लोक संगीत का अर्थ एवं परिभाषा

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लोक संगीत का अलोक संगीत शब्द में ‘लोक’ और ‘संगीत’ दो अलग-अलग शब्द हैं। हिन्दी व्याकरण की दृष्टि से लोक संगीत एक समस्त पद है। ‘लोक’ तथा ‘संगीत’ के बीच तत्पुरुष कारक की षष्ठी विभक्ति ‘कर’ के लोप हो जाने से लोक संगीत शब्द समान रूप से व्यवंत होता है। इसलिए लोक संगीत शब्द का अर्थ हुआ ‘लोक का संगीत’।

लोक संगीत की सबसे सार्थक व्याख्या यही हो सकती हैं कि यह लोक या लोग या जनमानस का संगीत है। लोक द्वारा सृजित, लोक द्वारा रक्षित, लोकरंजन के लिए, लोक जिव्हाओं द्वारा गाया जाने वाला संगीत ही लोक संगीत होता है। लोक मानस की किसी भी अनुभूति की अभिव्यक्ति के लिए स्वर, ताल, नृत्य के आश्रय से ही लोक संगीत का जन्म होता है। लोक संगीत की महिमा बताते हुए कहा गया है कि मनुष्य नौ प्रकार के रसों से प्रभावित होकर जब स्वाभाविक रूप से गाकर, बजाकर अथवा नाचकर अपने भावों को प्रकट करता है, तो उसे लोक संगीत कहते हैं। लोक संगीत अत्यध्कि सरल, परम स्वाभाविक और अनुभूतिमय है। लोक संगीत में प्रेम, ईर्ष्या, खुशी, उल्लास, तड़पन, सिरहन आदि सभी भावनाएं झलकती हैं। लोगों के रहन-सहन, आचार-विचार, भाषा का बाहरी रूप चाहे एक दूसरे से भिन्न हो लेकिन उनकी अन्तर आत्मा में समानता पाई जाती है।

लोक संगीत के माध्यम से आदि मानव की पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्छतिक तथा साहित्यिक अवस्था का मूल्यांकन किया जा सकता है। लोक संगीत के माध्यम से ही आदि मानव के रहन-सहन, खान-पान, बोल-चाल, भाषा इत्यादि का चित्राण मिलता है। इसके अतिरिक्त प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक मानव जीवन में हुई प्रगति का मूल्यांकन मिलता है। लोक संगीत दर्पण के समान है जिसके मामयम से मानव की पुरातन सभ्यता संस्छति का मूल्यांकन साक्षात रूप से हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है।

लोक संगीत जनसाधरण का सरल, सहज, सुलभ तथा सामान्य व्यवहार में प्रयुक्त होने वाला संगीत है। लोक संगीत किसी प्रकार के कठोर नियमों के बन्मान को नहीं स्वीकारता। यह पूर्ण रूप से ‘स्वान्त: सुखाय’ आधरित होता है। लोक संगीत में स्वर शब्दों से पूर्णत: मेल खाते हैं। कुछ लोग लोक संगीत का अर्थ ‘ग्राम्य’ समझते हैं। वास्तव में लोक संगीत उसी को कहा जा सकता है जिसका स्वरूप लोकरंजनी है तथा किसी विशिष्ट जनसमुदाय की समझ तक ही जो मर्यादित नहीं है। वह जनसमाज की अन्त: स्थली को संगीत से संचित करने वाले ऐसे लोकसंगीत की उपादेयता प्रत्येक देश में विद्वानों के अमययन का विषय बनी हुई है। लोक संगीत द्वारा ही सामाजिक जीवन का कोष संचित हुआ है, जन साधारण के स्वप्न, आदर्श, उपेश्य और कल्पना सब कुछ लोक संगीत में ही मुखरित होता है।

लोक संगीत का मुख्य उद्देश्य जन मनोरंजन है। लोक संगीत में मानव जीवन की उसके उल्लास की, उसकी उमंगों की, उसकी करुणा की, उसके समस्त सुख-दु:ख की कहानी चित्रित होती है। लोक जीवन में आने वाले प्रत्येक शुभअवसर, उत्सव, त्यौहार आदि में लोक संगीत का मुख्य स्थान रहता है। उदाहरणार्थ विवाह के गीत, जन्म दिवस के गीत, धर्मिक गीत, कृषि सम्बन्ध्ी गीत आदि। लोक संगीत किसी एक व्यक्ति विशेष द्वारा न गा बजाकर सामूहिक रूप में गाया, बजाया जाता है।

लोक संगीत के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के विचार

लोक संगीत के विषय में एदएचद वेमी के विचार ‘लोक संगीत वह सम्पूर्ण गेय गीत है जिसकी रचना प्राचीन अनपढ़ जन में अज्ञात रूप से हुई है और जो यथेष्ठ समय अत: शताब्दियों तक प्रचलित रहा।,

चैम्बर्स डिक्शनरी में ‘लोक संगीत को ऐसा संगीत या गीत कहा गया है। जिसका उद्गम लोक में और परम्परागत रूप से पश्चात्वर्तियों को मिला हो।, जर्मनी के प्रसिद्ध शास्त्राकर्ता श्री विलियम ग्रिन ने समुदाय वाद-सिणन्त में स्पष्ट किया है कि लोक काव्य का निर्माण अपने आप विशाल जन-समूह द्वारा होता है, किसी व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं। लोक संगीत स्वत: सम्पूर्ण है। लोक काव्य संग्राहक श्री राम नरेश ित्रपाठी ने लोक संगीत की प्रशंसा करते हुए कहा है कि ‘जब गृह देवियां एकित्रत होकर पूरे आनन्द के साथ गीत गाती हैं, तब उन्हें सुनकर चराचर के प्राण तरंगित हो जाते हैं।

संदर्भ

  1. साहित्य संगीत और कला, कोमल कोठारी, पृद 139-141
  2. हिमाचल प्रदेश का लोक संगीत तथा वाद्य वादन, डॉद हरि सिंह ठाकुर, पृद 15
  3. संगीत पित्रका, डॉद राधछष्ण, जून 1968, पृद 12
  4. द सांईस ऑपफ पफोक लोर, पृद 135

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