अस्तित्ववाद का अर्थ, परिभाषा, मान्यताए, महत्व एवं कमियाँ

अनुक्रम

अस्तित्ववाद बीसवीं सदी का दर्शन है हालांकि यह संज्ञान में काफी पहले आ गया था। अस्तित्ववाद से हमारा परिचय साहित्यिक आंदोलन के रूप में होता है। अस्तित्ववाद में सिद्धांत व विचार की अपेक्षा व्यक्ति के अस्तित्व को महत्व दिया गया। वह उन सभी मान्यताओं, सिद्धांतों व संस्थाओं का विरोध करता है जो मानवीय गरिमा व उसके अस्तित्व को गौण बनाते हैं। अस्तित्व, मानवीय गरिमा, कर्म, सत्य, दु:ख, वेदना व निराशा इत्यादि को महत्त्व देने वाला यह दर्शन अपना महत्व रखता है।

अस्तित्ववाद का अर्थ एवं परिभाषा

शब्दकोश में अस्तित्व का अर्थ माना गया है- ‘सत्ता का भाव, विद्यमानता होना, मौजूदगी।’डॉ0 गणपति चंद्र गुप्त अस्तित्ववाद को परिभाषित करते हुए लिखते हैं- ‘‘जब उन्नीसवीं शताब्दी में विभिन्न प्रकार के आविष्कारों एवं सिद्धांतों के प्रचलन के कारण मानव जीवन पर वैज्ञानिकता एवं सामाजिकता का प्रभाव अधिक बढ़ने लगा, जिसके सम्मुख व्यक्ति की वैयक्तिकता एवं स्वतंत्रता उपेक्षित होने लगी, तो उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप एक ऐसे वाद का विकास हुआ, जो कि वैयक्तिक स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्त्व देता हुआ वैज्ञानिकता एवं सामाजिकता का तीव्र विरोध करता है। यही वाद दर्शन एवं कला के क्षेत्र में अस्तित्ववाद के नाम से प्रसिद्ध है।’’

गुप्त जी ने अस्तित्ववाद को वैयक्तिक स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक और व्यक्ति को गौण बनाने के कारण विज्ञान व सामाजिकता का विरोधी माना है। डॉ0 नगेन्द्र ने अस्तित्ववाद को दार्शनिक दृष्टिकोण का प्रतीक माना है जो उन सभी परंपरागत, तर्क संगत मान्यताओं, सिद्धांतों व विचारों का विरोध करता है जिससे मानव की सत्ता व उसकी समस्या की उपेक्षा हुई है। अस्तित्ववाद को परिभाषित करते हुए वह लिखते हैं- ‘‘अस्तित्ववाद दृष्टिकोण है, वस्तुत: उन परंपरागत तर्क संगत, दार्शनिक मतवादों के विरूद्ध एक विद्रोह है जो विचारों अथवा पदार्थ-जगत की तर्कसंगत व्याख्या करते हैं तथा मानवीय सत्ता की समस्या की उपेक्षा करते हैं। वह एक तर्कसंगत दार्शनिक मतवाद की अपेक्षा एक दार्शनिक दृष्टिकोण का प्रतीक अधिक है।’’

सार्त्र ने अस्तित्ववाद को मानववाद माना। उनका मानना था कि मनुष्य स्वयं का निर्माता है। वह जैसा स्वयं को बनाता है उसके अतिरिक्त वह कुछ नहीं है। ‘अस्तित्ववाद और मानववाद’ में वह लिखते हैं- ‘‘सीधी बात यह है कि मनुष्य है। वह अपने बारे में जैसा सोचता है, वैसा नहीं होता। बल्कि वैसा होता है, जैसा वह संकल्प करता है, अपने होने के बाद ही वह अपने बारे में सोचता है- वैसे ही अपने अस्तित्व की ओर बढ़ने के बाद ही वह अपने बारे में संकल्प करता है। मनुष्य इसके अतिरिक्त कुछ भी नही है जैसा खुद को बनाता है कि वह स्वयं का निर्माण करता है। यही अस्तित्ववाद का पहला सिद्धांत है।’’

प्रभा खेतान अस्तित्ववाद को परिभाषित करते हुए लिखती हैं-‘‘अस्तित्व का अर्थ हुआ सतत प्रकट होते रहना, निरंतर आविर्भावित होते रहना और अनुभूति के साथ उभरते रहना। इस अर्थ में केवल आदमी ही अस्तित्ववान होता है और केवल आदमी को ही सतत अनुभूति होती रहती है कि वह अपने आप से बाहर आ रहा है और अपनी परिस्थितियों का अतिक्रमण कर रहा है। अत: इस विचार के केंद्र में व्यक्ति स्वयं है।’’ प्रभा खेतान अस्तित्व का अर्थ सतत प्रकट होने के रूप में स्वीकारती हैं तथा व्यक्ति की सत्ता को ही अस्तित्ववान मानती हैं।

अस्तित्ववाद की पृष्ठभूमि

अस्तित्ववाद के उदय में अनेक कारण व परिस्थितियाँ जिम्मेदार थी। जिन्होंने मानव अस्तित्व व उसकी स्वतंत्रता की उपेक्षा की थी। अस्तित्ववाद व्यक्ति के अस्तित्व व उसकी खोर्इ हुर्इ गरिमा की खोज करने वाला दर्शन है।यूरोप का पूर्ववर्ती दर्शन, फ्रांसीसी क्रांति (1789-1799), रूसी क्रांति (1917), औद्योगिक क्रांति (18-19वीं शताब्दी), विज्ञान व तकनीक का बढ़ता वर्चस्व, दो-दो विश्वयुद्धों (1914-1918, 1939-1945) की विभीषिका, तानाशाही, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, आदर्शवाद, बौद्धिकता इत्यादि कारण के रूप में उपस्थित रहे।

प्राचीन ग्रीक दर्शन में प्लेटो, अरस्तू व सुकरात का नाम महत्वपूर्ण रहा है। प्लेटो ने सार को महत्वपूर्ण माना इसके साथ ही उन्होंने आदर्श राज्य की परिकल्पना कर राज्य के महत्व को भी प्रतिपादित किया। जिसमें व्यक्ति की उपेक्षा हुई।

सुकरात का ‘स्वयं को जानो’ व्यक्ति की महत्ता को अवश्य प्रतिपादित करता है तथा अस्तित्ववादियों के निकट जान पड़ता है। प्राचीन काल में मान्यता रही कि सर्वप्रथम वस्तु का रूप ईश्वर द्वारा परिकल्पित किया गया तत्पश्चात् वस्तु अस्तित्व में आई। मध्यकाल में सार को व्यक्ति से अधिक महत्व दिया गया जिसकी अनुपस्थिति में वस्तु को निरर्थक माना गया। हालांकि संत आगास्टाइन व कांट इत्यादि का नाम महत्वपूर्ण है जो बौद्धिकता की उपेक्षा करते हैं इनके विचार भी अस्तित्ववाद के निकट दिखाई पड़ते हैं।

हीगेल व्यक्ति को तो महत्व देता है मगर बौद्धिकता के प्रति विशेष आग्रह अस्तित्ववादियों को उसका विरोध करने पर मजबूर करता है। देकार्त का प्रसिद्ध वाक्य ‘मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ’ व्यक्ति से पहले चिंतन को ही महत्वपूर्ण मानता है। यद्यपि यहीं से अस्तित्ववाद का आरंभ भी माना गया है मगर अस्तित्ववादियों का मानना था कि अस्तित्व पहले है चिंतन, विचार या सिद्धांत बाद में हैं इसलिए वह ‘मैं हूँ, इसलिए मैं सोचता हूँ’ के रूप में अपनी बात कहना चाहते हैं।

डार्विन का ‘योग्यतम की उत्तर जीविता’ का सिद्धांत मानव जीवन के संघर्ष की बात करता है जो योग्य होगा वही जीवित रह पाएगा, न्यूटन के भौतिकी के सिद्धांत आदि भी कारण के रूप में मौजूद रहे। फ्रांस में सामंतवाद, राजतंत्र व दासता के विरोध में राज्यक्रांति हुई जिससे समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता व लोकतंत्र की स्थापना हुई, रूसी क्रांति में भी राजशाही का अंत हुआ मजदूरों व किसानों की सत्ता स्थापित हुर्इ। यूरोप का पुनर्जागरण धार्मिक बंधनों व अंधविश्वासों से व्यक्ति को मुक्त कराने में सफल हुआ। 

तर्क, बुद्धि, जिज्ञासा व विवेक को महत्व दिया गया। औद्योगिक क्रांति से नए-नए उद्योगों की स्थापना हुई, पूंजीवादी साम्राज्यवाद को बल मिला, उपनिवेश स्थापित हुए, विज्ञान व तकनीक का विकास हुआ, नगरीकरण हुआ लोग गाँव से शहर की ओर पलायन करने लगे, सामाजिक विसंगतियों व अपराध में बढ़ोत्तरी हुई। शोषण, अन्याय की स्थिति में भीी बढ़ोत्तरी हुई। माक्र्सवाद व मनोविश्लेषणवाद जैसी विचारधाराओं का उदय हुआ।

सर्वाधिक भयावह स्थिति थी दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिका। इन युद्धों में करोड़ो लोग मारे गए। सत्ता के क्षुद्र स्वार्थ हेतु मनुष्य का कीट-पतंगों की भाँति मारा जाना बड़ा त्रासदीपूर्ण था। मानव मूल्यों को अपार क्षति पहुँची। लोगों में नैराश्य, दीनता, अवशता, पीड़ा व कुंठा घर कर गई। ईश्वर, धर्म व मानवता से उसका विश्वास उठने लगा।

विज्ञान व तकनीक के विकास ने भी मानवीय मूल्यों को विघटित किया। एक ओर इन्होंने मानव जीवन को सुखी बनाया, ब्रह्मांड व प्रकृति के अनेक रहस्यों से पर्दा उठाया, धर्म व ईश्वर को तर्क की कसौटी पर कसकर मनुष्य को महत्व प्रदान किया तो दूसरी ओर मानवीय मूल्यों, पर्यावरण, प्रकृति को भी सर्वाधिक क्षति पहुंचाई तथा नए-नए युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार की। इन सभी परिस्थितियों, मान्यताओं, सिद्धांतों व दर्शन में मानव की घोर उपेक्षा हुई। अस्तित्ववाद उन सभी धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक व नियतिवादी सिद्धांतों व मान्यताओं का विरोध करता है जो व्यक्ति को गौण बनाते हैं। अस्तित्ववाद में सुख की भावना को निरर्थक मानते हुए दु:ख को जीवन की उपलब्धि स्वीकार किया गया।

विज्ञान, परंपरा,बौद्धिकता, इत्यादि का विरोध अस्तित्ववाद में दिखार्इ पड़ता है। पहले राज्य, धर्म व ईश्वर को महत्व दिया जाता रहा था मनुष्य को इनके संदर्भ में ही विश्लेषित किया गया। राज्य, सत्ता व सामंतवाद का बोलबाला रहा। मनुष्य दमित व शोषित हुआ जिसका तीव्र विरोध अस्तित्ववाद ने किया। अस्तित्ववादियों ने संसार को निरर्थक व निष्प्रयोजन माना। उनके अनुसार मनुष्य अस्तित्व के माध्यम से अपनी अर्थवत्ता को प्राप्त कर सकता है तथा अपने जीवन के उद्देश्य को निश्चित कर सकता है। यद्यपि अस्तित्ववाद का प्रवर्तन जर्मनी में 19वीं सदी में ही हो गया था मगर यूरोप में इसकी सशक्त उपस्थिति सन् 1940 व 1950 के दशक में दिखलाई पड़ती है।

अस्तित्ववाद की मान्यता है कि सर्वप्रथम व्यक्ति का अस्तित्व है फिर उसका सार है। अगर वस्तु ही नहीं होगी तो सार कैसे होगा? व्यक्ति में ‘मैं’ की स्थिति को आवश्यक माना। व्यक्ति की स्वतंत्रता को उन्होंने महत्वपूर्ण माना। बाह्य परिस्थितियों, मान्यताओं या वस्तुओं को उस पर थोपा नहीं जाना चाहिए उसे अपने जीवन का चुनाव स्वयं करना है अपने विषय में निर्णय लेना होगा। उन्होंंने उस व्यक्ति को महत्वपूर्ण माना जो किसी के काम आता हो। सार्थक कर्म द्वारा ही वह अपने आप को अभिव्यक्त कर पायेगा।

कृष्णदत्त पालीवाल ने अस्तित्ववाद के उदय की परिस्थितियों पर विचार करते हुए इसे महायुद्धों की विभीषका से उत्पन्न माना है- ‘‘अस्तित्ववाद का उदय और प्रसार का महत्वपूर्ण कारण दो विश्वयुद्धों की विभीषिका से उत्पन्न आर्थिक-राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन, विदू्रपता, विसंगति व्यक्तिबोध, अकेलापन तथा मृत्युबोध की भावना में निहित है... महायुद्ध के इन दिनों में मानव ने त्रास और पूंजीवादी महत्वकांक्षाओं का जो पतनशील रूप देखा है- अस्तित्ववाद इसी चीख एवं कराह से जन्मा दर्शन है।’’

अस्तित्ववाद को दो वर्गों में विभक्त किया गया है- 1. ईश्वरवादीअस्तित्ववाद एवं 2.अनीश्वरवादी अस्तित्ववाद

पहले प्रकार के अस्तित्ववाद में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया गया है तथा अनीश्वरवादी में ईश्वर की सत्ता को नकारा गया है फिर भी सभी अस्तित्ववादी व्यक्ति को ही महत्वपूर्ण मानते हैं।अस्तित्ववाद भारतीय सांख्य दर्शन के निकट माना गया है। भारतीय सांख्य दर्शन प्रकृति और मानव चेतना को महत्त्वपूर्ण मानता है वह ईश्वर को नहीं मानता, समस्त क्रियाकलाप मनुष्य को बंधन मुक्त कराने के लिए किए जाते हैं। अस्तित्ववाद की स्वतंत्रता की अवधारणा इससे मेल खाती प्रतीत होती है। चार्वाक दर्शन प्रत्यक्ष दर्शन पर आधारित है जो प्रत्यक्ष वस्तुओं की सत्ता को स्वीकारता है। ईश्वर, परलोक, आत्मा व पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करता। उसे मूलत: सुखवादी दर्शन माना गया है। चार्वाक से अस्तित्ववाद के र्इश्वर संबंधी विचार मेल खाते हैं। अस्तित्ववाद में दु:ख को महत्व दिया गया है।

भारतीय दर्शन का ‘नेति नेति’ भी अस्तित्ववाद में ‘नथिंगनैस’ के रूप में दिखलाई पड़ता है। गीता के कर्मवाद के सिद्धांत की महत्ता भी अपने में विशिष्ट है। अस्तित्ववाद भी कर्म के महत्व को स्वीकार करता है। बौद्ध दर्शन में दु:खवाद व अस्तित्ववाद में दु:ख, पीड़ा व वेदना का महत्व निकट जान पड़ते हैं। बौद्ध दर्शन में निर्वाण द्वारा दु:ख से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। अरविन्द दर्शन में अराजकता से मुक्ति के लिए अतिमानस व अतिमानव दोनों की स्थिति को स्वीकार किया गया है जो नीत्शे के अतिमानव के निकट दिखाई पड़ता है। भारतीय दर्शन में आशावादी स्वर मिलता है। यहाँ मृत्यु के परे भी मुक्ति या मोक्ष की मान्यता मृत्यु को महत्त्वपूर्ण बना देती है जबकि अस्तित्ववाद में ऐसी कोर्इ आशा नहीं दिखाई पड़ती।

भारतीय दर्शन जहाँ आशावादी है वही अस्तित्ववाद का स्वर निराशावादी माना गया है। भारतीय दर्शन में भक्ति, योग, अध्यात्म, ईश्वर, मोक्ष के माध्यम से सात्विक जीवन व मुक्ति की बात की गई है जो जीवन से परे भी मुक्ति के रूप में आशा का दर्शन है। वही अस्तित्ववाद मुख्यत: वर्तमान के दु:ख, निराशा अवसाद की बात करता है मृत्यु मानव जीवन की संभावनाओं का अंत है उसकी सीमा है।

अस्तित्ववाद के विचारक

अस्तित्ववाद का आरंभ जर्मनी से माना जाता हैं। इस दर्शन को विकसित करने में सॉरेन कीर्केगार्द, ग्रेबियल मार्शल, नीत्शे, मार्टिन हेडेगर, कार्ल जैस्पर्स, अल्बेयर कामू व ज्यां पाल सार्त्र का नाम प्रमुख हैं इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

सारेन कीर्केगार्द- 

कीर्केगार्द को अस्तित्ववाद का प्रवर्तक माना जाता है। डेनमार्क में 5 मई सन् 1813 ई. में इनका जन्म हुआ। इन्होंने ईश्वर की सत्ता को माना है मगर कीर्केगार्द ने श्रद्धा को मनुष्य की आंतरिक वस्तु स्वीकार किया। उन्होंने निराशा को भी महत्त्व दिया। इनके दर्शन में आत्मनिष्ठा भी विद्यमान है। मनुष्य के अकेलेपन को सबसे पहले इन्होंने ही अनुभव किया। नीत्शे- नीत्शे ने अपने प्रसिद्ध वाक्य ‘र्इश्वर की मृत्यु हो गयी है’ के द्वारा नवीन जीवन मूल्यों की अपेक्षा की है। इन्हें अतर्कवादी दार्शनिक भी कहा गया है। उन्होंने अतिमानव की कल्पना की जो समाज में पाशविक वृत्तियों का दमन कर मानवता को पुनस्र्थापित करे या मनुष्य को सबल बनाए। नाजियो ने उनको गलत अर्थ में ग्रहण किया।

व्यक्ति के दु:ख, संतोष का चित्रण, मृत्यु का स्वागत, समाजवाद व हीगेल की मान्यताओं का विरोध भी नीत्शे ने किया। मार्टिन हेडेगर- वह स्वयं को अस्तित्ववादी नहीं मानते। उन्होंने मनुष्य का ही ऐतिहासिक अस्तित्व माना। संत्रास, मृत्यु संबंधी चर्चा व शून्य को महत्व प्रदान किया। मृत्यु को वह अर्थपूर्ण जीवन की कुंजी मानते हैं। उन्होंने व्यक्ति के साथ उसकी भाषा व जगत को भी महत्व दिया। उन्होंने अस्तित्व का अर्थ संभावना से लिया। चुनाव की स्वतंत्रता और इस स्वतंत्रता की पहचान को अस्तित्व का सार तत्व माना। हेडेगर को ‘जीवन विद्या का दार्शनिक’ कहा जाता है।

कार्ल जैस्पर्स

कार्ल जैस्पर्स को आधुनिक अस्तित्ववाद का प्रवर्तक माना गया। साथ ही उन्हें ‘तर्क का दार्शनिक’ भी माना जाता है। उन्होंने व्यक्ति के आंतरिक अस्तित्व को ही स्वतंत्र रूप में स्वीकार किया है। मनुष्य को बौद्धिक, भौतिक व ऐतिहासिक बंधनों में बंधा हुआ माना तथा कर्म को महत्व दिया। ग्रैबियल मार्सल- इनका ईश्वर में विश्वास था। अस्तित्व व आधिपत्य के बीच द्वंद्व दर्शन का मूल आधार रहा इन्होंने आशा को महत्व दिया। चुनौती, निर्णय, उत्तरदायित्व व मूल्यांकन को मानव अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण माना।

अल्बेयर कामू

 कामू ने स्वतंत्रता, भाईचारे व सौहार्द को महत्त्व दिया। उन्हें विसंगति का दार्शनिक माना गया। विसंगति से बचने के लिए विद्रोह जरूरी माना है। कामू ने माक्र्सवाद का समर्थन किया। वह मानवीय मूल्यों, नैतिक मूल्यों, कर्म में विश्वास करते थे। इतिहास को सृजित करने की बात भी वह स्वीकारते हैं। अलगाव व तानाशाही का उन्होंने विरोध किया। उन्हें 1957 में नोबेल पुरस्कार मिला। प्रभा खेतान ने उनके अस्तित्ववाद को मानववाद कहा है। मानवीय गरिमा को वह श्रेष्ठ मानते थे। अहिंसा, शांति की बात भी कामू ने उठाई है।

ज्यां पाल सार्त्र

ज्यां पाल सार्त्र का नाम अस्तित्ववादियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। सार्त्र का जन्म पेरिस में 1905 ई. में हुआ था। सार्त्र अस्तित्व को सार से पहले मानते हैं। स्वतंत्रता, कर्म को महत्ता प्रदान की। उनका मानना था कि व्यक्ति वही है जैसा वह स्वयं को बनाता है। मृत्यु को सभी संभावनाओं का अंत माना। सार्त् रईश्वर को अस्वीकार करते हैं उनका मानना था कि ईश्वर के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। कामू की तरह सार्त्र भी माक्र्सवाद के समर्थक थे। इसके साथ ही मनोविश्लेषण को भी महत्व दिया। बैडफेथ का वह विरोध करते हैं।

इसके अतिरिक्त निराशा, अकेलेपन, त्रासदी, अलगाव, बाजारवाद, संवेग, चेतना व इगो को उन्होंने विश्लेषित किया। सार्त्र ने नोबेल पुरस्कार लेने से अस्वीकार कर दिया था। जनहित के समर्थक इस लेखक ने नोबेल पुरस्कार को बुर्जुवावादी संस्था का ही रूप माना। दॉस्तोवस्की- दॉस्तोवस्की में स्वतंत्रता, अकेलापन व व्यैक्तिकता देखने को मिलती है। वह समाजवाद के समर्थक थे तथा क्रांति को ‘अराजकता’ के समान माना।

फ्रेंज काफ्का

सन् 1883 र्इ0 में प्राग में इनका जन्म हुआ। इनका साहित्य महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता, संघर्ष, अलगाव व प्रेम का चित्रण इनके साहित्य में हुआ है। ये अलगाव का विरोध करते हैं। इसके अलावा हुर्सेल, बर्दिएफ आदि का भी अस्तित्ववादी चिंतकों में महत्त्वपूर्ण स्थान है।

अस्तित्ववाद की मान्यताएं

व्यक्ति के अस्तित्व को सर्वाधिक महत्व देने वाले दर्शन अस्तित्ववाद की सभी मान्यताएं व्यक्ति के अस्तित्व, उसकी स्थिति व गरिमा को ही अर्थवत्ता प्रदान करने वाली हैं। 

अस्तित्व का महत्व

अस्तित्ववादियों ने उन सभी ज्ञान-विज्ञान, दर्शन व सिद्धांतों का तीव्र विरोध किया जिन्होंने व्यक्ति के अस्तित्व को गौण मानकर उपेक्षित किया था। अस्तित्ववाद व्यक्ति के अस्तित्व को प्रमुख मानता है पहले मनुष्य है उसका सार, चिंतन व सिद्धांत सब बाद में है। व्यैक्तिक स्वतंत्रता- सभी अस्तित्ववादियों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना। उन्होंने माना कि बाºय परिस्थितियों और मान्यताओं को व्यक्ति पर थोपना नहीं चाहिए वह वरण करने के लिए स्वतंत्र है साथ ही वरण किए गए के प्रति उत्तरदायी भी, स्वतंत्रता तभी तक सार्थक है जब तक वह किसी की स्वतंत्रता में अवरोधक न बने।

सार्त्र स्वतंत्रता को परिभाषित करते हुए लिखते हैं- ‘‘सार तत्व से पहले अस्तित्व है। यह मानवीय स्वतंत्रता ही है, जो आदमी की आदमियत को संभव करती है। अत: हम जिसे स्वतंत्रता कहते हैं, मानवीय वास्तविकता से अलग नहीं।’’ स्वतंत्रता के साथ ही चुनाव व निर्णय को भी महत्त्व दिया गया। व्यक्ति अपने जीवन में जो बनना चाहता है उसके लिए चुनाव करे, निर्णय ले साथ ही उसके उत्तरदायित्व को भी वहन करे तभी अपने अस्तित्व, गरिमा व मानवता के लिए कुछ कर पाएगा।

कर्म व सत्य को महत्त्व 

अस्तित्ववाद में कर्म व सत्य को भी महत्त्वपूर्ण माना। कर्म के द्वारा ही मनुष्य अपने स्वत्व को पा सकता है। कर्मशील व्यक्ति को ही अस्तित्ववादियों ने अस्तित्ववान माना। उनका मानना है कि परिवेशजन्य तनावों, दबावों इत्यादि से कर्मशील रहकर ही मुक्ति संभव है। कर्म के साथ ही सत्य को भी महत्व प्रदान किया। निराशा, कुंठा व पीड़ा बोध- इन्होंने निराशा की स्थिति को भी स्वीकार किया है। निराशा, दु:ख, पीड़ा की स्थिति में व्यक्ति अपने अस्तित्व की खोज कर सकता है उसे सार्थक बना सकता है। अस्तित्ववादी बाºय की अपेक्षा व्यक्ति के आंतरिक पक्ष को महत्त्व देते हैं उसकी पीड़ा कुंठा, निराशा, दु:ख की अभिव्यक्ति अस्तित्ववाद में हुर्इ है।

तनाव, ऊब व व्यर्थताबोध-

अस्तित्ववाद में तनाव, ऊब व व्यर्थता बोध की स्थिति भी स्वीकार की गर्इ है। औद्योगीकरण, मशीनीकरण ने इन स्थितियों को उत्पन्न किया है। मनुष्य इनसे संघर्षरत है वह ‘सिफिसस’ की तरह निरर्थक श्रम करता है जो व्यर्थता को बढ़ाता है। मृत्युबोध व शून्यता- अस्तित्ववादियों ने मृत्यु संबंधी विचार भी प्रस्तुत किए। मृत्यु से शरीर का अंत होता है उसका अस्तित्व, उसकी स्वतंत्रता बची रहनी चाहिए। हेडेगर ने मृत्यु को अर्थपूर्ण जीवन की कुंजी कहा है, नीत्शे मृत्यु का स्वागत करते दिखार्इ पड़ते हैं। वहीं सार्त्र मानव जीवन की संभावनाओं का अंत मानते हुए भी इसे तथ्यपूर्ण मानते हैं।

शून्यता की स्थिति भी अस्तित्ववाद में स्वीकार की गर्इ है। हेडेगर ने इसे महत्वपूर्ण माना। सार्त्र ने ‘नथिंगनैस’ कहा है। साथ ही इसे मानवीय अस्तित्व का आधार भी माना है। चयन करने में यह सहायक होती है। र्इश्वर संबंधी विचार- कुछ अस्तित्ववादी र्इश्वर की सत्ता में विश्वास करते हैं जैसे कीर्केगार्द, मार्सल व जैस्पर्स इत्यादि। कुछ अस्तित्ववादी अनीश्वरवादी हैं। सार्त्र का मानना है कि र्इश्वर के होने न होने से कोर्इ फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अपने कार्य के प्रति मानव स्वयं जिम्मेदार है। नीत्शे का कहना ‘र्इश्वर की मृत्यु हो गर्इ है’ नए मूल्यों की मांग करता है।

दु:ख व संत्रास- दु:ख व पीड़ा को अस्तित्ववादी जीवन की उपलब्धि मानते हैं। दु:ख की घड़ी में ही मनुष्य स्वयं को खोज पाएगा। दु:ख, पीड़ा व वेदना जितनी अधिक होगी व्यक्ति की अनुभव की तीव्रता भी उतनी ही अधिक होगी। समकालीन परिस्थितियाँ व्यक्ति के मन में भय को उत्पन्न करती हैं। संत्रस्त व्यक्ति स्वयं को परिस्थितियों से घिरा हुआ पाता है। संत्रास की यह भावना भी इनके यहाँ पार्इ जाती है।

क्षण बोध-

अस्तित्ववाद में क्षण को महत्व दिया गया है। प्रत्येक क्षण अर्थपूर्ण है जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व, स्वतंत्रता व अर्थवत्ता को प्राप्त कर सकता है। अजनबीपन, अलगाव व एकाकीपन- विज्ञान व तकनीक का विकास, औद्योगीकरण, नगरीकरण व मशीनीकरण ने मानव जीवन को यांत्रिक बना दिया है। परिवेश व समाज से निर्वासित वह एक अजनबी की तरह जीवन यापन करने को मजबूर है। परिवेश, समाज व संबंधों के इस अलगाव ने उसको एकाकी भी बना दिया है। अस्तित्ववाद इस पर भी प्रकाश डालता है। विसंगति- कामू को विसंगति के दार्शनिक के रूप में जाना जाता है। आधुनिक जीवन विसंगति से जूझ रहा है। विरोधाभास जीवन को जटिल बनाते हैं।

अस्तित्ववाद मानवीय अस्मिता के लिए प्रयासरत रहता है। उसका उद्देश्य मानव जीवन को अर्थवत्ता प्रदान करना है। यांत्रिकता, निरर्थकता, ऊब, अलगाव, अनिश्चितता व मृत्युबोध आदि परिस्थितियां जीवन में विसंगति को पैदा करती हैं। बौद्धिकता एवं अति वैज्ञानिकता का विरोध- चिंतन और विज्ञान दोनों में मनुष्य की उपेक्षा की स्थिति रही है। उसे वस्तु मान लिए जाने का अस्तित्ववाद विरोध करता है। इन बढ़ते वर्चस्व के सामने मनुष्य का अस्तित्व प्राय: गौण हो जाता है जिसे यह दर्शन स्वीकार नहीं करता।

अस्तित्ववादी दर्शन में केवल वे ही मान्यताएं या विचार स्वीकार्य हैं जो मानव के अस्तित्व, अस्मिता व गरिमा की बात करते हैं। उसके अस्तित्व को अर्थवत्ता प्रदान कर सार्थक जीवन का दिशा निर्देशन करने वाले हो। परंपरा, धर्म, ईश्वर, चिंतन, भाग्य, पूर्वजन्म इत्यादि पर उसे बहुत ज्यादा विश्वास नहीं क्योंकि यह सब मनुष्य की स्वतंत्रता में अवरोधक का कार्य करते हैं। इस दर्शन के अनुसार मनुष्य ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है वही मूल्यों और अपने भाग्य का भी निर्माता है उसे जीवन में चुनाव और निर्णय लेने चाहिए। सार्थक कर्म को जीवन का उद्देश्य बनाते हुए समस्त मानवता के हित में संलग्न रहना चाहिए। वह स्वयं के लिए ही नहीं वरन् समस्त मानव समुदाय के लिए निर्णय लेता है। कामू व सार्त्र माक्र्सवाद का समर्थन भी इसीलिए करते हैं इसके साथ ही मनोविश्लेषण को भी महत्व दिया गया है।

अस्तित्ववाद की कमियाँ

अस्तित्ववाद को जहाँ एक ओर मानव मूल्यों को प्रतिपादित करने के कारण मानववाद की संज्ञा दी गर्इ तो दूसरी ओर कुछ आरोप भी अस्तित्ववाद पर लगते रहे हैं। अस्तित्ववाद का स्वर निराशावादी माना गया जहां दु:ख, पीड़ा, संताप, वेदना आदि जीवन की उपलब्धि हैं और संत्रास व विसंगति आदि मानव जीवन का हिस्सा जिससे मुक्त हो पाना मुश्किल जान पड़ता है। मृत्यु का भय जीवन में निराशा का संचार कर देता है। इसके साथ ही ईश्वर की सत्ता, बौद्धिकता, विज्ञान इत्यादि का नकार भी मानव जीवन में विश्वास, विवेक व विकास की संभावनाओं को कम कर देता है। स्वच्छंदता, भोगवाद व अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रामविलास शर्मा अस्तित्ववाद में विसंगति की स्थिति मानते हैं।अस्तित्ववाद में एक ओर तो आंतरिकता पर बल दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर मूल्यों को महत्त्व दिया गया है जिसका संबंध समाज से है।

इस विषय में रामविलास शर्मा लिखते हैं- ‘‘अस्तित्ववाद में एक तीव्र विसंगति है। वह केवल आत्मगत सत्य को स्वीकार करता है, दूसरी ओर वह मूल्यों की बात करता है जो स्वभावत: समाजगत है। तर्कसंगत विचारक या तो मूल्यों को समाजगत मानकर माक्र्सवाद की ओर बढ़ेगा जैसा सार्त्र ने किया या वह उन्हें पूर्ण स्वतंत्र और निरपेक्ष रूप से आत्मगत मानकर मूल्य हीनता की ओर बढ़ेगा जैसा कि ब्रिटेन, अमरीका और भारत के बहुत से पराजयवादी ‘विद्रोही’ कर रहे हैं।’’ अस्तित्ववाद को व्यक्तिवाद, स्वार्थवाद, अहंकारवाद, विद्रोह व उत्पाती दर्शन के रूप में भी माना गया तथा समस्त नकारात्मक क्रियाकलापों व आंदोलनों पर अस्तित्ववाद का प्रभाव माना गया। इसे निराशा व असामाजिकता के संदर्भ में विश्लेषित किया गया जो समाज, ईश्वर, परंपरा, विज्ञान व इतिहास को नकारता है।

डॉ0 शिव प्रसाद सिंह ने अस्तित्ववाद को महत्वपूर्ण मानते हुए इसे प्रत्येक दर्शन का प्रस्थान बिंदु स्वीकार किया है- ‘‘अस्तित्ववाद की सबसे बड़ी देन यह है कि उसने आज के वातावरण में मनुष्य के अपने और समाज से हुए अलगाव को रेखांकित किया। .....अस्तित्ववाद इसी कारण प्रत्येक दर्शन का प्रस्थान बिंदु बन जाता है क्योंकि वह अस्तित्व दर्शन से संबंधित प्रश्नों को इस ढंग से सामने रखता है कि पहले के समाधान रद्दी और व्यर्थ लगने लगते हैं।’’9 इस प्रकार कमियों के बावजूद भी इसके महत्व को कम नहीं किया जा सकता। समकालीन परिस्थितियों के मध्य उपेक्षित व निस्संग मानवीय अस्तित्व की खोज इसे उल्लेखनीय बनाती है।

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