हिंदी कहानी का उद्भव एवं विकास

मानव के आदि काल से कहानी कहने, सुनने, सुनाने की प्रवृत्ति चली आ रही है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में कहानी का महत्व प्राय: देशों में है। भारतीय वांगमय में वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश तथा पुरानी हिंदी में किसी न किसी स्वरूप में कहानी विद्यमान है, इसके अतिरिक्त पुराणों, उपनिषदों, ब्राह्मणों, रामायण, महाभारत, पालि जातक, तथा पंचतंत्र आदि में कहानियों का भंडार भरा पड़ा है। इन सभी कहानियों में उपदेशात्मक अथवा धार्मिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। आधुनिक अर्थ में इन्हें कहानी नहीं कहा जा सकता है।

कहानी शब्द की व्याख्या

‘कहानी’ शब्द संस्कृत कथानिका प्राकृत कहाणिआ, सिंहली-मराठी कहानी से विकसित हुआ है जिसका अर्थ मौखिक या लिखित कल्पित या वास्तविक, तथा गद्य या पद्य में लिखी हुई कोई भाव प्रधान या विषय प्रधान घटना, जिसका मुख्य उद्देश्य पाठकों का मनोरंजन करना, उन्हें कोई शिक्षा देना अथवा किसी वस्तु स्थिति से परिचित कराना होता है। इसका अंग्रेजी पर्याय ‘स्टोरी’ है।

आधुनिक हिंदी कहानी का प्रारंभ उन्नीसवीं सदी में हुआ जिसे कहानी या कथा कहते हैं इसका शाब्दिक अर्थ ‘कहना’ है। इस अर्थ के अनुसार जो कुछ भी कहा जाये कहानी है। किंतु विशिष्ट अर्थ में किसी विशेष घटना के रोचक ढंग से वर्णन को ‘कहानी’ कहते हैं। ‘कथा’ एवं ‘कहानी’ पर्यायवाची होते हुए भी समानाथ्र्ाी नहीं हैं। दोनों के अर्थों में सूक्ष्म अंतर आ गया है। कथानक व्यापक अर्थ की प्रतीति कराता है इसमें कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी आदि का समावेश हो जाता है। कथा साहित्य के अंतर्गत मुख्य रूप से कहानी एवं उपन्यास को ही माना जाता है जबकि कहानी के अंतर्गत कहानी और लघु कथाएं ही आती हैं। यूरोप में विकसित कहानी का स्वरूप अंग्रेजी और बंगला के माध्यम से बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भारत आया। प्राचीन कहानी एवं आधुनिक कहानी के स्वरूप में पर्याप्त अंतर है। आधुनिक कहानी जनसाधारण मनुष्य जीवन से संबंधित लौकिक यथार्थवादी, विचारात्मक धरती के सुख तक सीमित है।

हिंदी की प्रथम कहानी

हिंदी की प्रथम कहानी किसे माना जाए इस विषय में पर्याप्त मतभेद है। लगभग दर्जन भर कहानियां प्रथम कहानी की होड़ में सम्मिलित हैं जिन्हें आलोचक मान्यता प्रदान करते हैं।

सन् 1803 ई. में लिखी गई, हिंदी गद्य में कहानी शीर्षक से प्रकाशित होने वाली प्रथम रचना ‘रानी केतकी की कहानी’ है। इस कहानी के लेखक इंशा अल्ला खां हैं। डॉ. राम रतन भटनागर ने ‘रानी केतकी की कहानी’ को हिंदी प्रथम कहानी स्वीकारा है। किंतु इसकी संयोग बहुलता, अतिमानवीयता के कारण इसे प्रथम कहानी के रूप में नहीं स्वीकारा जा सकता है क्योंकि ये विशेषताएं आधुनिक कहानी में क्षम्य नहीं है। इसके विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन समीचीन प्रतीत है कि यह नई परंपरा की प्रारंभिक कहानी नहीं है, बल्कि मुस्लिम प्रभावापन्न परंपरा की अंतिम कहानी है।

डॉ. बच्चन सिंह ने किशोरी लाल गोस्वामी कृत ‘प्रणायिनी परिणय’ (सन् 1887 ई.) को हिंदी की प्रथम कहानी माना है जबकि स्वयं इसके लेखक ने इसे उपन्यास कहा है। कारण यह बताया गया है कि सन् 1900 ई. तक कथा साहित्य को उपन्यास कहने की परिपाटी थी। इसलिए यह भी प्रथम कहानी नहीं है। क्योंकि इसका विभाजन सात निष्कों में किया गया है। प्रत्येक निष्क को अलग खंड मान लेने पर कहानी कई खंडों में विभक्त प्रतीत होती है। इस तरह खंडों में विभाजित कर कहानी लिखने की परिपाटी चलती रही है। प्रत्येक निष्क या खंड के प्रारंभ में श्लोक बद्ध नीति कथन हैं जो कहानी के रूप विन्यास में बाधक सिद्ध होते हैं। इस कहानी के रूप बंध पर आख्यान पद्धति का पूर्ण प्रभाव हैं। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली में केन्द्रीय भाव प्रगाढ़ प्रेम की सुखद परिणति दिखलाई गई है।

रैवरेंट जे. न्यूटन कृत ‘जमींदार का दृष्टांत’ तथा अनाम ‘छली अरबी की कथा’ नामक दो कहानियां अलीगढ़ से प्रकाशित ‘शिलापंख’ मासिक के ‘कल की कहानी’ स्तंभ में प्रकाशित देखकर यह अनुमान लगाया किंचित ये ईसाई धर्म प्रचार हेतु लिखी गई है। ‘शिलापंख’ के संपादक राजेंद्र गढ़वालिया ने सन् 1871 ई. में प्रकाशित इस कहानी को अब तक प्राप्त कहानियों में प्राचीनतम माना है। प्राचीनतम होकर भी प्रथम कहानी नहीं क्यों धर्म प्रचार हेतु लिखी गई है।

डॉ. सुरेख सिन्हा गोस्वामी कृत ‘इन्दुमती’ को प्रथम कहानी मानने पर बल देते हुए लिखा है, “प्रथम कहानी का निर्धारण समय क्रम से होना चाहिए न कि कथानक, शिल्प, विचार धारा, या अन्य किसी दृष्टिकोण से।”

‘रानी केतनी की कहानी’ के पश्चात राजा शिव प्रसाद सितारे हिंद कृत ‘राजा भोज का सपना’; भारतेंहु हरिश्चन्द्र कृत ‘अद्भुत अपूर्व स्वप्न’ का उल्लेख किया जा सकता है जिसमें कहानी की सी रोचकता विद्यमान है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आधुनिक ढंग की कहानियों का आरंभ ‘सरस्वती पत्रिका’ के प्रकाशन काल से स्वीकारा है। ‘सरस्वती’ में प्रकाशित कहानियां इस प्रकार हैं-
  1. इंदुमती - किशोरी लाल गोस्वामी (1900 ई.)
  2. गुलबहार - किशोरी लाल गोस्वामी (1902 ई.)
  3. प्लेग की चुडैल - मास्टर भगवान दास (1902 ई.)
  4. ग्यारह वर्ष का समय - राम चन्द्र शुक्ल (1903 ई.)
  5. पंडित और पंडितानी - गिरजादत्त बाजपेयी (1903 ई.)
  6. दुलाई वाली - बंग महिला (1907 ई.)
ये सभी कहानियां ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई थीं। इस प्रकार प्रथम कहानीकार किशोरी लाल गोस्वामी तथा प्रथम कहानी ‘इंदुमती’ प्रमाणित होती है। ‘इंदुमती’ की चर्चा प्राय: प्रत्येक समीक्षक ने की है। इस पर टेम्पेस्ट की छाया मानकर इस की मौलिकता पर भी प्रश्न चिह्न लगा दिया। रामचन्द्र शुक्ल ‘इंदुमती’ को ही प्रथम कहानी मानते हैं।

रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, “यदि ‘इंदुमती’ किसी बंगला कहानी की छाया नहीं है तो हिंदी की यही पहली मौलिक कहानी ठहरती है इसके उपरांत ‘ग्यारह वर्ष का समय’ और ‘दुलाईवाली’ का नंबर आता है।”

सुरेश सिन्हा को शुक्ल के कथन में चालाकी की गंध आती है। उन्हें लगता है कि इंदुमती को अनूदित करार देकर अपनी कहानी ‘ग्यारह वर्ष का समय’ को प्रतिष्ठित करना चाहते थे। किंतु यह प्रमाणित हो चुका है कि ‘इंदुमती’ मौलिक रचना नहीं है। डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल शिल्प की दृष्टि से रामचन्द्र शुक्ल कृत ‘ग्यारह वर्ष का समय’ (सन् 1903) हिंदी की प्रथम कहानी है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी इसे आधुनिकता के लक्षण से युक्त माना है।

देवी प्रसाद वर्मा, ओंकार शरद और देवेश ठाकुर आदि समीक्षकों ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित माधव राव सपे्र कृत ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ (सन् 1901) को हिंदी की प्रथम कहानी का श्रेय दिया है। देवेश ठाकुर के अनुसार काल क्रमानुसार अपने समय के यथार्थ परिवेश से जुड़ी है। शिल्प की दृष्टि से सहजता, सरलता तथा भाषा की शुद्धता इसमें है। अत: जब तक इस दिशा में और अधिक शोध न हो जाए मान लेना चाहिए कि माधव राव सपे्र कृत ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ हिंदी की प्रथम कहानी है। आर्थिक चेतना की कहानी होने के कारण यह आधुनिक अर्थमूला कहानियों की पहचान की पहली हिंदी कहानी है। ‘दुलाईवाली’ (सन् 1907 ई.) को यथार्थवादी चित्रण की सर्वप्रथम रचना माना है। किंतु वंग महिला का नाम नहीं ज्ञात है।

प्रो. वासुदेव ‘इंदु’ में प्रकाशित ‘ग्राम’ (1911 ई.) को हिंदी की पहली कहानी का गौरव प्रदान करते हैं। प्रसाद की यह पहली कहानी है।

शिवदान सिंह चौहान के विचार में हिंदी कहानी का श्रीगणेश प्रसाद और प्रेमचन्द से माना जाना चाहिए। राजेन्द्र यादव चन्द्रधर शर्मा गुलेरी कृत - ‘उसने कहा था’ (1916) को हिंदी की पहली मौलिक कहानी मानते हुए इसी से आधुनिक हिंदी कहानी का श्रीगणेश मानना चाहिए अब तक ‘दुलाई वाली’ को ही प्रथम कहानी माना जाता है। ‘जमींदार का दृष्टांत’ ( 1871 ई.) को अंग्रेजों की लिखी कहानी को प्रथम श्रेय नहीं मिलना चाहिए।

‘दुलाईवाली’ या ‘ग्यारह वर्ष का समय’ को हिंदी की प्रथम कहानी का श्रेय मिलना श्रेयस्कर है।

हिंदी कहानी का विकास

हिंदी कहानी के विकास में प्रेम चन्द केन्द्र बिन्दु हैं जिन्हें आधार बनाकर प्रेम चन्द पूर्वोत्तर, प्रेमचन्द, प्रेमचन्द परवर्ती युग के विभाग द्वारा संपूर्ण कहानी काल का विवेचन किया जाता रहा है। यह कहना कि प्रसाद का महत्व खो जाता है उनका युग नहीं बन पाता है। वे मूलतः कवि हैं उनका युग माना जा सकता है माना जाए। चरणों में अध्ययन वैज्ञानिक न होते भी आसान है किंतु सन् 1950 ई. से आज तक एक ही चरण नहीं माना जाना चाहिए। लगभग पांच चरणों में कहानी के विकास को विभाजित किया जाना श्रेयस्कर प्रतीत होता है।
  1. प्रथम चरण (सन् 1870 - 1915 ई.)
  2. द्वितीय चरण (सन् 1916 - 1935 ई.)
  3. तृतीय चरण (सन् 1936 - 1955 ई.)
  4. चतुर्थ चरण (सन् 1956 - 1975 ई.)
  5. पंचम चरण (सन् 1976 से आज तक)

प्रथम चरण (सन् 1870-1915 ई.)

हिंदी का प्रारंभिक कहानियों के विषय में डॉ. रामदरश मिश्र का कथन सत्य है कि इनमें यथार्थ समर्थित आदर्श की व्यंजना लक्ष्य रूप में विद्यमान है। ‘इंदुमति’, ‘दुलाई वाली’, ‘ग्यारह वर्ष का समय’, ‘जमींदार का दृष्टांत’, ‘प्रणयिनी परिणय’, ‘छली अरब की कथा’ तथा ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ आदि प्रमुख कहानियां हैं। जमींदार का दृष्टांत तथा प्रणयिनी परिणय में परोपकारी भावना का चित्राण किया गया है। ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ की परिणति परहित में हुई है। ‘जमींदार का दृष्टांत’ में महाजन कृषकों की परेशानी से अवगत होकर सोचता है कि मेरे पास अपार धन दौलत है। इनके आर्थिक संकट का निवारण मैं कर सकता हूं। ‘प्रणयिनी परिणय’ में राजाराम शास्त्री की सहायता करता है। परोपकारी वृत्ति के आदर्श के साथ राज्य कर्मचारियों की धन लिप्सा के यथार्थ की ओर भी संकेत किया गया है - “ऐसी चपलता, क्या राज्य कर्मचारी ऐसे-ऐसे भयंकर लालच से बच सकते हैं? फिर तब क्या अनर्थ न्यून होने की संभावना हो सकता है? यदि इस समय मैं न होता तो इधर न्यायाधीश अवश्य ही घूस लेकर इसे छोड़ देते।” ‘ग्यारह वर्ष का समय’ में प्रेम के आदर्श की अभिव्यक्ति हुई है - इस अदृष्ट प्रेम का कर्म और कर्त्तव्य से घनिष्ठ संबंध है। इसकी उत्पत्ति केवल सदाशय और नि:स्वार्थ हृदय में ही हो सकती है।

इस कालावधि की अधिकांश कहानियों में भावुकता और संयोग का बाहुल्य दृष्टिगोचर होता है। ‘ग्यारह वर्ष का समय’ में दीर्घ काल के उपरांत पति पत्नी का मेल एकाएक एक टूटे फूटे निर्जन भवन में हो जाता है। ‘इंदुमती’ में भी संयोग से ही चन्द्रशेखर इंदुमती का अतिथि बन जाता है। राधिका रमण सिंह कृत ‘कानों में कंगना’ में गहरी भावुकता के दर्शन होते हैं। अधिकांश कहानियां अंग्रेजी एवं बंगला कहानियों से प्रभावित हैं। कहानी शिल्प अति अव्यवस्थित है मात्रा ‘छली अरब की कथा’ और ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ शिल्प की दृष्टि से कसी हुई कहानियां हैं। यद्यपि इन कहानियों का महत्व नहीं है। इतना अवश्य है कि अब तक कहानीकारों के एक मंडल का गठन हो चुका था तथा पत्रा पित्राकाओं के माध्यम से कहानी एक लोकप्रिय विधा का रूप धारण करती जा रही थी।

द्वितीय चरण (सन् 1916-1935 ई.)

प्रेमचन्द-

द्वितीय चरण को कहानी की प्रेमचन्द की अपूर्व देन के कारण प्रेमचन्द युग कहा जाता है। मुंशी प्रेमचन्द द्वारा रचित कहानियों की संख्या लगभग तीन सौ से अधिक है जो मान सरोवर के आठ भागों में संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त इनकी कहानियों के संग्रह ‘सप्तसरोज’, ‘नव निधि’, ‘प्रेम पचीसी’, ‘प्रेम पूर्णिमा’, ‘प्रेम द्वादशी’, ‘प्रेम तीर्थ’, तथा ‘सप्त सुमन’ आदि हैं। प्रेमचन्द पहले उर्दू में लिखते थे। उनका उर्दू में लिखा हुआ प्रसिद्ध कहानी संग्रह सोचे वतन सन् 1907 ई. में प्रकाशित हुआ था जो स्वातंत्रय भावनाओं से ओत-प्रोत होने के कारण अंग्रेजी सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था। सन् 1919 ई. में उनकी हिंदी रचित प्रथम कहानी ‘पंच परमेश्वर’ प्रकाशित हुई। उनकी कहानियों में इसके अतिरिक्त ‘आत्माराम’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘रानी सारंघा’, ‘वज्रपात’, ‘अलग्योझा’, ‘ईदगाह’, ‘पूस की रात’, ‘सुजान भक्त’, ‘कफन’, ‘पंडित मोटे राम’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। प्रेमचन्द की कहानियों में जन साधारण के जीवन की सामान्य परिस्थितियों, मनोवृत्तियों एवं समस्याओं का मार्मिक चित्राण हुआ है। वे साधारण से साधारण बात को भी मर्मस्पश्र्ाी रूप में प्रस्तुत करने की कला में निपुण कहानीकार थे। उनकी शैली सरल स्वाभाविक एवं रोचक है। जो पाठक के हृदय पर सीधा प्रहार करती है। उनकी सभी कहानियां सोद्देश्य हैं - उनमें किसी न किसी विचार या समस्या का अंकन हुआ है किन्तु इससे उनकी रागात्मकता में कोई न्यूनता नहीं आई है। भाव-विचार, कला-प्रचार का सुंदर समन्वय किस प्रकार किया जा सकता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रेम चंद का कहानी साहित्य है। द्वितीय चरण में हिंदी कहानी दो विशिष्ट धाराओं में विभक्त होकर चलती है-

1. प्रथम धारा व्यक्ति हित या व्यक्ति सत्य के भावात्मक अंकन की है, जिसके सर्वप्रथम प्रमुख कहानीकार जयशंकर प्रसाद हैं और रायकृष्ण दास, विनोद शंकर व्यास तथा चतुरसेन शास्त्री इस परंपरा को अग्रसर करने वाले सहयोगी हैं। 

2. द्वितीय धारा के विषय में डॉ. इंद्रनाथ मदान का कथन है “हिंदी कहानी के विकास की दूसरी दिशा जिसमें समष्टि-सत्य की संवेदना है, समष्टि - विकास की संचेतना है, समष्टि मंगल की भावना है, समष्टि यथार्थ को आत्मसात करने की प्रेरणा है, प्रेम चन्द के कहानी साहित्य से आरंभ होती है।” प्रेमचन्द के समसामयिक कहानीकार सुदर्शन और विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक प्रेमचन्द की कथा दृष्टि का समर्थन करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं।

प्रेमचन्द और उनके सहयोगी कहानीकारों में समकालीन यथार्थ की आदर्शात्मक परिणति मिलती है। अपनी कहानी यात्रा के अंतिम चरण में प्रेमचंद ने स्वयं को आदर्श के मोह से अलग कर दिया था लेकिन सुदर्शन, विश्वंभर नाथ शर्मा ‘कौशिक’ ज्वाला दत्त शर्मा आदि बराबर आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहानियां लिखते रहे। इस दृष्टि से कौशिक की ‘रक्षा बंधन’, ‘सुदर्शन की एलबम’, ‘हार जीत’ और ‘एथेन्स का सत्याथ्र्ाी’ उल्लेखनीय कहानियां हैं। प्रेमचन्द की कहानी यात्रा के तीन मोड़ माने जा सकते हैं।

1. ‘पंच परमेश्वर’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘नमक का दरोगा’ आदि प्रारंभिक कहानियों में उनका आग्रह पुरातन आदर्शों को प्रतिष्ठित करता प्रतीत होता है। इन कहानियों में उपदेश का प्रच्छन्न स्वर सुनाई देता है।

2. सन् 1920-30 ई. के मध्य लिखी गई गांधी वादी विवाद धारा सतह पर है।

3. ‘मैकू’, ‘शेख नाद’, ‘दुर्गा मन्दिर’, ‘सेवा मार्ग’ आदि कहानियों में प्रेम चन्द स्थूल कथात्मकता को छोड़कर यथार्थ को विश्लेषण और संकेत के स्तर पर ग्रहण करते दिखाई देते हैं। डॉ. बचन कुमार सिंह के अनुसार, “चरित्रों के चित्रण में मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मताओं का समावेश भी उनमें आ गया है। नाटकीयता तथा व्यंग्य के पैनेपन के कारण उसमें जीवंतमयता और प्रभान्विति की घनता आ गई है। ‘नशा’, ‘पूस की रात’ और ‘कफन’ आदि कहानियां प्रेम चन्द की कहानी कला के अंतिम चरण की है। यहां तक आते-आते प्रेम चन्द अपनी सारी आस्थाओं का परित्याग कर देते हैं और जीवन के प्रति उनकी दृष्टि अधिक तीखी और निर्मम हो गई है। इन कहानियों में जो सूक्ष्मता और सांकेतिकता विद्यमान है वह ‘नई कहानी’ की अच्छी कहानियों में भी नहीं है। यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि हिंदी कहानी का विकास प्रेमचन्द द्वारा संकेतित दिशा में ही हुआ है।

प्रेमचन्द की कहानियों में जहां एक ओर युग का सच्चा चित्राण है, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संदर्भों के विश्लेषण की कोशिश है वहीं दूसरी ओर प्रेम, सहानुभूति, तपस्या, सेवा आदि महनीय मूल्यों का जोरदार समर्थन उनमें है। अधिकांश कहानियों में प्रेम चंद ने जन साधारण के जीवन को उसी की भाषा में उपस्थित किया है। वे संभवत: पहले कहानीकार हैं जिनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन अपनी समूची शक्ति और सीमा के साथ उभरा है। डॉ. भगवत स्वरूप मिश्र ने लिखा है, “मानव स्वभाव के परिचय, युगबोध, विषय क्षेत्रा के विस्तार, कहानी कला के उत्कर्ष आदि की दृष्टि से प्रेमचन्द स्कूल का एक भी कहानीकार प्रेमचन्द की गरिमा को नहीं पहुंच सका।”

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद की प्रथम कहानी ‘ग्राम’ सन् 1911 ई. में ‘इंदु’ में प्रकाशित हुई और जीवनपर्यंत उन्होंनके कुछ 69 कहानियां लिखीं। देवेश ठाकुर का कथन है, “प्रसाद जी पहले कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी को बंगला, अंग्रेजी तथा फ्रेंच अनुवादों सें मुक्त कर, उसके स्वरूप को मौलिकता और स्थिरता प्रदान की।” इसी आधार पर कुछ आलोचक प्रसाद को प्रथम कहानीकार तथा उनकी कहानी ‘ग्राम’ को प्रथम कहानी मानते हैं। प्रसाद की कहानियों की विशिष्टता उनके पात्रों के अंतर्द्वन्द्व उद्घाटन, काव्यात्मक अभिव्यक्ति और कहानी के मार्मिक अंत में निहित है, यद्यपि कविता और नाटक का शिल्प कभी कहानी में प्रमुख हो उठता है और उसकी संरचना में गड़बड़ी पैदा करता है।

प्रसाद की कहानियों में वस्तुगत वैविध्य बिलकुल न हो, ऐसा नहीं है। ‘पुरस्कार’, ‘दासी तथा गुंडा’ आदि में इतिहास का प्रयोग किया गया है जबकि ‘मछुआ बड़ा’ और ‘छोटा जादूगर’ में सामाजिक विषमता को उभारा गया है। अधिकतर कहानियों में कथा सूत्रा की क्षीणता दृष्टिगोचर होती है। लेकिन ‘दासी’ एवं ‘सालवती’ आदि कहानियों में अनावश्यक अंश भी कम नहीं है। भावुकता की स्फीति कहानी को प्रतिघातित करती है। इन दोषों के होते हुए भी प्रसाद की कथन भंगिमा और चारिित्राक सृष्टि कहानियों को अविस्मरणीय बना देती है। प्रसाद का शिल्प प्राय: ‘ग्राम’ कहानी से लेकर ‘सालवटी’ तक एक समान रहा है और इसका अनुकरण नहीं हो पाया है। प्रसाद की शैली में लिखी गई हृदयेश और विनोद शंकर व्यास की अनेक कहानियां असफल रही हैं। उनके शिल्प के संबंध में डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल ने लिखा है, “हिन्दी कहानी साहित्य में प्रसाद जी एक ऐसे कहानीकार हैं जिनकी कहानी भावों की अनुवर्तिनी रही है। शिल्प की अनुवर्तिनी नहीं।”

विश्वंभर नाथ शर्मा ‘कौशिक’

विश्वंभर नाथ शर्मा ‘कौशिक’ (सन् 1891 - 1946 ई.) उर्दू से हिंदी में आने वाले प्रेमचंद युगीन कहानीकार हैं। उनकी प्रथम कहानी ‘रक्षाबंधन’ सन् 1913 ई. में प्रकाशित हुई थी। विचारधारा की दृष्टि से कौशिक प्रेमचन्द की परंपरा में आते हैं। उन्होंने समाज सुधार को कहानी का लक्ष्य बनाया। उनकी कहानियों की शैली अत्यंत सरस, सरल एवं रोचक है। उनकी हास्य एवं विनोद से भरी हुई कहानियां ‘चांद’ में ‘दुबे जी की चिट्ठियां’ के रूप में प्रकाशित हुई थीं। उन्होंने लगभग 300 कहानियां लिखीं। जो ‘कल्पमंदिर’, ‘चित्रशाला’ आदि में संग्रहीत हैं।

आचार्य चतुर सेन शास्त्री

आचार्य चतुर सेन शास्त्राी ने अपनी कहानियों में सामाजिक परिस्थितियों का चित्राण किया है। उनकी कहानियों के संग्रह ‘रजकण’ और ‘अक्षत’ आदि प्रकाशित हुए हैं। उनकी प्रमुख कहानियां में ‘दुखवा मैं कासे कहूं मोरी सजनी’, ‘दे खुदा की राह पर’, ‘भिक्षुराज’ तथा ‘ककड़ी की कीमत’ विशेष उल्लेखनीय हैं।

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

प्रेमचन्द युगीन कहानीकारों में मात्रा तीन कहानी लिखकर ख्याति प्राप्त करने वाले चंद्रधर शर्मा गुलेरी हैं। हिंदी कहानी साहित्य में इनका बहुत ऊँचा स्थान है। उनकी प्रथम कहानी ‘उसने कहा था’ सन् 1915 में प्रकाशित हुई थी जो अपने ढंग की अनूठी रचना है। इसमें किशोरावस्था के प्रेमांकुर का विकास, त्याग, और बलिदान से ओत-प्रोत पवित्रा भावना के रूप में किया गया है। कहानी का अंत गंभीर एवं शोकप्रद होते हुए भी इसमें हास्य एवं व्यंग्य का समन्वय इस ढंग से किया गया है कि उसमें मूल स्थायी भाव को कोई ठेस नहीं पहुंचती है। विभिन्न दृश्यों के चित्रण में सजीवता, घटनाओं के आयोजन में स्वाभाविकता एवं शैली की रोचकता सभी विशेषताएं एक से बढ़कर एक हैं। कहानी की प्रथम पंक्ति ही पाठक के हृदय को पकड़कर बैठ जाती है और जब तक वह पूरी कहानी को पढ़ नहीं लेता है उसे छोड़ती नहीं है तथा जिसने एक बार कहानी पढ़ लिया वह ‘उसने कहा था’ वाक्य को आजीवन विस्मृत नहीं कर पाता है। भाव, विचार, शिल्प तथा शैली आदि सभी दृष्टियों से यह कहानी एक अमर कहानी है। गुलेरी की दूसरी कहानी ‘सुखमय जीवन’ भी पर्याप्त रोचक एवं भावोत्तेजक है। इसमें एक अविवाहित युवक के द्वारा विवाहित जीवन पर लिखी गई पुस्तक को लेकर अच्छा विवाद खड़ा किया गया है। जिसकी परिणति एक अत्यंत रोचक प्रसंग में हो जाती है। ‘बुद्धू का कांटा’ भी अच्छी कहानी है।

पं. बद्रीनाथ भट्ट ‘सुदर्शन’

सुदर्शन का जन्म सन् 1896 ई. में हुआ था। कहानी कला में इनका महत्व कौशिक के समान स्वीकारा गया है। इनकी प्रथम कहानी ‘हार की जीत’ ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई थी। तब से अनेक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जैसे ‘सुदर्शन सुधा’, ‘सुदर्शन सुमन’, ‘तीर्थ यात्रा’, ‘पुष्प लता’, ‘गल्प मंजरी’, ‘सुप्रभात’, ‘नगीना’, ‘चार कहानियां’, तथा ‘पनघट’ आदि। उन्होंने अपनी कहानियों में भावनाओं एवं मनोवृत्तियों का चित्राण अत्यंत सरल एवं रोचक शैली में किया है।

पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’

उग्र का हिंदी कहानी जगत में प्रवेश सन् 1922 ई. में हुआ। उग्र की उग्रता को परिलक्षित आलोचकों ने उन्हें ‘उल्कापात’, ‘धूमकेतु’, ‘तूफान’ तथा ‘बवंडर’ आदि नामों से विभूषित किया। इसी से आपकी विद्रोही प्रवृत्ति का अनुमान लगाया जा सकता है जिसको ऐसी ऐसी उपमाएं या उपाधियां मिली हों उसकी कहानी कला कैसी होगी? सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उनकी कहानियों ‘वीभत्स’ एवं ‘कुरूपता’ को भी स्थान मिल गया है किन्तु उग्र का उद्देश्य जीवन की कुरूपता का प्रचार करना नहीं था अपितु कुरूपता का समूल अंत करना था। उनके कहानी संग्रह ‘दोजख की आग’, ‘चिंगारियां’, ‘बलात्कार’ तथा ‘सनकी अमीर’ आदि प्रकाशित है।

ज्वालादत्त शर्मा

ज्वालादत्त शर्मा ने बहुत कम कहानियां लिखी हैं किन्तु हिन्दी जगत ने उनका अच्छा स्वागत किया है। उनकी कहानियों में ‘भाग्य चक्र’ तथा ‘अनाथ बालिका’ आदि उल्लेखनीय हैं।
इन कहानीकारों के अतिरिक्त द्वितीय चरण के अन्य कहानीकार रामकृष्ण दास, विनोद शंकर व्यास के नाम भी उल्लेखनीय हैं।

तृतीय चरण (सन् 1936-1955 ई.)

हिंदी कहानी का तृतीय चरण जैनेंद्र के आगमन से आरंभ होता है। तृतीय चरण की कहानियों को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।
  1. व्यक्ति - सत्य का उद्घाटन, मनोवैज्ञानिक धारणाओं के संदर्भ में करने वाली कहानियां - जिनका प्रतिनिधित्व जैनेन्द्र, अज्ञेय, इलाचन्द्र जोशी, भगवती प्रसाद वाजपेयी और पहाड़ी आदि कहानीकार करते हैं।
  2. समाज सापेक्ष- इस वर्ग की कहानियों का समाज सापेक्ष प्रश्नों से संबंध है। इस वर्ग के प्रमुख कहानीकार यशपाल, रांगेय राघव, भैरवप्रसाद गुप्त, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ और अमृत राय हैं।
  3. व्यक्ति सत्य-समष्टि सत्य- इस वर्ग में वे कहानीकार आते हैं जो व्यक्ति सत्य तथा समष्टि सत्य दोनों को सुविधानुसार अपनी कहानियों का आधार बनाते हैं। अश्क और भगवती चरण वर्मा आदि इसी वर्ग में आते हैं।

जैनेन्द्र कुमार

जैनेन्द्र कुमार ने स्थूल समस्याओं को कहानी का विषय न बनाकर सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विषयों को कहानी का विषय बनाया। उन्होंने हिन्दी कहानी को एक नवीन अंतदर्ृष्टि, संवेदनशीलता एवं दार्शनिक गहनता प्रदान की। सामान्य मानव की सामान्य परिस्थितियों को न लेकर असामान्य मानव की असामान्य परिस्थितियों से प्रभावित मानसिक प्रक्रियाओं का व्यापक विश्लेषण किया है। उनका दृष्टिकोण समष्टिगत न होकर व्यष्टिगत था, भौतिकवाद की अपेक्षा आध्यात्मिक वाद था। उनके पास विषय सामग्री का अभाव दृष्टिगोचर होता है। इसलिए प्रत्येक रचना में एक ही तथ्य का पिष्टपेषण करते हुए दिखलाई पड़ते हैं। घटनाओं की अपेक्षा उन्होंने चरित्रा-चित्राण तथा शैली को अधिक महत्व दिया है। इनकी कहानियों के संग्रह ‘वातायन’, ‘स्पर्धा’, ‘पाजेंब’, ‘फांसी’, ‘एक रात’, ‘जयसंधि’ तथा ‘दो चिड़िया’ आदि हैं।

जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’

जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ ने अपनी कहानियों में करुण रस की अभिव्यक्ति मौलिक ढंग से की है। उनके कहानी संग्रह ‘किसलय’, ‘मृदुल’ तथा ‘मधुमयी’ आदि प्रकाशित हुए हैं। इनकी कहानियों में मार्मिकता का हृदय ग्राºय रूप मिलता है। इसलिए इनकी कहानियों का स्थान अत्यधिक ऊंचा है।

चंडीप्रसाद ‘हृदयेश’

चंडी प्रसाद हृदयेश का दृष्टिकोण आदर्शवादी था। उनकी कहानियों में सेवा, त्याग, बलिदान तथा आत्म शुद्धि आदि की उच्च भावनाओं का चित्राण किया गया है। उनमें भावुकता की प्रधानता है। उनकी कहानी के संग्रह ‘नंदन निकुंज’ तथा ‘वनमाला’ आदि नामों से प्रकाशित हुए हैं।

गोविंद वल्लभ पंत

गोविंद वल्लभ पंत की कहानियों में यथार्थ की कटुता तथा कल्पना की रंगीनी का दिव्य समन्वय मिलता है। उनमें प्रणय-भावनाओं का चित्राण अति मधुर रूप में किया गया है।

सियाराम शरण गुप्त

सियाराम शरण गुप्त ने कविता की तरह कहानी क्षेत्रा में भी अच्छी सफलता प्राप्त की है। उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी ‘झूठ-सच’ है जिसमें आधुनिक युगीन यथार्थ वादी लेखकों पर तीखा व्यंग्य किया है। कहानी कला की दृष्टि से भी यह कहानी अद्वितीय है। उनकी कहानियों का संग्रह ‘मानुषी’ है।

वृंदावन लाल वर्मा

वृंदावन लाल वर्मा ने कहानी की अपेक्षा उपन्यास के क्षेत्रा में अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की है। उनकी कहानियों में भी कल्पना एवं इतिहास का समन्वय मिलता है। इनकी कहानियों का संग्रह ‘कलाकार का दंड’ है। वर्मा की शैली में सरलता एवं स्वाभाविकता होती है।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

अज्ञेय की कहानियां अभिजात्य बौद्धिकता द्वारा लिखी गई मनोवैज्ञानिक कहानियां हैं। कथ्यगत विविधता के होते हुए भी इन कहानियों का अनुभव सांसारिक, व्यक्तिगत तथा अत्यधिक सीमित है। मनोविज्ञान के सिद्धांतों का स्मरण और सचेत रूप से केन्द्रित करने का आग्रह भी ‘कड़ियां’, ‘पुलिस की सीटी’, ‘लेटर बॉक्स’, ‘हीलोबीन बतखें’ आदि कुछ कहानियोंं में अत्यधिक मुखर हो उठा है। डॉ. रामदरश मिश्र का कथन है, “अज्ञेय का गरिष्ठ व्यक्तित्व उनकी कहानियों को एक निजता प्रदान करता है।

इस निजता की बनावट बड़ी जटिल है। इसीलिए इनकी कहानियों में लेखक की वैचारिकता, अनुभव, अध्ययन, तटस्थता, मानवीय प्रतिबद्धता आदि का बड़ा ही जटिल सहअस्तित्व दिखाई पड़ता है। इस जटिल सहअस्तित्व का परिणाम शुभ-अशुभ दोनों है। एक ओर वे इसके चलते ‘रोज’ जैसी अच्छी कहानी लिखने में समर्थ एवं सफल सिद्ध हुए हैं, वहीं दूसरी ओर घोर बौद्धिकता से परिपूर्ण रचनाएं भी उन्हेांने की हैं। ‘रोज’ में एक रस और यांत्रिक ढंग से जीवन जीने का संदर्भ अति सहजता किंतु तीखेपन के साथ चित्रित हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि अज्ञेय मनोविज्ञान के किसी सिद्धांत के प्रतिपादन हेतु कहानी लिख रहे हैं।

यशपाल, रांगेय राघव, अमृत लाल नागर एवं बेचन शर्मा ‘उग्र’ सामाजिक समस्याओं का समाधान प्राप्त करना तथा उसी में जूझते रहने का क्रियाकलाप करने का श्रीगणेश मुंशी प्रेमचंद ने किया था। सामाजिक समस्याओं का समाधान प्राप्त करने में यशपाल, रांगेय राघव, अमृतलाल नागर एवं बेचन शर्मा ‘उग्र’ उनके अनुगामी रहे हैं।

यशपाल

यशपाल सामाजिक प्रश्नों एवं समस्याओं को माक्र्सवादी जीवन दृष्टि के माध्यम से देखते हैं क्योंकि वे माक्र्सवादी कामरेड था। साम्यवाद को प्रधानता देते थे। सन् 1936 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। जिसने तत्कालीन रचनाकारों पर अपना प्रभाव डालना प्रारंभ कर दिया तथा प्रगतिशील रचनाएं सामने आने लगीं।

यशपाल इन प्रतिबद्ध रचनाकारों में अग्रगण्य थे। यशपाल का अनुभव संसार अति व्यापक तथा वैविध्यपूर्ण है। एक ओर मध्यवर्गीय जीवन की विसंगति, असहायता और यातना को व्यक्त करने वाली ‘परदा’, ‘फूलों का कुरता’, ‘प्रतिष्ठा का बोझ’ आदि कहानियां है। दूसरी ओर श्रमशील विश्व के संघर्ष और शोषण तंत्रा की विरोधी कहानियां हैं, जिनमें ‘राग’, ‘कर्मफल’, ‘वर्दी’ तथा ‘आदमी का बच्चा’ महत्वपूर्ण कहानियां हैं। पुरातन मूल्यों, अप्रासंगिक रूढ़ियों और नैतिक निषेधों को तिरस्कृत करने का उनका ढंग वैयक्तिक है। धारदार व्यंग्य उनकी अभिव्यंजना का सर्वाधिक सबल अस्त्रा है। यशपाल में जहां कथ्यगत समृद्धि है वहीं शिल्पगत प्रभाव भी है। कुछ प्रगतिवादी कहानीकारों की तरह उनकी कहानियों में शिल्प का अवमूल्यन नहीं दिखलाई पड़ता है।

रांगेय राघव

रांगेय राघव की कहानियां माक्र्सवादी बोध से सम्पन्न होकर भी कहीं-कहीं उससे बाहर जाती हुई दृष्टिगोचर होती है। अनुभव की वास्तविकता उनकी प्रथम विशेषता है। रांगेय राघव की सर्वश्रेष्ठ कहानी मदल है।

बेचन शर्मा उग्र

बेचन शर्मा ‘उग्र’ को प्रेमचंद युगीन कहानीकारों में गिना जाता है। वास्तव में उनकी कहानी कला का उमभांश प्रेम चंदोत्तर युग में ही अस्तित्व में आया। वे घोषित माक्र्सवादी न थे लेकिन सामाजिक विसंगतियों को उधेड़ने में वे प्रगतिशीलता का परिचय देते हैं। ‘कला का पुरस्कार’, ‘ऐसी होली खेलो लाल’, ‘उसकी मां’ आदि उनकी श्रेष्ठ कहानियां हैं।

उपेन्द्र नाथ ‘अश्क’

अश्क को न तो प्रगतिवादी कहानीकार कहा जा सकता है न व्यक्तिवादी। डॉ. रामदरश मिश्र ने अश्क के माक्र्सवादी दृष्टिकोण को लेकर कहानी लिखने वालों को प्रगतिशील कोटि में रखा है। वस्तुत: अपनी संवेदना के दृष्टिकोण से वे प्रगतिशील कथा चेतना से स्पष्ट अलगाव रखते हैं। उनके भाषा शिल्प पर प्रेम चन्द का गहन प्रभाव दिखलाई पड़ता है। एक ओर अश्क ने ‘डाची’ और ‘कांड़ा का तेली’ जैसी अति चुस्त प्रभावशाली कहानियां लिखी हैं वहीं दूसरी ओर ‘एंबेसडर’ तथा ‘बेबसी’ जैसी यौन समस्याओं वाली कहानियों में उनको सफलता नहीं मिली है। उनकी कहानियों पर टिप्पणी करते हुए हृषिकेश ने लिखा है - “वह इतनी सपाट और आत्मीय हैं कि पढ़कर चिंता नहीं होती, न खेद होता है, न आश्चर्य न जिज्ञासा और न ही व्यामोह, केवल तरल अनुभूति देने वाली अश्क की कहानियां अन्वेषण तो करती हैं अन्वेषक नहीं बनाती और पाठक के समक्ष आत्म निर्णय का संचार नहीं करती।” अश्क की बहुत सी कहानियों पर यह टिप्पणी सटीक बैठती है।

भगवती चरण वर्मा

भगवती बाबू अपनी व्यंग्यात्मक कहानियों के लिए चर्चा का विषय बने रहे। उनको प्रतिष्ठित करने में ‘प्रायश्चित’, ‘दो बांके’, और ‘मुगलों ने सल्तनत बख्श दी’ आदि कहानियों का विशेष योगदान रहा है। किन्तु ‘मोर्चा बंदी’ संग्रह की कहानियां उनको चुकाने में सहयोगी सिद्ध हुई है।

इन कहानीकारों के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक कहानीकारों में भगवती प्रसाद वाजपेयी तथा पहाड़ी का नाम भी उल्लेखनीय है। प्रगतिवादी कहानीकारों में भैरव प्रसाद गुप्त तथा अमृत राय का भी कहानी साहित्य को प्रमुख योगदान है।

चतुर्थ चरण (सन् 1956-1975 ई.)

हिंदी कहानी के चतुर्थ चरण में जैनेंद्र द्वारा प्रवर्तित मनो-विश्लेषण की परंपरा का विकास हुआ। भगवती प्रसाद वाजपेयी तथा राम प्रसाद आदि का योगदान मिला।

भगवती प्रसाद वाजपेयी

वाजपेयी ने अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक सत्यों को उद्घाटित किया। उनके अनेक कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें ‘हिलोर’, ‘पुष्करिणी’ तथा ‘खाली बोतल’ आदि प्रमुख हैं। उनकी कहानियोंं में ‘मिठाई वाला’, ‘झांकी’, ‘त्याग’, तथा ‘वंशीवादन’ आदि श्रेष्ठ कहानियां मानी जाती हैं। भगवती चरण वर्मा ने कहानी के क्षेत्रा में असाधारण सफलता प्राप्त की है। उनमें विश्लेषण की गरिमा तथा गंभीरता है। मार्मिकता एवं रोचकता का गुण भी विद्यमान है। उनके कहानी-संग्रह ‘खिलते-फूल’, ‘इंस्टालमेंट’ तथा ‘दो बांके’ आदि उल्लेखनीय हैं।

सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

चतुर्थ चरण के मनोवैज्ञानिक कहानीकारों में भी अज्ञेय का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने मनोविश्लेषण परंपरा को और आगे बढ़ाया है। ‘विपयाग’, ‘परंपरा’, ‘कोठरी की बात’ तथा ‘जयदोल’ इनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं।

इला चन्द्र जोशी

इनके कहानी संग्रह ‘रोमांटिक छाया’, ‘आहूति’ तथा ‘दीवाली और होली’ आदि हैं। जोगी ने मनोविज्ञान के सत्यों का उद्घाटन किया जिससे अन्य लेखकों की अपेक्षा इनका अधिक मर्मस्पश्र्ाी रूप सामने आया।

उपेंद्र नाथ ‘अश्क’

सामाजिक विषयों को अपनाने वाले लेखकों में उपेंद्रनाथ ‘अश्क’ का नाम चतुर्थ चरण में भी प्रमुख है। उनकी कहानियों में ‘पिंजरा’, ‘पाषाण’, ‘मोती’, ‘दूलो’, ‘मरुस्थल’, ‘गोखरू’, ‘खिलौने’, ‘चट्टान’, ‘जादूगरनी’ तथा ‘चित्राकार की मौत’ आदि प्रमुख हैं। इनको अत्यधिक लोकप्रियता मिली। अश्क की विषय वस्तु, शैली एवं रोचकता की दृष्टि से प्रेम चंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कहानीकार हैं।

यशपाल

यशपाल ने अपनी कहानियों में आधुनिक समाज की विषमताओं पर करारा व्यंग्य किया हैं उनकी कहानियों में पराया सुख, ‘हलाल का टुकड़ा’, ‘ज्ञान दान’, ‘कुछ न समझ सका’, ‘जबरदस्ती’ तथा ‘बदनाम’ आदि उल्लेखनीय हैं।

चन्द्रगुप्त विद्यालंकार

विद्यालंकार का कहानी क्षेत्रा में विशेष नाम है। आपकी कहानियों के द्वारा कहानी-कला का विकास हुआ है। विद्यालंकार के कहानी संग्रह ‘चन्द्रकला’ तथा ‘अमावस’ है।

राम प्रसाद पहाड़ी

पहाड़ी का हिंदी कहानी को विशेष योगदान है। पहाड़ी के कहानी संग्रह ‘सड़क पर’, ‘मौली’ तथा ‘बरगद की जड़े’, आदि उल्लेखनीय हैं।

हास्य रस की कहानियां

हिंदी में हास्य रस की कहानियां लिखने वालों में जी.पी. श्रीवास्तव, हरिशंकर शर्मा, कृष्ण प्रसाद गौड़, बेढब बनारसी, अन्नपूर्णानंद, मिर्जा अजीम बेग, चुगताई तथा जयनाथ नलिन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। जी.पी. श्रीवास्तव की कहानियों में अत्यधिक वैविध्य उपलब्ध है। इनकी कहानियों में ‘पिकनिक’, ‘भड़ाम सिंह शर्मा’, ‘गुदगुदी’ तथा ‘लतखोरी लाल’ आदि महत्वपूर्ण हैं। उनका हास्य साधारण स्तर का है। ‘बेढब बनारसी’ और ‘अन्नपूर्णानंद’ की कहानियों में अधिक परिष्कृत हास्य मिलता है। अन्नपूर्णानंद की कहानियों में ‘महाकवि चच्चा’, ‘मेरी हजामत’, ‘मगन रहु चोला’ आदि उल्लेखनीय हैं। मिर्जा ने ‘गीदड़ को शिकार’, ‘लेफ्टिनेंट’, ‘कोलतार’ आदि कहानियां लिखीं। नलिन के कहानी संग्रह में ‘नवाबी सनक’, ‘शतरंज के मोहरे’, ‘जवानी का नशा’, ‘टीलों की चमक’, आदि उल्लेखनीय हैं।

चतुर्थ चरण को स्वतंत्रयोत्तर हिंदी कहानी युग भी कहा जाता है। इस अवधि में तीन पीढ़ियों की लिखी कहानियां आती हैं- 

1. यशपाल, जैनेंद्र, भगवती चरण वर्मा जैसे पुरानी पीढ़ी के कहानीकार सक्रिय रहे।

2. आजादी मिलने के समय वयस्क हो रही पीढ़ी के कहानीकारों राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मन्नू भंडारी, रेणु, मोहन राकेश आदि ने खूब कहानियां लिखीं।

3. सन् 1960 ई. के अत में युवा पीढ़ी ने लिखना प्रारंभ किया जिसने स्वतंत्रा भारत में आंखे खोली थीं। इस पीढ़ी के कहानीकारों में ज्ञानरंजन, रवींद्र कालिया, कामता नाथ, इब्राहिम शरीफ, हिमांशु जोशी तथा महीपाल सिंह आदि प्रमुख हैं। स्वतंत्रता के बाद की हिंदी कहानी का इतिहास आंदोलन का इतिहास है। चार-पांच साल की अवधि बीतते-बीतते एक आंदोलन उठ खड़ा होता रहा जिसे लेकर खूब ढोल पिटे तथा नारे लगे। इसके परिणामस्वरूप कहानी एक गंभीर एवं केन्द्रीय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हो गई। सन् 1950 ई. के बाद कहानी में एक नवीन मोड़ आया जिससे नई कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी सहज और समानांतर कहानी के अलग अलग झंडे लहराने लगे। इस ढाई-तीन दशक की अवधि में ढेरों अच्छी बुरी कहानियां लिखी गईं। नई कहानी के नई होने की घोषणा कम, स्वतंत्रता पूर्व की कहानी के पुरानी हो जाने की घोषणा अधिक थी। 

सन् 1950 ई. तक आते आते ऐसा प्रतीत होने लगा कि जैनेन्द्र की चौंकाने वाली दार्शनिक कथा, मुद्रा, अज्ञेय की सतही प्रगतिशील कहानियां तथा कथा एवं शिल्प के द्वंद्व में फंसी हुई यशपाल की कहानियों की प्रासंगिकता समाप्त प्राय है। ऐसा प्रतीत होता था कि या तो वे कहानीकार बुझ चुके हैं अथवा कहानी लेखन का आत्म विश्वास उन्हें अनाथ बनाकर चला गया है। ऐसी स्थिति में एकाएक कहानी के नएपन के आग्रह का उभर कर आंदोलन का रूप ग्रहण कर लेना आकस्मिक घटना नहीं अपितु पुराने के प्रति नए का विद्रोह तथा नवीन कहानी लेखक की तड़प तथा छपास है।

हिंदी कहानी साहित्य की अभिवृद्धि में महिला कहानीकारों ने भी कम योगदान नहीं किया है। सुभद्रा कुमारी चौहान, उमा नेहरू, शिवरानी देवी, तेजरानी पाठक, ऊषा देवी मित्रा, सत्यवती मलिक, कमला देवी चौधरानी, महादेवी वर्मा, चंद्रप्रभा, तारा पांडेय, चन्द्र किरण सौन रिक्शा, रामेश्वरी शर्मा, पुष्पा महाजन, विद्यावती शर्मा आदि ने अनेक कहानियों की रचना की है। इनकी कहानियों में प्राय: पारिवारिक जीवन और हिंदी समाज में नारी की दारुण स्थिति के चित्रा हैं। फिर वे जीवन के उस गरिमा द्वंद्व को उस व्यापक दृष्टि से आंकने में सफल नहीं हो सकी हैं जैसा कि विश्व के महान कहानीकारों ने किया है। 

पंचम चरण (सन् 1976 से आज तक)

नई कहानी नामकरण

कमलेश्वर का कथन है कि जितेंद्र एवं ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने कहानी को नवीन रूप देने का प्रयास किया। कहानी के नवीन रूपों को ‘नई कहानी’ नाम देने का श्रेय दुष्यंत कुमार को है। डॉ. बच्चन सिंह ने सन् 1950 ई. में शिवप्रसाद सिंह द्वारा प्रकाशित ‘दादी मां’ में नयी कहानी के तत्वों का अवलोकन किया। उनके विचार से सन् 1956-57 में नई कविता के साम्य पर इसका नाम ‘नई कहानी’ रख दिया गया। सूर्य प्रकाश दीक्षित नई कहानी के शुभारंभ का श्रेय कमलेश्वर मोहन राकेश तथा राजेन्द्र यादव को संवेत रूप में देते हैं। वास्तव में किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों को किसी आंदोलन का श्रेय देना उचित प्रतीत नहीं होता है। सार्थक आंदोलन परिवेश की मांग तथा पूरी पीढ़ी के प्रयास की उपज होता है। 

हिंदी कहानी साहित्य में नएपन का प्रारंभ ‘पूस की रात’, ‘नशा’ तथा ‘कथन’ जैसी कहानियों से हो चुका था। सन् 1950 ई. तक आते आते कहानी के कथा शिल्प में पर्याप्त परिवर्तन हो चुका था। नएपन की यह प्रवृत्ति सन् 1956.57 ई. में आंदोलन का रूप ग्रहण कर चुकी थी। डॉनामवर सिंह उन आलोचकों में से हैं जिन्होंने नई कहानी के प्रवक्ता की भूमिका निभाई है। कहानी के नववर्षांक सन् 1956-58 में प्रकाशित उन लेखों से इस आंदोलन को अति बल मिला।

नई कहानी उस समय लिखी गई जब कहानीकारों में देश की स्वतंत्रता को लेकर संशय की भावना का उदय हो रहा था। मोह भंग की पृष्ठ भूमि का निर्माण हो रहा था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के विभाजन के फलस्वरूप बड़े पैमाने पर मूल्य संक्रमण तथा मूल्य-विघटन का परिवेश तैयार हो गया था। राजनीतिक पृष्ठभूमि में भी सेवा, त्याग, करुणा, सत्य, पे्रम आदि गांधीवादी मूल्य कड़ी आजमाइश में पड़ गए थे। डॉ. भगवान दास वर्मा का कथन है, “परंपरावादी जीवन-दर्शन की असारता, भारतीय संस्कृति की नए युग के संदर्भ में निरर्थकता, स्वतंत्राता प्राप्ति और भ्रम भंग की अवस्था, जीवनादर्शों की अनिश्चितता, व्यक्ति जीवन, अकेलेपन एवं अजनबीपन एहसास आदि अनुभूत सत्यों के अनेक स्तरीय संदर्भों के परिपाश्र्व पर नई कहानी विकसित हो रही है।

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