गैर सरकारी संगठन की परिभाषा, कार्य एवं विशेषताएँ

गैर सरकारी संगठन निस्वार्थ सेवा हेतु एकत्रित हुए लोगों का समूह है जो कुछ व्यक्ति मिलकर खास उद्देश्य के लिए कोई संगठन बनाते हैं। इसमें व्यक्तिगत लाभ ना होकर सामाजिक विकास का उद्देश्य होता है। इनका मुख्य लक्ष्य जरूरतमंद की सेवा करना होता है। गैर सरकारी संगठन व्यक्तियों का ऐसा समूह होता है जिन्होंने स्वयं को विधि सम्मत निकाय में संगठित कर लिया है ताकि वे संगठित कार्यक्रमों के माध्यम से सामाजिक सेवाएँ प्रदान कर सकें। गैर सरकारी संगठन राष्ट्रीय व अन्तर्राश्ट्रीय स्तर पर विद्यमान है। सरकार की नीतियाँ जहाँ नहीं पहुंच पाती वहाँ गैर सरकारी संगठन के सदस्य पहुँच कर कार्य करते हैं, जिनमें जनता का हित होता है। 

गैर सरकारी संगठन की परिभाषा

लार्ड विवरिज के शब्दों में - ‘‘ठीक से कहें तो गैर सरकारी संगठन ऐसा संगठन होता है जिनके कार्य का आरम्भ और संचालन इसके सदस्यों द्वारा बिना बाहरी हस्तक्षेप के किया जाता है, चाहे इसके कार्यकर्ताओं को वेतन दिया जाता हो या नहीं’’

ऐसे संगठनों का एक संगठनात्मक व्यक्तित्व होता है, जिससे अपनी ही पहल पर अथवा बाहर से प्रेरित होकर लोगों के समूह द्वारा किसी स्थान विषेश में एक आत्मनिर्भर तरीके से गतिविधियाँ चलाई जा सके व उनकी जरूरतें पूरी की जा सके और साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र की प्रसार सेवाओं को एक-दूसरे के करीब लाया जा सके ताकि कमजोर वर्गों के न्यायोचित और प्रभावी विकास को अंजाम दिया जा सके। गैर सरकारी संगठनों को अपने विकास कार्यों में खर्च होने वाली राशि का कुछ हिस्सा सरकार द्वारा प्राप्त होता है।

संयुक्त राष्ट्र ने भी गैर सरकारी संगठनों की महत्ता को मान्यता दी है। संयुक्त राष्ट्र भी इन चीजों को मानता है कि गैर सरकारी संगठन सामुदायिक क्षेत्र में एक खास अनुभव और तकनीकी ज्ञान रखते हैं जो आर्थिक और सामाजिक कल्याण के कार्यों में अपना स्थान रखते हैं इसलिए उनको सुअवसर दिया जाना चाहिए ताकि वो अपने विचारों का वर्णन कर सके। अत: सरकारी संस्थाओं को गैर सरकारी संस्थाओं से ऐसे मुद्दों पर सलाह मशविरा कर लेना चाहिए, जिन पर इन गैर सरकारी संस्थाओं को खास अनुभव प्राप्त हो। वे अपने पर्यवेक्षक ऐसे सम्मेलनों में जहाँ आर्थिक मुद्दों पर विचार विमर्श हो रहा हो भेज सकते हैं। मई 1985 में 34 संगठनों को द्वितीय श्रेणियों में सूचीबद्ध किया गया था और बाकी बचे हुए लगभग 450 गैर सरकारी संगठनों को एक रजिस्टर में दर्ज कर लिया गया था। 

ये संगठन सरकार द्वारा दी जाने वाली राशि का इन्तजार नहीं करते बल्कि अपने प्रयास से धन एकत्रित करते हैं। ये संगठन जनता की भलाई के लिए कार्य करते हैं ताकि जनता का विकास हो तथा सामाजिक विकास हेतू लोगों की भागीदारी प्रक्रिया का श्रीगणेश करते हैं। लाभ ना पा सकने वाले समूह को सामाजिक न्याय दिला सकते हैं और समाज में अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता पैदा कर सकते हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं में प्रगति को बढ़ावा दे सकते हैं।

गैर सरकारी संगठनों ने विश्व में अपना जाल बिछाया हुआ है। सबसे ज्यादा गैर सरकारी संगठन अमेरिका में हैं और सबसे कम केन्या में हैं। कनाड़ा के कुछ भागों में उदाहरण के तौर पर होटलों के सभी बिलों पर कुछ प्रतिषत राशि अधिक ली जाती है और यह राशि अस्पतालों में गरीब और असहाय मरीजों की दवाइयों के लिए इक्कठा किया जाता है। इसी प्रकार स्वीडन में अनाथ बच्चों की जरूरतों के लिए माचिस बेचकर धन जुटाया जाता है। 

गैर सरकारी संगठन पदावली का प्रयोग मुख्यतः अलाभकारी सेवा संगठन के रूप में किया जाता है। गैर सरकारी संगठनों के अन्तर्गत ऐसे ग्रुप व संस्थान आते हैं जो पूर्ण रूप से या अधिकांश रूप से गैर सरकारी होते हैं। इनका उद्देश्य व्यावसायिक न होकर मुख्यत: मानव के कल्याण हेतु सहकारी तौर पर काम करना होता है। ये संस्थाएँ अन्तर्राश्ट्रीय विकास के लिए सहायता प्रदान करती है। यह सहायता प्रादेशिक स्तर पर या राष्ट्रीय स्तर के समूहों और गांवों के सदस्य समूहों को प्रदान की जाती है।

गैर सरकारी संगठन की विशेषताएँ

प्रथम, गैर सरकारी संगठन लाभ अर्जित न करने वाला गैर सरकारी, सेवाभाव वाला, विकास प्रकृति वाला एक ऐसा संगठन है, जो अपने संगठन के मूल सदस्यों या जन समुदाय के अन्य सदस्यों के हितों के लिए काम करता है।

द्वितीय, यह निजी व्यक्तियों द्वारा बनाया गया एक ऐसा संगठन है जो कुछ मूलभूत साधारण सिद्धान्तों पर विश्वास करता है और अपनी गतिविधियों का गठन समुदाय के एक ऐसे वर्ग के विकास के लिए करता है जिसको वह अपनी सेवाएँ प्रदान करना चाहता है।

तृतीय, यह एक समाज विकास प्रेरित संगठन है, जो समाज को सशक्त और समर्थ बनाने में सहयोग देता है।

चतुर्थ, यह एक ऐसा संगठन या जनता का एक ऐसा समूह है जो स्वतन्त्र रूप से काम करता है और इस पर किसी तरह का कोई बाहरी नियंत्रण नहीं होता। प्रत्येक गैर सरकारी संगठन के अपने कुछ खास उद्देश्य और लक्ष्य होते हैं, जिनके आधार पर वे किसी समुदाय, इलाके या परिस्थिति विषेश में उपयुक्त बदलाव लाने के लिए अपने निर्दिष्ट कार्यों को पूरा करते हैं।

पंचम, यह एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक और गैर साम्प्रदायिक व्यक्तियों का एक ऐसा संगठन होता है जो आर्थिक व सामान्य दृष्टि से नीचे के स्तर के लोगों के समूह को सशक्त व समर्थ बनाने का काम करता है।

शश्ठम, यह किसी भी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा नहीं होता और जो आम तौर पर जनसमुदाय को मदद देने, उनके विकास व कल्याण के कार्यों में जुटा रहता है।

सप्तम, यह एक ऐसा संगठन है, जो समाज को समस्याओं के मूलभूत कारणों की जड़ों का पता लगाने और विषेश रूप से गरीब, उत्पीड़ित, सामाजिक दृष्टि से हीनतम स्थिति के लोगों, वे चाहे शहरी हों, या ग्रामीण इलाकों में हो, के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के प्रति वचनबद्ध हैं। अन्त में, गैर सरकारी संगठन जन समुदाय द्वारा बनाए जाते हैं, इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता या बहुत ही कम होता है। ये धमार्थ संगठन ही नहीं होते बल्कि, ये सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक गतिविधियों का भी आयोजन करते हैं।

गैर सरकारी संगठन को परम्परागत रूप से निम्नलिखित नामों से जाना जाता है- 
  1. गैर सरकारी संगठन (VOs), 
  2. गैर सरकारी एजेसियाँ (VAs), 
  3. सरकारी विकास संगठन (VDOs), 
  4. गैर सरकारी विकास संगठन (NGDOs)
गैर सरकारी संगठनों की कार्यप्रणाली : सरकार ने अपने राज्य नीति के निर्देशित सिद्धान्तों के तहत राज्य को कल्याणकारी राज्य का दर्जा दिया है। अत: निश्चित रूप से नागरिक समाज और सामाजिक संगठनों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे भी अनाथ, दलित और कमजोर वर्गों (महिलाओं व बच्चों) की समस्याओं को हल करने व उनकी मूलभूत आवश्यकताओं और सुविधाओं को प्रदान करने के लिए अपनी विषेश भूमिका निभाए। सरकार ने नागरिकों के जीवन स्तर और उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, कुछ योजनाएँ निर्धारित की है जिनमें गैर सरकारी संगठन अपना योगदान दे रहे हैं, ये हैं - शिक्षा, वृद्धों का संरक्षण, कृशि, पशु कल्याण, कला, दस्तकारी, षिषु कल्याण, शहर व नगर, संस्कृति व धरोहर, विकलांगता, पर्यावरण, स्वास्थ्य, मानव संसाधन, ग्रामीण विकास, विज्ञान प्रौद्योगिकी, जनजातिय वर्ग कल्याण, महिला विकास, अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ आदि।

गैर सरकारी संगठन का वर्गीकरण

गैर सरकारी संगठन के संदर्भ में कार्य समूह की दृष्टि से दो तरह की संकल्पनाएँ प्रचलित है। सर्वप्रथम तो इसकी परिभाषा ऐसे कार्य समूह अथवा सरकारोत्तर संस्था के रूप में की जाती है, जिसका सरोकार मानवीय हो अथवा ध्यानाकर्शण मानव, पशु एवं पर्यावरण संरक्षण आदि पर हो। द्वितीय, ऐसे समूह जो गरीब शोशित, दलित, असमर्थ लोगों की सहायता एवं उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान से जुड़े हुए हैं।

गैर सरकारी संगठनों के प्रकार को उनके मुख्य सरोकारों के आधार पर पहचाना जाता है। गैर सरकारी संगठन को उनके उद्देश्य, गतिविधियाँ एवं राजनीतिक झुकाव के आधार पर मुख्य पाँच रूपों में परिभाषित किया जाता है, ऐसे समूह जो राहत एवं चैरिटी का कार्य करते हैं। दूसरे ऐसे समूह जो विकासात्मक योजना एवं कार्यक्रमों के संपादन कार्य में सलंग्न है। तृतीय, ऐसे सरकारोत्तर समूह जिनके कार्य किसी मानवीय सरोकार के लिए लोगों का संगठन एवं लाभबंदीकरण हो। चतुर्थ ऐसे समूह जिनका उद्देश्य राजनीतिक व्यवस्था पर दबाव हो तथा पंचम ऐसे समूह जो लोगों में राजनीतिक शिक्षा के प्रसार का कार्य करते हैं

मूल रूप से एक गैर सरकारी संगठन की परिकल्पना एक ऐसी संस्था के रूप में की जाती है, जिसकी संरचना कुछ व्यक्तियों ने मिलकर या व्यक्तियों की एक समिति ने मिलकर की है। इसका एक निश्चित नाम और उद्देश्य होता है। यह संगठन पंजीकृत भी हो सकते हैं और नहीं भी। परन्तु जब वह संगठन कोई लोकपरोपकारी या अन्य सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बाहर से वित्तीय सहायता प्राप्त करना चाहता है तो धन देने वाली संस्थाएँ (अन्तर्राश्ट्रीय या राष्ट्रीय) निश्चित रूप से उस संगठन से उपेक्षा करेगी कि वे अपना एक वैध स्वरूप धारण करें। इन्हें वैध स्वरूप तभी मिल सकता है जब व्यक्तियों के समूह को किसी लागू कानून के अन्तर्गत पंजीकृत कर लिया हो। सरकार ने अनेक तरह के विधान व कानून बनाए हैं, उनमें से तीन प्रकार के विधान भारत में गैर सरकारी संगठन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।

(क) पंजीकरण या संस्थान (Incorporation) के कानून सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860- सोसाइटी को अपने सदस्य को लाभांश की अदायगी के लिए सोसाइटी की आय के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है और साथ यह भी प्रतिबंध लगाता है कि सोसाइटी के भंग हो जाने पर परिसम्पतियों का अन्तरण केवल उन्हीं संगठनों को हो, जिसका उद्देश्य एक जैसा हो। यह प्रतिबंध कुछ हद तक एक सा दूसरी सोसाइटी द्वारा उद्देश्यों की निरन्तरता अर्थात् इनके लगातार जारी रहने का सुनिश्चित करता है। अब भारत सरकार सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 2012 को लागू कर चुकी है और अब सभी गैर सरकारी संगठन इसी कानून के अन्तर्गत रजिस्ट्रड होते हैं। 

(ख) वित्त से सम्बन्धित विधान - आयकर अधिनियम 1961 मुख्यत: गैर सरकारी संगठनों सहित धर्मार्थ संगठनों को विषेश रियायत देता है, बशर्ते ऐसी रियायतों की शर्तें प्रति वर्ष संतोषजनक हो।

संगठनों के लिए विदेशी निधियों को गति और अंशदान को विनियमित करता है। भारत सरकार ने इस अधिनियम को लागू करने की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय को सौंप रखी है। सरकार द्वारा धनराशि का दिया जाना : हमारे संविधान में जो उद्देश्य दिये गए हैं, वे उद्देश्य हमारे देष में अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों, अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों, महिलाओं सहित निम्न स्तर की जनता की बुनियादी जरूरतों को देखते हुए पूरे नहीं हो पाए हैं और विकास का लाभ उन तक नहीं पहुंच पाया। गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रम पर जोर देने और काफी धनराशि खर्च किए जाने के बाद भी सरकार उन जरूरतमंद की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ रही है। इसलिए इन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में और अधिक स्वतन्त्रता, लचीलापन और नवीनता की लाने आवश्यकता है। सरकार की यह इच्छा भी तभी पूरी हो सकती है, जब वह उन गैर सरकारी संगठनों की सहायता ले, जिनके पास समाज के कमजोर वर्गों के बीच कार्य करने का अनुभव हो और ये गैर सरकारी संगठन भी नियमित आधार पर इस कार्य में अपना सहयोग देने के इच्छुक हों। इसलिए सरकार और गैर सरकारी संगठन के बीच सहयोगात्मक संबंधों की आवश्यकता है।

केन्द्र और राज्य सरकारें भी विकास संबंधी और मानवीय सहायता प्रदान करने में गैर सरकारी संगठनों की भागीदारी को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रोत्साहन दे रही हैं। सरकारी धनराशि का काफी बड़ा भाग कार्यान्वयन एजेन्सियों को स्वायत्तता के साथ खर्च करने के लिए उपलब्ध कराया जाता है बशर्ते कि इसे कुशलता और मितव्यतिता एवं ईमानदारी के साथ खर्च किया जाए

सरकारी अनुदान की शर्तें : भारत सरकार विशिष्ट कार्यक्रमों और सामान्य प्रायोजनों के लिए सहायता अनुदान देती है। ये अनुदान कुछ अनुमोदित कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने में लगे हुए स्वैच्छिक संगठनों को दिये जाते हैं। इन विशिष्ट योजनाओं को विनियमित करने वाले नियम और शर्तें विभिन्न मंत्रालय और विभागों की इन योजनाओं में उल्लेखित सहायता अनुदान के नियमों के अनुसार होती है। कुछ शर्तें इस प्रकार हैं-
  1. संस्था/संगठन/एजेन्सी सोसाइटिज पंजीकरण अधिनियम, 2012 आदि के अन्तर्गत पंजीकृत होनी चाहिए।
  2. धन राषि के इच्छुक संगठन पंजीकृत और प्रतिष्ठित होने चाहिए। 
  3. इसे समुचित रूप से गठित होना चाहिए और इसका आधार व्यापक होना चाहिए। प्रबंधकीय समिति के अधिकार कर्तव्यों व जिम्मेदारियों का स्पष्ट रूप से इसके लिखित संविधान में उल्लेख होना चाहिए। 
  4. इन्हें सामाजिक कल्याण के कार्यों में कम से कम 3 वर्ष तक संलग्न होना चाहिए। 
  5. स्वैच्छिक संगठनों के कार्यक्रमों और सेवाएँ जाति, नस्ल, धर्म का भेदभाव किए बिना सभी के लिए होनी चाहिए। 
  6. संगठन की आर्थिक स्थिति सुदृ़ढ़ होनी चाहिए और इसके पास आबंटित अनुवादन से कार्यक्रमों को चलाने के लिए पर्याप्त सभी सुविधाएँ और कर्मचारी होने चाहिए। 
  7. इसे किसी व्यक्ति विषेश आदि के लाभ के लिए नहीं परिचालित किया जाना चाहिए। 
  8. अनुदान प्राप्त करने वाले संगठन को अनुदान की शर्तों का पालन करने का एक बांड भरना अनिवार्य होगा। यदि इन शर्तों का उल्लंघन होता है तो अनुदान की राशि वापिस करनी पड़ेगी। 
  9. अनुदान प्राप्त करने वाली एजेंसी अनुदान देने वाले के अधिकार को मानेगी कि वह कभी भी इस संस्था के कार्यचालन आदि का निरीक्षण कर सकता है। 
  10. एजेन्सी जनता के अंशदान लेने सहित अपने संसाधन जुटाने में समर्थ होनी चाहिए। 
  11. अनुदान की राशि उसी प्रयोजन के लिए उपयोग की जानी चाहिए, जिसके लिए वह ली गई है। 
  12. संस्थायें उन कार्यक्रमों के लिए अलग बैंक खाते रखेगी जिनके लिए अनुदान प्राप्त हुआ है। 
  13. यदि अनुदानदाता धनराशि के उपयोग से संतुष्ट नहीं है तो अनुदान रोक दिया जाएगा। 
  14. अनुदान प्राप्त करने वाला संगठन किसी दूसरे संगठन के कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए अनुदान की राषि अन्तरित नहीं कर सकता। 
  15. यदि केन्द्रीय सरकार के किसी अन्य विभाग से किसी प्रयोजन के लिए चयन राषि प्राप्त की गई है जो उसी प्रयोजन के लिए अनुदान आबंटित नहीं किया जाएगा। 
  16. अनुदान की खर्च न की गई राशि वर्ष के अन्त में वापिस करनी पड़ेगी।

गैर सरकारी संगठन के कार्य

  1. वे व्यक्तियों को अपने निजी संगठनों के प्रशासन में भाग लेकर समूह एवं राजनीतिक कार्य की मौलिकताओं को सीखने का अवसर प्रदान करते हैं।
  2. मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है। समूह में कार्य करने की प्रवृत्ति उसमें मौलिक है। इसलिए वह समूह एवं समितियों की संरचना करते हैं। 
  3. प्रजातांत्रिक प्रणालीयुक्त बहुल्य समाज में सरकार को विभिन्न क्षेत्रों में एकाधिकार विकसित करने से रोकने के लिए व्यक्ति एवम् राज्य के मध्य अन्त:स्थ रूप में अनेक स्वतन्त्र गैर सरकारी अषासकीय संगठनों की आवश्यकता होती है। 
  4. राज्य के पास नागरिकों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आवश्यक वित्तीय साधन एवं मानवषक्ति नहीं होती। गैर सरकारी संगठन अतिरिक्त साधन जुटाकर सरकार द्वारा पूरी न हो पाने वाली आवष्यकताओं की पूर्ति तथा स्थानीय जीवन को समृद्ध कर सकता है। 
  5. स्वैच्छिक संगठन अपने कार्य विभिन्न राजनीतिक एवं अन्य हितों वाले समूहों एवम् व्यक्तियों की सहायता करता है। राष्ट्रीय सुदृढ़ता की भावना को सषक्त बनाता है तथा प्रजातंत्र के सहभागी स्वरूप का वर्द्धन करता है। 

स्वैच्छिक संगठनों का ढांचा

गैर सरकारी संगठनों को अपने कार्यों में खर्च होने वाली राशि का कुछ हिस्सा सरकार द्वारा प्राप्त होता है, जिसमें वे कार्यों को सफलतापूर्वक करते हैं ताकि आत्मनिर्भर तरीके से गतिविधियाँ चलाई जा सके, गरीब व कमजोर वर्गों के न्यायोचित और प्रभावी विकास को अंजाम दिया जा सके। यह केवल एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह हो सकता है। इसे प्राय: गैर सरकारी संगठन के नाम से जाना जाता है। इसका विवरण इस प्रकार है-
  1. आम सभा
  2. कार्यकारिणी समिति
  3. संचालन मंडल

आम सभा

आम सभा में संस्था के सभी सदस्य शामिल होते हैं, जिनमें साधारण सदस्य, आजीवन सदस्य होते हैं। आम सभा के सदस्य मिलकर कार्यकारिणी और संचालन समिति का चुनाव करते है।

कार्यकारिणी समिति

संस्था के सुचारू संचालन के लिए आमसभा द्वारा कार्यकारिणी समिति का चुनाव किया जाता है, जो आम सभा की ओर से संस्था के उद्देष्यों की पूर्ति हेतु गतिविधियों का संचालन करती है तथा नीतिगत फैसले लेती है। बाद में इन फैसलों का आमसभा द्वारा अनुमोदन किया जाता है। कार्यकारिणी में संचालन मंडल सहित 11 या इससे अधिक सदस्य होते हैं।

संचालन मंडल

संगठन की रोजमर्रा की गतिविधियों का संचालन, संचालन मण्डल द्वारा किया जाता है।

इसमें संस्था के पदाधिकारी शामिल होते हैं। आमतौर पर किसी स्वैच्छिक संगठन में निम्न पदाधिकारी होते हैं-
  1. अध्यक्ष/प्रधान
  2. उपाध्यक्ष/उप-प्रधान
  3. सचिव
  4. कोशाध्यक्ष
संस्था के कार्यों के अनुरूप हर संस्था अपने संविधान में उल्लेख करती है कि उसमें कौन-कौन से पदाधिकारी रहेंगे। बड़ी संस्थाओं में वरिश्ठ उप-प्रधान, सह-सचिव इत्यादि के पद भी होते हैं और इनकी संख्या 1 से अधिक भी हो सकती है। आमतौर पर संस्था के वित्तीय कार्यों का क्रियान्वयन प्रधान, सचिव व कोशाध्यक्ष द्वारा किया जाता है।

विलक्षणताएँ

एक स्वैच्छिक संगठन को अधिक प्रासंगिक प्राभावेत्पादक बनाने व सामाजिक विकास में इसकी अर्थपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करने के लिए पूर्णत: स्वैच्छिक एवं स्वतन्त्र निकाय बनकर रहना होगा। उनके कोश प्राप्त करने का जरिया ऐसा नहीं होना चाहिए कि वे अपना स्वैच्छिक एवं स्वतन्त्र रूप ही खो बैठें। भारत की सातवीं पंचवश्र्ाीय योजना के दस्तावेजों में, सरकार ने सामाजिक विकास कार्यक्रमों में सहायता के लिए स्वैच्छिक संगठनों को मान्यताएँ देने के लिए निम्नलिखित मापदण्ड सुझाएँ हैं-
  1. गैर सरकारी संगठनों की एक कानूनी सत्ता होनी चाहिए।
  2. यह सामाजिक क्षेत्र में आधारित हो व कम से कम 3 साल से काम कर रही हो।
  3. इसके उद्देश्य व्यापक व आधारपूर्ण हो। जैसे गरीब वर्गों की सामाजिक, आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करना।
  4. इनकी गतिविधियाँ बिना किसी धर्म, जाति, लिंग, समुदाय आदि के भेदभाव के सभी नागरिकों के लिए होनी चाहिए।
  5. इनके पदाधिकारी किसी राजनीतिक दल के निर्वाचित सदस्य नहीं होने चाहिए। 
गैर सरकारी संगठन ऐसे संगठन हैं जो गरीब व दूसरे निराश्रितों की सहायता करने के उद्देश्य को लेकर चलते हैं। ये संगठन गरीब वर्ग के लोगों की सहायता बिना किसी लागत के तकनीकी व सामाजिक सेवाएँ देते है। इनका सरकार से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता। इन संगठनों को अपने आप को तटस्थ रखना काफी मुश्किल है क्योंकि इन संगठनों को गैर सरकारी संगठन होने के कारण कुछ वित्तीय एवं आधारित संरचना सम्बन्धी सहायता के लिए अधिकारियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

गैर सरकारी संगठनों के गुण

  1. ये संगठन लोगों का ऐसा समूह होता है जो उचित कानून द्वारा पंजीकृत होते हैं और जिन्हें निगम या पालिका का दर्जा मिला होता है, जिनके कारण इनको कानूनी रूप मिलता है और अकेले व्यक्ति की जिम्मेवारी समूह की जिम्मेवारी होती है।
  2. इनका प्रशासनिक ढांचा उपर्युक्त कार्यवाहक कमेटी से बना होता है। 
  3. इनका लक्ष्य एवं उद्देश्य होता है जिनकी पूर्ति के लिए कार्यक्रम बनाए जाते हैं।
  4. यह संगठन सदस्यों द्वारा लोकतान्त्रिक नियमों के आधार पर शुरू किया जाता है, जिस पर बाहरी नियन्त्रण नहीं होता।

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