान के ऐकान्तिक जीवन का अन्त हो गया।

टाउनसैण्ड हैैरी का आगमन- 

कानागावा की सन्धि के अनुसार 1856 इर्. में टाउनसडें हैरी अमेरिकी प्रतिनिधि की हैसियत से जापान पहुँचा। जापानी बन्दरगाह शिमोदा में वाणिज्य दूतावास खोला गया, हेरी को उसका प्रथम अधिकारी बना कर भेजा गया था। प्रारम्भ में जापानी लोगों का व्यवहार उसके प्रति शत्रु भाव लिए हुए था। किन्तु हैरी व्यवहार कुशल और कूटनीतिज्ञ था उसने पर्याप्त धैर्य से कार्य किया और जापानी अधिकारी तथा जापानी लोगों को पाश्चात्य देशों से सम्बन्ध कायम करने के लाभ बताए। उन्हें रूस तथा इंग्लैण्ड की शक्ति का डर भी दिखाया कि किस प्रकार इंग्लैण्ड ने चीन को युद्ध में पराजित करके सन्धि करने के लिए विवश कर दिया था। वे जापान के साथ भी इसी प्रकार का व्यवहार कर सकते हैं। उसके तर्कों का जापानी अधिकारियों पर गहरा प्रभाव हुआ और वे अमेरिका को और अधिक सुविधाए देने को तैयार हो गए। अमेरिका के नागरिकों को प्रतिबन्धित बन्दरगाहों पर आवास का अधिकार मिल गया, नागासाकी में भी अधिकार मिल गए।

जापान-अमेरिका सन्धि 1858- 

जापान धीरे- धीरे विदेशियों के प्रति अपने रूख में नर्मी ला रहा था जिसका प्रतिफल सन् 1858 में देखने को मिला जबकि 29 जुलाई 1858ई. को जापान और अमेरिका के मध्य एक और सन्धि हुई जिसकी शर्ते इस प्रकार थीं-

  1. शिमोदा और हाकोदाते के अतिरिक्त कानागावा तथा नागासाकी भी फौरन ही व्यापार के लिए खोल दिए गए।
  2. नीईगाता और हयोगो को 1860 ई. से 1863ई. तक धीरे-धीरे खोलने की व्यवस्था की गई तथा यीदो और ओसाका में विदेशियों को बसने की स्वीकृति दे दी गई।
  3. क्षेत्रातीत अधिकार को मान्यता दी गई अर्थात् जो अमेरिकी जापान में निवास करेंगे उन पर अमेरिकी कानून लागू होंगे।
  4. जापान अपने आयात-निर्यात पर 5घ कर ले सकेगा दोनों देशों की सहमति से ही कोई परिवर्तन सम्भव होगा।
  5. विदेशी मुद्रा जापान में चल सकेगी। जापान की मुद्रा का भी निर्यात हो सकेगा। 
  6. अमेरिका ने जापान को जहाज, हथियार और तकनीकी विशेषज्ञ उपलब्ध कराने का वचन दिया।
  7. दोनेां देश एक दूसरे के यहाँ दूत तथा अधिकारियों की नियुक्ति कर सकेंगे।
  8. जापान में, अमेरिकियों को धार्मिक स्वतन्त्रता होगी।
  9. 4 जुलाई, 1872 को सन्धि को पुन: दोहराने की शर्त रखी गई।

सन्धि की समीक्षा- 

टाउनसेंड हैरी ने उपरोक्त  सन्धि शोगून के साथ भय अथवा शक्ति का डर दिखाकर नहीं की थी वरन इस कार्य की सफलता का श्रेय मुख्यत: उसकी सहानुभूति, व्यवहार कुशलता तथा दृढ़ता थी। अमेरिकी सन्धि का अनुसमर्थन करने के लिए जापानी दूत अमेरिका भेजे गए। यह जापान से किसी विदेशी राष्ट्र में जाने वाला प्रथम राजनयिक प्रतिनिन्धिा मण्डल था। इस सन्धि द्वारा जापान ने अपरदेशीयता तथा सन्धि द्वारा प्रतिपादित शुल्क-पद्धति की व्यवस्था करके अंशत: अपने राष्ट्रीय अधिकारों का बलिदान कर दिया था। इन अधिकारों को पुन: प्राप्त करने के लिए उसको 40 वर्ष तक संघर्ष करना पड़ा। अब विदेशियों पर से जापानी राजदरबार का नियन्त्रण समाप्त हो गया। जापान का शुल्क-दर निर्धारण का अपना अधिकार छोड़ना पड़ा। क्षेत्रातीत अधिकार जापान की सम्प्रभुता पर सीधा आक्रमण था। विदेशी मुद्रा के विनियम की धारा से भी जापान को ही नुकसान होने वाला था। परिणाम यही था कि जापान का प्रवेश द्वार अब पाश्चात्य देशों के लिए खुल गया था और असहाय जापान उनको बर्दाश्त करने के लिए तैयार था। जापान के बन्द द्वार विदेशी व्यापार के लिए खुल गए। जापान में विदेशियों का प्रवेश, उनका वहाँ बसना और व्यापार करना एक विशिष्टता थी। इस कार्य के लिए न लड़ाई लड़ी गई, न क्षेत्र दबाया गया और न छीना-झपटी या मारकाट हुई, सब कुछ बहुत आसानी से हो गया। जापान को क्षेत्रातीत मामले में अपमान का अवश्य सामना करना पड़ा तथापि जापान द्वारा अपना प्रवेश द्वार खोलना उसके अपने ही हित में था, सन्धि द्वारा नही तो लड़ाई द्वारा खोलना पड़ता। जापान ने पश्चिमी देशों की ताकत को समझा और समयानुकूल कार्य किया। पश्चिम की उन्नत तकनीक को अपनाने में जापानियों ने किसी तरह का संकोच नहीं किया। इस सन्धि से जापान के सर्वांगीण विकास का द्वार खुल गया।

जापान को अन्य राष्ट्रों के साथ भी सन्धियाँ करनी पड़ी। 12 अन्य पश्चिमी राष्ट्रों से जापान को ऐसी ही सन्धियाँ करनी पड़ी। इन सन्धियों से जापान पर पाश्चात्य साम्राज्यवाद की काली छाया पड़ना स्वाभाविक था। जापान ने इसका सामना कैसे और किस रूप में किया यह आगे देखेंगे।

उपरोक्त सन्धि का सबसे बड़ा परिणाम एक और हुआ। सन्धि के कारण शोगून की बहुत बदनामी हुई। उसने पश्चिम के सामने घुटने टेक दिए थे। जापान में उसकी आलोचना होने लगीे तथा उसके अन्त की माँग की जाने लगी। सन्धियों की जटिलता का समाधान शोगून के पास नहीं था। शोगून की समाप्ति और सम्राट की शक्ति की पुर्नस्थापना की माँग बलबती होती गई जिसका परिणाम 1868 ई. में देखने को मिला जबकि शोगून व्यवस्था का पूर्णत: अन्त हो गया और राजशक्ति की पुर्नस्थापना हुई।

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