हिन्दू विवाह के उद्देश्य क्या है?

विवाह एक ऐसी सार्वभौमिक सामाजिक संस्था है, जो विश्व के प्रत्येक भाग में पाई जाती है। विवाह के द्वारा न केवल परिवार का निर्माण होता है, बल्कि व्यक्ति को समाज में एक विशिष्ट सामाजिक प्रस्थिति भी प्राप्त होती है। यद्यपि विश्व के प्रत्येक भाग में चाहे वह आधुनिक हो या प्राचीन, शहरी हो या ग्रामीण सभ्य हो या जनजातीय, विवाह अवश्य पाया जाता है, लेकिन फिर भी विभिन्न समाजों में इसके विभिन्न रूप दिखाई देते हैं। पश्चिमी समाजों में जहाँ विवाह, मित्रता को लिए हुए, एक समझौते के रूप में इसके विभिन्न रूप दिखाई देते हैं, मुसलमान विवाह को एक संविदा के रूप में स्वीकार करते हैं। हिन्दुओं में विवाह को सामान्यत: एक संस्कार के रूप में स्वीकार किया जाता हैं।

भारतीय समाज में प्रत्येक हिन्दू व्यक्ति के लिए विवाह एक अनिवार्य शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हिन्दुओं के पुरूशार्थ में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य माना गया है, जिनकी पूर्ति विवाह द्वारा ही सम्भव है। हमारे समाज में अविवाहित व्यक्ति को अपवित्र माना गया है, तथा उसे धार्मिक दृष्टि से अपूर्ण मानकर विभिन्न संस्कारों में भाग लेने योग्य नहीं माना गया है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि विवाह यौन-सम्बन्धों के उचित नियन्त्रण एवं इस लोक-परलोक के सुख के लिए आवश्यक है। शतपथ ब्रह्मण में लिखा गया है कि, “पत्नी निश्चित रूप से पति का अर्द्धांश है, अत: जब तक पुरूश पत्नी प्राप्त नहीं करता एवं सन्तान उत्पन्न नहीं करता तब तक वह पूर्ण नहीं होता। 

विवाह का उद्देश्य अत्यन्त पवित्र और गौरवशाली है। इसके माध्यम से मनुष्य अपने समस्त अपेक्षित कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है। धर्म का पालन, पुत्र की प्राप्ति एवं रति का सुख विवाह के प्रधान उद्देश्य माने गये हैं। वस्तुत: मनुष्य को धर्म सुख, पुत्र सुख और रति सुख विवाह से ही उपलब्ध होता है। 

विवाह का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति को अपने धार्मिक एवं सामाजिक कर्तव्यों को पूरा करने के अवसर प्रदान करना है। मूलत: यही कारण है कि हिन्दू संस्थाओं में से अनेक के अत्यधिक रूढ़िगत हो जाने के बाद भी विवाह का महत्व कम नहीं हुआ है। पवित्रता, धार्मिकता, एक विवाही प्रथा एवं स्थायित्व आदि हिन्दू विवाह की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जिनकी ओर पश्चिमी समाजों की निगाहें टिकी हुई हैं। हिन्दू विवाह जहाँ व्यक्तियों को मानसिक स्थायित्व, धार्मिक आस्था, त्यागमय जीवन की प्ररेणा आदि प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर वह सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करता है।

हिन्दू विवाह के उद्देश्य

हिन्दू विवाह के उद्देश्य इतने व्यापक हैं कि उनसे भारतीय सामाजिक जीवन का निर्माण होता है। इस महान संस्था के आधारभूत आदर्श क्रमश: धर्म और रति हैं। धर्म को सबसे प्रमुख माना गया है और रति को सबसे बाद में स्थान दिया गया है।

धर्म या धार्मिक कार्यों की पूर्ति

धर्म, हिन्दू विवाह की आधारशिला है। प्रत्येक पुरूश को अपने जीवन में कुछ ऐसे धार्मिक कर्तव्यों का निर्वाह करना पड़ता है, जो पत्नी के अभाव में पूरे नहीं किये जा सकते। धार्मिक कार्यों में यज्ञों का सर्वाधिक महत्व है। यज्ञ पाँच प्रकार के कहे गये हैं- ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ और अतिथि यज्ञ। इन यज्ञों के सम्पन्न करने में मनुष्य के साथ उसकी पत्नी का होना अनिवार्य बताया गया है। 

तैत्तरीय ब्राह्मण में उल्लिखित है, कि पत्नी रहित व्यक्ति यज्ञ सम्पन्न करने का अधिकारी नहीं।

प्रजा या पुत्र प्राप्ति

हिन्दू विवाह का दूसरा मूल उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति है, जिसमें भी पुत्र को जन्म देना प्रथम बात है। समाज की निरन्तरता और वंश के अस्तित्व के लिए पुत्र पैदा करना एक धार्मिक कर्तव्य माना गया है। हिन्दू विवाह में पुत्र प्राप्ति पर विशेष बल इसलिए भी दिया गया है, कि पितृ ण से उऋण होने का कार्य पुत्र ही करता है। पुत्र वह है, जो पिता को पुत् अर्थात् नरक से बचाए। हिन्दू विवाह एक पवित्र धार्मिक संस्कार है, अत: इसमें यह विचार भी प्रबल है, कि सन्तान उत्तम हो। 

मनु के अनुसार, पिता, पुत्र से स्वर्ग आदि उत्तम लोकों में अनन्त काल तक निवास करता है तथा प्रपौत्र से सूर्य लोक को प्राप्त करता है।”

(3) रति सुख -

हिन्दू विवाह का तीसरा आधार भूत उद्देश्य रति अथवा यौन सम्बन्धी आनन्द का भोग करना है, लेकिन यह यौन सम्बन्ध समाज द्वारा मान्यता प्राप्त तरीके से निभाना है, ताकि स्त्री-पुरूश का मानवीय सन्तुलन बना रहे, व्यक्तिगत आचरण दूषित न हो और समाज यौन अराजकता की स्थिति में न फँसे। यहाँ रति आनन्द का तात्पर्य वासना या व्यभिचार से न होकर धर्मानुकूल काम से है, जिसे तीसरे पुरूशार्थ में व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया है। हिन्दू धर्मशास्त्रकारों ने जहाँ एक ओर इसे मानव जीवन के लिए आवश्यक माना है, वहीं दूसरी ओर यह नियत्रंण भी लगाया कि पत्नी के अलावा अन्य किसी स्त्री से सम्भोग नहीं होना चाहिए। मनु ने भी धर्म निरुद्ध काम का परित्याग करने की सलाह दी है।

रति को विवाह का उद्देश्य अवश्य माना गया है, किन्तु इसे निम्न स्थान पर रखा गया है। डा0 कपाड़िया ने लिखा है कि “यद्यपि रति अथवा यौन सम्बन्ध विवाह का उद्देश्य अवश्य है, किन्तु इसे तीसरा स्थान दिया गया है, जिससे स्पष्ट है कि यह विवाह का अत्यन्त ही कम वाँछनीय उद्देश्य है।”

विवाह के उपर्युक्त विवेचित उद्देश्य, व्यक्ति को अत्यन्त शालीन और सदाचारी बनाते हैं, उसे नियमित और नियंत्रित करते हैं। अगर व्यक्ति को यौन स्वतन्त्रता मिल जाये तो समाज अनियन्त्रित और अनियमित हो जायेगा तथा उसका नैतिक पतन हो जायेगा। अत: विवाह नामक संस्था व्यक्ति को सन्मार्ग का दिग्दर्शन कराती है। स्त्री पुरूश दोनों के व्यक्तित्वों का उत्थान इन्ही उद्देश्यों के आधार पर होता है। दोनों के पावन और पवित्र समन्वय से सुव्यवस्थित जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है तथा दोनों के जीवन भौतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक भावना का विकास होता है। परिवारगत और समाजगत आचार-विचार, परम्परा-प्रथा और धर्म-कर्म की निरन्तरता को विवाह ही सतत् प्रवाहमान बनाता है और एक सभ्य समाज के निर्माण में योगदान करता है।

Bandey

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