अस्तित्ववाद के प्रमुख विचारक

अनुक्रम

अस्तित्ववाद बीसवीं सदी का दर्शन है हालांकि यह संज्ञान में काफी पहले आ गया था। अस्तित्ववाद से हमारा परिचय साहित्यिक आंदोलन के रूप में होता है। अस्तित्ववाद में सिद्धांत व विचार की अपेक्षा व्यक्ति के अस्तित्व को महत्व दिया गया। वह उन सभी मान्यताओं, सिद्धांतों व संस्थाओं का विरोध करता है जो मानवीय गरिमा व उसके अस्तित्व को गौण बनाते हैं। अस्तित्व, मानवीय गरिमा, कर्म, सत्य, दु:ख, वेदना व निराशा इत्यादि को महत्त्व देने वाला यह दर्शन अपना महत्व रखता है।

अस्तित्ववाद के प्रमुख विचारक 

अस्तित्ववाद का आरंभ जर्मनी से माना जाता हैं। इस दर्शन को विकसित करने में सॉरेन कीर्केगार्द, ग्रेबियल मार्शल, नीत्शे, मार्टिन हेडेगर, कार्ल जैस्पर्स, अल्बेयर कामू व ज्यां पाल सार्त्र का नाम प्रमुख हैं इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

सारेन कीर्केगार्द- 

कीर्केगार्द को अस्तित्ववाद का प्रवर्तक माना जाता है। डेनमार्क में 5 मई सन् 1813 ई. में इनका जन्म हुआ। इन्होंने ईश्वर की सत्ता को माना है मगर कीर्केगार्द ने श्रद्धा को मनुष्य की आंतरिक वस्तु स्वीकार किया। उन्होंने निराशा को भी महत्त्व दिया। इनके दर्शन में आत्मनिष्ठा भी विद्यमान है। मनुष्य के अकेलेपन को सबसे पहले इन्होंने ही अनुभव किया। नीत्शे- नीत्शे ने अपने प्रसिद्ध वाक्य ‘र्इश्वर की मृत्यु हो गयी है’ के द्वारा नवीन जीवन मूल्यों की अपेक्षा की है। इन्हें अतर्कवादी दार्शनिक भी कहा गया है। उन्होंने अतिमानव की कल्पना की जो समाज में पाशविक वृत्तियों का दमन कर मानवता को पुनस्र्थापित करे या मनुष्य को सबल बनाए। नाजियो ने उनको गलत अर्थ में ग्रहण किया।

व्यक्ति के दु:ख, संतोष का चित्रण, मृत्यु का स्वागत, समाजवाद व हीगेल की मान्यताओं का विरोध भी नीत्शे ने किया। मार्टिन हेडेगर- वह स्वयं को अस्तित्ववादी नहीं मानते। उन्होंने मनुष्य का ही ऐतिहासिक अस्तित्व माना। संत्रास, मृत्यु संबंधी चर्चा व शून्य को महत्व प्रदान किया। मृत्यु को वह अर्थपूर्ण जीवन की कुंजी मानते हैं। उन्होंने व्यक्ति के साथ उसकी भाषा व जगत को भी महत्व दिया। उन्होंने अस्तित्व का अर्थ संभावना से लिया। चुनाव की स्वतंत्रता और इस स्वतंत्रता की पहचान को अस्तित्व का सार तत्व माना। हेडेगर को ‘जीवन विद्या का दार्शनिक’ कहा जाता है।

कार्ल जैस्पर्स

कार्ल जैस्पर्स को आधुनिक अस्तित्ववाद का प्रवर्तक माना गया। साथ ही उन्हें ‘तर्क का दार्शनिक’ भी माना जाता है। उन्होंने व्यक्ति के आंतरिक अस्तित्व को ही स्वतंत्र रूप में स्वीकार किया है। मनुष्य को बौद्धिक, भौतिक व ऐतिहासिक बंधनों में बंधा हुआ माना तथा कर्म को महत्व दिया। ग्रैबियल मार्सल- इनका ईश्वर में विश्वास था। अस्तित्व व आधिपत्य के बीच द्वंद्व दर्शन का मूल आधार रहा इन्होंने आशा को महत्व दिया। चुनौती, निर्णय, उत्तरदायित्व व मूल्यांकन को मानव अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण माना।

अल्बेयर कामू

 कामू ने स्वतंत्रता, भाईचारे व सौहार्द को महत्त्व दिया। उन्हें विसंगति का दार्शनिक माना गया। विसंगति से बचने के लिए विद्रोह जरूरी माना है। कामू ने माक्र्सवाद का समर्थन किया। वह मानवीय मूल्यों, नैतिक मूल्यों, कर्म में विश्वास करते थे। इतिहास को सृजित करने की बात भी वह स्वीकारते हैं। अलगाव व तानाशाही का उन्होंने विरोध किया। उन्हें 1957 में नोबेल पुरस्कार मिला। प्रभा खेतान ने उनके अस्तित्ववाद को मानववाद कहा है। मानवीय गरिमा को वह श्रेष्ठ मानते थे। अहिंसा, शांति की बात भी कामू ने उठाई है।

ज्यां पाल सार्त्र

ज्यां पाल सार्त्र का नाम अस्तित्ववादियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। सार्त्र का जन्म पेरिस में 1905 ई. में हुआ था। सार्त्र अस्तित्व को सार से पहले मानते हैं। स्वतंत्रता, कर्म को महत्ता प्रदान की। उनका मानना था कि व्यक्ति वही है जैसा वह स्वयं को बनाता है। मृत्यु को सभी संभावनाओं का अंत माना। सार्त् रईश्वर को अस्वीकार करते हैं उनका मानना था कि ईश्वर के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। कामू की तरह सार्त्र भी माक्र्सवाद के समर्थक थे। इसके साथ ही मनोविश्लेषण को भी महत्व दिया। बैडफेथ का वह विरोध करते हैं।

इसके अतिरिक्त निराशा, अकेलेपन, त्रासदी, अलगाव, बाजारवाद, संवेग, चेतना व इगो को उन्होंने विश्लेषित किया। सार्त्र ने नोबेल पुरस्कार लेने से अस्वीकार कर दिया था। जनहित के समर्थक इस लेखक ने नोबेल पुरस्कार को बुर्जुवावादी संस्था का ही रूप माना। दॉस्तोवस्की- दॉस्तोवस्की में स्वतंत्रता, अकेलापन व व्यैक्तिकता देखने को मिलती है। वह समाजवाद के समर्थक थे तथा क्रांति को ‘अराजकता’ के समान माना।

फ्रेंज काफ्का

सन् 1883 र्इ0 में प्राग में इनका जन्म हुआ। इनका साहित्य महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता, संघर्ष, अलगाव व प्रेम का चित्रण इनके साहित्य में हुआ है। ये अलगाव का विरोध करते हैं। इसके अलावा हुर्सेल, बर्दिएफ आदि का भी अस्तित्ववादी चिंतकों में महत्त्वपूर्ण स्थान है।

अस्तित्ववाद दर्शन के सिद्धांत 

अस्तित्ववाद दर्शन के अपने कुछ सिद्धांत है, जिसके विषय में हमारा ज्ञान आवश्यक है और ये सिद्धांत है-
  1. व्यक्तिगत मूल्यों एवं प्रयासों को महत्व दिया जाना। 
  2. अस्तित्ववाद व्यक्तिगत मनुष्य की स्वतंत्रता एवं मुक्ति पर बल देता है। मुक्ति असीमित है। 
  3. अस्तित्ववाद सर्वश्रेण्ठता के अन्तयुर्द्ध से उठकर नैतिक बनकर साथ रहने पर बल देता है। 
  4. अस्तित्ववाद मनोविश्लेषणात्मक विधियों को अपनाने में विश्वास करता है। 
  5. अस्तित्ववाद मानव के अस्तित्व में विश्वास करता है, इसका आभास हमें प्रो0 ब्लैकहोम शब्दों में निम्नलिखित रुप में मिलता है-’’अस्तित्ववाद सद्भाव या सत्तावाद का दर्शन है, प्रमाणित तथा स्वीकार करने और सत्ता का विचार करने और तर्क करने को न मानने का दर्शन है।’’

अस्तित्ववाद एवं शिक्षा 

अस्तित्ववादी दर्शन इतना क्रान्तिकारी तथा जटिल है कि शिक्षा की दृष्टि से इस पर कुछ कम विचार हुआ है। अस्तित्ववाद का पादुर्भाव एक जर्मन दार्शिनिक हीगेल के ‘‘अंगीकारात्मक या स्वीकारात्मक’’ आदर्शवाद का विरोध है। हम पूर्व में भी पढ़ चुके है कि यह अहंवादी दर्शन की एक खास धारा है।’’ मानव को चेतना युक्त, स्वयं निर्णय लेने अपने जीवन दशाओं को तय करने के योग्य मानते है तो ऐसी दशा में शिक्षा की आवश्यकता स्वयं सिद्ध हो जाती है। भारतीय दर्शन में इस दर्शन का प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ। परन्तु पाण्चात्य दर्शन ने इसका उल्लेख स्पष्ट रुप में मिलता है। अस्तित्ववाद के शैक्षिक विचार पर प्रथम पुस्तक 1958 में प्रकाशित हु और इस ओर मुख्य योगदान प्रो0 मारिस, प्रो0 नेलर तथा प्रो0 ब्रूबेकर आदि का है।

अस्तित्ववादी शिक्षा का अर्थ -  

अस्तित्ववादी शिक्षा को मनुष्य की एक क्रिया या प्रवृत्ति मानते है। शिक्षा मनुष्य के अपने व्यक्तिगत अनुभूति के रुप में पायी जाती है। अस्तित्ववादी शिक्षा को मनुष्य को अपने अस्तित्व की प्रदर्शित करने का माध्यम मानते है। अस्तित्ववादी के अनुसार शिक्षा व्यक्तिगत प्रयास है।

अस्तित्ववाद एवं शिक्षा के उद्देश्य  -

प्रा0े आडे के अनुसार अस्तित्ववादी शिक्षा के उद्देश्य अग्राकित अविधारणा पर आधारित है- 1. मनुष्य स्वतंत्र है, उसकी नियति प्रागनुभूत नहीं हैं। वह जो बनना चाहें, उसके लिए स्वतंत्र है। 2. मनुष्य अपने कृत्यो का चयन करने वाला अभिकरण है उसे चयन की स्वतंत्रता है। इनके आधार पर उद्देश्य निर्धारित है-
  1. स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास-चयन करने वाला अभिकरण होने के नाते चयन प्रक्रिया में व्यक्ति को समग्र रुप से अन्त:ग्रसित हो जाना पड़ता है। अत: शिक्षा का यह उद्देश्य है कि वह बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करे।
  2. व्यक्तिगत गुणों व मूल्यों का विकास:-अस्तित्ववादी मानते है कि मानव स्वयं अपने गुणों एव मूल्यों को निर्धारित करता है। अत: शिक्षा को बालक में व्यक्तिगत गुणों और मूल्यों विकास की योग्यता विकसित करनी चाहिए। 
  3. मानव में अहं व अभिलाषा का विकास करना-इस सम्बन्ध में प्रो0 मार्टिन हीडेगर का कथन है-’’सच्चा व्यक्तिगत अस्तित्व ऊपर से थोपे गये और अन्दर से इच्छित किये गये अभिलाषाओं का संकलन है।’’ अत: अस्तित्ववाद यह मानता है कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की अहं भावना के साथ अभिलाषा का भी विकास करना होना चाहिये। 
  4. वास्तविक जीवन हेतु तैयारी:-मानव अस्तित्व जीवन में यातना एवं कष्ट सहकर ही रहेगी। अत: अस्तित्ववादियों के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक को इस योग्य बनाना है कि वह भावी जीवन में आने वाले संघर्षो, कष्टों और यातनाओं को सहन कर सके जो उत्तरदायित्व पूर्ण जीवन में आ सकते है। अस्तित्ववादी मृत्यु की शिक्षा देने के पक्ष में है। 
  5. व्यक्तिगत ज्ञान या अन्तर्ज्ञान का विकास करना:-इस सम्बन्ध में प्रा0े बिआउबर का कहना है-’’मानव एक पत्थर या पौधा नहीं है’’ और अस्तित्ववाद इसके अनुसार दो-बाते मानते है कि मनुष्य अपनी बुद्धि और सूझ बूझा से काम करते है अत: अस्तित्ववादियों के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तिगत सहज ज्ञान या अन्तर्ज्ञान का विकास करना है और मानव को अपने क्रियाओं हेतु निर्णय लेने में सहायता देना है।

अस्तित्ववादी शिक्षा में शिक्षक एवं शिक्षार्थी

अस्तित्ववाद के अनुसार हमे छात्र के अस्तित्व को महत्व देना चाहिये। अस्तित्ववादी विद्यार्थी के कुछ कर्तव्य निर्धारित करते है। विद्यार्थी स्वयं में महत्वपूर्ण और सन्निहित होते है। अस्तित्ववाद के अनुसार, विद्यार्थी एक मुक्त या निश्चित परिश्रमों एवं विचारणील प्राणी होता है। विद्यार्थियों की शिक्षा अलग-अलग प्रकार से उनकी योग्यता एवं व्यक्तित्व के अनुसार होनी चाहिए। प्रत्येक विद्यार्थी को अपने व्यक्तित्व के विकास एवं पूरा ध्यान देना चाहिये। अस्तित्ववादी बालक के व्यक्तित्व में इन गुणों की परिकल्पना करते है-
  1. आत्मबोध, आत्मनियर्णय या आत्मनियंत्रण की शक्ति। 
  2. आत्मशुद्धि व आत्मकेद्रिता के गुण। 
  3. विचारों, एवं इच्छाओं को प्रकट करने की क्षमता। 
  4. सौन्दर्यबोध की क्षमता। 
  5. जीवन पर्यन्त ज्ञान की इच्छा का विकसित करते रहने की क्षमता। 
  6. अध्यापक के साथ सम्बन्ध स्थापन की क्षमता। 
  7. भावात्मक पक्ष की सुदृढ़ता
जैसा कि छात्र संकल्पना में स्पष्ट किया गया है कि अस्तित्ववाद स्वतंत्रता में विश्वास करता है। अस्तित्ववादी अध्यापको को स्वतंत्र विचार करने वाला स्वेच्छा से काम करने वाला, स्वतंत्र मूल्यों को स्थापित करने वाला, आशावादी, व्यावहारिक एवं निर्भीक होना चाहियें। अस्तित्ववादी मानते है कि अध्यापक में विद्यार्थी को उसके अनुकूल तैयार करने की अभिक्षमता होनी चाहिए। शिक्षक को जीवन के वास्तविक अनुभव प्राप्त कर उसके अनुकूल विद्यार्थी तैयार करने हेतु तैयार रहना चाहिये। अस्तित्ववादी यह मानते है कि विद्यार्थियों को आत्मानुभूति के लिए तैयार करना चाहिए और विद्यार्थियों को निजता की अनुभूति करते हुये जीवन के सत्य का बोध कराये। अस्तित्ववादी अनुभूति के माध्यम से विद्यार्थी के व्यक्तित्व का विकास करे और इस प्रकार से अस्तित्ववादियों के अनुसार शिक्षक के दायित्व बहुत अधिक है और उसमे विशेष गुण की आवश्यकता होगी उससे अपेक्षा की जाती है कि-
  1. वह विषय सामग्री के प्रस्तुतिकरण में विद्यार्थियों को उसके सत्य के खोज के लिए स्वतंत्रता प्रदान करे।
  2. विद्यार्थियों में मस्तिष्क का स्वयं संचालक एवं नियंत्रण की क्षमता विकसित करे। 
  3. विद्यार्थियों को चरित्र गठन कर स्वयं सिद्ध सत्य मानने की क्षमता उत्पन्न करे। 
  4. विद्यार्थियों को चयन करने की स्वतंत्रा प्रदान करें। 
  5. विद्यार्थियों को स्वयं की अनुभूति करने का अवसर प्रदान करे।

अस्तित्ववादी पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियाँ

पाठ्यक्रम-

अस्तित्ववादी जैसा कि पढ चुके है व्यक्ति की वैयक्तिकता को महत्व देता है। अत: यह स्पष्ट है कि पाठ्यक्रम में हम ऐसे विशेषताओं को अवश्य पायेंगे जिनमें मानव जीवन का अस्तित्व प्रधान है। अस्तित्ववादी पाठ्यक्रम को विशाल रखना चाहते है। क्योकि उसमें सम्पूर्ण परिवेश (प्रकृति एवं जीवन) का अनुभव सम्मिलित हो पायेगा। अस्तित्ववाद समाज विज्ञान को स्थान प्रदान करता है पर फिर भी यह पक्ष विचारणीय रहता है कि इसके अध्ययन द्वारा विद्याथ्र्ाी को अपने आप की निरीहता तथा अस्तित्व हीनता का अहसास करवाया जाता है। अस्तित्ववादी वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन को महत्व नही देता है क्योकि वैज्ञानिक अध्ययन निवर्ैयक्तिक होता है। उसमे निजता समाप्त होती है। अस्तित्ववादी वैज्ञानिक सत्य को पूर्ण सत्य नहीं मानते है। उनके अनुसार व्यक्ति द्वारा जो चयन किया जाता है वहीं पूर्ण सत्य एवं स्वीकार्य है। अस्तित्ववादी पाठ्यक्रम में कला, साहित्य, इतिहास, विज्ञान, भूगोल, संगीत, दर्शन, मनोविज्ञान, तथा वििभान्न विषयों एवं क्रियाओं को विशेष स्थान दिया जाता है। कला खेलकूद एवं व्यायाम को यथोचित स्थान मिलना चाहिए क्योकि यह विद्यार्थियों के अस्तित्व को स्पष्ट करते हुए संसार को ज्ञान देते है एवं स्वतंत्र आत्मप्रकाशन का अवसर देते है।

शिक्षण विधि-

अस्तित्ववादी ज्ञान मिमासा के अनुसार व्यक्ति स्वयं अपने प्रयत्नों से ज्ञान प्राप्त करता है। जो भी धारणाएँ तथ्य आदि उसने ग्रहण किये है। और उसका उत्तरदायित्व उसका स्वयं है। ज्ञान मानवीय होता है।अस्तित्ववादी सामूहिक विधि का विरोध करते है। वह शिक्षण प्रक्रिया को पूर्णतया व्यक्ति केन्द्रित बनाने के प्रबल समर्थक है। सामूहिक विधि वैयक्तिकता के विकास में बाधक है। विद्यार्थी को एकल शिक्षा दी जानी चाहियें। पश्थक शिक्षा के साथ ‘‘स्वप्रयत्न द्वारा शिक्षा’’ का अवसर दिया जाना चाहिये। अन्तर्ज्ञान विधि की परिस्थितिया भी विद्यार्थी को दी जानी चाहियें। अस्तित्ववादी प्रश्नोत्तर विधि से प्रयोग को भी आवश्यक मानते है। क्योकि यह बालक को प्रदर्शन का अवसर उपलब्ध कराती है। अस्तित्ववादी आत्मीकरण के साथ समस्या विधि के प्रयोग को उचित मानते है क्योकि इससे वैयक्तिक योग्यता एवं आत्मदर्शन का पूरा अवसर मिलता है। शिक्षा में अस्तित्ववाद का पूर्णरुपेण नूतन है परन्तु व्यक्तिवादी विचार के कारण शिक्षा मे इसका प्रभाव काफी स्पष्ट है क्योंकि वर्तमान स्वतंत्र युग में व्यक्ति महम्वपूर्ण हो गया है।

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