आधुनिक भारत की समस्याएं

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किसी भी राष्ट्र में मनुष्य के जीवन की महत्त्वपूर्ण धूरी ‘अर्थ’ होती है। अर्थ के माध्यम से ही मनुष्य अपनी सम्पूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। मनुष्य के समस्त क्रिया-कलापों को अर्थ के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है। अर्थ ही राष्ट्र के विकास का निर्धारण करता है। यदि राष्ट्र में अर्थ की समस्या होती है तो विभिन्न प्रकार की राष्ट्रीय आर्थिक तथा सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

आधुनिक भारत की समस्याएं

1. महँगाई -

महँगाई सबसे भयंकर समस्या है। समाज का प्रत्येक वर्ग इस बढ़ती समस्या से प्रभावित होता है। जब महँगाई बढ़ती है तो व्यक्ति के क्रय शक्ति क्षमता में कमी आती है। वस्तुओं के मूल्य बेतहाशा रूप से बढ़ने लगते हैं। सामान्य व्यक्ति इस महँगाई के कारण दैनिक आवश्यकता की मूल वस्तुओं की खरीदारी नहीं कर पाता है। साधारण व्यक्ति को अपनी सुख-सुविधाओं की पूर्ति कर पाना सम्भव नहीं लगता है।

2. बेरोजगारी -

बेरोजगारी एक ऐसी आर्थिक समस्या है। जिससे देश के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में आय व सम्पित्त के वितरण की असमानता तथा इससे उत्पन्न सामाजिक बुराइयाँ साथ-साथ एक दूसरी प्रधान सामाजिक समस्या बेरोजगारी की है।

साधारणतया बेकारी का अर्थ बिना काम के होने से लगाया जाता है। किन्तु इस दृष्टि से आलसी व्यक्ति, जो काम करना नहीं चाहता उसे भी बेकार कहना पड़ेगा। अत: आर्थिक दृष्टिकोण से बेकारी से तात्पर्य उन लोगों के काम के बिना रहने से है जिनमें कार्य करने की इच्छा तथा योग्यता रहती है, परन्तु उन्हें काम के बिना रहने के लिये विवश कर दिया जाता है, बेकार कहलाते है। यदि एक पी-एच0 डी0 धारक व्यक्ति किसी दफतर में एक छोटे बाबू की तरह कार्य करता है तो उसे बेरोजगार नहीं माना जायेगा। अत: बेरोजगार व्यक्ति, ‘‘वह है जिसमें कमाने की अन्तर्निहित क्षमता तथा इच्छा दोनों है फिर भी उसे वैतनिक काम नहीं मिल पाता। 

समाजशास्त्री दृष्टिकोण से बेरोजगारी की परिभाषा है कि, ‘‘यह सामान्य वेतन पर और बल के एक सदस्य को सामान्य काल में सामान्य वेतन पर और उसकी इच्छा के विरूद्ध वैतनिक कार्य से अलग रखना है।’’ अर्थात बेरोजगारी वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति बिना काम के रहने के लिये विवश होता है। इस स्थिति में बेकार मनुष्य बिना काम के होता है, उसके पास कोई रोजगार नहीं होता। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि साधु-सन्यासी या बीमार व अपाहिज आदि व्यक्तियों को बेकार कहा जायेगा। वास्तव में बेकार केवल वे ही व्यक्ति होते है जिनमें काम करने की इच्छा तथा योग्यता होते हुए भी जिन्हें समाज में कोई काम नहीं मिलता है।

3. भ्रष्टाचार -

सरल शब्दों में भ्रष्टाचार को रिश्वत का कार्य कहा जा सकता है। इसे निजी लाभ के लिये सार्वजनिक शक्ति का इस प्रकार प्रयोग करना जिसमें कानून तोड़ना शामिल हो या जिससे समाज के मानदण्डो का विचलन हुआ हो ‘ भी भ्रष्टाचार के अन्तर्गत आता है। डी0 एच0 बेली ने भ्रष्टाचार को इस प्रकार बताया है, ‘‘निजी लाभ के विचार के परिणामस्वरूप सत्ता का दुरुपयोग जो धन से सम्बंधित नहीं भी हो सकता है।’’

भ्रष्टाचार अनेक स्वरूपों में फैला हुआ है। इनमें से प्रमुख इस प्रकार है- रिश्वत (देने वाले के पक्ष में अवैध, बेईमानी से युक्त कार्य करने को प्रेरित करने के लिये नगद या वस्तु या उपहार में दिया जाना ), भाई-भतीजवाद, दुर्विनियोग (दूसरे के धन को अपने प्रयोग में लेना) और पक्षपात।,

भ्रष्टाचार एक विश्वव्यापी तथ्य है। यह अनन्त समय से प्रत्येक समाज में किसी ने किसी रूप में पाया जाता है। भारत में कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में राज्यकोश के सरकारी कर्मचारियों द्वारा गबन और अन्य भ्रष्ट तरीकों का वर्णन किया है। ब्रिटिश शासन काल में रिश्वत न केवल भारतीय अफसरों द्वारा स्वीकार की जाती थी बल्कि उच्च पदस्थ अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भी किया जाता था। क्लाइव व वारेन हेस्टिंज तो इस कदर भ्रष्ट पाये गये थे कि उनके इंग्लैण्ड लौटने पर एक संसदीय समिति द्वारा उन पर मुकदमा चलाया गया। प्रथम और द्वितीय महायुद्वों के दौरान आर्थिक क्रियाकलाओं के विस्तार ने देष में भ्रष्टाचार के नये रूपों को जन्म दिया। युद्ध के दौरान लगाये गये प्रतिबंधो, नियंत्रणों और अभावों ने रिश्वत, भ्रष्टाचार व पक्षपात करने का अवसर प्रदान किये।

भ्रष्टाचार का स्वरूप केवल भारत में ही नहीं फैल रहा है बल्कि यह अन्य देशों में भी तीव्र गति से फैलता जा रहा है। समृद्ध और विकसित देषों मे भी भ्रष्टाचार अपना पैर फैलाता जा रहा है। यह राष्ट्रीय स्तर की चिंता की बात है।

4. काला धन -

काला धन देष की अर्थव्यवस्था को अपूरणीय हानि पहुँचाता है। और इसका सबसे अधिक दुश्प्रभाव आम नागरिक पर पड़ता है। इसके कुछ प्रमुख आर्थिक प्रभाव है जैसे मुद्रास्फीति दबाव में वृद्धि, विकास कार्य में बाधा, संसाधनों में अव्यवस्था, कर आधार का सीमितकरण और समानान्तर अर्थव्यवस्था का उदय। देष का आर्थिक संतुलन खतरे में पड़ जाता है। सामान्य व्यापार के क्रिया-कलाप प्रभावित होते हैं तथा वित्तीय संस्थानों और वाणिज्य संस्थानों के संसाधन विकृत और इधर-उधर हो जाते हैं। 

5. आतंकवाद -

आतंकवाद हिंसा का एक गैर-कानूनी तरीका है जो लोगों को डराने के लिये आतंकवादियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। आज, आतंकवाद एक सामाजिक मुद्दा बन चुका है। इसका इस्तेमाल आम लोगों और सरकार को डराने-धमकाने के लिये हो रहा है। बहुत आसानी से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये विभिन्न सामाजिक संगठन, राजनीतिज्ञ और व्यापारिक उद्योगों के द्वारा आतंकवाद का इस्तेमाल किया जा रहा है।

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