आत्महत्या का सिद्धांत (दुर्खीम)

आत्महत्या के सामान्य अर्थ की भ्रमकता को दूर करने के लिए दुर्खीम ने अपने ग्रन्थ में सर्वप्रथम इसकी अवधारणा सम्बन्धी विचार प्रस्तुत किये हैं। इस दृष्टि से दुर्खीम ने सभी प्रकार के मृत्युओं की समीक्षा करके आत्महत्या से होने वाली मृत्यु के गुणों का निश्चयीकरण किया है और इन्हीं गुणों के आधार पर आत्महत्या को परिभाषित किया गया है। इस सम्बन्ध में दुर्खीम ने लिखा है, यद्यपि सामान्य रूप से यह माना जाता है कि आत्महत्या निश्चित रूप से एक हिसात्मक कार्य है, जिसमें शारीरिक शक्ति का प्रयोग किया जाता है, परन्तु यह भी हो सकता है कि व्यक्ति की एक नकारात्मक मनोवृत्ति या केवल कार्य-निवृत्ति से भी वही परिणाम निकलते हैं। इस आधार पर दुर्खीम ने आगे स्पष्ट करते हुए लिखा है, आत्महत्या शब्द का प्रयोग ऐसी किसी भी मृत्यु के लिए किया जा सकता है जो स्वयं किसी मृतक के द्वारा किये गए किसी सकारात्मक अथवा नकारात्मक कार्य का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रतिफल है।

परन्तु दुर्खीम आत्महत्या की इन परिभाषाओं से संतुष्ट नहीं हुआ है। उसका अपने इस सिद्धांत का प्रथम यही प्रयास रहा कि अन्य मृत्युओं में आत्महत्या द्वारा हुई मृत्यु में अन्तर किया जाए। उसने आत्महत्या की अपनी अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए यह प्रस्तावित किया है कि आत्महत्या की बाहरी दशाएँ उल्लेखनीय स्थान रखती हैं। ये बाह्य दशाएँ इस दृष्टि से तब ही प्रभावशाली होती हैं जब हम उनमें हस्तक्षेप करते हैं। क्योंकि हम आत्मघात करने वाले व्यक्ति की भावनाओं व उद्देश्यों की खोज नहीं कर सकते हैं।

आत्महत्या के गैर-सामाजिक कारण

आत्महत्या के प्रचलित कारणों की समीक्षा करने की दृष्टि से दुर्खीम ने व्यापक रूप से विचार किया है। इस दृष्टि से दुर्खीम ने गैर-सामाजिक कारकों को लिया है। इन कारकों के अन्तर्गत सावयवी मनोवैज्ञानिक क्षमताएँ एवं प्राकृतिक पर्यावरण आदि को दुर्खीम ने केन्द्र बनाया है। प्रथम दुर्खीम ने मनोव्याधिकीय अवस्थाओं पर अपने विचार प्रकट किये हैं। इस दृष्टि से उसने पागलपन, एकोन्माद, प्रजाति व वंशानुसंक्रमण आदि कारकों पर अपने इस दृष्टि से सिद्धांत में समीक्षाएँ प्रस्तुत की हैं। इस सम्बन्ध में दुर्खीम ने लिखा है कि ये सभी कारण आत्महत्या की वास्तविक प्रकृति को दर्शाने में असमर्थ हैं और इन्हें आत्महत्या का कारण नहीं माना जा सकता है।

अपने इस महान ग्रन्थ में दुर्खीम ने आगे आत्महत्या और भौगोलिक कारकों पर विचार किया है। इस दृष्टि से उसने जलवायु, तापमान, समय, दिन व रात, आदि कारणों पर विचार किया है। अपने प्रमुख सिद्धांत को पारित करने से पूर्व दुर्खीम ने आत्महत्या और अनुकरण के सम्बन्धों की चर्चा की है। इन सभी कारकों को दुर्खीम ने अप्रभावहीन बनाया है। 

आत्महत्या का सिद्धांत (aatmahatya ka siddhant)

दुर्खीम के आत्महत्या सिद्धांत का प्रमुख सार हम संक्षेप में निम्नलिखित रूप से कर सकते हैं-

आत्महत्या विषय पर अपने इस सिद्धांत में भी दुर्खीम ने समाजशास्त्रीयवाद के अपने मूल सिद्धांत का पूर्णत: पालन किया है। इसके अन्तर्गत उसने व्यापक आंकड़ों के आधार पर व्याख्या और विश्लेषण के द्वारा ही अपने इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया है। उसका मत है कि प्राणिशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक एवं भौगोलिक तथ्यों अथवा कारकों द्वारा इन आत्महत्या का समाजशास्त्रीय विश्लेषण नहीं कर सकते हैं। दुर्खीम ने यह भी स्वीकार किया है कि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के व्यक्तिगत उद्देश्यों के आधार पर उसके इस कार्य की व्याख्या की जा सकती है। इसी प्रकार भौगोलिक कारक या चिन्ता, भय, गरीबी, असफल प्रेम, आदि तत्वों के आधार पर भी हम आत्महत्या का विश्लेषण नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार दुर्खीम ने बताया कि आत्महत्या के लिए तो केवल सामाजिक कारक ही उत्तरदायी ठहराये जा सकते हैं। दुर्खीम ने लिखा है कि आत्महत्या एक सामाजिक तथ्य है। इसलिए आत्महत्या की व्याख्या भी सामाजिक तथ्य के रूप में ही की जा सकती है। इस विचार को स्पष्ट करते हुए दुर्खीम ने लिखा है, फ्सामाजिक पर्यावरण की कुछ अवस्थाओं से आत्महत्या का सम्बन्ध उतना ही प्रत्यक्ष एवं स्थिर है जितना की प्राणीशास्त्रीय एवं भौतिक लक्षणों वाले तथ्यों से इसका सम्बन्ध अनिश्चित एवं अस्पष्ट देखा गया है।

दुर्खीम ने सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर आत्महत्या का जो अध्ययन किया है उसके द्वारा दुर्खीम के इस सिद्धांत की विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं। दुर्खीम के अनुसार आत्महत्या सिद्धांत की निम्न विशेषताएँ हैं
  1. आत्महत्या की दर प्रत्येक साल लगभग समान रहती है।
  2. सर्दी की अपेक्षा गर्मी में आत्महत्या की दर ऊँची होती है।
  3. पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक आत्महत्या पाई गई है।
  4. बड़ों में छोटों की अपेक्षा अधिक आत्महत्याएँ पाई जाती हैं।
  5. नागरिकों की अपेक्षा सैनिकों में आत्महत्याएँ पाई जाती हैं।
  6. केथोलिकों की अपेक्षा प्रोटेस्टेंट में अधिक आत्महत्या पाई जाती हैं।
  7. विवाहितों की अपेक्षा अकेले, अविवाहितों, विधवा, विधुरों एवं तलाक दिये हुए व्यक्तियों में अधिक आत्महत्याएँ पाई जाती हैं।
  8. विवाहितों में संतानहीन व्यक्ति संतानयुक्त व्यक्तियों की अपेक्षा आत्महत्या अधिक पाई जाती हैं।
  9. आत्महत्या के प्रमुख कारण सामाजिक प्रकृति के हैं।
इन निष्कर्षों के आधार पर दुर्खीम ने बताया कि इन उच्च स्थितियों के लिए बाह्य रूप से मनोवैज्ञानिक एवं भौगोलिक कारण उत्तरदायी दिखाई देते हैं। लेकिन वास्तव में केवल सामाजिक कारणों को ही इनके लिए उत्तरदायी माना जा सकता है। अपने आत्महत्या की विभिन्न घटनाओं के विश्लेषण के आधार पर दुर्खीम ने आत्महत्या को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया है।

आत्महत्या के प्रकार

दुर्खीम के अनुसार आत्महत्या के निम्नांकित प्रकार हैं

1. अहम्वादी आत्महत्या-आहम्वादी आत्महत्या के अन्तर्गत व्यक्ति सामाजिक पृथक्करण एवं उसमें वृद्धि के कारण अपना आत्मविनाश करने के लिए तैयार हो जाता है। सामाजिक पृथक्करण का अभिप्राय यही है कि जब व्यक्ति के लिए सामाजिक सम्पर्वफ, सामाजिक सहवास एवं मेल-जोल के कम अवसर होते जाते हैं। जब मनुष्यों को एकान्तवासी के रूप में रहने के लिए विवश होना पड़ता है तो वे आत्म-विनाश कर लेते हैं। अर्थात् सामूहिक अस्तित्व के न्यूनतम होने के कारण व्यक्ति आत्महत्या करते हैं। इसका प्रमाण दुर्खीम के निष्कर्षों में मिलता है। 

इनमें बतलाया गया है कि विवाहित व्यक्तियों की अपेक्षा अकेले व तलाक प्राप्त अथवा अविवाहितों में आत्महत्या अधिक पाई जाती है। क्योंकि उनके सामाजिक सम्पर्वफ में कमी आ गई है और वे पारिवारिक समूह से पृथक हो गए हैं। दूसरी ओर, विवाहितों को उनकी पत्नियों एवं बच्चों का सान्निध्य प्राप्त होता रहता है। विवाहितों का पारिवारिक बन्धन से पृथक्करण नहीं हो पाता है। इसलिए वे आत्महत्या कम करते हैं। इसी प्रकार पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में आत्महत्या अधिक पाई जाती है। क्योंकि वे समूह जीवन पुरुषों की अपेक्षा कम व्यतीत करती हैं और समूह से अधिक पृथक रहना पड़ता है। आत्मवादी आत्महत्या को दुर्खीम ने अहम्वादी आत्महत्या कहा है।

दुर्खीम के अनुसार गर्मी में आत्महत्या की वृद्धि का यही कारण है। इन महीनों में दिन बड़े होते हैं। इसलिए सामाजिक सम्पर्वफ अधिक नहीं रह पाते। इसके विपरीत सर्दी में दिन छोटे होते हैं। इन दिनों में सम्पर्वफ अधिक बना रहता है। इसलिए आत्महत्या की दर सर्दी में कम रहती है। रोमन केथोलिक की अपेक्षा प्रोटेस्टेन्ट धर्म के लोगों में आत्महत्या की दर अधिक उँफची होती है। इसका भी यही कारण है कि प्रोटेस्टेन्ट धर्म व्यक्तिवादिता एवं व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अधिक जोर देता है। व्यक्तियों में इस कारण धार्मिक समूह का नियन्त्रण एवं संगठन कम होने से पृथक्कता बढ़ती है। दूसरी ओर रोमन केथोलिक धर्म रूढ़िवादी होने के कारण, इसके सदस्यों को धार्मिक समूह बहुत अधिक संगठित एवं नियंत्रित करता है। इसलिए उनमें पृथकता नहीं बढ़ने पाती है। युद्ध और सामाजिक आन्दोलन के समय व्यक्ति घर से बाहर निकलते हैं। परिणामस्वरूप इनमें सामाजिक पृथक्करण विकसित होता है। इसलिए इस समय सामान्य दिनों की अपेक्षा आत्महत्या की दर में वृद्धि हो जाती है।

इस प्रकार दुर्खीम के अनुसार अहम्वादी आत्महत्या के विश्लेषण में प्रधान कारण दुर्खीम ने सामाजिक पृथक्करण में वृद्धि को माना है और इस वृद्धि के उपर्युक्त तथ्यों के सांख्यिकीय आधार पर अध्ययन से सिद्ध करने का प्रयत्न किया है।

2. प्रतिमानहीनता संबंधी आत्महत्या-आत्महत्या का दूसरा प्रकार प्रतिमानहीनता या विसंगति संबंधी आत्महत्या है। दुर्खीम के अनुसार ये आत्महत्याएँ आकस्मिक सामाजिक कारकों के उपस्थित हो जाने से की जाती है। विसंगति या प्रतिमानहीनता की परिभाषा करते हुए कोजर एवं रोजनबर्ग लिखते हैं, प्रतिमानहीनता का अर्थ है सामान्यता के अभाव की अवस्था, नैतिक शून्यता, नियमों का विलम्बन, ऐसी स्थिति जिसमें कभी-कभी अनियमन की एक अवस्था के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसका अभिप्राय यही है कि जब निराशा, व्यापारिक गिरावट, आर्थिक संकट तथा असामान्य सम्पन्नता आदि की स्थिति उत्पन्न होती है तब इस प्रकार की आत्महत्या प्रतिमानहीनता संबंधी आत्महत्याएँ कही जाती है। दुर्खीम ने भी इस संबंध में लिखा है, फ्प्रतिमानहीनता आदर्श-विहीनता की एक वह स्थिति है, जिसमें स्वाभाविकता का अभाव, नियमों का विलम्बन व नियमविहीनता होती है।

दुर्खीम अपने प्रमुख ग्रन्थ में लिखता है कि प्रतिमानहीनता संबंध आत्महत्या सामाजिक विघटन के कारण होती है। जब सामाजिक संतुलन अचानक समाप्त हो जाता है तो सारी सामाजिक व्यवस्था असामान्य एवं अव्यवस्थित हो जाती है। ऐसे समय में समूह अपने सदस्यों को संगठित नहीं रख सकता। इसलिए ऐसी सामाजिक शून्यता में आत्महत्याएं अधिक होती है। उदहारण के लिए, भीषण आर्थिक परिवर्तन हो अर्थात् भीषण मन्दी हो या बहुत अधिक समृद्धि हो, उस समय लोगों का अभ्यस्त एवं सामान्य जीवन समाप्त हो जाता है और सामाजिक नियंत्रण शिथिल पड़ जाते हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति स्वतंत्र एवं नियम-रहित हो जाता है। इसमें वह आत्महत्या कर सकता है।

3. परार्थवादी आत्महत्या-दुर्खीम ने एक तीसरे प्रकार की आत्महत्या का और उल्लेख किया है। आत्महत्या के इस स्वरूप को उसने पराथ्र्ाी या परोपकारी आत्महत्या का नाम दिया है। इसके अन्तर्गत व्यक्ति आत्म बलिदान की भावना से प्रेरित होकर ऐच्छिक रूप से आत्महत्या करने पर उतारू हो जाता है। अपने आशय को स्पष्ट करते हुए दुर्खीम लिखता है कि परार्थवादी आत्महत्या में व्यक्ति अपने आपको इसलिए नहीं मारता है कि उसे ऐसा करने का अधिकार है, बल्कि वह ऐसा इसलिए करता है कि मरना उसका कर्तव्य है। सामाजिक अनादर से बचने के लिए वह ऐसा करता है। इस भांति स्पष्ट है कि परार्थवादी आत्महत्या वह होती है जो सामाजिक दबाव से की जाती है।

दुर्खीम लिखता है कि परार्थपरक आत्महत्या उस समय सम्भव हो सकती है जब किसी समाज में व्यक्ति एवं समूह के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। ऐसी दशा में व्यक्ति समाज के हित में पूर्णत: आत्मसात हो जाते हैं। ऐसा होने पर व्यक्ति की वैयक्तिक सत्ता की समाप्ति हो जाती है। वह केवल नाम रूप से समूह का एक सदस्य मात्र समझा जाता है। इस भांति जो व्यक्तित्व का महत्त्व कम हो जाता है तो परार्थवादी आत्महत्याओं की संख्या बढ़ जाती है।य् दुर्खीम के लिए परोपकारी या पराथ्र्ाी आत्महत्या उस कठोर एवं प्रबल सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति है, जिसमें समूह के हितों की तुलना में व्यक्ति का कोई महत्त्व नहीं होता। व्यक्ति के जीवन का मूल्य समूह के जीवन की तुलना में न्यून होता है। इस स्थिति में वह अपने आपको समूह के लिए न्यौछावर कर देता है और समय आने पर समूह के कल्याण के लिए स्वेच्छा से अपने प्राण दे देता है।

परार्थवादी आत्महत्या परोपकारी आत्महत्या कहलाती है। इसमें व्यक्ति अपने हित के लिए नहीं बल्कि समूह के हित के लिए स्वेच्छा से अपने प्राण दे देता है।

कर्त्तव्य एवं बलिदान की भावना आने पर व्यक्ति का पृथक व्यक्तित्व लोप हो जाता है। वह अपने आपको समाज की सेवा में पूर्णरूप से लगा देता है। उदाहरण के लिए एक सैनिक का युद्ध में अपने आपको देश की सेवा के लिए बलिदान कर देना। माता का अपने पुत्र की रक्षा के लिए बलिदान करना आदि परोपकारी आत्महत्याएं हैं। आदिम समाजों में भी व्यक्ति समूह के हित के लिए मरने को तैयार हो जाता था। ये सभी परोपकारी आत्महत्या के उदाहरण हैं। इस प्रकार की आत्महत्याएं इसलिए होती हैं कि व्यक्ति समूह में पूर्णरूप से संगठित है। वह समूह के नियंत्रण में हैं। ये आत्महत्याएं अत्यधिक सामाजिक एकीकरण के कारण होती हैं। अर्थात् जब स्वेच्छा से विभिन्न व्यक्तियों के स्वार्थों का पूर्णरूपेण एकीकरण हो जाता है।

दुर्खीम ने परार्थवादी आत्महत्या के प्रकारों की भी विवेचना की है। इस दृष्टि से उसने प्रथम, अनिवार्य परार्थवादी आत्महत्या का विवेचन किया है। यह आत्महत्या व्यक्ति पर समाज का अत्यधिक दबाव होने के कारण होती है। दुर्खीम ने इस सम्बन्ध में आदिम समाजों के कई उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। जब समाज गहन रूप से एकात्मक होता है, तब इस प्रकार की अनिवार्य आत्महत्याओं की संख्या अधिक होती है। दूसरी प्रकार की परार्थवादी आत्महत्या ऐन्द्रिक परार्थवादी आत्महत्या है। इस आत्महत्या में व्यक्ति पर समाज के दबाव की अनिवार्यता नहीं होती है। इस आत्महत्या का आधार सामाजिक प्रतिष्ठा है। समाज में ऐसी भी परिस्थितियां होती हैं जब व्यक्ति के समर्पण की औपचारिक मांग नहीं होती। परन्तु उस समर्पण को प्रशंसा की दृष्टि से देखा जाता है। 

भारत में सती-प्रथा का उदाहरण इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। सती होने के पीछे सामाजिक प्रतिष्ठा का भाव स्त्री को अपने पति की ज्वाला में स्वाहा होने की प्रेरणा देता है। इसके अतिरिक्त एक और प्रकार की आत्महत्या की चर्चा की जाती है, हालांकि दुर्खीम ने इसकी चर्चा अपनी पुस्तक में नहीं की है।

4. मरणांतक आत्महत्या (Fetalistic Suicide)-इस प्रकार की आत्महत्या प्रतिमानों की बहुत अधिक अधिकता या विद्यमानता के कारण होती है, जहाँ व्यक्ति नियमों या प्रतिमानों से इतना उद्वेलित हो जाता है कि वह आत्महत्या की स्थिति तक जा सकता है, जैसे-सैनिकों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या या जेलों में होने वाली आत्महत्या आदि।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि दुर्खीम ने आत्महत्या के विश्लेषण में सामाजिक कारकों को ही प्रधान माना है। इस प्रकार वह अपने इस सिद्धांत में भी अपने मूल सिद्धांत का पूर्णत: पालन करता है। उसका यह दृढ़ मत रहा है कि सामाजिक तथ्यों की व्याख्या सामजिक तथ्यों के द्वारा की जानी चाहिए। 

अपने इस अध्ययन का निष्कर्ष देते हुए दुर्खीम लिखता है, इन सभी तथ्यों का यही निष्कर्ष है कि सामाजिक आत्महत्या की दर की व्याख्या केवल समाजशास्त्रीय ढंग से ही की जा सकती है। किसी भी क्षण समाज का नैतिक विधान ऐच्छिक मृत्युओं के लिए अवसर निश्चित कर सकता है। इसलिए मनुष्यों को आत्मविनाश के लिए प्रेरित करने के हेतु प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक निश्चित मात्रा में शक्तिशाली सामूहिक शक्ति संयुक्त रूप में पाई जाती है।

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