जल संरक्षण के उपाय एवं प्रकार

जीवन के लिए वायु के बाद सबसे जरूरी तत्व जल है। जल ही जीवन है। पृथ्वी पर कुल जल क्षेत्र 1460 मिलियन घन किमी. है। लेकिन यह उपलब्ध जल पूरी तरह से उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है। इस जल का बहुत मामूली अंष ही मनुष्य के पीने और अन्य के उपयोग में लाने हेतु उपयुक्त है। जल की मात्रा कम नहीं है और मनुष्य मात्र कुछ भाग ही उपयोग कर पा रहा है लेकिन इस जल का भी समुचित और समान उपयोग नहीं हो पा रहा है। कुछ देशों में जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है परन्तु कुछ देशों में जल की मात्रा बहुत ही कम है। 

वर्षा भी सभी देशों में समान नहीं होती है जो प्रकृति द्वारा दिया जाने वाला जल है। इस जल की मात्रा भी कहीं बहुत अधिक होती है, कहीं बहुत ही कम। भारत विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाले देशों के द्वितीय स्थान रखता है, जहाँ 1150 मिमी. वार्षिक वर्षा होती है। लेकिन दुर्भाग्य से मुश्किल से 1/4 भाग पानी का ही हम उपयोग कर पाते हैं। शेष पानी समुद्र और महासागरों में जा मिलता है।

देष के कई भाग ऐसे हैं जहाँ भयंकर जल संकट है। पानी का भण्डारण और उचित संरक्षण अत्यन्त आवश्यक है। पानी ऐसा संसाधन है जिसका यदि उचित संरक्षण किया जाये तो इसकी कमी को टाला जा सकता है। एक समस्या यह भी है कि जल को दूषित होने से बचाया कैसा जाये ? जल की जितनी मात्रा उपयोग में आती है उसे प्रदूषण से कैसे बचाया जाये और उस जल को पीने योग्य कैसे बनाया जाये। वर्षा के जल का बहुतायात में उपयोग कैसे किया जाये ? जल संरक्षण के लिए आवश्यक है कि वर्षा के जल का संग्रहण झीलों, तालाबों में किया जाये। पानी बेकार नहीं जाये इसके लिए सिंचाई हेतु पक्की नालियाँ बनाई जायें। नहरों को पक्का किया जाये। 

आजकल जल प्रदूषण एक विकराल समस्या बनती जा रही है। इससे बचाव के लिए जरूरी है कि नदी, तालाब, कुँओं के पानी को प्रदूषण से बचाया जाये। नदियों के जल में सीवेज पाइप, गन्दे नाले तथा नालियाँ गिरती है, उद्योगों का गन्दा पानी बहाया जाता है। मेरे जीव-जन्तु फेंके जाते हैं, कूड़ा-करकट फेंका जाता है। इससे नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है। यह दूषित जल न केवल मानव के पीने के अयोग्य रहता है वरन् जलीय जीव-जन्तुओं को भी इससे खतरा रहता है। वे मृत हो जाते हैं। 

दूषित जल पीने से पीलिया, हैजा, टाइफाइड जैसे रोग हो जाते हैं। इसलिए इस जल स्रोत की शुद्धता और संरक्षण बहुत आवश्यक है। 

जल संरक्षण के उपाय

जल का अभाव अधिकतर मामलों में जल की अत्यधिक बर्बादी एवं अधिक प्रयोग से होता है। यह जल अभाव के मात्रात्मक आयाम हैं। कुछ मूल्यात्मक पहलू जैसे जल प्रदूषण भी हैं। उदाहरण के लिए उत्तरी एवं तटीय क्षेत्रों में स्थिति बड़े शहर जहाँ भूजल की अच्छी मात्रा पाई जाती है। इन शहरों में जल का अभाव अधिक जनसंख्या, ज्यादा माँग एवं असमान आपूर्ति है। घरेलू उपयोग के अतिरिक्त जल संसाधनों का दोहन कृषि भूमि का विस्तार एवं शुष्क जलवायु में कृषि के लिए किया जा रहा है। इस कारण कई शहरों में भूजल का स्तर गिर गया है। उसी प्रकार, उद्योगों ने स्वच्छ जल का दोहन कर स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। 

जल से सम्बन्धित बहुत मुद्दे हैं जबकि लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जल प्रचुर मात्रा में मौजूद है। हाँ, हम इस बात से अवगत हैं कि घरेलू कचरा, औद्योगिक कचरा, रासायनिक पदार्थ, कीटनाशक तथा कृषि के लिए उपयोग में लाए जाने वाली उर्वरक इत्यादि से जल प्रदूषण बढ़ रहा है। 

हमें स्वच्छ जल के बचाव के लिए पूर्ण प्रयास करने चाहिए ताकि हम भविष्य में लोगों के लिए स्वच्छ जल की व्यवस्था कर सकें। इसके अतिरिक्त, हमें जल क्षय, पुनचक्रण एवं पुन: उपयोग के साथ-साथ देश के विभिन्न भागों में पुराने समय में प्रयोग में लाए जाने वाली विधियाँ जिनमें वर्षा जल संरक्षण आदि आते हैं; को प्रयोग में लाना चाहिए। पानी को बाढ़ प्रवृत्त क्षेत्रों से सूखा प्रवृत्त क्षेत्रों में स्थानांतरित करने के प्रयास किए जाने चाहिए। जल संरक्षण के उपाय क्या है? जल की दूषित होने से बचाने के लिए उपाय अपनाये जा सकते हैं-
  1. घर की छतों पर वर्षा का जल एक पाइप के माध्यम से भंडारण टैंक में एकत्र किया जाता है। एक और तरीका यह है कि इन पाइपों को जमीन के गड्ढे में ले जाना चाहिए। ताकि यह पानी भूमिगत जल का स्तर बनाए रखने में सहायता कर सकें।
  2. कूड़ा-करकट, गन्दे नाले, नालियाँ और सीवेज पाइप आबादी से दूर बड़े हौजों या गड्ढे में डाला जाये, नदियों में नहीं डाला जाये।
  3. ऐसे शौचालयों का उपयोग किया जाये जिसमें कम जल की आवश्यकता हो।
  4.  वर्षा के पानी को एकत्र किया जाये और उनका संग्रह स्थान शुद्ध रखा जाये, किसी भी प्रकार के प्रदूषण से उसे बचाया जाये।
  5. अधिक से अधिक पेड़ लगाये जायें।
  6. कुओं, तालाबों, नदियों की सफाई की जानी चाहिए।
  7. प्रकृति द्वारा संरक्षित जल, भू-जल की मात्रा मात्र 4.1 प्रतिषत है, इसका अत्यधिक दोहन न किया जाये, इसको सुरक्षित रखा जाये।
जल प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक ऐसा उपहार है जिसके बिना जीवन जीने की कल्पना करना भी असंभव है। जल हमें जीवन देने के साथ-साथ हमारे अधिकांश कार्यों के लिए आवश्यक है अत: जल को एक संसाधन माना गया है।

जल के प्रकार

जिस जल का हम उपयोग करते हैं वह बहुत ही कम है इसका कारण है विश्व में दो प्रकार के जल होना- 
  1. लवणीय जल - विश्व का लगभग 97.5 प्रतिशत जल लवणीय जल है जो कि खारापन लिये होता है।
  2. अलवणीय जल -विश्व में अलवणीय जल का लगभग 70 प्रतिशत भाग अंटार्कटिका ,ग्रीनलैंड व पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की चादरों और हिमनदों के रुप में मिलता है जबकि 30 प्रतिशत से थोड़ा -सा कम भौमजल के जलभृत के रुप में पाया जाता है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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