कला शिक्षा क्या है?

अनुक्रम
कला शिक्षा विद्यार्थियों के सृजनात्मक विकास के लिये महत्त्वपूर्ण उपयुक्त माध्यम के रूप में पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा है। यह शिक्षा मुख्यत: दो तथ्यों पर आधारित है। प्रथम तथ्य है कि प्रत्येक विद्यार्थी अनेकों छुपी हुई सृजनात्मक योग्यताओं से परिपूर्ण होता है एवं द्वितीय तथ्य है कि कला शिक्षा बालक की इन सृजनात्मक योग्यताओं को परिपूर्ण करने में सहायक होती है। ये कलायें ही विद्यार्थी की उत्सुकता, कल्पना, सृजन, सौन्दर्यानुभूति को विकसित कर सकती हैं। विभिन्न कलायें जैसे चित्रकला, मूर्तिकला, सज्जात्मक कला, संगीत, नृत्य, थियेटर, ड्रामा आदि के माध्यम से बालक को उसकी वंशानुगत क्षमताओं को प्रकट करने एवं अभिव्यक्त करने का अवसर प्राप्त होता है।

कलाओं में प्रमुखत: चाक्षुष (Visual) एवं प्रदर्शनकारी (Performing) कलायें निहित होती हैं।

चाक्षुष (Visual Art) कला के अंतर्गत चित्रकला, मूर्तिकला एवं स्थापत्यकला सम्मिलित होती हैं।

प्रदर्शनकारी (Performing Art) कला के अंतर्गत संगीत, नृत्य, नाटक (ड्रामा), फिल्म, काव्य आते हैं। कला, मानव की मानसिक आवश्यकता है। चाक्षुष एवं प्रदर्शनकारी कलाओं के मूल में भावनाओं की सहज, सौन्दर्यपूर्ण, सृजनात्मक अभिव्यक्ति निहित होती है। जब से मानव का अस्तित्व इस दुनिया में आया है तब से लगातार अलग-अलग रूपों, आकारों से मानव उसे अभिव्यक्त करता आ रहा है। आदिकाल से मानव अपनी बातों को रंगों, रेखाओं, मुद्राओं, सुर, ताल, हाव-भावों से प्रदर्शित करता आ रहा है और अपनी संस्कृति एवं सभ्यता को अपने माध्यम से संजो रहा है। यही कारण है कि जब संस्कृति और सभ्यता की बात आती है तो उस समय की कला ही उसको जानने और मापने का प्रमुख मापदंड माना जाता है।

ड्रामा एवं कला शिक्षण के पीछे भी उपरोक्त भावनायें निहित होती हैं। मनुष्य के समग्र विकास हेतु इन दोनों विधाओं को समाहित कर शिक्षण दिये जाने से विद्यार्थी का मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक विकास संभव होकर वह एक पूर्ण मानव के रूप में विकसित हो सकेगा। विद्यार्थी में सौन्दर्य की समझ विकसित करने में ये विषय सहायक सिद्ध होंगे। साथ ही साथ हस्त-कौशल, हस्तशिल्प के महत्व से भी विद्यार्थी अवगत हो सकेंगे।

‘‘राष्ट्रीय पाठ्य चर्चा की रूपरेखा 2005 NCERT में उद्धृृत रवीन्द्रनाथ टैगोर के निबंध ‘‘सभ्यता और प्रगति से’’ की निम्न पंक्तियाँ कला शिक्षा की संपूर्णता एवं बालक के जीवन में उसके महत्व पर पूर्ण प्रकाश डालती हैं-

‘‘जब मैं बच्चा था तो छोटी छोटी चीजों से अपने खिलौने बनाने और अपनी कल्पना में नये नये खेल ईज़ाद करने की मुझे पूरी आज़ादी थी। मेरी खुशी में मेरे साथियों का पूरा हिस्सा होता था ; बल्कि मेरे खेलों का पूरा मज़ा उनके साथ खेलने पर निर्भर करता था। एक दिन हमारे बचपन के इस स्वर्ग में वयस्कों की बाज़ार - प्रधान दुनिया से एक प्रलोभन ने प्रवेश किया। एक अंग्रेज दुकान से खरीदा गया खिलौना हमारे एक साथी को दिया गया ; वह कमाल का खिलौना था- बड़ा और मानों सजीव । हमारे साथी को उस खिलौने पर घमंड हो गया और अब उसका ध्यान हमारे खेलों में इतना नहीं लगता था ; वह उस कीमती चीज़ को बहुत ध्यान से हमारी पहुंच से दूर रखता था, अपनी इस खास वस्तु पर इठलाता हुआ। वह अपने अन्य साथियों से खुद को श्रेष्ठ समझता था क्योंकि उनके खिलौने सस्ते थे। मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि अगर वह इतिहास की आधुनिक भाषा का प्रयोग कर सकता तो वह यही कहता कि वह उस हास्यास्पद रूप से श्रेष्ठ खिलौने का स्वामी होने की हद तक हमसे अधिक सभ्य था।

अपनी उत्तेजना में वह एक चीज़ भूल गया - वह तथ्य जो उस वक्त उसे बहुत मामूली लगा था- कि इस प्रलोभन में एक ऐसी चीज़ खो गई जो उसके खिलौने से कहीं श्रेष्ठ थी, बच्चे की रचनात्मक ऊर्जा नहीं, न ही उसके खेल में बच्चे का आनंद था और न ही उसके खेल की दुनिया में साथियों को खुला निमंत्रण ।’’

कला शिक्षा के लिये विभिन्न समितियों की अनुशंसायें

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही विभिन्न शिक्षा समितियों द्वारा कला को महत्वपूर्ण स्थान दिये जाने संबंधी विभिन्न अनुशंसाये होती आ रही हैं जिनमें से प्रमुख अनुशंसाओं पर उनके मतों को यहाँ उल्लिखित किया जा रहा है।

माध्यमिक शिक्षा समिति (1952-53 )

1952-53 की रिपोर्ट के अंतर्गत विद्यार्थियों में सृजनात्मक ऊर्जा के विकास एवं सांस्कृतिक विरासत के सम्मान एवं ज्ञान पर अधिक जोर दिया गया था। इस ज्ञान द्वारा वे आगामी जीवन में उसका प्रयोग एवं उपयोग कर जीवनयापन भी करने में सक्षम हो सकते हैं।

माध्यमिक शालाओं में कला, क्राफ्ट, संगीत, नृत्य आदि विधाओं को विषय के रूप में इन्हें पाठयक्रम में शामिल किया गया था। इसके पीछे विचारकों का उद्देश्य था कि विद्यार्थी हाथ से कार्य करके कोई एक क्राफ्ट (हस्तकौशल) में दक्षता हासिल करें और श्रम की महत्ता को समझें और यदि आगामी जीवन में आवश्यक हो तो उसे अपनी जीविका का साधन बना सकें। अपने रचनात्मक कार्य के दरम्यान विद्यार्थी प्रसन्नता प्राप्त करते हुए व्यक्तित्व का विकास करें।

“Release of creative energy among the students so that they may be able to appreciate cultural heritage and cultivate rich interests, which they can pursue in their leisure and later in life (National curriculum framework 2005’. Position Paper National Focus Group on Arts, Music, Dance and Theatre)

1952 में माध्यमिक शिक्षा आयोग की संपूर्ण परिकल्पना निम्न रूप से प्रस्तुत की गई थी- ‘‘लोकतंत्र में नागरिकता की परिभाषा में कई बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक गुण शामिल होते हैं : एक लोकतांत्रिक नागरिक में सच को झूठ से अलग छांटने, प्रचार से तथ्य अलग करने, धर्मान्धता और पूर्वग्रहों के खतरनाक आक”रण को अस्वीकार करने की समझ व बौद्धिक क्षमता होनी चाहिये ........ वह न तो पुराने को इसलिये नकारे क्योंकि वह पुराना है, न ही नये को इसलिये स्वीकार करें क्योंकि वह नया है- बल्कि उसे नि”पक्ष रूप से दोनों को परखना चाहिये और साहस से उसको नकार देना चाहिये जो न्याय और प्रगति के बलों को अवरूद्ध करता हो .....।’’

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 (P.N. 78) कला के संदर्भ में विविध सांस्कृतिक विरासतों एवं राष्ट्रीयता के प्रति सम्मान की भावना की निहितता के लिये ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्कयता होनी चाहिये जिसमें हमारी नई पीढ़ी इस लायक बन सके कि वह नई अवधारणों व बदलती सामाजिक व्यवस्थाओं को उनके अतीत को पुर्नमूल्यांकन करते हुए सुदृढ़ बना सके।

भारतीय शिक्षा नीति - (1964-66)

इस नीति के अंतर्गत कोठारी कमीशन की रिपोर्ट के द्वारा दृश्यकला एवं प्रदर्शनकारी कलाओं के शिक्षकों को प्रशिक्षण देने की सिफारिश दी गई थी। कला शिक्षण को श्रेय न दिये जाने से होने वाली क्षति के कारण नैतिक मूल्यों के हनन और सौन्दर्यबोध में होने वाले ह्यास को भी इस कमीशन ने इंगित किया। भारत शासन से भी इस क्षेत्र में कमेटी गठन करने का अनुरोध किया गया जो तत्कालीन कला शिक्षण के विस्तार एवं प्रगति के लिये सुझाव व संभावनायें तलाश कर व्यवस्थित रूप से कार्यान्वित करें। देश के अलग-अलग स्थानों पर स्थानीय सहभािगता द्वारा बाल भवन खोले जाने की भी अनुशंसा इस समिति द्वारा की गई। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय स्तर पर भी कला विभाग एवं इस क्षेत्र में शोध कार्य को बढ़ावा देना प्रस्तावित किया गया।

“Adequalte facilities for the training of teachers in music and the visual arts do not exist. The neglact of the arts is education impoverishes the educational process and leads to a decline of aesthetic tastes and values.”

कोठारी कमीशन की रिपोर्ट के फलस्वरूप एन.सी.ई. आर.टी. ने श्री के.जी. सैयिदैन की अध्यक्षता में स्कूली शिक्षा में कला शिक्षण की महत्ता को बढ़ाने के लिये एक कमेटी गठित की गई जिसने 1967 में अपनी रिपोर्ट में शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर कला शिक्षण की अनिवार्यता पर जोर दिये ओर इसके शिक्षकों को प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं उन्मुखीकरण की रूपरेखा योजना दी। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) में भी कला शिक्षण विभाग की स्थापना किये जाने की अनुशंसा की।

एन.सी.ई.आर. टी. पाठ्यक्रम परिचर्या 1975 में कोठारी कमीशन की अनुशंसा के अनुरूप कला शिक्षा को सृजनात्मक गतिविधियों (Creative activities), 1980 में सृजनात्मक अभिव्यक्ति (Creative Expression), 1988 में कला एवं सृजनात्मकता (Art & creativity) के नाम से प्रस्तावित किया गया था। इन सभी में विधार्थियों में कल्पनाशीलता, उत्सुकता, खोज, सृजन एवं सौन्दर्यबोध को विकसित करना ही मुख्य उद््देश्य था।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 -

इस शिक्षा नीति के अंतर्गत स्कूली शिक्षा में विद्यार्थियों द्वारा पूरे देश के विभिन्न स्थानों की संस्कृतियों और रहन सहन की विस्तृत जानकारी के महत्व के बारे में जानने की अनुशंसा की गi थी। 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में यशपाल समिति द्वारा 1986 की राष्ट्रीय नीति की अनुशंसाओं को ही आधार मानकर विद्यार्थियों को पूर्व प्राथमिक स्तर से ही संस्कृति और शिक्षा का सामंजस्य करते हुए व्यक्तित्व विकास एवं विद्यार्थियों में अन्तर्निहित विशेषताओं को उजागर करने पर जोर दिया गया था।

“An illustrated view on the cultural perspective interlinking education and culture in order to promote the process of child personality development particularly in terms of discovering the inherent potentialities of the child.”

इस समिति ने पूर्व प्राथमिक स्तर से सभी उच्चस्रतीय शिक्षा में सभी प्रादेशिक संस्कृतियों की जानकारी एवं आपस में सांस्कृतिक आदान प्रदान, समुदायों की पूर्ण मनोयोग से सहभागिता, शिक्षकों को प्रोत्साहन, युवाओं का सांस्कृतिक सरोकारों में योगदान, पाठयक्रम में परिषकार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की थी।

प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट जिसका शीर्षक था ‘‘लर्निंग विदाउट बर्डन ‘‘अर्थात शिक्षा बिना बोझ विद्यार्थियों पर पाठयक्रम के बोझ को कम करने और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रणाली की सिफारिश की गई साथ ही साथ विद्यार्थियों में स्वयं सीखने एवं कौशल विकास पर जोर दिया गया। इस समिति का मानना था कि यदि बोझिल शिक्षा प्रक्रिया होगी तो विद्यार्थी स्वानुभव, आत्मप्रदर्शन एवं रचनात्मकता को बेहतर रूप से प्रदर्शित करने में असहाय होगा।

“Look into the ways and means to reduce the load of curriculum on students and at the same time improve the quality of learning including capability for life long self learning and skill for mulation.”

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005 ( NCF 2005 )

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण परिचर्चा के अंतर्गत कला शिक्षा के विषय में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अनुशंसायें की गई-
  1. प्रत्येक शाला में कक्षा दसवीं तक कला को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाये। तत्संबंधी संसाधन प्रत्येक स्कूल में मुहैया किये जायें। कला शिक्षा के अंतर्गत मुख्यत: चार विधायें समाहित होती है। संगीत, नृत्य, दृश्यात्मक कलायें एवं थियेटर या नाटक। प्रमुखतया भारतीय पारंपरिक एवं सांस्कृतिक कलाओं पर अधिक प्रकाश डाला जाना चाहिये जो मृतप्राय होती जा रही हैं और मुख्य प्रचलित कला से विलग सी हो रहीं हैं।
  2. शिक्षकों के उन्मुखीकरण द्वारा शाला में पढ़ाये जाने वाले अन्य विषयों को कला के माध्यम से सृजनात्मक ढंग से पढ़ाये जाने के विषय में प्रेरित एवं शिक्षित करने की अनुशंसा की गई। शाला के अधिकारियेां को कला को स्कूल की गतिविधियों एवं पाठयक्रम में आवश्यक एवं उचित स्थान देना चाहिये। उसे अन्येतर गतिविधि तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिये। अभिभावकों, अधिकारियों, नीतिनिर्धारकों का दृ”िटकोण बदलने की आवश्कयता है क्योंकि कला ही वह माध्यम है जिसके द्वारा युवा मस्तिष्क पूर्णरूप से विकसित होता है। शिक्षक को विद्यार्थी के सहयोगी सहायक के रूप में अपनी भूमिका निभाना चाहिये न कि निर्देशक के रूप में ।  कला शिक्षक को यांत्रिकी उपकरणों सहित अधिक से अधिक संसाधन उपलब्ध कराये जाने चाहिये। साथ ही साथ शोध एवं प्रशिक्षण की भी अधिक से अधिक व्यवस्था की जानी चाहिये।
  3. कला की विभिन्न विधाओं के लिये अलग अलग प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता हो।
  4. कला शिक्षण द्वारा विद्यार्थी एक सुसंस्कृत नागरिक बन सकेगा जो कि देश की कला और संस्कृति का सम्मान कर सभ्य नागरिक बन आगामी जीवन को शांतिपूर्ण बिता सकेंगे।

यूनेस्को का दस्तावेज़ 

 कला शिक्षण की प्रासंगिकता की समस्या केवल भारत में ही नहीं थी, बल्कि संपूर्ण विश्व में इसकी महत्ता के लिये सन् 2000 में यूनेस्को के डायरेक्टर जनरल ने कला को स्कूली शिक्षा के लिये अनिवार्य विषय के रूप में स्थापित किये जाने के लिये प्रस्तावित किया। कला शिक्षण द्वारा सृजनात्मकता एवं सांस्कृतिक, शांतिपूर्ण एवं सौहार्दमय वातावरण का विकास संभव है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि विज्ञान, तकनीकी, शारीरिक शिक्षा, सामाजिक विज्ञान के समकक्ष कला शिक्षण को भी मान्यता दी जानी चाहिये जिससे बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक विद्यार्थी का ज्ञान एवं भावनात्मक स्तर पर संतुलन स्थापित हो सकेगा। नाटक की भी शिक्षा में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी होती है। कला शिक्षण द्वारा शरीर एवं मस्तिष्क दोनों की सक्रिय भागीदारी होती है। अन्य विषयों को सीखने में भी कलात्मक गतिविधियाँ सहयोगी होती हैं। विद्यार्थी आक्रोश एवं उदंडता से दूर होकर सृजनशील और ज्ञानवान व्यक्तित्व का धनी हो जाता है।

“A more balanced kind of education is now needed with scientific, technical and sports disciplines, the human sciences and art education placed on an equal footing at the different stages of schooling, during which children and adolescents must be able to accede to a learning process that is beneficial more broadly, to their intellectnal and emotional balance. In that respect play activities as a vital form of creativity, are one of the factors that deserve to be encouraged in the teaching of arts. Art teaching should stimulate the body as well as the mind. By setting the senses in motion, it creates a memory which sharpens the sensitivity of the child and makes him or her more receptive to other forms of knowledge, notably scientific knowledge. Further more it develops individual’s creative faculty and directs their aggressiveness towards the symbolic object of their choice.

इसके अतिरिक्त पुर्तगाल के लिस्बन में 2006 को हुई यूनेस्को की वल्र्ड कान्फ्रेंस के अंतर्गत Road map for Art Education 2006- 2010 में हुई मीटिंग में विद्यार्थी की औपचारिक तथा अनौपचारिक क्वालिटी शिक्षा के लिये कला शिक्षा को विशेष आधार के रूप में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
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