विवाह के प्रकार

अनुक्रम
विवाह का एक आधार स्त्री में माँ एवं पुरुष में पिता बनने की इच्छा भी है, जिसकी पूर्ति वैधा रूप में विवाह द्वारा ही सम्भव है। विवाह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को संस्कृति का हस्तान्तरण भी करता है। कुछ समाजों में आर्थिक जीवन विषमलिंगियों के बीच सहयोग एवं श्रम-विभाजन पर आधारित होता है। आर्थिक क्रियाओं को स्त्री-पुरुष द्वारा सामूहिक रूप से सम्पन्न करने की आवश्यकता ने भी विवाह को अनिवार्य बना दिया। इन सभी कारणों से विवाह रूपी संस्था प्रत्येक काल और प्रत्येक समाज में विद्यमान रही है, यद्यपि इसके स्वरूपों में भिन्नता पायी जाती है। भारत में भी विवाह के क्षेत्र में अनेक विभिन्नताएँ पायी जाती हैं। प्राचीन काल से ही यहाँ विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, प्रजातियों, भाषाओं एवं मतों से सम्बिन्धात लोग रहते आये हैं जिनकी प्रथाओं, रीति-रिवाजों, संस्कृतियों, संस्थाओं एवं जीवनदर्शन में भिन्नता पायी जाती है। इस भिन्न्ता ने यहाँ की विवाह संस्था को भी प्रभावित किया है। भारत में विवाह के अनेक रूप जैसे एक-विवाह, बहुपति विवाह, द्वि-विवाह एवं बहुपत्नी विवाह, आदि पाये जाते हैं। कुछ समाजों में विवाह को एक संस्कार माना गया है तो कुछ में एक सामाजिक एवं दीवानी समझौता।

विवाह

विवाह के प्रकार

ब्राह्म विवाह

यह विवाह सभी प्रकार के विवाह में श्रेष्ठ माना गया है। ब्राह्म विवाह को परिभाषित करते हुए लिखा है, वेदों के ज्ञाता शीलवान वर को स्वयं बुलाकर, वस्त्र एवं आभूषण आदि से सुसज्जित कर पूजा एवं धार्मिक विधि से कन्या दान कराना ही ब्राह्म विवाह है।

दैव विवाह

गौतम एवं याज्ञवल्क्य ने दैव विवाह के लक्षण का उल्लेख इस प्रकार किया है-वेदों में दक्षिणा देने के समय पर यज्ञ कराने वाले पुरोहित को अलंकारों से सुसज्जित कन्या दान ही ‘दैव’ विवाह है। इसद्कर्म में लगे पुरोहित को जब वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित कन्या दी जाती है तो इसे दैव विवाह कहते हैं। प्राचीन समय में यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों का अधिक महत्त्व था। जो ऋषिअथवा पुरोहित इन पवित्र धार्मिक कार्यों को सम्पन्न कराता यजमान उससे अपनी कन्या का विवाह कर देता था। इस प्रकार के विवाह से सम्पन्न सन्तान सात पीढ़ी ऊपर की एवं सात पीढ़ी नीचे के व्यक्तियों का उद्धार करा देती है। कुछ स्मृतिकारों ने इस प्रकार के विवाह की आलोचना की है क्योंकि कई बार वर एवं वधू की आयु में बहुत अन्तर होता था। वर्तमान समय में इस प्रकार के विवाह नहीं पाये जाते। अल्टेकर लिखते हैं कि दैव विवाह वैदिक यज्ञों के साथ-साथ लुप्त हो गये।

आर्ष विवाह

इस प्रकार के विवाह में विवाह का इच्छुक वर कन्या के पिता को एक गाय और एक बैल अथवा इनके दो जोड़े प्रदान करके विवाह करता है। गौतम ने धर्मसूत्र में लिखा है, आर्ष विवाह में वह कन्या के पिता को एक गाय और एक बैल प्रदान करता है। याज्ञवल्क्य लिखते हैं कि दो गाय लेकर जब कन्यादान किया जाय तब उसे आर्ष विवाह कहते हैं। गाय और बैल का एक युग्म वर के द्वारा धर्म कार्य हेतु कन्या के लिए देकर विधिवत् कन्यादान करना आर्ष विवाह कहा जाता है। आर्ष का सम्बन्ध ऋषि शब्द से है। जब कोई ऋषि किसी कन्या के पिता को गाय और बैल भेंट के रूप में देता है तो यह समझ लिया जाता था कि अब उसने विवाह करने का निश्चय कर लिया है। कई आचार्यों ने गाय व बैल भेंट करने को कन्या मूल्य माना है, किन्तु यह सही नहीं है, गाय व बैल भेंट करना भारत जैसे देश में पशुधन के महत्त्व को प्रकट करता है। बैल को धर्म का एवं गाय को पृथ्वी का प्रतीक माना गया है जो विवाह की साक्षी के रूप में दिये जाते थे। कन्या के पिता को दिया जाने वाला जोड़ा पुन: वर को लौटा दिया जाता था। इन सभी तथ्यों के आधार पर स्पष्ट है कि आर्ष विवाह में कन्या मूल्य जैसी कोई बात नहीं है। वर्तमान में इस प्रकार के विवाह प्रचलित नहीं हैं।

प्रजापत्य विवाह

प्रजापत्य विवाह भी ब्राह्म विवाह के समान होता है। इसमें लड़की का पिता आदेश देते हुए कहता है तुम दोनों एक साथ रहकर आजीवन धर्म का आचरण करो। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न सन्तान अपने वंश की तरह पीढ़ियों को पवित्र करने वाली होती है। वशिष्ठ और आपस्तम्ब ने प्रजापत्य विवाह का कहीं उल्लेख नहीं किया है। डा. अल्टेकर का मत है कि विवाह के आठ प्रकार की संख्या को पूर्ण करने हेतु ही इस पद्धति को पृथक रूप दे दिया गया।

असुर विवाह

कन्या के परिवार वालों एवं कन्या को अपनी शक्ति के अनुसार धन देकर अपनी इच्छा से कन्या को ग्रहण करना असुर विवाह कहा जाता है। याज्ञवल्क्य एवं गौतम का मत है कि अधिक धन देकर कन्या को ग्रहण करना असुर विवाह कहलाता है। कन्या मूल्य देकर सम्पन्न किये जाने वाले सभी विवाह असुर विवाह की श्रेणी में आते हैं। कन्या मूल्य देना कन्या का सम्मान करना है साथ ही कन्या के परिवार की उसके चले जाने की क्षतिपूर्ति भी है। कन्या मूल्य की प्रथा विशेषत: निम्न जातियों में प्रचलित है, उच्च जातियाँ इसे घृणा की दृष्टि से देखती हैं। स्मृतिकारों ने तो कन्या मूल्य देकर प्राप्त की गयी स्त्री को ‘पत्नी’ कहने से भी इन्कार किया है। इस प्रकार के दामाद के लिए ‘विजामाता’ शब्द का प्रयोग किया गया है। केकेयी, गन्धारी और माद्री के विवाहों में उनके माता-पिता की कन्या मूल्य के रूप में बहुत अधिक धनराशि दिये जाने का उल्लेख मिलता है।

गान्धर्व विवाह

कन्या और वर की इच्छा से पारस्परिक स्नेह द्वारा काम और मैथुन युक्त भावों से जो विवाह किया जाता है, उसे गान्धर्व विवाह कहते हैं। याज्ञवल्क्य पारस्परिक स्नेह द्वारा होने वाले विवाह को गान्धर्व विवाह कहते हैं। गौतम कहते हैं, इच्छा रखती हुई कन्या के साथ अपनी इच्छा से सम्बन्ध स्थापित करना गान्धर्व विवाह कहलाता है। प्राचीन समय में गान्धर्व नामक जाति द्वारा इस प्रकार के विवाह किये जाने के कारण ही ऐसे विवाहों का नाम गान्धर्व विवाह रखा गया है। वर्तमान में हम इसे प्रेम-विवाह के नाम से जानते हैं जिसमें वर एवं वधु एक-दूसरे से प्रेम करने के कारण विवाह करते हैं। इस प्रकार के विवाह में धार्मिक क्रियाएँ सम्बन्ध स्थापित करने के बाद की जाती हैं। कुछ स्मृतिकारों ने इस प्रकार के विवाह को स्वीकृत किया है तो कुछ ने अस्वीकृत। बौधायन धर्मसूत्र में इसकी प्रशंसा की गयी है। वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में इसे एक आदर्श विवाह माना है। दुष्यन्त का शकुन्तला के साथ गान्धर्व विवाह ही हुआ था।

राक्षस विवाह

मारकर, अंग-छेदन करके, घर को तोड़कर, हल्ला करती हुई, रोती हुई कन्या को बलात् अपहरण करके लाना ‘राक्षस’ विवाह कहा जाता है। याज्ञवल्क्य लिखते हैं, ‘राक्षसो युद्ध हरणात्’ अर्थात् युद्ध में कन्या का अपहरण करके उसके साथ विवाह करना ही राक्षस विवाह है। इस प्रकार के विवाह उस समय अधिक होते थे जब युद्धों का महत्त्व था और स्त्री को युद्ध का पुरस्कार माना जाता था। महाभारत काल में इस प्रकार के विवाह के अनेक उदाहरण मिलते हैं। भीष्म ने काशी के राजा को पराजित किया और उसकी लड़की अम्बा को अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाया। श्रीकृष्ण का रुक्मणी एवं अर्जुन का सुभद्रा के साथ भी इसी प्रकार का विवाह हुआ था। राक्षस विवाह में वर एवं वधु पक्ष के बीच परस्पर मारपीट एवं लड़ाई-झगड़ा होता है। इस प्रकार के विवाह क्षत्रियों में अधिक होने के कारण इसे ‘क्षात्र-विवाह’ भी कहा जाता है। आजकाल इस प्रकार के विवाह अपवाद के रूप में ही देखने को मिलते हैं।

पैशाच विवाह

सोयी हुई उन्मत्त, घबराई हुई, मदिरापान की हुई अथवा राह में जाती हुई लड़की के साथ बलपूर्वक कुकृत्य करने के बाद उससे विवाह करना पैशाच विवाह है। इस प्रकार के विवाह को सबसे निकृष्ट कोटि का माना गया है। वशिष्ठ एवं आपस्तम्ब ने इस प्रकार के विवाह को मान्यता नहीं दी है, किन्तु इस प्रकार के विवाह को लड़की का दोष न होने के कारण कौमार्य भंग हो जाने के बाद उसे सामाजिक बहिष्कार से बचाने एवं उसका सामाजिक सम्मान बनाये रखने के लिए ही स्वीकृति प्रदान की गयी है।

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