नगरीकरण क्या है?

अनुक्रम
नगरीकरण विकास की एक प्रक्रिया है, और स्वाभाविक रूप से नगरों की स्थापना एक लम्बे विकासक्रम का परिणाम होगी। प्राचीन भारतीय साहित्य में नगर शब्द अपेक्षाकृत बाद का है। इसके प्रारम्भिक उल्लेख परवर्ती वैदिक साहित्य में ही उपलब्ध है। तैत्तिरीय आरण्यक और जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण नगर शब्द का उल्लेख करते हैं। इसके विपरीत ‘पुर’ शब्द प्राचीन है और ऋग्वेद संहिता सहित लगभग सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में इसके उल्लेख यंत्र-तंत्र उपलब्ध है, ऋग्वेद में ‘पुर’ शब्द एक प्रकार के दुर्ग का द्योतक प्रतीत होता है, जो शत्रु से सुरक्षा प्रदान कर सकता था। ये देहि (मिट्टी की रक्षा प्राचीर) से घिरा होता था, और सुदृढ़ था। सामान्यत: यह माना जाता है कि समाज में उत्पन्न कुछ विशिष्ट परिस्थितियाँ नगरीकरण की प्रक्रिया में सहायक होती है। यह परिस्थितियाँ राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक हो सकती है। ये इस प्रक्रिया के लिए सामूहिक रूप से उत्तरदायी हो सकती है या फिर किसी एक वर्ग के प्रतिमान इतने शक्तिशाली हो सकते हैं कि वे नगरों की स्थापना को विकसित कर सकें। 

नगरों के विकास का एक अन्य कारण विशुद्ध आर्थिक था। उल्लेखनीय है कि आर्थिक कारणों से नगरों का विकास सर्वाधिक हुआ। व्यापार के केन्द्र व्यापारिक मार्गो पर प्राय: नगरों के रूप में विकसित हो जाते थे। ये व्यापारिक नगर महत्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्रों को जोड़ते थे, और अपने कारणों के साथ नियमित यात्रा करने वाले व्यापारियों के निश्चित स्थान पर क्रय-विक्रय के कारण ऐसे स्थान नगर के रूप में विकसित हो जाते थे, ऐसे नगरों को विकसित होने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नगर था। 

प्रादुर्भाव के प्रेरक कारणों की दृष्टि से प्राचीन भारतीय नगरों का विभाजन दो वर्गो में किया जा सकता है। 

प्रथम वर्ग में उन नगरों की गणना की जा सकती है, जो योजनारहित स्वाभाविक विकास के फल थे तथा द्वितीय वर्ग में वे नगर आते हैं, जिनका उद्गम सोद्देश्य एवं संकल्पपूर्वक था। प्रथम वर्ग के नगर प्रारम्भिक दशा में वस्तुत: ग्राम ही थे। जिन अनेक कारणों से उनमें नगर-तत्त्व का क्रमिक आगमन सम्भव हुआ, उनमें वाणिज्य का स्थान सर्वश्रेष्ठ प्रतीत होता है। नदियों एवं समुद्रों के तट पर सुप्रसिद्ध मार्गो पर बसी हुई साधारण बस्तियों का नगर-रूपान्तर व्यापारिक संबंध के कारण नितान्त स्वाभाविक था। व्यापारिक केन्द्रों के अतिरिक्त प्रधान व्यावसायिक, धार्मिक एवं शिक्षण-केन्द्रों में भी कालानतर में नगर-तत्त्व के क्रमिक उद्भव की प्रक्रिया आरम्भ हुई। 

द्वितीय वर्ग के नगरों की उत्पत्ति के कारण प्राय: राजकीय आवश्यकताएँ थीं। सुरक्षा के साधन, शासन की सुदृढ़ता एवं सुव्यवस्था, सैनिक प्रबन्ध तथा प्रसिद्ध राजभवनों एवं राजप्रासादों की सुस्थिति के प्रश्न नाना भारतीय नगरों के शीघ्र आविर्भाव में सक्रिय कारक सिद्ध हुए थे। ‘‘हलों में लोहे की फाल की सुविधा के कारण गहरे कर्षण एवं उसके ग्रामीण प्रयोग से अधिक (अतिरिक्त) अन्न का उत्पादन तथा विविध लौह उपकरणों के प्रयोग से प्रचुर व्यावसायिक उत्पादन एवं उद्योग-धन्धों का विकास हुआ।’’ इससे ग्राम अपने अतिरिक्त ख् ााद्यान्न द्वारा नगर से अपने अतिरिक्त व्यावसायिक उत्पादों का विनियम करने लगा। ग्राम एवं नगर का यह घनिष्ठ आर्थिक सम्बन्ध इस समय विशाल मापदण्ड पर दृष्टिगत होने लगता है। राजमार्गो के निर्माण की सुविधा के साथ ही उनके किनारे नये व्यापारिक केन्द्रों, बाजारों, नये नगरों के उद्भव एवं विकास की प्रक्रिया तेजी से प्रारम्भ हुई तथा नगरीकरण की प्रक्रिया में योगदान मिला। नगरीकरण में निश्चय ही आर्थिक प्रगति ने इतनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की, कि दो या तीन शताब्दी व्यतीत होने के साथ ही तत्कालीन विचारकों ने इसे स्वतन्त्र रूप प्रदान करने की आवश्यकता स्वीकार किया। सर्वप्रथम मौर्य काल में नगर संस्कृति के अन्तर्गत इसके महत्व को स्वीकार किया गया। चार शताब्दी पहले समाज में जो क्रान्ति आयी उसमें पशुपालन एवं कृषि, के साथ ही वाणिज्य की महती भूमिका थी। वाणिज्य शब्द का प्रयोग यहाँ पर व्यापक अर्थ में हुआ है। वाणिज्य के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के उद्योगों को भी वार्ता में सम्मिलित किया गया है। इसलिए कौटिल्य ने ‘कृषि पशुपाल्यें वणिज्या च वार्ता’ कहा और इतना कहने के बाद कौटिल्य ने तत्काल यह भी कहा कि इन तीनों ही उपांगों की समान महत्ता है, क्योंकि इनसे अन्न, पशु, सुवर्ण, वन्य पदार्थ एवं विष्टि सुलभ होते हैं। कालान्तर में आर्थिक जीवन में जटिलता के साथ विविधता भी आयी जिसके परिणामस्वरूप वार्ता के क्षेत्र का भी विस्तार हुआ। 

छठी सदी ईसा पूर्व की नगर क्रान्ति के जहाँ तीन कारक थे-पशुपालन, कृषि एवं वाणिज्य वही बाद में शुक्र ने कुसीद अथवा ऋणादान को भी वार्ता में सम्मिलित किया।8 अनवरत आर्थिक प्रगति के परिणामस्वरूप वार्ता के क्षेत्र में परवर्ती काल में विस्तार होता रहा। कला एवं शिल्प नगर जीवन के पर्याय बन गए। वात्स्यायन ने कामसूत्र में चौसठ कलाओं का उल्लेख किया है, साथ ही इस ग्रन्थ से यह भी ज्ञात होता है कि नगरों में एक ऐसे कुलीन वर्ग का उद्भव हो चुका था जिसके वैभव एवं विलास की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए अनेक शिल्पों का विकास हुआ जिसकी परिकल्पना पूर्व काल में नहीं की जा सकी थी।9 शिल्पों का विकास एवं विविधता का ही परिणाम था कि वार्ता के क्षेत्र में शिल्प को पाँचवा उपांग पुराणों ने परिगणित कर लिया। इस पाँचवे उपांग को ‘तूर्य या कर्मान्त’ अर्थात् शिल्प कहा गया है और इसको उपर्युक्त चार उपांगों के अतिरिक्त पाँचवा माना गया। 

नगरों की उत्पत्ति 

मानवीय साधनों के विकास से नगरों का विकास जुड़ा हुआ है। मनुष्य ने अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही नगरों का निर्माण किया है। जब से मनुष्य ने समूहों में रहने के बाद सामाजिक एवं आर्थिक जीवन को संगठित करना प्रारम्भ किया तभी से ही नगरीय विकास की परम्परा विकसित हुई। नगरों की उत्पत्ति को ठीक से समझने के लिए ऐतिहासिक सामग्री के साथ -साथ समाजशास्त्रीय धारणाओं का सहारा लेना उचित होगा। 

‘नगर’ शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘City’ का हिन्दी रूपान्तरण है। ‘City’ शब्द लैटिन के ‘civitous’ (सिविटॉस) से बना है जिसका अर्थ है ‘नागरिकता’। ‘नगर’ शब्द का प्रयोग आधुनिक युग में जिस अर्थ में किया जाता है उसके अन्तर्गत सैंधव संस्कृति के अवशेष सम्भवत: ‘नगर’ का बोध पूर्ण रूप से नहीं कराते हैं। घनी आबादी, विशाल इमारतों का अस्तित्व, शिल्प एवं उद्योगों का केन्द्रीकरण, उपभोक्ता वर्ग की स्थिति आदि। सामान्य विशेषताएँ नगरों की गार्डेन चाइल्ड ने मानी है।इसके अतिरिक्त कलात्मक कृतियाँ, अधिशेष उत्पादन, नगरों का पोषण करने वाले समृद्ध कृष्य क्षेत्र इत्यादि अन्य अनेक शर्ते होती है जो वास्तविक नगर के रूप को संभव बनाती है। नगर से तात्पर्य घनी आबादी वाला वह स्थान है, जहां कृषि के अतिरिक्त अन्य दूसरी आर्थिक गतिविधियाँ अथवा कारोबार संचालित किया जाता है। जिस प्रकार गांवों में किसान तथा खेती की प्रधानता होती है, उसी प्रकार नगरों में व्यापारियों, कारीगरों तथा प्रशासन कर्त्ताओं की प्रधानता होती है। नगर केन्द्र अपने साथ-साथ अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले विशाल जन समुदाय के लिए भी सेवाएँ उपलब्ध कराता है। 

नगर शब्द से अवधारणाओं, अमूर्तताओं, मूर्तताओं, कार्यो, संस्कृतियों, प्रारूपों, वृद्धि एवं विकासों और अन्य अनेक ऐसे पहलुओं का बोध होता है जिसे व्यक्त करना सम्भव नहीं है। नगर के ठोस अस्तित्व के रूप में आते हैं वहाँ के निवासी, उनके आवास, आवागमन, यातायात के साधन, परिवहन के उपकरण, नगर में विद्यमान समस्त ऊपरी अधि-संरचनाएँ, निर्मित वस्तुएँ, भण्डारित वस्तुएँ, भोज्य-अभोज्य पदार्थ, उपयोगी औजार , सुरक्षात्मक संसाधन आदि और इन सबके कार्यात्मक एकीकरण के समग्र को नगर कहा जा सकता है।

नगर की विशेषताएँ

किसी भी नगर में निम्नांकित आठ विशेषताएँ पाई जाती हैं- 
  1. ऐसा क्षेत्र जहाँ कि अधिकांश आबादी उत्पादन, यान्त्रिक कार्य व्यापार, विभिन्न उद्योगों और प्रशासकीय कार्यो में व्यस्त हो, अर्थात् जिसकी आजीविका कृषि विहीन व्यवसायों से चलती हो, नगर के रूप में जाना जाता है। 
  2. क्ष् ोत्रीय पर्यावरण मनुष्य द्वारा निर्मित होता है। नगरीय व्यक्ति प्रकृति पर कम आश्रित रहते हैं। 
  3. समुदाय का आकार वृहद् होता है, अत: सामाजिक संगठन और पारस्परिक सम्बन्ध अधिक औपचारिक होते हैं। 
  4. नगर में जनसंख्या का घनत्व एवं दबाव बहुत अधिक और आवास की समस्या बहुत ही जटिल होती है। 
  5. नगरों में गाँवों की तुलना में जनसंख्या की विषमता अधिक होती है, क्योंकि विविध सांस्कृतिक क्षेत्र के लोग आजीविका के लिए यहाँ आकर रहते हैं। 
  6. सामाजिक विभेदीकरण वर्ग प्रणाली पर आधारित होता है और विभेदीकरण गाँवों में अधिक जटिल रूप में देखा जा सकता है। 
  7. गतिशीलता के अवसर गाँवों की अपेक्षा नगरों में प्राय: अधिक मिलते हैं। 
  8. नगरों में लोगों के पारस्परिक सम्बन्ध व्यक्तिपरक एवं द्वितीयक आधारों पर निर्मित तथा सामाजिक सम्बन्ध अल्पकालीन और स्वार्थों पर आधारित होते है। 

नगरों का विकास 

भारत में नगरों का विकास भी सामान्यत: सामान्य नगरों के विकास की भाँति ही हुआ। यहाँ अति प्राचीनकाल तथा महाकाव्यों एवं पुराणों के काल से ही नगरों की विद्यमानता के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं। इस सन्दर्भ में डॉ0 उदयनारायण राय लिखते हैं- नगर, मानव सभ्यता एवं संस्कृति के विकास का मुख्य समाश्रय हर समय ही रहा है। यह सोचना कि प्राचीन युग में हमारे देश में नगर नहीं हुआ करते थे या पुर और ग्राम में उस समय कोई विशेष अन्तर न था, बड़ी भारी भूल होगी हमारे प्राचीन शिल्प शास्त्रों में नगर और ग्राम की अलग-अलग परिभाषा तथा उनके निर्माण की पृथक् योजनाएँ उपलब्ध होती हैं। आर्थिक दृष्टि से यदि ग्राम-जीवन कृषिमूलक था, तो पुर-जीवन व्यवसाय एवं वाणिज्यमूलक। नगर अपनी व्यावसायिक वस्तुओं के विनिमय द्वारा ग्राम से ख् ााद्याान्न प्राप्त करता था। प्राचीन भारतीय साहित्य में विभिन्न कोटि के नगरों के उल्लेख मिलते हैं, यथा राजधानी, पुटभेदन (बड़े व्यापारिक नगर), पत्तन (बन्दरगाह) तथा द्रोणीमुख (नदी के मुहाने के समीप स्थित पुर) आदि।

नगरों की उत्पत्ति एवं ऐतिहासिक विकास के विवेचनात्मक परिप्रेक्ष्य में नगर का जो रूप उपलब्ध होता है, वह किसी समुदाय की शक्ति और संस्कृति का अन्तिम केन्द्र रहा है। नगर में जीवन की नाना रूपी रश्मियाँ एक ही केन्द्र पर एकत्रित या केन्द्रीभूत होती है और सामाजिक प्रभविष्णुता तथा सार्थकता दोनों की ही प्राप्ति होती है। नगर एक अविच्छिन्न सामाजिक सम्बन्ध का रूप और प्रतीक तथा मन्दिर, बाजार, न्यायालय और विद्या-भवन का अधिष्ठान है। नगर में ही सभ्यता के उपकरण बाहुल्य एवं वैविध्य प्राप्त करते है और मानव के अनुभव व्यवहार्य चिन्हों, प्रतीकों , आवरण के प्रतिरूपों तथा व्यवस्था की प्रणालियों में रूपान्तरित होते हैं। वहीं सभ्यता के विषयों का केन्द्रीकरण होता है।

नगरों की उत्पत्ति और विकास में राजनैतिक कारक, अत्यधिक महत्वपूर्ण होते है। नगर राजनीतिक क्रियाकलापों के सदैव से ही केन्द्र रहे हैं। केन्द्रीय एवं सुरक्षित स्थानों पर देश एवं प्रान्त की राजधानियाँ बनाई जाती रही हैं। ऐसे स्थानों पर प्रशासनिक केन्द्र भी होने के कारण सेवा, पुलिस, राज्य अधिकारी तथा अन्य कर्मचारी रहते हैं, अत: इन लोगों की सुख-सुविधा और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य लोग सहायक एवं उपयोगी कार्यो को करने के लिए भी ऐसे स्थानों पर बसने लगे। यहीं युद्ध सामग्री का निर्माण होने लगा। इन सब परिस्थितियों के कारण, ऐसी दशा में नगरों का विकास होना स्वाभाविक ही था। नगरों के विकास में राजनीतिक कारकों के साथ ही साथ आर्थिक कारक सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं। कृषि उत्पादन की वृद्धि, विविध उद्योग धन्धों का विकास, व्यापार, श्रम-विभाजन, नई वितरण व्यवस्था और बाजारों के विस्तार से नगरों का विकास बड़ी तेजी से हुआ। किसी भी नगर के विकास में किसी एक ही कारक को आधार नहीं माना जा सकता। कई कारक मिलकर किसी नगर का विकास कर पाने में सक्षम होते हैं। आज नगरों के तीव्र विकास में इन कारकों के अतिरिक्त औद्योगिक विकास, यातायात एवं संचार माध्यमों का प्रसार, परम्पराओं, रूढ़ियों के प्रति उदार भावना आदि अधिक महत्वपूर्ण माने जा सकते हैं।

नगरों के विकास में हजारों वर्ष पूर्व कृषि एवं कृषिगत औजारों, बैलगाड़ी, हल तथा आवागमन की व्यवस्था के आविष्कार एवं विकास ने बड़ा योगदान प्रस्तुत किया है। जल एवं थल दोनों ही मार्गो के विकास ने प्राकृतिक सम्पदा के दोहन में वृद्धि के साथ ही इनके उपयोग में भी वृद्धि होती चली गई। मनुष्य औजारों को बनाने वाला पशु है। इसीलिए विभिन्न ऐतिहासिक खोजों से पता चलता है कि नव-पाषाण युग के उत्तरार्द्ध तथा कांस्य युग के प्रारम्भ में धीरे-धीरे प्रौद्योगिकी का विकास होता गया। धातुओं के प्रयोग के साथ ही दस्तकारी का विकास हुआ। व्यापार, उद्योग, प्रशासन, राष्ट्रीय सुरक्षा और विभिन्न नए-नए व्यवसायों में लोगों को कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ, जिससे नगरों का विकास हुआ। नगर एक ऐसा विशाल जनसमूह है, जिसकी जीविका के साधन उद्योग एवं व्यापार हैं। वह व्यावसायिक उत्पादनों के विनियम द्वारा ग्राम से खाद्यान्न प्राप्त करता है। नगर तत्त्व एवं ग्राम तत्त्व का यह प्रधान भेद भारतवर्ष में चिरकाल से चला आ रहा है। इस देश में नगरों के आविर्भाव की यह प्राचीनता कास्यं काल में हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों नामक स्थानों पर बने हुए नगरों के सन्निवेश एवं उनके सामाजिक एवं आर्थिक जीवन के दृष्टान्तों से सिद्ध हो जाती है। जब ताँबे के अतिरिक्त प्रस्तर का प्रयोग साथ-साथ होता था।

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