वर्ण व्यवस्था क्या है?

वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत समाज का चार भागों में कार्यात्मक विभाजन किया जा सकता है, यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र। यह कार्यात्मक विभाजन मूलत: मनुष्य की चार स्वाभाविक इच्छाओं यथा ज्ञान, रक्षा, जीविका एवं सेवा की पूर्ति के लिये किया गया। साधारणतया लोग वर्ण एवं जाति को एक ही मान लेते हैं और एक ही अर्थ में इन दोनों का प्रयोग भी करते हैं, यह सर्वथा अनुपयुक्त है। यथार्थ में यह दोनों अवधारणायें एक दूसरे से भिन्न हैं। वर्ण-व्यवस्था एक वृहत् व्यवस्था है, जिसमें समाज को कार्यात्मक रूप से चार बड़े भागों में विभाजित किया गया है, जबकि जाति व्यवस्था एक ऐसा संगठन है, जिसका निर्माण हजारों जातियों के संस्तरण द्वारा हुआ है। वर्ण व्यवस्था की व्यापकता इसी से जानी जा सकती है, कि आज एक वर्ण के भीतर ही हजारों जातियों का निमार्ण हो चुका है।

वर्ण से आशय समान व्यवस्था करने वाले व्यक्तियों के एक सामाजिक समूह से है। व्यवसाय व्यक्ति के गुण और कर्म पर निर्भर करता है। एक व्यक्ति में अनेक गुण हो सकते हैं, किन्तु व्यक्ति के व्यक्तित्व में उन गुणों के एक विशेष संगठन के रूप में प्रधानरूप से कौन सी शक्तियाँ कार्यरत हैं, वर्ण निर्धारण में मुख्यत: इस बात पर ध्यान दिया जाता है। प्रमुख गुण तीन हैं-सत् ,रज और तम। जिस व्यक्ति में रज और तम गुणों की तुलना में सत् प्रधान है वह ब्राह्मण है, रजो गुण प्रधानता का व्यक्ति क्षत्रिय, रजो और तमो मिश्रित गुण सम्पन्न व्यक्ति वैश्य और तमो गुण प्रधान शूद्र है।

1. ब्राह्मण :-  मनु के अनुसार द्विजों में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण है। ब्राह्मण का आधार सात्विक पद्धति, निश्चल स्वभाव, इद्रियों पर संयम आदि हैं। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सदा वेद का अभ्यास करता रहे और ज्ञान का अर्जन करता रहे, यही उसका तप है। ब्राह्मण का कार्य अध्ययन करना, यज्ञ करना एवं कराना, दान लेना एवं दान देना आदि हैं। दान लेने में उसका प्रयास यही होना चाहिए, कि वह दान न ले क्योंकि दान लेने से उसका ब्रºम तेज कम हो जाता है।13 अन्त:करण की शुद्धि, इन्द्रियों का दमन, पवित्रता, धर्म के लिए कष्ट सहना, क्षमावान होना, ज्ञान का संचय करना तथा परमतत्व अर्थात सत्य का अनुभव करना ही ब्राह्मणांें के परम धर्म हैं।

2. क्षत्रिय:- क्षत्रियों का परम धर्म प्रजा की रक्षा करना, दान देना, विशयभोग से दूर रहना, अध्ययन एवं अपनी शक्ति को श्रेष्ठ कार्यो- शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता, युद्ध से न भागना, दान देना एवं स्वामीभाव अर्थात् नि:स्वार्थ भाव से प्रजा का पालन करना आदि में लगाना, क्षत्रियों के धर्म हैं।

3. वैश्य:- मनु ने मनुस्मृति में वैश्यों के भी सात धर्मों का उल्लेख किया है-पशुओं की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन करना, व्यापार करना, ब्याज पर धन देना तथा कृषि करना, वैश्यों के प्रमुख धर्म हैं।

4. शूद्र :- शूद्र चतुर्थ व सबसे अन्तिम वर्ण है और इसका एक मात्र धर्म अपने से उच्च तीनों वर्णों की बिना किसी ईर्ष्या-भाव के सेवा करना है। इनके अतिरिक्त सभी वर्णों के लिए, क्रोध न करना, सत्य बोलना, धन को बाँटकर उसका उपयोग करना, पत्नी से सन्तानोत्पत्ति, पवित्रता को बनाये रखना, क्षमाशील होना, सरल भाव रखना, किसी से द्रोह न करना तथा समस्त जीवों का पालन-पोषण करना आदि समस्त वर्णों के नौ सामान्य धर्म हैं, जिनका पालन करना प्रत्येक वर्ण के लिए अनिवार्य माना गया है।

वर्ण व्यवस्था की विशेषताएं

  1. वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक अवधारणा है।
  2. वर्ण का अर्थ चुनाव करने से है।
  3. वर्ण व्यवस्था का आधार जन्म नहीं, कर्म या व्यवस्था था।
  4. पूर्व वैदिक काल में वर्ण परिवर्तनीय था।
  5. वर्ण व्यवस्था ने भारतीय समाज को चार वर्णो में बाँट दिया।
  6. चारो वर्णों के कार्य तथा कर्तव्य अलग-अलग थे।
  7. कार्यात्मक भिन्नता के आधार पर वर्णों की सामाजिक स्थिति भी भिन्न थी।
सन्दर्भ-
  1. राम गोपाल सिंह, “भारतीय समाज एवं संस्कृति”, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर, 1997, पृश्ठ-52
  2. पी0सी0खरे, “भारतीय समाज एवं संस्कृति”, मीनाक्षी प्रकाशन मेरठ, 1976, पृश्ठ-39
  3. मनुस्मृति ( 4/186)
  4. मनुस्मृति ( 2/128)-”शमो दमास्वय: शैच: क्षन्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तियं ब्राºंकर्म सवभावजम्।।”
  5. गीता ( 18/4)- “शौर्य तेजो धृति रश्यिं युद्धे चारमलायलम्। छानमीश्वरमावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।”
  6. मनुस्मृति ( 1/90) - “पशूनां रक्षणं रानमिज्याध्ययनमेव च। व्णिंक्वथं कुसीदं च वैश्यस्य कृशिमेव च्।।”
  7. पी0एच0प्रभू “हिन्दू सोशल आर्गनाइजेशन”,राजपाल एण्ड सन्स दिल्ली, 1972, पृश्ठ-284

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