त्रिपिटक क्या है?

अनुक्रम
बौद्ध धर्म के मूल व पवित्र-ग्रन्थों में पालि ‘त्रिपिटक’ प्रमुख है जो बौद्ध धर्म का मूल आधार है। ‘त्रिपिटक’ दो शब्दों के योग से बना है-त्रि+पिटक। ‘त्रि‘ का अर्थ ‘तीन’ और ‘पिटक’ का अर्थ ‘पिटारी’ या ‘मंजूषा’ है। इस प्रकार त्रिपिटक का शाब्दिक अर्थ होगा ‘तीन पिटारियाँ’। वे तीन पिटारियाँ है-सुत्त-पिटक, विनय-पिटक, अभिधम्म-पिटक।

त्रिपिटक एक ऐसा साहित्य है जिसमें संसार के सभी प्राणियो के हित-सुख के लिए मार्ग बताये गये है। इसमें इस लोक के साथ-साथ परलोक को सुखी बनाने वाली शिक्षाएँ या उपदेश दिये गये है। त्रिपिटक जैसा कि पहले बताया गया है कि तीन पिटकों सुत्त, विनय, अभिधम्म में विभक्त है आरै प्रत्येक पिटक भी अनेक भागों में विभक्त है। उनका यहाँ संक्षेप में परिचय दिया जा रहा है-

विनय-पिटक

पिटको में विनय-पिटक का सर्वप्रथम स्थान माना जाता है। ‘विनय’ का अर्थ ‘नियम’ होता है। इस पिटक में भिक्षु-भिक्षुणियों के रहन-सहन के नियम और अनुशासन से संबंधित उपदेश है। इसलिए इसका नाम विनय-पिटक रखा गया। इस पिटक को ‘आणा (आज्ञा) देसना’ के नाम से भी पुकारते है। यह बौद्ध-संघ का संविधान है। विनय-पिटक का संगायन भी प्रथम संगीति में ही हुई थी। भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद भिक्षु-संघ में विनय संबंधी नियमों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। इसलिए उनके परिनिर्वाण के छ: माह बाद महाकाष्यप की अध्यक्षता में वैषाली में प्रथम संगति का आयाजेन किया गया और धम्म तथा विनय का संगायन किया गया। इस अवसर पर आर्य महाकाष्यप कहते है कि-‘‘हम धम्म और विनय का संगायन करे।’’

आगे चल कर इस पर टीका भी लिखा गया। विनय-पिटक की टीका बुद्धघोश ने लिखा है जिसे ‘सामत्तपसादिका’ कहते है। विनय-पिटक का सगं ायन उपालि ने किया था। भगवान बुद्ध ने उनके बारे में कहा-’’भिक्षुओं मेरे विनय धारण करने वाल े श्रावको ं में यह उपालि श्रेष्ठ अग्र है।’’

विनय के ज्ञाता को ‘विनयधर’ कहा जाता है। प्रमुख विनयधरो  में उपालि, मोग्गलिपुत्र आदि का नाम मुख्य रूप से लिया जाता है। न केवल स्थविरवाद बौद्ध धर्म की परम्परा ने विनय-पिटक को अपनी धर्म-साधना में सदा एक अत्यन्त ऊँचा स्थान दिया है बल्कि बौद्ध धर्म की अन्य सम्प्रदायों ने भी विनय-पिटक को महत्त्व दिया है। भिक्षु-संघ ने विनय-पिटक को अन्य पिटको से  ऊँचा स्थान दिया है और उसे  बुद्ध शासन की आयु मानते है। अर्थात् उनका विश्वास है कि जब तक विनय-पिटक है तभी तक बुद्ध शासन जीवित रह सकता है जैसे ही विनय संबंधी नियमों के अभ्यास लुप्त हुए बुद्ध शासन भी लुप्त हो जायेगा। सिंहल, “याम आदि देशों के भिक्षु-संघ में यह विश्वास अभी तक कायम है। इसलिए वे  पिटको को विनय, सुत्त, अभिधम्म इस क्रम में रखते है।

भिक्षु और भिक्षुणी-संघ ही विनय-पिटक के एकमात्र विषय है। बौद्ध-संघ की व्याख्या, भिक्षु और भिक्षुणियों के नित्य नैमित्तिक कृत्य, उपसम्पदा-नियम, देसना, वर्शावास के नियम, भोजन, वस्त्र, पथ्य-औशधादि संबंधी नियम, संघ के संचालन संबंधी नियम, संघ-भेद होने पर संघ-सामग्री (संघ की एकता) सम्पादित करने के नियम आदि नियम समूह विनय-पिटक में स्पष्ट कहे गये हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से भी विनय-पिटक का बड़ा महत्व माना गया है। इसमें भगवान बुद्ध की जीवनी, उनके द्वारा संघ की स्थापना, उनके जीवन काल में संघ का विकास, उसके नियम, उसका शासन एवं बुद्ध परिनिर्वाण के बाद 100 साल तक का उसका प्रामाणिक इतिहास, यह सब हमें विनय-पिटक से मिलता है। इसके अतिरिक्त इसमें प्रथम दो संगीतियों के विषय में विवरण, बुद्ध के षिश्यों का परिचय, छठी-पाँचवी शताब्दी ईसवी-पूर्व के भारत का सामाजिक विवरण, विषेशत: बुद्धकालीन संघ और उससे संबंधित विवरण आदि की जानकारी भी इस विनय-पिटक से प्राप्त होती है।

विनय-पिटक का सार ‘प्रातिमोक्ष’ है। प्रातिमोक्ष में बौद्ध-भिक्षुओं तथा बौद्ध-भिक्षुणियों के जीवन से संबंधित नियमों का कथन हैं। पाप-स्वीकरण, क्षमा-याचना और आगे के लिये कृत-संकल्प यही प्रातिमोक्ष-विधान के प्रधान लक्ष्य थे। इसकी विस्तृत चर्चा चतुर्थ अध्याय में की गयी है।

विनय-पिटक के भाग -

इसके तीन भाग है-(1) सुत्तविभंग (2) खन्धक (3) परिवार।

(1) सुत्तविभंग- इसके दो भाग है (1) भिक्षु-विभंग (2) भिक्षुणी-विभंग। 

(2) खन्धक- विनय-पिटक का दूसरा भाग खन्धक है। खन्धक को दो भागों में बाँटा गया है-महावग्ग और चूल्लवग्ग।

(क) महावग्ग- ‘महावग्ग’ खन्धक का पहला ग्रन्थ है। ‘महा’ का अर्थ होता है ‘महान’, ‘बड़ा’। आकार की दृष्टि से बड़ा होने के कारण ‘महावग्ग’ कहा जाता है। यह दस भागो  में विभक्त है।  (1) महा-स्कन्धक (2) उपोसथ-स्कन्धक (3) वर्शोपनायिका-स्कन्धक (4) प्रवारणा-स्कन्धक (5) चर्म-स्कन्धक (6) भैशज्य-स्कन्धक (7) कठिन-स्कन्धक (8) चीवर-स्कन्धक (9) चम्पेय-स्कन्धक (10) कोसम्बक-स्कन्धक।

इसमें भगवान बुद्ध के ज्ञान-प्राप्ति से लेकर बोधगया में रहने और बुद्ध की प्रथम यात्रा का वर्णन है। इस वग्ग में प्रव्रज्या-उपसम्पदा के नियम, उपोसथ के नियम, प्रवारणा के नियम, षिश्य आरै उपाध्याय के कर्त्तव्य, चमड़ े से बनी वस्तुओं के उपयोग के नियम, भगवान बुद्ध के समय की चिकित्सा पद्धति आरै दवाईयो और उनके सवेन, विभिन्न प्रकार के चीवरों आदि का वर्णन है।
 
(ख) चूल्लवग्ग- चूल्लवग्ग खन्धक का दूसरा ग्रन्थ है। इसके 12 भेद है। (1) कर्म-स्कन्धक (2) पारिवासिक-स्कन्धक (3) समुच्चय-स्कन्धक (4) शमथ-स्कन्धक (5) क्षुद्रकवस्तु-स्कन्धक (6) शयनासन-स्कन्धक (7) संघभेदक-स्कन्धक (8) व्रत-स्कन्धक (9) प्रातिमोक्ष-स्थापना-स्कन्धक (10) भिक्षुणी-स्कन्धक (11) पंचषतिका-स्कन्धक (12) सप्तषतिका-स्कन्धक। इस ग्रन्थ में संघ भेद, विभिन्न प्रकार के कर्म (जैसे तर्जनीय, उत्क्षेपणीय आदि) और उनकी दण्ड़ व्यवस्था के बारे में बताया गया है। इसके अतिरिक्त भिक्षुणी-संघ की स्थापना तथा उनके लिए पालनीय आठ कर्मों, प्रातिमोक्ष के नियम, बौद्ध धर्म में हुई प्रथम संगीति और द्वितीय संगीति का इतिहास आदि का वर्णन मिलता है।

(3) परिवार- विनय-पिटक का अन्तिम भाग परिवार है। एक तरह से परिवार को विनय-पिटक की विषय-वस्तु की मातिका या विषय-सूची भी कहा जाता है। इसमें “लोकों की संख्या 7920 है। इसमें बड़े-छोटे कुल 21 परिच्छेद है। वे 21 परिच्छेद इस प्रकार है- (1) भिक्खु-विभग (2) भिक्खुनी-विभंग (3) समुट्टानसीससंखेय (4) अन्तरपेयाल (5) समथभेद (6) खन्धक पुच्छावार (7) एकुत्तरिकनय (8) उपोसथादिपुच्छाविस्सज्जना (9) अत्थवसपकरण (10) गाथासंगणिक (11) अधिकरणभेद (12) अपगाथासंगणिक (13) चोदनाकाण्ड (14) चूळसंगाम (15) महासंगाम (16) कठिन-भेद (17) उपालिप¥्चक (18) अत्थापत्ति समुट्टान (19) दुतियगाथा संगणिक (20) सेदमोचनगाथा (21) पंचवग्ग। परिवार ग्रन्थ की शैली प्रश्नोत्तर की है अर्थात् इसमें पहले विनय से सबंधित प्रश्न किये गये है फिर बाद में उसके उत्तर भी बताये गये है। (जैसे-कौन सा शिक्षापद भगवान ने कहा, किसको, किस प्रसंग में दिया, संघ के झगड़े कितने प्रकार के होते हैं, उपोसथ का आदि क्या है, मध्य क्या है, अन्त क्या है, किस दस बातों का विचार कर तथागत ने शिक्षापदां े को प्रज्ञप्त किया आदि)। इसके साथ ही इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में उपालि महास्थविर से लकेर चौतीस स्थविर-पीढ़ियां े की विनय परम्परा का उल्लेख है। परिवार के अन्तिम भाग में उपालि पंचक में भगवान से उपालि द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर संगृहीत है।

सुत्त-पिटक

पालि त्रिपिटकों में दूसरा पिटक ‘सुत्त-पिटक’ कहलाता है। इसे ‘वोहार’ (व्यवहार) ‘देसना’ भी कहते है। इस पिटक का संगायन भी विनय-पिटक की तरह प्रथम संगीति में ही हो गया था। सुत्त-पिटक के ज्ञाता सुत्तधर कहलाते है। जिस प्रकार विनय-पिटक संघ अनुशासन की दृश्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, उसी प्रकार साहित्य और इतिहास की दृष्टि से सुत्त-पिटक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सुत्त-पिटक में सुत्तो  का प्रारम्भ ‘एवं में सुतं’ अर्थात् ‘एसे ा मैंने सुना’ से हाते ा है। सुत्त-पिटक में भगवान बुद्ध द्वारा अलग-अलग समयो पर अलग-अलग लोगों को दिये गए उपदेशों के साथ उनके परम षिश्यां े महास्थविर, सारिपुत्र, मोग्गलायन और आनन्द आदि द्वारा दिये गए उपदेषों का भी (जिन्हें भगवान बुद्ध ने भी मान्यता प्रदान की थी) वर्णन है। साथ ही सुत्त-पिटक से बुद्धकालीन सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक आदि परिस्थितियों की जानकारी मिलती है। सुत्त-पिटक पाँच निकायों (समूह) में विभक्त है-

(1) दीद्य-निकाय -

सुत्त-पिटक का पहला निकाय ‘दीद्य-निकाय’ है। इसे ‘दीद्यागम’ या ‘दीद्यसंग्रह’ भी कहते है। इस निकाय का नाम ‘दीद्य’ इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें बड़े-बड़ े सुत्तो  का संग्रह है। दीद्य-निकाय की अट्ठकथा ‘सुमंगलविलासिनी’ है। यह तीन वर्गों में विभक्त है-
  1. सीलक्खंध-वग्ग- इसमें 13 सुत्त है। इन सुत्तों में बुद्धकालीन 62 प्रकार के धार्मिक एवं दार्शनिक मतां े का वर्णन, शील, इन्दिय्र , सवंर, समाधि, प्रज्ञा, अभिज्ञाओ  का उपदेश, वर्ण-धर्म व्यवस्था के संबंध में भगवान बुद्ध के विचार, ब्राह्मण बनाने वाले धर्म, विविध प्रकार के यज्ञ आदि का वर्णन है।8
  2. महावग्ग- यह दीद्य-निकाय का दूसरा ग्रन्थ है। इसमें 10 सुत्त है। प्रत्येक सुत्त के नाम का आरम्भ महाषब्द से होता है। इसके अन्तर्गत बुद्धों की जाति, गोत्र, गर्भ में आने का लक्षण, गृहत्याग, प्रव्रज्या, बुद्धत्व प्राप्ति, माता-पिता के नाम, नानात्मवाद, अनात्मवाद, आदि का वर्णन है।
  3. पाथिक-वग्ग- इस वग्ग के सुत्तों के आदि में पाथिक सुत्त नामक सुत्त है इसलिए इसका नाम पाथिक-वग्ग पड़ा। इसमें वर्णव्यवस्था का खण्डन, भिक्षु के कर्त्तव्य, गृहस्थों के कर्तव्य आदि का वर्णन मिलता है।

(2) मज्झिम-निकाय-

मज्झिम-निकाय सुत्त-पिटक का दूसरा निकाय है। इसमें मध्यम आकार के सुत्तो का सगं ्ह है। इसलिए इसे मज्झिम-निकाय कहा गया है। राहुल सांस्कृत्यायन ने मज्झिम-निकाय को ‘बुद्धवचनामृत’ कहा है। इस प्रसंग में उनका कथन है कि त्रिपिटक साहित्य में मज्झिम-निकाय का सर्वोच्च स्थान है। विद्वान लोग इसके बारे में कहते है कि ‘‘यदि सारा त्रिपिटक और बौद्ध साहित्य नश्ट हो जाए, सिर्फ मज्झिम-निकाय ही बचा रहे, तो भी इसकी सहायता स े बुद्ध के व्यक्तित्व, उनके दर्षन और अन्य षिक्षाआं े के तत्त्व को समझने में कठिनाई नहीं होगी।’’(5) मज्झिम-निकाय की अट्ठकथा ‘पपंचसूदनी’ है।

मज्झिम-निकाय में 152 सुत्तो का संकलन है जिन्हें ‘पन्नास’ नाम के तीन ग्रन्थों में संगृहित किया गया है। यहाँ ‘पन्नास’ का अर्थ 50 होता है। वे तीन ग्रन्थ इस प्रकार है-

(1) मूल-पन्नास- मूल का अर्थ है ‘प्रधान’। इसमें 50 सुत्त है। इसको पाँच वगोर्ं में बाँटा गया है।
  1. मूलपरियाय-वग्ग-1 से 10 सूत्र।
  2. सीहनाद-वग्ग-11 से 20 सूत्र।
  3. ओपम्म-वग्ग 21 से 30 सूत्र।
  4. महायमक-वग्ग 31 से 40 सूत्र।
  5. चूल-यमक-वग्ग 41 से 50 सूत्र।
(2) मज्झिम-पन्नास- इसमें भी 50 सुत्त है। इसको भी पाँच वर्गों में बाटाँ गया है।
  1. गहपति-वग्ग 51 से 60।
  2. भिक्खु-वग्ग 61 से 70।
  3. परिब्बाजक-वग्ग 71 से 80।
  4. राज-वग्ग 81 से 90।
  5. ब्राह्मण-वग्ग 91 से 100।
(3) उपरि-पन्नास-  ‘उपरि-पन्नास’ का अर्थ है 50 से अधिक। इसमें 52 सुत्त है और यह भी 5 वर्गों में विभक्त है-
  1. देवदह-वग्ग 101 से 110।
  2. अनुपद-वग्ग 111 से 120।
  3. सुं¥ता-वग्ग 121 130।
  4. विभंग-वग्ग 131 142।
  5. सलायतन-वग्ग 143 152।
मज्झिम-निकाय के सुत्तो में भगवान बुद्ध के जीवन के बारे में प्रतीत्यसमुत्पाद, अनात्मवाद, आर्य-अश्टांगिक-मार्ग, निर्वाण, ध्यान आदि का विवेचन मिलता है। इसके अतिरिक्त मज्झिम-निकाय के सुत्तों से तत्कालीन समाज की राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं भौगोलिक स्थिति की झलक भी मिलती है। इसमें निहित सुत्तों से यह भी स्पश्ट होता है कि तत्कालीन समाज में प्रचलित जातिवाद और उसके विशय में बुद्ध के मतं व्य क्या थ।े इसके 86 वें सुत्त से भयंकर डाकू-अंगुलीमाल द्वारा प्रव्रज्या लेकर अर्हत होने का वर्णन भी मिलता है। 82 और 83 सुत्त में जातक की शैली की भी कई कथाएँ संगृहीत है साथ ही मज्झिम-निकाय के सुत्तो से तत्कालीन समाज में प्रचलित कठोर दण्डां े की सचू ी और ब्राह्मणों में प्रचलित यज्ञ आदि की सचू नाएँ मिलती है। इसमें बुद्ध के प्रमुख षिश्यांे सारिपुत्र या मोग्गलायन द्वारा दिये गये उपदेशों का भी वर्णन है। इसमें नरक आदि का विस्तृत वर्णन मिलता है। भगवान बुद्ध के धम्म में सैतीस बोधिपक्षीय धम्म माने जाते हैं। ये सारे के सारे मज्झिम-निकाय में मौजूद है। सैंतीस बोधिपक्षीय धम्म निम्न प्रकार है-

(1) चार स्मृत्युपस्थान- शरीर, मन, अनुभूतियों तथा संसार के आंतरिक और बाहृय पदार्थों को बुद्धिवादी जो कुछ समझता है, उसको बराबर स्मृति द्वारा उपस्थित रखना, उन्हें न भूलना, इसी को स्मृति का उपस्थान कहा जाता है। ये चार है-
  1. कायानुपष्यी होना।
  2. वेदनानुपष्यी होना।
  3. चित्तानुपष्यी होना।
  4. धम्मानुपष्यी होना।
(2) चार सम्यक् प्रहाण- किसी बात या कार्य में मन के लीन होने की दषा या भाव सम्यक् प्रहाण है जैसे-
  1. न उत्पन्न पुण्य कर्मों को उत्पन्न करना अर्थात् नए पुण्य कर्मों को करते रहना।
  2. उत्पन्न पुण्य कर्मों की रक्षा करना, उन्हें नश्ट न होने देना।
  3. उत्पन्न पाप कर्मों को साधना द्वारा नश्ट करना।
  4. न उत्पन्न पाप कर्मों को उत्पन्न न होने देना।
(3) चार ऋद्धिपाद- ध्यान, मार्ग एवं फल की प्राप्ति के लिए प्रयत्न किये जाने पर इनकी प्राप्ति होती है अर्थात् ‘सिद्धि’ को ‘ऋद्धि’ कहा जाता है तथा उन ध्यान, मार्ग एवं फल की प्राप्ति के पादक छन्द, वीर्य, चित्त एवं प्रज्ञा को ‘ऋद्धिपाद’ कहते है। चार ऋद्धिपाद इस प्रकार है-
  1. छन्द ऋद्धि।
  2. वीर्य ऋद्धि।
  3. चित्त ऋद्धि।
  4. मीमांसा ऋद्धि।
(4) पाँच इन्द्रियाँ - इन्द्रिय का अर्थ साधन, मार्ग या मानस पर प्रभुत्व उत्पादन करने वाला धर्म हैं। पाँच इन्द्रियाँ इस प्रकार है-
  1. श्रद्धा।
  2. वीर्य।
  3. स्मृति।
  4. समाधि।
  5. प्रज्ञा।
(5) पाँच बल- पाँच इन्द्रियाँ ही पाँच बल हैं। मनुष्य को इन पाँचों बलों-श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा से सदैव सम्पन्न रहना चाहिए।

(6) सात सम्बोध्यंग- जिस धर्म समूह द्वारा आर्य-सत्य आदि जाने जाते है, उन्हे ‘बोधि’ कहते हैं तथा ‘बोधि’ के अंग को ‘बोध्यंग’ कहा जाता है। ये सात है-
  1. स्मृति-सम्बोध्यंग।
  2. धम्म-सम्बोध्यंग।
  3. वीर्य-सम्बोध्यंग।
  4. प्रीति-सम्बोध्यंग।
  5. प्रश्रब्धि-सम्बोध्यंग।
  6. समाधि-सम्बोध्यंग।
  7. उपेक्षा-सम्बोध्यंग।
(7) आठ श्रेष्ठ-मार्ग- भगवान बुद्ध द्वारा बताये गये अश्टांगिक-मार्ग ही आठ श्रेष्ठ-मार्ग है। जो इस प्रकार है-सम्यक्- दृष्टि, सम्यक्-संकल्प, सम्यक्-वाक्, सम्यक्-कर्मान्त, सम्यक्-आजीविका, सम्यक्-व्यायाम, सम्यक्-स्मृति, सम्यक्-समाधि।

(3) संयुक्त-निकाय- यह तीसरा निकाय है। इस निकाय में छोटे-बड़े दोनों आकार के सुत्तो का संग्रह है इसलिये इसका नाम संयुक्त-निकाय पड़ा। संयुक्त-निकाय की अट्ठकथा ‘सारत्थप्पकासिनी’ है। इस निकाय को पाँच वर्गों में बाँटा गया है तथा सुत्तों की कुल संख्या 7762 है। संयुक्त-निकाय के पाँच वग्ग इस प्रकार है-
  1. सगाथा-वग्ग- इस वग्ग में 271 सत्रू है जो 11 संयुक्तों में विभक्त है। इस वर्ग के सुत्तो में गाथाओं का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है इसलिए इसे सगाथा वग्ग कहा गया है। इसमें भगवान बुद्ध द्वारा काम-वासना, पुनर्जन्म, मिथ्या मतवाद और अविद्याश्रित इच्छाओं का दमन, बुद्ध तथा उनके शिष्यों की मार विजय आदि का वर्णन किया गया है।
  2. निदान-वग्ग- निदान का अर्थ मूल कारण हाते ा है। इस वग्ग के सुत्तो  में मूल कारण पर प्रकाश डाला गया है अर्थात् इस वग्ग का विशय संसार चक्र की व्याख्या करना है। इस वग्ग में 293 सुत्त है जो 10 संयुक्तों में विभक्त है।
  3. खन्ध-वग्ग- खन्ध को स्कन्ध कहत है। यह 13 संयुक्तों में विभक्त है और 716 सुत्र है। बौद्ध दर्शन में स्कन्धों का बड़ा महत्व है। इन स्कन्धो  के विवेचना के माध्यम से यह बताया गया है कि संसार में शुद्ध इकाई के रूप में किसी वस्तु की सत्ता नहीं है। खन्ध वग्ग के सभी सूत्रों में यही बात निहित है कि पाँच स्कन्ध रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान अनित्य, अनात्म एवं दुःख रूप है।
  4. सलायन-वग्ग- इसमें 434 सुत्त ह ै जो 10 संयुक्तों में विभक्त है। इस वग्ग के सुत्तो  में पंच स्कन्धवाद तथा सलायतनवाद दोनों के सिद्धान्त प्रतिपादित है।
  5. महा-वग्ग-इसमें 1224 सुत्त है। यह 12 सयुक्तों में विभक्त है। इसमें बौद्ध धर्म एवं दर्शन के महत्त्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाला गया है।
इस प्रकार संयुक्त-निकाय दार्शनिक, साहित्यिक, भौगोलिक, धार्मिक आदि बातों में सुत्तपिटक के ग्रन्थों में महत्त्वपूर्ण निकाय है।

(4) अंगुत्तर-निकाय- सुत्त-पिटक का चौथा निकाय अंगुत्तर-निकाय है। अंगुत्तर-निकाय को ‘अंगुत्तर संगह’ या ‘एकोत्तर आगम’ भी कहा जाता है। अंगुत्तर-निकाय की अट्ठकथा ‘मनोरथपूरणी’ है। यह निकाय 11 निपातों में विभक्त है। इसमें वर्गों की संख्या 169 और सत्त्ु ाो ं की कुल संख्या 9557 है।

इस निकाय में भगवान बुद्ध द्वारा दिये गये धर्म उपदेशों का वर्णन है साथ ही बुद्ध के समय में श्रेष्ठ उपासक-उपासिकाओ,ं भिक्षु-भिक्षुणियों के नाम एवं गुण भी बताये गये है। इस निकाय से बुद्ध के समय की सामाजिक व्यवस्था, भूगोल, दर्शन, सोलह जनपदों तथा दस गणतंत्रों आदि का भी ज्ञान होता है। इस निकाय के तीसरे निपात में (लोक-विश्रुत कालासुत्त) भगवान बुद्ध ने बुद्धि स्वातन्त्र्य का उपदेश दिया है। इसके अतिरिक्त अंगुत्तर-निकाय में चार आर्यवंष, वर्ण-व्यवस्था का खण्ड़न, बुद्ध की मथुरा यात्रा और मथुरा के पाँच दोष, बहुधर्म, नारी-प्रव्रज्या आदि का भी वर्णन है।

(5) खुद्दक-निकाय- सुत्त-पिटक का पाँचवा निकाय खुद्दक-निकाय कहलाता है। इस निकाय में छोटे-छोटे ग्रन्थों का संग्रह है इसलिए इसे ‘खुद्दक’ कहते है।

खुद्दक-निकाय की अट्ठकथा ‘परमत्थजोतिका’ है। खुद्दक-निकाय में ही सबसे ज्यादा सुत्त संकलित किये गये है। इस निकाय में भगवान बुद्ध के उपदेश और उनसे सबंंधित विचारों को पदों के रूप में संकलित किया गया है। भगवान बुद्ध से संबंधित घटनाओं और उनके जीवन से संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं को पदों के रूप में संकलित किया गया है, इसके अलावा अनेकों बौद्ध भिक्खुओं (जिनको थेरा कहा जाता था) और भिक्खुणियों (जिनको थेरी कहा जाता था) के व्यक्तिगत सघ्ंर्श, उनकी आध्यात्मिक उपलब्धियो और उनके व्यक्तिगत प्रत्यक्ष अनुभवों को भी पद के रूप में संकलित किया गया है। इसमें कुल ग्रन्थों की संख्या 15 है। जो इस प्रकार है-
  1. खुद्दकपाठ- खुद्दक-निकाय का सबसे छोटा ग्रन्थ खुद्दकपाठ कहलाता है। इस ग्रन्थ में त्रिशरण (बुद्ध, संघ और धम्म) दस षिक्षापाद (जीव-हिंसा, चोरी, व्यभिचार, असत्य-भाषण, मद्य-पान, असमय-भोजन, नृत्य-गीत, माला, गन्ध-विलेपन, ऊँची और बड़ी शय्या, सोने और चाँदी का ग्रहण) आदि का विवेचन है।
  2. धम्मपद - धम्मपद खुद्दक-निकाय का दूसरा ग्रन्थ है। इसमें नैतिक उपदेषों का संग्रह है। यह 26 वग्गों में बँटा हुआ है। इसमें मूलत: 423 गाथाएँ आयी हुई है।
  3. उदान- यह खुद्दक-निकाय का तीसरा ग्रन्थ है। इसमें चित्त की परम शक्ति, निर्वाण, पुनर्जन्म, कर्म और आचार तत्व संबंधी गंम्भीर उपदेश निहित है। इसमें 8 वर्ग है और 80 सुत्त। इसमें 95 उदान गाथाएँ आयी हुई है तथा साढ़े आठ भाणवार है।
  4. इतिवुत्तक- यह चौथा ग्रन्थ है। इतिवुत्तक का अर्थ होता है ‘ऐसा कहा गया, ऐसा तथागत ने कहा’। यह चार निपातो ं में विभक्त है। इसमें कुल सुत्तों की सख्ं या 112 है। इस ग्रन्थ में भगवान बद्धु की छोटी-छोटी युक्तियो ं का संग्रह है जो ‘भगवान ने यह कहा- ऐसा मैंने सुना से प्रारम्भ होता है और अन्त में ‘यह भी बात भगवान बुद्ध द्वारा कही गई-ऐसा मैंने सुना’ के साथ सुत्त समाप्त होता है।
  5. सुत्तनिपात- यह पाँचवा ग्रन्थ है। यह पाँच वर्गों में बटा है तथा इसमें सुत्तो की संख्या 72 है। इसमें बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का बड़ी मार्मिकता के साथ वर्णन किया गया है।
  6. विमानवत्थु- इसमें बुद्ध, संघ और धर्म की आराधना कर देवयोनि में उत्पन्न हुए स्त्री-पुरुष का वर्णन है। इसमें 7 वग्ग और 85 विमान है।
  7. पेतवत्थु- यह विमानवत्थु के विपरीत है। इसमें पाप कर्म करके प्रेतयाेि न में उत्पन्न हुए स्त्री-पुरुष का वर्णन है। इसमें कुल 4 वग्ग आरै 50 पे्रत्यो ं की कथाएँ है।
  8. थेरगाथा- थेर का अर्थ भिक्षु है। इसमें भिक्षु द्वारा व्यक्त किये गये उदगार है। यह 11 निपातां े में विभक्त है।
  9. थेरीगाथा- थेरी भिक्षुणी को कहते है। इसमें भिक्षुणियों के उदगार है। इसमें 16 निपात, 527 गाथाएँ है, जिसमें 73 थेरियों की गाथाएँ हैं।
  10. जातक- यह खुद्दक-निकाय का 10वाँ ग्रन्थ है। जातक का अर्थ जन्म-संबंधी है। इस ग्रन्थ में भगवान बुद्ध के पूर्व जन्मों में कहीं गई गाथाएँ तथा युक्तियाँ है। इसमें 547 जातक है और 22 निपातो में विभक्त है।
  11. निद्देस- निद्देस का अर्थ ‘व्याख्या’ है। यह ग्रन्थ सुत्तनिपात में आये हुए खग्गविसाण सुत्त, अट्टक और परायण-वग्ग की व्याख्या है। इसके दो भाग है-1 महानिद्देस (इसमें अट्टकवग्ग की व्याख्या) और 2. चूलनिद्देस(इसमें परायण-वग्ग और खग्गविसाण सुत्त की व्याख्या है।)
  12. पटिसंभिदामग्ग- इसमें बौद्ध सिद्धान्तो ं जैसे- पा्रणायाम, ध्यान, कर्म, आर्यसत्य, मैत्री आदि विशयों का विष्लेशण तथा व्याख्यान है।
  13. अपदान- अपदान का अर्थ है जीवन चरित्र। इसमें बौद्ध सन्तों के जीवन का बड़ा रोचक वर्णन किया गया है।
  14. बुद्धवंष- इसमें भगवान बुद्ध और उनके पूर्व उत्पन्न हुए बुद्धों के जीवन चरित्र का वर्णन है।
  15. चरियापिटक- इसमें सात पारमिताओं का वर्णन है। वे सात पारमिताएँ इस प्रकार है-दान, शील, नैश्क्रम्य, अधिश्ठान, सत्य, मैत्री और उपेक्षा। दीद्य-निकाय की अट्ठकथा ‘सुमंगलविलासिनी’ में कहा गया है-(13) दीद्य आदि इन चार निकायों को छोड़कर, अन्य जो कुछ भी बुद्ध वचन है, उसे खुद्दक-निकाय कहा जाता है।

अभिधम्म-पिटक

त्रिपिटको  में तीसरा पिटक अभिधम्म-पिटक कहलाता है। अभिधम्म-पिटक में भगवान बुद्ध द्वारा दिए गए धम्म की व्यापक शिक्षा है। अभिधम्म-पिटक उनकी शिक्षाओं व दर्शन का सम्पूर्ण सार है। बुद्धघोश ने अभिधम्म की देसना को परमार्थ या निश्पर्याय देसना कहा है। अभिधम्म-पिटक केवल भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए ही उपयोगी नहीं है बल्कि धर्म के मार्ग पर चलने वाले हर उपासक-उपासिका के लिए भी अत्यन्त उपयागे ी है। जिन सिद्धान्तो का प्रतिपादन स्थलू रूप से सुत्त-पिटक में किया गया है उन्हीं का विस्तृत विवेचन अभिधम्म में है। इस पिटक में भगवान बुद्ध के गूढ़ और गम्भीर उपदेशों का संग्रह हैं इसमें चित्त, चैत्तसिक आदि धमोर्ं का ही विश्लेषण नहीं किया गया है बल्कि इसमें विज्ञान क्या है, संस्कार क्या है, वेदना क्या है, संज्ञा क्या है आदि आध्यात्मिक विषयों पर दार्शनिक गवेशणा की गयी है आरै आóव रहित निर्वाण की प्राप्ति का साधन बताया गया है। इसमें सात पुस्तकें है-
  1. धर्मसंगणि- इसमें विषेश रूप से चित्त-चैतसिक तथा अव्याकृत धर्मों का विश्लेषण किया गया है। धर्मसंगणि की अट्ठकथा ‘अट्ठसालिनी’ है।
  2. विभंग- इसमें भी चित्त-चैतसिक तथा बौद्ध-शब्दावली का वर्णन है। इसकी अट्ठकथा ‘सम्मोहविनोदनी’ है। इसमें अट्ठारह अध्याय है-स्कन्ध, आयतन, धातु, सत्य, इन्द्रिय, प्रत्ययाकार, स्मृति, सम्यक्-प्रधान, ऋद्विपाद, बोध्यंग, ध्यान, अप्रमाण्य, षिक्षापाद, प्रतिसंविदा, ज्ञान, क्षुद्रक-वस्तु, धर्म हृदय।
  3. धातुकथा- इसमें धातुओं (पदार्थों) के विषय में प्रश्न तथा उत्तर दिये गये है इसलिए इसका नाम धातुकथा पड़ा। परन्तु धातु के अतिरिक्त धातुकथा में विभंग के तीन भाग-स्कन्ध, आयतन एवं धातु का भी ग्रहण किया गया है। इसकी अट्ठकथा ‘परमत्थदीपिनी’ है।
  4. पुग्गल पं¥ति- यह अभिधम्म-पिटक का चौथा ग्रन्थ है। पुदगल का अर्थ जीव होता है और प्रज्ञप्ति का अर्थ विवेचना या वर्णन है। अत: लोक के जीवों का विवेचन या वर्णन उपमा या उदाहरण द्वारा करना ही इस ग्रन्थ का विषय है।
  5. कथावत्थु- कथावत्थु कथा+वत्थु दो शब्दों से मिलकर बना है। कथा का अर्थ विवाद या विचार-विमर्श है तथा वत्थु का अर्थ आधार या विषय है। इस प्रकार कथावत्थु विचार, विमर्श एवं विभिन्न मतां े का आधार ग्रन्थ है। अर्थात् बुद्ध धर्म के 18 सम्प्रदायों में जिन विषयों को लेकर विवाद खड़ा हुआ था उनका विवेचन इस ग्रन्थ में किया गया है।
  6. यमक- यमक में युग अर्थात् जोडी़ के रूप से बौद्ध-सिद्धान्तां े का वर्णन प्राप्त होता है।
  7. पट्टान- इसमें 24 प्रत्ययो  के अनुसार प्रतीत्यसमुत्पाद का वर्णन किया गया है। 
सन्दर्भ- 
  1. मज्झिम-निकाय (बुद्ध वचनामृत-1) अनुवादक त्रिपिटकाचार्य महापंड़ित राहुल सांकृत्यायन। प्रकाशन (सम्यक प्रकाशन) प्रथम संस्करण 2009 पृ0 2। 
  2. चुल्लवग्ग- दीपवंस 4 तथा महावग्ग 3 के अनुसार। 
  3. धम्मं च विनयं च संगायेय्याम। महापरिनिब्बान-सुत्त पृ03 दीद्य-निकाय। 
  4. मज्झिम-निकाय, गहपतिवग्ग के कन्दरक-सुत्त। 
  5. (सुत्त, गेय्य, व्याकरण, गाथा, उदान, इतिवुत्तक, जातक, अद्भुत, धम्म तथा वेदल्ल) अ.सा पृ02। 
  6. सुवुत्ततो सूचनतोअत्थानं सुट्ट ताणतो। सवणा सूटना चेव यस्मा सुत्तं पवुच्यति।। सुत्तनिपात 4।
  7. तथारुपानि सुत्तानि नियातेत्वा ततो ततो संगीति च अयं तस्मा संखमेवमुपागतो। सु0 नि0 अ0, भाग 1 पृ03। (18) सु0 नि0 पृ0 अ।
  8. खुद्दक-निकाय अवस.1ए खुद्दकपाठ, पृ0 5,6,11। 
  9. मज्झिम-निकाय-ब्राह्मण वग्ग,पृ0 क्र0 416, 443। 
  10. संयुत्त-निकाय, सगाथा वग्ग, पृ0 134,170,138,151।

Comments