बहुराष्ट्रीय कंपनी किसे कहते हैं?

अनुक्रम
बहुराष्ट्रीय कंपनी

बहुराष्ट्रीय कंपनी से आशय ऐसी कम्पनी से है, जिसके कार्य क्षेत्र का विस्तार एक से अधिक देशों में होता है जिसकी उत्पादन एवं सेवा सुविधाएं उस देश से बाहर हैं। ये कम्पनियाँ ऐसी होती है जिसका प्रधान कार्यालय एक देश में स्थित होता है परन्तु वे अपनी व्यापारिक क्रियाएं मौलिक देश में आरम्भ होने के पश्चात् उसके सीमाओं के बाहर भी फैली होती है अत: निम्न बातें बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए आवश्यक हैं :-
  1. एक से अधिक देशों में अपनी सेवाएं प्रदान करती हो।
  2. उन देशों मं अनुसंधान, विकास एवं निर्माण का कार्य करती है।
  3. जिसका बहुराष्ट्रीय प्रबन्ध होता है, एवं
  4. जिसका स्कन्ध स्वामित्व बहुराष्ट्रीय हो।
ऐसी कम्पनियों को अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी या राष्ट्रपारीय कम्पनी को भी कहा जाता है। वर्तमान समय में इसके लिए बहुराष्ट्रीय कंपनी अधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय शब्द है। ऐसी कम्पनियों की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनके प्रमुख निर्णय पूरे विश्व के संदर्भ में एक साथ लिये जाते है। जिसके कारण इनके निर्णय बहुधा उस देशों की नीतियों से बेमेल हो जाते है। ये कम्पनियां जिन देशां में अपना कारोबार करती है। उन देशों में इनकी क्रियाओं की प्रतिक्रिया क्या होगी इसका ध्यान नहीं देती है।

बहुराष्ट्रीय कंपनी के उदय और प्रसार से उत्पादन और निवेश का भी अन्तर्राष्ट्रीयकरण हुआ है जिसके फलस्वरूप बाजारों में अल्पाधिकार और केन्द्रीयकरण का विकास होता हैं यद्यपि कम्पनियों का उद्भव विगत वर्षों में ही हुआ है। तथापि इनका विस्तार विश्व के अनेक देशों में हो चुका है। इस प्रकार के कम्पनियां विश्व के लगभग सभी देशों में विद्यमान है। संयुक्त राज्य अमेरिका में इनकी संख्या सर्वाधिक है। संयुक्त राष्ट्र संघ, 2004 की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2004 में पूरे विश्व में लगभग 39,332 बहुराष्ट्रीय कम्पनिया कार्यरत थी। ये कम्पनियां विश्व की कुल पूंजी की 1/3 भाग के स्वामी थी। इन कम्पनियों कबा कार्यक्षेत्र अपने देशों के बाहर विकसित और विकास शील दोनों ही प्रकार के देशों में फैल चुका है। यहां तक की सोवियत रूस जैसा समाजवादी देश भी इनकी पहुच से बाहर नहीं रह सका, बहुराष्ट्रीय कंपनी का असितत्व अल्पविकसित देशों में भी देखा जा सकता, अनुमान है इन देशों में इनकी संख्या एक हजार से ऊपर ही है, अल्पविकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अन्य विकासशील देशों में कार्य करती है। किन्तु विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनी की प्रतिस्पर्धा के सम्मुख यह कहीं ठहर नहीं पाती है।

भारत में इस प्रकार की अनेक कम्पनियां है जैसे पाण्ड्स, वारेन टी, सीबा, कोलगेट, पामोलिव, हिन्दुस्तान लीवर लि0, ग्लैस्को, नैरोलक पेण्ट्स, पेप्सी, कोला, राथमन्स, फाइजर इत्यादि। जो औषधि उद्योग, विद्युत मशीनरी, रासायन, एल्यूमिनियम धातु और उत्पाद इंजीनियरिंग, समान खाद्य पदार्थ आदि उद्योगों में कार्यरत है।

बहुराष्ट्रीय कंपनी की विशेषताएँ 

  1. बहुराष्ट्रीय क्रियाकलाप: बहुराष्ट्रीय कंपनी की पहली विशेषता यह है कि इनकी क्रियाएं किसी एक राष्ट्र में सीमित न होकर अनेक राष्ट्रों तक चलती है। इसके लिए ये अपने देश में मुख्य कम्पनी का हिस्सा 51 प्रतिशत या इससे अधिक होता है। इस प्रकार कम्पनी इन शाखाओं व सहायक कम्पनियों पर नियन्त्रण करती रहती है।
  2. साधनों का हस्तानन्तरण : इन कम्पनियों की दूसरी विशेषता यह है कि ये अपने साधनों को सहायक कम्पनियों व शाखाओं में हस्तान्तरित कर देते है। ये अपनी तकनीकी, प्रबन्धकीय, सेविवर्ग, कच्चा एवं पक्का व तैयार माल आदि को अपनी सहायक कम्पनियों व शाखाओं पर आसानी से हस्तान्तरित कर देते है।
  3. विशाल आकार : इन कम्पनियों की तीसरी विशेषता यह है कि बहुत विशाल आकार की होती है इनकी पूंजी व बिक्री अरबों रूपये में होती है। उदाहरण के लिए आई0बी0एम0 या जनरल मोटर्स की बिक्री अरबों रूपयों में होती है।
  4. बहुराष्ट्रीय स्कन्ध स्वमित्व : इन कम्पनियां की पूंजी में हिस्सा अनेक राष्ट्रों का होता है।
  5. बहुराष्ट्रीय प्रबन्ध : इन कम्पनियों का प्रबन्ध बहुराष्ट्रीय होता है। अर्थात प्रबन्ध मण्डल में अनेक राष्ट्रों में व्यक्ति होते है। जो तकनीकी, आर्थिक, प्रबन्धकीय दृष्टि से विशेषज्ञ होते है।
  6. विपणन रचनाएं : इन निगमों की विपणन रचनाएं बहुत प्रभावी होती है व श्रेष्ठ होती है ये कम्पनियां वस्तु या सेवा को बेचने से पहले बाजार सर्वेक्षण करती है। 

बहुराष्ट्रीय कंपनी के उद्देश्य

बहुराष्ट्रीय कंपनी के उद्देश्य इस प्रकार है :-

1. विदेशी पूंजी निवेश में अत्यधिक वृद्धि : भारत सरकार द्वारा वर्ष 1991 में उदारीकरण की नीति प्रारम्भ करने के साथ ही इन सभी में बदलाव आया। उदाहरणार्थ विदेशी निवेश शामिल करने वाले सहयोग के अनुमोदन वर्ष 1991 के 289 की तुलना में वर्ष 1994 में बढ़ाकर 1062 हो गए। अनुमोदित विदेशी निवेश की कुल राशि जो 1991 में 530 करोड़ रूपये थी, 1994 में बढ़ाकर 1062 हो गए। अनुमोदित विदेशी निवेश की कुल राशि जो 1991 में 530 करोड़ रूपये थी, 1994 में बढ़ाकर 14,190 करोड़ तक पहुंच गयी। वर्ष 1994 के दौरान कुल 21,972 करोड़ रूपये की वास्तविक पूंजी का उत्प्रवाह हुआ जो एक बिलियन डालर के निकट है। जबकि वर्ष 1971-80 की अवधि में लगभग 59, 92 करोड़ रूपये तथा वर्ष 1981-90 की अवधि में 1,274.02 करोड़ रूपये की विदेशी पूंजी निवेश ही किया गया था।

स्वीकृत की गयी परियोजनाओं में 518 परियोजनाओं में विदेशी इक्विटी भागीदारी 0-25 प्रतिशत तक, 668 परियोजनाआं में 26-50 प्रतिशत, 348 परियोजनाओं में 50-74 प्रतिशत तथा 147 परियोजनाओं में 74 -100 प्रतिशत तक है। इनमें से 80 प्रतिशत से अधिक प्रस्ताव प्राथमिकता क्षेत्र के लिए है। विभिन्न क्षेत्रों के लिए स्वीकृत प्रस्तावों का विवरण निम्न प्रकार है। ईधन एवं तेल शोधन-शालाओं में 2394.06 करोड़ रूपये, विद्युत 2,013,81 करोड़ रूपये, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग 1,390,.28, धातुई उद्याग 321.40, धातुई उद्योग 321.40 करोड़ रूपये , विद्युत उपकरण तथा इलेक्ट्रानिकी 1,107.76 करोड़ रूपये, रसायन उद्योग 914.13 करोड़, होटल एवं पर्यटन सम्बन्धी उद्योग 721.56 करोड रूपये, परिवहन उद्योग 512.82 करोड़ रूपये, औद्योगिकी मशीनरी एवं उपकरण 313.80 करोड़ रूपये, दूरसंचार 179.42 करोड़ रूपये, कागज एवं लुगदी 145.87 रूपये, कांच एवं चीनी मिट्टी 118.45 करोड़ रूपये। संयुक्त राज्य अमरीका के वर्ष जापान के 1991 में 52.71 करोड़ रूपये , वर्ष 1992 में 610.28 करोड़ रूपये तथा वर्ष 1993 में जून तक 103.67 करोड़ रूपये के प्रस्ताव स्वीकृत किये गये।

अनिवासी भारतीयों के लिए वर्ष 1993 में 30 जून तक 255.86 करोड़ रूपये के प्रस्ताव स्वीकृत किये गये जबकि वर्ष 1991 तथा वर्ष 1992 में स्वीकृत किये गये प्रस्तावों की राशि क्रमश: 197 करोड़ रूपये तथा 439.13 थी। इसी क्रम में जर्मनी, स्विटजरलैण्ड, आस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम, मलेशिया, नीदर लैण्ड्स, सिंगापुर, इटली, स्वीडन तथा दक्षिण कोरिया से भी भारी मात्रा में पूंजी निवेश किए जाने के प्रस्ताव स्वीकृत किये गये। फरवरी 1994 तक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड के पास 145 विदेशी संस्थागत निवेशक पंजीकरण करा चुके थे। एवं इनके माध्यम से 4139 करोड़ रूपये के बराबर विदेशी पूंजी

भारत आ चुकी थी। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अगस्त 1991 से सितम्बर 2006 की अवधि देश में 18,1566 करोड़ रूपये (43.29 ) अरब डालर रहा। 2006-07 में पहले छ: महीनों (अप्रैल- सितम्बर) की अवधि में यह 20115 करोड़ रूपये (4.38 अरब डालर) बताया गया। समीक्षा के अनुसार 2006- 07 की पहली छमाही में भारत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का चौथा बड़ा लक्ष्य प्राप्त करने वाला देश रहा है। इस छमाही में देश में एफ0डी0आई0 का सर्वाधिक 6.05 अरब डालर का अन्र्तप्रवाह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में हुआ।

भारतीय पूंजी बाजार के विदेशी निवेश के लिए खोलने और बेहतर दर्जे की कम्पनियों के विदेशी शेयर बाजारों में अपने स्टाक के सूचीकरण द्वारा विदेशी निवेशकों से सम्पर्क करने की अनुमति देने के कदम उठाये गये। इस प्रस्ताव का मुख्य कारण था कम से कम अंशत: भारतीय पूंजी बाजार को सार्वभौमिक पूंजी बाजार से समन्वित किए जाए और इस प्रक्रिया में भारतीय उद्योग और विदेशी निवेशकों, दोनों के लाभ के लिए रास्ता खोला जाए। इससे जहाँ एक और उद्योग में निवेश के लिए विदेशी पूंजी की अधिक प्राप्ति से लाभ होगा। वहीं विदेशी निवेशकों को भी बेहतर प्रतिफल के द्वारा लाभ होगा, क्योंकि इस समय प्रगतिशील बाजारों में से भारतीय पूंजी बाजार बहुत आकर्षक है। 

बहुराष्ट्रीय कंपनी के गुण

बहुराष्ट्रीय कंपनी के द्वारा विकासशील देशों के औद्योगीकरण में सहायता पहुचायी गयी है। जहां विकासशील देश पूंजी व तकनीकी देने में असमर्थ थे, वहाँ इन बहुराष्ट्रीय कंपनी ने भारी मात्रा में पूंजी ही नहीं लगायी है, बल्कि तकीनकी भी प्रदान की है, जिससे कि उन देशां में औद्योगिक उत्पादन की नींव ही नहीं रखी है, बल्कि उसके विकास में भारी योगदान दिया है। इन बहुराष्ट्रीय कंपनी ने ऐसे उद्योगां की स्थापना इन विकासशील देशों में की है, जिनमें भारी मात्रा में पूंजी व आधुनिक तकनीकी की आवश्यकता होती है: जैसे पेट्रोलियम, रसायन, खनिज आदि। भारत में बरमाह शैल व करारैक्स पेट्रोलियम के क्षेत्र में इन्हीं कम्पनियों की देन थी।

भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनी ने साधानों के बारे में पता लगाकर उनके विदोहन का कार्य प्रारम्भ किया, जिसे भारत उन परिस्थितियों में नहीं कर सकता था। बहुराष्ट्रीय कंपनी ने जब यह पाया कि भारत में श्रम सस्ता है तो उन्होंने उनका लाभ प्राप्त करने के लिए उत्पादन तकनीकी में अनेक बार महत्वपूर्ण परिर्वतन किये, जिससे कि उत्पादन आधुनिक व अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि से प्रतियोगी बन गया जो देश के हित में ही रहा। इन कम्पनियों ने शोध एवं विकास पर पर्याप्त मात्र में व्यय तथा मुख्य कार्यालय के शोध एवं विकास का लाभ शाखा कार्यालय व सहायक कम्पनियों को भी दिया, जिससे अल्पविकसित देशों में औद्योगीकरण में सहायता मिली है। बहुराष्ट्रीय कंपनी ने विपणन कार्य भी कुशलता से कर निर्यात को बढ़ावा दिया है इसके लिए बाजार, शोध, विज्ञापन, विपणन सुविधाओं का प्रसारण, भण्डार प्रबन्ध, पैकेजिंग आदि का भी विकास किया है, जिससे कि वस्तु उपभोक्ता तक उचित प्रकार में पहुच सके। इनके द्वारा बृहत स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जाते है, जिससे देश में रोजगार की सुविधाएं बढ़ी है।

विकसित देशों में जन्मी बहुराष्ट्रीय कंपनी के कार्यक्षेत्र देशों में अपेक्षाकृत अधिक व्यापक हैं इनके क्रियाकलाप में वे सेवाए शामिल हैं, जिनका सम्बन्ध पूंजीगत तकनीकी अन्तरण, उत्पादन के वितरण आदि की जानकारी के लिए शोध और उनके विकास से है। दूसरे स्तर पर वस्तु और उत्पादन आते है इनसे सम्बन्धित कार्यकलाप मुख्य रूप से खनिज ओैर पेट्रोलियम जैसे क्षेत्रों से सम्बन्धित है। इसके अलावा ये निगम बेबी फूड और कृषि उत्पाद सहित ख् ााद्य सामग्र के क्षेत्र में भी कार्य करते हैं इतना ही नहीं इनका दखल अल्पविकसित देशों को विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात के क्षेत्र में भी हैं इन सेवाओं और उत्पादों को उपलब्ध कराने में यह उत्पाद और क्रेता दोनां रूपों में कार्य करते हैं भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनी औषधि उद्योग, विद्युत मशीनरी, रासायन, एल्यूमिनियम धातु और उत्पाद, भारी इंजीनियरिंग समान, खाद्य पदार्थ आदि उद्योग में कार्यरत है।  बहुराष्ट्रीय कंपनी की उपदेयता एवं लाभ निम्नवत है:-

1. शोध एवं विकास

तकनीकी प्रगति के लिए तकनीकी विषयक शोध एवं विकास पर होने वाले व्यय का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। इस व्यय का एक बड़ा भाग बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा उनके अपने देश के बाहर किया जाता है, यद्यपि यह व्यय भारत सहित अन्य विकासशील देशों में बहुत कम है, फिर भी इस समिति व्यय से कुछ लाभ उठाये जा सकते है। सामान्यत: इस व्यय में वृद्धि की जा सकती है ओर की भी जानी चाहिए, क्योंकि अल्पविकसित देशों में लोगों का जीवन-स्तर विकसित देशों की तुलना में बहुत निम्न स्तर का है। बहुराष्ट्रीय कंपनी शोध एवं तकनीकी विकास पर पर्याप्त धनराशि व्यय करें, जिससे देश में तकनीकी प्रगति हो और देश में आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने में सहायता प्राप्त हो सके।

2. विदेशी पूंजी और तकनीकी की आपूर्ति 

किसी भी व्यवसाय को प्रारम्भ करने की पूंजी की आवश्यकता होती है। औद्योगीकरण को जन्म देने के लिए भारत जैसे देश पूंजी की पर्याप्त मात्रा में कमी थी, जिससे हमारे लिए यह आवश्यक हो गया था कि विदेशी सहयोग के माध्यम से पर्याप्त मात्रा में विदेशी पूंजी प्राप्त करें, क्योंकि जिस प्रकार शरीर को जीवित करने के लिए रक्तसंचार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार किसी व्यवसाय को पुर्नजीवित करने के लिए पंजी की आवश्यकता होती हैं। विश्व के पिछड़े तथा विकासशील राष्ट्रों की आर्थिक विषमता को दूर करने में विदेशी पूंजी की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। भारत को विदेशी पूंजी निम्नलिखित रूप से प्राप्त होती है। 
  • (अ) प्रत्यक्ष निवेश बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा निवेश 
  • (ब) अप्रत्यक्ष निवेश- विदेशियों द्वारा भारतीय कम्पनियों के हिस्से अथवा डिबेंचर (ऋण -पत्र) 
  • (स) विदेशी पूंजी जिसे विदेशी सहायता अथवा वाह्य सहायता भी कहते है। 
यह पूंजी बैंक (आई0बी0आर0डी0) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई0एम0एफ0) तथा अन्य संयुक्त राष्ट्र एजेन्सियों के अनुदानों तथा ऋणों के रूप में प्राप्त होती है। अर्थव्यवस्था मं खुलापन आने के फलस्वरूप विदेशी निवेश अब 250 से 400 करोड़ डालर प्रतिवर्ष आने लगा हैं भारत में 1994 के दौरान मात्र 95 करोड़ डालर का निवेश हुआ जबकि 1995 में यह राशि बढ़कर 2.12 अरब डालर पहुच गयी। इस प्रकार 1951-95 तक कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मात्र 4 अरब डालर हुआ है। वाणिज्य मंत्रालय के संशोधित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2004-05 के पहले 11 महीनों में भारत से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का अन्तप्रर्वाह 447 करोड़ डालर का रहा है। विदेशी पूंजी निवेश की तेजी से भारत में बढ़ने के फलस्वरूप कई समस्याएं भी पैदा होती हैं जैसे विदेशी निवेशक उन्हीं क्षेत्रों में पूंजी निवेश लगाने को प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिसमें अधिक लाभ की गुंजाइश है उदाहरण स्वरूप कोका कोला, पेप्सी आदि। औद्योगिक नीति 1991 के अन्तर्ग्ात जहां एक ओर घरेलू विनियमन व्यवस्था में सुधार किए गये, वहीं दूसरी और प्रत्यक्ष निवेश के भारत में प्रवाह को बढ़ाने के लिए विदेशी निवेश से सम्बन्धित अनेक विनियमां में भी सुधार किए गए है। ये सुधार है:-
  1. उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में विदेशी इक्विटी की अधिकतम सीमा को 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 51 प्रतिशत कर दिया गया है।
  2. गैर प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में विदेशी निवेश सम्बन्धी नीति को उदार बनाया गया है। इस कार्य के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त विदेशी निवेश सम्बर्द्धन (एफ0आई0पी0बी0) का गठन किया गया है। यह बोर्ड बहुराष्ट्रीय कंपनी के विदेशी निवेश सम्बन्धी मामलों में शीघ्रता पूर्वक निपटाने का कार्य करता है।
  3. उच्च प्रौद्योगिकी तथा भारी निवेश प्राथमिकता वाले उद्योगों को विनिर्दिष्ट सूची के लिए फार्मो के कुछ मार्गदश्र्ाी सिद्धान्तों के अन्तर्गत विदेशी प्रौद्योगिकी करार करने की स्व: अनुमति प्राप्त हो गई है। इसके लिए दी जाने वाली रायल्टी की सीमा घरेलू बिक्री का 5 प्रतिशत तथा निर्यात बिक्री का 8 प्रतिशत रखी गई है। अधिकाधिक विदेशी पूंजी निवेश को भारत में आकर्षित करने के लिए सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों पेंशन फण्ड्स, निवेश, न्यास, मैनेजमेंण्ट कम्पनियां, नोमनी कम्पनियां, निगमित व संस्थागत पोर्ट फोलियों प्रबन्धकों आदि को भारतीय पूंजी बाजार में प्रत्यक्ष निवेश करने की छूट प्रदान कर दी है। ये संस्थागत निवेशकर्ता अब सभी प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेश करते है, परन्तु ऐसा करने से इन्हें भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (एस0ई0बी0आई0) के तहत पंजीकरण कराना होता है। विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा द्वितीयक बाजार में किए गए निवेशको के बीच कोई लॉक-इन-पीरियड भी नहीं है, किन्तु कोई एक संस्थागत निवेशक किसी एक कम्पनी के तहत 5 प्रतिशत से अधिक शेयर क्रय नहीं कर सकता तथा कम्पनी की कुल विदेशी इक्विटी 51 प्रतिशत से अधिक भी नहीं हो सकती।
बहुराष्ट्रीय कंपनी के माध्यम से तकनीक का अन्तरण भारत सहित विभिन्न देशों में हुआ। इतना ही नहीं, यह बहुराष्ट्रीय कंपनी के विकास में समर्थ हो सकती हैं और रही भी है। इसका कारण यह है कि इनके पास विशाल मात्रा में कौशल और संसाधन उपलब्ध है। इनके प्रयोग से श्रम तकनीक का विकास किया जा सकता है। सरकार ने करारोपण में सुधार हेतु डा0 राजा चेलैया की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए वर्ष 1993-94 के बजट में सीमा शुल्कों में व्यापक रहात प्रदान करने की घोषणा की। अप्रत्याशित कमी से न केवल विदेशों से मशीनरी और नवीन प्रौद्योगिकी देशी में आएगी, बल्कि भारत लौटने वाले प्रवासी भारतीय अब अपने साथ अधिक समान ला सकेगे। इससे घरेलू उद्योगों को घरेलू तथा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतियोगिता के अधिक अवसर प्राप्त हुए। घरेलू उ़द्योगों में आयातित वस्तुओ की टक्कर में समान स्तर प्रदान करने के उद्देश्य से भारतीय उद्योगों के उत्पाद शुल्क मे भारी रियायतें प्रदान की गई। ये रियायतें उदारीकरण के अन्य कार्यक्रमों के पूरक रूप थी।

4. औद्योगिक उत्पादन का व्यापक आधार 

भारत में औ़द्योगिक उत्पादन के लिए आवश्यक व्यापार आधार निर्मित हो चुका है तकनीकी एवं प्रबन्ध कुशलता में भी सक्षम है। सारे देश में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही हैं जिसके लिए यह आवश्यक हो गया है। कि उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उत्पादन बृहत पैमाने पर किया जाए। बहुराष्ट्रीय कंपनी के माध्यम से उत्पादन बृहत पैमाले पर करके उपभोक्ताओं की मांग को पूरा किया जा सकता है। देश में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है और इन सबसे ऊपर तैयार माल की ख् ापत के लिए बहुत बड़ा घरेलू बाजार हैं। ऐसी परिस्थितियों में निजी क्षेत्र के उत्पादक यदि कम कीमत पर उच्च कोटि की वस्तुओं का उत्पादन करने लगता हैं और वे वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा में बाजार में टिक भी जाती है तो खपत के साथ-साथ निर्यात में भी वृद्धि होगी।

श्रम प्रधान तकनीकी के आलवा, उत्पादन का क्षेत्र ऐसा भी हैं, जिनका विकास पूंजी प्रधान तकनीकी के बिना नहीं हो सकता जैसे : पेट्रोलियम, रसायन, उर्वरक खनिज आदि इन क्षेत्रों में तकनीकी का अन्तरण लाभप्रद हो सकता हैं, ऐसी तकनीकी का उत्पादन चाहे, स्थानीय हो या आयात पर निर्भर, इसके लिए बहुत अधिक साधन और समय की आवश्यकता होती है समय की बचत करने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनी का सहारा लिया जा सकता है, विशेषतया कच्चे तेल जैसी आवश्यक वस्तु के उत्पादन की संभावनाओं की वृद्धि के लिए। भारत में यदि बहुराष्ट्रीय कंपनी पूंजी-प्रधान तकनीक के साथ सस्ती दर पर ऐसी वस्तुओं की आपूर्ति करने में सक्षम हैं, जिनके उत्पादन में अधिक पूंजी की आवश्यकता पड़ती है तो यह समय के लिए वांछनीय हो सकता है और इस व्यय की जानें वाली पूंजी का उपयोग अन्य क्षेत्रों में करके विकास की गति को तीव्र किया जा सकता है।

5. विपणन सम्बन्धी सुविधा 

बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा वस्तुएं एक देश से दूसरे देश, विशेषत: अल्पविकसित देशों में विकसित देशों को वस्तुओं की आदान-प्रदान होता है, जिससे देश देशों की संस्कृति एवं सभ्यता का विकास होता हैं विपणन एक ऐसी क्रिया है जिसमें विभिन्न प्रकार के क्रियाकलाप सम्मिलित है, जिन्हें बहुराष्ट्रीय कम्पनी अल्पविकसित देशां में अपेक्षाकृत अधिक कुशलता से कर सकती हैं इन क्रियाकलापों में बाजार सम्बन्धी शोध, विज्ञापन, विपणन सूचनाओं का प्रसार, गोदाम, यातायात, पैकिंग की डिजाइन तैयार करना, वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुचाना आदि सम्मिलित हैं यह भी कार्य अल्पविकसित देशों के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ बहुत अधिक कुशलता से करती हैं किन्तु अल्पविकसित देशों में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

6. सेवा क्षेत्र में उपलब्धियाँ 

सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता ( Gendral Agreement of Trade in Service) नाम से गैट समझौता व डंकल प्रस्ताव में एक प्रावधान यह है कि सदस्य देशों की सेवाओं के व्यापार पर लगे प्रतिबन्धों को समाप्त करना। इसके अनुसार बैंक, बीमा, शिक्षा, पर्यटन, संचार, स्वास्थ्य, यातायात, टेलीकम्यूनिकेशन, इंजीनियरिंग, जहाजरानी, वायुसेवा, परामर्श, विज्ञापन, मीडिया, डाटा, प्रोसेसिंग, आदि सेवा क्षेत्रों को प्रतिबन्ध मुक्त करना। और इन क्ष् ोत्रों में विदेशी कम्पनियों को घरेलू कम्पनी का दर्जा देना। इन कम्पनियों के साथ सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र की तरह व्यवहार करना। बैंकिग, बीमा, जनसंचार, शिक्षा, पर्यटन, स्वास्थ्य, टेलीकम्यूनिकेशन, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्र की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनी, का भारत में प्रवेश इससे इन क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जिसका लाभ आम उपभोक्ताओं को मिलेगा। सेवा क्षेत्र सम्बन्धी गैट समझौते के इन प्रावधानों से यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि इससे देश में बहुराष्ट्रीय कंपनी का न केवल बहुतायत में प्रवेश होगा बल्कि अपने विशाल संसाधनों के चलते वे भारतीय कम्पनियों के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा देने में सक्षम होंगी विकसित देशों की बैंकिग एवं बीमा कम्पनियां भारतीय कम्पनियों अथवा संस्थाओं से हर मामले में आगे हैं विदेशी बैंक अपने ग्राहकों को मौजूदा समय में भी अधिक सेवा व ब्याज प्रदान करते है। इस ताकत के बूते वे भारत के राष्ट्रीयकृत बैंकों में जमा राशि को बड़ी सरलता से अपनी ओर खींच लेगें। इस तरह ही घरेलू बचत हमारे अपने विकास कार्यो के लिए उपलब्ध न हो सकेगी। ऐसी स्थिति में हमारी सरकारी को देश के विभिन्न विकास कायर्ेा हेतु विदेशी कम्पनियों व संस्थाओं से ऋण लेकर हम अपनी हालत पतली कर चुके है। भारतीय कम्पनियों की अपेक्षा बहुराष्ट्रीय कंपनी अपने ग्राहकों को संतुष्टि पूर्ण वातावरण प्रदान करने, बैठने, ठहरने और उनकी समस्याओं को सुनने तथा उन्हें का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते है जिससे प्रतियोगिता की भावना होती है।

7. भारतीय उद्योगों के प्रतियोगी बनाने की भावना

बहुराष्ट्रीय कम्पनियां को आगमन, उदारीकरण एवं आर्थिक सुधारों की नीतियों में सरकार ने इस बात को स्पष्ट संकेत दे दिए है कि भारतीय उद्योग को भविष्य में सरकारी संरक्षण के बिना ही कार्य करना होगा। विगत 60 वर्षो से भारतीय उद्योगों को संरक्षण पर जीने की आदत हो गई हैं। संरक्षणवादी नीतियों का लाभ उठाकर भारतीय उद्योगो ने न तो गुणवत्ता में सुधार किया और न ही लागत को काम करने का प्रयास किया, परन्तु अब सारे विश्व में जिस प्रकार से तैयार माल की गुणवत्ता व कीमत दोनों ही मामलों में प्रतियोगी बनाना पड़ा। सरकार ने प्रत्येक स्तर पर यह स्पष्ट कर दिया कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पैर जमाए बिना बगैर भारत के विकास में और अधिक तेजी नहीं लाई जा सकती है और इसके लिए यह जरूरी हो गया है कि भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप प्रतिस्पर्धात्मक हो। बहुराष्ट्रीय कंपनी के आने से घरेलू कम्पनियां भी अपने उत्पादन में प्रतियोगिता की वजह से उच्च किस्म की वस्तुएं निर्मित करने की कोशिश करते है। प्रतियोगिता का होना व्यवसाय में बने रहने का कारण ही गुणवत्ता में सुधार है। इस प्रकार ये यह भारतीय उद्योगों की प्रतियोगी बनाने की भावना उत्पन्न कर गुणवत्ता में सुधार के प्रति मार्ग प्रशस्त करती है। इस कारण से ग्राहकों को अच्छे किस्म की वस्तुएं कम मूल्य पर मिल पाती है। जिन वस्तुओं को हम उत्पादित नहीं कर सकते है या निर्णय नहीं कर सकते है। उसे बहुराष्ट्रीय कंपनी के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता हैं बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा औद्योगिक परिवर्तन तेजी से होता है, जिससे बड़े पैमानें पर उत्पादन संभव हो पाता है इस प्रकार हम आयात प्रतिस्थापन और निर्यात प्रोत्साहन नीति अपनाने में सफल हो सकते है। उच्च तकनीकी का उपयोग करके लागत में कमी लाने के साथ-साथ वस्तुओ की उच्च गुणवत्ता बनाये रखा जा सकता है।

8. मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध 

जब व्यापार के देशों के मध्य होता है तो उसमें अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव एवं सहयोग स्थापित होता है, जिससे आधुनिकतम टेक्नोलाजी, वैज्ञानिकीकरण, भुगतान, संतुलन, विनियम दर, रूपये की पूर्णपरिवर्तनीयता, श्रमशक्ति का उपयोग, मुद्रास्फीति नियंत्रण, पूंजी सहयोग, विदेशी प्रौद्योगिकी तथा इसके साथ-साथ आन्तरिक एवं बाह्य सम्बन्ध मधुर बनते हैं। विकासशील देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनी की भूमिका को प्रभावशाली बनाने में कतिपय घटकों का महत्वपूर्ण योगदान है। वास्तव में बहुराष्ट्रीय कम्पनी का यह अनुभव करती है कि उनकी विश्वव्यापी गतिविधियों का प्रसार करने में वर्तमान परिवेश प्रोत्साहक है। अपनी अर्थव्यवस्थाओं पर वर्चस्व रखने वाली चीन और रूस जैसे देश भी संवृद्धि और विकास सम्बन्धी अभिवृत्तियों में परिवर्तन के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनी में रूचि दर्शा रहे है।

9. रोजगार परक 

भारत एक विकासशील देश है और यह विश्व का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला राष्ट्र है। यहां श्रम की प्रचुरता है, फिर भी कुशल श्रमिकों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। बड़े पैमाने पर बेरोजगारी यहां देखी जा सकती है, इस सस्ते श्रम का उपयोग कर अधिकतम लाभ कमाने की दृष्टि से भी भारतीय श्रमिकों को रोजगार प्रदानप करती है तो उससे उनके आय में वृद्धि तो होगी ही साथ ही प्रति व्यक्ति आय और रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी। यदि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां श्रम प्रधान तकनीक का प्रयोग कर उत्पादन करती है तो रोजगार दृष्टि से इसे वांछित माना जा सकता है। बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अपने देशों और विदेशों से लगभग 73 मिलियन लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान किया है, जिनमें सम्पूर्ण विश्व गैर-कृषि कार्यकालापों के लगभग 10 प्रतिशत रोजगार निहित हैं, यदि केवल विकसित देशों की गणना की जाए तो इसका परिणाम लगभग 20 प्रतिशत होता है। विश्व का लगभग एक तिहाई उत्पाद बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। भारत में भी इस प्रकार की अनेक कम्पनियां है जैसे पाण्ड्स, वरेन टी, सीबा, कोलगेट- पामोलिव, हिन्दुस्तान लीवर, ग्लैक्सो, गुडलक नैरोले पेण्ट्स, पेप्सी, कोला इत्यादि।

10. अन्य गुण 

  1. बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आर्थिक रूप से बहुत शाक्तिशाली होती है।
  2. इनके पास व्यापार करने का अनुभव प्राप्त होता।
  3. अपने पूंजी निवेश के समय ये कम्पनियां बहुत जोखिम उठाती है, क्योंकि जहां ये निवेश करती है वहाँ बिजली, परिवहन, श्रमिकों तथा विपणन की समस्याओं से गुजरना पड़ता है।
  4. बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ देश-विदेश में नये-नये संस्थानों की स्थापना करते है तथा अपने उत्कृष्ट प्रबन्ध तथा शिक्षण का पूरा-पूरा लाभ उठाने में सफल होती है।
  5. बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी का हस्तान्तरण अपनी अन्य कम्पनियां में करते है तथा खोज और अनुसंधान पर जो खर्च किया जाता है उससे नये-नये उत्पादों का अविष्कार होता है, इससे लोगों का जीवन स्तर सुधारने में सहायता मिलती है।
  6. बहुराष्ट्रीय कंपनी का सर्वत्र स्वागत किया जाता है, क्योंकि ये कम्पनियॉ पूॅजी निर्माण तथा रोजगार में वृद्धि करती है।
  7. बहुराष्ट्रीय कंपनी के आगमन से हर क्षेत्र में विकास सम्भव हो पाता है चाहे वह पूंजी तकनीकी, अनुसंधान, क्षेत्रीय विकास व रोजगार का क्ष् ोत्र हो सकता है।
  8. बहुराष्ट्रीय कंपनी के द्वारा दो या अधिक देशों के मध्य मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित होता है। 
उसमें अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव एवं सहयोग स्थापित होता है, जिससे आधुनिकतम टेक्नोलाजी, वैज्ञानिकीकरण, श्रम शक्ति का उपयोग, मुद्रास्फीति नियंत्रण, पूंजी सहयोग तथा इसके साथ-साथ आन्तारिक एवं बाहय सम्बन्ध मुधर बनता है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां एक समूह के देशों द्वारा उत्पादित कच्चे माल को दूसरे समूह के देशों में श्रमशक्ति एवं संयत्र सुविधाओं की सहायता से रूपान्तरित करके, वस्तुओं का विनिर्माण करके और इन वस्तुओं को बाजार में बेचकर उत्पादन के अन्तर्राष्ट्रीय कारण करने में योगदान करती है। निरन्तर सम्प्रेषण, त्वरित परिवहन, कम्प्यूटर, आधुनिक प्रबन्धकीय तकनीकें आदि बहुराष्ट्रीय कंपनी को संसाधनों के विदोहन में सहायता करती है। बहुराष्ट्रीय कंपनी के नये उद्योगां को प्रौद्योगिकी प्रबन्धकीय कौशल तथा पूंजी प्रदान करके अन्य कई मामलों में उनके व्यवसाय संचालन हेतु परिवहन सहित समूचि सामाजिक-आधारिक सुविधा अर्जित करके नवोन्मेषी और उत्प्रेरक भूमिका निभाई है। इन कम्पनियों में विश्वव्यापी विपणन संगठन होते है जो विकासशील देशों के निर्यातों में सुविधा प्रदान करते हैं और इस प्रकार एक परम्परागत क्रम उत्पादक क्षेत्र को उच्च उत्पादक निर्यात क्षेत्र में रूपान्तरित करने की प्रक्रिया में सहायता पहुचाते है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश विपणन, वित्तीय एवं तकनीकी सेवाओं से सम्बन्धित कौशल लाता है संयुक्त उद्यमों के माध्यम से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश स्थानीय प्रबन्धकों को प्रशिक्षत करने में सहायता प्रदान करता है और व्युत्पादगत प्रभावों के माध्यम से रोजगार के अवसरों में वृद्धि करता है। वर्तमान में विकासशील देश असहाय स्थिति में नहीं है। पिछले कुछ समय में इन देशों नें बहुराष्ट्रीय कम्पनियां से समझौता करने में पर्याप्त विशेषज्ञता हासिल कर ली है। वास्तव में बहुराष्ट्रीय कंपनी और पोषक देशों के बीच मौजूद भ्रान्तियां और मतभेद अब धीरे-धीरे प्रारम्भिक सहयोग स्थापित कर रहे है। यही कारण है कि नवोन्मेषी संविदात्मक किस्म की श्रंखलाओं ने लगातों और लाभों के अधिक वितरण का मार्ग प्रशस्त किया हेै। पहले हमारे व्यापार अपने देश के ही अन्तर्गत सम्पन्न होते था, किन्तु धीरे-धीरे हमारा सम्बन्ध जिन दूसरे देशों में मित्रता पूर्ण बनता गया यह द्विपक्षीय व्यापार का रूप धारण करने लगा। इस प्रकार हमें गैट, विश्व व्यापार संगठन (डब्लू0टी0ओ0) में सदस्यता बनाये रखने के लिए विदेशों में अपने निर्यात को बढ़ाने तथा आवश्य वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए बहुपक्षीय व्यापार की आवश्यकता महसूस हुई। इसलि बहुराष्ट्रीय कंपनी को अपनाना हमारी मजबूरी या सहयोग कहिए, किन्तु आज इसकी आवश्यकता महत्वपूर्ण है। बिना इसके विदेशों में अपना बाजार स्थापित नहीं कर सकते है।

बहुराष्ट्रीय कंपनी के दोष

  1. अमेरिका आधारित बहुत सी कम्पनियां कई देशों में अपना पूर्ण स्वामित्व स्थापित कर चुकी है। उदाहरण स्वरूप सिंगापुर, मैक्सिको, ब्राजील तथा ताइवान। इन देशों में आयकर दरें कम होने के कारण अमेरिकी कम्पनियों को अत्यधिक लाभ मिल रहा है।
  2. भारत जैसे देश में साठ से दशक में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां 25 से 40 प्रतिशत का भागीदार बन सकती थीं उनको बहुत से विशेषाधिकार प्राप्त थे, वे अत्यधिक लाभान्वित हो सकती थी।
  3. बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने सभी कर्मचारियों को वेतन के रूप में अच्छी राशि प्रदान करती है। जिससे समाज में न केवल असमानता व्याप्त होती है, बल्कि असंतोष भी फैलता है।
  4. बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपनी कम्पनियां बडे़-बड़े शहरों में स्थापित करती है, जहां पर हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध रहती है, जिससे क्षेत्रीय असामानता में वृद्धि होती है। 
  5. बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आम राजनीति तथा अपना मतलब साधने हेतु राजनैतिक को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से घूस भी देती है, जिससे भ्रष्टाचार में वृद्धि होती है। ये निगमें विशेष वर्ग के लोगों को लुभावने अवसर देती है। तथा नौकरी प्राप्त करने वाले लोग आमौतार पर राजनैतिकों के सम्बन्धी होते है।

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