आयुर्वेद का अर्थ

आयुर्वेद शब्द की निरूक्ति - आयुर्वेद शब्द दो शब्दों के योग से बना है - आयु: + वेद। आयु के ज्ञान को आयुर्वेद कहते हैं - आयुशो वेद: आयुर्वेद:। आयु और वेद शब्दों के अलग-अलग अर्थज्ञान के पश्चात ही आयुर्वेद शब्द का वास्तविक अर्थ जाना जा सकता है, इसे आयु, धारि, कहते हैं।

इस प्रकार आयु और वेद इन दोनों शब्दों की व्याख्या के पश्चात सुगमता से आयुर्वेद शब्द का अर्थ बुद्धिगम्य हो जाता है एवं जिस शास्त्र में आयु का अस्तित्व हो, जिससे आयु का ज्ञान हो, जिसमें आयु सम्बन्धी विचार हो और जिससे आयु की प्राप्ति हो, उस शास्त्र को ‘आयुर्वेद’ कहते हैं अर्थात् आयुर्वेद आयु की रक्षा के साधनों का उपदेष करने वाला शास्त्र है। आयुर्वेद शाखा, विद्या, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण और तन्त्र ये शब्द एक अर्थ के बोधक हैं। अर्थात्
  1. जिस शास्त्र के द्वारा आयु का अस्तित्त्व बना रहे।
  2. जिसके द्वारा आयु की प्राप्ति या लाभ हो।
  3. जिसके द्वारा आयु का ज्ञान हो और
  4. जिसके द्वारा आयु पर विचार किया जाय, उस शास्त्र का नाम आयुर्वेद है।
आयुर्वेद शाश्वत, नित्य और पवित्र है, यह स्वर्गदायक, सुखदायक, यश, आयु, का वर्धक तथा वृत्ति अर्थात् जीविका का संचालक है।

आयुर्वेद की परिभाषा

जिस शास्त्र में हितायु, अहितायु, सुखायु और दु:खायु इन चार प्रकार की आयु के लिए हितकर तथा अहितकर द्रव्य, गुण एवं कर्म के प्रमाण का विवेचन और जिसमें आयुओं के स्वरुप का वर्णन किया गया हो उसे ‘आयुर्वेद’ कहते हैं।6 आयुर्वेद शास्त्र आयु की व्याख्या करता है, दीर्घ और आरोग्यमय जीवन की प्राप्ति का मार्ग निर्दिश्ट करता है। आयु की स्थिरता, स्वास्थ्य-संरक्षण और व्याधि-परिमोक्षण का शास्त्र है।

आयुर्वेद के प्रकार

  1. सुखायु - जो व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रोगों से ग्रसित नहीं हैं, वे युवावस्था-संपन्न हैं, बल, वीर्य, यश, पौरुष एवं पराक्रम युक्त हैं, जो शास्त्रज्ञ तथा व्यवहारज्ञ हैं जिसकी इन्द्रियाँ प्रसन्न एवं सन्तुश्ट हैं, जो समृद्धि सुन्दर उपभोग-संपन्न हैं, जिसको प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त है और जो यथेश्ट विचाराषील है, उसकी आयु सुखायु कही जाती है।
  2. दु:खायु - सुखाय के विपरीत स्थिति दु:खायु कही जाती है।
  3. हितायु - जो व्यक्ति सबका हितैषी है, दूसरे के धन का लोभ नहीं करता एवं सत्य बोलता है, शान्त प्रकृति का है, सोच-समझकर कदम उठाने वाला है, सावधान रहता है, धर्म, अर्थ तथा काम का विरोध रहित रूप से प्रयोग करता है, पूज्यजनों की पूजा करता है ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न है, शान्ति प्रधान है, वृद्धजनों की सेवा करता है, राग, द्वेश, ईर्ष्या, मद, और मान के वेगों को नियन्त्रित रखता है, दानशील है, तपस्या, ज्ञान और शान्ति का प्रेमी है, आध्यात्मविद् है, लोक और परलोक का विचार कर कार्य करने वाला है और स्मृतिमान् है, उसकी आयु ‘हितायु’ कहलाती है।
  4. अहितायु - हिताय के विपरीत स्थिति को ‘अहितायु’ कहते हैं। इस प्रकार आयु का हिताहित विवेचन आयुर्वेद का प्रतिपाद्य विषय है। अनेक दृष्टिकोणों से आयु के हित और अहित का विचार ही आयुर्वेद में किया गया है।

आयुर्वेद का स्वरूप

आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है, इसलिए जीवन अर्थात् आयु के विषय में जो भी ज्ञान उपलब्ध हो, वह सब आयुर्वेद की सीमा में आता है। जिस विद्या से रोगियों का रोग दूर हो और प्राणियों का जीवन आरोग्यमय तथा दीर्घायुश्य सम्पन्न हो, वह सब ‘विद्या’ आयुर्वेद है।

पुराणामित्येव नसाधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। 
सन्त: परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढ़: परप्रत्ययनेयबुद्धि:।।

अर्थात् पुराना होने से न कोई ज्ञान उत्तम कहा जाता है, न तो नया होने के कारण कोई ज्ञान दोषपूर्ण समझा जाता है। इसलिए विद्वान लोग अपने विवेक के अनुसार ग्राह्य वस्तु का चयन करते हैं। वे मूर्ख एवं विवेकहीन हैं, जो बाबावाक्यं प्रमाण के आधार पर दूसरों के कथनानुसार चलते हैं। इस सूक्ति के अनुसार नीर-क्षीरविवेकिनी बुद्धि से, परिश्रम-पूर्ण अनुसंधान और धैर्य से चिकित्सा-जगत् में उपलब्ध चिन्तन, ज्ञान तथा आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत ज्ञान की समीक्षा कर उसे आयुर्वेदीय सिद्धान्तों के अनुरूप आयुर्वेद में समाहित करना चाहिए।

आयुर्वेद एक महत्वपूर्ण विज्ञान है। विज्ञान सार्वभौम होता है, उस पर किसी एक वर्ग का अधिकार नहीं होता है। जो कल तक अज्ञात था, वह आज जान लिया गया है। जो कार्य पूर्वजों ने नहीं किया, वह कार्य उनकी सन्तानें कर रही हैं - कृतानि पुत्रैरकृतानि पूर्वे:। जो अविदित है, उसे कल जाना जा सकता है। इसलिए विद्वान् और बुद्धि का सीमांकन करना उचित नहीं है। विज्ञान के क्षेत्र में अहर्निश गवेशणा हो रही है। अत: प्राच्य और नवीन चिकित्सा-विज्ञान के सांमजस्य का द्वार खुला रखना चाहिए तथा उपादेयता के आधार पर परस्पर आदान-प्रदान स्थापित करने में रूढ़िग्रस्तता एवं हिचक दूर रखना चाहिए। युगानुरूप प्रगति करते रहने के कारण ही आयुर्वेद के क्षेत्र का समुचित विकास हो पाया है। चरक एवं सुश्रुत के काल में चिकित्सा-प्रक्रिया का विकास हुआ है। औषधियों के प्रयोग के ढ़ंग एवं चिकित्सा-विधि के प्रकार में परिवर्तन हुआ है। नये-नये योग और प्रयोग प्रचलित हुए हैं।

संहिता-काल की चिकित्सा में भी आगे चलकर परिवर्तन हुआ है। निदान एवं चिकित्सा के नवीन ढंग अपनाए गये हैं। रसशास्त्र के विकास ने चिकित्सा जगत् में चमत्कार दिखलाया। अल्प मात्रा में, अरूचि रहित एवं शीघ्र लाभ होने के कारण इसका बहुत प्रचार हुआ। वानस्पतिक द्रव्यों के स्थान पर रस, उपरस, लौहादि धातुओं के भस्म एवं विश-उपविश आदि का प्रयोग प्रचुर रूप में किया जाने लगा। बदलते हुए समय के परिवेष में यूनानी चिकित्सा के स्पर्धा युग में चोपचीनी, पारसीकयवानी आदि अनेक यूनानी द्रव्यों का प्रयोग करना वैद्यों ने प्रारम्भ कर दिया। जब भारतीय भू-भाग पर विदेशी पुर्तगीज व्यापारीजनों ने पद-विन्यास रखा, तो उनके समागम से अनेक अंगों के स्पर्श तथा उनकी स्त्रियों के साथ सहवास करने से ‘फिरंग’ नामक नये रोग ने जन्म लिया। आयुर्वेद के चिकित्सकों ने अपने संग्रह ग्रन्थों में उस रोग का उल्लेख किया और उसके आयुर्वेदीय निदान एवं चिकित्सा का प्राविधान किया।

आयुर्वेद के विद्वानों ने कभी भी संकुचित दृष्टिकोण नहीं अपनाया। उन्होंने ज्ञान के संवर्धन तथा ऊहापोह, तर्क-वितर्क के लिए सदैव प्रेरणा दी है। ओषध वही श्रेष्ठ है, जिससे आरोग्य लाभ हो और वही चिकित्सक श्रेश्ठ है, जो रोगी को रोग से मुक्त करें, ये विचार आचार्य चरक के हैं जिनमें कहीं भी लेषमात्र भी रूढ़िवादिता या पक्षपात की भावना नहीं है।

आयुर्वेद मात्र चिकित्सा शास्त्र नहीं है, अपितु यह एक दर्षन है, जो स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य का संरक्षण और रुग्ण व्यक्ति के रोग की मुक्ति तो करता ही है, साथ ही सांसारिक सर्वोच्च सुख एवं पारमार्थिक सर्वोच्च आनन्द की उपलब्धि के लिए निभर््रान्त मार्गदर्षन भी करता है। आयुर्वेद की एक महती विषेशता यह है कि यह चतुर्विंषतितत्त्वात्मक समस्त पुरूश की चिकित्सा करता है, जब कि अन्य चिकित्सा-पद्धतियाँ रोगी के किसी खास अंग की चिकित्सा करती हैं। सम्प्रति विषेशज्ञता के नाम पर एक-एक शरीरांग को बाँटकर चिकित्सा करने वाले चिकित्सकों की भरमार है।

आयुर्वेद में धर्म, कला, साहित्य, दर्षन और विज्ञान आदि सभी तरह के ज्ञान की उपयोगिता है। चरकाचार्य ने कहा है कि संसार के यावत् पदार्थ ओशध है - नानौशधिभूतं जगति किंचिंद द्रव्यमुपलभामहे। आज के औद्योगिक युग में विविध प्रकार की यान्त्रिक सुविधाएँ उपलब्ध है, जिनकी सहायता से बहुकाल साध्य कार्य स्वल्पकाल में ही सम्पन्न हो जाते हैं।

आयुर्वेद के विकास के लिए उन यान्त्रिक प्रक्रियाओं को अपना कर आयुर्वेद का विकास करना चाहिए। आयुर्वेद के सिद्धान्तों के आधार पर नये योगों के प्रयोग का मार्ग अवरूद्ध नहीं होना चाहिए। आयुर्वेद अपार है। इसलिए सावधानी के साथ इसके ज्ञान के लिए तैयार रहना चाहिए। दूसरों के अच्छे गुणों को ग्रहण करने में संकोच नहीं करना चाहिए। बुद्धिमान् व्यक्ति के लिए सारा संसार उसका गुरु है और मूर्खो के लिए सम्पूर्ण जगत् शत्रु है। इसलिए बुद्धिमानी की बात यह है कि शत्रु भी यदि हितकर, आयुश्यकर एवं कल्याणकारी मार्ग का निर्देष करता है, तो उसकी बातें ध्यान पूर्वक सुनें और विवेक पूर्वक उसका पालन करें - न चैव ह्यस्ति सुतरामायुर्वेदस्य पारम्। तस्मादप्रमत्त: शाष्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत्, एतच्च कार्यम्, एवं भूयष्च वृत्तसौश्ठवमनसूयता च परेभ्योSप्यागमयितव्यम्, कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्य: शत्रुष्चाबुद्धिमताम्, अतष्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताSमित्रस्यापि धन्यं यषस्यं आयुश्यं पौश्टिकं लौक्यमभ्युपदिषतो वच: श्रोतव्यमनु विधातत्यष्च।

स्वास्थ्य और चिकित्सा विभाग, संक्रामक रोग तथा सांघातिक व्याधियों के प्रतीकार के क्षेत्र में अपनी पूरी जिम्मेदारी के साथ जागरूक रहकर, अपने कर्त्तव्य का पालन करके ही आयुर्वेद के गौरव को बढ़ाया जा सकता है। आयुर्वेद का भविष्य सुन्दर है। विश्व के लोगों को आयुर्वेद से बड़ी आकांक्षाएँ हैं।

आयुर्वेद का अवतरण

प्राणिमात्र की सर्वप्रथम कामना है-सुखमय, दीर्घ जीवन की प्राप्ति। यद्यपि सभी शास्त्र मनुष्य को आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीन प्रकार के सन्तापों से मुक्त करने का मार्ग निर्देश करते हैं, किन्तु उनमें बतलाये गये विधानों का पालन करने के लिए उत्तम स्वास्थ्य तथा आरोग्य अत्यन्त अपेक्षित है। स्वास्थ्य-संरक्षण और रोग-मुक्ति का शास्त्र आयुर्वेद ही है। इसलिए आयुर्वेद सभी शास्त्रों का आधार होने के कारण सर्वाधिक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण शास्त्र है। यह सुखमय दीर्घ जीवन देने वाला शास्त्र है।

आध्यात्मिक या भौतिक, लौकिक या पारलौकिक, सांस्कृतिक, सामाजिक या आर्थिक, किसी भी प्रकार के चिन्तन का मूलमंत्र है। शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की उत्तमता है। नीरोग एवं स्वस्थ्य व्यक्ति के उत्तम उपायों का अवलम्बन कर परिष्कृत मार्ग पर चलता हुआ अभीश्ट स्थान से पहुँच जाता है, किन्तु रोगी या अस्वस्थ्य व्यक्ति विविध प्रयत्नों के वावजूद भी अपने कार्य को सिद्ध करने में सफल नहीं हो पाता है।

शरीर नाना प्रकार के स्थूल और सूक्ष्मतम अवयवों और उनकी गहन क्रियाओं द्वारा परिचालित एक रहस्यमय यन्त्र के समान है। शरीर में होने वाली किसी भी प्रकार की विकृति, न केवल शरीर को अपितु शरीराधिश्ठित आत्मा, मन, बुद्धि और इन्द्रियों में भी वैकलव्य उत्पन्न कर देती है। रोग ग्रसित शरीर वाला व्यक्ति शरीर और मन की ग्लानि से अवसाद की स्थिति में दु:खों का बसेरा बन जाता है अथवा किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और अपनी समस्याओं के कण्टकमय अर्गला में आबद्ध होकर कथम•िप दु:खों से छुटकारा नहीं पाता।

मन और शरीर की रूग्णता की स्थिति में जप-तप, ध्यान-धारणा, एकाग्रता, तीर्थांटन, देवोपासना, परोपकार आदि धार्मिक कर्म, षिल्प, वाणिज्य, कृशि, व्यापार, देषान्तर-गमन आदि आर्थिक प्रयत्न मनोवांछित आहार-विहार, विशयोपभोग, रतिप्रयोग एवं मानसिक विकारों (लोभ, शोक, मोह, मद, मात्सर्य, ईश्र्या, द्वेश, भय, चिन्ता आदि) का दमन, इन्द्रियनिग्रह, ईष्वर-भजन आदि मोक्ष के उपायों का भी सम्यक् प्रकार से उपयोग नहीं हो सकता। प्राणी जब पूर्णत: स्वस्थ और रोगमुक्त होता है, तभी उसमें उत्तम फूल और फल लगते हैं।

इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि जीवन को आरोग्यभय, दीर्घायुश्य-संपन्न और शारीरिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्त रखा जाये। शारीरिक दु:ख, मानसिक दु:ख तथा सभी प्रकार की आधि-व्याधि को दूर करने के लिए कल्याणमय हितकर आयुश्य की उपलब्धि हेतु अधिक उपयोगी, ज्ञान-विज्ञान को आयुर्वेद-विज्ञान कहा जाता है।

आयुर्वेद-विज्ञान केवल किसी व्यक्ति, जाति, समाज, प्रदेष या देष की उन्नति का साधक नहीं है, अपितु यह सार्वभौम है। इसका क्षेत्र समस्त प्राणिजगत् है। यह विष्वजनीन है। अत: प्रत्येक हितेच्छु व्यक्ति का यह पुनीत और इसके प्रचार-प्रसार एवं उपदेष को बहुजन-हिताय, बहुजन-सुखाय तथा लोकानुकम्पाय अधिकाधिक विस्तृत करें। प्राणिमात्र के प्रति दया-भाव से करूणादर््र-हृदय ऋशियों ने इसका उद्बोधन किया है। जीवन-दान सबसे बड़ा दान है। स्वस्थ ही सबसे बड़ा सुख है। इसलिए आयुर्वेद के उपदेषों का अक्षरष: पालन करना चाहिए और आर्तजनों की सेवा के क्षेत्र का विस्तार कर पुण्य और यश का अर्जन करना चाहिए।

आयुर्वेद के आठ अंग

वैदिक ग्रन्थ में आयुर्वेद के अंगों का यत्र-तत्र वर्णन प्राप्त होता है, परन्तु आठ अंगों का कहीं पर भी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि आयुर्वेद का आठ अंगों में विभाजन परकालीन चिन्तन है चरक, सुश्रुत और अश्टांगहृदय में इन आठ अंगों का कुछ नामोल्लेख प्राप्त होता है। सुश्रुत ने आयुर्वेद के आठ अंगों का नामोल्लेख किया है - 
  1. कायचिकित्सा - सम्पूर्ण शरीर की चिकित्सा अर्थात् शरीर के सभी अंगों के रोगों की चिकित्सा कायचिकित्सा है। काय का अर्थ जाठराग्नि भी कहॉं गया है, इसलिए इसका अर्थ होगा - जठर (पेट) सम्बन्घी अग्नि की चिकित्सा।
  2. बालचिकित्सा - इसे कौमारभृत्य भी कहते हैं। कौमारभृत्य अर्थात् बालकों का भरण-पोशण और उनके रोगों की चिकित्सा से है। इसे Science of Paediatrics कहते हैं। 
  3. ग्रहचिकित्सा - इसे भूतविद्या भी कहते हैं इसमें दैवीय विपत्तियों एवं ग्रहों के कु-प्रभाव को दूर करने के लिए शान्ति कर्म आदि का विधान है। इसे emonolgy कहते हैं।
  4. ऊध्र्वांग चिकित्सा - इसे शालाक्य चिकित्सा भी कहते हैं। इसमें गले से ऊपर के सभी अंगों अर्थात् आँख, नाक, कान तथा गले आदि रोगों की चिकित्सा का समावेष है। इसे कायचिकित्सा का ही अंग माना जाता है।
  5. षल्यचिकित्सा - इसे शल्यतन्त्र भी कहते हैं। इसमें तीक्ष्ण औजारों आदि के द्वारा चीर-फाड़ आदि का कार्य किया जाता है और दूशित तत्त्वों को निकाला जाता है, इसे Surgery कहते हैं।
  6. विशचिकित्सा -इसे अगदतंत्र, दंश्टाचिकित्सा, विशगर-वैरोधिक-प्रषमन भी कहते हैं। इसमें सर्प आदि के विश को दूर करने का विधान है। इसे Toxicology कहते हैं।
  7. रसायनतन्त्र - इसे रसायन या जराचिकित्सा भी कहते हैं। इसमें युवावस्था को अधिक समय तक बनाए रखने, बुढ़ापे के प्रभाव को दूर करने और शारीरिक शक्तियों को बढ़ाने के उपायों का वर्णन प्राप्त होता है।
  8. वाजीकरण तन्त्र - इसे वृशचिकित्सा भी कहते हैं। शुक्ररहित को शुक्रयुक्त बनाने की विधि को वाजीकरण कहते हैं। इस चिकित्सा के द्वारा वीर्यहीन को भी वीर्ययुक्त बनाया जाता है। इन्हें ही आयुर्वेद अश्टांग कहते हैं। दिवोदास ने षिश्यों से पूछा-आपको मैं किस तन्त्र का उपदेष बताऊ? षिश्यों ने कहा-आप हमें शल्यतन्त्र-प्रधान आयुर्वेद का उपदेष बतावें।
सन्दर्भ-
  1. षरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगोधारि जीवितम्।
  2. आयुर्जीवितकाल:। - अमरकोश - 2/8/120। 
  3. सत्तायां विद्यते, ज्ञाने वेत्ति, विन्ते विचारणे। 
  4. तदिदं शाश्वत पुण्यं स्वग्र्यं यषस्यमायुश्यं वृत्तिकरं च।-सु0सू0-1/17। 
  5. प्रचरणामिवभिक्षुकस्य, तीजमिवाकर्शकस्य, सूत्रं बुद्धिमतामल्पमप्यनल्प-ज्ञानायतनं भवति। तस्माद् बुद्धिमतामूहापोहवितर्का:। - च0वि0-8/152। 
  6. तदेव युक्तं भैशज्यं यदारोग्याय कल्पते। स चैव भिशजां श्रेश्ठो रोगेभ्यो य: प्रमोचयेत्।-च0सू0-1/133। 
  7. ब्रह्मा प्रोवाच, तत: प्रजापतिरधिजज्ञे, तस्मादष्विनावष्विभ्यामिन्द्र:।-सु0सू0 - 1/20। 
  8. अनुत्पाद्येव प्रजा: “लोकषतसहस्र, मध्यायसहस्रष्च कृतवान् स्वयम्भू:।-सु0सू0 - 1। 
  9. अहमर्थें नियुज्ये·यमत्रेति प्रथमं वच:। भरद्वाजो·ब्रवीत्तस्माद् ऋशिभि: स नियोजित:।-च0सू0-1/19। 
  10. हेतुलिंगौशधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्। त्रिसूत्रं शाष्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामह:।।-च0सू0-1/24। 
  11. चरक संहिता-1/25। 
  12. तेनायुरमितं लेभे भरद्वाज: सुखान्वितम्।-च0सू0-1/16। 

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