हरिशंकर परसाई का जीवन परिचय एवं रचनाएँ

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हरिशंकर परसाई का जीवन परिचय एवं रचनाएँ

हरिशंकर परसाई जी हिन्दी के एक प्रख्यात व्यंग्यकार हैं परसाई जी की ख्याति न केवल व्यंग्यकार के रूप में बल्कि प्रतिबद्ध लेखक के रूप में है। व्यंग्य कोई विधा नहीं बल्कि लेखक की प्रकृति या स्परिट है। इसलिये परसाई जी का मौलिक चिन्तन कहानी, उपन्यास, निबन्ध, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में व्यक्त हुआ है। परसाई जी मूलत: मानवतावादी लेखक हैं। परसाई जी बहुआयामी व्यक्तित्व कहानीकार, निबंधकार के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं। गद्य की सम्भवत: कोई भी विधा परसाई जी से अछूती नहीं रही है। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, प्रखर चिन्तक, मौलिक सर्जक परसाई जी के निजी व्यक्तित्व एवं साहित्यकार व्यक्तित्व के बीच विभाजन कठिन प्रतीत होता है। यह कहना अत्यन्त दुष्कर है कि परसाई जी के व्यक्तित्व को उनके साहित्यकार व्यक्तित्व ने महान बनाया या परसाई जी ने अपने व्यक्तित्व से साहित्यकार को समृद्ध किया, किन्तु इतना निःसंदेह कहा जा सकता है कि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व में अन्तर्विरोधी तथ्य नहीं पाये जाते हैं। उनका साहित्य उनके गहन चिन्तन का परिणाम है। यहाँ उनके व्यक्तित्व को रूपायित करने वाली निजी जीवन की परिस्थितियों और उनके परिवेष से सम्बन्धित कुछेक तथ्यों पर प्रकाष डाला गया है।

हरिशंकर परसाई जी का आरम्भिक जीवन 

हरिशंकर परसाई जी का जन्म 22 अगस्त, 1924 को ‘जमानी’ नामक ग्राम में हुआ था परसाई जी के पिता झूमक लाल परसाई जंगल में कोयला बनाने और बेचने का कार्य करते थे। अत: कार्य की सम्भावना समाप्त हो जाने पर विवशता: एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना पड़ता था। अपना घर गाँव होते हुए अन्त में ‘टिमसी’ जा बसे। टिमसी में भी किराये के मकान में ही रहते थे। पिता दिन भर जंगल में रहते थे तथा माँ घर की देख-रेख करती थीं। पारिवारिक वातावरण मध्य वित्तीय परिवार जैसा था। पाँच-भाई-बहनों में परसाई जी सबसे बड़े थे, किन्तु परिवार में हंसी खुषी का यह वातावरण चिरस्थाई न रह सका। उनकी माँ प्लेग की महामारी का ग्रास बन गयी सभी भाई-बहन छोटे थे। ‘‘प्लेग की तीखी याद’’ की चर्चा परसाई जी ने ‘‘गर्दिश के दिन’’ नामक निबन्ध में की है। माँ की मृत्यु ऐसे भयावह समय में हुई थी, जब कुते भी बस्ती में न थे। 

इनके पिता पत्नी की बीमारी के कारण कस्बा न छोड सके थे और इसी त्रासदायिक, भयावह वातावरण में इनकी माँ इन्हें सदा के लिए छोड़कर चली गयी। माँ की मृत्यु की त्रासदी तथा पिता का दु:ख दोनों ही कष्ट परसाई जी को सहने पड़े। इन भयानक काली रातों की चर्चा करते हुए हरिशंकर परसाई जी ने लिखा है- ‘‘आबादी घर छोड़कर जंगल में टपरे बनाकर रहने चली गयी थी, हम नहीं गये थे। माँ सख्त बीमार थी, उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था। भॉय-भॉय करते पूरे आसपास में पर हमारे घर में चहल-पहल थी। काली राते इनमें सारे घर में जलने वाले कंदील। मुझे इन कंदीलों से डर लगता था। कुत्ते तक बस्ती छोड़ गये थे। रात के सन्नाटे में हमारी आवाजें ही हमें डरावनी लगती थीं। 

रात को मरणासन्न माँ के सामने हम लोग आरती गाते- ‘‘जय जगदीश हरे, भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे।’’ गाते-गाते पिता सिसकने लगे, माँ बिलखकर हम बच्चों को सीने से चिपटा लेती और हम भी रोने लगते। रोज का यह नियम था, फिर रात को पिता जी चाचा और दो एक रिश्तेदार लाठी बल्लम लेकर घर के चारों तरफ घूम-घूम कर पहरा देते ऐसे भयकारी त्रासदायक वातावरण में एक रात तीसरे पहर माँ की मृत्यु हो गयी। कोलाहल और विलाप शुरू हो गया, कुछ कुत्ते भी सिमटकर आ गये और सहयोग देने लगे। पाँच भाई-बहनों में बड़े होने के कारण हरिशंकर परसाई जी ही माँ की मृत्यु का अर्थ समझते थे। बाकी भाई-बहन अबोध एवं अनजान थे। 

मृत्यु की भयंकरता का उन्हें ज्ञान न था। प्लेग की उन रातों तथा पिता के दुःख का जिक्र, उन्होंने अपने निबन्ध ‘‘गर्दिश के दिन’’ में किया है। इनके पिता माँ की मृत्यु के बाद अन्दर से टूट गये थे। निराश-हताश पिता, के लिए माँ की मृत्यु अत्यन्त कष्टदायक थी, जीवन संगिनी विहीन जीवन में केवल निराशा चिन्ता एवं निष्क्रियता शेष रह गयी है।

हरिशंकर परसाई जी 14-15 साल की उम्र में ही समझदार हो गये थे। इसे यों भी कहा जा सकता है कि दुःख तकलीफ तथा जिन्दगी की ) त्रासदी एवं परिस्थितियों ने उन्हें समझदार एवं बुजुर्ग बना दिया था। इसी दुःख और पीड़ा ने पूरे समाज को समझने की जिज्ञासा प्रदान की। 

हरिशंकर परसाई की शिक्षा 

हरिशंकर परसाई जी ने इसी परिस्थिति में मैट्रिक की परीक्षा पास की किन्तु लगातार पढ़ाई जारी रखना कठिन था क्योंकि पिता जी जिम्मेदारियों का भारी बोझ छोड़ गये थे, जिसे वहन करना, पढ़ाई करते हुए घर की देखभाल करना कठिन था तथा आर्थिक कारणों से भी इन्होंने जंगल विभाग में नौकरी कर ली। फिर स्कूल मास्टरी की तथा यत्र तत्र नौकरी करते हुए इन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम0 ए0 किया। पारिवारिक जिम्मेदारियों एवं गहन आर्थिक अभाव के बीच इन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की तथा जीवन पर्यन्त संघर्शरत रहे। जीवन संघर्ष में निरन्तर विजयी रहे किन्तु इन संघर्षों का न आदि है न अन्त । हरिशंकर परसाई जी आरम्भ से संघर्शरत है। 

हरिशंकर परसाई का व्यवसाय 

हरिशंकर परसाई जी ने कई स्थानों पर नौकरी की किन्तु स्वाभिमान तथा आत्मसम्मान के कारण नौकरी रास न आई तथा 1.8.1957 ई0 से स्वतन्त्र लेखन करने लगे, 18 वर्ष की आयु में जंगल विभाग की नौकरी की फिर 6 महीने खण्डवा में अध्यापन किया। पुन: टीचर्स ट्रेनिंग लेकर माडल हाईस्कूल में अध्यापन किया। सन् 1952 में नौकरी से त्यागपत्र दे दिया तथा 1953 से 1957 तक प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते रहे किन्तु परसाई जैसे स्वतन्त्र चेतन व्यक्ति से नौकरी न हो सकी, फिर जीवन पर्यन्त निरन्तर स्वतन्त्र लेखन किया। ‘‘बहुत पहले (24 जनवरी 1971) धर्मयुग में ज्योतिषी परसाई का प्रसंग आया था, जिससे लोगों को भ्रम हो गया तथा उन्हें ऐसा लगा कि व्यंग्यकार लेखक परसाई और ज्योतिषी परसाई एक ही हैं। इस सिलसिले में उन्हें नैनीताल से एक महिला का पत्र प्राप्त हुआ था जिससे उन्होंने छापने के लिये धर्मयुग को दे दिया था वह पत्र धर्मयुग में प्रकाशित हुआ जिससे परसाई जी ज्योतिषी बनते-बनते बच गये वरना जनता का क्या है ? लेखक के बजाय उन्हें ज्योतिषी बना देती।’’ 

हरिशंकर परसाई जी को कवियों का मजाक बनाने में बहुत आनन्द आता है, किन्तु एक बार अपने मित्रों के आग्रह पर उन्हें कवि सम्मेलन का अध्यक्ष बनना पड़ा जिसका जिक्र ‘‘डॉ0 विलास शर्मा’’ ने इस प्रकार किया है, कवियों की फजीहत करने में परसाई जी को बड़ा रस मिलता है, मौका मिलने पर कतई नहीं चूकते। हम भी अवसर के ताक में थे। ‘‘प्रमोद वर्मा’’ उन दिनों ‘धार शासकीय कालेज’’ में विभागाध्यक्ष थे, फिर धार में ही पदस्थ कालेज में कवि सम्मेलन का निर्णय लिया गया। कई कवियों को आमंत्रित करते हुए परसाई जी को अध्यक्षता करने हेतु अनुरोध किया गया उनका उत्तर था- मैं तो कवि नहीं हूँ हमने सुझाया-आप अपनीे लघु कथाओं का ही वाचन कर दें मित्रता के तकाजे ने जोर मारा और परसाई आ फंसे। हम इसका आनन्द कई वर्षों तक लेते रहे।’’

हरिशंकर परसाई की उपाधियाँ एवं पुरस्कार 

महत्त्वपूर्ण साहित्यिक योगदान के लिये रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर ने डी0लिट् की मानद उपाधि से विभूषित किया। सन् 1987 में मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सर्वोच्च सम्मान ‘‘भवभूर्ति अलंकरण’’ से अलंकृत किया गया । सन् 1986 में ‘साहित्य अकादमी’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् 1984 में मध्य प्रदेश शसन द्वारा ‘‘शिखर सम्मान’’ प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त भी अन्य कई पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। 

हरिशंकर परसाई की रचनाएँ/कृतियाँ

  1. हंँसते हैं रोते हैं
  2. भूत के पाँव पीछे
  3. तब की बात और थी
  4. जैसे उनके दिन फिरे
  5. सदाचार का ताबीज
  6. पगडंडियों का जमाना
  7. रानी नागफनी की कहानी
  8. वैष्णव की फिसलन
  9. शिकायत मुझे भी है
  10. अपनी-अपनी बीमारी
  11. ठिठुरता हुआ गणतन्त्र
  12. निठल्ले की डायरी
  13. मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ
  14. बोलती रखायें
  15. एक लड़की : पाँच दीवाने 
  16.  तिरछी रेखाएं 
  17. और अन्त में
  18. तट की खोज
  19. ज्वाला और जल
  20. माटी कहे कुम्हार से
  21. पाखण्ड का अध्यात्म
  22. सुनो भाई साधो
  23. विकलांग श्रद्धा का दौर
  24. प्रतिदिन व्यंग्य
  25. तुलसी दास चन्दन घिसै
  26. कहत कबीर
  27. हम इक उम्र से वाकिफ हैं
  28. एक सामाजिक की डायरी
  29. मेरे समकालीन तथा जो याद है।
स्थायी स्तम्भ, सुनो भाई साधे, माजरा क्या है, नवीन दुनिया स्थायी स्तम्भ सुनो भाई साधो, माजरा क्या है (नवीन दुनिया) जीवन परिचय एवं कृतियों तथा उनके सामाजिक जीवन के आधार पर हम यदि उनके व्यक्तित्व का विष्लेशण करे तो पायेंगे कि हरिशंकर परसाई जी एक हँंसमुख मिलनसार एवं मस्त प्रवृति के व्यक्ति हैं, यही नहीं बल्कि हरिशंकर परसाई जी निहायत गम्भीर किस्म के जागरूक व्यक्ति भी हैं, तथा निरन्तर सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक सांस्कृतिक गतिविधियों का अवलोकन करते हुए बेचैन मन:स्थिति में जीवन व्यतीत करते है। 

10 अगस्त, 1995 को हरिशंकर परसाई जी का देहावसान हुआ। उस समय अत्यधिक वर्शा हो रही थी, किसी को उनके मृत्यु की खबर न हो सकी सुबह सबने उनसे बात करने की कोषिष की तो पता लगा कि परसाई जी सो गये, फिर कभी न उठने के लिए। सुबह ने दस्तक दी तो पता चला वह महामानव चला गया दूर, सदा-सदा के लिए।

संदर्भ-
  1. डॉ0 अर्चना सिंह, व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई और उनका साहित्य, पृ0 38
  2. डॉ0 अर्चना सिंह, व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई और उनका साहित्य, पृ0 41

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