ऐतिहासिक भौतिकवाद का अर्थ एवं परिभाषा

अनुक्रम
ऐतिहासिक भौतिकवाद मार्क्स के विचारों की धूरी है। यह सिद्धान्त इतिहास, संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन की सभी आदर्शवादी व्याख्याओं को नकारता है। मानवशास्त्रीय दर्शन पर आधारित यह सिद्धान्त इतिहास की व्याख्या मानव द्वारा सामाजिक विश्व के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिये किये गये आर्थिक प्रयत्नों और मूलभूत आर्थिक विभिन्नताओं के कारण उत्पन्न वर्ग संघर्ष के रूप में करता है।

कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्तों में ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धान्त एक प्रमुख सिद्धान्त है। इससे सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में एक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। यह मानव इतिहास की गतिविधि को नियन्त्रित करता है। इस सिद्धान्त के द्वारा मार्क्स ने हीगल द्वारा प्रस्तुत इतिहास की आदर्शात्मक व्याख्या के स्थाप पर अपनी भौतिवादी व्याख्या की प्रतिष्ठा की है। ऐतिहासिक भौतिकवाद की बुनियादी बातों को मार्क्स ने अपनी कृति जर्मन विचारधारा में प्रस्तुत की है। मार्क्स को यह मूलभूत ऐतिहासिक नियम भौतिक मूल्यों के उत्पादन में समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियों से प्राप्त हुआ था। मार्क्स ने अपने इस सिद्धान्त में बताया है कि सामाजिक-आर्थिक संरचना में होने वाले परिवर्तन कुछ निश्चित वस्तुनिष्ठ नियमों के अन्तर्गत आते हैं। इसके परिणामस्वरूप एक प्रकार की सामाजिक-आर्थिक संरचना ले लेती है। ऐतिहासिक भौतिकवाद इतिहास की उस दिशा की खोज करता है जो सभी निर्णायक ऐतिहासिक घटनाओं को चलाने वाली महत्वपूर्ण शक्ति है। मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सम्बन्ध में एंगेल्स ने लिखा है कि मार्क्स पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा को समाजविज्ञानों में रखा। ऐतिहासिक भौतिक के अतिरिक्त मार्क्स का दूसरा बड़ा योगदान अतिरिक्त मूल्य का है। मार्क्स ने अपने ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धान्त को दार्शनिक विवेचना के आधार पर निरूपित किया है। मार्क्स ने पूंजीवाद की नृशंस कार्यवाही को नजदीक से देखा था। इसलिए उन्होंने लिखा कि दार्शनिकों ने विभिन्न विधियों से विश्व की केवल व्याख्या की है, लेकिन प्रश्न विश्व को बदलने का है। मार्क्स एवं हीगल के दर्शन के सम्बन्ध में सेबाइन ने राजनैतिक दर्शन का इतिहास में लिखा है, ‘दोनों व्यक्ति इतिहास के प्रवाह को तर्कसंगत ढंग से आवश्यक मानते थे। उनका विचार था कि यह प्रवाह एक सुनिश्चित योजना के अनुसार संचालित होता है और एक सुनिश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ता है।

मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सारतत्व कहे जा सकते हैं-
  1. जीवन एवं जीवित रहने के लिए आवश्यक भौतिक वस्तुओं या मूल्यों के उत्पादन एवं पुन: उत्पादन पर ऐतिहासिक विकास निर्भर करता है।
  2. मानव अस्तित्व के लिए सर्वप्रथम उसका जिन्दा रहना आवश्यक है। इसके लिए भोजन, वस्त्र एवं आवास सर्वप्रथम आवश्यकता है।
  3. मनुष्य को पहले भोजन, वस्त्र एवं आवास चाहिए। इसके बाद ही वह धर्म कला, आदर्श एवं राजनीति के सम्बन्ध में सोचता है। इस सम्बन्ध में मार्क्स एवं एंगेल्स ने ‘The German Ideology’ में लिखा है, ‘सर्वप्रथम ऐतिहासिक कार्य उन साधनों का उत्पादन है जिससे कि भोजन, वस्त्र और आवास आदि की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके, अर्थात् स्वयं भौतिक जीवन का उत्पादन ही सर्वप्रथम ऐतिहासिक कार्य है। वास्तव में, यही एक ऐसा ऐतिहासिक कार्य है जो कि हजारों वर्ष पहले की भांति आज भी मानव जीवन को बनाये रखने के लिए परम आवश्यक है अर्थात् समस्त इतिहास की एक बुनियादी शर्त है।’
  4. उत्पादन प्रणाली ही समाज के संगठन और उसकी विभिन्न संस्थाओं अर्थात् ऐतिहासिक घटनाओं को निर्धारित करती है।
  5. इतिहास में सभी प्रमुख परिवर्तन उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन के कारण ही हुए हैं।
  6. इतिहास का विकास विचार, आत्मा या आदर्श पर आधारित नहीं होता है बल्कि उसका वास्तविक आधार समाज का आर्थिक जीवन, उत्पादन शक्ति एवं उत्पादन सम्बन्ध है।
  7. भौतिक मूल्यों के उत्पादन क्रिया में सबसे आधारभूत, सबसे अधिक आवश्यक एवं सबसे अधिक सामान्य ऐतिहासिक घटना है। इतिहास का निर्माण असंख्य साधारण व्यक्तियों के द्वारा होता है।

विभिन्न युगों में भौतिकवादी व्याख्या

मार्क्स के अनुसार उत्पादन प्रणाली के प्रत्येक परिवर्तन के साथ लोगों के आर्थिक सम्बन्ध एवं सामाजिक व्यवस्था आदि में भी परिवर्तन हो जाता है। उन्होंने इस दृष्टिकोण से मानव इतिहास को पांच युगों में विभाजित किया है। ये पांच युग हैं- आदिम साम्यवादी युग, दासत्व युग, सामन्तवादी युग, पूंजीवादी युग तथा समाजवादी युग। मार्क्स का कथन है कि इनमें से तीन युग समाप्त हो चुके हैं, चौथा युग चल रहा है एवं पांचवा अभी शेष है। ये पांच युग हैं- 1. आदिम साम्यवादी युग 2. दासत्व युग 3. सामन्तवादी युग 4. पूंजीवादी युग और 5. समाजवादी युग।

आदिम साम्यवादी युग

यह युग इतिहास का प्रारम्भिक युग है। इस युग में उत्पादन के साधन किसी व्यक्ति-विशेष के नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के होते थे। उत्पादन और वितरण साम्यवादी ढंग से होता था। पहले-पहल पत्थर के औजार और बाद में तीर-धनुष से लोग फल-मूल इकट्ठा करते तथा पशुओं का शिकार करते थे। जंगलों से फल इकट्ठा करने, पशुओं का शिकार करने, मछली मारने, रहने के लिए किसी न किसी प्रकार का ‘घर’ बनाने और ऐसे ही अन्य कार्यों में सब लोग मिल-जुलकर काम करने को बाध्य होते थे, क्योंकि परिस्थितियां ही कुछ इस प्रकार की थीं कि ये सब काम अकेले नहीं किये जा सकते थे। संयुक्त श्रम के कारण ही उत्पादन के साधनों पर तथा उनसे मिलने वाली वस्तुओं पर सबका अधिकार होता था। उस समय उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत अधिकार की धारणा का अभाव था। इसलिए वर्ग-प्रथा न थी, और न ही किसी प्रकार का शोषण।

दासत्व युग

इसके बाद दासत्व युग का आविर्भाव हुआ। दास-व्यवस्था के अन्तर्गत उत्पादन के साधनों पर दास के मालिकों का अधिकार होता था, साथ ही साथ उत्पादन कार्य को करने वाले श्रमिकों अर्थात् दासों पर भी उनका अधिकार होता था। इन दासों को उनके मालिक पशुओं की भांति बेच सकते थे, खरीद सकते थे या मार सकते थे। इस युग से खेती और पशुपालन का आविष्कार हुआ और धातुओं के औजारों को उपयोग में लाया गया। इस युग में निजी सम्पत्ति की धारणा विकसित हुई, सम्पत्ति कुछ लोगों के हाथों में अधिकाधिक एकत्र होने लगी तथा सम्पत्ति के अधिकारी इस अल्पसंख्यक ने बहुसंख्यक को दास बनाकर रखा। पहले की भांति अब लोग स्वेच्छा से मिल-जुलकर काम नहीं करते थे, बल्कि उन्हें दास बनाकर उन्हें जबरदस्ती काम लिया जाता था। इस प्रकार समाज दो वर्गों- दास तथा अनेक मालिक में बंट गया। इस शोषक तथा शोषित वर्गों में संघर्ष भी स्वाभाविक था।

सामन्तवादी युग

तीसरा युग सामन्तवादी युग था। इस युग में उत्पादन के साधनों पर सामन्तों का आविष्कार होता था। ये सामन्त उत्पादन के साधनों, विशेषत: भूमि के स्वामी होते थे। गरीब अर्द्ध-दास किसान इन सामन्तों के अधीन थे। उत्पादन का कार्य इन्हीं भमिहीन किसानों से करवाया जाता था। किसान दास न थे, पर उन पर अनेक प्रकार के बन्धन थे। इन्हें सामन्तों की भूमि की भी जुताई-बुआई आदि बेगार के रूप में करनी पड़ती थी और युद्ध के समय उनको सेना में सिपाहियों के रूप में काम करना पड़ता था। इन सबसे बदले में उन्हें अपने सामन्तों से अपने निर्वाह के लिए भूमि मिलती थी। निजी सम्पत्ति की धारणा इस युग में और भी प्रबल हुई और सामन्तों द्वारा किसानों का शोषण भी प्राय: दासत्व युग की भांति होता था। इन दोनों में संघर्ष और भी स्पष्ट था।

पूंजीवादी युग

चौथा युग आधुनिक पूंजीवादी युग है। इस युग का प्रादुर्भाव मशीनों के आविष्कार तथा बड़े-बड़े उद्योग-धन्धों के जम्न के फलस्वरूप हुआ इस युग में उत्पादन के साधनों पर पूंजीपतियों का अधिकार होता है। उत्पादन कार्य करने वाला दूसरा वर्ग-वेतनभोगी श्रमिक-व्यक्तिगत रूप से स्वतन्त्र होते हैं; इस कारण दासों की भांति उन्हें पूंजीपति लोग बेच या मार नहीं सकते हैं, परन्तु चूंकि उत्पादन के साधनों पर श्रमिकों का कुछ भी अधिकार नहीं होता, इस कारण अपने तथा अपने परिवार के अन्य सदस्यों की भूखों मरने से बचाने के लिए उन्हें अपने श्रम को पूंजीपतियों के हाथ बेचना पड़ता है जोकि उन्हें नाम-मात्र का वेतन देते हैं। पूंजीपतियों के इस प्रकार के उत्तरोत्तर बढ़ने वाले शोषण के फलस्वरूप श्रमिकों की दशा दिन-प्रतिदिन अधिक दयनीय होती जायेगी और अन्त में श्रमिक वर्ग बाध्य होकर क्रान्ति के द्वारा पूंजीपतियों को उखाड़ फेकेगा। इस प्रकार सर्वहारा के अधिनायकत्व की स्थापना होगी और समाजवादी या साम्यवादी युग के आगमन का पथ प्रशस्त होगा।

आधुनिकतम युग

पांचवां और आधुनिकतम युग होगा समाजवादी या साम्यवादी युग। यह युग सर्वरूप में वर्ग-विहीन, राज्य-विहीन और शोषण रहित होगा। जैसाकि पहले भी कहा गया है, यह तभी संभव होगा जबकि पूंजीवादी व्यवस्था को खूनी क्रान्ति के द्वारा श्रमिक वर्ग उखाड़ फेकेगा और शासकीय शक्ति पर अपना अधिकार जमा लेगा। परन्तु श्रमिक वर्ग के हाथ में शक्ति आ जाने से ही समाजवाद की स्थापना या समाजवादी व्यवस्था संभव न होगी क्योंकि पूंजीवादी वर्ग का सम्पूर्ण विनाश उस स्तर पर भी न होगा और उस स्तर के बचे-खुचे लोग रह ही जायेंगे जो उस नवीन समाजवादी व्यवस्था को उलट देने का प्रयत्न करेंगे। इन लोगों का विनाश धीरे-धीरे ही होगा और इसके लिए आवश्यक तैयारी की आवश्यकता होगी। नये सिरे से समस्त समाज का पुनर्निमाण करना होगा। यही संक्रमणकालीन युग होगा। इस युग में राज्य का प्रमुख कार्य निम्नलिखित होगा-भूमि के व्यक्तिगत स्वामित्व, व्यापार तथा वाणिज्य का नियमन, सम्पत्ति के उत्तराधिकार को उन्मूलन, कारखानों में बाल-श्रम का निषेध और प्रत्येक प्रकार के एकाधिकारों या विशेषाधिकारों का अन्त करना।

सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि मार्क्स से पूर्व समाज के विकास की व्याख्या हीगल के आदर्शवादी दर्शन के आधार पर की जाती थी। हीगलवादी दर्शन के अनुसार समाज में सर्वप्रथम वाद आता है और समाज को कुछ वादों के साथ संचालित करता है। परन्तु कोई भी वाद अपने आप में पूर्ण नहीं होता है। वह समाज के विकास को पूर्ण रूप सही दिशा नहीं दे पाता जिसके कारण समाज में उसके खिलाफ कुछ प्रतिवाद भी उत्पन्न होते हैं और यह प्रतिवाद जब समाज में बड़े पैमाने पर प्रसारित हो जाता है तो उसका वाद के साथ संघर्ष होता है जिसके कारण वाद को प्रतिवाद के साथ कुछ समझौते करने पड़ते हैं जिससे एक नई स्थिति उत्पन्न होती है, उसे संवाद कहते हैं और कालान्तर में यह समाज के लिए वाद हो जाता है। परन्तु कुछ समय बाद इसकी भी कमियां स्पष्ट होने लगती हैं और प्रतिवाद उत्पन्न होता है। इस प्रकार सामाजिक विकास की गति चलती रहती है। यही हीगल का द्वन्द्वात्मक आदर्शवाद है।

मार्क्स ने देखा कि समाज में द्वन्द्वात्मक विकास तो है परन्तु उसका आधार वैचारिक न होकर भौतिकवादी है और उसने कहा कि एक उत्पादन प्रणाली आती है और जब वह समाज की पूर्वापेक्षी आशाओं पर खरी नहीं उतरती है तो उसकी जगह दूसरी उत्पादन प्रणाली जन्म लेती है और एक नये समाज का निर्माण होता है और इस तरह समाज का विकास होता रहता है और समाज के विकास एवं परिवर्तन की यह धारा तब तक चलती रहेगी जब तक समाज मे साम्यवादी व्यवस्था स्थापित न हो जाये।

ऐतिहासिक भौतिकवाद की मूल मान्यतायें

हीगलवादी दर्शन की यह मान्यता थी कि समाज अपने आप में संतुलन की अवस्था में होता है। परन्तु मार्क्स ने कहा कि समाज में हमेशा संतुलन ही नहीं होता। उसमें असंतुलन, असमानता तथा भेद भी व्याप्त होता है जिसके कारण वर्ग संघर्ष होता रहता है।ऐतिहासिक भौतिकवाद समाज की असमानता के अध्ययन का एक विशेष विज्ञान है जिसके द्वारा आर्थिक असमानता के साथ-साथ हम अधिसंरचनात्मक असमानता का भी अध्ययन कर सकते हैं।

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