वाद्य यंत्र के प्रकार

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वाद्य यंत्र अर्थ है, ‘‘वाद्यनिय’’ या बजाने योग्य यन्त्र विशेष। यह शब्द वद्य धातु से उत्पन्न होता है। वद्य धातु स्पष्ट उच्चारण करने के अर्थ में प्रयोग होती है- ‘‘वदतीति वाद्यम्’’ जो बोलता है, वही वाद्य यंत्र है। वास्तव में वाद्यों को बजाने में हमें स्वर व शब्द बोलते हुए प्रतीत होते है। प्राचीन संस्कृति साहित्य में वाद्य या बाजे शब्द के लिए तीन पर्याय मिलते हैं- वाद्य, वादित्र और अतोध। वाद्य और वादित्र के अन्तर्गत तत् और सुशीर वाद्य माने गये हैं और अतोध के अन्तर्गत वे वाद्य यंत्र हैं जो आघात से या पीट कर बजाए जाते हैं। 

वाद्य यंत्र के प्रकार

वाद्य यंत्र के प्रकार

भारत का संगीत विभिन्न वाद्यों से समृद्ध हुआ है। विभिन्न प्रकार के सांगीतिक वाद्य यंत्र पाये जाते हैं।
  1. सारंगी- गायन तथा नृत्य रूप से कल्पक नृत्य के साथ संगीत में प्रयुक्त होने वाला एक प्रचलित वाद्य यंत्र है। इसमें प्रमुख चार तार होते है तथा गूँज के लिए 11 तरब के तार होते हैं। इसका वादन गज से किया जाता है।
  2. सरोद- यह वाद्य तंत्र वाद्यों के अन्र्तगत एक सुविख्यात वाद्य है। इसे शारदीय वीणा का अपभ्रंश माना जाता है। यह काष्ठ का बना होता है। जिसमें ऊपर की ओर चमड़ा मढ़ा हुआ रहता है।
  3. सरस्वती वीणा या तंजीर वीणा- वाद्यों में सरस्वती वीणा या तंजीरी वीणा का प्रमुख स्थान है। इस वीणा का उल्लेख ‘‘संगीत मकरंद’’, ‘‘अभिनव भारती’’ जैसे ग्रन्थों में भी मिलता है। 
  4. सुरबीन- इसे बजाने के लिए काष्ठ खण्ड का प्रयोग किया जाता है। कुछ वादक तारों को दबाकर स्वर निकालने के लिए काँच के गोले या बाँस के टुकड़ें का भी प्रयोग करते हैं। 
  5. तानपुरा- इसका वादन गायन तथा वादन की संगत के लिए किया जाता है। इसमें चार तार होते हैं, जिसे गायक रागानुसार प़ ससा स़ा अथवा म़ सा सा स़ा में मिलाते हैं।
  6. इसराज- इसराज एक प्रकार से सितार का ही रूपांतर है। इस वाद्य का प्रयोग गायन के साथ संगति के लिए किया जाता है। इसे दिलरूबा के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सितार के समान ही परदे होते हैं। इसराज वादक इसे बाँये कंधे पर टिकाकर एवं इसके निचले सिरे को गोदी में रखकर हाथ की अंगुलियों से दबाकर स्वर निकालते हैं। तथा दाहिने हाथ में लिये हुए गज से तारों को रगड़ने से स्वर पैदा होता है। इस वाद्य में एक डाँड होती है जो तूँबे से जुड़ी होती है तथा डाँड पर ही विभिन्न स्वरों के पर्दे बँधे होते हैं।
  7. रूद्ध वीणा- यह वीणा के नाम से भी जानी जाती है। इस वीणा में दो तूँम्बे होते हैं जो डाँड के दोनो सिरों पर जुड़े रहते हैं। इसके वादन के लिए रूद्ध वीणा वादक इसके बायें तूँम्बे को बायें कंधे पर रखकर तथा दाहिने तूँबे को अपनी दाहिनी ओर रखकर दाहिने हाथ की कनिश्ठा उँगुली से डाँड से ऊपर तारों को दबाकर स्वर की उत्पत्ति करते हैं। उत्तर भारतीय संगीत में इसी वीणा का एक अन्य प्रकार ‘‘विचित्र वीणा’’ भी प्रचलित है।
  8. तुण्डकी या तुरूतरी- यह दो हाथ की लम्बाई वाला वाद्य यंत्र है। इसे जोड़ी में बजाया जाता है।
  9. शृंग- जैसा की इसके नाम से ही स्पष्ट होता है इसे, भैंस के सींग से बनाया जाता है। यह आठ अंगुल लम्बा होता है एवं इसकी ध्वनि गंभीर होती है। यह भिन्न-2 प्रदेशों में भिन्न-2 नामों से जाना जाता है। जैसे भील इसे सिंगा कहते हैं। 
  10. शंख- इससे सात स्वरों की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु इसका प्रयोग युद्ध में युद्धारंग की घोषणा व युद्ध समाप्ति की घोषणा के लिए किया जाता था। आज भी शंख का प्रयोग धार्मिक कार्यों में एवं सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों में किया जाता है।
  11. नागस्वर- इसका वादन शादी, जुलूस आदि मांगलिक अवसरों पर एवं धार्मिक कार्यों में मंदिरों में किया जाता है। यह वाद्य यंत्र बहुत कुछ उत्तर भारत में प्रचलित शहनाई वाद्य यंत्र से मिलता जुलता है, किन्तु आकार में शहनाई से दुगना लंबा होता है।
  12. मुख वीणा- यह छोटा नागस्वर है। इसका प्रयोग नाट्य में होता है किन्तु आजकल इसके वादन का प्रचलन कम हो गया है एवं इसका स्थान क्लेरिनेट ने ले लिया है। 
  13. शहनाई- इसका प्रयोग विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर किया जाता है। इस वाद्य यंत्र का प्रचार ईस्वी 16 से पाया जाता है। इस वाद्य यंत्र पर शास्त्रीय संगीत का प्रभावपूर्ण वादन होता है।
  14. नागफनी- जैसा कि नाम से ही विदित होता है इसका आकार नाग के फन के समान होता है। यह वाद्य यंत्र बहुत कुछ रणसिंगा या नरसिंग नाम के वाद्य यंत्र से मिलता जुलता है।
  15. अलगोजा- यह जोड़ी में बजने वाला वाद्य यंत्र है। ये बांस से निर्मित होता है जिसमें 3 से 4 छिद्र होते हैं। जोड़ी में बजने के कारण ध्वनि बड़ी ही मधुर प्रतीत होती है। 
  16. तुरही- ये धातु का बना एक हाथ लंबा वाद्य यंत्र है। इसका प्रयोग मांगलिक अवसरों पर किया जाता है। इसमें कोई भी छिद्र नहीं होता है। केवल हवा फूँक कर उसके विभिन्न दबावों से स्वरों की उत्पत्ति की जाती है। इसलिए इसमें 2 अथवा 3 स्वरों से ज्यादा उतार चढाव संभव नहीं है। इसकी ध्वनि तीक्ष्ण होती है।
  17. बीन- यह वाद्य यंत्र तूम्बे तथा काष्ठ से निर्मित होता है। तूम्बे के एक ओर बाँस की दो नलिकाऐ होती हैं। इनमें 3-4 सुराख किए जाते हैं एवं तूम्बे के दूसरे सिरे को काष्ठ की एक पोली नली से जोड़ा जाता है। इस नली के एक सिरे से फूँककर इस वाद्य यंत्र को बजाया जाता है।
  18. नड़ा- भैरव का गुणगान करने के लिए भोपे लोग मषक की तरह जिस वाद्य यंत्र को फूँक द्वारा बजाते हैं उसे नड़ कहते हैं।
  19. घण्टा- यह चार सेमी0 से लेकर 12 सेमी0 तक के व्यास वाला पीतल से निर्मित वाद्य यंत्र होता है। उसे डोरी से लटका कर धातु अथवा लकड़ी के हथौड़े से आघात करके बजाया जाता है। इसका प्रयोग मंदिरों में पूजा अर्चना के अवसर पर किया जाता है।
  20. खड़ताल- यह लकड़ी की बनी हुई 11 अँगुल लंबी खण्ड युक्त होती है, जिसके खण्डों के मध्य धातु की गोल पत्तियों को लगाया जाता है। इसका वादन मंदिरों में कीर्तन के साथ किया जाता है।
  21. मंजीरा- यह तीन इंच से लेकर 12 तथा 16 इंच तक व्यास वाले पीतल आदि धातु से निर्मित गोलाकार होते हैं। यह जोड़े में होते हैं। इन्हें आपस में टकरा कर ध्वनि उत्पन्न की जाती है। इसका प्रयोग प्राय: मंदिरों में देवी-देवताओं की स्तुति के अवसर पर किया जाता है।
  22. घुँघरू- यह पीतल से निर्मित पोले गोलाकार टुकड़े होते हैं। इनके अन्दर लोहे की छोटी-2 गोलियाँ डाल दी जाती हैं। इन घुँघुरूओं को एक साथ एक लड़ी में पिरो कर नर्तक अपने पैरों में बाँध लेते हैं। 
  23. चिमटा- यह लौह धातु से निर्मित दो हाथ लंबी दो पट्टियों को मिलाकर बनाया जाता है। प्रत्येक पटटी में बीच-2 में लोहे की गोल-2 थोड़ी पत्तियाँ लगा दी जाती हैं। इनसे अतिरिक्त झंकार उत्पन्न होती है।
  24. मुखचंग- इसे मोर चंग भी कहते हैं। इसकी लम्बाई पाँच अंगुल की होती है। इसे दाँती से दबा कर बीच वाली पत्ती को अंगुली से छेड़कर बजाया जाता है। 
  25. पुश्कर- पुश्कर नामक वाद्य यंत्र वैदिक काल में एक प्रचलित वाद्य यंत्र था। इसमें चमड़ें से मढें हुए तीन मुख होते थे। दो मुख दायीं तथा बांयी और तीसरा मुख ऊपर की ओर रहता था। इसके पिंड का निर्माण मिट्टी से किया जाता था। कालान्तर में इसका निर्माण लकड़ी से भी किया जाने लगा। पुष्कर वाद्य यंत्र आज प्रचार मे नहीं है। 
  26. मृदंग- मृदंग नामक वैदिक कालीन वाद्य यंत्र का प्रयोग आज भी किया जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि मृदंग की उत्पत्ति ब्रहा ने शिव ताण्डव के साथ वादन के लिए की थी। मृदंग का पिंड बीज वृक्ष की लकड़ी या पनस की लकड़ी से बनाया जाता है। इसकी लम्बाई 15.75 इंच 23 होती है। लकड़ी का दल आधे अंगुल का होता है। दाहिने मुख की चौड़ाई 14 अंगुल तथा बाँए मुख की चौड़ाई 13 अंगुल रखी जाती है। दोनो ओर इसे चमड़ें से मढ़ा जाता है। चमडें के घेरे में 24 छिद्र होते हैं। इन छिद्रों में से चमड़े की रस्सी को पिरोकर बाधां जाता है। रस्सी के बंधन को ढ़ीला करने या कसने से मृदंग का स्वर ऊँचा व नीचा होता है। 
  27. पटह- यह काष्ठ से बना हुआ ढ़ाई हाथ की लम्बाई का चर्माच्छादित अवनद्व वाद्य यंत्र था। इसके दाहिने मुख का व्यास 11.5 अंगुल तथा बाँये मुख का व्यास 10 अंगुल रखा जाता था। दोनो ही ओर से मुख को बछड़े के चर्म से मढ़ा जाता था तथा बांयी ओर के चमड़े के घेरे में सात छिद्र बनाकर उसमें पतली रस्सी से सोने-चॉदी आदि से बनाये हुए चार अंगुल लम्बे सात कलशों को ढ़ीला बाधा जाता था। इसका वादन हाथ से किया जाता था।
  28. हुडुक्का- यह काष्ठ का बना होता है। इसकी लम्बाई एक हाथ की होती है। इसके दोनों मुख चर्म से ढके हुए होते हैं। प्रत्येक मुख पर चर्म से बनी हुई मण्डली बाँधी जाती है, जिसका व्यास ग्यारह अंगुल होता है।
  29. घड़स- यह दो मुख वाला वाद्य यंत्र होता है, किन्तु केवल दाहिने मुख में ही चर्म मढ़ा जाता है तथा बायाँ मुख रस्सी से बाँधा जाता है। बायें हाथ की तर्जनी से रस्सी को दबाते हैं तथा दाहिने हाथ से वादन किया जाता है।
  30. ढ़वस- इसकी लम्बाई एक हाथ की होती है तथा परिधि 39 अंगुल होती है तथा मुख का व्यास 12 अंगुल होता है, जिसमें सात छिद्र होते हैं। जिसमें रस्सी पिरोकर इसे बांधा जाता है। इसे मध्य भाग से बायें हाथ से पकड़कर दाहिने हाथ से कोण के आधात से बजाया जाता है।
  31. भेरी- भेरी नामक अवनद्व वाद्य यंत्र का उल्लेख वैदिक कालीन साहित्य में कई स्थानों पर प्राप्त होता है। इसका वादन जनता को सूचना देते समय किया जाता था। संगीत रत्नाकर में मेरी का वर्णन इस प्रकार मिलता है-इसका खेल ताँबे का बना होता है जो कि 65 सेमी0 लंबा होता है तथा दोनो ओर मुख का व्यास 25 सेमी0 होता है तथा इसे चर्म से आच्छदित किया जाता है।
  32. डफ- डफ एक गोलाकार चर्म आच्छादित तथा प्रचलित वाद्य यंत्र है। एक गोलाकार फ्रेम जिसका व्यास तीन फुट तक होता है। इसमें एक ओर चमड़ा मढ़ा जाता है तथा दूसरी ओर खुला रखा जाता है। इसे बायें हाथ से पकड़कर दाहिने हाथ से बजाया जाता है। इसका प्रयोग लोक नृत्य आदि के साथ किया जाता है।
  33. डमरू- डमरू को शिव का वाद्य यंत्र माना जाता है। यह आकार में छोटा होता है। इसकी लम्बाई लगभग 6 से 8 इंच होती है। मध्य भाग में इसका आकार संकरा होता है। तथा दोनो मुख समान आकार के चौड़े होते हैं जिन पर चमड़े को मढ़कर रस्सी अथवा चमड़े की बद्दी से कस दिया जाता है। मध्य भाग में रस्सी के सहारे धातु की दो गोलियां बांधी जाती है। जब डमरू को हाथ में लेकर घुमाया जाता है तो रस्सी के सहारे बंधी हुई ये गोलियां दोनो मुख पर चमड़े से टकराकर ध्वनि उत्पन्न करती है।
  34. ढोल- यह आकार में बड़ा होता है इसकी लम्बाई 3 से 4 फुट तक होती हैै। इसके खोल का व्यास बारह इंच से बीस इंच तक होता है। यह लकड़ी से बनाया जाता है। इसके दोनो मुख समान व्यास वाले होते है तथा इन पर चमड़ा मढ़ा जाता है।
  35. ढोलक- ढोलक का आकार ढोल से छोटा होता है। इसका निर्माण भी लकड़ी के खोल से किया जाता है। इसकी लम्बाई 2 से 3 फुट तक होती है तथा दोनो मुखों के व्यास में एक से डेढ़ इंच का अंतर होता है अथात् एक मुख दूसरे मुख से छोटा रहता है। दोनो मुखों पर चमड़े को रस्सी से कसा जाता है।
  36. मादल- इसका निर्माण मिट्टी से किया जाता है तथा मजबूती के लिए मिट्टी के खोल को आग में तपाया जाता है। इसकी लम्बाई तीन फुट तक होती है। इसके एक मुख का व्यास 12 इंच तथा दूसरे मुख का व्यास 5 इंच होता है। इसके मध्य का व्यास दोनों मुखों से अधिक होता है।
  37. पखावज- इसकी आकृति बहुत कुछ मृदंग से मिलती जुलती ही होती है। इसमें एक लकड़ी के खोल पर जिसकी लम्बाई तीन फुट की हो दोनो ओर चमड़ा मढ़ा जाता है। जिसे चमड़े की बद्दी के द्वारा कसा जाता है। दोनो मुख पर चमड़े की पुड़ी का व्यास अलग-2 होता है। बायें मुख का व्यास 10 इंच तथा दाहिने मुख का व्यास 5 इंच होता है। 
  38. खंजरी- इसे धातु की पतली पट्टी के गोलाकार फ्रेम पर चमड़े को मढ़कर बनाया जाता है। इस फ्रेम की चौड़ाई तीन अंगुल की होती है। इसका व्यास 10 से 12 इंच का होता है। इस पर चमड़े को मढ़ा जाता है। बोल में मधुरता की उत्पत्ति के लिए इसके फ्रेम पर धातु के गोल पतले टुकड़े लगा दिये जाते है।

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