समायोजन का अर्थ, परिभाषा, प्रकार एवं विशेषताएं

समायोजन को सामंजस्य, व्यवस्थापन या अनुकूलन भी कहते हैं। व्यक्ति को सफल जीवन व्यतीत करने के लिए अपने वातावरण और परिस्थितियों के साथ समायोजन स्थापित करना आवश्यक हो जाता है। व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार की अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती रहती हैं, जिनका उसे समय-समय पर सामना करना पड़ता है। 

 प्रत्येक व्यक्ति अपनी अलग-अलग क्षमता के अनुसार समायोजन करने का प्रयत्न करते हैं कुछ व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में सफल होते हैं तो कुछ व्यक्ति हार मानकर अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। 

इस प्रकार के व्यक्ति तनाव का शिकार बने रहते है। ये बातें शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

समायोजन का अर्थ

‘‘समायोजन दो शब्दों से मिलकर बना है, सम एवं आयोजन सम् का अर्थ है भली-भांति अच्छी तरह या समान रूप से और आयोजन का अर्थ है व्यवस्था अर्थात अच्छी तरह व्यवस्था करना। ‘इस प्रकार समायोजन का अर्थ हुआ सुव्यवस्था या अच्छे ढंग से परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की प्रक्रिया से है, जिससे कि व्यक्ति की आवश्यकता पूरी हो जाये और मानसिक द्वन्द्व न हो।’’ 

समायोजन का अर्थ स्पष्ट करते हुए गेट्स एवं अन्य विद्वानों ने लिखा है कि, ‘‘समायोजन शब्द के दो अर्थ है। एक अर्थ में, निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति स्वयं और पर्यावरण के बीच अधिक सांमजस्यपूर्ण संबंध रखने के लिए अपने व्यवहार में परिवर्तन कर देता है। 

दूसरे अर्थ में, समायोजन एक संतुलित दशा है जिस पर पहुँचने पर हम उस व्यक्ति को सुसमायोजित कहते है।

समायोजन की परिभाषा

बोरिंग, लैंगफील्ड एवं वैल्ड के अनुसार, ‘’समायोजन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और इन आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखता है।’’ 

लॉरेन्स एफ. शैफर के अनुसार, ‘‘समायोजन वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति की आवश्यकताएं मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है : 
  1. शारीरिक आवश्यकताएँ, एवं 
  2. मानसिक आवश्यकताएँ भूख, त्याग, नींद कामवासना, मलमूत्र त्याग आदि शारीरिक आवश्यकताएँ हैं, जबकि सुरक्षा, स्वतंत्रता सामाजिक आवश्यकताएं है। जब इन आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है तो वह बैचेन हो जाता है और उसमें तनाव पैदा हो जाता है।

समायोजन की आवश्यकता

सर्वांगीण विकास के लिए उसका वातावरण के साथ समायोजन अत्यंत आवश्यक है। इस आवश्यकता को  निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा रहा है :
  1. मानसिक कष्ट और व्याधियों से अपने को दूर रखने के लिए।
  2. अपने मन और मस्तिष्क को व्यर्थ के चिंतन सें दूर रखने के लिए।
  3. ध्यान की एकाग्रता बनाये रखने के लिए ।
  4. विभिन्न गतिविधियों और कार्यकलापों में सक्रिय और उत्साहपूर्वक भाग लेने के लिए।
  5. पलायन करना, चुनौती देना जैसी कुप्रवृत्तियों को न पनपने देने के लिए।
  6. जीवन में शौक पैदा करने के लिए।
  7. अपने काम के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण विकसित करने के लिए।
  8. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अधिकतम उपलब्धि प्राप्त करने के लिए।

समायोजन का विकास

मन के अनुसार, ‘‘निरंतर रहने वाली चिंता शारीरिक और मानसिक रूप से कष्टदायी होती है, यहाँ पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि किसी भी प्रकार की असफलता विद्यार्थियों में निराशा उत्पन्न करती है निराशा के द्वारा मानसिक संघर्ष उत्पन्न होता है और मानसिक संघर्ष की निरंतरता तनाव को उत्पन्न कर देती है।’’ अत: समायोजन अषान्ति उत्पन्न हो सकती है। 

प्रत्येक विद्यालय का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने विद्यार्थियों में समायोजनषीलता को बनाये रखें। इसके लिए विद्यालय द्वारा निम्नलिखित कार्य किये जाने चाहिए :
  1. किसी प्रकार की समस्या का सामना करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
  2. निराशा और असफलताओं का सामना करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
  3. विशेष शिक्षा एवं दीक्षा का प्रबंध होना चाहिए।
  4. मार्गदर्शन की व्यवस्था हो ताकि वे वैयक्तिक, शैक्षिक, व्यावसायिक चिंताओं का सही समाधान कर सकें।
  5. वातावरण में आपसी तनाव को प्रेम तथा सौहार्द के साथ दूर करना चाहिए।
  6. जीवन का उद्देश्य और वे भविष्य में क्या बनेंगे, बता देना चाहिए ताकि उनके मन से असुरक्षा की भावना निकल सके।
  7. माता-पिता को बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसका ज्ञान समय-समय पर अध्यापक संरक्षण गोष्ठी के माध्यम से समझना चाहिए ताकि बालकों के प्रति स्वयं के कर्तव्य को वे अधिक अच्छे तरीके से समझ सकें।

समायोजन प्रक्रिया

‘‘तनाव तथा आवश्यकताओं के साथ व्यवहार करने के व्यक्तिगत प्रयासों का परिणाम समायोजन है तथा समायोजन एक प्रक्रिया है, जिसमें कोई व्यक्ति तनाव अंदरूनी विरोधों के साथ व्यवहार करने का प्रयास करता है तथा अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता है, इस प्रक्रिया में वह अपने वातावरण के साथ सहयोगी संबंध बनाने का प्रयत्न भी करता है।’’

आईजनेक के अनुसार, ‘‘समायोजन वह अवस्था है जिसमें एक ओर व्यक्ति की आवश्यकताएँ तथा दूसरी ओर वातावरण के कुछ दावे पूर्ण रूप से संतुष्ट होते है अथवा समायोजन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा आवश्यकताओं और दावों में सामंजस्य संबंध प्राप्त होता है।’’ 

उपरोक्त कथन से स्पष्ट है कि, व्यक्ति की बाहर व आंतरिक आवश्यकताओं के मध्य संतुलन होना अनिवार्य है। अत: समायोजन वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति का व्यवहार समाज या संस्कृति सम्मत हो और साथ-साथ उसकी स्वयं की आवश्यकता पूर्ति करने वाला हो। 

अत: व्यवहार की पर्याप्तता ही समायोजन की कुंजी हैं।

समायोजन की विशेषताएं

समायोजन करने वाले व्यक्ति में विभिन्न विशेषताएं होती हैं। इन्हीं विशेषताओं का अध्ययन इस प्रकार से किया गया है :
  1. ये पूर्णतया संतुलित रहते हैं। इनके स्पष्ट उद्देश्य होते हैं।
  2. ये अपनी समस्या का समाधान स्वयं कर लेते हैं।
  3. इन्हें हमेशा परिस्थिति का ज्ञान होता हैं।
  4.  ये अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट एवं सुखी रहने वाले होते हैं।
  5. ऐसे व्यक्ति समाज के प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान रखने वाले होते हैं।
  6. ये संवेगात्मक रूप से स्थिर होते है।
  7. ये व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार कार्य करते हैं।
  8.  ऐसे व्यक्ति अपनी गल्तियों का दोषारोपण दूसरों पर नहीं करते। 

समायोजन के प्रकार

समायोजन को सामान्यत: दो प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है। दोनों ही वर्गीकरण का पृथक्-पृथक् अध्ययन किया है। पहले वर्गीकरण के अनुसार समायोजन चार प्रकार का होता है, जो निम्न प्रकार से है :

आत्म समायोजन

आत्म समायोजन का सामान्य अर्थ होता है अपने आप में समायोजन करना। कभी कभी बालक के सामने ऐसी समस्या आ जाती है जिसके कारण उसके मस्तिष्क में विरोधी विचारों से द्वन्द्व की स्थिति उत्पन्न हो जाती है उसे समायोजन द्वारा इसे दूर करना होता है। इस प्रकार के समायोजन को आत्म समायोजन कहते हैं। 

सामान्यत: विचारों, इच्छाओं एवं उद्दष्यों से मानसिक द्वन्द्व की स्थिति, भौतिक साधन सुविधाओं की इच्छा, इच्छाओं की तृप्ति-अतृप्ति, सामाजिक नियम, प्रथाएँ, रीति-रिवाज, धर्म और नैतिक आदर्श आदि के मनोवैज्ञानिक समायोजन की रक्षात्मक युक्तियाँ को अपनाना होता है।

सामाजिक समायोजन

समायोजन का यह महत्वपूर्ण प्रकार है सामाजिक समायोजन के अंतर्गत व्यक्ति सामाजिक परिवेष में रहते हुए घर - परिवार, मित्र सम्बन्धी एवं पड़ोसियों से उचित तालमेल बनाए रखकर समायोजित रहता है।

लैंगिक समायोजन

लैंगिक समायोजन के अंतर्गत व्यक्ति यौन संबंधियों की आवश्यकताओं की पूर्ति समाज द्वारा मान्य तरीकों से करता है यौन आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होने पर व्यक्ति में कुसमायेाजन व कुंठा का जन्म होता हैं।

व्यावसायिक समायोजन

इसके अंतर्गत व्यक्ति अपने व्यावसायिक कार्यक्षेत्र में अपने सहकर्मियों के साथ उचित व्यवहार करते हुए सम्मान प्राप्त करता है तथा अपने व्यवसाय से संतुष्टता तथा संतोष प्राप्त करता हैं।
 
दूसरे वर्गीकरण के अनुसार समायोजन चार प्रकार के होते हैं। इन्हें निम्न प्रकार से बतलाया गया है :

सुसमायोजन - 

‘‘सुसमायोजन का अर्थ है बालक द्वारा अपनी क्षमताओं, योग्यताओं और अपने पर्यावरण के मध्य समायोजन करने में सफल होना। बालक अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं का आकलन कर उनके अनुसार आवश्यकताएँ, इच्छाएँ और उद्देश्य निर्धारित करता है तो उसे इनकी पूर्ति में समय नहीं लगता और वह अपनी कार्यकुशलता एवं संतुलित व्यवहार से संतुष्टि एवं प्रसéता को प्राप्त करता है। यदि इनकी पूर्ति में बाधाएँ आती है तो भी वह सहज पूर्ण ढंग से इनका सामना करता है और इन्हें दूर करने में सफल होता है। 

गेट्स ने लिखा है कि, ‘‘सुसमायोजित व्यक्ति वह है जिसकी आवष्यकताएँ एवं तृप्ति सामाजिक दृष्टिकोण तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की स्वीकृति के साथ संगठित हों।’’

कुसमायोजन

‘‘कुसमायोजन का अर्थ होता है बालक द्वारा अपनी आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और परिस्थितियों के बीच सामंजस्यपूर्ण संतुलन बनाने में असफल होने पर उत्पन्न मानसिक तनाव के कारण अपनी पारिवारिक समस्याओं से हटकर अन्य व्यवहार करना, जैसे- कोई बालक अपनी स्वयं की योग्यता एवं क्षमता से अधिक शैक्षिक योग्यता प्राप्त करने की आकांक्षा करता है। साथ ही उसकी पारिवारिक, सामाजिक एवं शैक्षिक परिस्थितियाँ भी उसकी आकांक्षा की पूर्ति में सहमत नहीं होती है और वह असफल हो जाता है, ऐसी स्थिति में वह अपने समूह में अपना स्थान बनाने के लिए अन्य व्यवहार (दादागिरी) करता है तो मनोवैज्ञानिक भाषा में वह व्यवहार कुसमायोजन कहलाता है।

रचनात्मक समायोजन

यदि कोई बालक अपने सामने प्रस्तुत समस्या का समाधान रचनात्मक ढंग से करता है तो उसे रचनात्मक समायोजन कहा जाता है। जैसे - लक्ष्य प्राप्ति के प्रयत्नों में वृद्धि करना, समस्या पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार करना, अन्य व्यक्तियों से उचित सलाह लेना आदि।

प्रतिस्थापित समायोजन

यदि बालक द्वारा किए जा रहे प्रयत्नों से आकांक्षित लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पा रही है तो वह प्रतिबंधित लक्ष्य का प्रतिस्थापन करके स्वयं को समायोजित कर सकता है।

समायोजन की आवश्यकता

व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्ति के मार्ग में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिसके कारण व्यक्ति को अनेक प्रकार की मानसिक अवस्थाओं से गुजरना पड़ता हैं जिनमें समायोजन की आवश्यकता होती है। 

(1) तनाव अवस्था - तनाव का अर्थ व्यक्ति की उस शारीरिक तथा मानसिक दषा से है जो उसमें उत्तेजना असंतुलन उत्पन्न कर देती है। तनाव होने पर व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति का समायोजन बुरी तरह प्रभावित होता है। तनाव के अनेक कारण हो सकते है जैसे - आवश्यकता, इच्छा, आकांक्षा, लक्ष्य, अपमान, असफलता एवं शारीरिक दोष आदि।

(2) दबाव अवस्था - दबाव एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसे एक विशिष्ट व्यवहार करना है, या उसे परिवर्तनों के साथ अनुकूलन रहना है उदाहरण के लिए, एक विद्याथ्र्ाी पर परीक्षा के समय एक विशेष मानसिक दषा होती है उस े मनोवैज्ञानिक भाषा में दबाव कहते हैं। व्यक्ति के आंतरिक दबाव उसके आत्मसम्मान को बनाए रखने में सहायक होते हैं।

(3) चिन्ता अवस्था - जब व्यक्ति के अचेतन मन में दबी हुई इच्छा चेतना में आती है तो वह व्यक्ति चिंता में फँस जाता है। चिंता एक असामान्य लक्षण है जो लगभग सभी व्यक्तियों में पाई जाती है जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में चिंता का होना आवश्यक है। कोलमैन के अनुसार, ‘‘भय और आशंका की सामान्यीकृत अनुभूति ही चिंता है।

(4) कुण्ठा अवस्था - कुंठा वह संवेगात्मक तनाव है जो इच्छा या आवश्यकता में अवरोध आ जाने से उत्पन्न होती है। इसके कारण व्यक्ति का समायोजन बिगड़ जाता है और जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में उत्पन्न बाधाओं से अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर पाता और उसमें दुख की भावना उत्पन्न हो जाती है इस भावना को ही कुंठा कहते हैं, कुंठा के कारण व्यक्ति में भय अथवा चिंता की उत्पत्ति हो जाती है। कोलसनिक के अनुसार, ‘‘कुंठा उस आवश्यकता की पूर्ति या लक्ष्य की प्राप्ति में अवरूद्ध होने की भावना है जिसे व्यक्ति महत्वपूर्ण समझता है।’’ कुण्ठा के कारणों में भौतिक वातावरण सामाजिक वातावरण, व्यक्तिगत कारण, नैतिकता एवं आदर्श कारण प्रमुख हैं।

व्यक्ति के जीवन में कुछ नैतिक आदर्श हैं जैसे- सत्य बोलना, चोरी नहीं करना, अहिंसा आदि। कई बार वे आदर्श भी व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति में बाधा पैदा करते हैं, अंतत: व्यक्ति में हताशा उत्पन्न होती है और यही हताशा कुण्ठा के जन्म का कारण होती है।

(5) संघर्ष अवस्था -जब व्यक्ति के सामने दो अलग-अलग अवसर उपस्थित होते हैं और उन्हें एक का चयन करना है तो उस व्यक्ति के मस्तिष्क में संघर्ष की स्थिति निर्मित होती है।

संघर्ष चेतन या अचेतन किसी भी स्तर पर हो सकते हैं, लेकिन अधिकांश संघर्ष चेतना के स्तर पर ही होते हैं। निरंतर रहने वाला संघर्ष कष्टदायक होने के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होता है। संघर्ष की स्थिति में व्यक्ति को अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं रहता और उसका मानसिक संतुलन भी बिगड़ जाता है।

समायोजन की विधियाँ या तरीके

तनाव, दबाव व संघर्ष की स्थिति में समायोजन की आवश्यकता पड़ती है तब वह दो प्रकार से समायोजन करता है, जिन्हें निम्न प्रकार से बतलाया है : 
  1. प्रत्यक्ष विधि (Direct Method), एवं
  2. अप्रत्यक्ष विधि (Indirect Method)। 

प्रत्यक्ष तरीके

समायोजन की प्रत्यक्ष विधि में तीन सह-विधियाँ शामिल हैं जो कि आक्रमण, समझौता, परिस्थितियों से दूर भाग जाना। व्यक्ति किसी समस्या को सुलझाने में क्रोध या परिस्थितियों से समझौता का सहारा लेता है। यदि व्यक्ति उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग में आ रही बाधाओं को दोनों तरीकों से दूर नहीं कर पाता है तो वह परिस्थितियों से पृथक हो जाता है और वह इस प्रकार से कुंठा या तनाव को दूर करता है। 

अप्रत्यक्ष तरीके

जब तनावपूर्ण चिंता स्थिति का प्रत्यक्ष तरीकों से समाधान नहीं हो पाता है तो व्यक्ति विभिन्न अप्रत्यक्ष सुरक्षात्मक तरीके अपनाता है, जिन्हें रक्षायुक्तियाँ कहते हैं। फ्रायड के अनुसार, ‘‘रक्षायुक्तियाँ अहम की रक्षा करने, समग्रता बनाए रखने तथा चिंता से बचाव करने के अपेक्षाकृत अचेतन सुखात्मक प्रयास है।’’ रक्षायुक्तियाँ अचेतन स्तर पर कार्य करके चिंता, तनाव से व्यक्ति की रक्षायुक्तियों द्वारा प्राप्त समायोजन ऊपरी तथा अस्थायी होता है। व्यक्ति रक्षायुक्तियों का प्रयोग समस्या से बचने के लिए करता है उसके समाधान के लिए नहीं।   

प्रमुख रक्षायुक्तियाँ - प्रमुख रक्षायुक्तियों का अध्ययन निम्न प्रकार से किया है :
  1. दमन (Suppression) : दमन एक ऐसी रक्षायुक्ति है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने कष्टपूर्ण अनुभवों, विचारों आदि का अचेतन रूप में दमन करता है। इस रक्षायुक्ति द्वारा अनगिनत इच्छाएँ, घटनाएँ व दुखद अनुभव स्वत: ही व्यक्ति के चेतना क्षेत्र से निकलकर अचेतन क्षेत्र में चले जाते हैं, इसके कारण व्यक्ति की संघर्षपूण स्थिति का समाधान हो जाता है।
  2. प्रतिगमन (Regression) : इससे व्यक्ति अपने अतीतकालीन सफल प्रयासों की ओर लौटता है दबावयुक्त परिस्थितियों का सामना करने में असमर्थ होने पर व्यक्ति कम परिपक्व व्यवहार प्रदर्शित करता है, जैसे-प्रौढ़ व्यक्ति कभी-कभी हाथ पैर पटकने लगता है।
  3. शोधन/उदात्तीकरण (Sublimation) : इसमें व्यक्ति अपने क्षेत्र में अपने संवेग को अन्य किसी कार्य से सम्बद्ध कर लेता है। इस युक्ति के माध्यम से अवांछित इच्छाओं को स्थान्तरित कर दिया जाता है, जैसे- व्यक्ति की काम प्रवृित्त कला या संगीत की ओर मुड़ जाती है।
  4. प्रक्षेपण (Projection) : इसमें व्यक्ति अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहराकर अपने मानसिक तनाव को कम करता है, जैसे-परीक्षा में असफल होने पर परीक्षाथ्र्ाी कहते हैं कि प्रश्नपत्र कठिन था।
  5. तादात्म्य स्थापित करना (Identification) : तादात्मीकरण की प्रवृित्त्ा लगभग सभी व्यक्तियों में पायी जाती है। व्यक्ति अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए किसी बड़े व्यक्ति या नेता या अध्यापक की भूमिका का निर्वाह करता है और उनके साथ एक हो जाने की चेष्टा करता है।
  6. औचित्य स्थापना (Rationalisation) : इसे युक्तिकरण के नाम से जाना जाता है। इस मानसिक प्रक्रिया में व्यक्ति अपनी असफलता के लिए वास्तविक कारणों के स्थान पर झूठे कारण बताता है। यह युक्ति ‘‘लोमड़ी को अंगूर न मिलने पर खट्टा’’ बताना कहावत पर आधारित है।
  7. क्षतिपूर्ति (Compensation) : इसमें व्यक्ति एक क्षेत्र में अपनी किसी कमी की क्षतिपूर्ति किसी दूसरे क्षेत्र में करता है उदाहरण के लिए, पढ़ाई में कमजोर छात्र खेलकूद या कला के क्षेत्र में परिश्रम कर अपनी कमी को पूरा करता है।
  8. विस्थापन (Displacement) : इस रक्षायुक्ति में किसी विचार, वस्तु या व्यक्ति से संबंधित संवेग किसी अन्य विचार वस्तु या व्यक्ति पर स्थानांतरित हो जाता है। 
  9. पलायन (Withdrawal) : जब व्यक्ति किसी समस्या या परिस्थिति से अपने को दूर कर लेता है या फिर इस प्रकार किसी समस्या का समाधान करने के स्थान पर उस समस्या से ही दूर भाग जाना पलायन कहलाता है।
  10. दिवा-स्वप्न (Day Dreaming) : यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोई व्यक्ति वर्तमान के सुखों को न भाोगकर काल्पनिक संसार में विचरण करने लगता है। दिवा स्वप्नों के माध्यम से व्यक्ति अपनी असफलता को सफलता के रूप में देखने की कल्पना करता है। इससे उसे कुछ संतोष एवं सुख की प्राप्ति होती है और उसके मानसिक तनाव में कुछ कमी आती है।
सन्दर्भ -
  1. शिक्षा मनोविज्ञान, अग्रवाल पब्लिकेशन्स, आगरा, पृ. 530 
  2. आर. ए. शर्मा, शिक्षा मनोविज्ञान के मूल तत्व, आर.लाल बुक डिपो, बेगम ब्रिज रोड, मेरठ, पृ. 450
  3. शर्मा राजकुमारी, सक्सेना, वन्दना, शिक्षा मनोविज्ञान एवं मापन, राधा प्रकाशन, आगरा, पृ. 40 40
  4. कुलश्रेष्ठ, एस.पी. (2011), शिक्षा मनोविज्ञान, आर.लाल. बुक डिपो, मेरठ, पृ. 423
  5. पाठक, पी.डी. (2013), शिक्षा मनोविज्ञान, अग्रवाल पब्लिकेशन, आगरा, पृ. 531
  6. शर्मा, आर.एस., एवं शर्मा अजय कुमार (2011-12), नर्सेस के लिए समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान, वर्धन पब्लिशर्स एवं डिस्ट्रीब्यूटर्स, जयपुर, पृ. 148-142 
  7. शिक्षा मनोविज्ञान के मूल तत्व, आर.लाल. बुक डिपो, मेरठ, पृ. 450-452
  8. शिक्षा मनोविज्ञान, अग्रवाल पब्लिकेशन, आगरा, पृ. 464
  9. शिक्षा मनोविज्ञान, राधा प्रकाशन, आगरा, पृ. 271 48

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1 Comments

  1. Main samayojan ki bare mein acchi Tarah samajh liya aur aise hi notification mere ko chahie

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