मिथक का अर्थ, परिभाषा, प्रकार और भेद

अनुक्रम

मिथक शब्द अंग्रेजी भाषा के मिथ शब्द का ही हिन्दी रूपान्तरण अथवा पर्यायवाची है और अंग्रेजी भाषा के मिथ शब्द की व्युत्पत्ति यूनानी भाषा के माइथॉस से हुई है, जिसका अर्थ है आप्तवचन, मौखिक कथा अथवा अतक्र्य कथन अर्थात् एक ऐसी कथा जिसे कहने और सुनने वाले इसे सृष्टि या ब्रहमाण्ड सम्बन्धी तथ्य समझते हैं। मिथ शब्द का विपरितार्थक शब्द लोगोस (तर्क) को माना गया है। मिथक संस्कृत का प्रमाणित शब्द नहीं है। संस्कृत के ‘मिथ’ शब्द के साथ कर्त्तावाचक ‘क’ प्रत्यय को जोड़ने से ही इसकी निर्मित हुई है। संस्कृत में ‘मिथक’ शब्द के समीपवर्ती शब्दों के रूप में दो ही शब्दों का प्राधान्य रहा है। प्रथम है ‘मिथस’ अथवा ‘मिथ’, जिसका अर्थ है – ‘परस्पर सम्मिलन’ तथा द्वितीय है ‘मिथ्या’ जिसका अर्थ है – झूठ तथा असत्य। यदि मिथक का उद्धव ‘मिथस’ से माना जाए तो इस शब्द का अभिप्राय मात्र गप्प अथवा कपोल कथा से ही लगाया जा सकता है परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से आकलन करने पर ज्ञात होता है कि इन दोनों ही शब्दों से भले ही भिन्न-भिन्न अर्थ प्रकट होते हों लेकिन दोनों के उच्चारण में एक सा ही प्रयत्न लगता है कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों ही शब्दों में अर्थ साम्य की प्रधानता न होते हुए भी ध्वनिसाम्य की प्रधानता है।

मिथक की परिभाषा

बीसवीं शताब्दी के प्रारिम्भक वर्षो में पाश्चात्य विद्वानों में एक ‘प्रेसकाट’ (Prescatt) ने अपनी पुस्तक ‘प्रोयट्री एण्ड मिथ’ (Poetry and Myth) में कविता और मिथक के व्यापक विमर्श प्रस्तुत किए।

भारतीय साहित्य में मिथक का प्रयोग नवीन है। किन्तु इसका आधार हमारी पुराकथाएँ, देवकथाएँ तथा हमारे पौराणिक आख्यान हैं जो कि हमारी प्राचीन धरोहर हैं। किसी भी शब्द विशेष या किसी तथ्य को परिभाषित करने से तात्पर्य उसकी सम्पूर्ण विशेषता को सूक्ष्म रूप में समझाने से है। इसी हेतु पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों द्वारा प्रदत्त परिभाषाओं के आलोक में मिथक को समझाने का प्रयास किया गया है।

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में कहा गया है कि मिथ (मिथक) आदिम संस्कृति का एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण उपादान है, यह विश्वास को अभिव्यक्त विकसित और संहिताबद्ध करता है, यह नैतिकता की सुरक्षा करता है, उसे दृढ़ करता है, यह शास्त्र विधि धार्मिक अनुष्ठान की सक्षमता को प्रमाणित करते हुए मनुष्य के निर्देशन के लिए व्यावहारिक नियमों का निर्धारण करता है। इस प्रकार मिथक मानव सभ्यता के लिए अत्यावश्यक उपादान है। यह केवल निरर्थक कथा ही नहीं अपितु एक ठोस क्रिया व्यापार या कलात्मक बिम्ब-विधान की प्रस्तुति ही नहीं करता बल्कि आदिम विश्वासों और नैतिक विवेक का एक व्यावहारिक दस्तावेज है’

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में मिथक को परिभाषित करते हुए कहा है कि मिथक केवल दिमागी उपज या काल्पनिक चित्रों को व्यक्त करने का माध्यम नहीं है, वरन् यह तो मानव के विश्वास, उसकी नैतिकताओं का साक्षी है। मिथक तो धार्मिक अनुष्ठानों को प्रमाणित करते हुए मनुष्य के लिए व्यावहारिक नियमों का प्रतिपादन करता है।

इस प्रकार इस विश्व कोश के अनुसार मिथक मानवीय सभ्यता का अतिआवश्यक माध्यम है और यह सिर्फ कपोल-कथा न होकर, जीवन के यथार्थ अथवा सत्यता का अनिवार्य एवं महत्वपूर्ण तत्व है।

‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड ऐथिक्स में श्री ए.जी गार्डनर ने मिथक पर विचार प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मिथक प्राय: प्रत्यक्षत: या परोक्षत: कथा रूप में होता है। सामान्य कथा में यह इस रूप में अंशत: भिन्न होता है कि जिन मनुष्यों में यह कथा प्रथम बार प्रचारित होती है, वे इसे अवश्य ही तत्वत: सत्य मानते हैं। इस प्रकार मिथक कथा नीति कथा या अन्योक्ति से उसी प्रकार भिन्न है, जिस प्रकार कहानी या कल्पित कथा से।’

एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड ऐथिक्स में ए.जी. गार्डनर ने मिथक पर जो अपने विचार प्रस्तुत किये हैं, उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि मिथकीय कहानियों तथा कथाओं को यदि प्रथम बार सुना जाए तो उन पर विश्वास किया जा सकता है, लेकिन मिथकीय कथाएँ, नैतिक कथाओं से ठीक वैसे ही अलग हैं, जैसे कि कोई सच्ची कहानी किसी काल्पनिक से। कहने का तात्पर्य यह है कि मिथक हमारे सामने प्रस्तुत तो कथा कहानी के रूप में होते हैं, लेकिन इनका आधार हमारे विश्वास की परिणति ही होती है।

साहित्य के समान जातीय आकांक्षाओं (धारणाओं, आदर्शो) का एक सुस्पष्ट माध्यम है। इसके अनुसार मिथक को लोक-कथाओं के समान प्रधानत: औपन्यासिक कहानियाँ ही माना गया है, इन दोनों में मूलभूत अन्तर यह बताया गया है कि मिथक आलौकिक संसार की कहानियाँ हैं और इस प्रकार उनमें स्वभावत: ही धार्मिक तत्वों का समावेश हो जाता है। इस मत के आधार पर मिथक में दो तत्व ही प्रमुख रूप से शामिल होते हैं – प्रथम उसका कथात्मक स्वरूप और दूसरा – उसका धार्मिक तथा लोकोत्तर वातावरण।’ ‘कैसल्स एनसाइक्लोपीडिया ऑफ लिट्रेचर भी मिथक को लोक प्रचलित कथा स्वीकार करते हुए उसके धार्मिक तथा आलौकिक पक्ष की ओर ही संकेत करता है।’ ‘चैम्र्बस कौम्पैक्ट इंगलिश डिक्शनरी में मिथक को ईश्वर धर्म नायक या लोक प्रचलित आस्थावान व्यक्ति की परम्परागत पुरा कथा कहा गया है और माइथोलॉजी (पौराणिक कथा) को मिथको का समूह।’

स्टैण्डर्ड डिक्शनरी ऑफ फोकलोर माइथोलॉजी एण्ड लीजेण्ड में मिथक के धार्मिक पक्ष को महत्वपूर्ण उपादान स्वीकार करते हुए किसी देवी-देवता के इतिवृत्त से सम्बन्धित देव कथा की संज्ञा से अभिहित किया गया है।’

‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइंसेज, कैसल्स एनसाइक्लोपीडिया ऑफ लिट्रेचर, चैम्र्बस कोम्पैक्ट इंगलिश डिक्शनरी, स्टैण्र्डड डिक्शनरी ऑफ फोकलोर माइथोलॉजी एण्ड लीजैण्ड,। इन सभी विश्व कोशों के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि, इन विश्व कोशों में मिथकों के धार्मिक तथा आलौकिक रूप को ही दर्शाया गया है। इन सभी के अनुसार मिथक को धार्मिक मान्यता प्रदान करते हुए उसके अन्तर्गत किसी विशेष देवी-देवता के प्रारम्भ से लेकर अन्त तक के उसके क्रिया-कलापों को किसी लोक-गाथा, गाथा के माध्यम से दर्शाया गया है, और कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी इन कथाओं तथा ईश्वर में पूर्ण आस्था हो, उसकी एक प्राचीन गाथा कह कर सम्बोधित किया गया है।

‘जर्मन विद्वान उसनेर गौटरमैन माइथोलॉजी इज द साइंस ऑफ मिथ कहते हुए मिथक को धार्मिक विचारों के विज्ञान से अभिहित करते हैं।’

जर्मन विद्वान ‘उसनेर गौटरमैन’ ने भी मिथक को एक ऐसा विज्ञान कहकर सम्बोधित किया है, जिसमें कि हमारी धार्मिक मान्यताएँ सुरक्षित रहती हैं। अधिकाँश विद्वानों ने मिथक का क्षेत्र धार्मिक मान्यता लोक गाथा तथा प्रकृति को दर्शाया है किन्तु कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जो मिथक का प्रमुख क्षेत्र समाज को स्वीकार करते हैं, इनमें प्रमुख नाम नार्थप फ्राई, अन्सर्ट कैसिरर, मैलिनोवोस्की, रैने वैलेक, एरिक फ्राम आदि के हैं।

‘मैलिनोवोस्की मिथ को एक सामाजिक प्रक्रिया मानते हैं, जिसमें वह परम्परा को सम्पुष्ट करता है। परम्परा का एक उदग् म, एक उच्चतर, श्रेष्ठतर अधिकतर अति प्राकृतिक यथार्थता की आरम्भिक घटनाओं में खोजता है। तदुपरान्त परम्परा को एक वृहतर मूल्य और प्रतिष्ठा प्रदान करता है।’

मैलिनोवोस्की’ के अनुसार, मिथक हमारे समाज की एक महत्वपूर्ण क्रिया है, जो कि हमारी परम्पराओं के स्रोत को यथार्थ की घटनाक्रमों में तलाशता है, तथा हमारी परम्पराओं का समर्थन करता हैं।

‘अन्स्र्ट कैसिरर मिथक का क्षेत्र प्रकृति की अपेक्षा समाज को स्वीकार करते हुए मिथक के अतिप्राकृत स्वरूप को अस्वीकार करते हैं। वह मानते हैं कि मानव जीवन का प्रत्येक क्रिया-कलाप मिथक की सीमा में आता है और मिथक के मूलभूत अर्थ व्यक्ति के सामाजिक जीवन से उदभ् ाूत हैं। मिथक के दोहरे स्वरूप की व्याख्या करते हुए कैसिरर मिथक को केवल पौराणिक वर्णिती का वाहक ही नहीं मानते अपितु ज्ञान की दृष्टि से तात्विक भी मानते हैं। अर्थात् इसमें कथा का घटनाक्रम महत्वपूर्ण नहीं होता वरन् उसका तत्व महत्वपूर्ण होता है।’

हम कह सकते हैं कि, कैसिरर के अनुसार मिथक मानव जीवन का एक अभिन्न अंग है, तथा मानव जीवन का प्रत्येक दैनिक कार्य मिथक के अन्तर्गत आता है, समाज में ऐसी कई मान्यताएँ प्रचलित हैं, जिसमें मनुष्य के सामाजिक मूल्य निर्भर रहते हैं, जैसे – कैसिरर मिथक के दोनों रूपों को स्वीकार करते हुए लिखते हैं, जो हमारी पुरातन संस्कृति हैं, उनमें मिथक तो हैं ही और यह हमारे समक्ष कथा कहानी रूप में प्रचलित होते हैं, किन्तु इन कथा-कहानियों को ज्ञान की दृष्टि से देखने पर यह और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

‘एरिक फ्राम भी कैसिरर की ही भाँति मिथक के सामाजिक पक्ष को स्वीकारते हुये इसे अपनों के द्वारा, अपनों को दिया गया सन्देश मानते हैं, उनकी दृष्टि में मिथक ऐसी रहस्यपूर्ण भाषा है, जो अन्तर में व्याप्त भावों को बाहरी यथार्थ के रूप में अभिव्यक्त करती हैं’

उपर्युक्त परिभाषा के अध्ययन के आधार पर हम कह सकते हैं कि मिथक ऐसी रहस्यात्मक अभिव्यक्ति है, जो मनुष्य के अन्तस में निहित भावनाओं को उसकी वास्तविकता के आधार पर प्रस्तुत करती है।

मिथक: प्रकार और भेद

प्रत्येक देश का साहित्य भिन्न प्रकार का होता है, जो अपनी भिन्नता के कारण एक विशिष्ट महत्ता रखता है। साहित्य को विशेष पहचान दिलाने में उसमें निहित तत्व उसे और अधिक सुदृढ़ता प्रदान करते हैं। मिथकीय तत्त्वों के चिन्तन में कहा जा सकता है कि मिथक साहित्य को प्रभावशाली एवं द्वन्दमयी बनाते हैं। हर युग का साहित्य भी नानाविध भिन्नता संजोय हुये रहता है। इसी भिन्नता के अनुसार मिथकीय पात्र चरित्र व घटनाएं युगानुरूप स्वरूप धारण करते हैं। मिथकों को विद्वानों ने अपने-अपने अनुसार वर्गीकृत किया है, पाश्चात्य काव्यशास्त्री ए.जी. गार्डनर द्वारा किये गये विभाजन के अनुसार मिथकों की सम्पूर्ण वस्तुपरिधि को 12 श्रेणियों में विभाजित किया गया है। उनके विभाजन के आलोक के आधार पर मिथक के कुछ प्रकार प्रस्तुत हैं –

ऋतु परिवर्तर्नन के सन्दर्भ वाले मिथक

जिस प्रकार दिन-रात, सप्ताह, मास और वर्ष का सदैव एक ही तरह से आना निश्चित है, उसी प्रकार ऋतुओं का आगमन का भी एक निश्चित क्रम है। ये ऋतुएँ दिन और रात को प्रभावित करती हैं, जैसे कि गर्मियों के दिन बड़े व रातें छोटी होती हैं। सर्दी में क्रम विपरीत हो जाता है। ऋतु चक्र को प्रभावित करने वाले ग्रहण आदि कारकों के सन्दर्भों में राहु जैसे मिथक इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

विशिष्ट प्राकृतिक सन्दर्भों के मिथक

विशिष्ट प्राकृतिक सन्दर्भों के मिथकों के अन्तर्गत प्राकृतिक आपदाओं का विवेचन इनकी प्रणाली क्रिया को मिथकों के अन्र्तगत माना जा सकता है। भूकम्प, ज्वालामुखी प्रलय से सम्बन्धित मिथ कथायें इसके अन्र्तगत समाविष्ट की जा सकती है। भूकम्प पृथ्वी की नीचे की प्लेटों के खिसकने के कारण से आते हैं, जबकि लोकमानस में इन्हें ईश्वर का प्रकोप माना जाता है। इसी तरह ज्वालामुखी तथा प्रलय आदि को अथवा दैवी आपदा मानकर मिथ कथाओं से जोड़ दिया गया है। ‘कामायनी’ में प्रलयंकारी विनाशलीला के पश्चात ‘मनु की चिन्ता’ प्रसंग को भी प्राकृतिक मिथकों के अन्र्तगत रखा जा सकता है।

प्राकृतिक मिथक

मानव समाज द्वारा प्रकृति प्रारम्भ से ही पूज्य रही है। भारतीय समाज में जल, वायु, अग्नि, नदी इत्यादि को देवता के रूप में देखा गया। इनका जन्म, कार्यप्रणाली आदि से सम्बन्धित कथा प्रसंग वाले मिथक इसी श्रेणी में आते हैं। जैसे गंगावतरण की कथा।

सृष्टि जन्म सम्बन्धी मिथक

इस श्रेणी में संसार के उदय, उसके नियत कर्मों तथा विनाश आदि की जानकारी प्राप्त होती है। हिन्दू मान्यता के अनुसार ब्रहमा, विष्णु, महेश इन तीनों को ही सम्पूर्ण सृष्टि का उत्पत्तिकर्त्ता, पालनकर्ता और संहारक माना जाता है। इस प्रकार के मिथक इस कोटि में आते हैं। सृष्टि उत्पत्ति की मनुसम्बन्धी कथा को भी इसकी सीमा में लाया जा सकता है।

देवत्व सम्बन्धी मिथक

देवत्व सम्बन्धी मिथक से तात्पर्य ऐसे मिथकों से है, जिनके अन्तर्गत देवी-देवताओं की कथाओं का वर्णन होता है। इन कथाओं में देवी-देवताओं के जन्म, उनके दैत्य संहार तथा जग कल्याण का वर्णन होता है। इसी तरह गंगा को पाप नाशिनी, गणेश को विघ्नहर्त्ता और सरस्वती को वरदायिनी तथा ज्ञानदायिनी सम्बोधन देने की कथा और इनके जन्म आदि की कथाओं को देवत्व सम्बन्धी मिथक माना जा सकता है।

प्राणी जन्म सम्बन्धी मिथक

संसार में मानव के अलावा भी अनेकों ऐसे प्राणी हैं, जिन पर संसार में होने वाले हर छोटे-बड़े परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है। ऐसे ही प्राणियों के जन्म से सम्बन्धित मिथकों का वर्णन इस श्रेणी में होता है। जैसे कि हमारे हिन्दू समाज में प्रलय के पश्चात ् संसार का उदय हुआ तो मनु को प्रथम पुरूष तथा श्रद्धा को प्रथम स्त्री के रूप में दर्शाया गया है, इनके पश्चात ् ही संसार में उत्पत्ति का क्रम आगे बढ़ा। ठीक उसी प्रकार ग्रीक सभ्यता में आदम और हव्वा को सृष्टि उत्पत्ति का कारण माना गया है। यह मिथक इस श्रेणी के प्रमुख उदाहरण हैं।

जीव के आवागमन सम्बन्धी मिथक

कहा जाता है कि मनुष्य तथा अन्य किसी भी प्राणी को अपने कर्मों के अनुसार ही फल भोगना होता है, हम अच्छा या बुरा जैसा भी कर्म इस जन्म में करते हैं, उसका परिणाम अगले जन्म में भोगना पड़ता है। इसी के अनुसार जीव के आवागमन का सिद्धान्त प्रतिपादित होता है। जैसे कि मनुष्य की चौरासी लाख योनियाँ।

धीर उदात्त तथा वीर नायकों सम्बन्धी मिथक

इस श्रेणी में ऐसे प्राचीन कथा कहानियों का वर्णन होता है, जो कि एक निडर निष्ठावान कुशल नायक अथवा योद्धा के जीवन चरित्र को उजागर करती है। इन कहानियों में नायक के कुल के इतिहास तथा उसका देश के प्रति समर्पण का भी विस्तृत ज्ञान होता है। श्री राम तथा श्री कृष्ण के भी धीरोदात्त नायक होने का वर्णन, भीष्म का प्रतिज्ञाबठ्ठ तथा अर्जुन का श्रेष्ठ धर्नुधारी के रूप में मान्यता व महानयोद्धा कर्ण की श्रेष्ठ दानवीर के रूप में मान्यता इसी श्रेणी के मिथकीय उदाहरण हैं।

सामाजिक क्रिया-कलापों, संस्थाओं सम्बन्धी मिथक

प्रत्येक मनुष्य प्रारम्भ से ही एक समाज में रहता है इसलिए उसे एक सामाजिक प्राणी की संज्ञा दी जाती है। सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिये सामूहिक प्रयासों से जो नियम-कानून प्रचलन में आते गये हैं। उन्हें इस मिथकीय श्रेणी के अन्र्तगत लाया जा सकता है जैसे विवाह नामक संस्था समाज को पतनोन्मुख होने से बचाती है – इस लोक विश्वास के कारण ही समाज में इसे मान्यता मिली है यह अलग बात है कि हर युग में इसका रूप अलग-अलग है।

मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का मिथक

मानव शरीर नश्वर है तथा आत्मा अजर अमर। मनुष्य अपनी मृत्यु के पश्चात कहाँ जाता है? यह सब मनुष्य के कर्मों के आधार पर ही तय होता है कि मनुष्य स्वर्ग का अधिकारी है अथवा नरक का। पुर्नजन्म आदि को भी इसी श्रेणी में रखा गया है। इस भौतिक शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी आत्मा विद्यमान रहती है या नहीं, उसका अस्तित्व है या नहीं। यह सभी रहस्यपूर्ण तथ्य इन्हीं मिथकों की श्रेणी में आते हैं।

दानवों से सम्बन्धित मिथक

जिस प्रकार भारतीय परम्परा में देवताओं के जन्म इत्यादि से सम्बन्धित मिथक हैं, उसी प्रकार से दैत्यों अथवा दानवों से सम्बन्धित मिथक भी समाज में प्रचलित हैं। देवता तथा दानव दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ समाज में प्रारम्भ से ही विद्यमान थीं। देव अच्छाई तथा दानव बुराई के प्रतीक थे। यही तथ्य आज भी विद्यमान है। देवता तथा असुरों के संग्राम की जो कथा कहानियाँ समाज में प्रचलित हैं वो इसी श्रेणी के मिथक हैं। जैसे कि श्रीकृष्ण का कंस, जरासन्ध आदि के साथ युद्ध तथा माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज आदि दानव का वध और समुद्र मन्थन का वर्णन। इन सभी को इस वर्ग के अन्र्तगत देखा जा सकता है।

ऐतिहासिक सन्दर्भो के मिथक

इस श्रेणी के अन्तगर्त ऐसे तथ्य उदघाटित होते है, जिनका सम्बन्ध प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओं से है, ऐसे ऐतिहासिक पात्र जिनका प्रामाणिक आधार इतिहास सम्मत होते हुए भी पौराणिकता के समीप पहुँच गया है। कवि चन्दरवरदाई द्वारा ‘पृथ्वीराज रासो’ की रचना में पृथ्वीराज का ऐतिहासिक चरित्र जनमानस के आस्था-विश्वास के कारण मिथ चरित्र बन गया है।

ए.जी. गार्डनर के अतिरिक्त भी कई ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने मिथकों का उनकी प्रकृति के अनुरूप वर्गीकरण किया। उन पर एक दृष्टि डालना आवश्यक है इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम कॉक्स के अनुसार किया गया विभाजन प्रस्तुत है –

(क) अन्तरिक्ष (द एथीरियल हैवैवेन्स) इनमें द्यौस,् वरूण, मित्र, इन्द्र, ब्रहमा आदि से सम्बन्धित मिथक आते हैं।

(ख) आलोक (द लाइट) सूर्य, सवितृ, सोम, उर्वशी, उषस ् आदि के मिथक।

(ग) अग्नि (द फायर) अग्नि से सम्बन्धित मिथक।

(घ) वायु (द विंडंडस्स् ) वायु, मारूत, रूद्र आदि के मिथक।

(ड़) जल

(च) मेघ

(छ) पृथ्वी

(ज) अधोलोक (द अंडर वर्ल्ड)

(झ) अन्धकार – वृत्र, पाणि के मिथक।’

डॉ. सत्येन्द्र द्वारा वर्गीकृत मिथकों के प्रकार इस तरह से हैं-

  1. विश्व निर्माण की व्याख्या करने वाले मिथक।
  2. प्रकृति के इतिहास की विशेषतायें बताने वाले।
  3. मानवीय सभ्यता के मूल की व्याख्या करने वाले।
  4. समाज व धर्म प्रथाओं के मूल अथवा पूजा के इष्ट के स्वभाव तथा इतिहास की व्याख्या करने वाले।

डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, परम्परा और प्रचलन क्षेत्र की दृष्टि से मिथकों को दो वर्गों में रखा जा सकता है – जनजातीय और पाठीय। ट्राइबल मिथकों में पवित्रता, अपवित्रता की धारणा विशेष रूप से मिलती है, यद्यपि पाठीय परम्परा में भी अभिचार-कर्म से सम्बन्धित मिथक सामग्री को किंचित हेय दृष्टि से देखा ही गया है। ट्राइबल मिथकों का अध्ययन-विश्लेषण मानववादी और समाजशास्त्रीय ज्ञान धाराओं में विशेष रूप से हुआ है और इस प्रयत्न के अन्तर्गत इन्हें लिपिबद्ध भी किया गया है। पाठीय (वैदिक, पौराणिक) मिथक दर्शन और धर्म की विचारणाओं के आधार बने रहे हैं। मिथकों को स्वतन्त्र विषय के रूप में लेकर चलने वाले अध्येताओं ने दोनों धाराओं को अपनी विचार दृष्टि में रखा है। वैषयिक दृष्टि से मिथकों को इस प्रकार श्रेणीबद्ध कर सकते हैं –

सृष्टिपरक मिथक

विश्व और इसकी वस्तुओं के उदय की कथाएँ।

देववर्गीय मिथक

देवों के जन्म, कर्म और स्वरूप से सम्बन्धित कल्पनाएँ तथा कथाएँ।

प्राणिवगीर्य मिथक

मानव और पशुओं के उदभव और कर्म, आखेट, कृषि से सम्बन्धित विश्वास कथाएँ। विभिन्न प्रथाओ और संस्थाओं के उद्धव की कथाएँ।

प्रकृतिपरक मिथक

ऋतु चक्र, ऋतु व्यवस्था (प्रकाश, अन्धकार, दिन-रात) आदि से सम्बन्धित कथाएँ।

अस्तित्व वर्गीय मिथक

जन्म-मरण विषयक धारणाएँ-कथाएँ। प्रेत योनि, स्वर्ग-नरक आदि। दो उपभेद किये जा सकते हैं – लोकात्मक और लोकोत्तर।

कर्मकाण्डीय मन्त्रात्मक मिथक

विभिन्न अनुष्ठानों (औत्सविक, सामाजिक, धार्मिक) तथा व्याधि के उपचार कर्म से सम्बन्धित मन्त्र।

इतिहासधर्मी मिथक

ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर बनने वाले मिथक।

इनकी श्रृखंला जीवित वर्तमान तक चली आती है।

मिथकों के विभाजन के उक्त आधारों को देखते हुए एक बात निश्चित रूप से ज्ञात होती है कि प्राय: अधिकांश मिथक प्रकृति तथा ईश्वर से सम्बन्धित हैं जैसे – स्थूलत: सभी प्रकार के मिथकों को स्काटलैण्ड के प्रौफेसर एच.के. रोज द्वारा वर्गीकृत- 1. सृष्टि सम्बन्धी मिथक 2. प्रलय सम्बन्धी मिथक 3. देवताओं सम्बन्धी मिथक के अन्र्तगत समाहित किया जा सकता है। सृष्टि सम्बन्धित मिथकों में सृष्टि की उत्पत्ति एवं विनाश से सम्बन्धित कथाओं को, प्रलय सम्बन्धी मिथक के अन्र्तगत विविध आपदाओं को तथा देवताओं सम्बन्धी मिथकों के अन्र्तगत देव उत्पत्ति, असुर संग्राम जैसी कथाओं को सम्मिलित कर सकते हैं।

इस प्रकार हमारे समक्ष रहने वाली प्रत्येक वस्तु-विशेष में मिथक विद्यमान होते हैं। चाहे वह प्रकृति हो, समाज हो, हमारा इतिहास हो या फिर कि हमारे धर्म, पुराण, इत्यादि। सभी में मिथकों का अस्तित्व किसी न किसी रूप में विद्यमान है। यहाँ तक की हमारे दैनिक व्यवहार में भी मिथक अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं।

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